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Friday, August 07, 2009

एक उदास आदमी की कविता ''फॉरेस्ट गंप'


रन फॉरेस्ट रन...
पिछले कुछ दिनों से जब भी मैं किसी फिल्म के बारे में लिखने की बात सोचता हूँ, ये जुमला फुदक कर मेरे जेहन में सबसे ऊपर आ जाता है |
ये फिल्म मुझसे कह रही है कि मेरे बारे में लिखो...| और सही मायने में फिल्म वही है जो देखने के कई दिनों बाद तक आपके जेहन में घूमती रहे, जिसका स्वाद आप महसूस करने लगें |
ये फिल्म है सन १९९४ में बनी "फॉरेस्ट गंप" जिसके मुख्य भूमिका निभाई है टॉम हैंक्स ने, इतना जीवंत अभिनय कि आपको और कुछ याद ही नहीं रहता | फिल्म में टॉम हैंक्स ने एक मंदबुद्धि इंसान की भूमिका की है और इतनी कमाल की है कि अब अगर मैं सचमुच में टॉम हैंक्स को देखूं तो उनसे उसी तरह बात करने की उम्मीद करूँगा |
इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर पुरस्कार मिला था | इसके अलावा फिल्म का ऑस्कर में १३ श्रेणियों में नामांकन हुआ था जिसमे से इसे ६ पुरस्कार मिले | अन्य पुरस्कार जो मिले वो हैं - सर्वश्रेष्ठ फिल्म, निर्देशक, सम्पादन, विजुअल इफेक्ट्स, अडॉपटेड स्क्रीनप्ले | फिल्म १९८६ में इसी नाम से लिखे एक उपन्यास पर आधारित है |
फॉरेस्ट गंप आपको अपने साथ अपनी जीवन-यात्रा पर ले जाता है और उसके साथ आप कभी हसते हैं, कभी उदास होते हैं | सामान्य से कम I.Q. के साथ फॉरेस्ट अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त करता है | एक बच्चा जिसके एक पैर में लोहे की छड़ है जब भागने लगता है तो बन्दूक की गोली की तरह भागता है | अपने इसी भागने की क्षमता की वजह से उसे फुटबॉल टीम में ले लिया जाता है | उसे खेल की भी कोई समझ नहीं है, उसे किसी चीज़ की कोई समझ नहीं है. हाँ, लेकिन उसे जब कोई कुछ करने को कहता है तो वो पूरी एकाग्रता के साथ उसे करता है |
फॉरेस्ट का जीवन बहुत से संयोगों के साथ आगे बढ़ता है | वो जो भी काम करता है उसमे उसे अधिकतम सफलता मिलती है| कॉलेज के वक़्त वो फुटबाल स्टार बन जाता है, वहां से उसे आर्मी में जगह मिल जाती है जहां उसकी आज्ञाकारिता की वजह से तरक्की मिलती है | वो आज्ञाकारी है क्योंकि उसे खुद समझ में नहीं आता कि उसे क्या करना चाहिए इसीलिए वो वही करता है जो उसे करने को कहा जाए | उसकी ज़िन्दगी उसकी माँ के द्बारा सिखाये गए सिद्धांतों पर चलती है | उसे विएतनाम युद्ध में भेजा जाता है जहाँ उसकी दोस्ती बुब्बा से होती है जो एक फिशिंग कंपनी खोलना चाहता है और फॉरेस्ट को अपने साथ पार्टनरशिप के लिए राज़ी कर लेता है | एक हमले में फॉरेस्ट अपने बहुत से साथियों की जान बचाता है, अपने अफसर सहित लेकिन बुब्बा उस हमले में मारा जाता है | विएतनाम में किये कारनामे के लिए उसे बहुत से पदक मिलते हैं उसे नितम्ब पर गोली लगी होती है जिसके लिए उसे कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ता है| वहां कोई उसे पिंग-पोंग खेलना सिखाता है जिसका वो चैम्पियन हो जाता है और कई अन्तराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करता है| बाद में बुब्बा से किये वादे को निभाने के लिए वो फिशिंग कंपनी शुरू करता है जिसमे बाद में उसके साथ उसका वो अफसर भी आ जाता है जिसकी उसने जान बचाई थी, उसमे भी उसे बेहिसाब फायदा होता है और वो अरबपति हो जाता है लेकिन उसे किसी चीज़ से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, जिस तरह बिना समझे वो कोई काम शुरू करता है उसी तरह छोड़ भी देता है | अपनी सारी सफलताओं के बीच वो कई बार राष्ट्रपति से भी मिलता है लेकिन इसका भी उसे कोई महत्त्व समझ नहीं आता, जीवन उसे जैसा चलाता है वैसे ही वो चलने लगता है |
इस सारी कहानी के पार्श्व में एक प्रेम कहानी चलती है, फॉरेस्ट अपनी बचपन की दोस्त जेनी, जो कि स्कूल में उसकी एकमात्र दोस्त थी, से प्रेम करता है | वो जहाँ भी होता है, हमेशा उसे याद करता है | जेनी उसे बीच-बीच में कहीं न कहीं मिलती रहती है और फिर चली जाती है | जेनी का बचपन अच्छा नहीं गुज़रा जिसकी वजह से वो ड्रग्स और गलत लोगों से घिर जाती है और यहाँ-वहां घूमती रहती है | अंत में वो फॉरेस्ट की इच्छा पूरी होती है और जेनी उसे मिलती है लेकिन कुछ ही समय में उसकी मौत हो जाती है |
फिल्म एक कविता की तरह चलती है | आप उसके बहाव में गोते खाते रहते हैं | संवाद बेहतरीन हैं और टॉम हैंक्स की संवाद अदायगी तो माशा अल्लाह है | अभिनय सभी कलाकारों ने अच्छा किया है | फिल्म में विजुअल इफेक्ट्स भी बहुत ही अच्छे हैं जहाँ फॉरेस्ट को अमेरिका के तीन राष्ट्रपतियों के साथ हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है, उसे एल्विस प्रेस्ले से बात करते हुए भी दिखाया गया है और हमें बिलकुल पता नहीं चलता कि ये तकनीक का कमाल है | कैमरा, संगीत और बाकी सभी विभाग फिल्म के स्तर को बनाए रखने में बराबर का योगदान देते हैं |
फिल्म कई जगहों पर ज़िन्दगी की फिलॉसफी को बताती हुई लगती है | फॉरेस्ट के साथ जो भी होता है वो उसे स्वीकार करके आगे बढ़ जाता है और जीवन में कई कामों को सफलतापूर्वक अंजाम देता है | असल में जीवन जीने कि कला भी तो यही है कि जो बीत गया उसे छोड़कर निर्विकार भाव से आगे बढ़ते जाएँ, न सुख उत्तेजना दे, ना दुःख हताश करे...

एक बेहतरीन फिल्म जिसे एक बार ज़रूर देखा जाना चाहिए...
५ में से ४.५ अंक |

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, July 31, 2009

मुट्ठियां भींचो कि कहीं पंजे निकल आएं....



मैं आज बार-बार अपने हाथों की मुट्ठियाँ बना-बना कर देख रहा हूँ कि शायद वोल्वरीन जैसे पंजे निकल आयें हा हा.. ऐसा जादू होता है फिल्मों में कि इंसान उसे हकीकत में देखने की ख्वाहिश करने लगता है जी हाँ, आज ही 'X Men Origins - Wolverine' फिल्म देखी है मेरे एक मित्र की धर्मपत्नी एक्स मेन श्रंखला से इतनी प्रभावित है मेरे मित्र को कहती है- "तुम अपने हाथों में वोल्वरीन की तरह पंजे लगवा लो न"
बहरहाल बात करते हैं फिल्म के बारे में... फिल्म की कहानी बदले पर आधारित है और जैसा कि बदले के लिए ज़रूरी है कि हीरो के परिवार या फिर प्रेमिका के साथ कोई हादसा होना चाहिए और फिर उसे करने वाले को गायब हो जाना चाहिए जिससे हीरो फिल्म में उसे ढूंढता रहे... इस दौरान उसे कुछ साथी भी मिलते हैं जो इस राह में शहीद हो जाते हैं...यही सब कुछ इस फिल्म में भी है....वैसे इस थीम पर आधारित फिल्मों की स्टोरीलाइन लगभग एक जैसी ही होती है लेकिन जो चीज़ मायने रखती है वो है प्रस्तुतिकरण, और इस क्षेत्र में एक्स मेन ओरिजिंस को पूरे-पूरे अंक मिलेंगे.. बेहद दिलचस्प प्रस्तुतीकरण, रोमांचक घटनाक्रम, कुल मिलाकर फिल्म दर्शक को अपने सामने बैठाए रहती है....
ये फिल्म इस श्रृंख्ला की पहली ३ फिल्मों के आगे की कहानी ना होकर उसके पहले की कहानी है....पहली 3 फिल्मों में हीरो पूरी कहानी अकेले आगे नहीं बढाता लेकिन इस फिल्म में वोल्वरीन अकेला हीरो है....ह्यू जैकमैन ने वोल्वरीन को इस तरह जिया है कि मुझे शक है कहीं उनके सच में पंजे ना निकलने लगे हों... कहानी १८४५ से शुरू होती है जब वोल्वरीन जेम्स लोगन नाम का बच्चा है जो अनजाने में अपने पिता को क़त्ल करके घर से भागता है और उसका भाई विक्टर उसके साथ जाता है.....दोनों आर्मी में भर्ती हो जाते हैं और बहुत साड़ी लड़ाईयां लड़ते हैं... दोनों ही भाई म्यूटेंट हैं... विक्टर स्वभाव से खूंखार है और उसके विपरीत लोगन एक इंसाफपसंद और नरमदिल इंसान है....सेना का एक कर्नल विलियम स्ट्राइकर एक म्यूटेंट सेना बना रहा है और इन दोनों को अपने साथ ले जाता है लेकिन वो अपने स्वार्थ के लिए इनसे बेगुनाह लोगों की ह्त्या करवाता है जो लोगन को पसंद नहीं आता और वो इन्हें छोड़कर चला जाता है.... 6 साल गुज़र जाते हैं, लोगन शाति से अपनी प्रेमिका के साथ अपनी जिन्दगी जी रहा है, तभी स्ट्राइकर एक षड्यंत्र रचता है जिसके तहत विक्टर लोगन की प्रेमिका को मार देता है...बस यहीं से बदले की कहानी शुरू होती है जिसमें धोखे से लोगन की हड्डियों में admantiam नामक धातु भर दी जाती है, लोगन विक्टर को ढूंढता है, स्ट्राइकर से टकराता है और उसके गुप्त ठिकाने को तहस-नहस कर देता है लेकिन आखिर में अपनी याददाश्त खो देता है....फिल्म एक रोमांचक यात्रा है जिसमें कई क्षण ऐसे आते हैं जब आप अपने शरीर की नसों में तनाव महसूस करते हैं.... फाइट सीक्वेंस बहुत अच्छे हैं, फिल्म की गति तेज़ है... अभिनय सभी कलाकारों ने अच्छा किया है जिसमे सबसे ऊपर है ह्यू जैकमैन उर्फ़ लोगन... फिर लीव स्क्रैबर, जिन्होंने विक्टर का किरदार स्वाभाविक तरीके से निभाया है.....ग्राफिक्स पिछली तीनों फिल्मों की तरह ही अच्छे हैं...
अब कुछ कमियों की बात करें....सबसे बड़ी कमी अगर देखें तो कहानी ही है, जिसमे नया कुछ नहीं है जबकि पिछली तीनों फिल्मों में बहुत कुछ था...कहानी हजारों बार दोहराई जा चुकी है, हॉलीवुड में भी और बॉलीवुड में भी बहुत से दृश्य यूँ लगे जैसे कोई हिंदी मसाला फिल्म देख रहें हैं जैसे भाई-भाई का अंत में दुश्मन से एक साथ लड़ना, नायक-नायिका का लड़ाई के मैदान में प्यार भरी बातें करना आदि कुछ बातें हजम नहीं होती... जैसे विक्टर कहाँ चला जाता है? अंत में चार्ल्स कहाँ से आ जाता है? लेकिन कुल मिलाकर फिल्म अच्छी है और एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए
मैं अपनी तरफ से इसे ५ में से ३.५ अंक दूंगा

अनिरुद्ध शर्मा

Friday, February 13, 2009

विदेशी फिल्म "स्लमडॉग..." पर काहे झूमे इंडिया??

एक साल पहले मैंने "तारे ज़मीन पर" देखी। सिनेमा हॉल में शायद ही कोई हो जो फिल्म देखकर रोया न हो। जिसने खड़े होकर आखिर में दिखाया जाने वाला गाना देखा हो, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों का मासूम बचपन खोता हुआ दिखाया जाता है। कोई ऐसा नहीं है जिसने "माँ" वाला गाना न सुना हो। शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें न भर आई हों। एक ऐसी कहानी जिसने सच्चाई से परिचय कराया। एक बच्चे की कहानी जो बीमार है। माँ-बाप की बढ़ती उम्मीदों के बीच अपने बचपन की मासूम शरारतों से दूर है। डिस्लेक्सिया बीमारी के शिकार बच्चे की कहानी। भारत के लगभग हर एक घर की कहानी। जहाँ बच्चे पर बोझ डाल दिया जाता है किताबों का, उम्मीदों का।

जब ये फिल्म आई तो लगा कि यही वो फिल्म है जिसका हमें इंतज़ार था। ये वो फिल्म है जो हमें ऑस्कर दिलवायेगी। क्या निर्देशन किया है आमिर ने? क्या एक्टिंग की छोटे-से बच्चे दर्शिल सफारी ने। इतनी बढ़िया अदाकारी कि आमिर खान आधी फिल्म होने के बाद कहानी में आते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा सिर्फ दर्शिल के बूते चलता है। शंकर-एहसान-लॉय का जबर्दस्त संगीत। प्रसून जोशी के गीत। शंकर की आवाज़, कहानी। सब कुछ बढ़िया।
फिर, खबर आई कि फिल्म ऑस्कर से बाहर हो गई.... पैरों तले ज़मीन खिसक गई। अगर ये फिल्म नहीं, तो और कैसी फिल्म बनायें कि ऑस्कर में जा सके। 'लगान' से किसी मामले में कम नहीं। "रंग दे बसंती" के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

अब "स्ल्मडॉग मिलेनियर" को १० श्रेणियों में नामांकित किया गया है। इससे ज्यादा सिर्फ एक और फिल्म को ही नामांकन मिले। पर इस फिल्म में ऐसा क्या जो "तारे ज़मीन पर' में नहीं। "स्लमडॉग.." की भारत में हर ओर आलोचना भी हो रही है। इस बात पर भी बहस हुई कि भारत को केवल झुग्गी बस्ती का देश दिखाने और भारतीयों को ठग और विदेशियों को उदार दिखाने के बाद क्या ये फिल्म भारत में रिलीज़ होनी चाहिये? किस बात में आमिर की फिल्म पीछे हो गई? कहानी, संगीत, गीत, निर्देशन, अदाकारी या कुछ और। किन मापदंडो पर ऐसा किया जाता है। पहले मैं समझता था कि हिन्दी फिल्मों में नाच-गाने अधिक होते हैं और कहानी न के बराबर-शायद इसलिये पीछे रह जाते हैं। पर "स्ल्मडॉग.." भी तो भारतीय पृष्टभूमि पर आधारित है। इसमें भी ढेरो गाने हैं। जो बात दोनों फिल्मों को अलग करती है वो है फिल्म में अधिकतर विदेशी टीम का होना। कहीं ऐसा तो नहीं कि "स्लमडॉग.." केवल इसलिये आगे निकल गई क्योंकि ये एक विदेशी ने बनाई है। इसमें उन्हें उदार दिखाया गया है। ये केवल मेरी सोच हो सकती है, लेकिन जो घटा है मैं उसको झुठला नहीं सकता। और कोई दूसरा कारण मुझे नजर नहीं आता। आप बता सकें तो मुझे खुशी होगी। हम खुश हो रहे हैं कि ये फिल्म ऑस्कर के लिये नामांकित हुई। हमें खुशी केवल तभी होनी चाहिये जब संगीतकार ए.आर.रहमान को अवार्ड मिले। क्योंकि सिर्फ तभी ये अवार्ड भारतीय कहलायेगा।

तपन शर्मा