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Friday, March 26, 2010

मध्य प्रदेश का दुर्भाग्य

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का नया कारनामा. अब स्कूल में बच्चों को गीता पढना ज़रूरी है. क्या बात है, ये फैसला करके उन्होंने भगवान् कृष्ण से अपने लिए बहुत कुछ डिमांड कर डाला होगा, आखिर हमारे यहाँ धर्म का मतलब आम तौर पर मन्नत मांगना ही तो होता है और हमारे मुख्यमंत्री तो 'सिर्फ धार्मिक' ही हैं. ये अपने आप में एक बड़ा विषय है जिसके बारे में बाद में बात करेंगे, फिलहाल हम वापस अपने प्रिय मुख्यमंत्रीजी पर वापस आते हैं. गीता तो आपने थोप दी लेकिन क्या आपको खबर है कि जो पढाई ज़रूरी है एक बच्चे को आगे बढ़ने के लिए वो भी हो रही है या नहीं? स्वाभाविकतः नहीं, वरना मध्यप्रदेश को देश के सबसे पिछड़े राज्यों में एक नहीं गिना जाता. ये तथ्य है कि मध्यप्रदेश के बच्चों को बाहर जाकर प्रतियोगिता करना भारी पड़ता है. लेकिन मुख्यमंत्रीजी को इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि उन्होंने इतना सोचा भी होगा मुझे नहीं लगता. उनके अब तक के कार्यकाल में उन्होंने जो भी काम किये हैं वे उनकी बेहद सतही सोच को ही दर्शाते हैं. वो एक मुख्यमंत्री की तरह नहीं बल्कि किसी मोहल्ले की गणेश मंडली के अध्यक्ष की तरह सोचते हैं और राज्य को गणेश मंडल की तरह चला रहे हैं. स्कूलों में गीता पढ़वाएंगे लेकिन शिक्षक की जो फटीचर हालत है वो नहीं देखेंगे. प्राथमिक स्कूल के शिक्षक को एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम मेहनताना मिलता है उसमे वो क्या शिक्षा देगा बच्चों को. सच्चाई तो ये है कि जो आदमी किसी भी काम के योग्य नहीं होता (शिक्षक बनने के भी ) वो शिक्षक बन जाता है. सभी हारे हुए और अयोग्य लोग शिक्षा देने के धंधे में लगे हुए हैं तो कोई आश्चर्य नहीं कि पूरे राज्य की तस्वीर भी ऐसी ही है. मुख्यमंत्री भी ऐसे ही शिक्षकों का परिणाम लगते हैं जिन्होंने शिक्षा में विचार को कभी जगह ही नहीं दी. वैसे तो मुख्यमंत्रीजी बहुत ही लचीले हैं जिन्होंने कभी कोई मजबूत फैसला नहीं लिया लेकिन अब तक जिन बातों पर वे कड़क हुए हैं वे उनकी सोच के दीवालियेपन को ही दिखाती हैं. बानगी देखिये - जब राज्य में १ महीने तक बारिश नहीं होती तो वे महांकाल के मंदिर में जाकर ५०००० पंडों के साथ भोजन करते हैं और भगवन को बारिश की अर्जी देते हैं. अब एक आम आदमी को इस तरह की हरकत के लिए मूर्ख होने का तमगा देकर माफ़ किया जा सकता है लेकिन एक राज्य के मुखिया को नहीं. लेकिन इस एक काम के सिवा मुख्यमंत्रीजी ने पानी के मुद्दे पर कोई विचार नहीं किया, उन्हें अब भी पानी का मेनेजमेंट पूरी तरह भगवन के हाथ में ही लगता है, उन्हें ये पता ही नहीं है कि हमें ही कुछ नियम बनाने होंगे, कुछ कदम उठाने होंगे ताकि सही समय पर बारिश हो और पर्याप्त हो. मालवा में भूमिगत जलस्तर भयावह स्थिति में है लेकिन वे बेखबर हैं उन्हें लगता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि भगवन विष्णु अपने नाग पर नीचे बैठे हैं जो पानी कम नहीं होने देंगे. राज्य में पेडों की कटाई कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि उन्हें लगता ही नहीं कि ये किसी काम के हैं. दूसरी ज़ोरदार आवाज़ उन्होंने उठाई थी एक मसाज सेंटर के बोर्ड के खिलाफ....?????....क्या कर रहे हैं ये आप? आपको राज्य की बागडोर इन ओछे कामों के लिए नहीं सौंपी गई है. आपका राज्य बहुत बहुत पिछड़ा हुआ है, कभी अपने कुए से बाहर निकल कर देखिये कि दुनिया बहुत बड़ी है. अपने आप को ऊपर उठाइये, अपने कुए को और गहरा मत खोदिये. लाडली लक्ष्मी योजना को क़ानून बनाने के लिए वे बहुत आक्रामक नज़र आये लेकिन राज्य में जो गुंडों का साम्राज्य फ़ैल गया है (जिसके आका उन्ही कि पार्टी और सरकार के लोग हैं) उस पर गौर करना उन्हें ज़रूरी नहीं लगता. जहाँ भी कोई सोच-समझ से सम्बंधित मुद्दा सामने आता है वे केंद्र सरकार के ऊपर पूरी जिम्मेदारी डाल कर सो जाते हैं. ८ साल हो गए हैं उनके शासन को लेकिन प्रदेश में बिजली की समस्या में रत्ती भर भी सुधार नहीं आया है बल्कि हालात और भी बदतर हुए हैं. पहले सर्दियों में तो बिजली मिल जाती थी अब तो पूरे साल बिजली मेहमान कि तरह आती है. लेकिन ये समस्या केंद्र सरकार कि है, हम तो बस मंदिर जायेंगे और धर्म बचायेंगे तो भाई पुजारी बन जाओ मुख्यमंत्री बन कर इतने लोगों की ज़िन्दगी क्यों खराब करते हो? कहने को तो उन्होंने अपनी एक वेब साईट भी बनाई है और उस पर नागरिक अपनी समस्याएँ बता सकते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की कोई कभी उसे देखने की ज़हमत भी उठाता होगा क्योंकि उनके आस-पास के लोग भी तो उभी की तरह के होंगे न जो भगवन भरोसे काम कर रहे हैं. मैंने कई बार उस पर पत्र लिखे लेकिन मुझे आज तक कोई जवाब नहीं आया.
हाँ, एक काम ज़रूर हो रहा है कि इंदौर में सड़कें बन रही हैं लेकिन शासन ऐसे लोगों के हाथ में है जो दूर तक कुछ सोच ही नहीं पाते या यूँ कहें कि सोच ही नहीं पाते. जब सड़के बनाई जाती है तो हर एक पहलु पर विचार किया जाता है. यहाँ सड़कें बन रही हैं लेकिन बारिश का पानी कहाँ जाएगा ये किसी ने नहीं सोचा. पानी कि निकासी कि कोई व्यवस्था नहीं है. सब तरफ कंक्रीट बिछा दिया है लेकिन ज़मीन में पानी कैसे जाएगा ये नहीं सोचा. नतीजा बारिश का पानी ज़मीन के अन्दर नहीं जाता, ज़मीन में पानी का स्तर कम होता जा रहा है. सड़कें बनाने के लिए बेहिचक हज़ारों पेड़ काट दिए जाते हैं लेकिन वापस पौधे लगाने के बारे में कोई नहीं सोचता. आश्चर्य तो ये है कि लोग भी ऐसा नहीं मानते कि सड़कों के आस-पास पेड़ होने चाहिए.
लेकिन जनाब नेता भी कोई आसमान से नहीं उतरता, वो भी जनता के बीच का ही एक आदमी होता है और मोटे तौर पर उसी जनता का चेहरा होता है. यथा राजा तथा प्रजा या यथा प्रजा तथा राजा. मध्य प्रदेश के लिए दोनों ही उक्तियाँ सही हैं. यहाँ जनता भी उलटे-सीधे गोरखधंधों में ही अपना समय ख़राब करती है, जो मुद्दे वास्तव में मुद्दे हैं उनसे उन्हें कोई सरोकार नहीं, फिर चाहे वो उनके अपने ही हित में क्यों न हो.

-अनिरुद्ध शर्मा

Saturday, August 29, 2009

50 हज़ार पंडों के पेट में बादल की फैक्ट्री !


स्वाहा...

हमारे मध्यप्रदेश ने कमाल कर दिया और अब तक किसी को पता भी नहीं चला. देश भर में बारिश को लेकर चिंता फैल रही है, सब बादलों की ओर टकटकी लगाये हुए हैं. वैज्ञानिक चिंतित हैं कि कैसे बारिश होगी, पर्यावरणविद पर्यावरण के नष्ट होने की दुहाई दे देकर खुद मुरझा गए हैं, लेकिन हमारे प्रदेश के लोगों ने और सरकार ने रास्ता खोज लिया है. जब भी हमें बारिश करवानी होती है, हम बस एक यज्ञ या हवन करते हैं, किसी अफीमची पुजारी को घोड़े पर बैठाते हैं, डीजे वाली गाडी आगे चलाते हैं और फुरसती लड़कों को उसके आगे नचा-नचाकर जुलूस निकालते हैं. अगले दिन बहुत संभव है कि १०-१५ लीटर पानी बरस जाए. अगर बरस गया तो अफीमची अपने संत होने को खुद भी सच मानकर ख़ुशी में और अफीम पीता है और नहीं बरसा तो भगवान की मर्ज़ी.
क्या गाँव क्या शहर, हमारे प्रदेश के सारे निवासियों की समझ एक सी उर्वर है. और विकसित शहरों की तरह वे ट्रैफिक जाम आदि भौतिक समस्याओं को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते, वे तो किसी भी व्यस्ततम मार्ग पर भजन-कीर्तन करने बैठ जाते हैं. सच है, भाई तुम्हारा ट्रैफिक बड़ा कि पानी...और हमारे भजन-कीर्तन से जो पानी बरसेगा उसका तुम उपयोग नहीं करोगे क्या? फिर खड़े रहो एक घंटे और भजन सुनो.
अभी आप देखेंगे तो प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में रोज़ यज्ञ होते हैं और यही वजह है कि कभी-कभी बूंदा-बंदी हो जाती है क्योंकि भगवान् को 'अपने वाले' का ध्यान तो रखना पड़ता है न? मैं तो कहता हूँ कि हमारे मुख्यमंत्रीजी को इस युक्ति का पेटेंट करवा लेना चाहिए वरना अगर अमेरिका को पता चला तो वो करवा लेगा. फिर वहां यज्ञ-हवन से बारिश होगी और आपको इसके लिए उनकी अनुमति लेनी होगी.
बात निकली है तो हमारे पूज्यनीय मुख्यमंत्रीजी का भी गुणगान कर ही लेता हूँ. बहुत भले पुरुष हैं, उनकी नाक के नीचे लोग करोडों का हेर-फेर कर देते हैं लेकिन वे प्राणी मात्र में ईश्वर को देखते हुए उसे उनका भोग समझ कर धन्य हो जाते हैं. वे भी जनता की ही फ्रीक्वेंसी के हैं, वे भी पेड़-पौधों इत्यादि के चक्कर में नहीं पड़ते, ग्रीन हाउस इफेक्ट और ग्लोबल वार्मिंग तो शब्द ही अंगरेजी हैं और उनकी तो पार्टी ही स्वदेशी वाली है इसलिए इस पर तो वो नज़र भी नहीं डालते. और वे बारिश ना होने से चिंतित भी हैं, हालांकि उनके फोटो देखकर आप उन्हें दुनिया का सबसे खुश इंसान समझने की भूल भी कर सकते हैं. वो तो उन्हें फोटो खिचवाने का बचपन से ही शौक है इसीलिये पूरे प्रदेश में उनके बड़े-बड़े पोस्टर दिखाई देंगे.
हाँ, तो मैं कह रहा था कि वे बारिश ना होने से चिंतित हैं और मुखिया होने के नाते उन्हें इस समस्या के हल के लिए कुछ करना था. उन्होंने अपने सहयोगियों से सलाह-मशविरा किया. सहयोगी भी एक से बढ़कर एक धार्मिक पुरुष. किसी ने कहा गौ माता की पूजा करनी चाहिए, किसी ने कहा किसी संत को पकड़कर तपस्या करवा दो जब तक बारिश ना हो, फिर किसी ने बताया कि प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में सिर्फ महात्मा ही निवास करते हैं और उन महात्माओं ने बारिश की खातिर एक साथ बैठकर भोजन करना स्वीकार किया है. सो मुख्यमंत्रीजी अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर उज्जैन महाकाल मंदिर पहुचे जहाँ ५० हज़ार चिंतित पण्डे भोजन के इंतज़ार में थे क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि पण्डे के पेट से ही हर चीज़ बनती है. इतने पण्डे जब जीम लेंगे तो इस हलुवा, पूडी, खीर आदि से पंडों के पेट में बादल बनाने लगेंगे और अंततः वही बारिश करवाएंगे. ये खोज सच में विज्ञान की बड़ी से बड़ी खोज पर भारी है. तो हमारे मुखियाजी भी अपने पेट में बादल की फैक्ट्री बनवाने मंदिर जा पहुचे. वहां ५० हज़ार पंडों ने जम कर खाया ताकि बादल बनाने में कमी ना हो. फिर मुख्यामंत्रेजी इस समस्या के सुलझ जाने से प्रसन्न हो कर और भगवान् को धन्यवाद देकर घर चले गए. ये इस बीमारू प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि सारे पंडों को एक साथ कब्ज हो गई और पेट में बादल नहीं बन पाए, और बने भी तो बाहर नहीं निकल पाए.
वैसे हमारे मुख्यमंत्रीजी बहुत धार्मिक व्यक्ति हैं. उनका मानना है कि इंसान की क्या औकात है जो वो कोई समस्या सुलझा ले, जो करता है वो ईश्वर करता है. इसीलिए वे सारी समस्याएँ उसी को पास कर देते हैं, एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे प्रदेश का मुख्यमंत्री ईश्वर है. एक और बात वे कहना नहीं भूलते जब भी उनके सामने कोई समस्या लाई जाए कि केंद्र हमारी मदद नहीं कर रहा, इस तरह से हम एक केंद्र शासित प्रदेश भी हैं.
स्कूलों में शिक्षा बद से बदतर हो गई है, वो दे या ना दें लेकिन भोजन के पहले की प्रार्थना अनिवार्य है क्योंकि असली ज्ञान तो उसी से मिलेगा बाकी सब तो टाइम पास है. प्रदेश में बिजली नहीं है, नहीं क्या है बिलकुल भी नहीं है लेकिन आप ही सोचिये अँधेरा तो भगवान् ने बनाया है और ट्यूबलाइट किसने बनाई??? इंसान ने... तो अब ये बताइये कि इंसान बड़ा या भगवान्?? अब जवाब तो एक ही हो सकता है...तो लो हो गई हल समस्या, तुम क्या भगवान् से बढ़कर हो? क्यों बिजली के लिए रोते हो? उसी ने अँधेरा दिया है वही रौशनी देगा.
कुछ लोग होते ही हैं विध्नसंतोषी और वे ही कभी-कभी सांसारिक बातों का रोना रोते रहते हैं, कहते हैं इंदौर में हर तरफ गन्दगी हो रही है, जिधर देखो सड़ा हुआ पानी, मच्छर, कचरा...अब बताइये कितने निम्न स्तर पर जी रहे हैं ये लोग... पानी भगवान् ने बनाया और उसी ने सड़ाया...और मच्छर क्या किसी कंपनी में बनाते हैं? कभी सुना रिलायंस के मच्छर टाटा के मच्छर...? मच्छर भी तो भगवान् की देन हैं. और कचरे का क्या है...पुराने ज़माने में ऋषि-मुनियों के ऊपर तपस्या करते-करते इतनी मिट्टी जम जाती थी कि वे दिखाई देना बंद हो जाते थे और तुम इतने से में हाय-तौबा मचाने लगे? सचमुच कलयुग है. अरे कभी रामानंद सागर की रामायण देखी है? भगवान् के हाथ में से एक रौशनी निकलेगी और सारा कचरा भस्म...तुम बस पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन करते रहो.
तो ऐसे हैं हमारे लोग और नेता. सबके सब महापुरुष. धन्य हैं वे लोग जो अब तक संसार को असार समझ कर, सब उसके भरोसे छोड़कर भजन-कीर्तन में मस्त हैं.
शत-शत नमन.

अनिरुद्ध शर्मा

Wednesday, July 08, 2009

हम ख़बर हैं, बाक़ी सारा भ्रम है...



मुर्गी ने आदमी के बच्चे को जन्म दिया है। सुनने में आपको थोड़ा अटपटा ज़रूर लगेगा, लेकिन ये ख़बर आई है मध्य-प्रदेश के रायसेन शहर से। एक टीवी चैनल पर ये ख़बर चलने के बाद दूसरे चैनलों के पत्रकार भी इसे कवर करने दौड़ पड़े। बिना ये जांच-पड़ताल किये, कि क्या एक मुर्गी भी इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। मज़े की बात ये है कि इस पर किसी ने अपना दिमाग लगाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। मामला मध्य प्रदेश में रायसेन के एक गांव बाड़ीकला का है। जहां से ख़बर आई कि यहां रहने वाले पतिराम नाम के शख्स के घर मुर्गी ने एक इंसान के बच्चे को जन्म दिया है। इस ख़बर के आने के बाद मीडिया वाले दौड़ पड़े। लेकिन डॉक्टरों के साथ ही आम लोगों का दिमाग भी चकरा गया। हर कोई ये सोच रहा था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है। मेरे चैनल में भी ये ख़बर आई, तो मैं भी इसे सुनकर चौंक गया। पहले तो ख़बर की आपा-धापी में यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन जब इसकी तस्वीरें देखीं, तो माजरा समझते देर नहीं लगी। मुर्गी के साथ एक इंसान का चार इंच का भ्रूण दिख रहा था। जिसको लेकर ये दावा किया जा रहा था कि इंसान के इस बच्चे को मुर्गी ने ही जन्म दिया है। लेकिन मुर्गी को देखकर तरस आ रहा था, बेचारी अपने हाल पर बेबस थी, कैमरे की निगाहों के साथ ही उसे ज़माने की नज़रों का सामना भी करना पड़ रहा था। बेज़ुबान परेशान थी, अपनी सफ़ाई में क्या कहे, किससे कहे और कैसे कहे। कैसे लोगों को बताए कि इसमें उसका कोई कसूर नहीं है, बल्कि इसका पापी तो कोई और है, जो अपने गुनाहों पर पर्दा ढकने के लिए मेरे दड़बे में इस भ्रूण को रखकर चला गया है। लेकिन जैसे लोग नासमझ थे, वैसे ही मुर्गी भी लाचार थी। उसका मासूम चेहरा देखकर उस बेचारी पर तरस आ रहा था। जो ख़ता उसने की ही नहीं उसका इल्ज़ाम उसके मत्थे मढ़ दिया गया था। और तो और उसका मालिक भी इस ख़बर को कैश कराने में लगा था। मुर्गी बेचारी के हर एंगल से शॉट्स बनाए जा रहे थे। वो तो बस नहीं चला, अगर मुर्गी बोल पाती, तो शायद उससे तमाम तरह के बेतुके सवाल भी पूछ लिए होते। हो सकता है कोई ये भी पूछ लेता, कि इस बच्चे का बाप कौन है? डॉक्टर भी बेचारे बोल-बोलकर परेशान थे, कि कुदरत के नियम में इस तरह का कोई खिलवाड़ नहीं हो सकता। भला मुर्गी भी कहीं इंसान के बच्चे को जन्म दे सकती है। लेकिन सुनने को कोई तैयार ही नहीं था। ये किस्सा बिल्कुल ऐसा ही था, जैसे हमने जर्नलिज्म में पढ़ा था कि अगर कुत्ता आदमी को काटे तो ख़बर नहीं है, लेकिन अगर आदमी कुत्ते को काटे तो ख़बर बन जाती है।

अबयज़ खान

Tuesday, May 12, 2009

मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और भारतीय मतदाता

मैं जब कभी लोगों से राजनीति के बारे में बात करता हूँ या किसी फोरम में लोगों के कमेंट्स पढता हूँ तो एक बात बहुत ही शिद्दत से उभर कर आती है, लोगों का पार्टी प्रेम। मैं हैरान हूँ, यहाँ तक कि हैरानगी की हद तक चला गया हूँ। इन लोगों के लिए समझ क्या बाहर से आयात करनी पड़ेगी?
जब किसी का ध्यान किसी क्षेत्र विशेष की समस्याओं पर दिलाया जाये तो वो उस पार्टी को गालियाँ देने लगता है जिसके खिलाफ वो आज तक वोट करता आया है। कल ही मैं एक वेबसाइट पर एक लेख पढ़ रहा था जिसमें मध्यप्रदेश की बदहाली का ज़िक्र और सीएम साहब से कुछ सवालात किये गए थे। उसमें नीचे पाठकों की टिप्पणियाँ थीं। सिर्फ ३ या ४ लोगों ने समझदारी की बात कही थी बाकी सारे लोग वाहियात सी बातें कर रहे थे। चूंकि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है, वहां पर लोग लेखक को कांग्रेस का एजेंट साबित करने पर तुले हुए थे। उस बेचारे ने जो हाल देखा वो लिख दिया और इन लोगों को बिना बात की मिर्ची लग गई। एक महाशय लिखते हैं कि आप कांग्रेस शासित राज्यों में जाकर देखिये वहां क्या हुआ है? अरे मेरे भाई, तेरे घर में खाना नहीं होगा तो क्या तेरा पेट इसलिए भर जायेगा कि दूसरे के घर में भी खाना नहीं है? अजीब बातें करते हैं लोग, पता नहीं क्यों इस लोकतंत्र में लोक ही किसी काम का नहीं है, शायद इसीलिए लोकतंत्र भी किसी काम का नहीं रहा। मैं मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे से हूँ। इतना छोटा भी नहीं, तहसील है। मैंने वहां अपने बचपन से लेकर आज तक हमेशा अँधेरा ही देखा है, बिजली थोड़ी देर ही आती है, सड़कें हमेशा ख़राब ही रहीं हैं लेकिन ये कांग्रेस बीजेपी के पिट्ठू अपनी वफादारी साबित करने में लगे रहते हैं। अरे यार तू ये देख न कि तेरी समस्या कौन हल करता है, नहीं लेकिन, मर जायेंगे पर पार्टी को वोट देंगे। यहाँ तक कहते हैं लोग कि फलां पार्टी से अगर कोई कुत्ता भी खड़ा होता है तो हम उसी को वोट देंगे और ऐसी बेशर्मी की बातें ये लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं। बताइये अब कहाँ जायेगा ये देश ऐसे बेवकूफों के हुजूम के साथ? यही वजह है कि कोई नेता कुछ नहीं करता, पता है कि ये बेवकूफ ऐसे ही मुट्ठी में है, और नहीं होंगे तो एक-आध मंदिर-मस्जिद का झुनझुना और पकड़ा देंगे। बिजली नहीं है, पानी नहीं है, सड़कें नहीं हैं, ज़माने भर की समस्याएँ हैं लेकिन पार्टी का पट्टा गले में डाले रहते हैं। ६० साल से ज्यादा हो गएँ हैं जब अँगरेज़ हमें छोड़ गए थे लेकिन हमारे लोग बड़े ही नहीं हो रहे ... | क्या आप बता सकते हैं कोई हल... ?

--अनिरूद्ध शर्मा