कुछ ऐसे कलाकार हर सदी में होते है जो दर्शकों की सोच से परे कुछ ऐसा पेश करते है की सारी दुनिया उनके सामने झुकने के लिए बेबस हो जाये. और ये झुकना इतना सम्मान सहित होता है जोकि शायद किसी सम्राट को भी न नसीब हो. पर एक सम्राट ऐसे है जिन्होंने बार-बार दुनिया को उसी तरह के सम्मान से अपने आगे झुकने के लिए मजबूर किया अपने हुनर से, अपनी अदाकारी से! और वे हैं... इस सदी के महानायक ....अमिताभ बच्चन. जहाँ उनके उम्र के कई अभिनेता इतिहास के पन्नों में गुम हो गए या लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड लेके रिटायर हो चुके है, वही बिग बी आज भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के श्रेणी में नए-पुराने कलाकारों को चुनौती देते है.इसबार उन्होंने कुछ ऐसा किया है जो हॉलीवुड में भी शायद ही किसी ने किया हो. पा .... अमित जी के अभिनय कार्यकाल के चमचमाते तारामंडल में ध्रुव तारे सा अटल और जगमगाता सितारा है ... पा !
कथा सारांश :
ये कथा है विद्या (विद्या बालन) और अमोल आर्ते (अभिषेक बच्चन) की जो कॉलेज के वक्त एक-दूसरे से टकराते हैं और वहीं से उनमें प्यार बढ़ता है. एक क्षण की गलती से विद्या प्रेग्नेंट होती है पर अमोल जो एक सफल राजनेता का बेटा है, इंडिया को सुधारने का जिसका सपना है, वो विद्या को इस परिस्थिति से छुटकारा पाने को कहता है. विद्या उसे छुटकारा दिलाती है पर उसके जिंदगी से दूर जा कर.
विद्या अपनी माँ की मदद से अपने बेटे को पाल-पोस कर बड़ा करती है पर उसे तकदीर एकबार फिर से एक झटका देती है. विद्या का बेटा प्रोगेरिया नमक एक अनोखी बीमारी से पीड़ित है जिसमें बच्चे का शरीर उसकी असली उम्र से ४-५ गुना ज्यादा दीखता और बढ़ता है। माने 10 साल का लड़का ५० साल का दीखता और शरीर उसका वैसे रहता है. पर डॉक्टर होने के कारण विद्या उसे सम्हाल सकती है और एक नॉर्मल लड़के की तरह उसकी परवरिश करती है. उसका नाम रहता है औरो.
औरो को स्कूल के इंडिया व्हिजन स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार मिलता है एक खासदार के हाथों. वह खासदार होता है अमोल आर्ते. अमोल एक आशावादी, आदर्शवादी और प्रगतिशील राजनेता है जो औरो के व्हिजन से प्रभावित होकर उसके तरफ आकर्षित होता है. आगे क्या होता है. कैसे औरो को पता चलता है कि अमोल ही उसके पिता है और कैसे उनकी फेमिली फिर से मिलती है... ये कहानी है फिल्म की.
पटकथा:
अगर औरो की अनोखी बीमारी को फिल्म से निकाल दें तो फिल्म की कहानी किसी और साधारण फिल्म जैसी ही है. पर यही एक अलग चीज ... औरो और उसकी अजीब बीमारी ... इस फिल्म को अलग लेवल पर लेकर जाती है और एक अलग तरीके की ट्रीटमेंट मांगती है. और आर. बालाकृष्णन ने सही तरीके से इस डिमांड को पूरा किया है. उनका किरदारों और घटनाओं की तरफ देखने का एक अपना ही पॉजिटीव तरीका है जो पूरे स्क्रीनप्ले और फिल्म पे छाया है. इसी कारण इतने बुरे बीमारी के गिर्द घुमती कथा एक अल्हड़ और आनंदमयी कहानी के रूप में उजागर हो पाई है.
इस तरीके से सोचने और लिखने के लिए आर. बालाकृष्णन का हार्दिक अभिनन्दन. हिंदी फिल्म जगत को उनके जैसे लेखकों की सख्त आवश्यकता है.
दिग्दर्शन:
आर. बाल्की एक सुलझे हुए लेखक और एक उम्दा निर्देशक हैं. उनकी फिल्में अनोखी होती हैं और कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी सहज तरीके से प्रस्तुत करती हैं. इनका ये नजरिया अगर असल जिंदगी में भी हम उतार पाए तो जिंदगी स्वर्ग बन जाएगी.
इसी नजरिये से जब बाल्की फिल्म को प्रस्तुत करते हैं तो फिल्म एक मजेदार अनुभव बन जाती है. उनकी लेखनी और दिग्दर्शन दोनों माध्यमों पर जबरदस्त पकड़ है. जिस तरीके की सादगी और संजीदगी उनके काम में है वैसा किसी और निर्देशक के काम में नहीं दिखाई देता. उनका काम वाकई काबिले तारीफ है.
अभिनय:
अभिनय .... अभिनय का क्या कहना... ये तो एक जादू है... चमत्कार है. अमिताभ बच्चन इस फिल्म में है ऐसा जयाजी स्टार्ट में बोलती है पर मुझे तो वो दिखाई ही नहीं दिए पूरे फिल्म में... दिखाई दिया तो 12-13 साल का एक बच्चा जो प्रोगेरिया से पीड़ित है. दर्शकों को झंझोड़ कर रख दिया है अमितजी ने. उनके लिए ऐसे कई सारे दर्शक सिनेमाघर में दीखते है जो सालों से कभी सिनेमाघर में नहीं गए. उन सब संजीदा और उच्च शिक्षित लोगों को सिनेमाघर खिंच के लाये हैं बिग बी.
विद्या बालन सुंदर दिखी हैं और बहुत ही सटीक अभिनय है उनका. परेश रावल पूरी तरह से अभिषेक के किरदार को सहारा देते हैं. विद्या की माँ बनी अभिनेत्री एक बेहतरीन और सहज अभिनय का प्रदर्शन कराती हैं.
चित्रांकन :
पी. सी. श्रीराम की सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है और फिल्म की ऊँची लेवल को और ऊँचा बनाती है.
संगीत और पार्श्वसंगीत:
संगीत जगत के पुराने सितारे श्री इल्लायाराजा ने इस फिल्म को अपने साजों संगीत से सँवारा है. फिल्म में दो ही गाने है और तीसरा आखरी में है. पहला गाना "उड़ी उड़ी" एक बेहेतरीन सुरीला गाना है. फिल्म का पार्श्वसंगीत फिल्म के साथ पूरी तरह से न्याय करता है.
संकलन:
अनिल नायडू का संकलन फिल्म की गति को बहता हुआ रखता है और दर्शकों को कहानी और किरदारों से बंधे हुए रखने में सफल होता है.
निर्माण की गुणवत्ता:
उच्चतम गुणवत्ता इस फिल्म के हर भाग में दिखाई देती है हालाँकि फिल्म कम लागत से बनी है. कम लागत और ऊँची गुणवत्ता के चलते ये फिल्म रिलीज़ के पहले ही प्रॉफिट में होगी. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को अच्छा रेस्पोंस है. बाकी सभी अधिकारों की बिक्री से बहुत सारी कमाई एबीसीएल को दे पायेगी.
लेखा-जोखा:
****(4 तारे)
इस फिल्म की जितनी भी तारीफ की जा सके कम है. फिल्म में प्रोगेरिया के परेशानियों से नहीं डील करती बल्कि एक लाइट फिल्म है जो सभी उम्र के दर्शकों को पसंद आएगी. आप पूरी फेमिली और दोस्तों के साथ ये फिल्म देखने जरुर जाइए.
चित्रपट समीक्षक:
--- प्रशेन ह.क्यावल

"हैरी पॉटर" और "पायरेट्स ऑफ़ कैरिबियन" जैसी हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्में जब हिंदी फिल्मों को टक्कर देती है तो ऐसी कोई भी हिंदी फिल्म नहीं होती जो उन्हें मुह तोड़ जवाब दे पाए। हालाँकि कोई कहानी अच्छे से प्रस्तुत की जाये तो बच्चे-बूढ़े और जवान सभी को रास आता है, पर हिंदी फिल्मों में कभी ऐसे चमत्कारपूर्ण या परी कथाओं पर परिश्रमपूर्वक काम नहीं हुआ है।
अमिताभ बच्चन...बड़ा नाम, बड़ा कद, बड़ी शख्सियत. इतने सालों में कितना कुछ लिखा जा चुका है उनके बारे में लेकिन मेरा इस नाम के प्रति मोह मुझे लिखने के लिये बार-बार उकसाता है। सात हिन्दुस्तानी से लेकर भूतनाथ तक का सफर सभी जानते हैं। एक अभिनेता के तौर पर वे लाजवाब हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं। उनकी शख्सियत में जादू है। मैंने उनकी लगभग हर फिल्म देखी है और उनमें से कुछ ते कईं-कईं बार देखी हैं। लेकिन फिर भी एक बात मुझे महसूस होती है कि इस कमाल की शख्सियत और बेजोड़ अभिनेता का सही उपयोग नहीं हो पाया। जैसा कि मशहूर है कि अमिताभ एक सौम्य व्यक्ति हैं और रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, यही वजह है कि वे हमेशा कुछ निहायत ही अयोग्य व्यक्तियों के बीच फंसे रहे जिनमें फिल्म की सतही जानकारी थी। बिगबी की फिल्मों में से बहुत सी फिल्में ऐसी हैं कि उनमे से अगर उन्हें निकाल लिया जाये तो कुछ भी नहीं बचता, ना कहानी, ना निर्देशन, ना संवाद...लेकिन फिर भी लोग देखते हैं और खूब देखते हैं ये जादू सिर्फ और सिर्फ अमिताभ बच्चन का है। उनकी एक फिल्म जिसे मैं जब भी मौका मिलता है देख लेता हूं वो है ” अग्निपथ ”। मेरे हिसाब से (और श्रीमती जया बच्चन के हिसाब से भी :) ) अग्निपथ अमितजी के जीवन का सर्वश्रेश्ठ अभिनय है, ये उनकी अभिनय क्षमता का चरम है जिसने एक साधारण सी कहानी को असाधारण बना दिया। इस फिल्म में उनकी संवाद अदायगी अभिनय स्कूलों में पढ़ाये जाने योग्य है। एक-एक संवाद जबरदस्त है। वैसे अगर हम उनके जीवन की बेहतरीन फिल्में चुनें तो जो नाम सामने आएंगे वे हैं- जंज़ीर, अभिमान, शोले, दीवार, अग्निपथ, त्रिशूल, काला पत्थर, शक्ति, शराबी और मैं अक्स को भी शामिल करना चाहूँगा। चुपके-चुपके इसलिये छोड़ दी क्योंकि वो मुख्यतः धर्मेंद्र की फिल्म है और आनंद में भी बिगबी का छोटा सा ही रोल था, हालांकि इन दोनों फिल्मों में भी वे कमाल ही थे। परदे पर उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है खासकर पुरानी फिल्मों में। फिल्म त्रिशूल में उनका किरदार इस मायने में बेहतरीन था। “आज मेरी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं और मैं 5 लाख का सौदा करने आया हूँ“ इस डायलॉग की अदायगी पर तालियाँ और सीटियाँ बजना लाजमी है। यश चोपड़ा ने अपने जीवन की कुछ बेहतरीन फिल्में बिगबी के साथ बनाई हैं जैसे दीवार, काला पत्थर, त्रिशूल। कभी-कभी और सिलसिला भी यश चोपड़ा की ही फिल्में हैं लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर इन दोनों फिल्मों को पसन्द नहीं करता क्योंकि इनमें नौटंकी तत्व की प्रधानता थी जो आजकल यशराज बैनर की फिल्मों का स्थाई फार्मूला है, अविश्वसनीय तरीकों से रोना-धोना और भावनाओं का भौंडा प्रदर्शन। दूसरे फिल्मकार जिनके साथ बिगबी ने काफी फिल्में की हैं वे हैं मनमोहन देसाई। देसाई साहब एक बेहद सीमित प्रतिभा वाले फिल्मकार थे। उन्होंने एक ही कहानी में फेर बदल कर-कर कई-कईं फिल्में बनाईं। लेकिन वे किस्मत के धनी थे और उनकी फिल्में सफल रहीं लेकिन एक समय तक ही क्योंकि दर्शक को मूर्ख बनाकर लंबी पारी नहीं खेली जा सकती इसलिये बाद की उनकी फिल्में अमिताभ बच्चन के नाम के बावजूद पिट गईं। एक फिल्म जो वास्तव में हर मायने में अच्छी है वो है शक्ति सामंत की ”शक्ति”। अच्छी कहानी, अच्छी पटकथा, अच्छे संवाद और बेहतरीन अदाकारी अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार की। बाप-बेटे के रिश्तों पर बनी इस फिल्म का विषय उस समय के ट्रेंड को देखते हुए नया और अच्छा था। सबसे बड़ी बात कि इसमें भावनाओं को बिना लाउड हुए प्रदर्शित किया गया था जिसमें योगदान दिलीप कुमार और बिगबी के अभिनय का भी था। मेरी एक और पसंदीदा फिल्म है जिसमें बिगबी का अभिनय अपनी बुलंदी पर है, वो है ”शराबी”। शराबी प्रकाश मेहरा की फिल्म थी जिन्होंने अमिताभ कों पहली बार बतौर नायक जंज़ीर में पेश किया था। प्रकाश मेहरा ने व्यावसायिक फिल्में बनाईं लेकिन अपने स्तर पर अच्छी ही बनाई। ”मुक़द्दर का सिकंदर” भी उनकी अच्छी फिल्मों में एक है। अमिताभ हृषिकेश मुखर्जी के बहुत बड़े प्रसंशक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी फिल्म आनंद में उन्हें एक महत्वपूर्ण किरदार दिया था और अमिताभ ने भी उस किरदार में जान डाल दी थी। आनंद मेरी सबसे प्रिय फिल्मों में से एक है। इसके अंत के उस दृश्य में जहां डॉक्टर को पता चलता है कि आनंद मर चुका है, अमिताभ ने वो रुदन किया था कि आज भी देखता हूँ तो आँखों में आँसू आ जाते हैं। इसके बाद उन्होंने हृशिदा के साथ अभिमान, नमक हराम, चुपके-चुपके आदि फिल्मों में काम किया। 80 के दशक के मध्य में अमिताभ का सितारा गर्दिश में था लेकिन इसमें उनका फिल्मों का चुनाव भी एक कारण था। उन्होंने संबंधों की खातिर ऐसी वाहियात फिल्में कीं कि उन्हें देखना किसी सज़ा से कम नहीं। ”मर्द, कुली, जादूगर, तूफान, अकेला...“ ये ऐसी फिल्में हैं जो आजकल किसी ना किसी चैनल पर रोज़ आ रहीं हैं लेकिन इन्हें देखना सहनशक्ति की कठोर परीक्षा है। एक बात मैं अक्सर सोचता हूँ कि जब अमिताभ खुद ये फिल्में कभी देख लेते होंगे तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा या कि उन्होंने ये फिल्में कभी देखी ही नहीं हैं। तूफान में एक विचित्र वेशभूषा पहने, जादूगर में फूहड़ हरकतें करते। शायद इस दौर में वे अति आत्मविश्वास से पीड़ित हुए थे। कुली में जब उनके साथ दुर्घटना हुई थी और पूरे देश में दुख की लहर फैल गई थी तब उन्हें अपने पर शायद ये भरोसा हो गया था कि वे कुछ भी करें चलेगा। उस दौर में एक फिल्म ज़रूर ऐसी आई थी जो बिल्कुल अलग थी, ”मैं आज़ाद हूँ”। ये फिल्म उस समय बनती कला फिल्मों की श्रेणी में है। मुझे याद है तब मैं ये सोचकर खुश हुआ था कि अब उनके अभिनय का बेहतरीन नमूना देखने को मिलेगा लेकिन उसके बाद ऐसी किसी फिल्म में उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ लेकिन मैं एक सच्चे भक्त की तरह उनकी हर फिल्म देखता और उसकी तहेदिल से तारीफ भी करता था। फिर मुझ पर गाज गिरी जब उन्होंने 5 साल के लिये ब्रेक की घोषणा कर दी। मुझे बहुत गुस्सा भी आया लेकिन मैं बेचारा क्या कर सकता था? फिर 5 साल बाद उनकी वापसी की घोषणा हुई और मैं जितना खुश हुआ, मैं नहीं समझता कोई और उतना हुआ होगा। उनकी वापसी वाली फिल्म थी ”मृत्युदाता”। मैं बहुत उत्साहित था और पहले दिन ही मैंने फिल्म देखने का निश्चय किया था। मैंने अपने सभी साथियों से कहा लेकिन कोई भी फिल्म देखने के लिये राजी नहीं हुआ तो मैं अकेला ही चला पहला दिन, पहला शो। अंदर मेरी जो गत हुई मैं क्या कहूँ। ये फिल्म मेरे उत्साह के लिये सचमुच मृत्युदाता ही साबित हुई। दुनिया की सबसे बकवास फिल्मों में से एक थी ये फिल्म। मेरा मन खट्टा हो गया और ये फिल्म भी बुरी तरह पिट गई। फिल्म के निर्देशक मेहुल कुमार थे जिन्होंने और भी बहुत सी घटिया किस्म की फिल्में बनाई हैं। वे मनोज कुमार की नकली देशभक्ति के उत्तराधिकारी थे। इतना ही काफी नहीं था कि अमिताभ ने मेहुल कुमार के साथ एक और फिल्म "कोहराम” की जिसे आज तक मैं 10 मिनट से ज़्यादा नहीं देख पाया हूँ।
मार्कण्डेय