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Tuesday, March 16, 2010

सुनिए राजेन्द्र यादव का 93 मिनट का इंटरव्यू

पिछले 6 दशकों से रचनाकर्म में सक्रिय राजेन्द्र यादव साहित्य में महानायक की हैसियत रखते हैं। साल 2006 में वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश और युवा कवि-लेखक रामजी यादव की टीम (पीपुल्स विजन प्रोडक्शन कम्पनी) ने राजेन्द्र यादव का लम्बा इंटरव्यू लिया। पीपुल्स विजन यादव जी के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व पर फिल्म बना रहा है। यदि आप भी इस प्रोजेक्ट से किसी भी तरह से जुड़ना चाहें तो रामजी यादव से (yadav.ramji2@gmail.com या 9015634902 पर) संपर्क करें। इस साक्षात्कार में राजेन्द्र यादव ने कविता की विलुप्ति, कहानी-नई कहानी, दलित और महिला लेखन, मार्क्सवाद की भारत में असफलता, साहित्य और राजनीति के पारस्परिक संबंधों इत्यादि पर खुलकर बोला। हमें यह साक्षात्कार संग्रहणीय लगा और यह भी लगा कि शायद हिन्द-युग्म के बहुत-से पाठक भी इसे सुनकर ऐसा महसूस करेंगे कि बहुत कुछ जानने और समझने को मिला।



यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं या अपनी सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और गांधी शांति प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मासिक कार्यक्रम "अनहद" में राजेन्द्र यादव का कथापाठ शुक्रवार, 19 मार्च 2010 की शाम 5‍ः30 बजे आयोजित होगा। अध्यक्षता निर्मला जैन करेंगी। जरूर पधारें।

Wednesday, November 04, 2009

यह केवल उत्सवधर्मी विश्विविद्यालय नहीं रहेगा- विभूति नारायण राय

पिछले दिनों हिन्द-युग्म के रामजी यादव और शैलेश भारतवासी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय से बात की। विभूति नारायण राय हिन्दी के चर्चित लेखक और साहित्यकार हैं जिनकी दंगों के दौरान पुलिस के सांप्रदायिक रवैये पर लिखी पुस्तक 'शहर में कर्फ़्यू' बहुत प्रसिद्ध रही। विभूति उ॰ प्र॰ में पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्य कर चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा को समर्पित दुनिया का एक मात्र विश्वविद्यालय है। तो हमने जानने की कोशिश की कि हिन्दी भाषा-साहित्य की गाड़ी में गति लाने के लिए इनका विश्वविद्यालय क्या कुछ करने जा रहा है॰॰॰॰॰


(इंटरव्यू को उपर्युक्त प्लेयर से सुन भी सकते हैं)

रामजी यादव- महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 10-12 वर्ष पहले हुई थी। पूरी दुनिया में फैला हुआ जो हिन्दी समाज है, उसके प्रति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यह उत्तरदायी है। लेकिन यह एक उत्सवधर्मी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। और लगभग इसकी उत्सवधर्मिता इसके कुलपति की महात्वकांक्षाओं तक सीमित करके देखी जाती है। इस पूरी छवि को आप कैसे बदलेंगे?

वी एन राय- विश्वविद्यालय केवल उत्सवधर्मिता का केन्द्र न रहे, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध का क्षेत्र भी बने, और इसके साथ-साथ इस विश्वविद्यालय की हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में ज़रूरी उपकरण प्रदान करने की जो इसकी खास भूमिका है, उसे पूरा करने में भी इसका सक्रिय योगदान हो, इस समय दिशा में यह विश्वविद्यालय काम कर रहा है। इस वर्ष नये विभाग खुले हैं। मानवशास्त्र और फिल्म-थिएटर दो विभाग शुरू किये गये हैं। इसके अलावा डायस्पोरा स्ट्डीज का नया विभाग शुरू होने वाला है। ये तीनों नये विभाग महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की उस भूमिका को निभाने में भी मदद करेंगे, जिसकी कल्पना इस विश्ववविद्यालय के एक्ट में की गई है और प्रथम अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में इसकी निर्मिती के पीछे जो एक परिकल्पना रही है। इसे अंतरर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए, शायद आप अवगत हों, विश्वविद्यालय एक बहुत महात्वपकांक्षी योजना पर काम कर रहा है वो है कि हिन्दी में जो कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसे ऑनलाइन किया जाये ताकि दुनिया के कोने-कोने में बैठे हिन्दी के पठक उन्हें पढ़ सके। हमारी कोशिश है कि दिसम्बर 2009 तक लगभग 100000 पृष्ठ ऑनलाइन कर दिये जायें। इसके अलावा हम इन सभी महत्वपूर्ण कृतियों को दुनिया की तमाम भाषाओं में जैसे चीनी, जापानी, अरबी, फ्रेंच इत्यादि में अनुवाद करके ऑनलाइन करना चाहते हैं।

रामजी यादव- एक चीज़ मानी जाती है कि हिन्दी एक बड़ी भाषा है जो तमाम तरह के संघर्षों से निकली है। लेकिन हिन्दी में विचारों की स्थिति बहुत दयनीय है। एक विश्वविद्यालय के रूप में आपका विश्वविद्यालय किस तरह का प्रयास कर रहा है कि हिन्दी में विचार मौलिक पैदा हों और दुनिया के दूसरे अनुशासनों से इनका संबंध बने?

वी एन राय- इसके लिए भी हमने कुछ महात्वकांक्षी योजनाएँ बनाई है। हमारे विश्वविद्यालय का जो पाठ्यक्रम है वो गैरपारम्परिक पाठ्यक्रम हैं। जो विषय हमारे यहाँ पढ़ाये जा रहे हैं वह भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं। जैसे स्त्री-अध्ययन है, शांति और अहिंसा है, हिन्दी माध्यम में मानव-शास्त्र है, फिल्म और थिएटर या डायस्पोरा स्ट्डीज की पढ़ाई है। अनुवाद भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें हमारे यहाँ पढ़ाई हो रही है। लेकिन ज्ञान के इन अनुशासनों में मौलिक पुस्तकों की कमी है, मौलिक तो छोड़ दीजिए जो एक आधार बन सकती हों, ऐसे पाठ्यपुस्तकों की कमी है। इसलिए हमने योजना बनाई है कि हम ज्ञान के इन सारे अनुशासनों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में उपलब्ध है, उसके कुछ चुनिंदा अंशों का अनुवाद हो और उसे छापें। और यह योजना शुरू भी हो गई है, हमने स्त्री-अध्ययन के लिए 10 पुस्तकों को चुना है जिसका साल भर में हम अनुवाद करा लेंगे। इसके बाद अन्य अनुशासनों में जायेंगे।

शैलेश भारतवासी- सवाल हमारा यह था कि जो हिन्दी का साहित्यिक या वैचारिक परिदृश्य हैं, वो पूर्णतया मौलिक नहीं है। विश्वविद्यालय की तरफ से ऐस कोई प्रयास है जिससे मौलिक विचार निकलकर आये?

उत्तर- मौलिक लेखन को भी हम प्रोत्साहन देंगे, लेकिन सवाल यह है कि मौलिक लेखन के लिए भी आधारभूत सामग्री उपलब्ध हो, जिन्हें पढ़कर आप अपनी बेसिक तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से गंभीर समाज शास्त्रीय विषयों पर हिन्दी में मौलिक सामग्री या तो बहुत कम है या ज्यादातर अनुवाद के माध्यम से मिल रही है। पर हमारा प्रयास यह होगा कि जब हम महत्वपूर्ण चीज़ों का अनुवाद करायेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें पढ़कर जो मौलिक सोचने वाले हैं, वे मौलिक लेखन करेंगे और उन्हें भी हम प्रकाशित करेंगे।

रामजी यादव- क्या दुनिया के अन्य देशों के विश्ववद्यालयों में जहाँ प्राच्य विद्या किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, उनके साथ विश्वविद्यालय का कोई अंतर्संबंध बन रहा है?

वी एन राय- जी, हम यह कोशिश कर रहे हैं कि बाहर के 100 विश्वविद्यालयों में जहाँ हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, भाषा के तौर पर, प्राच्य विद्या का एक अंग होकर या साउथ-एशिया पर विभाग हैं, उनमें हिन्दी का इनपुट है, इन सभी विश्वविद्यालयों के बीच में हम एक समन्वय सेतु का काम करें, उनमें जो अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहे हैं, उनके लिए रिफ्रेशर कोर्सेस यहाँ पर हम संचालित करें, उनके लिए ज़रूरी पाठ्य-सामग्री का निर्माण करायें और सबसे बड़ी चीज़ है कि विदेशों से बहुत सारे लोग जो हिन्दी सीखने के लिए भारत आना चाहते हैं, उनके लिए हमारा विश्ववद्यालय एक बड़े केन्द्र की तरह काम करें, इस दिशा में भी काम चल रहा है।

शैलेश भारतवासी- जहाँ एक ओर आप विदेशी विश्वविद्यालयों से अंतर्संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं अपने ही देश के बहुत से लोग जो हिन्दी भाषा या साहित्य में ही अपनी पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं, उन्हें भी आपके विश्वविद्यालय के बारे में पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भी इस विश्वविद्यालय का नाम एक नई चीज़ है। तो क्या आप चाहते ही नहीं कि सभी लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचेया कोई और बात है?

वी एन राय- नहीं-नहीं, आपकी बात सही है। विश्वविद्यालय को बने 11 साल से ज्यादा हो गये, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत बड़ा हिन्दी समाज इससे परिचित नहीं है, या उसका बहुत रागात्मक संबंध नहीं बन पाया या कोई फ्रुटफुल इंटरेक्शन नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते, और हम इसके लिए हम प्रयास भी कर रहे हैं। मसलन हमारी वेबसाइट ही देखिए। हालाँकि हिन्दी-समाज बहुत तकनीकी समाज नहीं है, बहुत कम लोग हिन्दी वेबसाइट देखते हैं। लेकिन मुझे देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी वेबसाइट को रोज़ाना 150-200 लोग आते हैं और वो भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। तो ऐसा नहीं है, धीरे-धीरे लोगों ने इसे जानना शुरू किया है।

शैलेश भारतवासी- लेकिन यहीं पर मैं रोकूँगा, आपने कहाँ कि आप 150-200 लोगों से संतुष्ट हैं (कुलपति ने यहीं रोककर इंकार किया), मेरा कहना है कि आपको 150 विजिटरों से आशा की एक किरण नज़र आती है। मैं एक साहित्यिक-सांस्कृतिक वेबसाइट चलाता हूँ, जिसे रोज़ाना 10,000 हिट्स मिलते हैं (यह दुनिया भर की वेबसाइटों के एस्टीमेटेड हिट्स निकालने वाली वेबसाइट का आँकड़ा है), फिर भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ और इसे एक बहुत छोटी संख्या मानता हूँ। आपकी वेबसाइट पर मैं 2-3 बार गया भी हूँ। मेरा जो अनुभव है वह कहता है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है वह बहुत प्रयोक्ता-मित्र नहीं है, वह समय के साथ नहीं चल रही है। क्या इस दिशा में कोई परिवर्तन हो रहा है?

वी एन राय- पिछले 5-6 महीनों में जो परिवर्तन हुए हैं, उसमें दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शामिल किया जा रहा है। एक तो मैंने पहले भी बताया कि हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखन के 1 लाख पृष्ठ ऑनलाइन किये जायेंगे और हिन्दी के जो समकालीन रचनाकार हैं, लेखक है, उनकी प्रोफाइल, इनके पते वेबसाइट पर डाल रहे हैं ताकि दुनिया भर में फैले इनके प्रसंशक, इनके पाठक, प्रकाशक इनसे संपर्क कर सकें। तकनीक के स्तर पर भी हम परिवर्तन करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा विश्वविद्यालय कोई तकनीकी विश्वविद्यालय तो है नहीं, फिर भी हम सीख करके, दूसरों की सहायता लेकर अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रामजी यादव- भारत में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसमें गैर हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी का विकास हो रहा है, जिससे नये तरह के डायलेक्ट्स बन रहे हैं, भाषा जिस तरह से बन रही है, बाज़ार दूसरी तरह से इन चीज़ों को विकसित कर रहा है। इस पूरी पद्धति में भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से, विश्वविद्यालय किस रूप से देशज और भदेस को मुख्यधारा का विषय बना सकता है?

वी एन राय- इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद हैं। आज हम जिसे हिन्दी भाषा कह रहे हैं, वह भी एक समय बोली थी। खड़ी बोली। जब आप 'हिन्दी' शब्द का उच्चारण करते हैं तो 'खड़ी बोली' दिमाग में आती है। आज से 130 साल पहले भारतेन्दु तक यह नहीं मानते थे कि 'खड़ी बोली' में कविता भी लिखी जा सकती है। गद्य की भाषा तो 'खड़ी बोली' थी, लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा रखते थे भारतेन्दु। छायावाद आते-आते लगभग यह स्पष्ट हुआ कि 'खड़ी बोली' ही 'हिन्दी' होगी। और एक मानकीकरण शुरू हुआ। 30-40 साल बहुत संघर्ष चला। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी होगी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों के साथ हम कैसा व्यवहार करेंगे, कैसे हम इस भाषा को पूरे देश के लिए एक मानक और एक स्वीकार्य भाषा बना पायेंगे, यह सारे संघर्ष चलते-चलते कमोबेश यह तय हो गया है कि 'खड़ी बोली' ही हिन्दी होगी और सभी बोलियाँ इसे मदद करेंगी, खाद का काम करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक दूसरी प्रवृत्ति दिखलाई दे रही है, जो मेरे हिसाब से खतरनाक है। बहुत सारी बोलियाँ इस छटपटाहट में हैं कि वो हिन्दी को रिप्लेस करके एक स्वतंत्र भाषा जैसी स्थिति हासिल करें। विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने अभी मैं मॉरिशस गया था,, वहाँ भी बहुत सारे लोग अतिरिक्त उत्साह में यह कह रहे थे कि हिन्दी क्या है, हमारी राष्ट्रभाषा तो भोजपुरी है, मातृभाषा भोजपुरी है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ कि वहाँ के एक बड़े कार्यक्रम में जब एक राजनेता हिन्दी में बोलने लगे तो जनता में से कुछ लोग कहने लगे ये कौन सी भाषा इस्तेमाल कर रहे हो, छत्तीसगढ़ी हमारी राजभाषा है। यह एक डिवाइसिव, फूट डालने वाली स्थिति है, जिससे हमें बचना होगा। मतलब हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद भी बनें और हिन्दी का नुकसान भी न करें। हमारा विश्वविद्यालय चूँकि हिन्दी का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है, इसलिए इस दिशा में निश्चित ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। हमलोग फरवरी-मार्च में बोलियों को लेकर एक सम्मेलन करने जा रहे हैं। हिन्दी का लोक बहुत समृद्ध है, कई अर्थों में बहुत प्रगतिशील है। अगर आप देखें तो पूरी दुनिया में इतनी विविधता लिए हुए लोक दिखलाई नहीं देगा। हमें इस प्रवृत्ति पर नज़र रखनी पड़ेगी कि वो लोक आगे जाकर नुकसान न करे, यह खाद का काम करे न कि विषबेन बन जाय।

शैलेश भारतवासी- यह तो हमारी बोलियों की बात है। दक्षिण भारतीय जो गैर हिन्दी भाषी हैं, हालाँकि हिन्दी को वे सम्पूर्ण भारत की भाषा के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनकी शिकायत रहती है कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, चलो हम इसे सीख लेते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी हमारी भाषा को नहीं सीखते। क्या विश्वविद्यालय कोई इस तरह का कार्यक्रम चलाया रहा है जिससे गैरहिन्दी भाषा को सीखने पर प्रोत्साहन मिले?

वी एन राय- देखिए यह तो सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। यह बात आपने बिल्कुल सही कही कि त्रिभाषा कार्यक्रम को लेकर सबसे अधिक बेईमानी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुई। हम यह तो चाहते थे कि जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, वहाँ तो शुरू से बच्चे हिन्दी पढ़े, लेकिन जब हमारे यहाँ तीसरी भाषा की बात आई तो हमने संस्कृत को डाल दिया जो किसी भी जनसमूह की भाषा नहीं थी। हमें कोई जीवित भाषा सीखनी चाहिए थी। लेकिन विश्वविद्यालय का तो बहुत सीमित दायरा होता है। हम तो सरकार से बस अपील कर सकते हैं।

Friday, December 19, 2008

बिहार-रत्न भिखारी का साक्षात्कार

समय को पहचानने का एक माध्यम लोकरंग की विविध रंगों को समझना भी है। २०वीं शताब्दी के बिहार और उसके आसपास के भारत का मन टटोलना हो तो भिखारी ठाकुर का लोकसाहित्य बहुत उपयोगी है। पौष मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को इसी महान कलाकार का जन्म हुआ था। आपने हिन्द-युग्म के आवाज़ पर इनका संक्षिप्त परिचय, इनकी आवाज़ में काव्यपाठ, इनका लिखा लोकगीत 'हँसी, हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा' कल ही पढ़-सुन चुके हैं। हम चाहते हैं कि इंटरनेट का हर पाठक भी इस बिहार-रत्न से रुबरू हो। इसलिए हम 'बिदेसिया डॉट को डॉट इन' से साभार इनका एक दुर्लभ साक्षात्कार प्रकाशित कर रहे हैं। जस का तस। फ्लैश से यूनिकोड में बदलने में हमे सहयोग दिया है फैज़ाबाद से आशीष दुबे ने।



एक जनवरी 1965 के दिन के एक बजे लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की 77वीं वर्षगांठ के शुभ अवसर पर धापा (कोलकाता के पूर्वी सीमांत) स्थित श्री सत्यनारायण भवन परिसर में भव्य अभिनंदन समारोह का आयोजन हुआ था। अभिनंदन के समापन समारोह के उपरांत संत जेवियर कालेज, रांची के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रामसुहाग सिंह ने भिखारी ठाकुर का साक्षात्कार किया। प्रो. सिंह द्वारा किये गये इस साक्षात्कार को काफी वर्षों बाद रांची से प्रकाशित होने वाली अश्विनी कुमार पंकज की पत्रिका विदेशिया में 1987 में प्रकाशित किया गया था.
लोकरंग की दुनिया में इसे एक दुर्लभ साक्षात्कार भी कह सकते हैं। इस साक्षात्कार को पढ़ने के बाद भिखारी ठाकुर के व्‍यक्तित्‍व के बारे में कई बातें स्वत: ही सामने आ जायेंगी। कैसे बुलंदियों के दिन में भी भिखारी अपने बारे में कुछ बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहते थे. भिखारी को शायद तब ही इस बात का अहसास था कि आनेवाले दिनों में तमाशाई संस्कृति लोकरंग को निगल लेगी, तभी तो एक सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि अगले जनम में वे यही करना चाहेंगे, अभी से नहीं कह सकते। भिखारी अपने निजी व सार्वजनिक जीवन में कोई रहस्य का पर्दा नहीं डालना चाहते थे, इसीलिये जब उनसे नाच का उद्देश्य पूछा गया तो उन्होंने धनार्जन को भी स्वीकारा।

यहां हम विदेशिया से साभार उसी साक्षात्कार को प्रस्तुत कर रहे हैं-

प्रो.सिंह:- भिखारी ठाकुर जी आपकी जन्म तिथि क्‍या है?

भिखारी ठाकुर- सिंह साहब, 1295 सा ल पौष मास शुक्‍ल पक्ष, पंचमी, सोमवार, 12 बजे दिन।

प्रो.सिंह:- आपका जन्म स्थान कहां है?

भिखारी ठाकुर-कुतुबपुर दियर, कोढ़वापटी, रामपुर,सारण

प्रो.सिंह:- आपके पिताजी का क्‍या नाम है?

भिखारी ठाकुर-दलसिंगार ठाकुर।

प्रो.सिंह:- आपके दादाजी का नाम क्‍या है?

भिखारी ठाकुर- गुमान ठाकुर।

प्रो.सिंह:-क्‍या आपके पिताजी पढ़े-लिखे थे?

भिखारी ठाकुर- वे अशिक्षित थे.

प्रो.सिंह:- आपकी शिक्षा किस श्रेणी तक हुई?

भिखारी ठाकुर- स्कूल में केवल ककहरा तक, मैंने एक वर्ष तक पढ़ा, लेकिन कुछ नहीं आया। भगवान नामक लड़के ने मुझे पढ़ाया।

प्रो.सिंह:-आपके पिताजी की आर्थिक स्थिति कैसी थी?

भिखारी ठाकुर-जमीन तथा अन्य संपत्ति बहुत ही कम थी, गरीब थे।

प्रो.सिंह:-आपके जमींदार कौन थे?

भिखारी ठाकुर-मेरे जमींदार आरा के शिवसाह कलवार थे।

प्रो.सिंह:-आपके साथ उनका व्यवहार कैसा था?

भिखारी ठाकुर-उनका व्यवहार अच्छा था।

प्रो.सिंह:-क्‍या लड़कपन से ही नाच-गान में आपकी अभिरुचि है?

भिखारी ठाकुर-मैं तीस वर्षों तक हजामत करता रहा।

प्रो.सिंह:-कैसे नाच-गान और कविता की ओर आपकी अभिरुचि हुई?

भिखारी ठाकुर-मैं कुछ गाना जानता था। नेक नाम टोला के एक हजाम रामसेवक ठाकुर ने मेरा गाना सुनकर कहा कि ठीक है। उन्होंने यह बताया कि मात्रा की गणना इस प्रकार होती है। बाबू हरिनंदन सिंह ने मुझे सर्वप्रथम रामगीत का पाठ पढ़ाया। वे अपने गांव के थे।

प्रो.सिंह:-आपके गुरुजी का नाम क्‍या था?

भिखारी ठाकुर- स्कूल के गुरुजी का नाम याद नहीं है।

प्रो.सिंह:-आपने अपना पेशा कब तक किया?

भिखारी ठाकुर-तीस वर्ष की उम्र तक।

प्रो.सिंह:-क्‍या अपने पेशे के समय भी आप नाच-गान का काम करते थे?

भिखारी ठाकुर-तीस वर्ष के बाद से नाच-गान का काम कभी नहीं रुका।

प्रो.सिंह:-सबसे पहले आपने कौन कविता बनायी?

भिखारी ठाकुर- बिरहा-बहार पुस्तक।

प्रो.सिंह:-सबसे पहले आपने कौन नाटक बनाया?

भिखारी ठाकुर-बिरहा-बहार ही नाटक के रूप में खेला गया।

प्रो.सिंह:-सबसे पहले बिरहा-बहार नाटक कहां खेला गया?

भिखारी ठाकुर- सबसे पहले बिरहा-बहार नाटक सर्वसमस्तपुर ग्राम में लगन के समय खेला गया।

प्रो.सिंह:-क्‍या आपके पहले भी इस तरह का नाटक होता था?

भिखारी ठाकुर-मैंने विदेशिया नाम सुना था, परदेशी की बात आदि के आधार पर मैंने बिरहा-बहार बनाया।

प्रो.सिंह:-इस तरह के नाम की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

भिखारी ठाकुर- कोई पुस्तक मिली थी, नाम याद नहीं है।

प्रो.सिंह:- क्‍या आप छंद-शास्‍त्र के नियमों के अनुसार कविता बनाते हैं?

भिखारी ठाकुर-मैं मात्रा आदि जानता हूं, रामायण के ढंग पर कविता बनाता हूं।

प्रो.सिंह:- आपकी लिखी हुई कौन-कौन पुस्तकें हैं?

भिखारी ठाकुर-बिरहा-बहार, विदेशिया, कलियुग बहार, हरिकीर्तन, बहरा-बहार, गंगा-स्नान, भाई-विरोधी, बेटी-वियोग, नाई बहार, श्रीनाम रत्न, रामनाम माला आदि।

प्रो.सिंह:- सबसे हाल की रचना कौन है?

भिखारी ठाकुर-नर नव अवतार।

प्रो.सिंह:- आपकी अधिकांश पुस्तकें कहां-कहां से प्रकाशित हैं?

भिखारी ठाकुर- पुस्तकों से मालूम होगा.

प्रो.सिंह:- आपके विचार में सबसे अच्छी रचना कौन है?

भिखारी ठाकुर- भिखारी हरिकीर्तन और भिखारी शंका समाधान.

प्रो.सिंह:- आप जब कोई पुस्तक लिखते हैं तो क्‍या दूसरों से भी दिखाते हैं?

भिखारी ठाकुर- मानकी साहक्‍गांव के ही हैं। वे अभी जीवित हैं। वे सिर्फ साफ-साफ लिख देते हैं। उन्हें शुद्ध-अशुद्ध का ज्ञान नहीं है। रामायण का सत्संग बाबू रामानंद सिंह के द्वारा हुआ। श्लोक का ज्ञान दयालचक के साधु गोसाईं बाबा से हुआ।

प्रो.सिंह:- रायबहादुर की उपाधि आपको कब मिली?

भिखारी ठाकुर-रायबहादुर आदि की जो मुझे उपाधियां मिलीं उन्हें मैं नहीं जानता हूं। कब क्‍या उपाधियां मिलीं मुझे कुछ मालूम नहीं है।

प्रो.सिंह:- क्‍या आपको आशा है कि आपका कोई उत्तराधिकारी होगा?

भिखारी ठाकुर- मेरे भतीजा गौरीशंकर ठाकुर मेरी रचनाओं के आधार पर काम कर रहे हैं।

प्रो.सिंह:- आपकी संतानें कितनी हैं? आपके लड़के क्‍या करते हैं?

भिखारी ठाकुर- एक लड़का है शिलानाथ ठाकुर। वह घर-गृहस्थी का काम करता है। उसे नाच आदि से कोई संबंध नहीं है।

प्रो.सिंह:- क्‍या आप विश्रामपूर्ण जीवन बिताना चाहते हैं?

भिखारी ठाकुर- मैं इस काम से अलग रहकर जीवित नहीं रह सकता।

प्रो.सिंह:- आप तो जनता के कवि हैं, इस लिये स्वतंत्रता के पहले और बाद में क्‍या अंतर पाते हैं?

भिखारी ठाकुर- मैं कुछ कहना नहीं चाहता।

प्रो.सिंह:- वर्तमान शासन से क्‍या आप खुश हैं?

भिखारी ठाकुर- उत्तर देना संभव नहीं।

प्रो.सिंह:- अभी तक कितने पुरस्कार-पदक मिले हैं?

भिखारी ठाकुर- याद नहीं है।

प्रो.सिंह:- हाल में आपको क्‍या कोई उपाधि मिली है?

भिखारी ठाकुर-हां, बिहार रत्न की।

प्रो.सिंह:- बिहार के बाहर आप अपना नाच दिखाने कहां-कहां गये हैं?

भिखारी ठाकुर- आसाम, बनारस, कलकत्ता और बम्बई सिनेमा में एक गीत देने के लिये।

प्रो.सिंह:- कैसे आप समझते हैं कि आपके नाच से लोग प्रसन्न हो रहे हैं?

भिखारी ठाकुर- कोई उत्तर नहीं।

प्रो.सिंह:- क्या आप पूजा-पाठ, संध्या वंदना भी करते हैं? किन देवताओं की पूजा करते हैं?

भिखारी ठाकुर-सिर्फ राम-नाम जपता हूं।

प्रो.सिंह:- जिंदगी को आप सुखमय या दुखमय समझते हैं. हिंदी छोड़कर और कोई भाषा जानते हैं?

भिखारी ठाकुर- मौन।

प्रो.सिंह:- आपके आधार पर अभी कौन-कौन नाच हैं?

भिखारी ठाकुर- अनेक नाच इसी आधार पर हो गये हैं।

प्रो.सिंह:- क्या कुछ दिनों तक सिनेमा में भी आप थे? सिनेमा का जीवन आपको कैसा मालूम हुआ था?

भिखारी ठाकुर-नहीं।

प्रो.सिंह:- आप अपने दल के लोगों का क्या खुद अभ्यास करवाते हैं?

भिखारी ठाकुर-उस्ताद से सिखवाते हैं।

प्रो.सिंह:- आप जो नाटक दिखाते हैं उसका लक्ष्य धनोपार्जन के अतिरिक्त और क्या समझते हैं?

भिखारी ठाकुर-उपदेश और धनोपार्जन।

प्रो.सिंह:- स्वास्थ्य कैसा रहता है?

भिखारी ठाकुर- अब तक सिर्फ तीन दांत टूटे हैं।

प्रो.सिंह:- नाटक के बाद की थकावट कैसे दूर होती है?

भिखारी ठाकुर- मौन।

प्रो.सिंह:- आप क्या राजनीति में भाग लेना चाहते हैं?

भिखारी ठाकुर- मौन।

प्रो.सिंह:- पुन: आपका जन्म इसी देश में हुआ तो क्यया आप यही कार्य करना चाहते हैं?

भिखारी ठाकुर- कोई निश्चित नहीं।

प्रो.सिंह:- कविता लिखने या नाटक करने के लिये क्या आपको तैयारी करनी पड़ती है?

भिखारी ठाकुर- पहले तैयारी करनी पड़ती थी पर अब नहीं।

प्रो.सिंह:- अपने नाटकों के कथानक आप कहां से लेते हैं?

भिखारी ठाकुर- समाज से।

प्रो.सिंह:- इस समय आपके अनन्य मित्र कौन-कौन हैं?

भिखारी ठाकुर- अब कोई नहीं है। पहले बाबू रामानंद सिंह थे।

प्रो.सिंह:- क्या आपकी कोई स्थायी नाट्यशाला है?

भिखारी ठाकुर- कोई स्थायी जगह नहीं है।

प्रो.सिंह:- अच्छे नाटक या कविता के आप क्या लक्षण समझते हैं?

भिखारी ठाकुर- जनता की भीड़ से।

प्रो.सिंह:- क्या आपको मालूम है कि इस समय आपका उच्च कोटी के कलाकारों में स्थान है?

भिखारी ठाकुर-जो प्राप्त हुआ है वही मेरे लिये पर्याप्त है।

प्रो.सिंह:- भूतपूर्व राष्ट्रपति देशरत्न डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से सबसे पहले और अंत में भेंट कब हुई?

भिखारी ठाकुर- मुझे याद नहीं।

प्रो.सिंह:- क्या आप वर्तमान राष्ट्रपति डॉ॰ राधाकृष्ण्न और वर्तमान प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री से मिले हैं?

भिखारी ठाकुर- कभी नहीं।

प्रो.सिंह:- पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने कभी आपका नाटक देखा?

भिखारी ठाकुर-कभी नहीं।

प्रो.सिंह:- गांधीजी ने आपका नाटक देखा या कभी भेंट हुई थी?

भिखारी ठाकुर- निकट से साक्षात्कार नहीं हुआ।

प्रो.सिंह:- आपकी ससुराल कहां है?

भिखारी ठाकुर- मेरा प्रथम विवाह मानपुरा, आरा के स्वर्गीय देवशरण ठाकुर की लड़की से हुआ। उसके निधन के बाद दूसरा विवाह आमडाढ़ी, छपरा में हुआ. उसका गंगालाभ होने के बाद तीसरा विवाह हुआ, उसकी भी मृत्यु...

प्रस्तुति:- निराला