पिछले 6 दशकों से रचनाकर्म में सक्रिय राजेन्द्र यादव साहित्य में महानायक की हैसियत रखते हैं। साल 2006 में वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश और युवा कवि-लेखक रामजी यादव की टीम (पीपुल्स विजन प्रोडक्शन कम्पनी) ने राजेन्द्र यादव का लम्बा इंटरव्यू लिया। पीपुल्स विजन यादव जी के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व पर फिल्म बना रहा है। यदि आप भी इस प्रोजेक्ट से किसी भी तरह से जुड़ना चाहें तो रामजी यादव से (yadav.ramji2@gmail.com या 9015634902 पर) संपर्क करें। इस साक्षात्कार में राजेन्द्र यादव ने कविता की विलुप्ति, कहानी-नई कहानी, दलित और महिला लेखन, मार्क्सवाद की भारत में असफलता, साहित्य और राजनीति के पारस्परिक संबंधों इत्यादि पर खुलकर बोला। हमें यह साक्षात्कार संग्रहणीय लगा और यह भी लगा कि शायद हिन्द-युग्म के बहुत-से पाठक भी इसे सुनकर ऐसा महसूस करेंगे कि बहुत कुछ जानने और समझने को मिला।
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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और गांधी शांति प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मासिक कार्यक्रम "अनहद" में राजेन्द्र यादव का कथापाठ शुक्रवार, 19 मार्च 2010 की शाम 5ः30 बजे आयोजित होगा। अध्यक्षता निर्मला जैन करेंगी। जरूर पधारें।
पिछले दिनों मोहल्लालइव पर किसी प्रबुद्ध बेनामी लेखक ने लिखा कि 'कादम्बिनी क्या खाकर निकल रही है और क्यों निकल रही है'। किसी समय में कादम्बिनी की बहुत प्रतिष्ठा थी जो सांस्कृतिक और साहित्यिक जागरण के संस्कारों से सिंचित थी। हमें लगा कि हिन्द-युग्म भी एक साहित्यक-सांस्कृतिक पत्रिका है, ऐसे में इस बहस को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रबुद्ध लोगों से राय ली जा सकती है कि क्या इस पत्रिका को छपते रहना चाहिए, इसी तरह के विषय वस्तु के साथ? इस संदर्भ में हमारी टीम ने राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ट, भारत भारद्वाज, मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, रामजी यादव, प्रमोद कुमार तिवारी, विमल चंद्र पान्डेय और गौरव सोलंकी से बातचीत की। मंगलेश डबराल ने कहा कि मैं हर विषय पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। बाकी लोगों ने जो कहा वह संपादित रूप में आपके सामने प्रस्तुत है। कुछ बातचीत की रिकॉर्डिंग भी सुनने के लिए उपलब्ध है॰॰॰ बड़े घरानों की पत्रिकाओं में तीखी बहसें नहीं हो पाती- राजेन्द्र यादव
ये कादम्बिनी नाम दिया था बालकृष्ण राव ने, उन्होंने यह पत्रिका निकाली थी। राजेन्द्र अवस्थी के पास आकर यह भूत-प्रेत, अंधविश्वास और ज्योतिष की पत्रिका हो गई, यानी लगभग अपठनीय हो गई। बाद में विष्णु नागर आये तो इन्होंने कुछ सम्हालने की कोशिश की, पठनीय बनाया और उपयोगी चीज़ें दी। और धीरे-धीरे लगा था कि इसका एक स्थान बनेगा। लेकिन हुआ ये कि विष्णु नागर चले गये और फिर से उसी तरह की मैगजीन हो गई जैसी सरिता ग्रुप की पत्रिकाएँ होती हैं। इनमें कोई सीरियस बात तो होती नहीं, बस पाठक होते हैं और उनका मनोरंजन होता है।
एक बात साफ कर दूँ कि बड़े घरानों की पत्रिकाओं में वो चाहे साप्ताहिक हिन्दुस्तान हो, चाहे धर्मयुग हो या चाहे कुछ तीखी बहसें नहीं हो पातीं। इन्होंने कभी नहीं की। ख़ासकर राजनीति को लेकर और सेक्स लेकर, इनमें तरह-तरह के बंधन हैं कि यह बहू-बेटियों की या परिवार की पत्रिका है। इसलिए यह उम्मीद कि यहाँ कोई बहस होगी, यह सोचना बेकार है।
हम समझते हैं कि बहुत निकल ली, काफी चल लीं। हम समझते हैं कि इसकी सामाजिक या पाठकीय उपयोगिता शून्य है। यदि प्रकाशकों को मुनाफा है तो निकाले नहीं तो नहीं।
विष्णू नागर के वक्त में मैं इसका रेगुलर पाठक था। नागर को यह पत्रिका जिस रूप में मिली थी, उससे उन्होंने बहुत बढ़िया स्थिति में ला खड़ा किया था। लेकिन जो भी थी, पठनीय हो गई थी पत्रिका। यदि विष्णू नागर जैसा कोई दूसरा संपादक इस पत्रिका को मिलता है तो इसे 1-2 सालों में फिर से पठनीय पत्रिका बनाया जा सकती है। जहाँ तक आवश्यक फेरबदल का सवाल है तो उसमें पहली बात तो मौलिक रचनाएँ छपनी चाहिएँ तथा इसे यह तय करना चाहिए कि यह कविता की पत्रिका है, कहानी की, बहस की, कला या फिर कुछ और। (रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰॰राजेन्द्र यादव(प्रख्यात साहित्यकार, संपादक- हंस) कादम्बिनी एक दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है- पंकज बिष्ट
इस पत्रिका का पूरा इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव भरा है। शुरू में जब यह इलाहाबाद से निकलनी शुरू हुई थी तो यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, और इसमें सभी गंभीर लोग रुचि लेते थे। लेकिन जब यह हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के पास आई तो इन लोगों ने रीडर-डाइजेस्ट और नवनीत के तर्ज पर चलाना शुरू किया। इसके बाद जब राजेन्द्र अवस्थी इसके संपादक बने तो इन्होंने इसे तंत्र-मंत्र की पत्रिका बना दी। तबसे इसका पाठक-वर्ग बिलकुल बदल गया। यह एक पापुलर पत्रिका बन गई। जब विष्णु नागर जी आये तो उन्होंने सम्हालने की कोशिश की, एक गंभीर पत्रिका बनाने की कोशिश की। लेकिन दुर्भाग्यवश वे ज्यादा समय तक इसमें नहीं बने रह पाये, उसी का परिणाम है कि अब यह लगभग दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है। इसके संपादकों को यह नहीं समझ में आ पा रहा है कि उन्हें छापना क्या है, इसका टारगेट-रीडर्स कौन है।
एक बात मैं कहना चाहूँगा कि साप्ताहिक या मासिक पत्रिकाओं का संपादन बहुत मुश्किल है। दैनिक पत्रों में समाचार का फ्लो इतना तेज़ है और अलग-अलग पत्र एक ही ख़बर को इतने तरह से कवर कर देते हैं कि मासिक पत्रिका के संपादकों के सामने यह चुनौती होती है कि कैसे वह कुछ नया और सार्थक परोसे और अपना पाठक-वर्ग बचाये रखे।
अगर मालिक चाहे, उसमें इच्छाशक्ति हो तो एक समर्थ संपादक वह चुन सकता है जो बड़े आसानी से पत्रिका को बचा सकता है। हिन्दुस्तान में यह हालत नहीं है कि यह पत्रिका न चले, इस तरह के कंटेंट वाली कोई और मासिक पत्रिका है भी नहीं जिसे इतने बड़े घराने का समर्थन प्राप्त हो। वे चाहें तो इसे बहुत बढ़िया बना सकते हैं। लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों है कि व्यवसायिक घराने अपनी हिन्दी पत्रिकाओं के लिए कभी भी बहुत अच्छे सम्पादक चुनते ही नहीं। यदि कोई पत्रिका जो टेलीविजन में दिखाया जाता है, उसी की प्रिंटेंड नकल हो तो उसका कोई भविष्य नहीं है।
मैं विष्णु नागर के समय में इस पत्रिका को स्थाई तौर पर देखता था। राजेन्द्र अवस्थी के समय में मैंने इसे देखना भी पसंद नहीं किया। अब मैं इसपर ध्यान नहीं देता। (रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰पंकज बिष्ट (वरिष्ठ कथाकार, संपादक- समयांतर) गीली लकड़ी की तरह धुँआने से बढ़िया है भभककर जल जाये- भारत भारद्वाज
कादम्बिनी हिन्दी में निकलने वाली कुछ पुरानी पत्रिकाओं में है। कादम्बिनी का संपादन 1961 में इलाहाबाद से बालकृष्ण राव ने किया था और उस समय इसका पूर्णतः साहित्यिक स्वरूप था। लेकिन बाद में संपादक बदलते-बदलते इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदलते-बदलते पूरी तरह से बदल गया। पत्रिका की साहित्यिक प्रवृति नष्ट करने में सबसे बड़ा योगदान है राजेन्द्र अवस्थी का। यह भूत-प्रेत और तमाम धार्मिक अंधविश्वास से लदी पत्रिका तो थी ही विष्णु नागर में टाइम में सेलिब्रिटीज की पत्रिका हो गई। बाद में विजय किशोर मानव ने इसी में थोड़ा-बहुत बदलाव कर दिया।
कादम्बिनी के हर तरह के पाठक थे। साहित्य के तो थे ही, साहित्येत्तर अनुशासन की बहुत सी चीज़े इसमें होती थीं। आर्थिक अभाव के कारण यह पत्रिका बंद नहीं हो रही बल्कि नई अर्थनीति के कारण यह बंद हो सकती है। लगभग 50 साल से यह पत्रिका निकल रही है। मेरा अंदाज़ है वीणा के अलावा (जो 81 साल से निकल रही है) बाद हिन्दी की यह दूसरी पत्रिका है जो इतने लम्बे समय से निकल रही है। अब बहुत निकल ली।
इस पत्रिका के चरित्र में लगातार फेर-बदल हुए। ख़ास तरह की पत्रिका के ख़ास तरह के पाठक होते हैं। इस पत्रिका के हमेशा से ही पाठक बदलते रहे। राजेन्द्र अवस्थी ने इसे जहाँ पहुँचा दिया था उससे इसका जो पाठक-वर्ग तैयार हुआ था, उसे विष्णु नागर से बिलकुल बदल दिया।
हाँ, मैं इस पत्रिका को लम्बे समय से देखता रहा हूँ। 70 के दशक के भी मैंने इसे देखा है, विष्णु नागर के ज़माने में भी और मैंने इसका पिछला अंक भी देखा है। एक अच्छी पत्रिका थी अपने जमाने में, इसकी एक प्रतिष्ठा थी। मेरा कहना है कि गीली लकड़ी की तरह धूँ-धुँआने से बढ़िया है कि भभक कर जल जाये। जब किसी पत्रिका की भूमिका खत्म हो रही हो, उसका तात्पर्य ही न हो तो क्या मतलब है निकलने का! लेकिन बिना किसी सामाजिक भूमिका और हस्तक्षेप के बहुत सी पत्रिकाएँ निकलती रहती हैं। 41 साल से गोपाल राय का संबोधन उदाहरण है। किसी से पूछिए कि आप 'समीक्षा' देखते हो? इसी तरह मुझे लगा कि 'वीणा' बंद हो गई है। (रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰भारत भारद्वाज (आलोचक, संपादक-पुस्तक-वार्ता) कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है- मदन कश्यप
सुनें-
कादम्बिनी तो इन दिनों मैं पढ़ भी नहीं रहा हूँ, पहले भी नहीं पढ़ता था। लेकिन नागर जी जब सम्पादक हुए, तो उन्होंने कुछ ऐसी चीजें छापी, जिसके कारण उसको पढ़ने और लिखने में हमारी रुचि हुई थी। जब से नागर जी हटे हैं, मैंने इसका कोई अंक नहीं देखा है। तो अब क्या छप रहा है, यह भी मुझे नहीं मालुम है।
लेकिन मुझे लगता है कि लगातार इसकी पाठक-संख्या घटने का एक बड़ा कारण यह रहा कि हमारे समय के सांस्कृतिक सवालों से जूझने की बात तो छोडिए, तालमेल मिलाकर चलने वाली भी पत्रिका नहीं रही। बिलकुल अपनी डफली-अपना राग की तरह। अगर नागर जी के पीरियड को आप छोड़ दीजिए तो इस पत्रिका में कुछ नहीं था।
हर पत्रिका का अपना एक चरित्र होता है। फिर भी नागर जी ने हर स्तम्भ को रोचक बनाने की कोशिश की। लेकिन जिस तरह से एक कवि की एक कविता और दो पेज़ पर 4,5-6 कवियों की कविताएँ छापते थे। इस शिल्प में इसका कोई स्वरूप बन ही नहीं सकता है। फिर भी कुछ बन रहा था, लेकिन लग रहा था कि कुछ बन रहा है।
कोई पत्रिका महत्वपूर्ण कब होती है, जब वो समय में हस्तक्षेप करे। कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। अगर उससे मुनाफ़ा हो रहा हो तो ओचित्य हो सकता है, लेकिन मालिकान के लिए।
शुरू में यह इतनी बुरी नही थी। लेकिन दिन-दिन प्रतिदिन बुरी होती चली गई। राजेन्द्र अवस्थी के टाइम में भूत-प्रेत की झूठी कहानियाँ छपती थीं, वो भी पैसे लेकर। एक बार कादम्बिनी में छपा कि पटना में बुद्ध मार्ग में एक मंदिर में बाबा है जिन्हें वनदुर्गा सिद्ध है। यह मंदिर तो मेरे कॉम्प्लेक्स के बगल में था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं ऐसे किसी बाबा के बारे में नहीं जानता, जो मेरे बगल में रहते हैं। लेख भगवती शरण मिश्र का था। बहुत पता लगाया तो मालुम पड़ा कि वह बाबा भगवती शरण मिश्र के संबंधी हैं।
बाद में पता चला कि उसी बाबा ने एक पत्रिका निकाली। जब बाबा से पूछा गया कि आपने पत्रिका क्यों निकाली, तो उन्होंने बताया कि राजेन्द्र अवस्थी छापने के लिए 3 लाख रुपये माँग रहे थे, तो मैंने सोचा कि इतने में तो एक इस तरह की पत्रिका हम खुद निकाल सकते हैं। (रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
मदन कश्यप (कवि, संपादक- द पब्लिक एजेंडा) एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो - रामजी यादव
सुनें-
किसी भी पत्रिका का महत्व इस बात में है कि वह समकालीन विमर्श में क्या भूमिका निभाती है। इस हिसाब से देखा जाये तो अलग-अलग दौर में, अलग-अलग पत्रिकाओं की अपनी जगह रही है और वे लगभग अनियतकालिन और साधनहीन स्थितियों में निकलती रही है। ढेरों अध्यापक और साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होनें उस पत्रिका को विकसित करना अपना एक महत्वपूर्ण सरोकार समझा और उन्होनें इसे निभाया भी, लेकिन 80 के दशक में कुछ पत्रिकाएँ ऐसी निकलीं जो बड़े घरानों की पत्रिकाएँ थी। मसलन टाइम्स ऑफ़ इंडिया का धर्मयुग और हिन्दुस्तान टाईम्स का साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बनी इत्यादि। इससे पहले इन्हीं दोनों घरानों में से किन्हीं का रविवार और दिनमान भी हुआ करता था, रविवार और दिनमान एक बहुत अच्छे सम्पादकीय टीम का बहुत अच्छा उदाहरण हैं। जिसमें एक साथ रघुवीर सराय और अज्ञेय जैसे लोग एक समय में काम करते थे।
धर्मयुग ने स्वयं एक ज़माने में बहुत बड़े-बड़े लेखकों को एक बडा मंच दिया और वे लेखक मुख्य धारा के साहित्य में आये लेकिन आज शायद मुश्किल से ऐसे लोगों की गिनती की जा सकती है जो किसी ज़माने में धर्मयुग में छपते थे और हीरो हो जाते थे। आज उनकों हम नहीं जानते, किसी भी रुप में नहीं जानते। वे सारे दोयम दर्जे के कहानीकार-रचनाकार है जिनको दोहराना आज के सन्दर्भ में संभव नहीं है।
जहाँ तक कादम्बिनी की बात है, कादम्बिनी ने साहित्य के इतिहास में या समकालीन इतिहास में कोई मील का पत्थर रखा हो ऐसा कहना मुशिकल है और एक तरह से ज्यादती भी है क्योंकि उस पत्रिका की जो सीमायें थीं वह उसके सम्पादकों की भी अपनी सीमायें थीं। सम्पादक प्रायः नौकरियाँ करते थे और साहित्यकार थे इसलिये उन्होंने साहित्य को एक कैप्सूल की तरह अपने यहाँ से बेचने का काम किया।
एक ज़माने में इस कादिम्बनी में काफी साहित्यिक चीज़ें होती थीं, लोग समझते थे लेकिन जो भूमिका सामान्य जन के भीतर सरिता आदि ने निभाई, जैसे हिन्दू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास इत्यादि कालमों और दूसरे ऐसे अंधविश्वास विरोधी लेखों से समाज को जो रास्ता दिखाया, कादिम्बनी की ऐसी ज़गह कभी नहीं रही। कादिम्बनी मुख्यधारा से साहित्यकारों के प्रेम प्रसंगों, उनके कुछ चर्चित-कुचर्चित प्रसंगों और गैर ज़रूरी बहसों और साक्षात्कारों को छापती रही, जिसमें संवेदना में किसी किस्म का विचलन नहीं पैदा होता या विचार में किसी किस्म की दृढ़ता नहीं पैदा होती थी, लेकिन हम देखते हैं कि बाद में कादिम्बनी में आमूल-चूल परिवर्तन हुये, खासतौर पर विण्णु नागर के सम्पादकत्व में। जब इसको विष्णु नागर ने सम्पादित करना शुरू किया तो पहले तो इसका रूपाकार बदला। हम देखते हैं जिस तरह की सामग्री वह लगातार छापते रहे हैं, उस सामग्री में उस तरह की बात नहीं थी जिसे कहा जाये कि इन्होनें कोई नई बात कही है, वो बहुत पुरानी चीज़ें, बहुत पुरानी कहानियाँ, बहुत स्थापित किस्म के सेलिब्रिटीज और लेखक अभिनेता और गायक और दूसरे-दूसरे महफिलबाज़ किस्म के लोगों की आकांक्षाओं की पत्रिका रही है। इस पत्रिका का दाम तमाम लघुपत्रिकाओं के मुकाबले एक दुखदायी पक्ष रहा है। 25 या 30 रूपये दाम रखना भारत जैसे गरीब देश के, साधारण निम्नवर्गीय पाठक के साथ बड़ी ज्यादती है। चूँकि यह घराने की है और इसको पर्याप्त रूप से विज्ञापन भी मिलते हैं, इसके पास आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी बनी हुयी है तो यदि अपना सरोकार वो जनता और निम्न समाज से तय करती है तो उसे अपने दाम में कटौती कर देनी चाहिये और लगातार इस तरह की सामग्री देनी चाहिये जिससे कि लोगों को लगे कि कादिम्बनी पढ़ने से उनके विचारों में खूबी पैदा होगी या कादिम्बनी में ऐसी सूचना होगी जो दूसरी कहीं नहीं है या अभी तक नहीं मिली।
जहाँ तक उसके चलने या पढ़ने या बंद करने का सवाल है, इन हालात में उसके बंद होने से किसी को कोई हानि नहीं होगी और चलते रहने से किसी को कोई लाभ भी नहीं होगा। ये कहीं भी साहित्य के इतिहास में किसी मुकाम पर नहीं पहुँचती है। यह एक घराने की है और घराने के नौकर इसके संपादको की भूमिका निभाते हैं, जिनकी समझ बहुत कम है। इसलिये अगर लोगों का इरादा बिरला घराने, टाटा घराने या जैन-साहू घराने से या इस तरह से पैसे को लेकर है तो जैन साहू घराने, बिरला घराने को भी लोगों की आकांक्षओं का ध्यान रखना चाहिये, अगर वे नहीं रखते हैं तो उनकी पत्रिकाओं के बंद होने या चलने में किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
मैं कभी इस तरह की पत्रिका नहीं पढता। दूर दराज़ के छोटे शहरों और बाकि जगहों से प्रतिबद्ध और सरोकारों वाली पत्रिकाएँ ही पढ़ने की जरुरत पड़ती है और मैं कादिम्बनी इसलिये भी नहीं पढ़ता क्योंकि इसमें मेरे पढने लायक कोई सामग्री नहीं होती।
ऐसा नहीं है की कोई मैं अपनेआप को महान या बौद्धिक लेखक समझता हूँ बल्कि एक ऐसे बेचैन युवक के रूप में अपने आप को देखता हूँ जिसे बहुत कुछ जानना है और साहित्य उसके लिये बड़ा माध्यम है। मुझे दिखता है कि एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो जबकि उसके अभी के सभी अंक देख चुका हूँ। (शैलेश भारतवासी से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰रामजी यादव (कवि-कथाकार, फिल्ममेकर, आलोचक) कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है- प्रमोद कुमार तिवारी
कादम्बिनी पत्रिका बहुत से उतार-चढ़ाव से होकर गुजरी है। राजेन्द्र अवस्थी के समय यह काल-चिंतन और भूत-प्रेत की पत्रिका रही, वहीं विष्णु नागर जी के दौर में इसमें साहित्य और सरोकार की गूँज सुनाई देने लगी। और फिर से अपनी प्रतिष्ठा पाने लगी। आज की तारीख में यह साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका होने की बजाय आनंद, मस्ती, सैर-सपाटा आदि की एक पापुलर पत्रिका होने की तरफ अपने कदम बढ़ा रही है। पत्रिकाएँ दो तरह की होती हैं, एक वो जिन्हें पाठक खोजकर पढ़ता है, दूसरी वो जिससे पाठक टाइम पास करता है। कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है। मुझे याद है कि नागर जी के समय में इस पत्रिका में मेरे लिए कम से कम 30-35 मिनट की सामग्री होती थी, लेकिन आज 5 मिनट का कंटेंट भी नहीं होता।
अब हिन्दुस्तान समूह में मृणाल पाण्डेय के बाद शशि शेखर आये हैं। जब नया व्यक्ति आता है तो उसके अपने नये संस्कार होते हैं। लेकिन किसी चल रहे सिस्टम को समझने में वक्त तो लगता है। इनसे उम्मीदें हैं कि शायद कादम्बिनी फिर से अपना मुक़ाम हासिल करे। लेकिन इतनी जल्दी मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।
कादम्बिनी की अपनी एक सामाजिक उपयोगिता रही है। बहुत पुरानी पत्रिका है, जिसने सामाजिक जागरुकता फैलाने वाले कई स्तम्भ चलाये। एक समय में यह पत्रिका बाल पत्रिकाओं और गंभीर पत्रिकाओं की बीच की कड़ी थी। इसके वर्तमान रूप से मुझे निराशा हुई है, लेकिन हर पत्रिका का यह दौर आता है, मुझे लगता है कि यह परिस्थितियाँ बदल जायेंगी।
॰॰॰प्रमोद कुमार तिवारी (युवा लेखक व पत्रकार) कादम्बिनी चर्चा करने लायक पत्रिका ही नहीं है- विमल चंद्र पाण्डेय
किसने कहा कि कादम्बिनी की रीडरशीप घट रही है! मुझे लगता है कि कादम्बिनी को स्यूडो-इंटलैक्चयूल तरह के बहुत से पाठक अभी भी इससे जुड़े हैं और अब तो यह पूरी तरह से बाज़ारू पत्रिका हो गई है। और इसपर हमारे बोलने न बोलने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे पिताजी इस पत्रिका को घर लाया करते थे। तब उनका उद्देश्य अलग था, इसमें बहुत सी ज्ञानवर्धक बातें होती थीं, लेकिन अब तो भूतों-प्रेतों पत्रिका बनकर रह गई है। यह पत्रिका कभी भी इतनी स्तरीय नहीं रही कि इसपर राजेन्द्र यादव जैसे लोगों को टिप्पणी करनी पड़े। मेरी कविताएँ भी इसमें 'पहचान' स्तम्भ के अंतर्गत छपी थी, जिसमें से एक कविता का सार जो कि उसके अंतिम पंक्तियों में था ही उड़ा दिया गया था। मेरा मानना है कि इसके बंद होने या चलने, पाठक संख्या घटने-बढ़ने पर कोई चर्चा ही नहीं होनी चाहिए।
॰॰॰विमल चंद्र पाण्डेय (नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हिन्दी युवा कहानीकार) कादम्बिनी ने अपने ही पाठकों को ठेंगा दिखलाया है- गौरव सोलंकी
मैं कभी कादम्बिनी का नियमित पाठक नहीं रहा लेकिन मैंने इसके बदलते हुए रूप पर ज़रूर ग़ौर किया है और इसके बारे में लोगों से बात भी करता रहा हूँ। छ:-सात महीने पहले का कोई अंक मैंने देखा था। मैं यदि कुछ साल पहले की स्थिति को याद करूँ तो यह प्रबुद्ध पाठकों की पत्रिका थी जिसे पढ़ने पर एक किस्म की बौद्धिक समृद्धि का अनुभव होता था। इसका पाठक वर्ग यदि कम हो रहा है तो कम होने का सीधा सा कारण है कि इसने अपने उन्हीं पाठकों को ठेंगा दिखलाते हुए अपना रूप बदल लिया है जो इसकी नींव से जुड़े हुए थे। बाज़ार के चक्कर में कादम्बिनी ने अपना स्तर बच्चों या किशोरों की पत्रिकाओं जैसा बना लिया है। मैंने हाल ही में कादम्बिनी देखी तो मुझे किशोरों की पत्रिका 'सुमन सौरभ' की याद आई। मैं तो बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूँ। इसे छापने वाले लोग भी शायद ठीक से नहीं जानते कि वे किसके लिए पत्रिका निकाल रहे हैं। यदि वे कम पढ़े लिखे आम पाठक की पसन्द तक आना चाहते हैं तो याद रहे कि उन पाठकों के पास इससे कहीं बेहतर विकल्प पहले से ही मौज़ूद हैं। कोई भी उस सामग्री से कैसे संतुष्ट हो सकता है जो दैनिक अख़बारों के बालमंच वाले पृष्ट जैसी हो या इंटरनेट से उठाई गई 'ज्ञानवर्द्धक' सामग्री। मैं कभी कादम्बिनी में प्रकाशित नहीं हुआ।
॰॰॰गौरव सोलंकी (चर्चित युवा कहानीकार व कवि) आज यानी 25 सितम्बर 2009 को हमें कुछ और प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं। कादम्बिनी पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई- प्रियदर्शन
एक अरसे से कादंबिनी देख नहीं पाया हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल अखबारों और किताबों से फुर्सत नहीं मिल पाती। इत्तेफाक से कादंबिनी छूटती चली गई। सच कहूं तो कभी खरीद कर पढ़ने की ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। इसकी कोई वैचारिक वजह भी नहीं। बस इसे पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। विष्णु नागर जी संपादक थे तो ओलंपिक पर कवर स्टोरी लिखी थी। और भी थोड़ा-बहुत लिखना तभी हुआ था। तब थोड़ा अच्छी भी लगती थी कादंबिनी। (निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰प्रियदर्शन (वरिष्ठ पत्रकार) कादम्बिनी को बंद करने की बात एक अतिरेकी कथन है- पंकज सिंह
रामानंद दोषी के ज़माने से कादंबिनी को देख रहा हूं। उस वक्त इसका डाइजेस्ट वाला स्वरूप था, अच्छा भी लगता था। फिर राजेंद्र अवस्थी संपादक हुए तो कुछ परिवर्तन भी किए। उन्होंने परिचर्चाओं के ज़रिए कादंबिनी को समकालीन से जोड़ने की कोशिश भी की। कोई भी पत्रिका ये तो दिखाती ही है कि उसकी बौद्धिक तैयारी कैसी है। बाद में कादंबिनी राजेंद्र माथुर की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं (व्यापक अर्थ में) का शिकार हो गई। फिर विष्णु नागर ने पत्रिका का बड़ी विनम्रता (इतनी ज़रूरी भी नहीं थी) से कायांतरण किया। कई नए स्तंभ, कई नई परिकल्पनाएं दिखीं।
फिर भी किसी का ये कहना कि कादंबिनी जैसी पत्रिका को बंद हो जाना चाहिए, कोरी बकवास है। ये अतिरेकी कथन है। मैं तो कहता हूं कि हंस को बंद हो जाना चाहिए। हंस राजेंद्र यादव की मानसिक विकृतियों का आईना रहा है। पत्रिका सिर्फ संपादक की नहीं होती। कादंबिनी में हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे युवा कवि भी शामिल हैं। कादंबिनी में लिखने वाले हंस में लिखने वालों से बेहतर हैं। ये हो सकता है कि पढ़नेवालों को कादंबिनी से अपेक्षाएं ज़्यादा हों।
मैंने नागपुर के पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में युवाओं के बड़े समूह का नेतृत्व किया था। कादंबिनी ने फोटो के साथ इंटरव्यू छापा था। विष्णु नागर ने भी कुछ कविताएं छापीं, फिर पति-पत्नी का संयुक्त लेख भी छपा। नियमित लेखक कभी नहीं रहा, पाठक अभी भी हूं। मेरे अनुसार जीवन में सिर्फ साहित्य ही महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने बीए किया इतिहास में, जेएनयू से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर शोध किया, साहित्य से जुड़ाव भी है। मतलब, कादंबिनी ज़िंदगी के पूरे विस्तार को समेटने की कोशिश करती है, तो ये सराहनीय कदम है। वर्तमान संपादक ने कम से कम कोई क्षरण किया हो, ऐसा नहीं लगता। (निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰पंकज सिंह (कवि, आलोचक) जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसका तो सम्मान करें- पूर्णिमा वर्मन
अबकी बार अगस्त में जब मैं भारत से इमारात लौटी तब इकोनॉमी क्लास का टिकट नहीं मिला मजबूरन बिजनेस क्लास में बैठना पड़ा। एअर होस्टेस पत्रिकाओं वाली ट्रे लेकर आयी तो एक दो पत्रिकाएँ हटाकर देखा कि क्या कोई हिंदी पत्रिका है। मुझे कादंबिनी दिखी तो उठा ली। रूप रंग अलग, आकार अलग, पहला पन्ना खोलते ही ऐसा तमाचा पड़ा कि यात्रा का स्वाद ही खराब हो गया। लेख था- "हिंदी जेहादियों से डर लगता है।" लेख में सिद्ध किया गया था कि हिंगलिश ही बोलनी चाहिए। लिखने पढ़ने वाली हिंदी बोलना जेहाद है।
इस प्रकार के लेख प्रकाशित करने वाली हिंदी पत्रिका का प्रकाशित होना हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने वालों के लिए कलंक की बात है। हम जैसे लोग जो दिन-रात विदेशों में हिन्दी के प्रसार के लिए प्रयत्न कर रहे हैं भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में ऐसा कुछ देखें तो दिल टूटना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब घर में इसकी प्रतियाँ डाइजेस्ट की तरह संभाल कर रखी जाती थीं। सब पुरानी पत्रिकाएँ अखबारों के साथ रद्दी में बिकती थीं लेकिन यह नहीं बेची जाती थी। रुपरंग बदलना स्वाभाविक है लेकिन जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसके प्रति सम्मान तो होना चाहिए।
कुल मिलाकर यह कि गलती पत्रिका की नहीं क्लास की है। बिजनेस क्लास का टिकट लिया तो भुगतना तो था ही। आराम से इकोनॉमी में बैठती। वहाँ एअर होस्टेस पत्रिकाओं के लिए परेशान नहीं करती। दो घंटे सोती और चैन से घर पहुँचती। (ईमेल द्वारा प्राप्त)
ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खासियत यही है कि आपकी नाराज़गी या खुशी जगजाहिर होने में चंद मिनट लगते हैं...हिंदयुग्म का वार्षिकोत्सव खत्म होते ही मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव की कार्यक्रम में कही बातों पर तरह-तरह के मूड बनने लगे थे.... हिंदयुग्म की शोभा महेंद्रू ने सबसे पहले अपने ब्लॉग पर "शर्मिंदा हुई हिंदी" शीर्षक से नाराजगी ज़ाहिर की....फिर, हिंदयुग्म के कुछ और साथी भी अलग-अलग राय लेकर आये.... शोभा जी का गुस्सा आप यहां पढ सकते हैं.... http://ritbansal.blogspot.com/2008/12/blog-post.html इस लेख को पढकर हिंदयुग्म की नीलम मिश्रा ने भी अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजी..आप भी पढें..... संपादक
"राजेंद्र यादव जी के बारे में बहुत सारे पूर्वाग्रह तो पहले से ही घुले हुए थे... उन्हें खतरनाक और शर्मनाक में अन्तर नही पता है...उन्होंने कहा कि अब वो खतरनाक बातें कहने जा रहे हैं, वो सारी शर्मनाक बातें थी.... आप तो अतिथि के तौर पर शैलेश जी द्वारा बुलाए गए थे... हम भी मजबूर थे.."अतिथि देवो भव" भाव को मन में लिए बर्दाश्त करते गए...माननीय यादव जी, हमारा हिन्दयुग्म आपकी राजनीति का मंच नही था, यह काफ़ी आगे निकल गया है, हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं, मानवता की बात करते है, पर आप ............दो पंक्तियाँ कहनी है जो शायद आप जैसे लोगों के लिए ही कही गई हैं-बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर.. पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर मनु जी, आपकी टिप्पणी भी पढी...सही में कुछ बड़े नामों को हम भागदौड़ के चक्कर में मंच से आदर सहित पुकार नहीं पाये...मगर, बड़े आयोजन की छोटी गलतियां अगली बार न हों, इसका पूरा ध्यान रखेंगे...." साभार नीलम मिश्रा, हिंदयुग्म
हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2008 में राजन्द्र यादव द्वारा दिये गये वक्तव्यों पर प्रतिक्रियाओं के आने का दौर अभी थमा नहीं है। 30 दिसम्बर 2008 को बैठक पर ही मनु बे-तख्खल्लुस की प्रतिक्रिया कार्टून के माध्यम से लगाया था। आज प्रस्तुत है उनके दूसरे बयान पर एक और कार्टून॰॰॰
28 दिसम्बर को 2008 को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया, जिसमें प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव मुख्य-अतिथि के तौर पर उपस्थित थे। उन्होंने ब्लॉगिंग और हिन्दी साहित्य पर अपने विचार रखें। जिसपर बहुत से ब्लॉगों पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। आइए पढ़ते हैं कुछ चुनिंदा…….
आधुनिकता केवल टपर टपर कीबोर्ड चलाने से आएगी नहीं, यूँ आप आनलाइन हैं लेकिन उवाचेंगे गत्यात्मक ज्योतिष, जाहिर है ये नहीं चलेगा। मध्यकालीन सोच व साहित्य, स्त्री व वंचितवर्गों के प्रति अवमाननात्मक है ये स्थापित तथ्य है, इन्हीं आधारों पर इसे अजायबघर में रखे जाने की सलाह दी गई थी। ये प्रतीकात्मक है तथा उपयुक्त है। दलित यदि तुलसी से तथा स्त्री बिहारी से तादात्मय महसूस नहीं करते तो उन्हें पूरा हक है ऐसा सोचने का। राजेंद्र इनके परिप्रेक्ष्य में ही कह रहे थे।
Anonymous ने कहा.....
मसिजीवी की भी रचना अब हंस में छाप जायेगी आख़िर स्तुति भी कुछ शय है -दिल जीवी
Atul Sharma ने कहा....
न तो मैं राजेन्द्र यादव जी के कैंप का हूं और न उनके विरोधी कैंप का . मैं तो सिर्फ इतना भर जानता हूं कि राजेन्द्र यादव जी की एक भी ऐसी रचना मुझे नहीं पता जो किसी एक आम आदमी की जबान पर हो . उनकी एक किताब हंस मैंने देखी है जो सभंवत: उसी जमाने की प्रतीत होती है जिस जमाने के वे विरोधी नजर आते हैं . एक बात और, मूंछ लगाने से कोई मर्द नहीं बन जाता, काले पीले चश्मे लगाने से कोई जवान नहीं हो जाता, किताबें छपवाने से कोई साहित्यकार नहीं बन जाता.
Anonymous ने कहा...
Well you want to hang Rajendra Yadav for smoking in a country where, hard core criminals and murders are siting in parliament and making laws.
अधिकांश टिप्पणियां यह ज़ाहिर करती हैं कि हम वही सुनना चाहते हैं जो हमारे मन में है. अगर हम दूसरों की वह बात सुनने को तैयार न हों जो हमारे सोच से अलग है, तो फिर हमारे विवेक खुले मन वाला होने का क्या प्रमाण हो सकता है? राजेन्द्र यादव ने ऐसा भी बुरा क्या कह दिया? क्या समय के साथ चीज़ों को बदलना नहीं चाहिये? मैं लगभग चालीस बरस से हिन्दी पढा रहा हूं और जानता हूं कि हमारे पाठ्यक्रम कितने जड़ हैं. चन्द बरदाई, कबीर, तुलसी, सूर, बिहारी, केशव सब महान हैं, अपने युग में महत्वपूर्ण थे, लेकिन सामान्य हिन्दी के विद्यार्थी को उन्हें पढाने का क्या अर्थ है? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा आज आपकी ज़िन्दगी में कहां काम आएगी? मन्दाक्रांता, छन्द और किसम किसम के अलंकार आज कैसे प्रासंगिक हैं? अगर हम अपने विद्यार्थी को इन सब पारम्परिक चीज़ों के बोझ तले ही दबाये रखेंगे तो वह नई चीज़ें पढने का मौका कब और कैसे पाएगा? मुझे इस बात की ज़रूरत लगती है कि चीज़ों पर खुले मन से विचार किया जाए, न कि रूढ चीज़ों की बेमतलब जुगाली की जाए.
मैं शुरू से ही इस वाद में आने से कतरा रहा था -क्योंकि कथित /तथाकथित मठाधीशों से जुडी चर्चाओं से मुझे अलर्जी रही है -मैं तो एक बात ही शिद्दत के साथ महसूसता हूँ कि श्रेष्ठ साहित्य कालजयी होता है .अब आप नयी पीढी को क्या पढाएं क्या न पढाएं यह अलग मुआमला है मगर कबीर /तुलसी का साहित्य अप्रासंगिक नही हो जाता .और ये टिप्पणी कार महोदय तो धन्य ही है जो अपने जीवन के चालीस वर्ष बकौल उनके ही बरबाद कर चुके हैं और अब अपने फरमानों से आगामी पीढियों को बरबाद करने में लग जायेंगे . भाषा ,ज्ञान को करियर के काले चश्मे से देखने पर हम कहीं अपने जमीर से ही गद्दारी करते हैं सरोकारों से हटते हैं . बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर मैं हठात रोक रहा हूँ -अब राजेन्द्र यादव का खेमा दादुर धुन छेड़ रहा है !
आलोचना से राजेन्द्र यादव को कतई परहेज नहीं होगा जैसा कि मैं उन्हें जानता रहा हूँ लेकिन हम दो-चार ब्लॉग लिखकर अपने को हिन्दी का सबसे बड़ा सेवक समझने वालों को जरूर कुछ लिखने के पहले समझना चाहिए हमारी बात किसे संदर्भ में लेकर कही जा रही है...वह व्यक्ति पिछले साठ वर्षों से सिर्फ हिन्दी में लिख -सोच रहा है...मुझे तो लगता है कि हिंदी को अधिक विचारशील बनाने में जितना यादवजी का योगदान है उतना किसी का नहीं...नहीं तो हिन्दी के ज्यादातर गोष्ठियाँ वाह रे मैं वाह रे आप के प्रतिमानों पर चला करती थी.
Anonymous ने कहा...
वो क्या है कि लेखक को अपना व्यक्तित्व दिखाने के लिये कुछ चटाक पटाक करना पड़ता रहता है, बेचारे राजेन्द्र यादव के साथ में भी कुछ एसा ही है. इन्हें बिना पाइप के लोग पहचानते ही नहीं सो क्या करें... अब भले ही पियें या न पियें, मुंह में दबाये तो रखगे ही हैं. कहीं पढ़ा था कि ये शायद रात को सोते समय भी पाइप दबा कर सोते हैं
संसार की सर्व श्रेष्ट भाषा की ऐसी प्रशंसा? हिंदी कब संसार की सर्वश्रेष्ठ भाषा हो गयी... और राजेंद्र यादव ने गलत क्या कहा... पुराने साहित्य और नये समय के अंतर्विरोध को समझाने की कोशिश की। आपलोगों को मजे और वाहवाही के लिए नहीं, बल्कि समाज का दर्पण बनने के लिए साहित्य रचना चाहिए। शुभकामनाएं।
बिल्कुल ठीक ऐसे ही है जैसे आप चुतियापा कहकर पोस्ट लिखते है फ़िर किसी ब्लॉग पर गाली देने को ग़लत कहते है ,आप जैसे लोग दोगले लोग है जो ख़ुद कही सिगरेट फूंकते है ओर यहाँ कानून का रोना रोते है
हिन्दी या किसी अन्य भाषा का मान कोई बेसन का लड्डू नहीं है कि कोई आया और आराम से गप्प कर गया। अमां यार, उनका सिगार है, सभा का कोई ऐसा नियम न होगा कि धूर्मपान करना निषेध है, तो आपको क्यों तकलीफ है कि वे सिगार पी रहे थे? वे ५०२ पताका बीड़ी फूँक रहे होते तो ठीक रहता? सिगरेट चाहे जितनी भी महंगी क्यों न हो, सभा आदि में प्रतिष्ठित व्यक्ति उसको फूँकना इसलिए नहीं पसंद करते क्योंकि वह चीप (Cheap) लगती है, जो चार्म (Charp) सिगार में है वह सिगरेट में नहीं है।
जिस आदमी को देश के क़ानून का जरा भी ख्याल न हो और पूरी उद्धतता के साथ पब्लिक प्लेस पर धूमपान निषेध क़ानून की धज्जियाँ उडा रहा वह काहे का साहित्यकार ! आश्चर्य यह भी कि किसी ने उन्हें टोका तक नहीं !! मैं होता तो उन्हें टोकता और क़ानून का संज्ञान करा कर राजपत्रित अधिकारी की हैसियत से सिगार जब्त कर लेता !
मुझे लगता है ब्लॉगिंग अपने आप में साहसिक कदम है। इसके लिए नामवर और राजेंद्र यादव जैसे लोगों की वाहवाही की जरूरत नहीं है। अगर साहित्य के मठाधीश इसे खारिज भी करते हैं तो किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैंने सुना ही कि नामवर जी ब्लॉगिंग को दो कौड़ी से ज्यादा अहमियत नहीं देते। अगर वाकई ऐसा है तो इसके पीछे वजह एक ही है--सांचे के टूटने का भय। जमी जमाई दुकान के गिरने का भय। वाकई ब्लॉगिंग बड़ा दीगर का काम है। जिसमें आपको हर तरह की प्रतिक्रिया के लिए तैयार रहना है। यहां चेहरे देखकर प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है। अगर राजेंद्र यादव ब्लॉगिंग के पक्षधर हैं तो ये उनका समझदारी है।
हिन्द-युग्म के वार्षिकोत्सव जिसका आयोजन हिन्दी भवन में 28 दिसम्बर 2008 को हुआ, में कार्टूनिस्ट मनु बे-तख्खल्लुस भी उपस्थित थे। इन्होंने मुख्य-अतिथि देश के प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव के ऊपर एक कार्टून बनाया। आप भी देखें।