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Friday, September 11, 2009

उम्र की उल्टी गिनती पर बनी एक सीधी-सादी फिल्म


हॉलीवुड और बॉलीवुड की बहस बहुत पुरानी है और अक्सर लोग हॉलीवुड को हर तरह से बेहतर बताते हुए लम्बी-चौडी बहस करते हैं लेकिन यही लोग यहां पर बनी अच्छी फिल्म को सिरे से नकार देते हैं, ये कहकर कि यार फिल्म हल्की-फुल्की होनी चाहिये. दरअसल ये फर्क फिल्मों का नहीं, सोच का है और सोच से ही बनती है फिल्में. सिर्फ फिल्में ही नहीं ये फर्क जीवन के हर क्षेत्र में नज़र आता है चाहे वो खेल हों, विज्ञान हो या रोज़मर्रा के काम ही हों, हमारी जनता और उन्की जनता की सोच में बहुत अन्तर है. वहां लोग नये प्रयोगों के लिये हमेशा खुले होते है, और उसे प्रोत्साहित करते हैं जबकि हमारे यहां अधिकतर मानसिकता एक बंधी हुई लीक पर चलने की है, सदियों से जो निजाम चलता आया है वही चलेगा. उससे अलग जाने वाले को खामियाज़ा भुगतना पडता है. जीवन यापन के लिये अपना पेशा चुनने के वक्त भी आदमी इस लीक को छोड नहीं पाता है. यहां हर बच्चा डॉक्टर या इन्जीनियर बनने के लिये ही जन्म लेता है. यही कारण है कि हमारे यहां फैन्टेसी नही बनती हैं और वहां 'लॉर्ड ओफ द रिन्ग्स' के तीन सफल भाग बन जाते हैं.

खैर हम इस बहस में ज्यादा गहरे न उतरते हुए मुद्दे की बात पर आते हैं. मुद्दा है आज की फिल्म 'द क्यूरियस केस ऑफ बेन्जामिन बटन' जिसका विषय बिल्कुल नया है और साहसिक है. फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो बूढा ही पैदा होता है और समय के साथ उसकी उम्र घटती जाती है... फिल्म की शुरुआत होती है द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के दिन से. उस रात एक बच्चा पैदा होता है जिसके पैदा होने के बाद उसकी मां की मौत हो जाती है. उसका पिता एक अमीर व्यवसायी है. वो जब उस बच्चे को देखता है तो उसे बेइन्तहां घृणा होती है, बच्चे के पूरे शरीर पर झुर्रियां हैं जैसे किसी 80 साल के बूढे के शरीर पर होती हैं. पिता उसे रात में एक वृद्धाश्रम में छोड देता है. वृद्धाश्रम की मालकिन एक बहुत ही सहृदय स्त्री है जो पहले ब्च्चे को देख कर घबराती है लेकिन फिर सहानुभूतिवश उसे अपने पास रख लेती है. सबको लगता है कि बच्चा मरने वाला है लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे वो बडा होता है उसकी झुर्रियां कम होती हैं और शरीर की सारी समस्याएं खत्म होती जाती हैं. वो आंख खोलने के बाद ही से वृद्धों के बीच ही रहता है और उनसे ही उसकी मित्रता होती है. अजीब अहसास से गुज़रता है वो जब एक-एक करके उसके दोस्त दुनिया से विदा होते जाते हैं और उसकी उम्र कम होने लगती है.

ऐसी ही एक वृद्ध दोस्त की 5 साल की पोती कुछ दिनों के लिये वहां रहने आती है. उसकी दोस्ती बेन्जामिन से होती है, पहले ये दोस्ती एक बुजुर्ग व्यक्ति की दोस्ती होती है लेकिन यही दोस्ती आगे चलकर प्रेम बन जाती है. प्रेम कहानी को बहुत ही सुंदर ढंग से कहानी में गूंथा गया है. लडकी की उम्र बढती है और बेन्जामिन की उम्र घटती है. इस दौरान बेन्जामिन एक बोट पर नौकरी कर लेता है और कईं बरस बोट पर ही बिताता है जीवन के बहुत से उतार-चढावों से गुज़र कर वापस अपने घर, उसी वृद्धाश्रम में जाता है. ये वो वक्त है जब उसका बुढापा पूरी तरह से जा चुका है और वो एक खूबसूरत नौजवान है. यहां वो फिर से उसी लडकी से मिलता है जिसे वो हमेशा याद करता रहा है. दोनों शादी कर लेते हैं और उन्हें एक बच्ची भी होती है लेकिन बेन्जामिन अपनी घटती हुई उम्र से चिन्तित है, उसे लगता है कि जब उसकी बच्ची को एक पिता की छाया की ज़रूरत होगी, वो खुद इस हालत में होगा कि उसकी देखभाल के लिये किसी की ज़रूरत हो और उसकी पत्नी को 2 बच्चे पालने पडेंगे. वो अपनी पत्नी को बच्ची की सही परवरिश के लिये दूसरी शादी करने की सलाह देता है और एक दिन अपना सब कुछ बच्ची के नाम करके कहीं चला जाता है. कई साल इधर-उधर भटकने के बाद अन्त में वो फिर अपने घर पहुंचता है और अपनी पत्नी की गोद में दम तोडता है.

फिल्म फैन्टेसी ना होते हुए एक भावनात्मक कहानी है. निर्देशक ने बडी ही खूबी से एक असामान्य आदमी और उससे जुडे लोगों की भावनाओं को प्रदर्शित किया है. फिल्म दिल को छूती है. बेन्जामिन के रूप में ब्राड पिट ने दिल जीत लिया. उनकी पहचान एक स्टाइलिश हीरो की है लेकिन उन्होने बेन्जामिन के गहरे मनोभावों को जिया है. दाद दी जानी चाहिये मेक-अप मैन को जिसने बेन्जामिन की हर उम्र को इतनी स्वाभाविकता से दिखाया है. फिल्म का विषय बहुत बडा था जिसकी वजह से ऐसा लगता है, अन्त में इसे बहुत जल्दी समेट लिया गया. फिल्म एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिये.

मैं इसे 5 में से 4 दूंगा

अनिरुद्ध शर्मा

Tuesday, March 10, 2009

खुशी चाहिए या प्रसन्नता....

इधर दो घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने हिन्दी-उर्दू के सवाल पर मुझे झकझोर दिया। "पंचायती राज अपडेट' में मेरी संपादकीय सहयोगी ने एक समाचार बनाते समय झंडारोहण शब्द का प्रयोग किया था। कॉपी हाथ में आते ही मैंने झंडारोहण को काट कर ध्वजारोहण लिख दिया और उसे समझाया कि सामान्यत: तद्भव और तत्सम शब्दों के बीच संधि नहीं होती। मैं उसका अफसर था, इसलिए या वह मुझे हिन्दी का जानकार समझती है, इसलिए उसने मेरे संशोधन को स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं मानता हूं कि भाषा में अफसरी नहीं चलती। यह दावा तो मेरी कल्पना में भी नहीं आता कि मैं हिन्दी का जानकार हूं। अत: मैं सोचने लगा कि झंडारोहण में बुराई क्या है। मेरी धारणा है कि हिन्दी तद्भव-प्रधान भाषा है। अगर कोई दूसरी भाषा उसके साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ती है, तो वह उर्दू है। उर्दू यानी उसके वे लफ्ज जो आम बोलचाल में आ गए हैं। उम्र हिन्दी में चलता है, पर आब नहीं। उर्दू शब्दों के भी तद्भव रूप होते हैं -- जिसे हम खामखा कहते हैं, वह उर्दू में ख्वाहमख्वाह है। लेकिन बहुत समय से हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने का एक अटूट सिलसिला चला आ रहा है, जिससे हिन्दी का नुकसान हुआ है। जो हिन्दी लोक भाषा थी, उसका एक हिस्सा विद्वानों का, विद्वानों के द्वारा और विद्वानों के लिए हो गया। इसका कुछ उपचार होना चाहिए।
दूसरी घटना का संबंध हाल ही में पढ़ी एक कहानी में प्रेमी-प्रेमिका संवाद से है। प्रेमिका कहती है, मैं हमेशा तुम्हें खुश रखने की कोशिश करूंगी। इस पर प्रेमी कुछ नाराज हो जाता है। वह कहता है, इस तरह की घटिया बात मेरे दिमाग में आ ही नहीं सकती। खुश रखना तो नौकरों या तवायफों का काम है। इस पर प्रेमिका हंसने लगती है; कहती है -- तुमने हिन्दी में पीएचडी कर ली है, पर रहे पंडित के पंडित। चलो, मैं तुम्हें हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास करूंगी। इस पर प्रेमी सोच में पड़ जाता है। क्या खुश और प्रसन्न तथा खुशी और प्रसन्नता एक ही चीज नहीं हैं? फिर खुशी कैसे तुच्छ भौतिकवादी चीज और प्रसन्नता कैसे ऊंची और उदात्त चीज हो गई? कुछ देर सोचने के बाद वह प्रेमिका से कहता है, लेकिन मैं तो तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहूंगा। लड़की हंस पड़ती है। बोलती है, यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।
हिन्दू-मुसलमान एकता की चर्चा हमारे देश में काफी समय से चली आ रही है, पर हिन्दी-उर्दू एकता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। हिन्दी में शुद्धतावाद का आग्रह अभी भी बरकरार है। जो शुद्धतावादी हैं, वे इनसान कभी नहीं लिखेंगे, हमेशा मनुष्य ही लिखेंगे। जो कुछ उदार हैं, वे कहेंगे कि इनसान भी कम हिन्दी नहीं है। मैं इससे एक कदम आगे जाना चाहता हूं और जिस आदमी की कोई इज्जत नहीं है, उसे इज्जतहीन या इज्जतविहीन लिखने की इजाजत चाहता हूं। जहां हिन्दी और उर्दू की संधि बहुत खराब लगेगी, ऐसे मामलों को अपवाद मान लेना चाहिए, जैसे आजादिओत्तर (तूफानोत्तर या बाढ़ोत्तर राहत का स्वागत है)। लेकिन उम्राधिक्य लिखने में क्या हर्ज है? अगर कोई यह कहता है कि मेरा दोस्त शरीफतम लोगों में एक है या यहां से नजदीकतम स्टेशन रिवाड़ी है, तो उसकी आलोचना क्यों की जाए?
कई मामलों में इससे लिखने में सुविधा भी हो सकती है। जैसे अंग्रेजी के मार्जिनलाइजेशन का कोई अच्छा पर्याय नहीं है। सीमांतीकरण जमता नहीं है। पर हाशियाईकरण लिखा जाए तो? सीमांत की जगह हाशिया ज्यादा लोकप्रिय है और इसकी ध्वनि अर्थ के करीब भी है। इसी तरह नई अर्थनीति लोगों को गरीब बना रही है, यह कहने के बजाय यदि यह कहा जाए कि वह लोगों का गरीबीकरण कर रही है, तो आपत्ति क्यों की जाए? गरीबीकरण से एक क्रमिक प्रक्रिया का बोध होता है, जो गरीब बनाने में गैरहाजिर है। कस्बाईकरण तो चल ही पड़ा है, शहरीकरण भी अब काफी लोकप्रिय है। जो हिन्दी में अप्सरा है, उसे उर्दू में परी कहते हैं। अगर किसी स्त्री का वर्णन करते हुए कहा जाए कि उसके परीतुल्य सौंदर्य से मुग्ध होने से कौन बचा है, तो क्या हिन्दी की तौहीन हो जाएगी? रेस को नस्ल कहा जाता है। नस्ल-भेद हिन्दी का एक पुराना शब्द है। यहां संधि नहीं, समास है, जिसके उदाहरणों की कमी नहीं है, जैसे शादी-ब्याह, सुबह-सवेरे, नशामुक्ति, चाय-पान, पर कोई नस्लीय लिखे, जिसमें उर्दू नस्ल के साथ हिन्दी ईय प्रत्यय का योग है, तो क्या यह गलत हिन्दी का नमूना होगा? अश्लीलता की तर्ज पर नस्लीयता और धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर नस्लनिरपेक्षता। तद्भव शब्द गुट के आधार पर निर्गुट बनाया जा सकता है, तो उर्दू शब्द अक्ल के आधार पर निरक्ल या अक्लविहीन में क्या बुराई है? अखबारी सच्चाई को हम जानते हैं, पर अखबारेतर सच्चाइयां भी होती हैं। दमकलवाले हमेशा अग्निग्रस्त भवन की तरफ क्यों दौड़ें? वे आगग्रस्त मकान की ओर भी जा सकते हैं। हम शराबेतर नशों का जिक्र कर सकते हैं और किसी को शराब प्रेमी या शराबग्रस्त भी कहा जा सकता है। बल्कि शराब प्रेमी एक अलग कैटिगोरी है, जिसके लिए कोई माकूल शब्द नहीं है।
इस तरह के प्रयोग शुरू में कुछ अटपटे लगेंगे, पर धीरे-धीरे वे हमारी जबान पर चढ़ जाएंगे। संस्कृतनिष्ठता के प्रति मोह या अंग्रेजी की नकल के कारण मेरे मुहल्ले का एक दुकानदार लिखता है --- यहां चाय उपलब्ध है, जबकि वह आसानी से लिख सकता था -- यहां चाय मिलती है। असल में, हम अपने सामूहिक अवचेतन में संस्कृत शब्दों को पवित्र मानते हैं (संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है) और तद्भव तथा उर्दू शब्दों को कुछ हीन दृष्टि से देखते हैं। संस्कृत अगर ब्रााहृण है, तो तद्भव ओबीसी या दलित और उर्दू म्लेच्छ। यह मद्यप और शराबी के अंतर से स्पष्ट है। वर्षा में लालित्य है, बारिश में कोई रोमांस नहीं है। रेणु के उपन्यास "परती परिकथा' में नायक जिस स्त्री को अपनी रक्षिता बताता है, उसके लिए देशी शब्द रखैल है। रक्षिता कहे जाने से वह स्त्री सहज ही सम्माननीय हो उठती है, जबकि रखैल शब्द दूर से ही बदबू देता है।
शब्दों के बीच इस जाति प्रथा को खत्म करना लोकतंत्र के हित में तो है ही, हिन्दी-उर्दू की दूरी को मिटाने में भी सहायक होगा। शायद इस मिश्रित भाषा को हिन्दुस्तानी कहा जाने लगे, जो गांधी जी की हिन्दुस्तानी का ही एक और रूप है। एक और फायदा यह है कि हिन्दी शब्दों की संख्या में डेढ़ गुनी या दुगुनी वृद्धि हो जाएगी। विकसित भाषा वही मानी जाती है, जिसमें एक चीज के कई नाम हों और एक जैसी अभिव्यक्ति के लिए कई-कई शब्द हों। यदि मेरा यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाता है, तो हमारे पास शिकायती और शिकायतगर के साथ-साथ शिकायतकर्ता भी होगा, जो पहले दोनों से बेहतर है।

राजकिशोर