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Wednesday, July 21, 2010

कॉमनवेल्थ का काम कभी खत्म होगा क्या?


कॉमनवेल्थ गेम्स सर पर हैं पर अभी तक कईं परियोजनायें पूरी नहीं हो पाई हैं। कई परियोजनाओं का तो ये आलम है कि ये खेलों के बाद ही पूरी हो पायेंगी। २००३ में दिल्ली को खेलों की मेजबानी सौंपी गई थी। उसके बाद से दिल्ली में मेट्रो, फ्लाईओवरों का काम तो तेजी से हुआ लेकिन बाकि सब पीछे छूट गया। बुनियादी जरूरतें जैसे बिजली, पानी, सीवर, नाले ये सब पीछे रह गये। फुटपाथ का काम अभी जारी है। मुख्यमंत्री ने दस अगस्त तक सड़कों पर से मलबा हटाने को कह दिया है। बारिश का मौसम आ गया है तो जाहिर तौर से रूकावटें भी आती रहेंगी। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि सात साल मिलने के बावजूद हमारे नेता व सरकार कुछ कर क्यों नहीं पाई।

पिछले दिनों बारिश हुई तो नगर निगम के हिसाब से नालों की सफ़ाई करवाई जा चुकी है और जहाँ-जहाँ पानी भरा है वो उनके अंतर्गत नहीं आती हैं। इसका क्या मतलब हुआ? कितनी एजेंसियाँ सड़क निर्माण में जुटी हुई हैं? नगर निगम के अलावा पी.डब्ल्यू.डी, डी.एम.आर.सी (मेट्रो), राईट्स (RITES) और एन.डी.एम.सी (NDMC) सब जुटी हुई हैं दिल्ली को बुनियादी सुविधायें देने व सौंदर्यीकरण के लिये। आइये जानते हैं कि इन विभागों व एजेंसियों के क्या क्या काम हैं। लोक निर्माण विभाग यानि पी.डब्ल्यू.डी दिल्ली सरकार का ही एक विभाग है जिसके पास सड़क,फ्लाईऑवर निर्माण, फुटपाथ, अस्पताल, स्कूल कॉलेज व सबवे इत्यादि के निर्माण के कार्य आते हैं। यानि निर्माण जो हमें दिल्ली की सड़कों पर नजर आता है वो दिल्ली सरकार के विभाग करते हैं। जो सड़क दिल्ली मेट्रो के आस-पास आती हैं उनका निर्माण उसी विभाग को करना होता है। इसी तरह एक और कम्पनी है RITES| ये भारत सरकार के अंतर्गत आने वाली कम्पनी है जिसकी शुरुआत १९७४ में हुई थी। अभी हाल ही में खबर आई थी कि बीआरटी कॉरीडॉर पर इस कम्पनी ने पिछले वर्ष ही फुटपाथ बनवाया वो नगर निगम ने इसी माह में पाईपलाईन डालने के लिये तुड़वा दिया। यानि एक एजेंसी काम करवाती है दूसरी बिगाड़ती है। इतने विभाग हैं तो तालमेल कैसे बैठाया जाये। हर कोई चाहेगा कि काम कम किया जाये और वाह-वाही अधिक हो।

अब आप समझ ही गये होंगे कि राष्ट्रकुल खेलों का काम समय पर खत्म क्यों नहीं हो पा रहा है। जब कुछ काम समय पर पूरा होता है तो ये सरकारी विभाग श्रेय लेने के लिये आगे आ जाते हैं। विकास के नाम पर नगर निगम और राज्य सरकार दोनों अपना अपना "विकास" कर रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि दिल्ली फ़्लाईऑवरों व पुलों के जाल में ही फ़ँसी रह गई है जबकि बुनियादी सुविधायें पीछे छूट गईं हैं। लगभग सभी अंडरपास में बारिश के दिनों में जलभराव की शिकायतें आती हैं। क्या निकासी का कोई प्रावधान नहीं किया गया? इतने पुल बनाये गये पर यातायात की परेशानी अभी तक है।
किसी राज्य के लिये निगम और सरकार दोनों को अलग करने की क्या आवश्यकता है? क्या मात्र सरकार के रहते ही यह काम नहीं हो सकता? दिक्कत तब बढ़ जाती है जब नगर निगम और सरकार में दो अलग पार्टियों का कब्जा हो, जैसा कि दिल्ली में है। यहाँ सरकार है कांग्रेस की और नगर निगम में भाजपा काबिज है। इस परिस्थिति में दिल्ली का उत्थान कैसे हो सकता है? कांग्रेस १२ सालों से पैसा खा रही है तो भाजपा सरकार में न होने की भरपाई कर रही है।

कोई सड़क मेट्रो की, कोई पीडब्ल्यू.डी, कोई RITES तो कोई नगर निगम की और कोई एन.डी.एम.सी। किसको शिकायत करें? निगम पार्षद के पास जायें या विधायक के पास इसी में उलझा रहता है आम आदमी। जनता आस लगाये बैठी रहती है कि उसका दिया हुआ टैक्स शायद किसी काम आ सके लेकिन उन पैसों की बरबादी करने में अव्वल हैं ये सरकारी विभाग व एजेंसियाँ।

खेल आयेंगे और १० दिन में चले भी जायेंगे पीछे रह जायेंगी परियोजनायें, जनता की इच्छायें, बुनियादी सुविधायें, हर विभाग व नेता ठोकेंगे के अपनी पीठ कि उन्होंने भारत व दिल्ली को दुनिया में रोशन किया। पर अँधेरे में खो जायेंगी गरीब आदमी की आस। इतनी बढ़ती महँगाई में शायद ये खेल उन्हें रहने को घर, पहनने को कपड़ा और खाने को रोटी दे जायें....

तपन शर्मा

Friday, July 09, 2010

अमेठी का नाम बदला, अब देश का भी बदलेगा?

शेक्सपियर ने कहा था "नाम में क्या रखा है?"। मुझे नहीं पता कि यह किस संदर्भ में कहा गया लेकिन इतना जरूर है कि आज की तारीख में यह कथन उपयुक्त नहीं लगता। हाल ही में "माया प्रदेश" (यूपी) में एक और शहर का नाम बदला गया। अमेठी को जिला बनाया गया और नाम रखा गया श्री छत्रपतिशाहू जी महाराज नगर। यह पहला मौका नहीं है कि किसी शहर का नाम बदला गया हो। बम्बई का मुम्बई, मद्रास बना चेन्नई और कलकत्ता का बन गया कोलकोता। लेकिन वे नाम उस जगह की भाषा व संस्कृति को ध्यान में रखते हुए बदले गये। जबकि ये दलित नेता के नाम पर रखा गया जिनका अमेठी के लिये कोई योगदान नहीं रहा है।

मायावती की "माया" को हर कोई जानता है। जो ठान लेती हैं वो कर देती हैं। आजकल अपने और हाथी के पुतले लगाये जा रहे हैं चाहे सुप्रीम कोर्ट से फ़टकार ही क्यों न लगी हो। वैसे तो वे गाँधी परिवार से पंगा लेती ही रहती हैं। रायबरेली और अमेठी में अड़ंगा पड़ा ही रहता है। इस बार भी अमेठी ही हत्थे चढ़ा। अगर कोई दूसरा शहर होता तो बात कुछ और थी। पर उन्होंने छेड़ा है गाँधी परिवार की "धरोहर" को। कांग्रेस का आग-बबूला होना बनता था।

पर कांग्रेस नहीं जानती कि उसके खुद के दामन पर कितने छींटे हैं। कोई ऐसा शहर नहीं होगा जिसमें नेहरू नगर, इंदिरा नगर या इंदिरा विहार जैसी जगह न हों। अपने खुद के नेताओं के नाम पर हर जगह के नाम रखे हैं कांग्रेस ने। कोई सड़क बने या यूनिवर्सिटी या कोई बिल्डिंग सबसे आगे कांग्रेसी ही नजर आयेंगे। इंद्रप्रस्थ विष्वविद्यालय का नाम गुरू गोबिन्द सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय रखकर शीला सरकार ने सिखों को रिझाने की पूरी कोशिश की। कनॉट प्लेस जो सी.पी के नाम से मशहूर है उसका नाम राजीव चौक रखने में यही कांग्रेस आगे थी। कनॉट सर्कस भी इंदिरा चौक बन गया। आने वाला समय इस देश को इंडिया या भारत या हिन्दुस्तान नहीं कहेगा बल्कि गाँधीस्तान के नाम से जाना जायेगा। कुल मिलाकर कहना यह कि नामों के खेल में कांग्रेस से सब पीछे ही रहेंगे। क्या पता आगे मायावती उन्हें पीछे छोड़ सके फ़िलहाल तो यह मुश्किल लगता है।

लेकिन अगर आप कांग्रेस पर उंगली उठायेंगे तो आप को यह दलील सुनने को मिलेगी कि इन नेताओं ने देश की "सेवा" की है। इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस के बाकी नेता "बेकार" और निठल्ले थे और आज भी हैं। अगर हम यह कहें कि इन "महापुरुषों" ने देश की सेवा की है तो जब सड़कों के नाम "शहाजहाँ रोड", जहाँगीर रोड, लोदी रोड, औरांगअजेब रोड और तुगलक रोड रखा जाता है तो यह दलील कहाँ तक सही है? तुगलकाबाद व लोदी कॉलोनी के बारे में क्या कहा जाये? लोदी ने इस देश को लूटा, औरंगजेब ने देश को लूटा, मुगलों ने देश पर राज किया तो फिर उनके नाम पर सड़कों के नाम? तुगलक के आतंक को हम लोग भूल जाते हैं !!! इन सड़कों व जगहों के नाम लेते हुए दिल में आक्रोश सा भर जाता है।

किसी जाति व सम्प्रदाय को खुश करना हो तो इन्हीं नामों का सहारा लिया जाता। अम्बेडकर स्टेडियम हो या अम्बेडकर नगर या फिर उनके "मेमोरियल" पर बना कोई इंजीनियरिंग अथवा मेडिकल कॉलेज। भगत-तिलक-लाला लाजपत राय-राजगुरु-चंद्रशेखर आज़ाद-राम प्रसाद बिस्मिल-इन्होंने शायद देश के लिये ज्यादा योगदान नहीं दिया या फिर ये नाम किसी अल्पसंख्यक धर्म-सम्प्रदाय से नहीं जुड़े-ये दलित नहीं थे-वगैरह वगैरह और भी कारण हो सकते हैं (शायद इनके नाम में "गाँधी" नहीं था । शायद इसलिये इनके नाम पर सड़क-बिल्डिंग-कॉलेज का नाम रखते हुए दस बार सोचा जाता है। ये नाम किसी दल को वोट नहीं दिला सकते। बस इतनी सी बात है और यही सच्चाई है।

क्या आप जानते हैं कि वाघा बॉर्डर कहाँ है? आप कहेंगे कि अमृतसर में तो मेरा जवाब होगा कि नहीं। वाघा तो पाकिस्तान की सीमा में आता है, हमारे देश में तो अटारी आता है। शायद हमें वाघा नहीं अटारी बॉर्डर कहना चाहिये। यही उपयुक्त है या फिर वाघा-अटारी बॉर्डर। इस पर बहस हो सकती है। राज नेताओं को छोड़िये। लोगों की अंग्रेज़ी में लिखने की स्पेलिंग बदल जाती है। तो कोई अपनी फ़िल्म का नाम एक ही अक्षर से शुरु करता है। लोग अपनी किस्मत बदलने के लिये नाम तक बदल लेते हैं। ’राम’ व ’अल्लाह’ के नाम पर दुनिया टिकी है और आप कहते हैं कि "नाम में क्या रखा है!!!" अरे जनाब नाम का ही सारा खेल है। अब अगर राजनीति भी इस खेल में कूद जाये तो फिर कहना ही क्या!!

तपन शर्मा

Saturday, June 05, 2010

तलाश एक सच्चे राजनैतिक दल की

राष्‍ट्र की मुख्‍य भूमिका वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी दूसरी पारी की प्रथम वर्षगाँठ मनाई। इस प्रकार डॉ0 मनमोहन सिंह जी लगातार प्रधानमंत्री पद पर सातवें वर्ष में प्रवेश कर पिछले 25 वर्षों में इस पद पर सबसे लम्‍बे समय तक रहने वाले प्रथम प्रधानमंत्री बन गये। जो व्‍यक्‍ति कांग्रेस में नेहरू गाँधी परिवार में पैदा न हुआ हो और उक्‍त पार्टी की मुख्‍य भूमिका के द्वारा इतने लम्‍बे समय तक देश के प्रधानमंत्री पद का निर्वाह किया हो, यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्‍धि है। यदि हम यूपीए भाग-2 के प्रथम वर्ष का सिंहावलोकन करें तो पाएँगे 207 सांसदों के साथ कांग्रेस पार्टी के सत्‍ता संभालने के बावजूद यह गठबंधन लंगड़ा का लंगड़ा ही रहा। आत्‍मविश्‍वास से कमजोर यह सरकार संसद के हर सत्र में किसी न किसी विषय पर फंस जाती रही। सामाजिक क्षेत्र में सिर्फ गरीबी उन्‍मूलन के लिए सरकार का खर्च 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। परन्‍तु नतीजों का कुछ अता-पता नहीं। खाद्यान्‍न सुरक्षा विधेयक भी लगभग पिछले 9 महीनों से राजनैतिक झंझावात में उलझा हुआ है, देश की 70 प्रतिशत आबादी की आजीविका अभी भी कृषि आधारित है। जिसके कारण देश में बहुत बड़ी आर्थिक असमानता है। लगभग 200 जिलों में नक्‍सलवाद इसी का नतीजा है। अफजल गुरू जैसे कुख्‍यात आतंकी को सहेज कर रख मुस्‍लिम तुष्‍टिीकरण का विभत्‍स स्‍वरूप दिखाया है, इस सरकार ने। इसके अतिरिक्‍त जलवायु परिवर्तन, बी. टी. बैगन से लेकर माओवादियों से निपटने के तरीके पर आपस में एक दूसरे की टाँग खिंचाई की गई। फिर भी मनमोहन सिंह जी के पास उन्‍हें झेलने के अलावा दूसरा रास्‍ता नहीं था। क्‍योंकि छाया ग्रह की तरह कार्य करने वाले प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह जी के हाथ एक निश्‍चित सीमा तक ही खुले हैं। यदि हम यूपीए द्वितीय भाग का आकलन करें तो पायेंगे इस पंचवर्षीय में उनका लक्ष्‍य मुख्‍य रूप से उत्तर प्रदेश रहने वाला है। कांग्रेस सुप्रीमो के गृह प्रदेश तथा देश की सबसे ज्‍यादा लोकसभा सीटों वाला प्रदेश होने के कारण वे उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार बढ़ाना चाहते हैं। परन्‍तु जिस प्रकार टोटकों के सहारे युवराज राहुल गाँधी अपना कद बढ़ाना चाहते हैं, असम्‍भव सा दिखता है। दलितों के घर भोजन कर, उनके बच्‍चों को पुचकारना, उनके यहाँ रात व्‍यतीत करना सिर्फ उनके द्वारा समर्थन हासिल करने का हल्‍का प्रयास मात्र है।
राहुल गाँधी की स्‍पष्‍टवादिता या आदर्शवादिता के चर्चे प्रायः पढ़ने को मिलते हैं। समाज का सामान्‍य वर्ग अन्‍जाने में उनका मौखिक प्रचार माध्‍यम बनता जा रहा है। उक्‍त राजकुमार की छोटी-छोटी राजनैतिक स्‍पष्‍टवादिता समाज का भावनात्‍मक शोषण करती है। वे इतने ही आदर्शवादी हैं तो बताएँ आज देश विभिन्‍न ज्‍वलंत समस्‍याओं से गुजर रहा है आतंकवाद, मंहगाई सरीखे विषय मनुष्‍य को सशरीर निगल जाने पर आमादा हैं। देश का शायद ही कोई भाग हो जहाँ अमन-चैन कायम हो। परन्‍तु जिस प्रकार कहा जाता है, रोम जल रहा था और नीरो उक्‍त तबाही से बेपरवाह बाँसुरी बजा रहा था। ठीक उसी प्रकार सम्‍पूर्ण भारतवर्ष उन्‍हीं की सत्‍ता रहते हुए बड़े नाजुक दौर से गुजर रहा है। परन्‍तु उक्‍त युवराज सभी समस्‍याओं को नजरंदाज कर अपने हल्‍के राजनैतिक हथकंडे अपनाने पर आमादा है।
राष्‍ट्रीय राजनीति, समर का युद्ध क्षेत्र हमेशा से उत्‍तर प्रदेश रहा है। चूँकि यहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं अतः राष्‍ट्रीय राजनीति के योद्धा इस क्षेत्र में अपनी-अपनी पूरी ऊर्जा लगाते हैं। वर्तमान में कांग्रेस तथा भाजपा दो ऐसी राजनैतिक ताकतें हैं जो उत्‍तर प्रदेश में अपनी जोर आजमाइश का पूरा मन बनाए हुए हैं। जिसमें एक की केन्‍द में सरकार तथा दूसरा मुख्‍य विपक्षी दल की भूमिका में है। जनाधार के हिसाब से भी दोनों की स्‍थितियाँ लगभग प्रदेश में समान हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी अपने समय का अधिक भाग उत्‍तर प्रदेश में देते हैं तो वहीं उनकी बड़ी बहन प्रियंका सहित उनकी माँ सोनिया गाँधी भी उत्‍तर प्रदेश में अपना दखल बनाए हुए हैं। केन्‍द्र की योजनाओं के दुरुपयोग रोकने के बहाने प्रदेश सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति उनकी राजनैतिक योजना का हिस्‍सा है। कांग्रेस किसी भी सूरत में उत्‍तर प्रदेश में अपना आधार बढ़ाने पर आमादा है। वहीं राष्‍ट्रीय राजनीति का दूसरा महत्‍वपूर्ण किरदार भारतीय जनता पार्टी भी उत्‍तर प्रदेश में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। इसी लिए इस प्रदेश के सभी निर्णय भाजपा राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व बड़ी सूझ-बूझ से कर रहा है। उक्‍त पार्टी के शीर्ष राजनेताओं ने नेहरू - गांधी परिवार के सामने प्रदेश अध्‍यक्ष के रूप में सूर्य प्रताप शाही जी को लाये हैं। श्री शाही जी अपने निर्णायक व्‍यक्‍तित्‍व के रूप में जाने जाते हैं। वाह्य, आंतरिक व्‍यक्‍तित्‍व तथा विश्‍वास से लबरेज प्रदेश अध्‍यक्ष बनने के बाद वे सड़क मार्ग से पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश से दौरा कर लखनऊ पहुँचे रास्‍ते भर उनका अभूतपूर्व स्‍वागत उनकी लोकप्रियता एवं समाज में उनकी विश्‍वसनीयता दर्शाता है। उत्‍तर प्रदेश इकाई के वे पहले अध्‍यक्ष हैं जिनकी दूसरी पीढ़ी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रमुख का दायित्‍व निभा रही है। इसके पहले इनके चाचा श्री रवीन्‍द्र किशोर शाही जनसंघ (वर्तमान भाजपा) के उत्‍तर प्रदेश के अध्‍यक्ष रह चुके हैं। अब तक श्री शाही जी की राजनैतिक यात्रा विद्यार्थी परिषद से लेकर वर्तमान भाजपा तक बिना किसी समझौते के पूरी हुई है। एक साफ-सुथरी एवं संघर्षशील छवि के सहारे वे प्रदेश भाजपा के सारथी के तौर पर 15वीं लोकसभा के सेमी फाइनल उत्‍तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2012 के लिए तैयार है। वहीं कांग्रेस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी सपरिवार उत्‍तर प्रदेश में अपना दखल बनाए हुए हैं। इस प्रदेश की मुख्‍यमंत्री मायावती जिसने प्रथम बार अपने बूते सरकार बनाई वे तथा यहां के पूर्व मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव दोनों अपने जातिवादी समीकरणों के साथ हाजिर हैं। केन्‍द्र की कांग्रेस पार्टी को 13वीं लोकसभा चुनाव की तुलना में 14वीं लोकसभा में लगभग 2 प्रतिशत वोट बढ़कर मिला, जिसके कारण उन्‍हें सीधे 61 सीटों का फायदा हुआ तथा जातीय राजनीति के आधार पर मलाई खानेवाले मुलायम सिंह, लालू प्रसाद तथा मायावती सरीखे राजनेताओं को भारी नुकसान झेलना पड़ा। बिहार में जिस मुस्‍लिम यादव समीकरण के सहारे लालू प्रसाद यादव पिछले दो दशकों से बिहार पर निष्‍कंटक राज किये हुए थे नितिश कुमार के विकास के जादू के आगे उक्‍त जातीय गठबंधन टूटा। बिहार के लोगों ने पहली बार अपने यहां विकास देखा, तो वे इतने खुश हुए कि उन्‍होंने विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव के सीमित अंतराल में ही नितिश कुमार को विकास पुरुष का दर्जा दे डाला। इसी प्रकार तामिलनाडु में भी जाति आधारित राजनैतिक दलों में उदासीनता देखने को मिली। पिछले 15 वर्षों से वन्‍नियार समुदाय की राजनीति करने वाले दल पररलि मक्‍कल काच्‍चि (पीएमके) का सभी 7 सीटों पर सफाया हो गया।
देश की जनता जाति आधारित राजनीति से आजिज आ चुकी है। क्षेत्रीय दलों ने पूरे देश का सत्‍यानाश कर रखा है। उन्‍हें तलाश है उस नेतृत्‍व की जो उन्‍हें तथा उनके बच्‍चों को उचित शिक्षा, साधन तथा सुरक्षा उपलब्‍ध करा सके। वर्ष 2009 की चौदहवीं लोकसभा चुनाव में जिसकी एक झलक देखने को मिली। बड़ी-बड़ी क्षेत्रीय जातिवादी राजनैतिक ताकतें धूलधूसरित हो गईं। जातिवाद के आधार पर बने राजनैतिक तिलस्‍म चटक कर बिखर गये। जहां राष्‍ट्रीय राजनीति का महत्‍वपूर्ण राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी को लगभग 3.5 प्रतिशत मतों का नुकसान अपनी कुछ गलतियों की वजह से उठाना पड़ा वहीं केंद्र में काबिज कांग्रस पार्टी विभिन्‍न राष्‍ट्रीय समस्‍याओं जैसे बेरोजगारी, आतंकवाद तथा मंहगाई पर बुरी तरह फेल हुई तथा नरेगा, ग्राम विद्युतीकरण योजना सरीखी विकासवादी योजनाओं के सहारे केन्‍द्रीय सत्‍ता पर काबिज हो गई। आज देश की जनता समझ चुकी है कि किस प्रकार मुलायम, लालू तथा मायावती सरीखे राजनेता अपनी जातिवादी समीकरण तथा राजनीति के तहत उनका लाभ सत्‍ता में आने के लिए किया तथा उसके बाद उन्‍हें निरीह छोड़ सत्‍तासुख का मदिरापान करने में व्‍यस्‍त हो गये। आज तलाश है देश की जनता को ऐसे राजनैतिक दल की जो उन्‍हें विकास की किरण तथा देश को सही मार्ग पर ला सके।

*राघवेन्द्र सिंह

Saturday, March 13, 2010

तलाश-भारत के महानायक की

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसने देश की आजादी में सराहनीय योगदान किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनके नेताओं की भूमिका को राष्ट्र नकार नहीं सकता। आज कांग्रेस पार्टी अपना 125 वॉ जन्म वर्ष मना रही है। 1885 में कांग्रेस का जन्म हुआ, जिसके संस्थापक ए0ओ0 ह्यूम जो एक रिटायर्ड अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी थे तथा प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष डब्लू0सी0 बनर्जी हुए। ए0ओ0 ह्यूम, डब्लू सी0 बनर्जी से लेकर सोनियां गॉधी तक कांग्रेस पार्टी ने कई उतार चढ़ाव देखे। 1885 से लेकर 1905 तक लगातार 20 वर्षों तक कांग्रेस में उदारवादी गुट का प्रभाव रहा, जिसके प्रमुख नेता दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, फिरोज शाह मेहता, गोविन्द राना डे, गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय थे। 1905 से 1919 के मध्य नव राष्ट्रवाद तथा गरम पंथियों का उदय हुआ जिसके प्रमुख नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) तथा अरविन्द घोष प्रमुख थे। लाल-बाल-पाल तथा अरविन्द्र घोष के प्रयासों के कारण प्रथम बार 1905 में कांग्रेस के बनारस राष्ट्रीय अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में स्वदेश तथा 1906 के कलकत्ता राष्ट्रीय अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में पहली बार स्वराज की मांग रखी गयी।
स्वतन्त्र भारत पर सबसे अधिक शासन करने वाले उक्त राजनैतिक दल का चारित्रिक पतन देश की आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रारम्भ हुआ। किसी समय
लेखक
राघवेन्द्र सिंह
117/के/145 अम्बेडकर नगर
गीता नगर, कानपुर - 25
फोन नं- 9415405284
उत्तर प्रदेश (भारत)
email: raghvendrasingh36@yahoo.com
ईमानदारी से कार्य एवं सभी को साथ ले चलने वाली कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद अचानक एक परिवार की पार्टी होती चली गयी। उनके साथ काम करने वाले राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थों के चलते एक परिवार के आधीन होते चले गये। जाने-अन्जाने पूरी पार्टी जो किसी समय स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य किरदार थी स्वयं परातन्त्र हो गयी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस विषय पर आपत्तियॉ भी की, परन्तु उनके स्वर नक्कार खाने में तूते की आवाज बनकर रह गये। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी सोनियॉ गांधी की इतालवी अंदाज के हिन्दी भाषणों एवं राहुल गांधी के टोटकों की पार्टी बनकर रह गयी। उक्त राज कुमार कभी दलित के घर में भोजन करते है तो कभी उनके बच्चे को गोंद में उठाकर पुचकारते, कभी उनके यहॉ रात बिताते है तो कभी ए0टी0एम0 से लाइन में लगकर पैसे निकालने से लेकर मैट्रो ट्रेन में सफर कर व्यवहारिक जनसमर्थन हासिल करने का प्रयास करते है। क्या उक्त सभी सामाजिक पैतरेबाजी एवं उनकी कारगुजारियां राजनैतिक जनसमर्थन की तरफ किंचित मात्र भी इंगित नहीं करती? क्या कभी किसी ने उनसे यह पूछने का प्रयास किया है, कि केन्द्र में आपकी ही सरकार है देश में आतंकवादी व्यक्तियों का जीवन छीन रहे है, बढ़ी हुयी प्रयोजित महंगाई सभी पायदान लांघ गरीब के मुह से निवाले हडपने पर आमादा है, अफजल गुरू जैसा कुख्यात आतंकी को आपकी पार्टी ने जिन्दा रख छोड़ा है तथा भारत की नेपाल, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान सीमाए पूरी तरह असुरक्षित है। नकली नोट एवं हथियारों के साथ आतंकी उक्त सीमाओं से भारत में प्रवेश कर आतंकी गतिविधियों में संलग्न हैं क्या कभी किसी ने उनसे प्रश्न किया महाराष्ट्र में आपकी सरकार है आप वहॉ की मुख्य भूमिका में है आपकी सहयोगी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उत्तर भारतीयों के साथ गैर मानवीय हरकते क्यों कर रही है। उन्हे महाराष्ट्र प्रदेश छोड़ने को क्यों मजबूर किया जा रहा है। क्या किसी पत्रकार मित्र ने राहुल गॉधी से यह जानने का प्रयास किया वर्ष 2007-08 में आपकी सरकार में गेंहू का समर्थन मूल्य 8.50 पैसे था, उसी समय विदेशों से 14.82 पैसे की दर से गेंहू क्यों आयात किया गया, वर्ष 2009-10 जब हमारे देश में आटा रू0 20/- प्रति किलों की दर से बिक रहा था तो सरकार ने 12.51 पैसे की दर से गेंहू क्यों विदशों में बेचा। वर्ष 2008-09 में गन्ने की सामान्य पैदावार के बावजूद सरकार ने 48 लाख टन चीनी विदेशों में रू0 12.50 प्रति किलो की दर से पहले बेची उसके बाद उक्त निर्यात से आयी किल्लत के कारण रू0 42.00 प्रति किलों की दर से चीनी आयात की। क्या उक्त कुछ आयात-निर्यात के आर्थिक खेल देश की बढ़ी हुयी महंगाई का कारण नहीं प्रतीत होते। क्या किसी ने उनसे यह पूछने की हिम्मत की देश मंे मजहब के आधार पर सर्वेक्षण कराने का कार्य आपकी पार्टी ने क्यों किया। क्या सच्चर कमेटी से रिपोर्ट बनवा ऐसा नही किया गया जैसा लगभग 90 वर्षो पहले अंग्रेजो ने मुस्लिम लीग को शह देकर करवाया था। रंगनाथ मिश्र आयोग बनवा अलग आरक्षण की मांग क्यांे उठवायी गयी। क्या मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग किसी जिम्मेदार मुस्लिम नेता या संगठन ने की थी। देश का प्रधान मंत्री बनने को बेताब उक्त राजकुमार अपनी एयर कंडीशन्ड गाड़ी से घूम, फाइव स्टार होटलों का भोजन गरीब को झोपडी में कर यह जताने का प्रयास कर रहे है कि वे समाज से घुले मिले है। दुर्भाग्य की बात है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के स्तम्भ पत्रकार बन्धु भी उनके अंदाजों को महिमा मंडित कहने में नही चूकते हैं।
राहुल गॉधी की स्पष्ट एवं आदर्शवादिता के चर्चे प्रायः पढ़ने एवं देखने को मिलते हैं। समाज का व्यक्ति अन्जाने में उनका मौखिक प्रचार माध्यम बनता जा रहा है, राजकुमार की छोटे-छोटे विषयों की स्पष्टवादिता समाज का भावनात्मक शोषण कर रही है। वे इतने ही आदर्शवादी है तो बताये आज देश विभिन्न ज्वलन्त समस्याओं से गुजर रहा है। आतंकवादी, महंगाई सरीखे विषय मानव को सशरीर निगल जाने को आमादा है। देश का शायद ही ऐसा कोई भाग हो जहॉ अमन चैन कायम हो। इसके अतिरिक्त देश में और भी कई ऐसे विषय है जिनकी जवाब देही से वे बच नहीं सकते। कहने को तो वे कह सकते है मैं प्रधानमंत्री नहीं हूँ आदि-आदि परन्तु पूरा देश जनता है मनमोहन राज किसके सामने दण्डवत है।
सिर्फ अभी मैं प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हूँ ! या इसी प्रकार के कुछ जुमलों से व्यक्ति स्पष्टवादी दिखने लगे तो यह न्यायोचित नहीं लगता। वे भली प्रकार जानते है उनके पास जो उपनाम की ताकत है, वही उन्हें अनिवार्य एवं अपरिहार्य बनाए हुए है जो कभी जाने वाली नहीं, अतः कांग्रेस पार्टी में उनका सर्वोच्च आसन सुरक्षित हैं वे कुछ भी बोले उससे उनकी विशिष्टता कम होने वाली नही। अतः वे भावनात्म्क कृत्यों एवं बयानो की खुली बाजीगरी कर लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास कर रहे है। राहुल जी का यदि आप परिवारवाद विरोध देखें जो सिर्फ उनके बयानों तक ही सीमित हैं उनकी कथनी एवं करनी में जमीन आसमान का अन्तर है। राहुल के खास सिपहसालारों में मिलिंद देवडा, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, कनिष्क इधर है क्या वे वंशवाद की श्रेणी में नहीं है, गरीबों के घर में गरीबी देखने वाले राहुल बाबा बयान देते है अगर 1992 में गॉधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न टूटती इस वक्तव्य से सीधे तौर पर यह कहने का प्रयास करते है कांग्रेस पार्टी की हिफाजत एवं देश पर शासन करने की माद्दा शिर्फ गांधी परिवार के पास ही है। क्या उक्त बयान उनके शातिर दिमाग एवं परिवारवाद की तरफ इंगित नहीं करता। एक तरफ वे स्वयं सहित परिवारवाद के विरोधी एवं दूसरी तरफ स्वयं, मित्रों एवं बयानों के आधार पर परिवारवाद के पोषक दोनों ही भूमिका बाखूबी नहीं निभा रहे है वे। यदि उनकी 1992 वाली घटना मान भी ली जाये कि यदि उनके परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो विवादित स्थल न टूटता तो 1984 के सिक्खों के कत्ले-आम के विषय में वे क्या कहेगें उस समय तो उनके परिवार का ही प्रधानमंत्री था। हमारे देश के युवराज राहुल गॉधी योग्य एवं सफल राजनेताओं की बात करते है। तो वे यह भूल जाते है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही इनके रक्त सम्बन्धियों के अलावा भी योग्य एवे राष्ट्र भक्त राजनेता हुए है। लेकिन इनकी वैचारिक शक्ति शिर्फ अपने पिता श्री राजीव गांधी, माता श्रीमती सोनिया गांधी, दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा पर नाना श्री जवाहर लाल नेहरू ही देख सकती है। अन्य के चर्चें वे भूल कर के भी नहीं करते। फिर भी स्वयं को परिवारवाद के विरोधी के रूप में स्थापित करने पर आमदा है राहुल बाबा।
वास्तविकता तो यह है देश की गरीब एवं भावनाप्रधान जनता के साथ राहुल गांधी भावात्मक खेल बाखूबी खेल रहे हैं, वे राष्ट्रीय हित के विषयों पर न जाकर अपनी हल्की फुल्की गतिविधियों से भोली भाली जनता को रिझाने का प्रयास कर रहे है। उनके रास्ते पूर्व कांग्रेसी नेताओं से भिन्न हो सकते है परन्तु मंजिल एक है। देश का प्रधानमंत्री बनने की लालसा पाले वे यह भूल गये देश को एक ऐसे लौह पुरूष की तलाश है जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरो सके, उनके हितो की रक्षा कर सके, अमेरिका जैसी ताकत को जवाब दे सके, चीन जैसे रंग बदलने वाले गिरगिट को दुरूस्त रख सके तथा पाकिस्तान जैसे बिगडैल को सबक सिखा सके। देश का नहीं चाहिए जो उपनाम की ताकत के माध्यम से देश के सर्वोच्च राजनैतिक आसन पर आसीन होना चाहता हो, उसे तालाश है ऐसे महानायक की जो सही मायने में देश को गति दे सके, साम्प्रदायिक सद्भावना रख सकें, महंगाई पर काबू, आतंकवाद पर लगाम तथा आतंकियो को दण्डित कर सके।

--राघवेन्द्र सिंह

Friday, July 03, 2009

बोर्ड खत्म करने से क्या हासिल होगा?


आजकल बोर्ड का इम्तहान चर्चा का विषय बना हुआ है. हो भी क्यों ना, भई इसी से तो बच्चों के भविष्य की डोर बँधी हुयी है. इस विषय में सभी ने अपने-अपने विचार रखे. किसी ने बोर्ड परीक्षा को बच्चों पर बोझ और आत्महत्या का कारण बताया तो किसी ने कहा कि परीक्षा बच्चों को मज़बूत बनाती है साथ ही आगे आने वाली परीक्षाओं के लिये तैयार करती है.मुझे दोनों ही वर्गों की बातें अपनी-अपनी जगह ठीक लगीं. मैं यहां विस्तार से कहना चाहूंगी. जो लोग बोर्ड की परीक्षाओं को आत्महत्या का कारण मानते हैं उन्हें ये भी जानना चाहिये कि आखिर बोर्ड की परीक्षा आत्महत्या का कारण क्यों बनती है. यहां कई कारण हैं जैसे कि--माँ-बाप की उम्मीदें, शिक्षकों का व्यवहार और कापियाँ चैक करने की तथा रिजल्ट बनाने की प्रक्रिया में गलतियां.
अगर हम पहला कारण देखें तो सभी इस बात से सहमत होगें कि आजकल ज्यादातर माँ-बाप अपने बच्चों से कल्पना चावला, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा़ आदि जैसे कई आइकॉन की तरह बनने की उम्मीदें लगाते हैं, बच्चे की उम्र, रूचियाँ और उसकी मानसिक तथा शारीरिक क्षमता को अनदेखा करते हुए हर वो काम करवाने की कोशिश करते हैं जो बच्चे की सामर्थ्य से बाहर होता है. दूसरों की होड़ में हाई प्रोफाइल स्कूलों में दाखि़लाकरवाते हैं, चाहे बच्चा वहाँ सीखने की बजाय जो आता है वो भी भूल जाये. लेकिन उन्हें तो अपने बच्चे को जीनियस बनाना होता है.
दूसरामहत्वपूर्ण कारण है, बच्चों की क्षमता. जब भगवान ने इतने सारे इंसान बनाये हैं तो जाहिर है कि हर किसी की मानसिक वा शारीरिक क्षमता भी अलग-अलग होगी. इसी तरह उनमें गुणों तथा अवगुणों में भी अंतर होगा. अगर हम अपनी क्षमता के विपरीत कार्य करेंगे तो नतीजा गलत ही होगा. कहा गया है कि "जाको काम वाही को साजे ,कोइ और करे तो डंडा बाजे".यानि बच्चों को उनकी रूचियों, शारीरिक व मानसिक क्षमता के अनुसार ही विषय चुनने दें. साथ ही उनकी कमियों को सुधारने की कोशिश की जाये ना कि उनका मजाक बनाये और दुत्कारें.
तीसराकारण है शिक्षकों का व्यवहार. मैं इस कारण को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानती हूँ. वो इसलिये घर-आँगन से निकलकर जब बच्चा स्कूल जाता है तो शिक्षक ही उसका अभिभावक होता है. बच्चे के सम्पूर्ण विकास में शिक्षक का बहुत ज्यादा योगदन होता है. बच्चे शिक्षक पर अंधविश्वास करते हैं चाहे वो सही बताये या गलत. आपने कई बार देखा होगा ,अगर हम शिक्षक द्वारा बतायी गयी किसी विषय की गलती को सुधारने का प्रयास करते हैं तो बच्चे मानने से साफ़ इंकार कर देते हैं, क्योंकि बच्चों को उन पर पूर्ण विश्वास होता है. अत: उन्हें गलत जानकारी न दें. इसी तरह शिक्षक का डाँटना-फटकारना, उत्साह बढ़ाना आदि बातें भी बच्चों के नाजुक मन पर असर डालती हैं. शिक्षकों को ध्यान में रखना चाहिये कि हर बच्चे की मानसिक क्षमता एक जैसी नहीं होती और हर बच्चे की पारिवारिक, शैक्षिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमि भी अलग होती है. ऐसे में केवल होशियार बच्चों पर ध्यान देना, कमजोर बच्चों को मारना-पीटना, उनका मजाक बनाना आदि भी बच्चों को अंधकार में ढकेलने का काम करता है.
अब मैं बात करती हूँ चौथे कारण की. कापियाँ चैक करना तथा रिजल्ट बनाना बहुत ही जिम्मेदारी का काम है. इन पर बच्चों का भविष्य टिका होता है. शिक्षकों की जरा सी लापरवाही हजारों बच्चों के भविष्य तथा जिन्दगियों के साथ खिलवाड़ कर सकती है. इससे हम अच्छी तरह वाकि़फ हैं आज बोर्ड की परिक्षाओं में प्राइमरी विद्यालयों के शिक्षक तक कापियां चैक करते हैं. उन्हें ना तो विषय की जानकारी होती है और ना ही वो उस स्तर के होते है जो कि बोर्ड की कापियां चैक कर सकें. उऊपर से ज्यादातर शिक्ष्क कापियां चैक करने के लिए संजीदा कम ,उससे मिलने वाले पैसे के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं. ऐसे में जल्दबाजी में चैक की गयी कापियां क्या रिजल्ट देगीं कहने की जरूरत नहीं है. यही नहीं हमने कइ बार कापियां गायब होने, कूड़े में पायी जाने आदि की भी ख़बरें पढ़ी सुनी हैं यह भी बच्चों के रिजल्ट पर असर डालती हैं. आजकल बोर्ड के रिजल्ट में बहुत ही ज्यादा गल्तियां सामने आ रही हैं. इसी के चलते कई बार बच्चों ने आत्महत्या की है और बाद में पता चला है कि वो बच्चे फर्स्ट क्लास पास हुए थे.
अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि बोर्ड परीक्षा का ना कराया जाना समस्या का हल नहीं है बल्कि इससे जुड़े कारणों में सुधार लाने की आवश्यकता है. बच्चों को मानसिक रूप से सशक्त बनाया जाये साथ ही उन्हें परीक्षाओं से डराने की बजाय परीक्षा के लिये तैयार किये जाने की जरूरत है. जीवन में पग-पग पर एक परीक्षा है वो कहाँ-कहाँ से भागेगें. इसलिए मेरा यह निवेदन है कि बच्चों के भविष्य के साथ-साथ देश के भविष्य से खिलवाड़ ना किया जाये. अगर नींव ही कमजोर होगी तो इमारत कहाँ से खड़ी होगी.

दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

Tuesday, June 30, 2009

मासूमों से खेल रहे हैं कपिल सिब्बल !


मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कुछ निर्णयों के बारे में जनता को अवगत कराया। मुझे एक बात तो मालूम थी कि अर्जुन सिंह बेशक चले गये पर कांग्रेस सरकार चलेगी उसी तरह ही। बेचारे अर्जुन सिंह बिना वजह ही बलि का बकरा बनाये... पहले तो उन्होंने कहा कि १०वीं का बोर्ड समाप्त किया जाये। ये बच्चे की मर्जी पर होगा कि बोर्ड की परीक्षा देनी है या नहीं। कपिल सिब्बल ये बतायें कि एक औसत बच्चा पढ़ाई कब करता है। वो तभी पढ़ता है जब परीक्षा होती है। जनवरी-फरवरी में तो पढ़ाई शुरु की जाती है। उस पर यदि आप परीक्षा समाप्त कर देंगे तब तो भगवान भरोसे ही पढ़ाई हो पायेगी। पास होने के लिये भी नहीं। पर ऐसा किया क्यों गया? कुछ लोग ये दलील देंगे कि बच्चे पर बहुत जोर पड़ता है। कोमल फूल से बच्चे होते हैं और भारी भरकम सिलेबस। १५ साल का बच्चा मेरी नजर में बिल्कुल बच्चा नहीं रहा। जब वो शराब और सिगरेट पी सकता है तो इतना समझदार भी हो सकता है कि पढ़ाई कर सके। टीवी पर ऐसे प्रोग्राम आते हैं कि १० साल का बच्चा भी समझ ले। फिर ये पढ़ाई से बचने का बहाना क्यों? अगर ये कहा जाये कि बच्चे परीक्षा के डर से खुदकुशी कर लेते हैं तो मैं कहूँगा कि ये अभिभावकों की गलती है, शिक्षा प्रणाली की नहीं। आज से दस साल पहले तक कोई मुझे बता दे कि इतनी आत्महत्याएं होती थीं या नहीं। मेरे समय में तो बिल्कुल नहीं। आज ऐसा क्या हो गया जो दस या बीस या तीस साल पहले नहीं था। कम्पीटीशन और अभिभावकों की अधिक चाह ने बच्चों के करियर के साथ खिलवाड़ किया है। दसवीं का बोर्ड तो बहुत छोटी परीक्षा है। अगर इसी तरह से हम अपने बच्चों को परीक्षाओं से दूर भगाना सिखाते रहेंगे तो कल को जीवन में इससे भी कठिन परीक्षायें कैसे दे पायेंगे? बोर्ड को हौवा बना कर रख दिया गया है जितना वो है नहीं। इसे कहते हैं मुसीबत से भागना। अब स्कूल के टीचर ही ग्रेड के माध्यम से ये निर्णय ले सकेंगे कि बच्चे को ११वीं में भेजा जाये या नहीं। हर स्कूल के अपने खुद के टीचर... कमाल है... क्या गारंटी है कि ये बिल्कुल फ़ूल-प्रूफ़ होगा। अभी उत्तर-पुस्तिकाएं कोई बाहर का टीचर करता है जिसमें कम से कम ये बात साफ़ रहती है कि कोई बेईमानी नहीं होगी। पर अब? क्या भविष्य में १२वीं का बोर्ड भी समाप्त कर दिया जायेगा? सरकार ने बहुत कोशिशें कर ली बदलाव लाने की। अब १५ मिनट दिये जाते हैं प्रश्न-पत्र को पढ़ने के लिये। प्रश्नों का स्तर भी कम कर दिया। अब क्या परेशानी हो सकती है? कुछ लोग कहते हैं कि बच्चे १०वीं के बोर्ड में रटते हैं। क्या अब वे पढ़ेंगे? अब उतना भी नहीं करेंगे!! क्या १२वीं में नहीं रटते? या अब नहीं रटेंगे? अब तो बल्कि और भी डरेंगे क्योंकि बारहवीं का बोर्ड उनका पहला बोर्ड होगा। एक बार दसवीं की परीक्षा देने के बाद बच्चा निडर हो जाता है। पर अब?

एक और बात जो सिब्बल जी ने कही। पूरे भारत में एक ही बोर्ड और एक ही परीक्षा। अब उन्हें कैसे समझाया जाये कि इस देश में कितनी ही भाषायें हैं, कितने ही राज्य हैं। हर राज्य का परीक्षा करवाने का अलग समय होता है। छुट्टियों का अलग समय। अंकों का अलग हिसाब-किताब। अब इन सब के बीच एक ही बोर्ड को कैसे मुमकिन कर पायेंगे ये उन्हें बताना ही होगा।

अब बात करते हैं लगातार बढ़ाये जाने वाले आई.आई.टी जैसे संस्थानों की। थोक के भाव बढ़ाये जा रहे हैं आई.आई.टी.। पर कोई सरकार से पूछे कि क्या पूरी सुविधायें हैं जहाँ नये संस्थान खुल रहे हैं। पिछले २ बरसों से आई.आई.टी जयपुर की कक्षायें कभी दिल्ली कभी कानपुर में हो रही हैं। मुझे नहीं पता कि अब कहाँ लग रही हैं। आपको पता हो तो बतायें, पर इतना पता है कि अब आई.आई.टी को जयपुर से हटकर जोधपुर ले जाने का प्रस्ताव है। जब बच्चों को ढंग की सुविधायें नहीं मिल सकतीं तो खोलने का फ़ायदा क्या है? आई.आई.टी जैसे संस्थान के साथ ऐसा बर्ताव कर उसे खोखला बना दिया है। ऊपर से आरक्षण का भूत। समझ नहीं आता कि जिस आरक्षण को नेहरू ने दस वर्ष तक खत्म करने की बात की थी उसी को वोट का मोहरा मना कांग्रेस अभी तक रोटियाँ सेंक रही है। खैर ये बातें तो अब होती रहती हैं।

दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज को दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी बनाने की भी बात शुरु हुई है। इसकी जरूरत क्या थी? क्या हमारे देश में इंजीनियरिंग कॉलेज की कोई कमी हो गई है? इसके जरिये सरकार नये कॉलेजों को मान्यतायें देगी और पैसे कमायेगी जैसा कि इंद्रप्रस्थ विवि के साथ हो रहा है। १ सरकारी और ४ प्राइवेट कॉलेजों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा द्वारा शुरु हुए इस वि.वि. में अब १० से ऊपर प्राइवेट कॉलेज हो गये हैं पर पढ़ाई का स्तर केवल ३-४ में ही अच्छा है। जो स्तर दिल्ली इंटर कॉलेज का है वो बनाये रखा जाये तो बेहतर। चौथा मुद्दा मैं पहले भी छेड़ चुका है इसलिये संक्षेप में... मदरसा बोर्ड और सीबीएसई बोर्ड को बराबर का दर्जा। सिब्बल कहते हैं कि मदरसों में धार्मिक पढ़ाई के साथ आधुनिकीकरण भी किया जायेगा। मेरी उनसे गुजारिश है कि पहले आधुनिकीकरण कर लेवें तभी उसे सीबीएसई के साथ रखें।

कपिल सिब्बल जी ने एक ही ढंग की बात कही। कॉलेजों में दाखिले के लिये जीआरई जैसी परीक्षा.. पर ग्रेड से पास हुआ बच्चा क्या तब मार्क्स की परिभाषा समझ सकेगा। सौ दिनों में कुछ करने के चक्कर में सब कुछ बिगाड़ मत देना। राजनीति के लिये क्यों बच्चों के भविष्य से खेल रहे हैं मंत्री जी?



तपन शर्मा

Wednesday, May 20, 2009

....क्योंकि कोई विकल्प नहीं था !

लोक सभा के चुनाव परिणामों से सिर्फ एक राहत महसूस की जा सकती है और वह यह है कि केंद्र में अस्थिरता का डर नहीं रहा। लेकिन यह राहत भी सिर्फ उनके लिए हैं जो किसी भी कीमत पर स्थिरता को तरजीह देते हैं। सरकार या शासन की स्थिरता अपने आपमें कोई काम्य चीज नहीं है। स्थिरता तब अच्छी होती है जब वह देश को बेहतर ढंग से चलाने का माध्यम बने। अगर बकवास नीतियों और बकवास नेतृत्व के बावजूद स्थिरता बनी रहती है, जैसा नरसिंह राव के जमाने में था, तो वह देश के लिए नुकसानदेह और कभी-कभी खतरनाक भी होती है। मनमोहन सिंह सरकार की उपलब्धियां ऐसी नहीं रही हैं कि उन्हें एक महान प्रधानमंत्री माना जा सके। इसी तरह, सोनिया गांधी दूसरे नेताओं की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली साबित हुई हैं, पर यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि उनके नेतृत्व में हम एक महान भारत का सृजन करने जा रहे हैं। न ही कांग्रेस के बारे में यह दावा किया जा सकता है कि उसका कायाकल्प हो चुका है और अब वह राष्ट्र निर्माण की ऐसिहासिक भूमिका का निर्वाह करने जा रही है।

ये सब ऐसी खामखयालियां हैं जो कांग्रेस को इतनी अधिक सीटें मिलने से पैदा हुई हैं। वैसे, इन सीटों की संख्या इतनी भी नहीं है कि बहुमत के लिए उसे अन्य दलों का सहारा न लेना पड़े। इसलिए सीटों की संख्या पर इतराने का कोई वास्तविक कारण दिखाई नहीं देता। राजीव गांधी को 1984 में तीन-चौथाई बहुमत मिला था। लेकिन उनके शासन की कौन-सी उपलब्धियां आज याद आती हैं? बोफोर्स का दाग अभी तक नहीं मिट पाया है। इसी तरह, नरसिंहराव को बहुमत तो नहीं मिल पाया था, पर धीरे-धीरे तोड़-फोड़ की अपनी कुशलता के कारण उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए बहुमत का प्रबंध कर लिया था। लेकिन अंत में हुआ क्या? आज उन्हें देश के सबसे निस्तेज प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है। बाबरी मस्जिद कांड उन्हीं के समय में घटित हुआ था।

फिर कांग्रेस की इस अप्रत्याशित जीत की व्याख्या कैसे की जाए? इस व्याख्या पर ही निर्भर है कि हम वर्तमान राजनीति से क्या उम्मीद करते हैं। अगर कोई यह कहता है कि अब क्षेत्रीय दलों की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है तथा यह उनके पराभव का समय है, तो यह मिथक है। बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, बिहार का जनता दल (यूनाइटेड), उत्तर प्रदेश का समाजवादी दल, बहुजन समाज पार्टी आदि क्षेत्रीय दल नहीं तो और क्या हैं? यह जरूर है कि जिन क्षेत्रीय दलों की उपयोगिता बची हुई है, वे दल ही बचे हैं; जिन्होंने अपनी उपयोगिता का खुद ही भक्षण कर डाला है, वे ढलाव के शिकार हुए हैं। लेकिन यह तो राष्ट्रीय दलों के साथ भी होता रहा है। कांग्रेस और भाजपा, दोनों कई-कई बार नीचे जा चुकी हैं और फिर उभरी हैं। इसी तरह, क्षेत्रीय दल भी नीचे-ऊपर आते-जाते रहे हैं। इस राजनीतिक चक्र को भूल कर किसी एक चुनाव के आधार पर कोई बड़ा निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी राजनीतिक विश्लेषण के बचकानेपन के अलावा कुछ नहीं है।

सवाल यह भी है : अगर राष्ट्रीय दलों का जमाना सचमुच लौट आया है, तो यह सिर्फ कांग्रेस के लिए ही क्यों लौटा? भाजपा को भी तो राष्ट्रीय दल माना जाता है। सच पूछिए तो दोनों में से कोई भी व्यापक और सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय दल नहीं है। इसीलिए जिस अर्थ में कांग्रेस राष्ट्रीय दल है, उसी अर्थ में भाजपा भी राष्ट्रीय दल है। उसी अर्थ में बसपा भी राष्ट्रीय दल बनने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय दलों की वापसी का समय आ गया है, तो इसका लाभ कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी दलों को भी मिलना चाहिए था, जो नहीं हुआ है। इसलिए यह स्थापना भी निराधार प्रतीत होता है।

फिर कांग्रेस की जीत को कैसे समझा जाए? इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि कांग्रेस का कोई ऐसा विकल्प चुनाव मैदान में नहीं था जिसे कांग्रेस से बेहतर कहा जा सके। चुनाव की घोषणा के पहले ही लालकृष्ण आडवाणी ने अपने को भावी प्रधानमंत्री घोषित कर दिया था। इस नाते भाजपा ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी थी। भाजपा अपने सांप्रदायिक चेहरे के साथ-साथ हर अर्थ में दक्षिणपंथी पार्टी है। कांग्रेस को मध्यमार्गी दल माना जाता है, पर उसकी आर्थिक नीतियां भी पूरी तरह से दक्षिणपंथी हैं। अमेरिका से नजदीकी कांग्रेस भी चाहती है और भाजपा भी। यह जरूर है कि कांग्रेस का एक इतिहास, भले ही वह मुखौटा ही हो, गरीबी हटाओ का भी है, जो भाजपा का नहीं है। भाजपा उद्योगपतियों और व्यापारियों की ही नहीं, सवर्ण जातियों की भी पार्टी मानी जाती है। दूसरी ओर, कांग्रेस भी उद्योगपतियों और व्यापारियों की पार्टी है, पर वह गरीबों का नाम भी लेती रहती है और उनके लिए समय-समय पर कुछ कार्यक्रम भी बनाती रहती है। राष्ट्रीय ग्रामीण राजगार गारंटी योजना उसी ने लागू की थी, जिसका कुछ इलाकों में अच्छा असर पड़ा है। इस दृष्टि से देखा जाए, तो मतदाताओं ने कांग्रेस को चुन कर कुछ भी गलत नहीं किया।

कांग्रेस को असली चुनौती तब मिलती जब उसके मुकाबले कोई सचमुच का वामपंथी दल या दल समूह खड़ा होता। वामपंथी दलों ने यही सोच कर तीसरा मोर्चा बनाया था। लेकिन क्या यह वास्तव में तीसरा मोर्चा था? सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि इसका नेतृत्व कर रहे सीपीएम और अन्य वामपंथी दल स्वयं केरल और प. बंगाल में अपनी वामपंथी साख लुटा चुके थे। गरीब किसानों का दमन करने के मामले में वे किसी भी अन्य दल के मुकाबले ज्यादा क्रूर साबित हुए हैं। केरल के सीपीएम में घमासान चल रहा था। तीसरा मोर्चा बनाने के लिए जिन दलों का साथ लिया गया, वे अपने-अपने राज्य में राजनीतिक रूप से दिवालिया हो चुके थे। गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा होने का ऑटोमेटिक मतलब प्रगतिशील या जनवादी नहीं होता। फिर इनमें से अनेक दल ऐसे भी हैं जो अतीत में भाजपा के साथ रह चुके हैं। इसलिए उनकी विश्वसनीयता भी खटाई में थी। सच पूछा जाए तो तीसरा मोर्चा इतना बोगस था कि उसे वोट देने के बारे में कोई गंभीरता से सोच ही नहीं सकता था। इस तरह, बिना कुछ ज्यादा किए-कराए सत्ता एक तरह से मुफ्त में कांग्रेस की झोली में आ गिरी।

यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी की जीत स्वयं उसके लिए भी अविश्सनीय है। जब मीडिया के लोग अनुमान लगा रहे थे कि किसी भी दल समूह को बहुमत नहीं मिलेगा, तो वे हवा में कबड्डी नहीं खेल रहे थे। यही आकलन स्वयं राजनीतिक दलों का भी था। राहुल गांधी तो विपक्ष में बैठने के लिए भी तैयार थे। लालकृष्ण आडवाणी की आशाएं भी धीरे-धीरे धूमिल हो रही थीं, क्योंकि तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा की कोई लहर नहीं बन पा रही थीष्। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का खयाल आसमान से नहीं टपका था। इससे भी आडवाणी का भविष्य कुछ धूमिल हुआ।

बहरहाल, जो होना था, हो चुका। एक मान्यता है कि जो हुआ, वही हो सकता था। अगर कुछ और हो सकता था, तो वह हुआ क्यों नहीं? इसलिए कांग्रेस के जीतने को एक ऐसिहासिक घटना मान कर चलना ही उचित है। सवाल अब यह है कि आगे क्या? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि फिलहाल कांग्रेस का कोई प्रगतिशील विकल्प उभरता दिखाई नहीं देता। वामपंथियों में आत्मपरीक्षण के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। कायदे से प्रकाश करात को सीपीएम की शोचनीय पराजय के बाद अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए था। पर इसकी हलकी-सी आहट भी सुनाई नहीं देती। प. बंगाल की हार तो इतनी जबरदस्त है कि वहां के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को एक दिन के लिए भी अपने पद पर रहने का नैतिक हक नहीं है। इसी तरह, तीसरा मोर्चा में शामिल अन्य दलों में भी अंत:परीक्षण का कोई साक्ष्य दिखाई नहीं देता। यानी, भविष्य का परिदृश्य अत्यधिक धूमिल जान पड़ता है।

क्या यह चिंता की बात नहीं है कि इतने बड़े देश में कोई राजनीतिक विकल्प न हो जो जरूरत पड़ने पर वर्तमान सत्तारूढ़ दल का स्थान ग्रहण कर सके? कांग्रेस सफल होती है तो और नहीं सफल होती है तो भी, अच्छा लोकतंत्र वही होता है जिसमें वर्तमान का विकल्प हमेशा मौजूद रहे। इसे ही असली विपक्ष कहा जाता है। मौजूदा लोक सभा का सबसे दैन्यपूर्ण पक्ष यह दिखाई देता है कि इसमें कोई मजबूत विपक्ष नहीं है। यह सत्ता को निरंकुश बनाने के लिए काफी है। चूंकि वर्तमान राजनीति में कांग्रेस का कोई ठीक-ठाक विकल्प उभरता दिखाई नहीं देता, इसलिए कम से कम जनतंत्र के हित में आवश्यक है कि इसके लिए ठोस प्रयास किया जाए। ऐसा न हो कि पांच साल बाद फिर चुनाव की घड़ी आए और हम हाथ पर हाथ धरे पछताते रहें कि हाय, हमारे पास कोई सार्थक विकल्प नहीं हैं। विकल्प दो-चार महीनों में खड़ा नहीं होता। इसके लिए पांच वर्ष भी कम हैं। पर पांच वर्ष की अवधि इतनी छोटी भी नहीं है कि कुछ हो ही न सके। सवाल सिर्फ इतना है कि देश की तकदीर बदलने की कोई राजनीतिक इच्छा हमारे मनों में खदबदा रही है या नहीं।

राजकिशोर

Tuesday, May 12, 2009

मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और भारतीय मतदाता

मैं जब कभी लोगों से राजनीति के बारे में बात करता हूँ या किसी फोरम में लोगों के कमेंट्स पढता हूँ तो एक बात बहुत ही शिद्दत से उभर कर आती है, लोगों का पार्टी प्रेम। मैं हैरान हूँ, यहाँ तक कि हैरानगी की हद तक चला गया हूँ। इन लोगों के लिए समझ क्या बाहर से आयात करनी पड़ेगी?
जब किसी का ध्यान किसी क्षेत्र विशेष की समस्याओं पर दिलाया जाये तो वो उस पार्टी को गालियाँ देने लगता है जिसके खिलाफ वो आज तक वोट करता आया है। कल ही मैं एक वेबसाइट पर एक लेख पढ़ रहा था जिसमें मध्यप्रदेश की बदहाली का ज़िक्र और सीएम साहब से कुछ सवालात किये गए थे। उसमें नीचे पाठकों की टिप्पणियाँ थीं। सिर्फ ३ या ४ लोगों ने समझदारी की बात कही थी बाकी सारे लोग वाहियात सी बातें कर रहे थे। चूंकि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, वहां पर लोग लेखक को कांग्रेस का एजेंट साबित करने पर तुले हुए थे। उस बेचारे ने जो हाल देखा वो लिख दिया और इन लोगों को बिना बात की मिर्ची लग गई। एक महाशय लिखते हैं कि आप कांग्रेस शासित राज्यों में जाकर देखिये वहां क्या हुआ है? अरे मेरे भाई, तेरे घर में खाना नहीं होगा तो क्या तेरा पेट इसलिए भर जायेगा कि दूसरे के घर में भी खाना नहीं है? अजीब बातें करते हैं लोग, पता नहीं क्यों इस लोकतंत्र में लोक ही किसी काम का नहीं है, शायद इसीलिए लोकतंत्र भी किसी काम का नहीं रहा। मैं मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे से हूँ। इतना छोटा भी नहीं, तहसील है। मैंने वहां अपने बचपन से लेकर आज तक हमेशा अँधेरा ही देखा है, बिजली थोड़ी देर ही आती है, सड़कें हमेशा ख़राब ही रहीं हैं लेकिन ये कांग्रेस बीजेपी के पिट्ठू अपनी वफादारी साबित करने में लगे रहते हैं। अरे यार तू ये देख न कि तेरी समस्या कौन हल करता है, नहीं लेकिन, मर जायेंगे पर पार्टी को वोट देंगे। यहाँ तक कहते हैं लोग कि फलां पार्टी से अगर कोई कुत्ता भी खड़ा होता है तो हम उसी को वोट देंगे और ऐसी बेशर्मी की बातें ये लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं। बताइये अब कहाँ जायेगा ये देश ऐसे बेवकूफों के हुजूम के साथ? यही वजह है कि कोई नेता कुछ नहीं करता, पता है कि ये बेवकूफ ऐसे ही मुट्ठी में है, और नहीं होंगे तो एक-आध मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और पकड़ा देंगे। बिजली नहीं है, पानी नहीं है, सड़कें नहीं हैं, ज़माने भर की समस्याएँ हैं लेकिन पार्टी का पट्टा गले में डाले रहते हैं। ६० साल से ज्यादा हो गएँ हैं जब अँगरेज़ हमें छोड़ गए थे लेकिन हमारे लोग बड़े ही नहीं हो रहे ... | क्या आप बता सकते हैं कोई हल... ?

--अनिरूद्ध शर्मा

Friday, May 01, 2009

भाजपा प्रचार जानी पहचानी लीक पर

हिन्द-युग्म के प्रेमचंद सहजवाला उम्र के इस पड़ाव पर भी हाथ में कैमरा लिये कोई न कोई चुनाव रैली में शामिल हो जाते हैं। आम जनता और उनके भावी प्रतिनिधियों से एक पेशेवर पत्रकार की तरह बात करते हैं। सभाओं में श्रोता बनना इन्हें ख़ासा रुचिकर लगता है। पिछले हफ़्ते इन्होंने कांग्रेस के अजय माकन को कैमरे में कैद किया था और उसकी एक रिपोर्ट दी थी। आज कैद हुए है भाजपा के रविशंकर प्रसाद॰॰॰॰


लोक सभा चुनाव 2009 कई अर्थों में बेहद महत्वपूर्ण हो रहे हैं। एक तो यह कि 15वीं लोक सभा शायद सरकार बनाने वाली पार्टी के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण होगी। पार्टियों और नेताओं का एक लंबा जुलूस सा है। कांग्रेस के बारे में भले ही यह कहा जा रहा हो कि भाजपा की तुलना में उस की स्थिति थोड़ी सी ही बेहतर है, पर दिन ब दिन कांग्रेस की मुश्किलें भी बढ़ती नज़र आ रही हैं और कांग्रेस-भाजपा की टक्कर और अधिक तीखी होती जा रही है। कभी तो कांग्रेस को लालूप्रसाद और मुलायम सिंह छोड़ कर अपनी डफली बजाने में लगे हैं, कभी शरद पवार को प्रधानमंत्री बनने के सपने आते हैं। तो कभी अचानक क्वात्राची का पुराना भूत आकर 10 जनपथ पर मंडराने लगता है। कभी कोई कह देता है कि मनमोहन सिंह तो केवल 'नाइट वॉचमैन' हैं और चुनाव जीतते ही कांग्रेस सहसा राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बना देगी। टीवी चैनलों के भी खूब मौज हो गई है। कोई-कोई चैनल ग्लैमर को बढ़ावा देने के लिए प्रियंका गाँधी की साड़ियों की प्रदर्शनी लगा देता है, जिन में प्रियंका अपनी दादी माँ यानी इंदिरा गाँधी की साड़ियों में से अपने लिए साड़ी चुनती नज़र आती हैं। पर सारी चमक-दमक व मनमोहन सिंह की साफ़ सुथरी छवि के बावजूद कांग्रेस पर यह खतरा बना हुआ है कि जैसे 2004 के चुनावों में उम्मीद वाजपेयी की जीत की थी और जीत गई थी सोनिया, तो कहीं इस बार ठीक उल्टा न हो जाए। नए प्रधान मंत्री को शपथ दिलवाने के तैय्यारी कर रही हों सोनिया जी और बाज़ी मार ले जाएँ आडवानी जी! आडवानी और मोदी के द्वंद्व पर भी मीडिया अच्छे पैसे कमा लेता है, यह कह कर कि क्या मोदी ही भाजपा का असली चेहरा हैं?

बहरहाल, इस बीच मैं दिनांक 24 अप्रैल को जनकपुरी मेट्रो स्टेशन के नज़दीक बने 'एस के बैंकेट हाल' में आयोजित भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद का भाषण सुनने चला गया। रविशंकर प्रसाद वाजपेयी के नेतृत्त्व वाली सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं तथा भाजपा की सांप्रदायिक छवि के तुलना में एक 'सेकुलर' नेता व सुलझी हुई सभ्य शख्सियत माने जाते हैं। पर जैसा कि हर चुनाव में होता है, इस बार भी भाजपा का प्रचार नकारात्मक वोटों पर ही आधारित है। कांग्रेस के विफलताओं की रोटियां सेंक कर खाना भाजपा का बहुत पुराना खेल है। रविशंकर प्रसाद सुप्रीम कोर्ट के एक जाने माने वकील भी हैं तथा भाषण बहुत प्रभावशाली करते हैं। उन्होंने सब से पहले अपने समय की एन.डी.ए सरकार की एक बड़ी उपलब्धि यही मानी कि सन 98 में परमाणु परीक्षण कर के एन.डी.ए सरकार ने भारत को अग्रणी देशों में ला खड़ा किया। परन्तु जब मैंने भाषण के अंत में मंच पर जा कर यह प्रश्न किया कि परमाणु शक्ति होने के कारण भारत पाकिस्तान पर हमला ही नहीं कर पा रहा, वरना इतने आतंकवादी हमलों के बाद भारत के पास यही विकल्प है कि पाकिस्तान पर हमला कर के उन के आतंकवादी अड्डे नेस्तनाबूद कर दे। पर रवि शंकर प्रसाद यह मानने को तैयार नहीं हैं। बल्कि रोचक बात यह है कि उन्होंने पाकिस्तान को सीधा करने का वही तरीका बताया जो इस समय कांग्रेस को अपनाना पड़ रहा है। वे कहते हैं कि भारत के पास कई और तरीके हैं, जैसे कि सख्ती। और दुनिया के कई देश भारत की बात मानते हैं. यानी राजनयिक (diplomatic) तरीका। मुझे इस से भी अधिक रोचक बात यह लगती है कि कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक व विदेशी नीतियां एक दूसरे के फोटो-कॉपी ही हैं। कुछ दिन पहले तो रजत शर्मा ने 'आप की अदालत' में भाजपा नेता अरुण जेटली से पूछ ही लिया कि इतने ढेरों दलों के खिचडी से तो बेहतर है कि कांग्रेस और भाजपा मिल-जुल कर सरकार बनाएं। अरुण जेटली ने वही जवाब दिया जिसकी उम्मीद थी, हालांकि उपस्थित दर्शक-गण ने रजत के सवाल पर भरपूर ठहाका लगाया था। जेटली कहते हैं कि समय के साथ राजनैतिक ध्रुवीकरण भी हो चुका है। अतः भाजपा और कांग्रेस का मिलना तो अब दूर की बात ही रही। रविशंकर प्रसाद ने अपने भाषण में मंहगाई, आतंकवाद, काला धन, अफज़ल गुरू, कांधार विमान-अपहरण, बंगलादेशी घुसपैठिये, कसाब के बजाय दूसरे मृत आतंकवादी का डी.एन.ए टेस्ट पाकिस्तान भेज देना, सन 84 की सिख हत्याएं, हिंदू- मुस्लिम प्रश्न... इन सब जाने पहचाने प्रश्नों के चिरपरिचित लीक पर अपना प्रभावशाली भाषण रखा। हिंदू-मुस्लिम प्रश्न पर भाजपा की गिरगिट बाज़ी का प्रदर्शन उन्हें भी करना पड़ा शायद। वोटों के समय भाजपा एक नकली मुखौटा चढ़ाती है कि वह मुसलमानों की दुश्मन नहीं है। पर ज़रूरत पड़ने पर जैसा गुजरात में हुआ, नरसंहार अपनी आंखों से होता देखते रहने में कोई संकोच नहीं करती। न ही वह उड़ीसा की शर्मनाक ईसाई हत्याओं का कोई जवाब देती है। रोचक बात यह कि रविशंकर प्रसाद जी का कहना है कि उन की पार्टी मौलाना आजाद, परम वीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद, इरफान पठान व सानिया मिर्जा पर गर्व करती है। वास्तविकता यह है कि मौलाना आजाद की छवि पुराने जनसंघी नेता चुन-चुन कर बिगाड़ते रहे और अब्दुल हमीद के विषय में उन का प्रचार यही था कि सन 65 की लड़ाई के बाद दिखावे के तौर पर एक मुस्लिम को भी परम वीर चक्र दे दिया गया। बैंकेट हॉल में जहाँ शादी के बाद दूल्हा दुल्हन बैठते हैं, ऐसे एक हॉल में लगभग 600 लोग थे जिन में कई तो कार्यकर्त्ता थे। पर रविशंकर प्रसाद अपने प्रस्तुतीकरण में काफ़ी सशक्त रहे. वोटों के दिन जनता क्या करती है, यह जनता के गत जनता जाने।
इधर दिनांक 29 अप्रैल को मैं अपने घर बैठा चंगा भला फिल्मी गाने सुन रहा था कि नीचे कार्यकर्ताओं का शोर सा सुनाई दिया. 'भारतीय जनता युवा मोर्चा' के कार्यकर्ता एक वैन में प्रचार को निकल पड़े थे और उनके साथ थी यहाँ रमेशनगर की निगम पार्षद उषा मेहता, जो यहाँ की एक लोकप्रिय नेता हैं, अपनी सुंदर वाणी और हावभाव के लिए प्रसिद्ध। उन से मैंने पूछा कि नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र को ले कर उन की क्या योजनाएं हैं तो उन्होंने भी मंहगाई की बात कर के यह कहा कि नई दिल्ली में अजय माकन के होते जो तबाही हुई है, उस से दिल्ली को बचाना हमारा ध्येय है. हर बार की तरह कार्यकर्ताओं में उत्साह और धूमधड़ाका था पर आडवानी और मनमोहन सिंह की तुलना में आख़िर इस चुनाव का ऊँट किस करवट बैठता है, यह जानने के लिए सब को इंतज़ार है चुनाव ख़त्म होने का और 16 मई को परिणाम आने शुरू होने का।

रविशंकर प्रसाद से सवाल करते प्रेमनिगम पार्षद उषा मेहता का जवाब

Wednesday, April 29, 2009

आज़ादी से पहले और बाद के जूता-काण्ड

हि्द-युग्म के प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रेमचंद सहजवाला चंद चुनाव सम्बन्धी प्रश्न लाये हैं। इन दिनों नेता पर जूता-चप्पल फेंको प्रतियोगिता ज़ोरों पर है। उसी से जुड़े कुछ सवाल हैं। एक-एक प्रश्न के चार-चार विकल्प हैं जिन में से एक सही है और शेष ग़लत। पाठक Comment (टिप्पणी) में अपने उत्तर दे सकते हैं। शीघ्र ही मैं इनके उत्तर आपको बताये जायेंगे।

प्रश्न 1: आज़ादी से पहले कौन से कांग्रेस नेता पर एक कांग्रेस अधिवेशन में जूता फेंका गया था?
(a) मोतीलाल नेहरू
(b) मुहम्मद अली जिन्ना
(c) लोकमान्य तिलक
(d) महात्मा गाँधी

(संकेत - जूता जिस नेता पर फेंका गया उसे न लग कर दो अन्य नेताओं को लगा जिन में से एक पारसी था एक बंगाली)

प्रश्न 2 : आज़ादी के बाद एक लोक सभा चुनाव की रैली में कौन से नेता पर पत्थर फेंका गया जिस के फलस्वरूप उस की नाक fracture हो गई थी?

(a) अटल बहरी वाजपेयी
(b) इंदिरा गाँधी
(c) मार्गरेट अल्वा
(d) तारकेश्वरी सिन्हा

प्रश्न 3 : 'दो बैलों की जोड़ी' और 'हाथ' के चुनाव चिन्हों के बीच की अवधि में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह क्या था?

(a) चरखा कातती औरत
(b) हल चलाता किसान
(c) चरखा
(d) गाय-बछड़ा

सोचिए-सोचिए। हैं ना मज़ेदार सवाल!

Wednesday, April 22, 2009

अजय माकन को अपनी तथा मनमोहन सिंह दोनों की छवियों का दोहरा लाभ

प्रेमचंद सहजवाला हिन्द-युग्म के वरिष्ठ लेखक हैं। इन दिनों वे पाठकों के साथ भारतीय आमचुनावों की यादें बाँट रहे हैं। अभी कुछ ही समय पहले इनके इलाके रमेश नगर में कांग्रेस प्रत्याशी अजय माकन का आना हुआ। प्रेम ने सिटीजन पत्रकर का धर्म निभाया, माकन को कैमरे के मकान में बिठा लिया। आइए हम भी देखते हैं और पढ़ते भी-


दिल्ली के सात लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र सर्वाधिक गर्मजोशी वाला निर्वाचन क्षेत्र रहा है. इस निर्वाचन क्षेत्र से जहाँ एक ओर अटल बिहारी वाजपेयी, एम एल सोंधी, मोहिनी गिरी, जगमोहन व लाल कृष्ण आडवानी जैसे सांसद रह चुके हैं, वहीं सन 1957 के लोकसभा चुनाव में इसी सीट से सुचेता कृपलानी ने 73% से भी अधिक वोट हासिल किए जो कि आज तक एक कीर्तिमान रहा है। यहीं से राजेश खन्ना व शत्रुघ्न सिन्हा की टक्कर हुई थी। राजेश खन्ना ने शत्रुघ्न सिन्हा को हरा दिया तो बाद में जब लाल कृष्ण आडवानी ने राजेश खन्ना को हरा दिया तब मीडिया ने चुटकी काटी के राजेश खन्ना तो शत्रुघ्न सिन्हा से बड़े अभिनेता हैं, पर लाल कृष्ण शायद राजेश खन्ना से भी बड़े अभिनेता हैं। जब सन् 80 में नई दिल्ली से चुनाव लड़ने के बाद मत-गणना केन्द्र पर वाजपेयी बारिश में छाता पकड़े खड़े अन्दर की स्थिति का जायजा ले रहे थे और मत-गणना के एक मुकाम पर उन्हें पता चला कि वे हारने वाले हैं तो पास खड़े विक्षिप्त से माने जाने वाले नेता राजनारायण जो यहीं से चुनाव लड़ रहे थे, को अपना छाता पकड़ा कर वाजपेयी मीडिया से मज़ाकिया बातें करते कार में अपने घर चले गए। इसी निर्वाचन क्षेत्र से आई एस जोहर जैसे विचित्र से माने जाने वाले हास्य अभिनेता व Bandit Queen फूलन देवी चुनाव लड़ कर ज़मानतें ज़ब्त करा चुके हैं। परन्तु सन् 2004 यानी पिछला लोक सभा चुनाव भी इस निर्वाचन क्षेत्र के लिए कम दिलचस्प नहीं था। यहाँ एक युवा नेता अजय माकन ने जगमोहन जैसे धुंरधर नेता, जिन्होंने बुलडोज़र द्वारा दिल्ली के कई मकान व इमारतें धराशायी करवा दी थी, की आशाओं पर बुलडोज़र चला कर सब को चौंका भी दिया व अपना लोहा भी मनवा लिया। परन्तु दिल्ली निवासियों ने इन्हीं 5 वर्षों में सीलिंग तथा मकान गिरने के दुखद दिन भी देखे जिस में कि एक बार तो पुलिस की गोलियों से चार लोगों की मृत्यु भी हो गई। कांग्रेस को सन् 2007 में नगर निगम चुनावों में बुरी तरह पिटना पड़ा। परन्तु अजय माकन जिन्हें कि 'मास्टर प्लान माकन' नाम से जाना जाता है, का दावा है कि उनके विशेष प्रयासों से ही दिल्ली वासियों के दुखद दिनों का अब अंत हो चुका है. रमेश नगर जहाँ मैं रहता हूँ, वहां की एक जन सभा में उन्होंने कहा कि शहरी विकास राज्य मंत्री के रूप में उनके द्वारा कार्यान्वित 'मास्टर प्लान' के बाद दिल्ली-निवासी अब अपनी इमारत का निचला तल 'कार पार्किंग' के लिए रख कर उस के ऊपर चार मंज़िलें और बनवा सकते हैं तथा एक मंज़िल भूमिगत (basement) भी बनवा सकते हैं। इस प्रकार अब कोई भी इमारत कुल छह मंजिलों की बन सकती है। माकन के प्रतिद्वंद्वी विजय गोयल भले ही लोकप्रिय हों और स्वयं को एक कर्मठ नेता के रूप में प्रस्तुत करते हों, (वे भी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एन डी ए सरकार में राज्य मंत्री रह चुके हैं, पर अजय माकन की अपेक्षाकृत साफ़ सुथरी व सादगी पसंद छवि के आगे विजय गोयल बौने से पड़ जाते हैं) । अधिकाँश मतदाता स्पष्टतः अजय माकन की ओर झुके हुए हैं। तालियों की गड़गडाहट के बीच अजय माकन अपना भाषण बहुत प्रभावशाली तरीके से निभाते हैं।

अजय माकन का भाषण

भाषण का दूसरा तथा तीसरा भाग


प्रेमचंद सहजवाला की वोटरों (मतदाताओं) की बातचीत

अजय माकन के पास अपने चाचा, अपने समय में दिल्ली के धुआंधार नेता ललित माकन की राजनैतिक विरासत है, जिन्हें जुलाई 1985 में खालिस्तानी आतंकवादियों ने सपत्नीक गोलियों की बौछारों से उड़ा दिया था। दिल्ली हो या केन्द्र, अजय माकन की शख्सियत में कई सितारे टंके हैं। सन् 93 के दिल्ली विधान-सभा के चुनाव में घोर कांग्रेस विरोधी आंधी थी और 70 में से केवल 14 सीटें कांग्रेस के पाले में गई, तब अपेक्षाकृत नए प्रत्याशी अजय माकन न केवल चुनाव जीते वरन उन्हें वोटों की बहुत अच्छी प्रतिशत संख्या मिली। जब वे दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष बने तब देश की किसी भी विधान सभा के सब से युवा अध्यक्ष थे वे। तालियों की गड़गडाहट के बीच वे गर्व से कहते हैं कि दिल्ली के विद्युत् मंत्री के रूप में उन्होंने दिल्ली में विद्युत् का निजीकरण किया। केन्द्र में राज्य मंत्री के रूप में वे आज़ादी के बाद कांग्रेस के तब तक के सब से युवा मंत्री बने। अपने भाषण में उन्होंने गर्व से कहा कि उनकी जीत की बढ़त हमेशा बढ़ती ही रही। पहले 4000, फिर 20000 फिर 24000। अपने प्रतिद्वंद्वी विजय गोयल पर चुटकी लेते हुए वे कहते हैं कि गोयल हमेशा अपना निर्वाचन क्षेत्र बदलते रहे हैं। पहले सदर, फिर चांदनी चौक और अब नई दिल्ली। श्रोताओं के बीच कहकहों की एक लहर सी पैदा करते वे कहते हैं कि अब जब वे यहाँ भाषण कर के वोट मांगने आएं तो आप लोग उन से यह ज़रूर पूछियेगा कि अगला चुनाव आप कहाँ से लड़ेंगे। अजय माकन डॉ मनमोहन सिंह की छवि को भी खूब निपुणता से भुनवाते नज़र आते हैं। वे मतदाताओं को याद दिलाते हैं कि जब नरसिम्हा राव प्रधान-मंत्री थे और देश में केवल तीन दिन और की विदेशी पूंजी बची थी, तब उन्होंने रिज़र्व बैंक के ही गवर्नर डॉ मनमोहन सिंह को वित्त-मंत्री बनाया जिन्होंने आते ही चमत्कार सा कर के देश को उस विपत्ति भरी स्थिति से उबारा। वे गर्व से कहते हैं कि भारत तो क्या, पूरी दुनिया के प्रधान-मंत्रियों व राष्ट्रपतियों की तुलना में सब से अधिक साफ़ सुथरी छवि डॉ मनमोहन सिंह की है, जिन पर कभी कोई आरोप नहीं लगा। हालांकि गोयल ने यहाँ से टिकट लेने के लिए एड़ी चोटी के ज़ोर लगा दिया था, पर यहाँ माकन से यह सीट छीनना उनके लिए टेढी खीर होगी क्योंकि इस निर्वाचन क्षेत्र में अजय माकन के पाँव मजबूती से गड़े हुए हैं।