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Tuesday, June 29, 2010

पृथ्वी पर इस्लाम का समय अब पूरा हो चुका है ?

अमेरिका में कार बम विस्फोट के सिलसिले में पाक-अमेरिकी नागरिक गिरफ्तार. ये कुछ दिनों पहले की खबर है और इस तरह की खबरें अमूमन हर थोड़े दिन में सुनने में आती हैं. दुनिया धीरे-धीरे दो भागों में बंटती जा रही है - एक इस्लामिक और एक गैर-इस्लामिक. ये सच है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता और ये भी सच है कि दुनिया का 8० फीसदी आतंकवाद इस्लामिक आतंकवाद है. मेरी बात को अन्यथा कतई न लिया जाए, मैं एक धर्म के रूप में इस्लाम का सम्मान करता हूँ. मैं पैगम्बर मोहम्मद के जीवन से वाकिफ हूँ. मोहम्मद का पूरा जीवन लड़ाइयों में बीता लेकिन फिर भी उनका सन्देश शांति और भाईचारे का था. लडाइयां उनकी मजबूरी थी क्योंकि वो समय, वो परिस्थितियाँ कुछ और थी. आदमी जंगली था और आपसी लड़ाइयों में उलझा हुआ था, उसे एकजुट करने के लिए उन्होंने सबको जीता. लेकिन समय बदलने के साथ बहुत सी चीज़ें बेकार हो जाती हैं, सिर्फ वस्तुएं ही नहीं, विचार और क़ानून-कायदे भी बेकार हो जाते हैं. वो समय कब का बीत चुका. उस समय की दुनिया और आज की दुनिया में ज़मीन-आसमान का फर्क आ चुका है लेकिन इस्लाम के अनुयायी इसे स्वीकार करने से इनकार करते हैं, वे वक़्त के साथ चलने को अधर्म मानते हैं. वे आज भी वही जंगली और बर्बर जीवन शैली अपनाए रहना चाहते हैं. उनका समय, उनके विचार जड़ हो गए हैं, एक ही जगह रुक गए हैं और बहता पानी अगर रुक जाए तो वो सड़ जाता है. यही हुआ है. गैर-इस्लामिक लोग अगर इस्लाम को न समझ पायें तो बात समझ में आती है लेकिन इस्लाम का दुर्भाग्य ये है कि उसके अनुयायी ही उसे नहीं समझ पाए. आज क्या इस्लामिक और क्या गैर इस्लामिक सब उसे जिहाद का पर्याय ही मानते हैं मानो अगर क़त्ले-आम न हो तो वो इस्लाम ही नहीं है. मैं ऐसा नहीं कहता कि सभी मुस्लिम उसे जिहाद मानते हैं लेकिन ऐसा मानने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है और समझ वालों की कम वरना पढ़े-लिखे और अच्छे घरों के नौजवान क्यों आतंकवादी बनाते. इस्लाम अपने शुद्ध रूप में खूबसूरत है लेकिन उस शुद्ध रूप को समझने वाले लोग कब के ख़त्म हो चुके जिस तरह अब हिन्दू धर्म के शुद्ध रूप को समझने वाले लोग भी कम होते जा रहे हैं. आज जो संस्कृति का झंडा उठाये हुए हैं वे कपड़ों को ही धर्म समझते हैं। उन्हें उसके उच्च मूल्यों का ज्ञान तो दूर, आभास भी नहीं है. वे ठीक इस्लामिक आतंकवादियों की कार्बन-कॉपी होते जा रहे हैं. खैर, हमारा विषय ये नहीं है, बात हो रही है इस्लाम की. सोचने वाली बात ये है कि अब जब दुनिया आगे की ओर बढ़ रही है ऐसे में इस्लाम का ये पिछड़ापन उसके लिए चुनौती है. कोशिश की जा सकती है कि उन्हें इस्लाम का सही अर्थ समझ में आये लेकिन जड़ हो चुकी बुद्धि में कुछ भी उतरना लगभग असंभव हो जाता है. तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर इस्लाम का समय अब पूरा हो चुका है, उसे जो भलाई इंसान की करनी थी वो उसने कर दी और अब सिर्फ नुकसान ही उसकी झोली में बचा है जो उसके अपने ही लोगो ने डाला है.
इस्लामिक संस्कृति ने हमें बहुत सी खूबसूरत चीज़ें दी हैं इसमें कोई शक नहीं. बहुत सी समृद्ध कलाएं जैसे भवन निर्माण जिसका बेहतेरीन नमूना ताजमहल है. लेकिन ये सब इतिहास बन चुका है, मौजूदा स्थितियों में वो कुछ भी रचनात्मक नहीं दे रहा है बल्कि जो कुछ भी रचनात्मक है उसे ख़त्म कर रहा है.
इन परिस्थितियों में दो ही बातें हो सकती हैं, या तो मुस्लिम धर्म के कुछ ऐसे नुमाइंदे सामने आएं जो दुनिया को उसका सही मतलब समझाएं और उसे तरक्की के रास्ते पर ले जाएँ या फिर इस्लाम शांतिपूर्वक दुनिया से विदा हो जाए क्योंकि आखिर में जो बात मायने रखती है वो ये है कि इंसानियत बचनी चाहिए. मैं जानता हूँ कि मेरी बात व्यावहारिक नहीं है लेकिन फिर भी वो एक रास्ता तो है और एक बार बात सामने आ जाए तो पता नहीं कब वो जोर पकड़ ले. सारे फसाद की जड़ ये है कि धर्म को ज़रुरत से ज्यादा संजीदा बना दिया गया है. आखिर धर्म क्या है? वो जीने का एक तरीका है, या यूँ कहें कि शांतिपूर्वक जीने का तरीका है, अगर उसका ये बुनियादी उद्देश्य ही पूरा नहीं हो रहा है तो फिर वो क्यों है? एक बच्चा जब पैदा होता है तो वो किसी धर्म को साथ लेकर नहीं आता. सदियों पहले की दुनिया आज की तरह नहीं थी. तब लोग इस तरह जुड़े हुए नहीं थे. सबने अपनी-अपनी जगहों और परिस्थितियों के अनुसार अपने धर्म बनाए. आज पूरी दुनिया बहुत पास-पास आ गई है. ऐसे में बहुत सारे मतभेदों के साथ नहीं रहा जा सकता. जीने के नए रास्ते अपने आप सामने आते रहेंगे और ये इंसान को ही तय करना है कि कौन सा रास्ता इंसानियत के हक में है जिसे मंज़ूर किया जाए और किसे नकार दिया जाए. एक खूबसूरत सा ख़याल ये भी है कि सभी धर्मों की अच्छाइयों को लेकर एक विश्व-धर्म बने जिसे पूरी दुनिया के लोग माने तो दुनिया कितनी सुखी और सुन्दर हो.आखिर हर इंसान अदृश्य तारों से आपस में जुड़ा है, एक ही उर्जा ने सबको बाँध रखा है फिर अगर मनुष्यता का एक हिस्सा दूसरे को आहत करता है तो वो खुद भी चैन से कभी नहीं रह सकता.

अनिरुद्ध शर्मा

Wednesday, April 14, 2010

भारतीय समाचार जगत तथा आतंकवाद



लगभग दो दशक पहले आतंकी गतिविधियों का केन्द्र कश्मीर तक ही सीमित था। लेकिन धीर-धीरे उसने सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपनी गिरफ्त में ले लिया। देश के होटल, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, विद्यालय तथा धार्मिक परिसर सहित सभी क्षेत्र उसकी परिधि में आ गये। वर्तमान में हमारा देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व इसकी हिंसक गतिविधियों की चपेट में आ गया है। वह घटना ही नहीं अपितु एक सिद्धान्त के रूप में स्थापित हो चुका है। आतंकी भारत को अपनी प्रयोगशाला बनाना चाहते है। आतंक के सूत्रधार यह भलीभॉति जानते है कि भारत की वोट बैंक की राजनीति के चलते धर्मनिपेक्षता तथा मानवधिकार के सन्दर्भ में जितना भ्रम उत्पन्न होगा उतना ही उन्हें लाभ मिलेगा। आज कशमीर में उनका समर्थन कम हुआ है अतः वहॉ उनकी गतिविधियों में भी कमी आयी है। आतंकी बिना देश में आंतरिक समर्थन के कुछ भी नहीं कर सकते हैं। वे समय-समय पर अपनी गतिविधियों तथा कार्यवाहियों को मीडिया के द्वारा उछालने का प्रयत्न भी करते हैं। उनका उद्देश्य अपने समानधर्मियों को उकसाकर तथा बहकाकर अपनी तरफ आकर्षित करना होता है। आतंकी क्या यह सब अपने आर्थिक लाभ के लिये करते है? या किसी खास उद्देश्य के लिये? क्या उद्देश्य की प्राप्ति के बाद उनकी हिंसक कार्यवाहियां बन्द हो जायेगी? विचारणीय प्रश्न है। जब तक इस विषय की खुली विवेचन नहीं की जाती, तब तक इसका हल खोजने में कठिनाई होगी। आतंकवाद के सिद्धान्त, उसके स्रोत, उनकी आर्थिक एवं बौद्धिक ऊर्जा तथा उनकी अपील जैसे पहलुओं पर मीडिया सही विवेचना करने से बचती रहेगी तो विषय की सही जानकारी समाज को प्राप्त होने में कठिनाई होगी। पिछले बीस वर्षों में देश के विभिन्न आंचलो में सैकड़ों जिहादी आतंकी हिंसक घटनायें हुई। समाचार पत्रों सहित अन्य माध्यमों ने क्या दृष्टिकोण अपनाया शोध का विषय है। वर्तमान में इलेक्ट्रानिक मीडिया जिसके सिर्फ भारत में लगभग 125 माध्यम है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा तथा टी0आर0पी0 बढ़ाने के उद्देश्य से वे अपने मूल कर्त्तव्यों से विमुख हो जाते है। आतंकी घटनाओं, उनके साक्षात्कार, आतंकियों के भेजे संदेशों का प्रसारण सनसनीखेज तरीकों से कर वे अन्जाने में जिहादी आतंकियों के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल हो जाते है। जिसके माध्यम से उनका स्वधर्मी तथा काल्पनिक समाज में स्थापित होने का प्रयास होता हैं वर्तमान मे मीडिया के चहुमुखी विकास का लाभ वे बड़ी चतुराई से अपने मिशन में लोगों को आकर्षित करने के लिये करते हैं।
यह बात सत्य है अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी भाषी समाचार पत्र जन भावनाओं तथा वास्तविकता से अधिक नजदीक रहते हैं। भारतीय अंग्रेजी समाचार पत्र लगभग हर विषय पर अपनी वैश्विक सोच रखते हैं, आतंकवाद भी जिससे अछूता नहीं है। इसलिए उस पर अति विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगता रहता है। अतः हिन्दी तथा अंग्रेजी माध्यमों में प्रतिस्पर्धात्मक विवाद बना रहता है। भले ही आतंकवाद जैसे विषय पर अंग्रेजी भाषा माध्यम वैश्विक सोच रखता हो परन्तु देश के अन्दर हुई आतंकी वारदातों पर हिन्दी तथा अंग्रेजी समाचार पत्र दोनों की काफी हद तक एक राय रही है। दोनों ने ही आतंकवाद पर अंतरर्राष्ट्रीय सहयोग को आवश्यक माना, दोनों ने ही उक्त विषय पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोपों को गलत बताया, दोनों ने पोटा जैसे कानून को सिरे से खारिज नहीं किया, दोनों ने ही मुम्बई के आंतकी हमले को आंतरिक राजनीति से जोड़ने के प्रयास को कोई स्थान नहीं दिया तथा दोनों ने ही आतंकी संगठनों की गतिविधियों को उजागर करने का काम किया। हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों प्रकार के समाचार माध्यमों ने आतंकवाद का सही चित्र समाज के सामने रखा। दोनों भाषायी माध्यमों के बीच देश की आतंकवादी घटनाओं पर लगभग समानता दिखी।
चर्चा में प्रायः समाज हिन्दी तथा अंग्रेजी समाचार माध्यम पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता है। अन्जाने में उससे उर्दू समाचार पत्र छूट जाते है। यह बात सत्य है उसका पाठक वर्ग काफी कम है, परन्तु है जरूर। उर्दू समाचार पत्र समाज में एक खास वर्ग में पढ़ा जाता है। शायद ही कोई अन्य वर्ग का व्यक्ति उस पर ध्यान भी देता हो। इसलिए उक्त भाषायी समाचार पत्र स्वेच्छाचारी बन गये है। जिससे सम्पूर्ण समाचार जगत की निष्पक्षता सन्देह के घेरे में आ जाना स्वाभाविक है। समाचार के माध्यम तथा उसकी विश्वसनियता लोकतंत्र का मेरूदण्ड होती है। उसकी संदिग्धता राष्ट्र के उक्त स्वरूप को विकृति कर देती है। अतः उक्त माध्यम ईमानदर तथा निष्पक्ष होना ही चाहिए। आतंकवाद के साथ-साथ मीडिया का मुख कार्य उसके मूल में जाकर उनके सिद्धान्तों को उजागर करना, राज्य तथा उसकी विभिन्न एजेंसियों की भूमिका एवं पुलिस की जांच प्रक्रिया को समाचारों के माध्यम से समाज में पहुँचाना हैं जिससे उनकी भूमिका जिम्मेदारीपूर्ण के साथ-साथ संवेदनशील भी हो जाती है। मीडिया की एक छोटी से चूक उसकी विश्वसनीयता को राख में मिला सकती है। हमारे एक मुस्लिम मित्र के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय का नेतृत्व मदरसों में शिक्षित उन मजहवी मौलवियों के हाथों में रह गया है। जिसकी मानसिकता इन उर्दू समाचार पत्रों के माध्यम से तैयार होती हैं उर्दू समाचार पत्र सिर्फ आतंकी घटना ही नहीं मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति पर आरोप भी लगता हैं तो उसका रूख हमेशा एक पक्षीय-सा होता है। उस घटना के आधार पर वे ऐसा माहौल बानाने का प्रयास करते हे। मानो देश में उनके समाज के लोगों का उत्पीड़न ही हो रहा हो। यदि हम हाल की कुछ आतंकी घटनाओं का विश्लेषण करें चाहे वह मुम्बई का आतंकी हमला हो या अब्दुल रहमान अन्तुले के बयान का प्रकरण, बटाला हाउस मुठभेड़ की घटना हो या अन्य कोई। उनका झुकाव एक पक्षीय सा ही रहता है। उर्दू समाचार पत्रों ने कभी तो मुम्बई के आतंकी हमले का रूख दूसरी तरफ मोड़ने का प्रयास किया, तो कभी बटला हाउस मुठभेड़ तथा उसमें शहीद मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत पर प्रश्न चिन्ह लगाये, कभी अब्दुल रहमान अन्तुले के बयान पर अपनी सहमति दर्ज कर अपने पाठक वर्ग को भ्रमित करने का प्रयास किया।
उर्दू समाचारों पत्रों का आपना एक पाठक वर्ग है, जो राष्ट्रभक्त भी है। देश में उर्दू सहित अनेक समाचार स्रोतों के माध्यम से उन्हे विभिन्न तरीकों से जानकारी उपलब्ध होती हे। उन्हें अपनी ज्ञान की कसौटी पर कस वास्तविकता की जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसलिए उर्दू समाचार पत्रों द्वारा प्राप्त हुई जानकारी का उनके जेहन पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। इसी कारण वे समचार पत्र अपनी विश्वसनियता खोते चले जा रह है। तथा हासिये पर हैं।
अभी कुछ दिनों पूर्व बटला हाउस मुठभेड़ की जाँच के लिये आजमगढ़ से करीब दो हजार मुसलमानों की उलेमा परिषद द्वारा दिल्ली में एक रैली आयोजित की गई। जिसमें उक्त मुठभेड़ को शक के दायरे में ला शहीद एम0सी0 शर्मा को मरणोपरान्त दिये गये अशोक चक्र को वापस लेने की मांग रखी गई, हालाँकि उक्त दो हजार मुसलमानों के अलावा एक भी स्थानीय मुसलमान ने उसमें भाग नहीं लिया। उक्त घटना मुसलमानों की जागरूकता एवं स्पष्ट सोच को दर्शाता है। परन्तु उर्दू समाचार पत्रों ने विभिन्न तरीकों से उक्त मुठभेड़ को विवादित करने का पूरा प्रयास किया। 26/11 की घटना का अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों ने इस्लाम को बदनाम करने की साजिश तथा अमेरिकी खुफिया एजेन्सी सी0आई0ए0 तथा इजराइल खुफिया एजेंसी मौसाद का षड़यन्त्र बताया जिसे भी अधिकांश इस्लामी समाज ने हवा में उड़ा दिया, मुम्बई तथा मालेगाँव घटना में भी अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों मे जबरन सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। जिसे भी उनके पाठक वर्ग ने गम्भीरता से नहीं लिया। कुछ उर्दू समाचार पत्रों ने तो अजमल आमिर कसाब की स्वीकारोक्ति पर भी अविश्वास कर डाला। अधिकांश उर्दू समाचार पत्र प्रायः आतंकवाद को रोकने के लिये कठोर कानून का विरोध करते हैं उनकी दलील होती है, इसका दुरूपयोग अल्पसंख्यकों के विरूद्ध होगा।
कोई समाचार माध्यम चाहे किसी भी भाषा को हो घटनाओं तथा उसकी सही वस्तुस्थिति को समाज में पहुँचाना उसका प्रथम कर्त्तव्य होता है। समय-समय पर चर्चा होती है। किस प्रकार मीडिया को आतंकियों के हाथों से इस्तेमाल होने से बचाया जाये क्या इसे सेंसरशिप के दायरे में लाया जाये या नहीं चिन्तन तथा शोध का विषय है। समाचार पत्रों के अलग-अलग विचार होना स्वाभाविक है। किसी एक भाषायी समाचार पत्रों के द्वारा खास विचारधारा या मजहब का प्रतिनिधित्व करना लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता दोनों के लिये नुकसानदायक है। आज देश को महती आवश्यकता हैं आतंकवाद जैसे घृणित एवं राष्ट्रविरोधी विषय पर ईमानदारी से अध्ययन तथा सम्बन्धित विषय एवं घटनाओं के सत्य को समाज में पहुँचाने की तथा जागरूक करने की जिससे राष्ट्र की राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रह सके। समाचार जगत चाहे अपनी वैचारिक शक्ति से राष्ट्र को एक अभेद दुर्ग बना दे या समाज में विघटन का ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें सॉस लेना भी कठिन हो जाये।

Tuesday, February 10, 2009

आतंकवाद का गांधीवादी जवाब

बहुत-से लोग पूछते हैं कि आतंकवाद की समस्या का समाधान करने के लिए क्या गांधीवाद के पास कोई कार्यक्रम है? काश, इस प्रश्न के पीछे किसी प्रकार की जिज्ञासा होती! समाधान वहीं निकलता है जहां जिज्ञासा होती है। जब मजाक उड़ाने के लिए कोई सवाल किया जाता है, तो समाधान होता भी है तो वह छिप जाता है। यह ट्रेजेडी गांधीवाद के साथ अकसर होती है। ज्ञात गांधीवादियों ने भी ऐसी कोशिश नहीं की है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गांधीवाद की झोली में हर समस्या का कुछ न कुछ इलाज जरूर है। दरअसल, वही विचारधारा व्यापक तौर पर स्वीकार्य हो सकती है जिसमें जीवन के अधिकांश प्रश्नों का हल निकालने की संभावना हो। लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जीवन कभी भी समस्यारहित हो सकता है। कोई भी विचारधारा यह जादू कर दिखाने का दावा नहीं कर सकती। इसलिए गांधीवादी भी अपने को सत्य का अन्वेषक ही मानता है -- सत्य का गोदाम नहीं।

जब सामना प्रत्यक्ष हिंसा -- चाहे व्यक्ति द्वारा चाहे हिंसक समूह द्वारा -- से हो, उस वक्त क्या करना चाहिए, इसका कोई तसल्लीबख्श जवाब किसी के भी पास नहीं है। तनी हुई बंदूक के सामने दिमाग फेल हो जाता है। उस वक्त मैदान संवेग के हाथ में आ जाता है। संवेगों को भी प्रशिक्षित करने की सख्त जरूरत है। अन्यथा वे अपने आदिम, अराजक रूप में प्रकट होते हैं और कई लाख वर्ष पुराना हुक्म दुहराते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर है। क्या यह सुझाव सफलता का आश्वासन देता है? संवेग को इससे कोई मतलब नहीं। वह तो उबल रहे खून की आवाज होती है, जिसे भविष्य की कोई फिक्र नहीं होती। अगर हर मामले में र्इंट का जवाब पत्थर से देने की थोड़ी भी संभावना होती, तो र्इंट उठाने का चलन ही मिट जाता। गांधी का रास्ता अहिंसक प्रतिरोध का है, जिसमें आक्रमणकारी के प्रति भी प्रेम रहता है। अगर मानवता का अधिकांश हिस्सा इस जीवन प्रणाली को स्वीकार कर लें, तो हिंसा को मिलनेवाली सफलता का अनुपात बहुत नीचे चला जा सकता है।

जब लोग आतंकवाद के गांधीवादी समाधान के बारे में पूछते हैं, तो उनका आशय यह होता है कि सारी वर्तमान व्यवस्था यूं ही चलती रहे और तब बताओ कि गांधीवादी रास्ता आतंकवाद को खत्म करने का क्या तरीका सुझाता है। यह कुछ इसी तरह का पूछना है कि मैं यही सब खाता-पीता रहूं, मेरी जीवन चर्या में कोई परिवर्तन न आए और मेरी बीमारी ठीक हो जाए। यह कैसे हो सकता है? जिन परिस्थितियों के चलते आतंकवाद पनपा है, उन परिस्थितियों के बरकरार रहते आतंकवाद से संघर्ष कैसे किया जा सकता है? गांधीवाद तो क्या, किसी भी वाद के पास ऐसी गोली या कैप्सूल नहीं हो सकता जिसे खाते ही हिंसा के दानव को परास्त किया जा सके। जब ऐसी कोशिशें नाकाम हो जाती है, तो यह सलाह दी जाती है कि हमें आतंकवाद के साथ जीना सीखना होगा।

आतंकवाद के दो प्रमुख उत्स माने जा सकते हैं। एक, किसी समूह के साथ अन्याय और उसके जवाब में हिंसा की सफलता में विश्वास। दो, आबादी की सघनता, जिसका लाभ उठा कर विस्फोट के द्वारा जानमाल की क्षति की जा सके और लोगों में डर फैलाया जा सके कि उनका जीवन कहीं भी सुरक्षित नहीं है। गांधीवादी मॉडल में जीवन की व्यवस्था इस तरह की होगी कि भारी-भारी जमावड़ेवाली जगहें ही नहीं रह जाएंगी। महानगर तो खत्म ही हो जाएंगे, क्योंकि उनकी कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। लोग छोटे-छोटे आधुनिक गांवों में रहेंगे जहां सब सभी को जानते होंगे। स्थानीय उत्पादन पर निर्भरता ज्यादा होगी। इसलिए बड़े-बड़े कारखाने, बाजार, व्यापार केंद्र वगैरह अप्रासंगिक हो जाएंगे। रेल, वायुयान आदि का चलन भी बहुत कम हो जाएगा, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोग हर समय परिवहन के तहत रहे, यह पागलपन के सिवाय और कुछ नहीं है। वर्ष में एक-दो बार लाखों लोग अगर एक जगह जमा होते भी हैं जैसे कुंभ के अवसर पर या कोई राष्ट्रीय उत्सव मनाने के लिए, तो ऐसी व्यवस्था करना संभव होगा कि निरंकुशता और अराजकता न पैदा हो। इस तरह भीड़भाड़ और आबादी के संकेंद्रण से निजात मिल जाएगी, तो आतंकवादियों को प्रहार करने के ठिकाने बड़ी मुश्किल से मिलेंगे।

लेकिन ऐसी व्यवस्था में आतंकवाद पैदा ही क्योंकर होगा? बेशक हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन संगठित हिंसा की जरूरत नहीं रह जाएगी, क्योंकि किसी भी समूह के साथ कोई अन्याय होने की गुंजाइश न्यूनतम हो जाएगी। राज्य न्यूनतम शासन करेगा। अधिकतर नीतियां स्थानीय स्तर पर बनाई जाएंगी, जिनका आधार सामाजिक हित या सर्वोदय होगा। मुनाफा, शोषण, दमन आदि क्रमश: इतिहास की वस्तुएं बनती जाएंगी। जाहिर है, सत्य और अहिंसा पर आधारित इस व्यवस्था में सांप्रदायिक, नस्ली या जातिगत विद्वेष या प्रतिद्वंद्विता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाएगा। हिंसा को घृणा की निगाह से देखा जाएगा। कोई किसी के साथ अन्याय करने के बारे में नहीं सोचेगा। अभी तक के अनुभवों को देखते हुए यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इस तरह का समाज कभी बन सकेगा या नहीं। शायद नहीं ही बन सकेगा। लेकिन हमें इसकी आशा भी नहीं करनी चाहिए। पूर्णता की कामना ही मनुष्य की किस्मत में है, पूर्णता नहीं। लेकिन इतिहास की गति अगर हिंसा से अहिंसा की ओर, अन्याय से न्याय की ओर तथा एकतंत्र या बहुतंत्र से लोकतंत्र की ओर है, जो वह है, तो कोई कारण नहीं कि ऐसा समाज बनाने में बड़े पैमाने पर सफलता न मिले जो संगठित मुनाफे, संगठित अन्याय और संगठित दमन पर आधारित न हो। केंद्रीकरण -- सत्ता का, उत्पादन का और बसावट का -- अपने आपमें एक तरह का आतंकवाद है, जिसमें तरह-तरह का आतंकवाद पैदा होता है। आतंकवाद सिर्फ वह नहीं है जो आतंकवादी समूहों द्वारा फैलाया जाता है। आतंकवाद वह भी है जो सेना, पुलिस, कारपोरेट जगत तथा माफिया समूहों के द्वारा पैदा किया जाता है, जिसके कारण व्यक्ति अपने को अलग-थलग, असहाय और समुदायविहीन महसूस करता है।

ऐसा नहीं मानना चाहिए कि जिन समाजों में आतंकवाद की समस्या हमारे देश की तरह नहीं है, वे कोई सुखी समाज हैं। एक बड़े स्तर पर आतंकवाद उनके लिए भी एक भारी समस्या है, नहीं तो संयुक्त राज्य अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध विश्वयुद्ध नहीं चला रहा होता। लेकिन जिस जीवन व्यवस्था से आतंकवाद नाम की समस्या पैदा होती है, उससे और भी तरह-तरह की समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमें पारिवारिक तथा सामुदायिक जीवन का विघटन एवं प्रतिद्वंद्विता का निरंतर तनाव प्रमुख हैं। इसलिए हमें सिर्फ आतंकवाद का ही समाधान नहीं खोजना चाहिए, बल्कि उन समस्याओं का भी समाधान खोजना चाहिए जिनके परिवार का एक सदस्य आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। इस खोज में गांधीवाद सर्वाधिक सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मेरा अटल विश्वास है।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

Tuesday, December 09, 2008

क्या ये पहली बार हुआ है?

नाज़िम नक़वी की कलम से आप सब परिचित हैं....मुंबई की घटना के बाद इन्होंने हिंदयुग्म को फोन किया और कहा कि अवाम की ये आग इस बार बुझनी नहीं चाहिए.....उन्होंने हिंदयुग्म पर लगातार प्रकाशित हो रहे काव्यात्मक आक्रोशों को भी ख़ुद से जोड़ा.....चूंकि अब वो हमारे सदस्य भी हैं तो दैनिक भास्कर में छपा ये लेख हिंदयुग्म के पाठकों के लिए भी लाज़मी हो जाता है ताकि जो आतंक के खिलाफ जो अलख इस बार जगी है, उसकी लौ बुझने ना पाए....आमीन.....



कार्टूनः मनु बे-तक्खल्लुस
पहली बार मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद दर्द की जो लहर पूरे देश में है वो देशवासियों के लिये ख़ुशी का पर्याय बन गई है। क्योंकि पहली बार ऐसा हो रहा है कि देश की सुरक्षा में पैदा ख़ामियों पर ग़ुस्सा फूट रहा है। देश के नेताओं को गालियां पड़ रही हैं। ये गुस्सा और ये गालियां नई नहीं हैं। विदर्भ के किसानों की शव यात्राओं में भी ये दोनों बिंब हज़ारों बार दिखाई दिये। गुजरात के दंगों में भी इनसे हमारा साक्षात्कार हुआ लेकिन इनमें वो पैनापन नहीं था। बात भी ठीक है क्योंकि सबसे अहम तो ये है कि गालियां देने वाला है कौन? जी हां इसबार ये गालियां अति विशिष्ट लोगों के मुंह से निकल रही हैं। इस बार ग़ुस्सा उन चेहरों पर है जिन्हें नाराज़ होने का हक़ है। क्योंकि अब तो वो असुरक्षित महसूस कर रहे हैं जिन्हें सुबह से शाम तक सुरक्षा के घेरों में रहने की आदत हैं।
पहली बार ऐसा हुआ है कि आलीशान लोगों की शान में ग़ुस्ताख़ी हुई है। ये वो लोग हैं जिनके लिये संविधान बना, जिनके लिये जल, थल और वायुसेना का गठन हुआ, प्रशासन के तमाम महकमे जिनकी सुविधाओं के लिये पैदा किये गये। ग़ुस्सा इसी बात का है कि फिर इस पूरे ताम-झाम का क्या मतलब है? जब ये उसी चीज़ की गारंटी नहीं दे सकता जिसके लिये इसे पैदा किया गया। मौलिक लोगों के स्वाभाविक अधिकारों का हनन हुआ है इस बार। अब ये बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, ये एलान हो चुका है। हमारी ज़मीन का आसमान हिल गया है। सितारे गर्दिश में हैं। देश की अस्सी प्रतिशत जनता तो पहले भी महफ़ूज़ नहीं थी लेकिन इन हमलों के बाद पहली बार लग रहा है कि देश महफ़ूज़ नहीं है।
पहली बार देश में सार्थक बहस चल पड़ी है कि जिन लोगों को सत्ता सौंपी गई वो इस क़ाबिल ही नहीं हैं कि इसे चला सकें। कोई और मौक़ा होता तो आलीशान लोगों के इन विचारों को वर्तमान सरकार की अक्षमता से जोड़ दिया जाता लेकिन इस बार गालियों के दायरे में हर नेता खड़ा है, क्या माकपा और क्या आरएसएस। और मज़े की बात ये है कि अलग-अलग नस्ल के ये नेता भी अपने ऊपर होने वाले इन हमलों के बाद संगठित होकर अपनी सफ़ाई देने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। किसी को लगता है कि भावनाएं सही थीं लेकिन शब्दों का चयन ठीक नहीं था तो कोई अपने नेता को संयम बरतने की नाकाम सलाह दे रहा है। नेता लोग भी गालियों पर तिलमिला जाते हैं ये देशवासियों ने पहली बार महसूस किया है।
पहली बार ऐसा हुआ है कि आतंक का हमला उन ऐवानों पर हुआ है जिनके दरो-दीवार से देवानंदों, फ़रीद ज़करियाओं और राजदीप सरदेसाईयों की यादें चस्पां हैं तो इसके मायनें भी अलग हैं। खैरलांजी के आदिवासियों और विदर्भ के किसानों की यादों में और इन ख़ास लोगों की यादों में कोई न कोई तो फ़र्क़ है ही। साउथ मुंबई और कोलाबा जैसे सुरक्षित इलाक़े भी अब ख़ौफ़ की बाहों में हैं। आतंकवाद जबतक देश में था और सीरियल ब्लास्ट के शक्ल में, ट्रेन ब्लास्ट की सूरत में, हैदराबाद और अक्षरधाम के रूप में, दिल्ली – जयपुर – मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस के चेहरों से झलक रहा था तब तक ये सिर्फ़ अफ़सोसनाक था, एक बुरी ख़बर था, मसरूफ़ लोगों के विशिष्ठ कामों में ख़लल डालने जैसा था लेकिन अब देश के असरदार लोगों को पहली बार महसूस हो रहा है कि आतंकवाद तो उनके घर तक पहुंच गया है।
अब ये ख़ास लोग देश के नेताओं से, हुक्मरानों से ये पूछते हुए दिखाई दे रहे हैं कि–
क्या है हमारे सब्र की मंज़िल बताइये।
वो लोग तो हमारे मकां तक पहुंच गये।।
सिर्फ़ मुंबई ही नहीं, पहले भी हादसों से देश के कई हिस्से लहूलुहान हुए हैं, लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि हमारे नेताओं की क़ाबिलियत पर, नौकरशाही पर और पुलिसिया निज़ाम पर इतने तीखे प्रहार किये गये हों। देश के हुक्मरान और नोकरशाही तो पहले भी अक्षम थे, अपनी याददाश्त पर जोर डालिये तो पूर्व में हुए हर हमले के बाद ज़ख़्मी शहरों के दोबारा उठ खड़े होने की हिम्मत को सलाम किया जाता रहा है और इसी बुनियाद पर ये बताने की पुरज़ोर कोशिश होती रही है कि आतंकवादी अपने नापाक हौसलों में कभी भी कामयाब नहीं हो पायेंगे। लेकिन 26/11 की बात ही कुछ और है, इस हमले में पहली बार आतंकवादी अपने मंसूबों में न सिर्फ़ कामयाब हो गये हैं बल्कि नेता नाक़ाबिल, नौकरशाही बेढंगी और पुलिस तंत्र अशक्त हो चुका है।
ये बात अलग है कि मुंबई हादसे में बांबे वीटी और चौपाटी पर कीड़ों की तरह गोलियों का शिकार हुए लोग सुर्ख़ियों में नहीं हैं फिर भी देशवासियों के लिये ये सुकून की बात है कि पहली बार ज़ख़्म छुपाये नहीं जा रहे हैं, चीख़ें घोंटी नहीं जा रही हैं, आंसू रोके नहीं जा रहे हैं।
ज़ख़्म अभी गहरा है, मुंबई के नारीमन हाउस, ताज और ओबरॉय होटल्स का ख़ून अभी ताज़ा है इसलिये इनसे जुड़ा हुआ ग़म और ग़ुस्सा भी अभी थमा नहीं है। जो लोग पहले से ही असुरक्षित थे वो इन नये असुरक्षितों के साथ तो स्वाभाविक रूप से शामिल हैं ही और उन्हें लग भी रहा है कि शायद (यक़ीन नहीं है) इस बार देश आतंक की इस महामारी से निपटने के लिये कोई पुख़्ता और कारगर क़दम उठाये। एक फेडेरल एजेंसी बनाने की बात भी हो रही है। हर उस देशवासी के लिये ये ख़बरें ख़ुशी की सौग़ात हैं जिनकी आंखों के आंसू भी अब सूख चुके हैं।
मुंबई हादसे के बाद देश कई चीज़ें पहली बार महसूस कर रहा है। और पहली बार उसे ये समझने में भी कोई दिक़्क़त नहीं हो रही है कि हर ख़ून एक जैसा नहीं होता, दर्द की भी अलग-अलग मर्यादाएं होती हैं, हर चीख़ का पैमाना एक नहीं होता, हर आंख से निकलने वाले पानी को आंसू की संज्ञा नहीं दी जा सकती। 24 साल पहले जब किस ने कहा था कि " जब कोई कद्दावर पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है" तो हमने एक स्वर में उसे नकारा था। लेकिन अब पहली बार उसकी प्रधानता को मानना पड़ेगा और इसी बुनियाद पर पहली बार ये संभावनाएं भी ताक़त पा रही हैं कि देर सवेर हमारा ग़म और तुम्हारा ग़म की सरहदें भी खिंचेंगी।


नाज़िम नक़वी
naqvinazim@yahoo.com

दैनिक भास्कर से साभार