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Saturday, October 24, 2009

शोधपत्र- कहाँ तक पहुँची है हिन्दी-ब्लॉगिंग

गये सितम्बर शिमला में भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान द्वारा आयोजित हिंदी अध्‍ययन सप्‍ताह के दौरान आखिरी दिन के सत्र में ब्लॉगर राकेश कुमार सिंह ने 'हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा-दिशा' पर एक पर्चा पेश किया गया था। राकेश ने इस पर्चा को तैयार करने में एक महीना की मेहनत लगाई। काफी-कुछ समेटा है। कम से कम यह उन पाठकों के लिए हिन्दी-ब्लॉगिंग को कम शब्दों में पूरा जान लेने का आसान चैप्टर ज़रूर हैं जो हिन्दी ब्लॉगिंग में डेब्यू कर रहे हैं......................


हिन्‍दी चिट्ठाकारी: एक और नई चाल?

राकेश कुमार सिंह


अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- वीब्लॉगकार्टून

क्‍या है चिट्ठाकरी

राकेश कुमार सिंह

उत्तर बिहार के तरियानी छपरा की पैदाइश। 15 बरस पहले मैनेजमेंट का ख़्वाब लिए दिल्ली टपके। दूसरे साल छात्र-आंदोलन की संगत में आ गये। बृहत्तर सामाजिक सवालों से रू-ब-रू हुये। लिखने-उखने में दिलचस्‍पी थी। कुछ समय तक फ्रीलांसिंग, अनुवाद, इत्‍यादि के रास्‍ते शोध की दुनिया में उतरे। मीडिया, बाजार, शहर और श्रम पर माथापच्ची कर रहे है। तीन 'मीडियानगर' का संपादन कर चुके हैं। सराय और सफ़र के बीच डोलते हुए सामुदायिक मीडिया में दिलचस्पी जगी। प्रयोग जारी है और सहयोगियों की तलाश भी। फ़ोन- +91 9811 972 872
लेखक का चिट्ठा- हफ्तावार
21 अप्रैल 2003 हिंदी चिट्ठाकारी के लिए ऐतिहासिक दिन था. लगभग एक दर्जन से अधिक सक्रिय ब्लॉग्स और वेबसाइट्स इस बात की पुष्टि करते हैं और आलोक कुमार के 9-2-11 को हिंदी का सबसे पहला चिट्ठा का दर्जा देते हैं. 21 अप्रैल 2003 को अपने पहले ब्‍लॉग-पोस्ट में आलोक लिखते हैं:

चलिये अब ब्लॉग बना लिया है तो कुछ लिखा भी जाए इसमें। वैसे ब्लॉग की हिन्दी क्या होगी? पता नहीं। पर जब तक पता नहीं है तब तक ब्लॉग ही रखते हैं, पैदा होने के कुछ समय बाद ही नामकरण होता है न। पिछले ३ दिनों से इंस्क्रिप्ट में लिख रहा हूँ, अच्छी खासी हालत हो गई है उँगलियों की और उससे भी ज़्यादा दिमाग की। अपने बच्चों को तो पैदा होते ही इंस्क्रिप्ट पर लगा दूँगा, वैसे पता नहीं उस समय किस चीज़ का चलन होगा...1



आलोक के इस पोस्‍ट पर ग़ौर करें तो ब्लॉग के नामकरण और फॉण्‍ट को लेकर उनकी परेशानी साफ़ झलकती है. आज छह साल बाद न केवल आलोक की दोनों परेशानियों का हल ढूंढ लिया गया है बल्कि हिंदी ब्‍लॉग अन्‍य भारतीय भाषाओं, और कहें तो अंग्रेज़ी को भी पछाड़ने की स्थिति में आ चुका है. भारत में इंटरनेट उपयोक्‍ताओं पर ‘जक्‍स्‍ट कंसल्‍ट’ नामक एक कंपनी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार

कुल इंटरनेट इस्‍तेमालकर्ताओं में से 44 प्रतिशत ने हिंदी वेवसाइटों के प्रति उत्‍साह जताया जबकि 25 प्रतिशत उपयोक्‍ता अन्‍य भारतीय भाषाओं में इंटरनेट पर काम-काज़ के प्रति उत्‍सुक दिखे. अंग्रेज़ी को विश्‍वव्‍यापीजाल का पर्याय मान चुके लोगों के लिए सचमुच यह आंख खोलने वाला अध्‍ययन है ...2



वाकई आज क़रीब साढ़े छह साल बाद हिंदी में लगभग 12 हज़ार से ज़्यादा ब्‍लॉग्‍स, 1 हज़ार से ज़्यादा वेबसाइटें तथा 50 हज़ार से ज़्यादा वि‍किपृष्‍ठ3 हैं, और 12 लाख से ज़्यादा पन्‍ने इंटरनेट पर लिखे जा चुके हैं. हो सकता है कि इन आंकड़ों में सौ, दो सौ का अंतर आ जाए पर ये हक़ीक़त है कि आज अंतर्जाल पर हिन्‍दी फ़र्राटे से दौड़ रही है. ऐसे में ज़रूरी है कि इंटरनेट पर हिंदी के इस्‍तेमाल, उसके स्‍वरूप और अन्‍तर्वस्‍तु पर थोड़ा विचार किया जाए. निश्चित तौर पर चिट्ठा इसके लिए एक मुकम्‍मल ज़रिया है क्‍योंकि यह इंटरनेट पर हिंदी बरतने का एक वृहद मंच बन चुका है.

यूं देखा जाए तो अब तक ब्‍लॉग की कोई औपचारिक परिभाषा गढ़ी नहीं गयी है. हालांकि हर ब्‍लॉगर के पास ब्‍लॉगिंग की कोई न कोई परिभाषा ज़रूर है. किसी के लिए यह एक ऐसी डायरी है जिसका पन्‍ना कोई फ़ाड़ नहीं सकता और इस प्रकार इसमें एक ऑनलाइन अभिलेखागार बनने की पर्याप्‍त संभावना दिखती है. कुछ के लिए यह पत्रकारिता का अद्भुद माध्‍यम है: एक ऐसा माध्‍यम जो अब तक उपलब्‍ध तमाम माध्‍यमों से ज़्यादा अवसरयुक्‍त है, जहां अब तक की तमाम मानक लेखन शैलियों और भाषा से इतर मनचाहा ईज़ाद और इस्‍तेमाल करने की बेइंतहां आज़ादी है: लेखक, रिपोर्टर और संपादक सब ब्‍लॉगर ख़ुद होता है. कुछ लोगों के हिसाब से यह स्‍वांत: सुखाय लिखा जाता है, और ऐसा लिखकर लोग अपने मन की भड़ास निकालते हैं. ‘भड़ास’ का तो टैगलाइन ही है:

अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिये, मन हल्का हो जाएगा...4



हालांकि अपनी समृद्ध मौखिक परंपरा के बरअक्‍स ब्‍लॉग के बारे में जो छिटपुट लिखा गया है उनमें सुश्री नीलिमा चौहान का शोधपत्र ‘अंतर्जाल पर हिंदी की नई चाल: चन्‍द सिरफिरों के खतूत’ प्रमुख है. ब्‍लॉग को परिभाषित करते हुए नीलिमा लिखती हैं :

... चिट्ठे या ब्‍लॉग, इंटरनेट पर चिट्ठाकार का वह स्‍पेस है जिसमें वह अपनी सुविधा व रुचि के अनुसार सामग्री को प्रकाशित कर सार्वजनिक करता है. इस चिट्ठे का तथा इसकी हर प्रविष्टि का जिसे पोस्‍ट कहते हैं एक स्‍वतंत्र वेब – पता होता है. सामान्‍यत: पाठकों को इन पोस्‍टों पर टिप्‍पणी करने की सुविधा होती है! यदि चिट्ठाकार स्‍वयं इस पते को मिटा न दे तो यह सामग्री इस वेबपते पर सदा – सर्वदा के लिए अंकित हो जाती है. अंतर्जाल के सूचना प्रधान हैवी ट्रैफिक – जोन से परे व्‍यक्तिगत स्‍पेस में व्‍यक्तिगत विचारों और भावों की निर्द्वंद्व सार्वजनिक अभिव्‍यक्ति को ब्‍लॉगिंग कहा जा सकता है.5




अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- वीब्लॉगकार्टून

तमाम मौखिक और लिखित परिभाषाओं के मद्देनज़र मेरा ये मानना है कि ब्‍लॉग स्‍वांत: सुखाय कदापि नहीं हो सकता. ब्‍लॉग पर प्रकाशित हो जाने के बाद उस लिखे हुए के साथ लेखक और प्रकाशक के अलावा पाठक भी जुड़ जाता है. यह पाठक पर निर्भर करता है कि वह उस लिखे पर सहमति-असहमति, ख़ुशी-नाख़ुशी, तारीफ़ या खिंचाई में से, जो चाहे करे. मेरा यह मानना है कि किसी भी प्रकार की अभिव्‍यक्ति के सार्वजनिक हो जाने के बाद उसका एक असर होता है. हर ब्‍लॉगलिखी किसी न किसी सामाजिक पहलू, प्रक्रिया, प्रवृत्ति, परिस्थिति या परिघटना पर उंगली रख रही होती है, कुछ उकेर रही होती है, कहीं उकसा रही होती है, या फिर कुछ उलझा या सुलझा रही होती है. मिसाल के तौर पर 12 सितंबर 09 को कसबा पर रवीश कुमार की इस अभिव्‍यक्ति पर ग़ौर कीजिए:

आज हिंदी डे है। कई सरकारी दफ्तरों में बाहर भगवती जागरण की बजाय पखवाड़ा वाला बैनर लगा है। पखवाड़ा। फोर्टनाइट का फखवाड़ा। इस फटीचर कांसेप्ट की आलोचना बड़े बड़े ज्ञानीध्यानी बिना बताये कह गए हैं कि पेटीकोट कैसे पुलिंग है और मूंछ कैसे स्त्रीलिंग है। हर भाषा इस तरह की दुविधाओं के साथ बनी होती है। अब हिंदी के साथ डेटिंग किया जाना चाहिए। डेट विद हिंदी।नवरतन तेल,विको वज्रदंती,डॉलर अंडरवियर और बाक्सर बाइक का उपभोग करने वाला हिंदी का बाज़ार। एक अखबार ने विज्ञापन दिया कि इस दीवाली पर हमारे पाठक पांच लाख वाशिंग मशीन खरीदेंगे। आप विज्ञापन देंगे न। हद है। यही ताकत है हिंदी की। और भाषा की ताकत क्यों हो। भाषा को कातर ही होना चाहिए। रघुवीर सहाय ने क्यों लिखा कि ये दुहाजू(स्पेलिंग सही हो तो) की बीबी है। मुझे तो ये दुहाई हुई गाय लगती है। जिसका अब दिवस नहीं मनना चाहिए। जिसके साथ अब डेटिंग करना चाहिए। चैट करनी चाहिए। चैट स्त्रीलिंग है या पुलिंग। किसने बताया कि क्या है।6



रवीश की इस अभिव्‍यक्ति को आप ये कहेंगे कि उन्‍होंने उपर्युक्‍त बातें यूं ही ख़ुद को ख़ुश करने के लिए लिखा है? मुझे तो इसमें साल में एक दिन हिंदी को धो-पोछ कर सजाने की दृष्टि से फ्रेम में जड़ कर दीवार पर टांगने जैसी औपचारिकता का प्रतिरोध झलकता है. ज़रा रवीश की पोस्‍ट पर सतीश पंचम की टिप्‍पणी पर ग़ौर करते हैं:

वैसे ये बात तो सच है कि हाशिये, चिंतन, संगोष्ठी जैसे शब्द सुनते ही जहन में बूढे पोपले चेहरे, श्वेत बालों वाले लोगों की तस्वीर उभरती है।
एक गीत सुना था जिसमें 'दिल' शब्द की जगह 'हृदय' शब्द का इस्तेमाल हुआ था - वह गाना था... कोई जब तुम्हारा 'हृदय' तोड दे....। खोज बीन करने पर एक औऱ गीत का पता चला - अनामिका फिल्म का जिसमें पूरा तो याद नहीं पर कहीं अंतरे में शब्द है कि ...तुझे 'हृदय' से लगाया...जले मन तेरा भी...तू भी तडपे.....
इन दो गीतों के बाद मैंने थोडा सोचना शुरू किया कि आखिर क्यों फिल्म लाईन में 'दिल' शब्द को 'हृदय' शब्द के मुकाबले तरजीह दी जाती है।
जो जबान पर चढे है....वही भाषा बढे है...कम से कम फिल्म लाईन में तो यही चलन है। ...



उपर्युक्‍त दोनों उद्धरणों से ये स्‍पष्‍ट हो जाता है कि ब्‍लॉग महज़ दिल को ख़ुश रखने के लिए तो नहीं लिखा जाता है, और यह भी कि कि पोस्‍ट के साथ-साथ टिप्‍पणी/प्रतिक्रिया भी ब्‍लॉगिंग का एक अहम पहलु है. यह ब्‍लॉ‍गिंग को इंटरैक्टिव बनाती है और ये इसकी बहुत बड़ी ताक़त है. अख़बारों की तरह नहीं कि संपादकीय पृष्‍ट पर कोई लेख छप गया और फिर ख़ुद उसका कतरन लिए यार-दोस्‍तों के सामने लहराते फिर रहे हैं (माफ़ कीजिएगा, मेरे साथ ऐसा लंबे समय से होता आ रहा है), किसी ने अपनी राय दे दी तो ठीक वर्ना ... आप समझ ही सकते हैं कि लेखक की क्‍या हालत होती है! और अगर किसी संवेदनशील पाठक की राय छपी भी तो कौन-से संपादक महोदय फ़ोन करके बताते हैं कि ‘बंधुवर, आपके लेख पर किसी पाठक ने सज्‍जनपुर से चिट्ठी भेजी है, देख लीजिएगा’. इधर ब्‍लॉगिंग में माल प्रकाशित हुआ नहीं कि टिप्पणी हाजिर. मन माफिक प्रतिक्रिया मिल गयी तो बल्‍ले-बल्ले वर्ना बहस खड़ा करने वाली मुद्रा में आने से कौन रोक लेगा. यानी यहां एक तो टिप्‍पणी झट से मिल जाती है, और ऐसी मिलती है कि पट आने पर भी जी खट्टा नहीं होता.

रिश्ते गढ़े पहचान दिलाए

मुझे ब्‍लॉग के बारे में एक बात और लगती है, वो ये कि किसी मसले को एक व्‍यापक ऑडिएंस तक ले जाने और एक नये दायरे से रू-ब-रू होने व रिश्‍ता बनाने का यह एक ज़बर्दस्‍त ज़रिया है. यहां अकसर ऐसा होता है कि कोई शख्‍़स आपसे कभी साक्षात न मिला हो पर आभासी दुनिया में आपकी उपस्थिति से वो वाकिफ़ हो, और अपने मन में उसने आपकी कोई छवि तैयार कर ली हो. यानी आप व्‍यापक ऑडिएंस तक तो जाते ही हैं पर उससे भी आगे बढ़कर लोग आपसे जुड़ते हैं और आपकी एक पहचान गढ़ते है. यानी यहां ब्‍लॉगबाज़ों को एक पहचान मिलती है जो नितांत उनकी आभासी उपस्थिति के आधार पर निर्मित होती है. मिसाल के तौर पर, आपसी बातचीत में साथी ब्‍लॉगर विनीत कुमार अकसर बताते हैं कि जब तक वे मीडिया की नौकरी करते थे तो सहकर्मी भी भाव नहीं देते थे. और अब उनके पोस्‍ट पढ़-पढ़ कर मीडिया से बाबाओं के फ़ोन उनके पास आते हैं और घर आने का न्‍यौता भी.

कहां तक पहुंचा ब्‍लॉग

अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- रामब्लिंग विद् वेलूर
अप्रैल 2004 में जब आलोक ने 9-2-117 की शुरुआत की थी, तब महत्त्वपूर्ण सवाल ये था कि पाठक कौन होगा. हालांकि आलोक और उनके टेकमित्रों ने मिलकर उस समस्‍या को एक हद तक सुलझा लिया. कुछ ग़ैर-तकनीकी पृष्‍ठभूमि के लोगों को भी ऑनलाइन और फ़ोन प्रशिक्षण के मार्फ़त इस बात के लिए राज़ी किया कि वे भी ब्‍लॉगिंग में आएं. लोग आए भी. अगर साल 2004-2005 में आरंभ हुए ब्‍लॉगों पर विचरण करें तो आपको दो बातों का अहसास होगा: पहला ज़्यादातर आरंभिक ब्‍लॉगर टेकविशारद थे और दूसरा सब एक-दूसरे से जुड़े थे. यानी उन ब्‍लॉगरों का एक समुदाय था. वे आपस में पढ़ते-पढ़ाते थे और विशेषकर तकनीकी पक्ष को लेकर अनुसंधान किया करते थे. नुक्‍ताचीनी8, देवनागरी9, रचनाकार10, ई स्‍वामी11, फुरसतिया12 तथा प्रतिभास13 जैसे चिट्ठे और आलोक कुमार, देवाशीष चक्रवर्ती, रवि रतलामी, अनुनाद सिंह, जीतू14, जैसे चिट्ठाकारों ने ब्‍लॉग को लोकप्रिय बनाने में ऐतिहासिक भूमिका अदा की. मज़ेदार बात ये है कि इनमें से कोई भी खांटी हिंदीवाला नहीं है या यों कहें कि वे हिंदी कर-धर कर नहीं कमाते-खाते हैं. हां, वे हिन्‍दी-प्रेमी और हिंदी के प्रति समर्पित हैं, और प्रकारांतर में उनमें से ज़्यादातर ने शुरू-शुरू में शौकिया लिखना शुरू किया और आज कुछेक को छोड़कर सारे धांसू लिखाड़ बन चुके हैं.

2007 के शुरुआती महीनों में हिंदी चिट्ठों की संख्‍या तक़रीबन 700 थी और नीलिमा के मुताबिक़ उसमें तेज़ी से वृद्धि हो रही थी15. पाठकों की संख्या में भी थोड़ा-‍बहुत इज़ाफ़ा होने लगा था और लोग टेक्‍नॉल्‍जी में दिलचस्‍पी भी लेने लगे थे. 2007 तक आते-आते कुछ मुद्दे आधारित ब्‍लॉग भी अस्तित्‍व में आने लगे थे. कविताओं, कहानियों, संस्‍मरणों से आगे बढ़ कर ताज़ा ज्‍वलंत मुद्दों पर चर्चाएं होने लगी थीं. उसी साल शुरू हुए मोहल्‍ला16, कबाड़खाना17 और भड़ास जैसे सामुदायिक ब्‍लॉगों की मौज़ूदगी से बहस-मुबाहिसों को सह मिलने लगा था. तभी दिसंबर 2007 की 13 तारीख को अगले साल, 2008 की ब्लॉगकारिता कैसी हो – के बारे में वरिष्‍ठ पत्रकार और संवेदनशील ब्‍लॉगर श्री दिलीप मंडल ने अपनी राय कुछ इस तरह ज़ाहिर की:

एक रोमांचक-एक्शनपैक्ड साल का इंतजार है। हिंदी ब्लॉग नाम का शिशु अगले साल तक घुटनों के बल चलने लगेगा। अगले साल जब हम बीते साल में ब्लॉगकारिता का लेखा जोखा लेने बैठें, तो तस्वीर कुछ ऐसी हो। आप इसमें अपनी ओर से जोड़ने-घटाने के लिए स्वतंत्र हैं.18



और फिर उन्‍होंने निम्‍नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया:

हिन्दी ब्लॉग्स की संख्या कम से कम 10,000 हो ...
हिंदी ब्‍लॉग के पाठकों की संख्या लाखों में हो ...
विषय और मुद्दा आधारित ब्लॉगकारिता पैर जमाए ...
ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो ...
टिप्पणी के नाम पर चारण राग बंद हो ...
ब्ल़ॉग के लोकतंत्र में माफिया राज की आशंका का अंत हो ...
ब्लॉगर्स मीट का सिलसिला बंद हो ...
नेट सर्फिंग सस्ती हो और 10,000 रु में मिले लैपटॉप और एलसीडी मॉनिटर की कीमत हो 3000 रु ...
हैपी ब्लॉगिंग!19



जिस ऑर्डर में दिलीपजी ने शुभकामनाएं व्‍यक्‍त की थी, थोड़े-बहुत उलट-फेर के साथ भी यदि उनकी पूर्ति हो जाती तो हिंदी ब्‍लॉगिंग की सेहत में सुधार आता. बेशक 12 हज़ार से ज़्यादा ब्‍लॉग बन गए हों, मुद्दा आ‍धारित ब्‍लॉगों के पैर जमने लगे हों, असहमतियों और झगड़ों से गली-नुक्‍कड़ भी झेंपने लगे हों किंतु मठाधीशी, चारण-वंदन, मिलन समारोहों और वार्षिकियों जैसे छापे की दुनिया के रोगों से चिट्ठाकारी पूरी तरह आज़ाद नहीं हो पायी है. इंटरनेट के व्‍यापकीकरण तथा कंप्‍युटर की उपलब्‍धता में अवरोध से तो हम वाकिफ़ हैं ही.

ब्लॉग कैसे–कैसे


अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- वीब्लॉगकार्टून

पिछले पांच-छह सालों में ब्‍लॉग ने तमाम किस्‍म की अभिव्‍यक्तियों को प्रबल और मुखर बनाया है. व्‍यक्तिगत तौर पर लोग ब्‍लॉगबाज़ी कर रहे हैं, अपने ब्‍लॉग पर लिख रहे हैं; मित्रों के ब्‍लॉग के लिए लिख रहे हैं, सामुदायिक ब्‍लॉगों पर लिख रहे हैं. कई दफ़े ये लेखन असरदार भी साबित हो रहे हैं. इससे पहले कि ब्‍लॉग के अन्‍य पहलुओं पर बातचीत की जाए थोड़ी चर्चा ब्‍लॉग के स्‍वरूप पर.

अंतर्जाल पर ज़्यादातर चिट्ठे साहित्‍य-साधना में लीन नज़र आते हैं. उनमें भी भांति-भांति की कविताई करते ब्‍लॉगों की संख्‍या ख़ास तौर से ज़्यादा है. सामुदायिक ब्‍लॉगों को छोड़ भी दिया जाए तो पिछले दो-ढ़ाई सालों से व्‍यक्तिगत ब्‍लॉगों पर भी सरोकार और चिंताएं दिख रही हैं. मिसाल के तौर पर गिरीन्‍द्र के ब्लॉग अनुभव पर 10 अप्रैल 2006 को प्रकाशित उनकी पहली पोस्‍ट के इस अंश पर ग़ौर करते हैं:

... दिल्ली से नज़दीकी रिस्ता रख्नने वाले प्रदेश इस बात को भली-भाती ज़ानते है. उतर प्रदेश, हरियाणा के ज़्यादातर ग्रामीण इलाके के लोग रोज़ी-रोटी के लिए दिल्ली से सम्बध बनाए रखे है.
हरियाणा का होड्ल ग्राम आश्रय के इसी फार्मुले पर विश्वास रखता है... कृषि बहुल भुमि वाले इस गाव मे एक अज़ीब किस्म का व्यवसाय प्रचलन मे है,ज़िसे हम छोटे -बडे शहरो के सिनेमा हालो या फैक्ट्री आदि ज़गहो पर देखते है.वह है-साइकल्-मोटरसाइकल स्टैड्.दिल्ली मे काम करने वाले लोग रोज़ यहा आपना वाहन रख कर दिल्ली ट्रैन से ज़ाते है. एवज़ मे मासिक किराया देते है.
ज़ब मै होड्ल के स्थानिय स्टेशन से पैदल गुजर रहा था तो मैने एक ८० साल की एक् औरत को एक विशाल परती ज़मीन पर साईकिलो के लम्बे कतारो के बीच बैठा पाया...उस इक पल तो मै उसकी उम्र और विरान जगह को देखकर चकित ही हो गया पर जब वस्तुस्थिती का पता चला तो होडल गाव के आश्रयवादी नज़रिया से वाकिफ हुआ.जब मैने उस औरत से बात करनी चाही तो वह तैयार हो गयी और अपने आचलिक भाषा मे बहुत कुछ बताने लगी.उसने कहा कि खेती से अच्छा कमाई इस धधा मे है ...20



इस अध्‍ययन के सिलसिले में उपर्युक्‍त पोस्‍ट के बरअक्‍स 2006 के अप्रैल-मई महीने में कुछ और तलाशने के लिए मैंने तक़रीबन 80-90 ब्‍लॉगों का भ्रमण किया. ज़्यादातर पर कविताएं मिलीं. यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि तब या अब ही, जितनी प्रतिक्रियाएं कविताओं को मिलती हैं उतनी मुद्दे आधारित पोस्टों को नहीं. मिसाल के तौर पर उपर्युक्‍त पोस्‍ट पर आज तक एक प्रतिक्रिया भी नही आयी है. यानी इसे इस बात का संकेत माना जा सकता है कि मुद्दों पर लिखना कितना इकहरा काम होता है. मुझे ऐसा लगता है कि हिंदी चिट्ठाकारी से चारण-राग ख़त्‍म न होने की एक वजह ये भी है. वैसे भी कविताई या अन्‍य विशुद्ध साहित्यिक विधाओं में चारण-राग चलता आया है.

जहां तक सामुदायिक ब्‍लॉगों का प्रश्‍न है तो उनका उदय ही किसी न किसी मुद्दे, विषय या प्रसंग विशेष के कारण होता है. मिसाल के तौर पर अविनाश के ब्‍लॉग ‘मोहल्‍ला’, जो कि बाद में सामुदायिक घोषित कर दिया गया – के इस पहले पोस्‍ट पर ग़ौर करते हैं:

साथियो, नेट पर बहुत सारे पन्ने हैं, फिर इस पन्ने की कोई जरूरत नहीं थी. लेकिन हसरतों का क्या किया जाए? हम सब मोहल्ले-कस्बे के लोग हैं. पढ-लिख कर जीने-खाने की जरूरत भर शहर में रहने आते हैं और रहते चले जाते हैं. शायद हम उम्र भर शहरों में रहना सीखते हैं. हर ऊंची इमारत को फटी आंखों से देखते हैं, और ये देखने की कोशिश करते हैं कि कब इसकी फर्श पर हमारे पांव जमेंगे. लेकिन जडों से उखडना क्या इतना आसान है? आइए, हम अपनी उन गलियों को याद करें, जहां हमारी शक्ल ढंग से उभर कर आयी थी... अविनाश21



अब ‘भड़ास’ पर उसके मॉडरेटर यशवंत सिंह ने लोगों को अपने ब्‍लॉग से जोड़ने के लिए जो न्‍यौता प्रकाशित किया था, ज़रा उस पर ग़ौर फ़रमाते हैं:

भई, जीना तो है ही, सो भड़ास जो भरी पड़ी है, उसे निकालना भी है। और, इसीलिए है यह ब्लाग भड़ास। जब दिल टूट जाए, दिमाग भन्ना जाए, आंखें शून्य में गड़ जाएं, हंसी खो जाए, सब व्यर्थ नज़र आए, दोस्त दगाबाज हो जाएं, बास शैतान समझ आए, शहर अजनबियों का मेला लगे .....तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिए।22



अशोक पांडे ने जब ‘कबाड़खाना’ आरंभ किया तो लोगों को अपना हमसफ़र बनाने के लिए उन्‍होंने विरेन डंगवाल की इन पंक्तियों का सहारा लिया:

पेप्पोर रद्दी पेप्पोर
पहर अभी बीता ही है
पर चौंधा मार रही है धूप
खड़े खड़े कुम्हला रहे हैं सजीले अशोक के पेड़
उरूज पर आ पहुंचा है बैसाख
सुन पड़ती है सड़क से
किसी बच्चा कबाड़ी की संगीतमय पुकार
गोया एक फ़रियाद है अज़ान सी
एक फ़रियाद है एक फ़रियाद
कुछ थोड़ा और भरती मुझे
अवसाद और अकेलेपन से



सामुदायिक ब्‍लॉग काफ़ी हद तक अपने मिशन में सफल भी रहे. अनेक सामाजिक सरोकार के मसलों पर वहां बहसें हुई. कुछ लोगों ने बहस में प्रत्‍यक्ष यानी लेखों या विचारों के ज़रिए शिरकत की और कुछ ने टिप्‍पणी के मार्फ़त. आज इन सामुदायिक ब्‍लॉगों में से कोई ख़बर छानने में व्‍यस्‍त है तो कोई मीडिया की ख़बर ले रहा है, कुछ विचारधाराओं की रेहड़ी लगाए बैठे हैं तो कुछ पामिस्‍ट्री किए जा रहे हैं, कहीं बेटियों के बारे में आदान-प्रदान हो रहा है तो कहीं बेटों के बारे में. जिन सामुदायिक ब्‍लॉगों का अभी हवाला दिया गया उनके अलावा दर्जनों अन्‍य सामुदायिक ब्‍लॉग हैं. यह सच है कि सामुदायिक चिट्ठों से इस माध्‍यम को और ज़्यादा लोकप्रियता मिली. हालांकि, यह भी सच है कि साल 2009 के अपराह्न तक आते-आते सामुदायिक ब्‍लॉगों की धार और रफ़्तार मंद पड़नी शुरू हो गयी है. कुछ चिट्ठे तो तक़रीबन बंद हो चुके हैं, बस औपचारिक घोषणा होना बाक़ी है. मॉडरेटरों की व्‍यक्तिगत प्राथमिकताओं में आया बदलाव इसकी सर्वप्रमुख वजह लगती है. कल तक जो सामुदायिक ब्‍लॉग चला रहे थे आज डॉटकॉम चलाने लगे हैं, या यूं कहें कि कल तक जो सामुदायिक ब्‍लॉग थे आज डॉटकॉम में तब्‍दील हो रहे हैं.

बहरहाल, इतना तो तय है कि हिंदी में हर वैसे विषय, प्रश्‍न या मुद्दे पर ब्‍लॉगिंग हो रही है जो इस वक़्त आपके कल्‍पनालोक में घुमड़ रहे हैं. ये ज़रूर है कि यहां साहित्‍य का बोलबाला है. 12 हज़ार में से लगभग 10 हज़ार ब्‍लॉगों पर साहित्‍य साधना हो रही है, और उनमें भी कविताई करने वालों की तादाद ज़्यादा है. साहित्‍यकुंज, अनुभूति, बुनो कहानी, मातील्‍दा, तोत्तोचान, अंतर्मन, उनींदरा, अवनीश गौतम वग़ैरह हिंदी ब्‍लॉगिंग में प्रमुख साहित्‍य-साधना-स्‍थली हैं. उदय प्रकाश, हिंदी ब्लॉगिंग में सक्रिय बड़े साहित्‍यारों में से एक हैं. फिल्‍म और सिनेमा को समर्पित ब्‍लॉगों में इंडियन बाइस्‍कोप, आवारा हूं और चवन्‍नी चैप का स्‍थान अग्रणी है. गीतायन और रेडियोवाणी पर तमाम तरह के हिंदी गीतों का भंडारण हो रहा है. गाहे-बगाहे और टीवी प्‍लस टेलीविज़न की दुनिया में हो रहे हलचलों पर निगाह टिकाए हुए है. ज्ञान-विज्ञान, रवि-रतलामी का हिंदी ब्‍लॉग, प्रतिभास, मे आइ हेल्‍प यू, क्रमश:, देवनागरी, इत्‍यादि विज्ञान और तकनीकी से मुताल्लिक़ नए-नए अनुसंधानों की जानकारी प्रदान करने के साथ-साथ ब्‍लॉगरों को तकनीकी परेशानियों से निजात भी दिलाता है. अनुनाद सिंह इतिहास पर महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक लेखों को संकलित कर रहे हैं. रिजेक्‍ट माल, अनुभव और हाशिया जनपक्षधर पत्रकारिता और वैचारिकी के विलक्षण उदाहरण हैं, कस्‍बा, अनामदास का चिट्ठा, कानपुरनामा और फुरसतिया, उड़न-तश्‍तरी, मसिजीवी संस्‍मरणों और वैचारिकी के कुछ चुने हुए ठीहे हैं, खेती-बाड़ी अपने नाम को चरितार्थ करता इससे संबंधित जानकारियों का स्रोत है, दाल रोटी चावल पर लज़ीज़ व्‍यंजनों की जानकारी बनाने की विधि समेत एकत्रित की जा रही है, मस्‍तराम मुसाफिर अंतर्जाल पर प्रिंट वाले ‘मस्‍तराम’ की नुमाइंदगी करता है, हालांकि, साल 2005 के बाद इस पर कुछ नया माल नहीं चढ़ाया गया है.

अंग्रेज़ी ब्‍लॉगिंग के विपरीत हिंदी ब्लॉगिंग में आंदोलनों, अभियानों, संघर्षों, संगठनों या मुद्दों पर आधारित ब्‍लॉगों की संख्‍या नगण्‍य है. अंग्रेज़ी में इराक़ तथा अफ़गानिस्‍तान में अमरीकी गुण्‍डागर्दी, पाकिस्‍तान की आंतरिक हालत, जाति और जेंडर भेद, बचपन, वृद्धावस्‍था जैसे मसलों, पर्यावरण या ग्‍लोबल वार्मिंग पर चलने वाले अभियानों, तथा मानवाधिकार और पशुअधिकार आंदोलनों के बारे में समर्पित ब्‍लॉगिंग हो रही है. हिंदी में फिलहाल ये ट्रेंड नहीं बन पाया है. हालांकि, ये ज़रूर है कि अब इस माध्‍यम के प्रति आंदोलनों और संगठनों में संजीदगी दिखने लगी है और कुछेक ब्‍लॉगों की शुरुआत हुई भी है. मिसाल के तौर पर सफ़र, जहां संगठन से जुड़े कार्यक्रमों और गतिविधियों पर यदा-कदा कुछ लिखा-पढ़ा जाता है या फिर सूचना का अधिकार, जहां नियमित रूप से इस मुद्दे और इससे संबधित अभियानों की ख़बरें शेयर की जाती हैं. इस कड़ी में स्त्री प्रश्नों पर फ़ोकस्‍ड हिन्दी के पहले सामुदायिक ब्लॉग चोखेरबाली का काम सराहनीय रहा है. हिंदी के प्रचार-प्रसार और इसकी तरक्‍कती के लिए समर्पित हिंदयुग्‍म के अनूठे प्रयासों का यहां उल्‍लेख किया जाना ज़रूरी है. हिंदयुग्‍म पर तमाम विधाओं में साहित्‍य रचना के अलावा कला, संस्‍कृति और आम जन-जीवन से जुड़े प्रश्‍नों पर भी संजीदगी से चर्चा होती है.

चिट्ठाकारी को सरल और लोकप्रिय बनाने में एग्रीगेटरों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है. प्रकाशन के चंद मिनटों के अंदर चिट्ठों को व्‍यापक चिट्ठाजगत तक पहुंचाने तथा चिट्ठा संबंधी आवश्‍यक जानकारियां उपलब्‍ध कराने में एग्रीगेटरों का बड़ा योगदान है. साल 2005-06 में ही जीतू ने ‘अक्षरग्राम’ नामक हिंदी का पहला एग्रीगेटर आरंभ किया था. उसके बाद ‘नारद’ नामक एग्रीगेटर भी जीतू और उनके कुछ मित्रों के सामुहिक प्रयास से ही अस्तित्‍व में आया. साल 2007 में ‘ब्‍लागवाणी’ और ‘चिट्ठाजगत’ नामक दो और एग्रीगेटर्स अस्तित्‍व में आए और उन्‍होंने हिंदी ब्लॉगिंग को काफ़ी सहूलियतें मुहैया कीं.

कितनी सक्रिय है ये चिट्ठाकारी

18 सितंबर 2009 को दोपहर साढे चार बजे के आसपास चिट्ठाजगत के मुताबिक़ कुल 10 हज़ार 259 चिट्ठों में से कुल सक्रिय चिट्ठों की संख्‍या 40 थी. निश्चित रूप से ऐसी कोई भी सूचि स्‍थाई नहीं होती, क्‍योंकि रियल समय में सूचि में बदलाव होते रहते हैं. कभी कोई दसवें नंबर पर होता है तो चंद मिनटों या घंटे बाद वही 38वें नंबर पर या पहले नंबर पर हो सकता है या फिर सूचि में दिखे ही नहीं. बहरहाल, मैं उन ब्‍लॉगों को सक्रिय मानता हूं जिन पर हफ़्ते में दो नहीं तो कम से कम एक पोस्‍ट ज़रूर प्रकाशित होते हैं, यानी पोस्टिंग की निरंतरता बनी रहती है, और उस लिहाज़ा से देखा जाए तो हिंदी में सक्रिय ब्‍लॉगों की संख्‍या 200 के आसपास है. उड़न तश्‍तरी, गाहे-बगाहे, हिंदयुग्‍म, रचनाकार, अगड़म-बगड़म, फुरसतिया, रेडियोवाणी, कसबा, महाजाल, निर्मल-आनंद, मसिजीवी, मोहल्‍ला, कबाड़खाना, चोखेरबाली, इत्‍यादि अग्रिम पंक्ति के सक्रिय चिट्ठे हैं. लगे हाथ हिंदी चिट्टाकारी में सक्रिय लोगों की पृष्‍ठभूमि पर भी एक नज़र डाल ली जाए. दरअसल, हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में आए इस रेवल्‍यूशन के पीछे तीन अलग-अलग पृष्‍ठभूमि के लोगों का योगदान है: पेशेवर टेकीज़ (तकनीकीविशारद) जो हिंदी के प्रति कमिटेड हैं और प्रकारांतर में जिनमें लेखन एक ज़बर्दस्‍त हॉबी की तरह विकसित हुआ, पत्रकार (नियमित या अनियमित दोनों तरह के) जिन्‍हें अपने माध्‍यमों में स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करने का मुनासिब मौक़ा नहीं मिल पाता है, या जो यहां लिखकर लोगों का फ़ीडबैक हासिल करते हैं तथा उससे अपने पेशे में पैनापन लाने की कोशिश करते हैं (ऐसे लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों का भी फ़ायदा उठाते हैं) और वैसे लोग जिन्‍हें पत्रकारीय कर्म में दिलचस्‍पी है; तथा अंतिम श्रेणी में वैसे साहित्‍य-साधक शामिल हैं जिन्‍हें आम तौर पर छापे में मन माफिक मौक़ा नहीं मिल पाता है या फिर जो इस माध्‍यम की उपयोगिता देखते हुए यहां भी अपनी मौज़ूदगी बनाए रखना चाहते हैं या फिर वैसे लोग जिन्‍होंने ये ठान लिया है कि वे ब्‍लॉग के ज़रिए ही साहित्‍य सृजन करेंगे.

ब्‍लॉगिंग की सतरंगी भाषा

ज़ाहिर है जहां इतने विविध पृष्‍ठभूमियों वाले लोग ब्‍लॉगिंग कर रहे हैं वहां भाषाई विविधता तो होगी ही. मैं इस विविधता को हिंदी ब्‍लॉगिंग की पूंजी मानता हूं. यही इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत है. दरअसल, भाषाई प्रयोग और इस्‍तेमाल के मामले में अंतर्जाल पर मौज़ूद यह स्‍पेस घरों की उन दीवारों की तरह है जहां बच्‍चों को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चित्र उकेरने की आज़ादी होती है. दुहराने की ज़रूरत नहीं है कि किस हद तक यहां भाषाई प्रयोग हो रहे हैं; हां, ये ज़रूर उल्लेखनीय है कि फ़ॉर्म और एक हद तक कंटेन्‍ट को लेकर जो आज़ादी है यहां, उससे भाषा के स्‍तर पर प्रयोग करने में काफ़ी सहुलियत मिलती है. इस पर्चे में मैंने पहले कुछ चिट्ठों के नाम गिनाए थे, उन पर एक बार विचरण कर लें तो पता चल जाएगा कि सामग्री कैसे भाषा तय कर रही है या फिर क्‍या लिखने के लिए कैसी भाषा का इस्‍तेमाल किया जा रहा है.

यह सच है कि अख़बारों के लिए रिपोर्टिंग या स्‍पेशल एडिट लिखने अलावा ज़्यादातर ऑफ़लाइन लेखन (चाहे किसी भी तरह का हो) किस्‍तों में होता रहा है. जबकि ब्‍लॉग में ऐसा बहुत कम होता है. यहां तो कई बार बैठते हैं प्रतिक्रिया लिखने, बन जाता है लेख. ब्‍लॉगिंग में अकसर एक ही बैठक में लोग हज़ार-डेढ़ हज़ार शब्‍द ठेल देते हैं.

यह भी सच है कि कुछ बलॉगों, विशेषकर सामुदायिक ब्‍लॉगों ने अपनी एक शैली विकसित कर ली है और भाषा को लेकर भी वे चौकन्‍ने हैं. उनकी पोस्‍टों से गुज़रते हुए इस बात का अंदाज़ा लग जाता कि मॉडरेटर महोदय, क़ायदे से जिनका काम मॉडरेट करना भर होना चाहिए – चिट्ठों को अपनी स्‍टाइल में फिट करने के लिए किसी तरह अच्‍छा-खासा समय लगा रहे हैं. यहां इस तथ्‍य की ओर भी इशारा करना चाहूंगा कि मीडिया, विशेषकर इलेक्‍टॉनिक मीडिया वाली सनसनी और टीआरपी वाला गेम यहां भी ख़ूब प्‍ले किया जाता है. मूल पाठ से लेकर शीर्षक तक में यह ट्रेंड झलकता है.

अकसर हम देखते आए हैं कि बोलचाल में धड़ल्‍ले से प्रयोग होने वाले शब्‍दों का लेखन में बहुत कम इस्‍तेमाल होता है. पर अंतर्जाल पर स्थिति काफ़ी बदली-बदली सी दिखती है. और-तो-और यहां, क्षेत्रीय भाषाओं के शब्‍दों का भी धड़ल्‍ले से प्रयोग हो रहा है. हिंदी के कुछ ब्‍लॉग अपनी विशिष्‍ट क्षेत्रीय शैली की वजह से पॉप्‍युलर भी हुए हैं. मिसाल के तौर पर ज़रा ‘ताउ रामपुरिया’ की भाषा पर ग़ौर कीजिए:

इब राज भाटिया जी और योगिन्द्र मोदगिल जी ने गांव के चोधरी को कहा कि इस बटेऊ से सवाल पूछने का मौका ताऊ को भी दिया जाना चाहिये ! आखिर गांव की इज्जत का सवाल है ! चोधरी ने उनका एतराज मंजूर कर लिया !

बटेऊ की तो कुछ समझ नही आया कि आखिर तमाशा क्या है ? बटेऊ को यही समझ मे नही आया कि वो कैसे हार गया और ये ५ वीं फ़ेल छोरा कैसे जीत गया ! ले बेटा..और उलझ ताऊओं से !

गाम आलों का चौधरी बोला- भाई बटेऊ, तन्नै तो आज सवाल पूछ लिया ! और म्हारै गाम के छोरे ताऊ नै बिल्कुल सही जवाब भी दे दिया ! इब उसको भी तेरे तैं सवाल बुझनै का मौका देणा पडैगा ! कल दोपहर म्ह इसी चौपाल म्ह म्हारा छोरा ( ताऊ ) तेरे तैं सवाल बुजैगा अंग्रेजी म्ह और तन्नै जवाब देना पडैगा!23



दरअसल, ‘ताउ रामपुरिया’ की लेखन शैली ने हरियाणवी हिंदी को एक तरह से अंतर्जाल पर इस्‍टैब्लिश कर दिया है. उनके चिट्ठों पर मिलने वाली टिप्‍पणियां इस बात का प्रमाण हैं. इधर संजीव तिवारी जब अपने ब्‍लॉग पर अपनी भाषा के प्रति छत्तीसगढियों से अपील करते हैं तो उन्‍हें भी ठीक-ठाक समर्थन मिलता है. ज़रा देखिए उनके इस चिट्ठांश को:

छत्‍तीसगढ हा राज बनगे अउ हमर भाखा ला घलव मान मिलगे संगे संग हमर राज सरकार ह हमर भाखा के बढोतरी खातिर राज भाखा आयोग बना के बइठा दिस अउ हमर भाखा के उन्‍नति बर नवां रद्दा खोल दिस । अब आघू हमर भाखा हा विकास करही, येखर खातिर हम सब मन ला जुर मिल के प्रयास करे ल परही । भाखा के विकास से हमर छत्‍तीसगढी साहित्‍य, संस्‍कृति अउ लोककला के गियान ह बढही अउ सबे के मन म ‘अपन चेतना’ के जागरन होही । हमला ये बारे म गुने ला परही, काबर कि हम अपन भाखा के परयोग बर सुरू ले हीन भावना ला गठरी कस धरे हावन।24



कमोबेश यही स्थिति भोजपुरी और मैथिली के साथ भी है.

प्रयोग और इस्तेमाल की आज़ादी का ही नतीज़ा है कि इंटरनेट पर मस्‍तराम मार्का भाषा भी फल-फूल रही है. मिसाल के तौर पर किसी पोस्‍ट पर डॉ. सुभाष भदौरिया द्वारा की गयी इस प्रतिक्रिया पर ग़ौर करें:

यार यशवंतजी एक जमाना हो गया, न हमने किसी को गाली दी, न किसी ने हमें दी, पर इस डिंडोरची ने वही मिसाल कर दी गांड में गू नहीं नौ सौ सुअर नौत दिये. यार हम तो आप सब में शामिल सुअर राज हैं.गू क्या गांड भी खा जायेंगे साले की, तब पता पता चलेगा. नेट पर बेनामी छिनरे कई हैं, अदब साहित्य से इन्हें कोई लेना देना नहीं हैं, सबसे बड़ा सवाल इनकी नस्ल का है, न इधर के न उधर के.

भाई हम सीधा कहते हैं, भड़ासी पहुँचे हुए संत है, शिगरेट शराब जुआ और तमाम फैले के बावजूद उन पर भरोसा किया जा सकता है. इन तिलकधारियों का भरोसा नहीं किया जा सकता.कुल्हड़ी में गुड़ फोड़ते हैं चुपके चुपके.इन का नाम लेकर इन्हें क्यों महान बना रहे हैं आप. देखो हम ने कैसे इस कमजर्फ को अमर कर दिया.25



आम तौर पर हिंदी ब्‍लॉगिंग में प्रतिक्रिया देते हुए या किसी मसले पर चर्चा करते वक़्त शब्‍दकोश सिकुड़ने लगते हैं और भाषा हांफने लगती है. हिंदी ब्‍लॉगजगत ऐसी मिसालों से भरी पड़ी है. पिछली जुलाई में शीर्षस्‍थ साहित्‍यकार उदयप्रकाश से जुड़े एक प्रकरण को लेकर उठे बवंडर, इसी साल जनवरी में नया ज्ञानोदय की संपादकीय पर मचे अंतर्जालीय घमासान, या मार्च-अप्रैल में रविवार डॉट कॉम पर राजेंद्र यादव के एक साक्षात्‍कार, या फिर हाल ही में रविवार डॉट कॉम पर प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव के साक्षात्‍कार से उपजे विवाद पर ग़ौर करें तो भाषा के इस पक्ष से रू-ब-रू हुआ जा सकता है. मिसाल के तौर पर, उदयप्रकाश प्रकरण पर रंगनाथ सिंह ने हिंदी साहित्‍य में विष्‍ठावाद : अप्‍पा रे मुंह है कि जांघिया के मार्फ़त कुछ इस तरह अपनी राय ज़ाहिर की:

एक कवि हैं। सुना है उनके दोस्त उनके बारे में एक ही सवाल बार-बार पूछते रहतें हैं कि वो नासपीटा तो जब भी मुंह खोलता है, मल, मूत्र या उनके निकास द्वारों के लोक-नामों से अपनी बात का श्री गणेश करता है।

उनके मित्र आपस में अक्सर यही पूछते हैं कि अप्पा रे, उसका मुंह है कि जंघिया…??

हिंदी साहित्य के दिग्गजों (इसमें उदय प्रकाश भी शामिल हैं) ने और उनके चेलों ने उदय प्रकाश प्रकरण में हुए विवाद में बार-बार उस कवि की और उनके मित्रों को जंघिया वाले यक्ष प्रश्न की याद दिलायी।

जिस किसी ने जिस किसी के भी पक्ष या विपक्ष में लिखा, उसके खिलाफ़ दूसरे पक्ष के तीरंदाज-गोलंदाज आलोचना या भर्त्सना लिखने के बजाय गाली-गलौज पर उतर आये। या उस कवि के मित्रों की भाषा में कहें, तो इन सब के नाड़े ढीले थे।

इन सभी स्वनामधन्य कवि-लेखकों-पत्रकारों को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने अपनी आस्तीन से अपना असल शब्दकोश निकाला और उसका खुल कर प्रयोग किया। निस्संदेह उन्होंने इंटरनेशनल लेवल का सुलभ भाषा-कौशल दिखाया है।26



मेरा ये मानना है कि किसी भी माध्‍यम मे भाषा के विकास के लिए ज़रूरी है भरपूर लेखन और संवाद. जितना अधिक लेखन होगा उतने ही अधिक प्रयोग होंगे और भाषा में निखार आएगा. विगत पांच-छह सालों की हिंदी ब्‍लॉगिंग में निश्चित रूप से लेखन में उत्तरोत्तर इज़ाफ़ा हुआ है और ये इज़ाफ़ा क्‍वान्टिटी और क्‍वालिटी दोनों ही स्‍तरों पर हुआ है. पर इतना नहीं कि उसके आधार पर किसी ठोस नतीजे पर पहुंचा जाए. संवाद भी हो रहे हैं, पर संवाद के स्‍तर पर ज़्यादातर छींटाकसी या खींचातानी ही दिखती है. कुछ-कुछ प्रिंट जैसी. वैसे बेहतर होगा कि भाषाविज्ञानी इस बात की पड़ताल करें और रोशनी डालें कि हिंदी चिट्ठाकरी में बरती जाने वाली भाषा क्‍या है. तब तक मैं यही कहूंगा कि काफ़ी कुछ नया है, पहले से अलग है, हट के है, सतरंगी है.

कुछ फुटकर विचार

अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- डियर किट्टी
अंत में अंतर्जाल पर हिंदी के वर्तमान और भविष्‍य के बारे में अपनी कुछ राय साझा करना चाहूंगा. अब तक की चिट्ठाकारी को देखकर ये लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी बमबम कर रही है, हिंदी की तरक्‍की हो रही है. पर यहां मैं कुछ वैसे तथ्‍यों की ओर इशारा करना चाहूंगा जो आम तौर पर सतह पर नहीं दिखते. ग़ौरतलब है कि अंतर्जाल पर हिंदी चाहे जितनी ज़्यादा बरती जा रही हो, पर उसके पीछे हैं कुछ गिने-चुने लोग ही. ज़रा और खुलकर कहा जाए तो ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है जो एक साथ कई ब्‍लॉग चला रहे हैं, वेबसाइट चला रहे हैं, डॉट कॉम चला रहे हैं. आप अगर सक्रिय ब्‍लॉगरों की प्रोफ़ाइल पर क्लिक करेंगे तो इस बात का साक्ष्‍य आपको मिल जाएगा. दूसरी बात ये कि ब्‍लॉग, डॉटकॉम, इत्‍यादि पर चाहे जितना कुछ लिखा जा रहा हो, पाठकों की संख्‍या सीमित ही है. सीमित का मतलब ये कि वैसे लोग, आम तौर पर जिन्‍हें अंतर्जाल से कुछ लेना-देना नहीं है, उन्‍हें अब तक पाठक नहीं बनाया जा सका है. मोटे तौर पर अंतर्जाल पर पाठक वे ही हैं जो लेखक भी हैं.

यह साफ़ है कि बीते 5-6 सालों में अंतर्जाल पर, ख़ास तौर से चिट्ठाकारी के मार्फ़त हिंदी के प्रयोग और रफ़्तार में तेज़ी आयी है. ग़ौर करने वाली बात ये है कि इसने साहित्‍य, संस्‍कृति और पत्रकारिता के बहुत सारे अवयवों, मूल्‍य मान्‍यताओं, परिपाटियों तथा मानकों से ख़ुद को आज़ाद कर लिया है जिन्‍हें आधुनिकता ने अपने लिए निर्धारित किए थे. सेंसरशिप, कॉपीराइट, नियंत्रण और निगरानी जैसी आधुनिक अवधारणाएं फिलहाल दरकिनार हैं. ब्‍लॉगर्स तो जैसे दायें-बाएं, आगे-पीछे देखे बिना सरपट दौड़े चले जा रहे हैं.


संदर्भ-
1. http://9211.blogspot.com
2. http://techtree/techtee/jsp
3. http://hindyugm.com
4. http://bhadas.blogspot.com
5. http://linkitman.blogspot.com
6. http://naisadak.blogspot.com/2009/09/blog-post_12.html
7. http://9211.blogspot.com
8. http://nuktachini.blogspot.com
9. http://devnaagrii.net
10. http://rachnakar.blogspot.com
11. http://hindini.com/eswami
12. http://hindini.com/fursatiya
13. http://pratibhaas.blogspot.com
14. http://www.jitu.info
15. http://linkitman.blogspot.com
16. http://mohalla.blogspot.com

Friday, August 21, 2009

ढेन टणन....हॉलीवुड की अच्छी नकल है कमीने



बहुत हल्ला है साहब - 'कमीने...कमीने...कमीने'. आखिर हम देख ही आये. दरअसल मुझे इंतज़ार भी था इसके प्रदर्शन का. विशाल भारद्वाज का नाम उम्मीदें जगाने के लिए काफी है लेकिन...लेकिन...मुझे बहुत दुःख हुआ कि उम्मीदें पूरी नहीं हुई.....नहीं, मैं ये नहीं कह रहा कि फिल्म बुरी है. अपने तल पर फिल्म बहुत अच्छी बनी है और मुझे मज़ा आया देखने में लेकिन खुद विशाल से ही तुलना करें तो ये उनके स्तर की फिल्म नहीं है. मकबूल, मकड़ी, ब्लू अम्ब्रेला और ओमकारा बनाने वाले फिल्मकार को मैं फिल्म के उस कलात्मक स्वरुप का झंडाबरदार मानता हूँ जो सीधे दिल की रगों को छू लेती है. याद कीजिये ब्लू अम्ब्रेला में पंकज कपूर के किरदार का बारीक मनोवैज्ञानिक चित्रण, ओमकारा का अंत जहाँ अपनी निर्दोष पत्नी को सुहागरात पर नायक मार देता है और फिर उसका पश्चाताप जो आपको हिला देता है. उनकी अब तक की फिल्में किसी न किसी रूप में आपकी संवेदनाओं को हिलाती-डुलाती है लेकिन कमीने शुद्ध व्यावसायिक विषय पर बनी विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म है. हालांकि फिल्म का प्रस्तुतीकरण काबिले-तारीफ़ है. फिल्म पर निश्चित रूप से हॉलीवुड फिल्मकार Quentin Tarantino का प्रभाव है.
फिल्म की कहानी चिर-परिचित फार्मूले पर आधारित है(विशाल के लिए घिसे-पिटे कहना बुरा लगेगा..) . दो जुड़वाँ भाई हैं गुड्डू(शाहिद कपूर), जो हकलाता है और चार्ली(फिर शाहिद कपूर) जो तोतला है और स को फ बोलता है. गुड्डू सीधा-सादा है और चार्ली जुआरी है. एक लोकल मराठी गैंगस्टर भोपे(अमोल गुप्ते) है जो उत्तर भारतीयों से नफरत करता है और चुनाव लड़ने वाला है. गुड्डू से गलती ये होती है कि वो भोपे की बहन स्वीटी(प्रियंका चोपडा) से प्रेम करता है और शादी से पहले ही उनकी सुहागरात हो जाती है, उस पर गुड्डू उत्तरप्रदेश का मूल निवासी है. भोपे को जब पता चलता है तो वो अपने आदमियों को गुड्डू को मारने के लिए भेजता है.
दूसरी तरफ अपने पैसों की वसूली करके भागता चार्ली एक पुलिस अफसर की कार लेकर भाग जाता है. पुलिस अफसर एक गैंगस्टर ताशी के लिए काम करता है. कार में रखे गिटार केस में १० करोड़ की कोकीन है जो पुलिस अफसर ताशी के लिए ले जा रहा था. गुड्डू भोपे के आदमियों से बचकर भागता है और चार्ली गिटार लेकर...गुड्डू उस पुलिस अफसर के हाथ लग जाता है जो चार्ली को ढूंढ रहा है और चार्ली भोपे के हाथ लग जाता है. बस यहीं से आप घटनाओं का झूला झूलने लगते हैं. सब लोग गिटार के पीछे लग जाते हैं और आपस में गुत्थम-गुत्था होते हैं. घटनाओं को निर्देशक ने विश्वसनीय तरीके से एक सूत्र में पिरोया है. फिल्म दर्शक की उत्तेजना को अंत तक बरकरार रखती है बशर्ते कि दर्शक पूरी तरह एलर्ट है. किरदार फिल्मी होते हुए भी विश्वसनीय हैं. कुल मिलाकर कमीने एक रोमांचक फिल्म है. फिल्म की शुरुआत में आपको लग सकता है कि मज़ा नहीं आ रहा है लेकिन फिल्म धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत बना लेती है.
सब कुछ होते हुए भी मैं ये कहूँगा कि विशाल भारद्वाज व्यावसायिकता के लालच में पड़ गए हैं लेकिन कभी-कभी स्वाद बदलने के लिए फिल्मकार को इतनी छूट मिलनी चाहिए. फिल्म के अंत में एक संवाद है गुड्डू और स्वीटी के बीच जहाँ गुड्डू कहता है- 'मेरे पास तो ढंग के कपडे भी नहीं हैं' जिसके जवाब में स्वीटी कहती है- 'आइ लाइक यू विदाउट क्लोद्स'. इस संवाद के लिए वहां कोई सिचुएशन नहीं थी. बस बिना किसी बात के गुड्डू यूँ कहता है और स्वीटी यूँ जवाब देती है जो ये बताता है कि फिल्मकार ने ये संवाद सिर्फ इसलिए डाला है कि सड़कों पर बाद में इसके बारे में बातें हों.
अभिनय के मैदान में मुझे उम्मीद थी कि जैसे सैफ अली खान ने ओमकारा में चकित कर दिया था वैसा ही कुछ शाहिद के साथ होगा लेकिन अफ़सोस शाहिद औसत ही रहे, इतनी तरक्की उन्होंने ज़रूर की है कि शाहरुख खान की नक़ल बंद कर दी है फिर भी कहीं-कहीं अन्दर का शाहरुख बाहर आ जाता है. मुल्क के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक अभिनेता के पुत्र होने के बाद भी शाहरुख़ की नक़ल उन्हें शोभा नहीं देती जो खुद अपने किरदार में कभी उतर नहीं पाए. फिर भी शाहिद दो अलग-अलग चरित्रों को प्रर्दशित करने में सफल रहे हैं. प्रियंका चोपडा के अभिनय में पिछले कुछ समय में बहुत सुधार आया है. अमोल गुप्ते ने कमाल का अभिनय किया है. 'तारे ज़मीन पर' जैसी स्तरीय फिल्म का लेखक उतना ही स्तरीय अभिनेता भी है. सभी कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है जिसमे कई नए चेहरे शामिल हैं. निर्देशन और संवाद उम्दा हैं. संगीत का तो कहना ही क्या, उस क्षेत्र में विशाल ने अब तक कोई समझौता नहीं किया है. बहुत दिनों के बाद वाकई अच्छे गीत किसी फिल्म में आये हैं. गुलज़ार साहब को सलाम कर-करके मेरी कमर दुःख गई है, वे किसी भी शब्द को हाथ लगाकर जादुई बना देते हैं फिर चाहे वो 'कमीने' हो या धेला, टका, पाई हो जो यूँ तो चलना बंद हो गए हैं लेकिन गुलज़ार साहब ने ऐसा चलाया कि बेशकीमती हो गए. स्क्रीनप्ले बहुत दिलचस्प और कसा हुआ है.
अंगरेजी अखबारों में समीक्षक इस बात से बेहद खुश हैं कि विशाल ने टोरेंतिनो की तरह की फिल्म बनाई है और इसकी तुलना वे बहुत सी अंगरेजी फिल्मों से कर रहे हैं लेकिन शायद वे ये भूल जाते हैं कि एक अंगरेजी अखबार में समीक्षक होने पर भी वे भारतीय ही हैं. टोरेंतिनो की फिल्में मनोरंजक होती हैं लेकिन उन्हें महान नहीं कहा जा सकता और मेरे हिसाब से विशाल उनसे ज्यादा प्रतिभाशाली हैं. वे लोग इसलिए भी खुश है कि फिल्म की नायिका जो मध्यमवर्गीय प्रष्ठभूमि से है, सेक्स के बारे में खुल कर बातें करती है और वे इसे नारी स्वतंत्रता मानते हैं. अफ़सोस ये है कि नारी स्वतंत्रता सिर्फ शराब, सिगरेट और सेक्स के इर्द-गिर्द ही घूमकर रह गई है. पुरुष तो ठीक है खुद नारी भी अपनी स्वतंत्रता इन्ही चीज़ों में खोज रही है. उन्हें ये समझना ज़रूरी है कि स्वतंत्रता पुरुष की बुरी आदतों की नक़ल में नहीं है बल्कि अपने स्वभाव की गरिमा को स्थापित करने में है.
फिल्म में एक अच्छा मुद्दा उठाया गया है लेकिन वो उठा ही रह गया. मुद्दा आजकल की नफरत की राजनीति का जहाँ महाराष्ट्र के कुछ नेता दूसरे प्रांत के लोगों के लिए नफरत फैलाकर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं. वास्तव में इन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं है, इन्हें चुनाव जीतना है बस यही इनका एकमात्र धर्म है. मेरे हिसाब से इन्हें भी आतंकवादियों में शुमार किया जाना चाहिए पर करेगा कौन? नेता खुद ऐसा करेंगे नहीं और अवाम तो कब का सो गया.
ये अलग से एक लम्बी बहस का विषय है, हम फिर से फिल्म पर आते हैं. कुछ कमियां होते हुए भी फिल्म बहुत अच्छी है. मेरा आशय इतना ही है कि पिछली फिल्मों के मुकाबले इस बार विशाल भारद्वाज थोड़े से कमज़ोर रहे.
एक बात और साबित होती है कि फिल्म की कहानी लीक से हटकर न होते हुए पुराने ढर्रे की ही हो लेकिन निर्देशक में अगर कूवत है तो वो उस पर एक बेहतरीन फिल्म बना सकता है.

मेरी तरफ से ५ में से ३.८ और आप मोल-भाव करेंगे तो ४ तक दे दूंगा लेकिन उससे ज्यादा नहीं :)

अनिरुद्ध शर्मा

Tuesday, August 04, 2009

वह बार-बार बुदबुदाती कि मैं बहुत बुरा हूं

ब्लू फिल्म-भाग 5

लता कम्प्यूटर सीखने लगी थी। उसकी नई चीजों को सीखने की ललक देखकर मुझे अचरज होता था। मुझ पर तो पुरानी बातों और यादों का बोझ ही इतना बढ़ता जाता था कि मैं ठीक से जीता रहूं, यही मुझे काफ़ी लगने लगा था। वह अब शाम को एक घंटा और देर से आती थी। तब तक अँधेरा होने लगता था। माँ-पिताजी मुझे उसे लेने जाने के लिए कहते थे, लेकिन मेरा मन नहीं करता था। मैं चुप अँधेरे में पड़ा रहता। माँ पिताजी बूढ़े होते जा रहे थे। मैं उनके लिए भी चिंतित होता था, लेकिन कुछ नहीं कर पाता था। नई सरकार आने में अभी वक़्त था।
लता पड़ोस के चार पाँच बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी। कभी कभी मुझे लगता था कि वह मुझे अपमानित करने के लिए ऐसा कर रही है। उस पर वह दिनभर झूठा लाड़ भी दिखाती थी तो मुझे गुस्सा आता था। वह रात को सोने से पहले मेरे लिए दूध लेकर आती तो मैं उसे डाँट देता था। वह रूआँसी हो जाती और दूध रखकर चुपचाप चली जाती। हमारे घर में दो कमरे थे। एक में मैं सोता था और एक में माँ, पिताजी और लता। मुझे अक्सर बहुत देर में नींद आती थी।
एक दिन रागिनी का फ़ोन आया। फ़ोन माँ ने उठाया। अमूमन मेरे लिए कोई फ़ोन नहीं आता था, इसलिए मैं फ़ोन के बिल्कुल पास भी बैठा होता तो भी फ़ोन नहीं उठाता था। हमारी कई माँएं थीं, इसलिए एक माँ बाहर आँगन धो रही होती थी तो दूसरी दौड़कर फ़ोन उठाने आती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। माँ बहुत अच्छे स्वभाव की थी लेकिन शक्की थी। कोई लड़की मुझे फ़ोन करेगी, यह सोचकर ही वह काँप जाती होगी। रागिनी ने मुझे बुलाने के लिए कहा तो माँ ने ढेर सारे सवालों की झड़ी लगा दी। .....कौन हो, कहाँ से हो, किसकी बेटी हो, क्या काम है..... उसने नाम बताया और अगले सवाल पर फ़ोन काट दिया। वैसे उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। फ़ोन काटना ही था तो बिना नाम बताए काटती। माँ ने मुझसे पूछा कि रागिनी कौन है? मैंने कहा कि मैं किसी रागिनी को नहीं जानता। ऐसा कहते हुए मैंने विशेष ध्यान रखा कि मेरी नज़रें माँ की नज़रों से मिली रहें। उसके बाद दिनभर माँ चुप-चुप खोई खोई सी रही। मैं जानता हूं कि माँ के ख़यालों में एक चित्र बना होगा जिसमें मैं एक सुन्दर लड़की के होठ चूम रहा हूंगा। बैकग्राउंड में हरियाली होगी या दस बाई दस का छोटा सा कमरा। बहुत संभावना है कि माँ ने बैकग्राउंड पर या मुझ पर ध्यान ही नहीं दिया होगा। माँ ने लड़की की आँखें-नाक-कान जाँचे होंगे। कल्पना के चित्र में अच्छे नैन-नक्श वाली लड़की ही आई होगी, इसलिए माँ को हल्की सी संतुष्टि मिली होगी। माँ ने सोचा होगा कि चित्र में कहीं कोने में लड़की की जाति भी लिखी रहती तो अच्छा रहता। फिर शाम को मैंने यादव के घर से रागिनी को फ़ोन किया। उन दिनों दिनभर मेरी आँखें दुखती थीं। मेरी दृष्टि धुंधली होती जा रही थी। मुझे डर लगने लगा था कि कहीं मैं जल्दी ही अंधा न हो जाऊँ। यह डर दुनिया के सबसे बड़े डर की तरह लगता था। रागिनी फ़ोन पर देर तक रोती रही। उसने मुझे बताया कि वह विजय से प्यार नहीं करती और उसके साथ बहुत दुखी है। उसने कहा कि उसे मेरी बहुत याद आती है। उसका रोना और ख़ासकर रोने का कारण मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं खुशी से चिल्लाना चाहता था। मैंने उसे बताया कि मैं उसे कितना प्यार करता हूँ। यह मैंने इतना बताया कि सुनते सुनते वह चुप हो गई और फिर खिलखिलाकर हँसने भी लगी। उसने कहा कि मेरी माँ की बातें सुनकर लगता है कि वह मुझसे बहुत प्यार करती है। मैंने कहा कि हाँ। उसने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहती है। मैंने उसे याद दिलाया कि हमने उस दिन सुनार की दुकान के बाहर एक दूसरे को देखा था। उसने कहा कि उस दिन विजय उसके साथ था। मैंने कहा कि हाँ। उसने कहा कि वह शकरकंद खा रही है। मैंने उसे कहा कि मुझे भी खिलाए। उसने पूछा, “फ़ोन में से कैसे खिलाऊँ?”
यह हम पहले भी बहुत बार एक-दूसरे से पूछते थे और हँसते थे। फिर मैंने उसे अपनी आँखें बताई। उसने मुझे जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाने की हिदायत दी। वे बरसात के दिन थे, जब मैंने चलना सीखा था। जब मैंने संसार को ठीक से देखना सीखा था, वे भी बरसात के ही दिन थे। बरसात की ही एक शाम में मैंने रागिनी को पहली बार देखा था। उस फ़ोन के बाद हम बारिश के ही एक दिन मिले। उसने बताया कि वह उसकी एक सहेली शिल्पा का घर था। शिल्पा अकेली रहती थी। सामान से भरे उसके घर को देखकर ऐसा लगता नहीं था, लेकिन रागिनी ने मुझे यही बताया। उस दिन शिल्पा अपने घर की चाबी रागिनी को देकर चली गई थी। हर शहर में इस तरह की आपसी सहयोग की बहुत व्यवस्थाएँ होती थी।
मैं जब पहुँचा तो वह मेरा ही इंतज़ार कर रही थी। उसने हल्की नीली जींस और किसी गहरे रंग का टॉप पहन रखा था। उसके बाल खुले थे। दरवाज़ा खोलते ही वह मुस्कुराई। ड्रॉइंग रूम में टीवी चल रहा था, जिसके चित्र लहरों की तरह नहीं बहते थे। ड्रॉइंग रूम की छत पीली और दीवारें हरी थीं। एक फ़ानूस भी लटक रहा था। मुझे लगा कि मैंने उसे गले लगा लिया है, लेकिन जब उसने सोफे पर बैठने को कहा तो मेरी तन्द्रा टूटी। मैं बैठ गया। वह ख़ुश थी। मैं भी। वह मेरे पास आकर बैठ गई। उसकी जींस मेरी जींस को छू रही थी।
हमारी जान-पहचान के शुरु के दिनों में हम एक साइबर कैफ़े में मिला करते थे। वह पहले जाती थी। मैं क़रीब दस मिनट बाद घुसता था। हम एक ही केबिन में बैठते थे। मैं जब भी जाता, साइबर कैफे वाला मुझे देखकर मुस्कुराता था। मुझे अच्छा लगता था। गर्वीला अच्छा। मुझे कम्प्यूटर के बारे में उतना ही मालूम था, जितना अंटार्कटिका के बारे में था। अंटार्कटिका में बर्फ़ ही बर्फ़ थी, जो वायुमण्डल का तापमान बढ़ते जाने से साल दर साल पिघल रही थी। ओज़ोन परत में एक छेद था जो इसके लिए उत्तरदायी था। फ़्रिज़ से कोई हानिकारक गैस निकलती थी। समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ता ही जा रहा था। अंटार्कटिका में लोग नहीं रहते थे। बस इतना ही।
वह केबिन इतना छोटा होता था कि हम न भी चाहते तो भी सटकर बैठना पड़ता और हम चाहते थे, इसलिए और भी सटकर बैठते थे। उसके घर में भी कम्प्यूटर था, इसलिए वह काफ़ी कुछ जानती थी। वह एक दो वेबसाइट भी खोलती थी। वह अपना ईमेल मुझे दिखाती। उसे हमेशा कई लड़कों के प्यार के प्रस्ताव वाले मेल आते थे। वह मुझे पढ़वाती थी। मैं उसकी हथेली और कसकर पकड़ लेता था। हमारी हथेलियाँ पसीज जाती थीं। हम मेल पढ़ते पढ़ते हँसते थे। फिर वह मेरे घुटने पर अपना हाथ रखती थी, अक्सर घुटने से कुछ ऊपर। उसका अर्थ जाने क्या होता था! लेकिन जो भी होता हो, मुझे उत्तेजना होती थी। वह बाल खोल लेती थी। वह बताती थी कि उसने बाल आज ही धोए हैं। मुझे लगता था कि वह रोज़ बाल धोती होगी। मैं यह उससे पूछता था तो वह मेरी नादानी पर हँसती थी। वह मुझे अपने बाल छूकर उनका गीलापन देखने के लिए कहती थी। मैं उसके बालों में उंगलियाँ फिराने लगता था। वह जैसे सर्दी में थरथराती थी और उसकी आँखें बन्द होने लगती थी। उसका चेहरा मेरे चेहरे के क़रीब आता जाता था। मैं दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़कर उसे बेतहाशा चूमने लगता था। उसके होठ, उसकी नाक, माथा, बन्द आँखें, उसके बड़े बड़े कान, गर्दन की नीली नसें, उसकी ब्यूटी बोन और ब्यूटी बोन का गड्ढ़ा। वह मेरे हाथ पकड़कर अपनी छातियों तक ले जाती थी। मैं पागल हो जाता था। वह बार बार बुदबुदाती थी कि मैं बहुत बुरा हूं। मैं उसे इतना देखना चाहता था कि मेरी आँखें कभी बन्द नहीं होती थीं।
वह उन दिनों बहुत सारे वादे करती थी मसलन मेरे बिना वह मर जाएगी और मर भी गई तो भी मुझे भूल नहीं पाएगी। उसके हर वादे पर मुझे लगने लगता था कि अब वह ज़ल्दी ही मुझे छोड़ने वाली है। मैं उसके होठों पर हाथ रख देता था। हम बस में साथ साथ बैठकर पास के शहर तक जाया करते थे और चाय पीकर लौट आते थे। उसे मूँगफलियाँ बहुत पसन्द थीं और मुझे वह।
उस दिन, जब उसकी जींस मेरी जींस को छू रही थी, वह मेरे कंधे पर सिर रखकर सुबकने लगी। उसके बाल मेरे गालों को छू रहे थे। मैंने उससे पूछा कि यह कौनसा हेयर स्टाइल है? उसने भर्राए गले से कहा- लेयर स्टेप। उसने कहा कि उसे अपने पापा की बहुत याद आती है और मेरी भी। उसने बताया कि उसके पापा तीन महीने पहले एक कार दुर्घटना में चल बसे थे। मुझे दुख हुआ। मेरा मन हुआ कि मैं कुछ भी करके उसका दुख मिटा दूं। मैंने उससे कहा कि मैं अभी ज़िन्दा हूं, इसलिए कम से कम मुझे याद करके तो उसे रोना नहीं चाहिए। मैंने कहा कि उसके पापा यदि उसे कहीं से देख रहे होंगे तो उसे रोते हुए तो नहीं देखना चाहेंगे ना!
यह दिलासा देने का बहुत पुराना तरीका था। इस समझाइश ने काम नहीं किया। वह बदस्तूर रोती रही। मैंने कुछ मनगढंत बातें यह कहकर कही कि ऐसा गीता में लिखा है। वे बातें सुनकर वह कुछ शांत होने लगी। मैंने उससे कहा कि मैं उससे बहुत प्यार करता हूं और उसे हमेशा खुश देखना चाहता हूं और उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। मुझे अपनी बातें कुछ बाज़ारू सी भी लगीं लेकिन मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर, उसकी आँखों में आँखें डालकर ऐसा कहा। वह चुप हो गई और उसने अपने आँसू पोंछ लिए।
मेरे लौटने से पहले हमने मूंगफलियाँ खाईं, चाय पी और एक दूसरे को चूमा। उसने कहा कि वह मुझमें समा जाना चाहती है, लेकिन उसके लिए पहले विजय को अपनी ज़िन्दगी से दूर करना चाहती है। मैंने कहा कि मैं इंतज़ार करूंगा। उसने कहा कि इंतज़ार के अलावा कुछ और भी है, जो मैं उसके लिए कर सकता हूँ। मैंने पूछा, क्या? उसने कहा कि क्या मैं उसे पच्चीस हज़ार रुपए दे सकता हूं? उसे तलाक़ की कार्रवाई के लिए इन रुपयों की ज़रूरत थी। ऐसा उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर, मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछा। मैंने कहा कि हाँ। जबकि मैं बेरोज़गार था और मेरे पिता की तनख़्वाह सात हज़ार रुपए महीना थी, माँ की डेढ़ हज़ार और लता ट्यूशन से बारह सौ रुपए कमाने लगी थी, मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर यह वचन दिया।

गौरव सोलंकी

Monday, August 03, 2009

सुगौली संधि को घसीटते माओवादी

सौरभ के.स्वतंत्र ब्लॉगिंग की गलियों में विचरते हुए अचानक मिल गए....इनका यायावर मिज़ाज अच्छा लगा तो बैठक पर आने का न्योता देना पड़ा...बिहार से दिल्ली के बीच सौरभ की दुनिया बसती है.....ब्रेकिंग व्यूज़ नाम से नई पत्रिका के संपादन की तैयारी में सौरभ इन दिनों व्यस्त हैं....पर्यावरण संदेश पत्रिका का संपादन फिलहाल ये करते हैं....कभी-कभी पढ़ाने का भी शौक रखते हैं..और, ब्लॉगिंग में तो सक्रिय हैं ही...इस लेख के साथ ही बैठक में आना भी तय हो गया....

नेपाल अब चीन की शह पर कूटनीतिक चाल चल रहा है। दरअसल, राजशाही के अंत के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा का जो अभ्युदय हुआ, वह कहीं न कहीं चीनी ताकतों के विचारों से ओत-प्रोत है। तभी तो सुगौली संधि को वे जबरन भारत के सामने उछाल रहे हैं। ताकि भारत और नेपाल में वैमनस्य पैदा हो जाये। पेश है माओवादियों के मंसूबों को खंगालती यह रपट-

प्रकृति सरहद नहीं समझती। प्रकृति बाड़ नहीं समझती। प्रकृति कोई भारत-नेपाल नहीं समझती और न हीं वह कोई संधि समझती। पंक्षी हो या नदियां, प्रकृति के ये रूप उन्मुक्त अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ती जाती हैं। ऐसा हीं कुछ भारत और नेपाल के साथ प्रकृति ने किया। गोरखाओं के आगमन से पहले गंडक नदी(नारायणी)को ही भारत और नेपाल की सीमा माना जाता था। पर गंडक नदी की धारा ने जब अपना रूख भारत की तरफ किया तो हजारों एकड़ भारतीय भू-भाग गंडक उस पार चला गया। लिहाजा, नेपाल उस भू-भाग पर अपनी दावेदारी करने लगा। और दावेदारी का जो तरीका था वह हिंसात्मक। मसलन, भारतीय किसानों को प्रताड़ित करना। उन्हें डराना-धमकाना। इसके लिए नेपाली राजशाही ने तो भारतीय भगोड़े अपराधियों को भाड़े पर रखा हीं, उन्हें संरक्षण भी दिया। उन्हें अग्नेयास्त्र से लैस किया। जिसका फलसफा यह हुआ कि भारतीय सीमावर्ती किसानों को खाने के लाले पड़ गये। वे अपने हीं भू-भाग पर डर और सहम के रहने लगें। सीमा विवाद हर जगह बढ़ता गया। बिहार स्थित चंपारण का सुस्ता हो या ठोरी। नेपाल का अतिक्रमण बदस्तूर जारी रहा। आज भी कमोबेश जारी है। तकरीबन हर सीमाई इलाकों में।

इसके निमित्त भारत-नेपाल के बीच सैकड़ों दफे बैठके हुईं। नतीजा फलाफल सिफर रहा। नेपाल के दबंगई के आगे, सीमा विवाद का कोई हल नहीं निकला। नेपाल बस चिल्लाता रहा कि भारत अभी भी 1816 में हुए सुगौली संधि पर अमल कर रहा है। यह चीं-पों अब राजशाही के बाद माओवादी कर रहे हैं। नेपाल में जो कुछ भी बुरा हो रहा है, माओवादी नेता प्रचंड बस भारत को उसके लिए जिम्मेदार ठहरा देते हैं और यह उच्चारने से नहीं चूकते कि भारत अभी भी सुगौली संधि पर अमल कर रहा है, भारत नेपाल के साथ बड़े भाई के जैसा बर्ताव कर रहा है। माओवादियों का बारम्बार यहीं अलापना, यह अहसास कराता है कि चीन की शह पर माओवादी भारत से जबरिया दुश्मनी मोल लेना चाहते हैं।

बीते दिनों का वाकया
जब नेपाल के राश्ट्रपति रामबरन यादव ने सेना प्रमुख जनरल रूकमांगद कटवाल को हटाने से इंकार कर दिया तो प्रधानमंत्री व माओवादी नेता पुश्प कमल दहल प्रचंड ने इस्तीफा दे डाला। इस बाबत प्रचंड यह कहने से नहीं चूके कि यह सब भारत के इशारो पर हो रहा है। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली का नेपाल के साथ संबंध का आधार आज भी सुगौली संधि है। उन्होंने धमकी भरे लहजे में यह भी कहा कि इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। जाहिर है कहीं न कहीं माओवादियों में भारत के प्रति वैमनस्य की भावना है।

सुगौली संधि : एक ऩजर
1960 में लिखी गई चंपारण गजेटियर के विस्तृत अध्ययन से यह मालूम चलता है कि सुगौली संधि ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाल के गोरखाओं के बीच 1816 में हुआ था। जिसके तहत यह कहा गया है कि राप्ती और गंडक के बीच के तराई क्षेत्र पर भारत का अधिपत्य रहेगा। केवल बुटवल खास को छोड़कर। दरअसल, नेवार राजवंश के बाद जब गोरखाओं का नेपाल में पदार्पण हुआ तो ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ उनकी पटी नहीं। लिहाजा, ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1814 में नेपाल पर हमला कर दिया और तराई क्षेत्र में अपना झंडा गाड़ दिया। इसके बाद चंपारण के सुगौली में कम्पनी और गोरखाओं के बीच एक संधि हुई। जिसे आज सुगौली संधि कहा जाता है। कालांतर में नेपाल से रिश्ते सुधरने के बाद 1950 में भारत और नेपाल के बीच एक ‘शांति' समझौता भी हुआ। इस समझौते में गंडक उस पार तराई के कुछ हिस्से नेपाल को फिर मिल गये। पर, ज्यों-ज्यों गंडक ने अपना रूख भारत की तरफ किया। त्यों-त्यों भारतीय भू-भाग पर नेपाल का अतिक्रमण शुरू हुआ। भारत के विरोध पर नेपाल ने तर्क दिया कि सुगौली संधि को 1950 में निरस्त कर दिया गया है। सो, नदी उस पार के जो भी भू-भाग हैं, वह नेपाल के हैं।

जाहिर है, नेपाल अब चीन की शह पर कूटनीतिक चाल चल रहा है। दरअसल, राजशाही के अंत के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा का जो अभ्युदय हुआ, वह कहीं न कहीं चीनी ताकतों के विचारों से ओत-प्रोत है। तभी तो पुरानी परंपरा को तोड़ प्रचंड प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के बजाय पहले चीन जाना ज्यादा मुफीद समझे। पर माओवादियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने राजशाही के अंत का जो गांडीव तैयार किया, उसके लिए उनलोगों ने भारत के जमीन का इस्तेमाल किया। यह जगजाहिर है कि नेपाल को कुछ भी करना होता है, उसे भारत के जमीन की जरूरत पड़ती है। अगर भारतीय विदेश मंत्रालय तथा गृह मंत्रालय वर्तमान स्थिति को भांपते हुए अभी चाहे तो पासपोर्ट सिस्टम लागू कर सकती है। जिससे नेपाल को ऑक्सीजन देने वाले भारतीय सीमाई भू-भाग पर नेपाली जनता का बगैर पासपोर्ट पैर रखना दूभर हो जायेगा। परिणामस्वरूप, नेपाल में दाने-दाने के लिए कोहराम मच जायेगा। फिर चीन भी नेपाल की मदद नहीं कर पायेगा। जिसके दम पर आज माओवादी हो-हल्ला कर रहे हैं।

दरअसल, वे भारत के उदारता का फायदा उठा रहे हैं। वे भूल रहे हैं कि राम और सीता की विरासत आज भी हमारे भाइचारे का प्रतीक है। फिलहाल, भारत सरकार को चाहिए कि भारतीय भू-भाग को बाडा़ लगाकर महफूज करे। सीमांकन के लिए उच्चस्तर पर नेपाल के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री माधव नेपाल से बात करे। ताकि सीमावर्ती किसानों को उनका हक मिल सके। उन्हें उनकी भूमि मिल सके। अगर हमारी उदारता का फायदा उठा रहे माओवादी इसमें अड़ंगा लगाते हैं तो हमारे पास कई कूटनीतिक अस्त्र हैं। जिससे मानसिक तौर पर भ्रष्ट हो चुके माओवादिओं पर लगाम लगाया जा सकता है।

सौरभ के. स्वतंत्र

(लेखक शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली हिंदी मासिक पत्रिका Breaking Views के संपादक हैं)

Wednesday, March 04, 2009

हिन्दी ब्लॉगों की संख्या यूँ ही बढ़ती रहेगी

२२ फरवरी २००९ की ब्लॉगर-मीट का निष्कर्ष

वैसे जब कहीं भी और कभी भी २-४ ब्लॉगर मिलते हैं, हम उसे ब्लॉगर-मीट की ही संज्ञा देते रहे हैं। इस तरह से तो कम से कम १० ब्लॉगर मीट रोज़ाना होती होंगी। ज़रा सोचिए जिस परिवार का १ से अधिक सदस्य ब्लॉगर हों, वहाँ क्या हालत होती होगी। लेकिन २२ फरवरी २००९ को राँची में हुआ हिन्दी चिट्ठाकारों का सम्मेलन कई मायनों में एक औपचारिक और बड़ा आयोजन था।

बहुत सी रपटों में आपने पढ़ा कि इस आयोजन को लेकर जो-जो योजनाएँ बनाई गई थीं, वो सभी पूरी नहीं हो पाईं, फिर भी हिन्दी का इंटरनेट पर मिजाज समझने का अवसर ज़रूर मिल गया। अमिताभ मीत के साथ मिलकर जब मैं इस आयोजन की रूपरेखा खींच रहा था तब मैंने मात्र कोलकाता से हजारीबाग की भौगोलिक सीमाओं में रहने वाले ब्लॉगरों को पकड़ने का निश्चय किया था। हमें यह डर था कि दूरी अधिक होने से शायद लोग कम रुचि लेंगे। ईमेल/फोन से संपर्क स्थापित करने के तुरंत बाद कम से कम हमारा अंदाज़ा ठीक ही सिद्ध हो रहा था। लेकिन जब कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, राँची की निदेशक भारती कश्यप ने आयोजन के खर्च का भार उठाने की बात की और इसे ब्लॉगरों ने सुना तब रेस्पॉन्स अच्छे मिलने लगे।

मनीष कुमार ने फोन पर कहा भी कि हमें वाराणसी (यह शहर भी राँची के क़रीब है) और बिहार के भी ब्लॉगरों को बुलाना चाहिए। जैसे लवली कुमारी के माध्यम से वाराणसी से अभिषेक मिश्र कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आ सकते हैं, उसी तरह से वहाँ के अन्य ब्लॉगर भी आ सकते हैं। जब कोलकाता तक से कुछ ब्लॉगर (शिवकुमार मिश्रा और अमिताभ मीत) राँची आने की बात सोच सकते हैं, फिर पटना, दरभंगा से क्यों नहीं। आखिर यह भी वन नाइट जर्नी ही तो है। फिर मुझे भी ऐसा लगा कि इस पर पहले से काम किया गया होता तो यह जमावाड़ा और विराट हो सकता था।

जुलाई २००७ से मैंने टेलीफोन के द्वारा कम्प्यूटर पर 'यूनिकोड (हिन्दी) का इस्तेमाल और ब्लॉग बनाने की विधि' के संदर्भ में लोगों की मदद करनी शुरू की थी (यूनिप्रशिक्षण)। बाद में सार्वजनिक रूप से क्लॉसरूमों में पहुँचा। उस समय से लेकर अब तक इतनी ही कोशिश रही कि सामने वाला हिन्दी और ब्लॉगिंग से जुड़ जाये, आगे वह अपने रास्ते और ब्लॉग का चरित्र खुद बना लेगा। मैंने भी यही मानकर किसी भी सामान्य मुलाक़ात में ब्लॉग के अनुप्रयोग के बड़े फलक की बात नहीं की।

लेकिन हाँ, जहाँ-जहाँ मैंने पत्रकारिता के विद्यार्थियों को इसके बारे में बताया, वहाँ खूब बताया। इसका जितना और जिस तरह का इस्तेमाल मैंने किया, वह भी और बाकी दुनिया में जहाँ-जहाँ जितने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल हो रहा है, वह भी। और मुझे खुशी है सबसे अधिक उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ भी मुझे झारखण्ड से ही मिलीं। १४ फरवरी २००९ को करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर के पत्रकारिता के बच्चों की ब्लॉगिंग पर कक्षा लेने का अवसर मिला। एक तो वैलेन्टाइन डे का दिन, फिर भी शत-प्रतिशत उपस्थिति ने मुझे गदगद किया और कक्षा के दौरान उनकी प्रतिक्रियाओं ने भी।

पर इससे उलट प्रतिक्रिया पत्रकार बन चुके ब्लॉगरों में देखने को मिली। २२ फरवरी की मुलाकात में अधिकतम पत्रकार और पत्रकार-ब्लॉगरों को ब्लॉगिंग मात्र आलेख जमा करने का बक्सा नज़र आई। इस सम्मेलन में भी सेंट जेवियर्स कॉलेज के पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने इस विधा को अच्छे तरह से समझने की इच्छा जताई और व्यक्तिगत रूप से मुझे मिला और कहा कि सर हमारे यहाँ भी कक्षा लीजिए। वहीं मुझे एक HRD के इंजीनियर अरूण चक्रवर्ती भी मिलें जिन्होंने अपने ज्योतिष ज्ञान सम्बंधी कार्य को ब्लॉगिंग से कैसे प्रचारित-प्रसारित कर पायें?-इसपर मेरे विचार जानना चाहे। मुझे अगले दिन भी राँची में रुकना था। ज्योतिषी-इंजीनियर अरूण को ब्लॉगिंग ने इतना प्रभावित किया कि अगले दिन उन्होंने फोन करके मुझसे समय माँगा, मुझे अपने घर ले गये और ब्लॉग बनवाया, बहुत से सवाल किये।

ब्लॉगिंग से कमाई की बात टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार संजीव शेखर ने जाननी चाही। मैंने यही कहा कि हिन्दी के ९९% से अधिक ब्लॉग अभी इसपर न ही सोंचे क्योंकि उनके ब्लॉग का ट्रैफिक इतना भी नहीं है कि भारतीय विज्ञापन नेटवर्कों के विज्ञापन से रु १००० प्रतिवर्ष भी कमा पायें (क्योंकि गूगल हिन्दी कंटेंट को विज्ञापन नहीं दे रहा)। मैंने उनसे ज़रूर कहा कि हिन्दी के कमाने वाले ब्लॉगों की संख्या एक आदमी के हाथों की उँगलियों से भी कम हैं। मैंने हिन्द-युग्म की विज्ञापन की कुल कमाई का लेखा-जोखा भी उन्हें दिया।

यह बात ग़ौर करने वाली है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की शुरूआत से (यानी की अक्टूबर २००२ से) लेकर अब तक प्रत्येक ब्लॉगर अपने ब्लॉग में मात्र निवेश कर रहा है, वह चाहे धन के रूप में हो या समय के रूप में या फिर दोनों रूपों में। यह स्थिति चिंताजनक है और जैसाकि वरिष्ठ ब्लॉगर देबाशीष चक्रवर्ती ने अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि आने वाले पाँच वर्षों में हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई की गुँजाइश नहीं है, वैसे में हिन्दी में प्रोफैशनल ब्लॉगरों की संख्या खूब बढ़ेगी यह कहना मुश्किल है। हाँ यह ज़रूर कहा जा सकता है कि जिस तरह से ब्लॉगों की संख्या पिछले २ वर्षों में बढ़ी है, उसकी वृद्धि दर में लगातार वृद्धि होगी।

मैं आने वाले समय में छोटे और बड़े शहरों में ब्लॉगिंग पर ऐसे आयोजन करने के बारे में विचार कर रहा हूँ जिसमें ब्लॉगर के साथ-साथ नॉन-ब्लॉगर की संख्या भी अच्छी खासी हो।

Monday, February 09, 2009

22 फरवरी को राँची में जमा होंगे कलकतिया और झारखण्डी ब्लॉगर

कल मुझे एक ईमेल-निमंत्रण मिला, जिसमें लिखा था कि १० फरवरी २००९ को मेरठ विश्वविद्यालय में रवि पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हिन्दी ब्लॉगिंग की पुस्तक 'एटूजेड ब्लॉगिंग' का विमोचन होना है। किसी भी तरह की जानकारी और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में पॉकेट बुक्स ने अहम भूमिका निभाई है। याद कीजिए 'कौन सी ऐसी मछली है जो हवा में उड़ती है, पानी में तैरती है और जमीन पर चलती है?, कौन सा पेड़ है जो लोगों को खा जाता है? कौन सा ऐसा पहाड़ है जो रोज़ रंग बदलता है?' जैसे रसदार सवालों का पुलिंदा बस से लेकर ट्रेन में बिकता है। हर आम-खास इससे परिचित हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग जो कि २००२ में शुरू हुई, २००९ के शुरू में ही पॉकेट बुक्स में घुस गई, तो निश्चित रूप से सफलता का स्वाद इसने बहुत जल्दी चख लिया। एक पॉकेट बुक्स से इस तरह की पुस्तक आने का फायदा यह होगा कि इसे लगभग हर पॉकेट बुक्स वाला प्रकाशित करेगा। यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले २-३ महीनों में आप दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगर घूमने आये तों बसों-ट्रेनों में देखें कि ब्लॉगिंग की यह किताब रु १० में बिक रही है और साथ में चुटकुलों और देवर-भाभी की शायरियों की २-३ किताबें मुफ्त हैं।

अभी २८ दिसम्बर २००८ को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया। हिन्द-युग्म ब्लॉगिंग को लेकर गंभीर है, भाषा को लेकर गंभीर है, इसका उद्घोष तो यह २००८ के विश्व पुस्तक मेले में अपना स्टैंड लगाकर ही दे चुका था। लेकिन २८ दिसम्बर के कार्यक्रम में साहित्यशिखर राजेन्द्र यादव आये तो लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ। हम इसके जो सकारात्मक परिणाम आँक रहे थे, वह हुए।

चोखेरबालियों ने ६ फरवरी २००९ को अपना सालाना जलसा मनाया। राजकिशोर, अनामिका जैसे विद्वजन आये और ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों का जज्बा देखा और महसूस किया। इसी तरह से जमीनी और वर्चुयल दुनिया में बराबर दखल रखने वाली एनजीओ 'सफ़र' ने भी राजेन्द्र यादव द्वारा उन्हीं की लघुकथाओं के पाठ के माध्यम से इंटरनीय दुनिया की सजीव उपस्थिति को मुखरित किया।

हिन्दी ब्लॉगिंग से मेरा जुड़ाव ३२ महीना पुराना है। इस दौरान इस माध्यम के झंडारोपण के लिए मैं शहरो-कस्बों तक गया हूँ। लेकिन कभी झारखण्ड-बिहार जाने का मौका नहीं मिला। दिसम्बर में कोलकाता के ब्लॉगर अमिताभ मीत से जब मुलाक़ात हुई, उन्होंने मुझे कोसा कि यार कोलकाता और हजारीबाग के बीच सैकड़ों ब्लॉगर रहते हैं, हिन्दी-प्रेमियों का इलाका है, कभी उधर मिलने-मिलाने का प्रोग्राम करो तो बात बने।

मैंने गूगल किया तो पाया कि बात सही है। कुछ को पहले से जानता था, कुछ को नहीं। कुछ को फोन सेतो कुछ को ईमेले से पकड़ा और आखिरकार कश्यप मेमोरियल आई हास्पिटल, राँची की निदेशिका डॉ॰ भारती कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा लिया। साथ में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखण्डी ने संयोजन की बागडौर सम्हाली।

यह कार्यक्रम में रविवार २२ फरवरी २००९ को राँची में सुबह ११ बजे से आयोजित होने जा रहा है, जिसमें ब्लॉगर साथी तो एक-दूसरे से मिलेंगे ही साथ में दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, आई-नेक्सट के प्रधान सम्पादकों (जैसे संत शरण अवस्थी, हरिनारायाण, हरिवंश॰॰॰॰) के इस विधा पर विचार आयेंगे, मैं ब्लॉगिंग से कम परिचित या न परिचित लोगों को पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से इस दुनिया की सैर कराऊँगा, पारूल चाँद पुखराज गायेंगी, तो शिव कुमार मिश्रा ब्लॉगिंग का इतिहास बतायेंगे। पत्रकार ब्लॉगर इसे वैकल्पिक पत्रकारिता की नज़रिये से देखेगा तो वहीं अनुभवी ब्लॉगर मनीष कुमार की अपने अलग अनुभव शेयर करेंगे। पहली पाँत से अंतिम पाँत के विद्वानों की बातें होंगी। अभी यह अंतिम रूपरेखा नहीं है, कुछ और ब्लॉगर-वक्ता भी जुड़ेंगे।

झारखण्ड के ब्लॉगरों की यह शिकायत रही है कि वहाँ ब्लॉगिंग-स्लॉगिंग की फालतू की चीज माना जाता है। शायद यह पहल इसे ज़रूरी मानने का बीज रोप दे।

बहुत से ब्लॉगरों ने अभी तक ईमेल का जवाब भी नहीं दिया है। अब पोस्ट पढ़कर सम्मिलित होने का कंफर्मेशन तो दे दें। जिन ब्लॉगरों ने आने की पुष्टि की है, वे हैं-

अमिताभ मीत (कोलकाता)
शिव कुमार मिश्रा (कोलकाता)
बालकिशन (कोलकाता)
शम्भू चौधरी (कोलकाता)
रंजना सिंह (जमशेदपुर)
श्यामल सुमन (जमशेदपुर)
पारूल चाँद पुखराज (बोकारो)
संगीता पुरी (बोकारो)
मनीष कुमार (राँची)
नदीम अख्तर (राँची)
घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखंडी (राँची)
डॉ॰ भारती कश्यप (राँची)
निराला तिवारी (राँची)
संध्या गुप्ता (दुमका)
सुशील कुमार (चाईंबासा)
शैलेश भारतवासी (दिल्ली)
लवली कुमारी (धनबाद)
अभिषेक मिश्र (वाराणसी)

अब न कहना इसे अंट-शंट, न कहना आलतू-फालतू।