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Sunday, October 11, 2009

अमिताभ का सही उपयोग नहीं हो पाया

महानायक अमिताभ बच्चन के 67वें जन्मदिवस पर प्रस्तुत है अनिरुद्ध शर्मा का लेख....

अमिताभ बच्चन...बड़ा नाम, बड़ा कद, बड़ी शख्सियत. इतने सालों में कितना कुछ लिखा जा चुका है उनके बारे में लेकिन मेरा इस नाम के प्रति मोह मुझे लिखने के लिये बार-बार उकसाता है। सात हिन्दुस्तानी से लेकर भूतनाथ तक का सफर सभी जानते हैं। एक अभिनेता के तौर पर वे लाजवाब हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं। उनकी शख्सियत में जादू है। मैंने उनकी लगभग हर फिल्म देखी है और उनमें से कुछ ते कईं-कईं बार देखी हैं। लेकिन फिर भी एक बात मुझे महसूस होती है कि इस कमाल की शख्सियत और बेजोड़ अभिनेता का सही उपयोग नहीं हो पाया। जैसा कि मशहूर है कि अमिताभ एक सौम्य व्यक्ति हैं और रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, यही वजह है कि वे हमेशा कुछ निहायत ही अयोग्य व्यक्तियों के बीच फंसे रहे जिनमें फिल्म की सतही जानकारी थी। बिगबी की फिल्मों में से बहुत सी फिल्में ऐसी हैं कि उनमे से अगर उन्हें निकाल लिया जाये तो कुछ भी नहीं बचता, ना कहानी, ना निर्देशन, ना संवाद...लेकिन फिर भी लोग देखते हैं और खूब देखते हैं ये जादू सिर्फ और सिर्फ अमिताभ बच्चन का है। उनकी एक फिल्म जिसे मैं जब भी मौका मिलता है देख लेता हूं वो है ” अग्निपथ ”। मेरे हिसाब से (और श्रीमती जया बच्चन के हिसाब से भी :) ) अग्निपथ अमितजी के जीवन का सर्वश्रेश्ठ अभिनय है, ये उनकी अभिनय क्षमता का चरम है जिसने एक साधारण सी कहानी को असाधारण बना दिया। इस फिल्म में उनकी संवाद अदायगी अभिनय स्कूलों में पढ़ाये जाने योग्य है। एक-एक संवाद जबरदस्त है। वैसे अगर हम उनके जीवन की बेहतरीन फिल्में चुनें तो जो नाम सामने आएंगे वे हैं- जंज़ीर, अभिमान, शोले, दीवार, अग्निपथ, त्रिशूल, काला पत्थर, शक्ति, शराबी और मैं अक्स को भी शामिल करना चाहूँगा। चुपके-चुपके इसलिये छोड़ दी क्योंकि वो मुख्यतः धर्मेंद्र की फिल्म है और आनंद में भी बिगबी का छोटा सा ही रोल था, हालांकि इन दोनों फिल्मों में भी वे कमाल ही थे। परदे पर उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है खासकर पुरानी फिल्मों में। फिल्म त्रिशूल में उनका किरदार इस मायने में बेहतरीन था। “आज मेरी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं और मैं 5 लाख का सौदा करने आया हूँ“ इस डायलॉग की अदायगी पर तालियाँ और सीटियाँ बजना लाजमी है। यश चोपड़ा ने अपने जीवन की कुछ बेहतरीन फिल्में बिगबी के साथ बनाई हैं जैसे दीवार, काला पत्थर, त्रिशूल। कभी-कभी और सिलसिला भी यश चोपड़ा की ही फिल्में हैं लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर इन दोनों फिल्मों को पसन्द नहीं करता क्योंकि इनमें नौटंकी तत्व की प्रधानता थी जो आजकल यशराज बैनर की फिल्मों का स्थाई फार्मूला है, अविश्वसनीय तरीकों से रोना-धोना और भावनाओं का भौंडा प्रदर्शन। दूसरे फिल्मकार जिनके साथ बिगबी ने काफी फिल्में की हैं वे हैं मनमोहन देसाई। देसाई साहब एक बेहद सीमित प्रतिभा वाले फिल्मकार थे। उन्होंने एक ही कहानी में फेर बदल कर-कर कई-कईं फिल्में बनाईं। लेकिन वे किस्मत के धनी थे और उनकी फिल्में सफल रहीं लेकिन एक समय तक ही क्योंकि दर्शक को मूर्ख बनाकर लंबी पारी नहीं खेली जा सकती इसलिये बाद की उनकी फिल्में अमिताभ बच्चन के नाम के बावजूद पिट गईं। एक फिल्म जो वास्तव में हर मायने में अच्छी है वो है शक्ति सामंत की ”शक्ति”। अच्छी कहानी, अच्छी पटकथा, अच्छे संवाद और बेहतरीन अदाकारी अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार की। बाप-बेटे के रिश्तों पर बनी इस फिल्म का विषय उस समय के ट्रेंड को देखते हुए नया और अच्छा था। सबसे बड़ी बात कि इसमें भावनाओं को बिना लाउड हुए प्रदर्शित किया गया था जिसमें योगदान दिलीप कुमार और बिगबी के अभिनय का भी था। मेरी एक और पसंदीदा फिल्म है जिसमें बिगबी का अभिनय अपनी बुलंदी पर है, वो है ”शराबी”। शराबी प्रकाश मेहरा की फिल्म थी जिन्होंने अमिताभ कों पहली बार बतौर नायक जंज़ीर में पेश किया था। प्रकाश मेहरा ने व्यावसायिक फिल्में बनाईं लेकिन अपने स्तर पर अच्छी ही बनाई। ”मुक़द्दर का सिकंदर” भी उनकी अच्छी फिल्मों में एक है। अमिताभ हृषिकेश मुखर्जी के बहुत बड़े प्रसंशक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी फिल्म आनंद में उन्हें एक महत्वपूर्ण किरदार दिया था और अमिताभ ने भी उस किरदार में जान डाल दी थी। आनंद मेरी सबसे प्रिय फिल्मों में से एक है। इसके अंत के उस दृश्य में जहां डॉक्टर को पता चलता है कि आनंद मर चुका है, अमिताभ ने वो रुदन किया था कि आज भी देखता हूँ तो आँखों में आँसू आ जाते हैं। इसके बाद उन्होंने हृशिदा के साथ अभिमान, नमक हराम, चुपके-चुपके आदि फिल्मों में काम किया। 80 के दशक के मध्य में अमिताभ का सितारा गर्दिश में था लेकिन इसमें उनका फिल्मों का चुनाव भी एक कारण था। उन्होंने संबंधों की खातिर ऐसी वाहियात फिल्में कीं कि उन्हें देखना किसी सज़ा से कम नहीं। ”मर्द, कुली, जादूगर, तूफान, अकेला...“ ये ऐसी फिल्में हैं जो आजकल किसी ना किसी चैनल पर रोज़ आ रहीं हैं लेकिन इन्हें देखना सहनशक्ति की कठोर परीक्षा है। एक बात मैं अक्सर सोचता हूँ कि जब अमिताभ खुद ये फिल्में कभी देख लेते होंगे तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा या कि उन्होंने ये फिल्में कभी देखी ही नहीं हैं। तूफान में एक विचित्र वेशभूषा पहने, जादूगर में फूहड़ हरकतें करते। शायद इस दौर में वे अति आत्मविश्वास से पीड़ित हुए थे। कुली में जब उनके साथ दुर्घटना हुई थी और पूरे देश में दुख की लहर फैल गई थी तब उन्हें अपने पर शायद ये भरोसा हो गया था कि वे कुछ भी करें चलेगा। उस दौर में एक फिल्म ज़रूर ऐसी आई थी जो बिल्कुल अलग थी, ”मैं आज़ाद हूँ”। ये फिल्म उस समय बनती कला फिल्मों की श्रेणी में है। मुझे याद है तब मैं ये सोचकर खुश हुआ था कि अब उनके अभिनय का बेहतरीन नमूना देखने को मिलेगा लेकिन उसके बाद ऐसी किसी फिल्म में उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ लेकिन मैं एक सच्चे भक्त की तरह उनकी हर फिल्म देखता और उसकी तहेदिल से तारीफ भी करता था। फिर मुझ पर गाज गिरी जब उन्होंने 5 साल के लिये ब्रेक की घोषणा कर दी। मुझे बहुत गुस्सा भी आया लेकिन मैं बेचारा क्या कर सकता था? फिर 5 साल बाद उनकी वापसी की घोषणा हुई और मैं जितना खुश हुआ, मैं नहीं समझता कोई और उतना हुआ होगा। उनकी वापसी वाली फिल्म थी ”मृत्युदाता”। मैं बहुत उत्साहित था और पहले दिन ही मैंने फिल्म देखने का निश्चय किया था। मैंने अपने सभी साथियों से कहा लेकिन कोई भी फिल्म देखने के लिये राजी नहीं हुआ तो मैं अकेला ही चला पहला दिन, पहला शो। अंदर मेरी जो गत हुई मैं क्या कहूँ। ये फिल्म मेरे उत्साह के लिये सचमुच मृत्युदाता ही साबित हुई। दुनिया की सबसे बकवास फिल्मों में से एक थी ये फिल्म। मेरा मन खट्टा हो गया और ये फिल्म भी बुरी तरह पिट गई। फिल्म के निर्देशक मेहुल कुमार थे जिन्होंने और भी बहुत सी घटिया किस्म की फिल्में बनाई हैं। वे मनोज कुमार की नकली देशभक्ति के उत्तराधिकारी थे। इतना ही काफी नहीं था कि अमिताभ ने मेहुल कुमार के साथ एक और फिल्म "कोहराम” की जिसे आज तक मैं 10 मिनट से ज़्यादा नहीं देख पाया हूँ।

जैसा कि मैंने कहा, अमिताभ की प्रतिभा का पूरा उपयोग नहीं हो पाया और वे हमेशा गलत लोगों के बीच फंस गये। उनकी तीसरी पारी जो चरित्र भूमिकओं के साथ शुरु हुई उसमें भी वे आदित्य चोपडा और करण जौहर जैसे लोगों से घिर गये जो फिल्मकार नहीं बिजनेसमैन हैं, जो फिल्मों में कहानी, पटकथा, चरित्र-चित्रण को महत्व नहीं देते बल्कि मार्केटिंग पर ज़्यादा विश्वास रखते हैं। इन्हीं लोगों के बीच रहकर शाहरुख खान ने एक दशक से अभिनय नहीं किया है। अमिताभ बच्चन के फिल्म मोहब्बतें में एक बेहद कमज़ोर और अपमानजनक किरदार दिया गया। फिर करण जौहर ने ”कभी खुशी कभी गम” में उन्हें अपमानित किया जिसमें सभी लोग पूरे वक्त बिना बात के रोते रहते हैं। इस पारी में एक बात और नज़र आती है कि अमिताभ को कहीं ये ग्रंथि मन में बैठ गई कि वे बिगबी हैं और जो सहजता दीवार के वक़्त उनके अभिनय में दिखाई देती थी वो गायब हो गई। ”ब्लैक” की चाहे जितनी भी तारीफ हुई हो लेकिन बिगबी ने फिल्म के अंत को छोड़कर पूरी फिल्म में ओवरएक्टिंग की है। ”कांटे” उनके कॅरियर पर एक धब्बा है जो कि बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म थी। लेकिन इस पारी में भी जब भी उनके लायक कोई किरदार और निर्देशक उन्हें मिला उन्होंने वही जौहर दिखाए हैं, जैसे ”अक़्स”। इस फिल्म में उनका अभिनय उनके जीवन के सर्वश्रेष्ठ में से एक है। ”आँखें” भी अच्छी फिल्म थी। एक फिल्म आई थी ”फैमिली” जिसमें बिगबी का जबर्दस्त किरदार था। इसमें फिर वे अपने पूरे फॉर्म में हैं। इस फिल्म के अंत का दृश्य ज़रूर देखना चाहिये जिसमें फिर उसी महान अभिनेता के दर्शन होते हैं हालांकि ये फिल्म चली नहीं क्योंकि फिल्म का नायक अभिनयशून्य था। पिछले वर्ष आई फिल्म ”द लास्ट लीयर” ने फिर से मैं आज़ाद हूँ वाली उम्मीद जगा दी। ये फिल्म कला का नमूना है।

अब बस करता हूँ क्योंकि ये विषय तो इतना बड़ा है कि मेरे हाथ रुक ही नहीं रहे हैं, बातें खत्म ही नहीं हो रहीं हैं। अंत में इस उम्मीद के साथ इतिश्री करता हूँ कि निकट भविष्य में बिगबी के अभिनय के विविध रंग अपनी पूरी छटाओं के साथ हमें देखने को मिलेंगे। उनकी जल्द ही आने वाली फिल्में हैं ”अलादीन” और ”पा”।

धन्यवाद!

--अनिरुद्ध शर्मा

Sunday, September 27, 2009

अहिंसा परमो-धर्मः

आज से लगभग 102 साल पहले पंजाब की जमीन पर एक शेर पैदा हुआ, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला कर रख दिया। जी हाँ, आप ठीक समझे। आज भारतपुत्र शहीद भगत सिंह की 102वीं जयंती है। पिछले वर्ष आज ही के दिन हिन्द-युग्म ने प्रेमचंद सहजवाला की कलम से शगीद-ए-आज़म की जीवनी, उनके दर्शन, गाँधी से उनके मतभेद इत्यादि पर पुनर्चर्चा के लिए आलेखों की एक शृंखला शुरू की थी। आने वाले 2 अक्तूबर को महात्मा गाँधी की 140वीं जयंती है। इसी बीच हम इस शृंखला का परिशिष्ट प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें प्रेमचंद सहजवाला ने गाँधी की मजबूरी को उस समय की परिस्थितियों के सहारे मन्द किया है। एक अच्छी ख़बर यह है कि लेखों की यह शृंखला पुस्तक रूप में जल्द ही बाज़ार में उपलब्ध होने वाली है। लेख पढ़ें और भगत सिंह की महाकुर्बानी को स्मरण करें, यह उस वीर पुरुष को एक तरह की श्रद्धाँजलि होगी॰॰॰॰॰


परिशिष्ट
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दि. 23 मार्च 1931 को देश का एक स्वर्णिम पृष्ठ तो लिखा गया, पर एक बात को ले कर कई लोग सोचने पर विवश थे। पहले फाँसी की तारीख 24 मार्च तय की गई थी। फिर अचानक वाइसरॉय ने यह तिथि बदल कर 23 मार्च क्यों कर दी? क्या इसलिए कि 24 मार्च को ही कराची में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू होना था और यदि एक ही दिन कांग्रेस अधिवेशन का प्रारंभ व शहीदों की शहादत हुए तो कांग्रेस एक विद्रूपता भरी स्थिति में फंस जाएगी, जिससे उबरना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा? क्या शहादत की तिथि वाइसराय से कह कर गांधी ने बदलवाई थी? और कि जब भगत सिंह व उन के साथी जेलों में थे, तब कांग्रेस का लगभग हर महत्वपूर्ण नेता जेल में उन से मिलने जाता रहा, पर गाँधी ने वहां न जाना ही उचित क्यों समझा? गाँधी ने भगत सिंह व साथियों के विरुद्ध हुए फैसले को माफ़ कराने की बात वाइसराय लॉर्ड इर्विन से की तो थी, पर कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' को ख़त्म करने के सम्बन्ध में गाँधी व लॉर्ड इर्विन के बीच 17 फरवरी 1931 से बहुत महत्वपूर्ण वार्ता चल रही थी, जो 5 मार्च 1931 को 'गाँधी इर्विन समझौते' (जिसे 'दिल्ली समझौता' भी कहा जाता है) के रूप में समाप्त हुई। इस इतनी महत्वपूर्ण बातचीत के दौरान गाँधी ने भगत सिंह का ज़िक्र तक नहीं किया और समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद ही गाँधी ने उस विषय को क्यों उठाया? भगत सिंह व साथियों के विषय को बातचीत के बाहर क्यों रखा गया? जब तक भगत सिंह पर फैसला न हुआ, तब तक समझौते पर हस्ताक्षर ही क्यों किये उन्होंने? गाँधी चाहते तो यह शहादत रुक सकती थी। गाँधी को तो काले झंडों का सामना करना पड़ा। वार्धा से कराची जाते समय हर स्टेशन पर लोगों का समूह आक्रोश के एक तूफ़ान सा उमड़ रहा था। 'नौजवान भारत सभा' के सदस्यों में तो इतना आक्रोश था कि स्टेशनों पर लाल कमीज़ें पहन कर प्रदर्शन किये। इन जवानों ने नारे लगाए-

'महात्मा गाँधी वापस जाओ'
'गाँधीवाद मुर्दाबाद'


पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

  10. अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

  11. खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद ....

  12. एक मर मिटने की हसरत ही दिले-बिस्मिल में है

इन नौजवानों ने गाँधी को कपड़े से बने काले फूल पेश किये... गाँधी ने तो बाद में भगत सिंह के स्मारक के उद्‍घाटन पर जाने से भी साफ़ मना कर दिया। गाँधी तो गद्दार थे। अंग्रेज़ों के पिट्ठू थे गाँधी तो... गाँधी को तो मुसलामानों का ही दर्द सताता है बस। मुसलामानों पर ज़रा खरोंच लगी नहीं कि बस.. गाँधी अनशन पर बैठ जाते थे, वगैरह वगैरह... न जाने क्या क्या कहा और लिखा गया गाँधी के बारे में। आज़ादी से पहले भी और बाद में भी आज भी कई लोग लड़ने पर उतारू हो जाते हैं। यहाँ तक कहते हैं कि गाँधी ही इन बहादुर लड़कों की मृत्यु के ज़िम्मेदार थे। और तो और, विरोधी राजनैतिक दलों ने भी प्रारंभ के चुनावों में इस मुद्दे को उछाल कर वोट टीपने की कोशिश की थी। पर क्या बेहतर नहीं होगा कि इन तमाम सवालों के जवाब सिलसिलेवार खोजे जाएं? आखिर गाँधी को कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है, जब जब भगत सिंह की मृत्यु का प्रसंग उठता है?

पहले कांग्रेस अधिवेशन की बात की जाए, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में कराची में प्रारंभ हुआ। तारीख 29 मार्च 1931 है आज। कांग्रेस आज संकल्प (सं. 2) पारित करने यहाँ एकत्रित हुई है। देश के इन तीनों जवानों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है संकल्प (सं. 2)। इस सत्र में कांग्रेस के सभी गणमान्य सदस्यों के अतिरिक्त उपस्थित हैं भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह व शिवाराम राजगुरु की माँ। संकल्प का प्रस्ताव पढ़ रहे हैं पंडित जवाहरलाल नेहरु। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्ताव पढ़ने से पूर्व सत्र को संबोधित करते हुए जवाहरलाल नेहरु कहते हैं कि बेहतर होता, यदि इस संकल्प को वही महापुरुष प्रस्तुत करते, जिन्होंने इस संकल्प का मसौदा बनाया है। यानी स्वयं महात्मा गाँधी! पर कई व्यस्तताओं के होते वे इस समय यहाँ उपस्थित नहीं हो सके हैं। संकल्प इस प्रकार है-

'यह कांग्रेस, किसी भी प्रकार या आकार की राजनैतिक हिंसा से स्वयं को विलग रख कर स्वर्गीय सरदार भगत सिंह व उस के कॉमरेड साथियों, सुखदेव व राजगुरु की वीरता व त्याग की प्रशंसा यहाँ दर्ज करती है, तथा उनके शोकग्रस्त परिवारों से मिल कर इन (तीनों) ज़िंदगियों की क्षति पर शोक व्यक्त करती है।'

प्रस्ताव को पंडित नेहरु ने प्रस्तावित किया (propose by) और पंडित मदन मोहन मालवीय ने समर्थन किया (seconded by)। पंडित नेहरु द्वारा प्रस्ताव पढ़े जाने के बाद पंडित मदन मोहन मालवीय ने भाषण किया जिस में उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच भगत सिंह व उस के साथियों की बहादुरी व देशभक्ति की भरपूर प्रशंसा थी। इस के बाद वे सरदार किशन सिंह व राजगुरु की माँ को सहारा दे कर सादर मंच तक ले गए। सरदार किशन सिंह ने भी सत्र को संबोधित कर के अपने विचार प्रकट किये।

प्रस्ताव पर मतदान हो, इससे पहले कुछ सदस्यों ने कुछ संशोधन प्रस्तावित किये थे। पर सिवाय श्री एम.वी. शास्त्री के, अन्य सभी ने संशोधन वापस ले लिए थे। श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने श्री शास्त्री द्वारा प्रस्तावित संशोधन का समर्थन वापस लेने का फैसला भी सरदार पटेल को बता दिया। श्री शास्त्री ने अपना संशोधन पढ़ते हुए कहा-

'अध्यक्ष महोदय, इस संकल्प में ये शब्द नहीं होने चाहियें, कि कांग्रेस किसी भी प्रकार या आकार की राजनैतिक हिंसा से खुद को विलग रखती है। मेरा कहना है कि यदि हम महान सरदार भगत सिंह, महान सुखदेव व महान राजगुरु, जो कि (ब्रिटिश की) कानूनी हिंसा के शिकार हो गए हैं, का सम्मान कर रहे हैं, तो वह अधूरे मन से नहीं होना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि इन तीनों जवानों की बहादुरी व त्याग का गुणगान आप स्वच्छंद व निर्द्वंद्व भावना से करें।'

श्री शास्त्री के संशोधन को आखिर डॉ. ताराचंद लालवानी ने समर्थन दिया और अध्यक्ष के साथ श्री शास्त्री की अप्रिय तर्कबाज़ी के बाद उनके संशोधन पर मतदान हुआ तो शेष सदस्यों में से सभी ने संशोधन के विरुद्ध मतदान किया। इस के बाद मुख्य प्रस्ताव पर मतदान हुआ जिसे शत-प्रतिशत सदस्यों ने पक्ष में वोट डाल कर पारित किया। प्रथा के अनुसार उस दिन की कार्यवाही 'वन्देमातरम्' के गान के साथ संपन्न हुई (Proceedings of 45th session of Indian National Congress pp 78-81)

दरअसल गाँधी व अहिंसा परस्पर पर्यायवाची बन गए थे। गाँधी ने अहिंसा को कांग्रेस व स्वाधीनता संघर्ष का धर्म बना दिया था। भले ही कांग्रेस में कुछ ऐसे भी युवा नेता थे, जैसे जयप्रकाश नारायण, जो गाँधी से 33 वर्ष छोटे थे व उस समय के उत्साही युवा कांग्रेसियों में से थे, जो यदा कदा अहिंसा की लक्ष्मण रेखा से चुपके से बाहर भी निकल आते थे। परन्तु एक पार्टी के रूप में कांग्रेस उस लक्ष्मण रेखा को कदापि पार नहीं कर सकती थी। इसलिए एम.वी. शास्त्री चाहे कितने भी प्रयास कर लेते, वह संकल्प उसी तरह पारित होना था, जिस तरह हुआ। जब जनवरी 1924 में बंगाल के क्रांतिकारी युवक गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहा (गलती से उन्होंने किसी मि. डे की हत्या कर दी- अध्याय 7 अनुच्छेद 6), और हंसते हंसते फांसी के तख्ते पर झूल गए, तब बंगाल कांग्रेस को भी गोपीनाथ साहा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते समय ऐसा ही, शर्तों में बंधा संकल्प पारित करना पड़ा था, जिसमें कांग्रेस ने स्वयं को किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर ही रखा। अर्थात् कांग्रेस किसी भी अन्य बात से समझौता कर सकती थी, परन्तु अहिंसा पथ से विमुख होना उस के लिए असंभव था। गाँधी स्वाधीनता संघर्ष में अहिंसा पथ पर कितने दृढ़ थे, इस का सबूत है उनके सब से पहले आंदोलन 'असहयोग आंदोलन' का सहसा एक झटके से 12 फरवरी 1922 को समाप्त हो जाना। पंडित नेहरु जैसे नेता बौखला गए, जो इस आंदोलन को ले कर इतने उत्साहित थे कि उनके साथ हज़ारों नौजवानों में भी उत्तेजना सी आ गई थी। पंडित नेहरु अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि देश के नौजवानों में 'असहयोग आंदोलन' को ले कर इस कदर अदम्य जोश व उत्साह था कि जब पुलिस कोई लॉरी ले कर किसी कार्यकर्ता को गिरफ्तार करने जाती, तो ऐसे असंख्य लोग, जिन्होंने कभी कांग्रेस की गतिविधियों में हिस्सा नहीं लिया, गिरफ्तार कर लिए जाने का आग्रह करते। लॉरी के अन्दर भीड़ बन कर ठुंस जाते और ज़िद में बाहर आने से इनकार कर देते। जेल के अन्दर हम लोग सुनते कि बाहर लॉरियों की लॉरियां भर कर आई हैं। कई सरकारी क्लर्क ड्यूटी से घर लौट रहे होते तो इस सारे जुनून से प्रभावित हो कर उत्साहवश स्वयं को घर की बजाय जेलों में पाते (An Autobiography - Jawaharlal Nehru pp 86-87)। ऐसे में गाँधी ने अचानक सब को सकते में डाल 12 फरवरी 1922 को आंदोलन वापस क्यों ले लिया! दरअसल उत्तरप्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक कस्बे चौरी चौरा में 5 फरवरी 1922 को पुलिस और लोगों के बीच बेहद हिंसक प्रकार की मुठभेड़ हो गई। पुलिस ने गोलियां चलाई तो जनता भी होश खो बैठी और पुलिस थाने पर हमला बोल दिया। गुस्साई भीड़ ने जब पुलिस थाने को आग लगा दी तो पुलिसवाले जान बचा कर थाने से बाहर भागने लगे। पर भीड़ ने कई पुलिसवालों को पकड़ कर थाने में लगाई आग में ही झोंक दिया। कुल 22 पुलिसवाले जल कर मर गए (India's Struggle for Independence by Bipin Chandra, Mridula Mukherjee, KN Pannikar and Sucheta Mahajan p 191)। गाँधी के हृदय को बहुत असह्य ठेस पहुँची। कई लोगों ने सोचा केवल एक जगह ही तो ऐसा हुआ! पर नहीं! गाँधी ने अडिग हो कर आंदोलन समाप्त कर दिया। एक विदेशी महिला ने तो तो बाद के वर्षों में ब्रिटिश वाइसराय को पत्र भी लिखा था कि भारत में पुलिस की आखिर ज़रुरत क्या है। भारत में ब्रिटिश का सब से बड़ा पुलिसवाला गाँधी तो है!

हम इस सारे प्रकरण की तुलना 'भारत छोड़ो' आंदोलन से करते हैं। 8 अगस्त 1942 को गाँधी ने मुंबई से 'भारत छोड़ो' आन्दोलन का बिगुल बजा दिया। ब्रिटिश ने भी उतनी ही मुस्तैदी से 9 अगस्त की सुबह-सुबह सभी छोटे-बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ब्रिटिश वैसे ही पसीने-पसीने हो रही थी और ऐसे समय किसी भी प्रकार के आंदोलन से उसकी बौखलाहट इन गिरफ्तारियों से ही स्पष्ट थी। गाँधी और अन्य सभी नेता विभिन्न शहरों में जेलों में थे और बाहर देश की जनता के सर पर आक्रोश का भूत सा सवार हो गया। पूरा देश हिंसक घटनाओं से भर उठा। जनता को जहाँ मौका मिलता, एक ज्वालामुखी बन कर बहुत भारी संख्या में आगे बढ़ती और रेलवे स्टेशन हो या सरकारी इमारत, टेलेग्राम के खंभे हों या पुलिस थाने, सब को आग लगा देती या पथराव से भून देती. लेकिन नतीजा क्या हुआ? इस घटनाचक्र के ठीक दो महीने बाद ब्रिटिश के प्रधानमंत्री सर विन्स्टन चर्चिल एक कुटिल मुस्कराहट मुस्कराते हुए ब्रिटिश की संसद में भाषण कर रहे हैं। वे भारत के प्रति अपनी चिर परिचित वितृष्णा के साथ बहुत बेशर्म तरीके से ऐलान करते हैं कि भारत में हो रहे उपद्रवों को ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत के साथ कुचल दिया है। उन्होंने भारत की बहादुर पुलिस और अधिकारी वर्ग की वफादारी की प्रशंसा की, जिनका व्यवहार उन के अनुसार सदैव सर्वोच्च प्रशंसा का अधिकार रखता है! (The Discovery of India pp 538-539)

अर्थात शक्ति के समीकरण में भारत की जनता पिछड़ गई। इस पर कई लोग तो बौखला कर यह प्रश्न भी उछालते हैं -
'तो फिर क्या आज़ादी गाँधी के सत्याग्रह से डर कर मिली? या फिर जेलों में 'रघुपति राघव...' गा रहे कांग्रेसियों से मिली आज़ादी?

यह बहुत पेचीदा सवाल है। अक्सर राजनैतिक दल उस सारे घटनाचक्र को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं और अपने तुच्छ राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने के लिए यह तर्क देते हैं कि ब्रिटिश तो द्वितीय विश्वयुद्ध में ही थक हार चुकी थी, सो चली गई। गाँधी ने क्या किया? पर जब चौरी-चौरा प्रकरण के बाद अचानक आंदोलन वापस ले कर गाँधी ने सब को हैरत में डाल दिया, तब कांग्रेस से भी ज़्यादा चौंकी थी खुद ब्रिटिश। वाइसरॉय के एक प्रवक्ता ने सुख की सांस लेते हुए बयान दिया था कि गाँधी यह आंदोलन वापस न लेते तो ब्रिटिश को बहुत भारी नुक्सान उठाना पड़ता। अब तक इस आंदोलन से कई लाख पाउंड का नुकसान हो चुका है और आंदोलन वापस होते ही कई लाख पाउंड का नुकसान होते होते बच गया। गाँधी ब्रिटिश की नब्ज़ को परख सकते थे। उन्हें पता था कि ब्रिटिश तो यहाँ धन कमाने आई है। इस सोने की चिड़िया को लूट कर अपने घर जश्न मनाने आई है ब्रिटिश। इसलिए गाँधी ब्रिटिश से आया माल रेलवे स्टेशनों व कई सार्वजनिक स्थलों पर जलवाते थे, ताकि ब्रिटिश की रीढ़ की आर्थिक हड्डी टूटे। यदि सत्याग्रह का कोई अर्थ न होता तो सरदार पटेल ने बरदोली (गुजरात) में भूमि कर बढ़ने पर जो सत्याग्रह किया, उससे ब्रिटिश के तंत्र की जड़ें क्यों हिल गई? वल्लभ भाई पटेल नाम की गूँज ब्रिटिश की संसद में कैसे होने लगी? वल्लभ भाई पटेल रातों रात बरदोली निवासियों की नज़र में सरदार वल्लभ भाई पटेल कैसे बन गए? 'नमक सत्याग्रह' में जब गाँधी ने हज़ारों नर नारियों के साथ दांडी के समुद्र में घुस कर अपनी मुट्ठी में अपने ही देश का नमक कस लिया और ब्रिटिश को चुनौती दी कि जो ब्रिटिश हमारा ही नमक खा कर नमक का टैक्स बढ़ाती है, वह हमें नमक बनाने से रोक सके तो रोके। तब भी ब्रिटिश को ही ज़रुरत महसूस हुई कि वह 'गाँधी इर्विन वार्ता' करे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिस्थिति बहुत जटिल हो गई। ब्रिटिश की समझ नहीं आ रहा था कि जंग जीतने की खुशी मनाए या अचानक सर पर आई कंगाली को रोये। प्रसिद्ध लेखक युगल लैरी कॉलिन्स और डोमिनीक लैपीयर द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध उपन्यास 'Freedom at Midnight' के पहले अध्याय में ही लिखा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लन्दन में लोगों के पास नव-वर्ष मनाने तक का पैसा नहीं बचा था। लोग इस कदर फटेहाल से हो चुके थे कि उनके पास लांड्री का बिल भरने तक के पैसे नहीं थे। पूरे छः वर्ष इतना बड़ा युद्ध लड़ कर ब्रिटिश खोखली हो चुकी थी। ऊपर से अमरीका व अन्य सभी पश्चिमी देशों की गिद्ध-दृष्टि भारत पर! अमरीका बार बार चर्चिल को सलाह दे रहा था कि गाँधी जेल में अचानक अनशन पर बैठ गए हैं, उनकी जान खतरे में है। गाँधी को जेल से रिहा कर दो! तो क्या अमरीका को उस समय गाँधी के प्रति चिंता हो रही थी! अमरीका तो ब्रिटिश को भारत को आज़ाद कर देने को भी उकसा रहा था। चर्चिल जेल के बाहर एक हवाई जहाज़ और सेना खड़ी कर देते हैं और कहते हैं कि गाँधी को मरने दो। जब मर जाए तो सेना हवाई जहाज़ में उस का शरीर ले जा कर जहाँ लोग कहेंगे, वहीं धर देगी। तो चर्चिल को आखिर किस बात का तनाव सता रहा था! चर्चिल गाँधी के मरने में ही ब्रिटिश को सुरक्षित समझते थे। चर्चिल असुरक्षा से बुरी तरह ग्रस्त थे। चर्चिल को लग रहा था कि ब्रिटिश किसी भी परिस्थिति में भारत न छोड़े। क्योंकि युद्ध से हुई आर्थिक बर्बादी की भरपाई आखिर कैसे हो? अपनी खाली जेबों को भरने के लिए उसी सोने की चिड़िया की बेहद ज़रुरत थी ब्रिटिश को। ब्रिटिश अपना सारा आर्थिक घाटा इसी सोने की चिड़िया से ही पूरा कर सकती थी। इसलिये उस समय भारत में बने रहना उस के अस्तित्व की एक शर्त सा बन गया था। और जर्मनी में सुभाषचन्द्र बोस द्वारा हिटलर से किये गए इस निवेदन पर कि हिटलर भारत की आज़ादी के लिए मदद करें, हिटलर यह कहते हैं कि वे नहीं चाहते कि ब्रिटिश फिलहाल वहां से हटे! क्योंकि यदि ब्रिटिश हट गई तो वहां रूस आ जाएगा! अर्थात् दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतों की गिद्ध नज़रों ने भारत भूमि पर एक बिसात सी बिछा रखी थी। ब्रिटिश हटे तो इस सोने की चिड़िया का शोषण अमरीका करे या रूस! या फिर ब्रिटिश ही टिकी रहे! ऐसे में ब्रिटिश ने जब अंततः विश्लेषण किया तो परिस्थिति 1857 जैसी नहीं थी। न ही प्रथम विश्वयुद्ध जैसी। 1857 एक असंगठित बिखरा-बिखरा फौजी विद्रोह था, जिसे कुचल दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के प्रारंभ में अभी मोहनदास करमचंद गाँधी नाम की शक्ति ने भारत में कदम रखा ही था। अब उसी गाँधी की ताक़त के रूप में भारत की जनता का आज़ादी-उन्मुख चेहरा ब्रिटिश को उतना उत्साहवर्द्धक नहीं लगा, जितना प्रथम विश्वयुद्ध में! तब तो गाँधी ने गुजरात जा कर नौजवानों को प्रेरणा दी कि वे ब्रिटिश की सेना में भर्ती हों और युद्ध में ब्रिटिश की सहायता करें। अब परिस्थिति ठीक उलट थी। ब्रिटिश ने इस युद्ध में भी कांग्रेस के सामने समर्थन के लिए झोली फैलाई। कांग्रेस चाहती थी कि युद्ध में ब्रिटिश की मदद करे और लगे हाथों कीमत के रूप में आज़ादी ले ले। गाँधी ने मना किया। कांग्रेस नहीं मानी। पर ब्रिटिश से बातचीत कर के खिसियानी बिल्ली की तरह वापस गाँधी के पास ही आई। और गाँधी ने उस समय तक देश की जनता को एक अदम्य ताकत में बदल दिया था। ब्रिटिश की हथेलियों में पसीना आ गया, यह सोच कर कि अब वह उस देश पर एक वर्ष भी और राज करे, जिस देश की जनता एक पल के लिए भी अब पराधीन नहीं रह सकती! भले ही ब्रिटिश के पास उस समय भी बीस लाख से भी अधिक सेना थी, पर ब्रिटिश ने अपनी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को जनता के शोषण पर आधारित किया था, उस पर लोकतंत्र का मुखौटा चढ़ा कर। लोकतंत्र यानी जनता का साथ। पर जब लोक साथ न हो तो तंत्र क्या करेगा? शक्ति के समीकरण में ब्रिटिश ने लोकमान्य तिलक को भी एक समय-बिंदु के बाद शिथिल सा कर दिया था। शक्ति के समीकरण में सुभाषचन्द्र बोस की 'आज़ाद हिंद फौज' भी नगण्य पड़ गई। पर सहयोग व आज्ञापालन के मामले में ब्रिटिश अब खुद को मोहनदास करमचंद गाँधी के सामने बौना सा महसूस करने लगी थी। शारीरिक शक्ति के रूप में वह अब भी विकराल थी, पर वह हारी थी तो मानसिक मोर्चे पर।

गाँधी ने भगत सिंह के लिए कोशिश की भी थी या नहीं, इस बात को ले कर इतिहासकारों के कई मत हैं। 'गाँधी इर्विन वार्ता' 17 फरवरी 1931 को दिल्ली में शुरू हुई। इतिहास में स्वाधीनता संघर्ष का एक पूरा दशक, सन् '28 से ले कर '37 तक का, बेहद महत्वपूर्ण दशक था, जिस ने जनता को आज़ादी के काफी निकट ला कर खड़ा कर दिया। पंडित नेहरु 'The Discovery of India' में लिखते हैं कि सन् '37 में जब देश में प्रादेशिक चुनाव हो गए, और कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें आ गई तो लोगों के व्यवहार में बहुत सुखद से परिवर्तन देखे गए। आसपास के शहरों-गांवों से लोगों के झुंड के झुंड स्वेच्छा से सचिवालयों में घूमने लगे, (जैसे आज़ादी सचमुच मिल ही गई हो)। लोग विधान सभा के चैंबर में चले जाते, मंत्रियों के कमरों में झाँकने लगते। उन्हें रोकना सचमुच कठिन था (p 406)। सन् 1928 में 'साइमन कमीशन' आया। कांग्रेस ने उसे ठुकराया और कांग्रेस ने अपनी शर्तों पर आधारित मोतीलाल नेहरु रिपोर्ट बनाई। मुहम्मद अली जिन्ना ने रिपोर्ट को खारिज कर के अपने ही 14 पॉइंट दे दिए। कांग्रेस की बागडोर मोतीलाल नेहरु के हाथों से निकल जवाहरलाल नेहरु के हाथों आ गई जो एक बार तो पिता से ही भिड़ पड़े थे कि ब्रिटिश से हम सम्पूर्ण आज़ादी लेंगे, उस से कम और कुछ नहीं। पंडित नेहरु द्वारा रावी के किनारे से पूरे देश को सम्पूर्ण आज़ादी की शपथ दिलवाई गई। देश में जगह-जगह तिरंगा झंडा फहराए जाने की धूम मच गई। गिरफ्तारियां। 'सविनय अवज्ञा''नमक सत्याग्रह'। और फिर लन्दन में हुए 'गोल-मेज़ कांफ्रेंस', जिन का चरम था ब्रिटिश द्वारा बनाया गया 'Government of India Act1935', जिस के आधार पर सन् 1949 में भारत का पूरा संविधान बना। और 1937 के प्रादेशिक चुनाव। क्या कुछ नहीं हो रहा था स्वाधीनता इतिहास के पन्नों पर इस दशक में। गाँधी इस पूरे दशक में अथक परिश्रम में लगे थे और इस पूरे घटनाचक्र से जुड़े रहने के सिवाय उन्हें किसी अन्य बात के लिए समय नहीं था। वे एक महान यज्ञ में महान तपस्वी से लगे थे। ऐसे में उन के लिए तीन नौजवान ज़िन्दगियाँ शायद बहुत कम अहमियत रखती हों। उन्होंने जनता को आश्वस्त तो किया था कि उन्होंने वाइसराय से 'बहुत' कोशिश की कि इन तीनों जवानों के मृत्युदंड को उम्र कैद और देश निकाले में बदला जाए। पर कुछ लोग यह मानते हैं कि उन्होंने कोशिश तो की, पर सरसरी सी। वह भी अधूरे मन। कुछ लोग कहते हैं कि 'बहुत' शब्द झूठा है, तो अन्य कई लोग यह मानते हैं कि इतने बड़े यज्ञ में एक शब्द का झूठ कोई अर्थ नहीं रखता। क्योंकि धर्मराज युधिष्ठिर ने भी तो महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा हाथी के मरने पर द्रोणाचार्य को इस भ्रम में रखा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मर गया है। कुछ इस झूठ की तुलना चंद्रमा से करते हैं कि जैसे चंद्रमा पर एक काला दाग़ है, वैसे ही गाँधी के उज्जवल स्वच्छ चरित्र पर भी एक दाग़ है, कि उन्होंने 'बहुत' कोशिश कह कर अपने प्रयास की अतिशयोक्ति व्यक्त की। दरअसल अपने पूरे यज्ञ में गाँधी को एक ही चिंता रहती थी कि नौजवान किसी भी परिस्थिति में दिग्भ्रमित हो कर हिंसा की ओर उन्मुख न हो जाएं। इसीलिए जब मृत्युदंड घोषित हुए तो उन्होंने वाइसराय को पत्र लिख कर इस बात की चिंता जताई कि यदि यह मृत्युदंड हो गया तो संभव है कि देश की नौजवान पीढ़ी भड़क उठे और हिंसा पर उतर आए। गाँधी किसी भी परिस्थिति में नहीं चाहते थे कि इतनी महत्वपूर्ण वार्ता की प्रक्रिया में देश में भड़की कानून व्यवस्था की समस्या के कारण रुकावट आए। यही गाँधी का स्वार्थ था। 17 फरवरी को प्रारंभ हुई 'गाँधी इर्विन वार्ता' से अगले दिन गाँधी ने अन्य सभी महत्वपूर्ण बातों से अलग, एक सरसरे तरीके से लॉर्ड इर्विन से यह चर्चा छेड़ी कि देश के वातावरण को शांतिपूर्ण बनाए रखना इस वार्ता के दौरान बहुत ज़रूरी है। इसलिए यह मृत्युदंड रोक दें। इर्विन बहुत चालाक वाइसराय था। गाँधी से उसने स्पष्ट किया कि:

'मेरे पास तीन विकल्प हैं। या तो मैं तीनों की फांसी माफ़ कर दूं। या फांसी तब दूं, जब कांग्रेस का कराची अधिवेशन समाप्त हो चुका हो। या फिर कांग्रेस अधिवेशन से पहले ही फांसी दे दूं। पर मैं किसी भी हालत में फांसी को माफ़ नहीं कर सकता, और रही बात फांसी को बाद में देने की, सो इस से देश की जनता इसी भ्रम में रहेगी, कि शायद हम उसे माफ़ करने पर विचार कर रहे हैं। इसीलिए बेहतर कि यह काम पहले ही कर दिया जाए!'

और वाइसराय ने तारीख 24 से बदल कर 23 कर दी!

वाइसराय किसी भी हालत में मृत्युदंड माफ़ करने वाले नहीं थे। यह इस बात से भी स्पष्ट है कि जब 5 मार्च को आखिर 'दिल्ली समझौता' हुआ तो उस के एक अनुच्छेद में कांग्रेसियों पर चल रहे मुक़दमे वापस लेने और उन्हें जेलों से रिहा करने की भी ब्रिटिश द्वारा सहमति थी। पर यह सहमति इस शर्त के साथ थी कि केवल जिनके खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा के गंभीर आरोप नहीं हैं, उन पर चल रहे मुक़दमे वापस लिए जाएंगे और रिहा किया जाएगा। 5 मार्च को 'दिल्ली समझौते' पर हस्ताक्षर हुए और अभी भगत सिंह व साथियों की शहादत में पूरे 18 दिन पड़े थे। जनता के मन में यह उत्कट इच्छा थी कि गाँधी समझौते को ही क्यों नहीं फाड़-फूड़ कर कूड़ेदान में डाल देते, यदि वाइसराय हमारे इन तीन बहादुर लड़कों को छोड़ने पर राज़ी नहीं है तो। पर गाँधी जानते थे, कि देश उस समय बहुत महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा था और समझौते के बाद देश की जनता की शक्ति बढ़नी थी। सो कुछ भी हो, गाँधी समझौते की हत्या करने का विचार तक मन में नहीं ला सकते थे।

...आज 23 मार्च है। सोमवार है। गाँधी सोमवार को मौन व्रत रखते हैं व बातचीत ज़रूरी हो तो कागज़ पर लिख कर करते हैं। आज शाम को ही शहादत है। और गाँधी अचानक एक उत्तेजना भरी अपील वाइसराय को भेजते हैं। जैसे आम जनता की उत्तेजना गाँधी में भी आ गई हो। पर गाँधी को दरअसल 'नौजवान भारत सभा' ने बहुत आग्रह से एक अपील भेजी थी, कि गाँधी और केवल गाँधी ही उनके तीनों साथियों को बचा सकते हैं। पूरे देश में ऐसी कोई ताकत नहीं, जो ऐसे समय कुछ कर सके। 'नौजवान भारत सभा' के नौजवानों ने अपने पत्र में आश्वासन दिया है कि सिर्फ हमारे ये तीन साथी बचा लीजिये। हम आप से वादा करते हैं कि जीवन भर फिर कभी भी शस्त्र को हाथ में नहीं उठाएंगे। किसी भी प्रकार की हिंसा से हम पूरी तरह अछूते रहेंगे। हम हमेशा हमेशा के लिए अपना रास्ता छोड़ने को तैयार हैं। हम कोई भी राजनैतिक हत्या नहीं करेंगे। गाँधी की चेतना को इस आश्वासन ने झकझोर कर रख दिया। इन नौजवानों की ओर से इस से बड़ा पुरस्कार गाँधी के लिए नहीं हो सकता था। इन सभी घटनाओं के दौरान गाँधी कभी भी भगत सिंह की देशभक्ति, बहादुरी व चरित्र पर संदेह नहीं करते थे। पर वे अपने अख़बारों में इतना स्पष्ट लिखते थे कि राजनैतिक हत्याओं द्वारा ये नौजवान अपनी बहादुरी का दुरुपयोग कर रहे हैं। इसलिए भगत सिंह से जेल में मिलने जाने से कहीं अनायास ही उनके और भगत सिंह के रास्ते आपस में विलीन होते हुए न दिखें, वे भगत सिंह से जेल में मिलने कभी नहीं गए। अब एक बहुत बड़ा आश्वासन उन के हाथ में है। गाँधी वाइसराय को एक अति-तत्काल पत्र दौड़ाते हैं कि आज सोमवार है। मैं बातचीत नहीं कर पाऊंगा। कागज़ कलम से ही बात कर पाऊंगा। पर इस समय मेरे पास ब्रिटिश के लिए एक सुनहला मौका है। ब्रिटिश चाहती है कि देश में शांति बनी रहे। तो इस से अच्छा मौका और नहीं हो सकता। आप ये मृत्युदंड टाल कर उम्र कैद और देश निकाले में बदल दीजिये। भगत सिंह ही बाहर चले जाएंगे, और ये नौजवान अपनी पिस्तोलें व हथियार समर्पित कर के शांति पथ पर चलने लगेंगे, इस से ज़्यादा आप को चाहिए क्या...

...पर अब तक देर हो चुकी थी। वाइसराय ने गाँधी की अपील को ठुकरा दिया और शाम को शहादत हो गई।

गाँधी को अफ़सोस से कहना पड़ा, कि ब्रिटिश के पास एक सुनहला मौका था, देश के नौजवानों को दिग्भ्रमित होने से बचाने का। पर ब्रिटिश ने यह सुनहला मौका गँवा दिया है। शायद देर तो इसलिए भी हो गई थी कि भगत सिंह ने जिन लेखों द्वारा आतंकवाद के रास्ते को नकारना शुरू कर दिया था, उन का गाँधी को पता नहीं चला था। गाँधी को पता चलता कि अब भगत सिंह अपने रास्ते से मानसिक तौर पर विलग हो चुके हैं, तो मुमकिन है कि गाँधी के प्रयास कुछ और सशक्त होते।

गाँधी को भगत सिंह के ऊंचे चरित्र में कभी भी संदेह नहीं रहा। वे चाहते थे कि देश की युवा पीढ़ी उनके ऊंचे इखलाक और देशभक्ति से प्रेरणा ले। पर जब उन्हें किसी स्मारक समिति ने अनुरोध किया कि भगत सिंह की स्मृति में एक स्मारक स्थापित किया जा रहा है, इस में आप की उपस्थिति की ज़रुरत है, तब गाँधी ने उस स्मारक समिति को विनम्र लिखा:

'किसी का भी स्मारक बनाने का अर्थ है कि स्मारक बनाने वाले उस के कृत्य का अनुकरण करें। यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को भी एक आमंत्रण होगा कि ऐसे हर कृत्य की नक़ल करे। इसलिए मैं किसी भी तरीक़े से अपने आप को इस प्रकार के स्मारक से जोड़ने में असमर्थ हूँ'!...(The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice by AG Noorani p 251)

चौरी चौरा प्रकरण, और उक्त पत्र! अहिंसा को ले कर गाँधी की भीष्म प्रतिज्ञा के इन से बड़े सबूत भला और कोई हो सकते हैं ?...

समाप्त
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----प्रेमचंद सहजवाला