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Thursday, May 06, 2010

मीडिया आपको क्यों बनाए सेलिब्रिटी

हिन्दीबाजी-7
~अभिषेक कश्यप*


भाग-6 से आगे॰॰॰॰

हिंदी के लेखकों-बुद्धिजीवियों की कुछ तकलीफें शाश्वत किस्म की हैं। मगर इनमें शायद सबसे अहम शिकायत यह है कि हमें कोई पूछता नहीं। मतलब एक लेखक और बुद्धिजीवी के तौर पर हमारी कोई आईडेंटिटी नहीं।

पिछले हफ्ते मैं तीसीयों साल से दिल्ली में रह रहे हिंदी के एक बड़े कवि-कथाकार से मिलने गया। वह दिल्ली से प्रकाशित एक राष्ट्रीय अखबार के संपादक हैं। उनके खाते में सभी विद्याओं की दो दर्जन किताबें और दर्जन भर विदेश यात्राएं दर्ज हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए बताया-‘मैं बीस साल से पूर्वी दिल्ली के जिस अपार्टमेंट में रहता हूँ, वहां मेरा पड़ोसी भी नहीं जानता कि मैं लेखक हूँ। लोग बस यह जानते हैं कि मैं पत्रकार हूँ और फलाँ अखबार में काम करता हूँ।’

यह अफसोस, पहचान का यह संकट तब और दुख देता है जब हिंदी के अखबार, पत्रिकाएँ और टेलीविजन न्यूज चैनल भी हिंदी के लेखकों-बुद्धिजीवियों की बजाए अंग्रेजी के कलमनवीसों को ही तवज्जो देते हैं। जब अरुंधति राय नक्सल मामले पर गृहमंत्री चिदंबरम की आलोचना करती हैं तो यह ब्रेकिंग न्यूज है मगर राजेंद्र यादव किसी पुरस्कार की चयन समिति की ज्यूरी में रहने के बावजूद पुरस्कार समारोह में इसलिए नहीं जाते कि उन्हें गुजरात का ब्रांड एम्बेसडर बन कर नरेंद्र मोदी की तारीफों के पुल बांधनेवाले अमिताभ बच्चन के साथ बैठना पड़ेगा तो उनका यह नैतिक स्टैंड मीडिया के लिए कोई खबर नहीं। अशोक वाजपेयी की खीज को इसी रोशनी में देखा जा सकता है-‘क्यों हिंदी मीडिया ने हिंदी लेखकों को सेलिब्रिटी बनाने की कोशिश नहीं की?’ अब श्री वाजपेयी के इस भोलेपन पर कौन न रीझ जाए! हिंदी मीडिया को दोष देने से कुछ हासिल नहीं होनेवाला। मीडिया हिंदी का हो या अंग्रेजी का, वह बाजार के नियमों पर ही चलता है। वह उसी को सेलिब्रिटी बनाने की कोशिश करेगा जिनकी मार्केट वैल्यू हो या फिर जिसकी लोगों के बीच वकत हो। लालू यादव, स्वामी रामदेव, शहरूख खान, राखी सावंत के समानांतर सलमान रुश्दी, अरुंधति राय या विक्रम सेठ की अपनी मार्केट वैल्यू है। उनकी किताबों की लाखों प्रतियाँ बिकती हैं और लेखक के तौर पर उनकी प्रतिष्ठा विश्वव्यापी है। मगर हिंदी के लेखक के पास इन दोनों में से कुछ नहीं है - न मार्केट वैल्यू न वकत। लाखों की बात कौन कहे, हमारे मूर्धन्य लेखकों की पुस्तकों का 500 प्रतियों का पहला संस्करण ही सरकारी खरीद का मुहताज होता है। ऐसे में हिंदी हो या अंग्रेजी मीडिया, आपको कौन सेलिब्रिटी बनाएगा?

Thursday, April 29, 2010

क्लैसिक के बहाने कुछ बातें

हिन्दीबाजी-6
~अभिषेक कश्यप*


भाग-5 से आगे॰॰॰॰

हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर लिखी समीक्षाओं-आलोचनाओं में ‘क्लैसिक’ शब्द पर बहुत जोर दिया जाता है। अखबारों के लिए समीक्षा लिखनेवाले कई नवसिखुए तो किसी ऐरे-गैरे के उपन्यास या कविता-संग्रह को क्लैसिक बताने में तनिक संकोच नहीं करते। यही नहीं, सरकारी पैसे पर शोध करने वाले विद्यार्थी और विश्वविद्यालयों में हिंदी की प्रोफेसरी करते हुए मोटी तनख्वाह, सामाजिक सुरक्षा-प्रतिष्ठा का भरपूर उपभोग करने वाले हमारे आलोचकगण भी अपनी परंपरागत विद्वता के बूते इस-उस किताब को क्लैसिक बताते रहते हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्लैसिक का मतलब आखिर क्या है? दूसरे शब्दों में कहें तो किसी किताब या कृति को क्लैसिक कहने के मानदंड क्या हों?

इस मसले को लेकर पर्याप्त बहस और विवाद की गुंजाइश है। मगर कई साल पहले उर्दू के एक मशहूर लेखक ने किसी किताब के हवाले से क्लैसिक के बारे में जो बात कही, उसका मैं मुरीद हो गया। उन्होंने बताया-‘क्लैसिक वह कृति है, जो लोगों की जिन्दगी में इस कदर घुल-मिल जाए कि लोग उसमें अपने-अपने अर्थ निकालने लगें।’ मतलब ऐसी कृति जिसकी कहानी लोग अपने-अपने ढंग से कहने-सुनने लगें। किताब से बाहर लोगों की जिन्दगी पर जिसका ऐसा सर्वव्यापी असर हो कि हर शख्स के पास उसके परिवेश, घटनाओं और पात्रों की अपनी व्याख्याएं हों। ऐसी कृति जो जनमानस की सामूहिक स्मृतियों का निर्माण करे।

इस विचार की रोशनी में मैं आधुनिक हिंदी साहित्य की क्लैसिक मान ली गई कृतियों पर नजर डालता हूँ। सबसे पहले उपन्यासों की तरफ देखता हूँ- ‘गोदान’ (प्रेमचंद), ‘त्यागपत्र’ (जैनेंद्र कुमार), ‘मैला आंचल’ (फणीश्वर नाथ रेणु), ‘शेखर एक जीवनी’ (अज्ञेय), ‘सारा आकाश’ (राजेन्द्र यादव), ‘राग दरबारी’ (श्रीलाल शुक्ल), ‘कितने पाकिस्तान’ (कमलेश्वर), ‘नौकर की कमीज’ (विनोद कुमार शुक्ल) आदि......................फिर कहानियों की तरफ जाता हूँ- ‘उसने कहा था’ (चंद्रधर शर्मा गुलेरी), ‘पूस की रात’, ‘कफन’(प्रेमचंद), ‘भेडिय़े’ (भुवनेश्वर), ‘परिंदे’ (निर्मल वर्मा), ‘हत्यारे’ (अमरकान्त), ‘राजा निरबंसिया’ (कमलेश्वर),‘जहां लक्ष्मी कैद है’ (राजेन्द्र यादव), ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘और अंत में प्रार्थना’ (उदय प्रकाश) आदि। कविताओं में तत्काल निराला की ‘सरोज स्मृति’, ‘राम की शक्ति पूजा’ और मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ याद आती है।

मैं खुद से सवाल करता हूँ- ‘ऊपर मैंने आधुनिक हिंदी साहित्य की जिन निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण कृतियों के नाम दिए ... और भी अनेक कृतियां, स्थानाभाव की वजह से जिनके नाम यहां दे पाना संभव नहीं, में से कोई ऐसी कृति है, जनमानस पर जिसका असर तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’, मीरा के पद या कबीर के दोहे जैसा हो?’

बिना किसी दुविधा के तत्काल इस सवाल का जवाब दिया जा सकता है- ‘नहीं।’

यह कड़वी सच्चाई है कि आधुनिक हिंदी साहित्य की कोई ऐसी कृति नहीं जो ‘रामचरितमानस’ की तरह जनता की स्मृतियों में रची-बसी हो, नि:संदेह ‘रामचरितमानस’ क्लैसिक है। कोई यह कह सकता है कि तुलसी, सुर, मीरा या कबीर ने लोक जीवन में रच-बस जाने के लिए वक्त की एक लंबी दूरी तय की है। जबकि आधुनिक हिंदी साहित्य की उम्र महज सौ-डेढ़ सौ बरस की है। हिंदी साहित्य के कई सुरमा आज गर्व से यह कहते नजर आते हैं कि दो सौ या पांच सौ साल बाद जिस लेखक की कृतियां बची रह जाएं वही ‘सच्चा लेखक’ होगा। अफसोस कि उनकी आंखें बंद हैं, इसलिए 200-500 साल के बाद की कौन कहे आज ही उनकी किताबें ढाई सौ-पाँच सौ प्रतियाँ छपती हैं और सरकारी पुस्तकालयों के कब्रगाह में कैद हो जाती हैं। अगर हम जानना चाहें तो भारतीय भाषाओं में ही कालजयी लेखकों और क्लैसिक कृतियों के कई उदाहरण मिल सकते हैं।

रवीन्द्रनाथ टैगोर और उनकी कृतियाँ बंगाली जनमानस में किस कदर रची-बसी हैं यह बताने की जरूरत नहीं। यही नहीं, हिंदी के लेखकों, शोध छात्रों और साहित्यिक पाठकों से इतर मैंने हिंदी भाषी प्रदेशों के आम लोगों के बीच जिस कहानी की सबसे ज्यादा चर्चा सुनी है वह हिंदी कथा साहित्य के प्रतीक-पुरुष प्रेमचंद की नहीं, बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र की है- देवदास। मुझे ऐसे कई लोग मिले हैं जो शरतचंद्र को नहीं जानते, न ही यह जानते हैं कि ‘देवदास’ एक उपन्यास है। देवदास और पारो की प्रेमकथा को वे किसी उपन्यासकार की कल्पना नहीं बल्कि सच्ची कहानी मानते हैं, जो वास्तव में कभी घटी थी।

मैं समझता हूँ जो कृति ऐसा असर पैदा करे, वही क्लैसिक कही जा सकती है। दुनिया भर में ऐसे कई लेखक हैं जिनकी कृतियाँ क्लैसिक के इस मानदंड पर खरी उतरती हैं। चेखव की कई कहानियों में हर तबके के लोगों के सर चढक़र बोलने वाला जादू मौजूद है। महान लातिनी-अमेरिकी उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया माक्र्वेज का उपन्यास ‘हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिटयूड’ ऐसा ही क्लैसिक है जिसकी जादुई सफलता हैरतअंगेज है। वर्ष 1982 में ‘नोबल पुरस्कार’ से नवाजे गए इस उपन्यास की अब तक विभिन्न भाषाओं में ढाई करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी है। माक्र्वेज अभी जीवित हैं और किंवदंती बन चुके हैं। जो कोलंबिया गए हैं वे जानते हैं कि माक्र्वेज एक लेखक का नहीं, जनता में समाहित एक विचार का नाम है और ‘हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिटयूड’ सहित माक्र्वेज की कई कृतियाँ समीक्षाओं-आलोचनाओं से परे सचमुच क्लैसिक हैं यानी जनता की स्मृतियों में रच-बस गई हैं।

बेशक हिंदी को ऐसे लेखकों और ऐसी क्लैसिक कृतियों की सख्त दरकार है। आने वाले समय के लिए हिंदी साहित्य के लिए इससे अच्छी शुभकामना और क्या हो सकती है।

Thursday, April 22, 2010

हिंदी समाज में बुद्धिजीवी नैतिक पहचान का संकट

हिन्दीबाजी-5
~अभिषेक कश्यप*


भाग-4 से आगे॰॰॰॰

बरसों पहले की बात है। तब मैं दिल्ली नया-नया आया था। एक मित्र मुझे अपने साथ सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम ले गए। वहां विख्यात लेखक-बुद्धिजीवी एडवर्ड सईद के जीवन और अवदान पर केन्द्रित एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म का प्रसारण होना था। उन दिनों सईद की किताब ‘ओरिएंटलिज्म’ की काफी चर्चा थी और हिंदी की कई छोटी-मंझोली साहित्यिक पत्रिकाओं में सईद की राष्ट्रवाद की अवधारणा को लेकर अच्छी-खासी बहस चल रही थी। इसलिए सईद पर केंद्रित इस फिल्म को लेकर मैं बहुत उत्सुक था। फिल्म देखने आए छात्र-छात्राओं में ज्यादातर युवा थे- जवाहर लाल नेहरू और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं। और वाकई वह एक बेहतरीन ड्रॉक्यूमेंट्री फिल्म थी। बाद में मुझे पता चला, वह फिल्म इतनी पसन्द की गई कि उसका रिपीट शो करना पड़ा। फिल्म निर्देशक का नाम अब याद नहीं आ रहा मगर सईद से बातचीत के दौरान उसकी गर्मजोशी और जिरह की मुद्रा अब भी मेरे जेहन में दर्ज है। बातचीत के दौरान सईद से उसने एक दिलचस्प सवाल पूछा- ‘आपकी जड़ें दक्षिण एशिया से जुड़ी है, आपका मजहब इस्लाम है और रहते आप यूरोप में हैं...... आप खुद को कहां का मानते हैं? आप कहां से बिलांग करते हैं ?’ एडवर्ड सईद ने दो टूक जवाब दिया-‘देशकाल, धर्म, जाति और सम्प्रदाय से परे बुद्धिजीवी की अपनी एक अलग नैतिक पहचान होती है!’
सईद के इस विचार की रोशनी में हिंदी के लेखकों-बुद्धिजीवियों की जीवनशैली और गतिविधियों को देखें तो हम खुद को एक गहरे शर्म और अफसोस से घिरा पाएंगे।
‘क्या हिंदी के बुद्धिजीवियों की कोई आइडेंटिटी’ है? इस सवाल का जवाब साफ है-‘नहीं ।’
किसी लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी के लिए यह जरूरी है कि सबसे पहले वह अपनी पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठïभूमि से ऊपर उठे। परिवार, समाज और राजनीति में रहते हुए भी वह उसका हिस्सा न बने, बल्कि वह चीजों को एक अलग नजरिए से देखने का अभ्यास रखे। वह उन बंधनों, आदतों और पूर्वाग्रहों से निरंतर ऊपर उठने की कोशिश करे जो यथास्थिति बनाए रखने की पक्षधर हैं। तभी वह हालात की जटिलताओं को समझ और व्यक्त कर सकता है। मगर दुर्भाग्य से हमारे बुद्धिजीवी उन्हीं आदतों, रूढिय़ों और पूर्वाग्रहों के आसानी से शिकार हो जाते हैं, जिनसे हमारा हिंदी समाज ग्रस्त है।
हिंदी के बुद्धिजीवियों के लिए लिखना समाज और राजनीति में बदलाव के लिए एक एक्टिविस्ट की तरह मिशन भाव से काम करते हुए बुद्धिजीवी होने की अपनी स्वतंत्र नैतिक पहचान के लिए संघर्ष करना नहीं है। लेखन उनके लिए एक करियर है, जिसके जरिए वे ताउम्र पुरस्कार, पद, प्रतिष्ठा का जुगाड़ करते रहते हैं। उत्तर-आधुनिकता, भूमंडलीकरण, बाजारवाद और अस्मिता-विमर्श जैसे पश्चिम से आयतित जुमले लेखन का करियर चमकाने में उनकी खूब मदद करते हैं। यह बात और है कि अपने देश की जमीनी हकीकतों से उनका वास्ता न के बराबर होता है। इसलिए अपने देश में घटी हर छोटी-बड़ी घटना-दुर्घटना को वे पश्चिम से आयातित इन्हीं जुमलों की मदद से समझने-समझाने की कोशिश करते हैं।
हमारे बुद्धिजीवी बात भले साम्यवाद की करते हैं मगर उनका मूल वाद है - अवसरवाद। वे समाज के हित और राजनीति में व्यापक बदलाव की बात करते हैं मगर उनकी मुख्य रूचि लेखन के करियर के जरिए अपने निजी हितों को साधने में होती है।
हिंदी के ज्यादातर लेखकों-बुद्धिजीवियों की जीवनशैली ठीक वैसी ही है जैसी विचार शून्यता में लबालब डूबे हिंदी पट्टी के किसी खाते-पीते मध्यवर्गीय की हो सकती है। लेखन उनके लिए सामाजिक सुरक्षा और प्रतिष्ठा पाने का कारगर औजार है, जिसके जरिए वे ठीक उसी तरह ज्यादा-से-ज्यादा भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने की होड़ में लगे रहते हैं जिस तरह कोई डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, दलाल या व्यवसायी। वे कुछ खोने को तैयार नहीं। सुरक्षित मध्यवर्गीय जिंदगी जीते और ताउम्र पैसा, पद, पुरस्कार की होड़ में शामिल वे बस एक चीज खोते हैं- अपनी नैतिक पहचान।

Thursday, April 15, 2010

हिंदी में क्यों नहीं होते बेस्टसेलर

हिन्दीबाजी-4
~अभिषेक कश्यप*


भाग-3 से आगे॰॰॰॰

इधर मैंने अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित कई बेस्टसेलर पढ़े। इनमें से ज्यादातर सेल्फ-हेल्प पुस्तकें थीं, जिन्हें भोपाल के मंजूल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है। पहली बार साल २००३ में मैंने नेपोलियन हिल की ‘थिंक एंड ग्रो रिच’ (हिंदी अनुवाद: सोचिए और अमीर बनिए) पढ़ी और तभी से मुझे ऐसी किताबों का चस्का लग गया। कुछ वैचारिक असहमतियों के बावजूद इनमें से ज्यादातर किताबों ने आइडिया, सहज भाषा-शैली और पाठकों को मुरीद बनाने के अपने कौशल की वजह से मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्र्षित किया। पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में अपने विलक्षण योगदान के लिए जाने जानेवाले अरविंद कुमार ने भी कुछ साल पहले अपना प्रकाशन शुरू किया है-‘अरविंद कुमार पब्लिशर्स।’ इस प्रकाशन के जरिए वे नए-नए विषयों की बेहद सुंदर, उपयोगी और पठनीय पुस्तकें किफायती दाम पर पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। मगर अफसोस कि मंजूल, अरविंद कुमार पब्लिशर्स और ऐसे ऊंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद प्रकाशक पेशेगत विश्वसनीयता को बरकरार रखते हुए हिंदी में लीक से हटकर जो किताबें छाप रहे हैं, वह सब अंग्रेजी भाषा की बेस्टसेलर हैं। हिंदी में आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित इन किताबों के आवरण पर खासतौर से यह सूचना दर्ज होती है कि दुनिया भर में इस खास पुस्तक की कई लाख प्रतियां बिक चुकी हैं और यूरोप व अमेरिका के अखबारों ने इसकी प्रशंसा में ये शब्द कहे हैं। कवर पर दी गई ऐसी सूचनाएं किताब के प्रति पाठकों में उत्सूकता जगाती हैं और किताब की बिक्री का सकारात्मक माहौल तैयार करती हैं।
सवाल यह उठता है कि ऐसी किताबें हिंदी में क्यों नहीं लिखी जातीं जबकि इन किताबों का हिंदी में एक बड़ा पाठक वर्ग मौजूद है। यकीन न हो तो अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स के हिंदी संस्करण छापने वाले प्रकाशकों के आंकड़ों पर गौर करें। मंजूल पब्लिशिंग हाउस किसी भी पुस्तक के १० हजार से कम के संस्करण नहीं छापता। और इनमें से कई पुस्तकों के वह साल भर में कई संस्करण छाप कर बेच लेता है। कुछ साल पहले मंजूल ने जे.के. राउलिंग की हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तक ‘हैरी पॉटर : एन आर्डर ऑफ फीनिक्स’ की हिंदी में एक लाख प्रतियां छापी जो महीने भर में बिक गई। इसके बरक्स कहानियां-कविताएं छापनेवाले हिंदी के परंपरागत प्रकाशकों के प्रकाशन के आंकड़ों पर गौर करें तो मन खिन्न हो जाएगा। हिंदी साहित्य के परंपरागत प्रकाशकों का सरकारी खरीद और पुस्तकालयों के प्रति प्रेम जगजाहिर है। और हमारे लेखकों-बुद्धिजीवियों का तो कहना ही क्या! वे तो जैसे-तैसे किताब छप जाए उसी में खुद को धन्य मानते हैं। प्रकाशक पर पेशेगत विश्वसनीयता के लिए दबाव बनाना तो दूर, ज्यादातर लेखक तो अपनी रॉयल्टी मांगने में भी संकोच करते हैं। शायद इसलिए हिंदी साहित्य का बड़ा-से-बड़ा प्रकाशक पहला संस्करण 500 प्रतियों का छापता है और अधिकांश किताबों का तो पहला संस्करण ही नहीं बिक पाता कि दूसरे की नौबत आए।
खैर, मैं फिर अपने बुनियादी सवाल पर आता हूँ- हिंदी में बेस्टसेलर की परंपरा क्यों नहीं है? इसकी कई वजहें खोजी जा सकती हैं मगर एक सीधी और साफ वजह यह समझ आती है कि हमारे लेखकों के पास नए विचारों का अभाव है या फिर सृजन से ऊपर वे प्रक्रिया के महत्व पर गौर नहीं करते। शायद इसलिए श्रमसाध्य लेखन की संस्कृति विकसित नहीं हो पायी, जहां नए विचार हों और जो पाठकों को लुभाए भी।

Thursday, April 08, 2010

अकादमियों का भाईचारावाद

हिन्दीबाजी-3
~अभिषेक कश्यप*


भाग-2 से आगे॰॰॰॰

हिंदी साहित्य के संवर्द्धन और विकास के लिए बनी संस्थाओं और अकादमियों के भाईचारा और संपर्क कौशल की मिशाल कहीं ढूंढ़े नहीं मिलेगी। इसमें भी अगर संस्था या अकादमी सरकारी हुई तो माशाअल्ला! सरकारी होने की वजह से इन संस्थाओं और अकादमियों के कुर्ताछाप रघुपतिये सचिवों-उपसचिवों की आस्था साहित्य, विचार और सृजनात्मक गतिविधियों में कम लोकतंत्र में ज्यादा होती है। और भइया, लोकतंत्र का तकाजा है कि आप भाईचारा को बढ़ावा दें और अपने संपर्क-कौशल को धार देते रहें। और इस पवित्र-पावन भाईचारावाद की वजह से अगर साहित्य जाता है तो जाए तेल लेने! अपने को क्या?
सचिव-उपसचिव के पद को सुशोभित करने वाले इन कुर्ताछाप रघुपतियों का लोकतांत्रिक भाईचारावाद मित्रों, लाभ पहुंचाने वाले परिचितों और सुंदर स्त्रियों (कंवारी हो तो क्या कहने!) से शुरू होता है। औरत हो, युवा और सुंदर हो तो इस भाईचारावाद में वह पहले नंबर पर आएगी। ‘वो कहते हैं ना, लेडिज फ्रस्ट! हो-हो-हो।’
‘अरे काहे का साहित्य और काहे की प्रतिभा! आप तो इतनी सुंदर हो कि कुछ भी लिख दो तो कविता हो जाएगी।....... फिर हम जनता के पैसों से चल रही अपनी अकादमी में आपको कविता-पाठ(?) के लिए आमंत्रित कर लेंगे। आप कवयित्री होने का गौरव भी पा जाएंगी और कविता-पाठ के बाद हम आपको मानदेय के तौर पर रुपयों वाला लिफाफा भी पकड़ाएंगे! हो-हो-हो!’
बीते ३० नवंबर को साहित्य अकादमी की वार्षिक पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान आयोजित साहित्य-उत्सव के दूसरी गोष्ठी इसी भाईचारावाद का नमूना थी। आमंत्रित रचनाकारों में एक नवोदित कवयित्री भी थी, जिसके साहित्य में अभी दूध के दांत भी नहीं टूट्रे। उसकी कविताएं अभी इक्का-दुक्का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और हिंदी कविता के परिदृश्य में अभी उसकी कोई उल्लेखनीय पहचान नहीं। मगर शायद यहां इसी लोकतांत्रिक भाईचारावाद का असर था कि उसे कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कर लिया गया। जबकि हिंदी पट्टी से रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आए प्रतिभाशाली नवोदित कवियों-कथाकारों की कोई कमी नहीं, जिन्हें कविता और कहानी-पाठ के लिए आमंत्रित कर साहित्य अकादमी भी धन्य होती। इनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्हें आर्थिक सहयोग की भी दरकार है। मगर इन पर कुर्ताछाप रघुपतियों की नजर तब पड़ती है जब वे अपना भाईचारावाद निपटा चुक होते हैं।
ऐसे में अब समय आ गया है कि जनता के पैसे से चलने वाले इन संस्थाओं और अकादमियों को लेखकों, पाठकों और श्रोताओं के प्रति जवाबदेह बनाने की मुहिम शुरू की जाए। यह भी तय होना चाहिए कि इन अकादमियों का कामकाज, इनके आयोजन पारदर्शी हों और इनके फैसलों में युवा और नवोदित लेखकों-कवियों की भागीदारी सुनिश्चित हो। वरना हम इन अकादमियों और संस्थाओं के इसी तरह के भाईचारावाद को देखने और भोगने को अभिशप्त होंगे।
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*लेखक कहानीकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं

Thursday, April 01, 2010

अजब हिंदी प्रेम की गजब कहानी

हिन्दीबाजी-2
~अभिषेक कश्यप*


भाग-1 से आगे॰॰॰॰

हिंदी शायद संसार की इकलौती ऐसी भाषा है जिसके परजीवी मलाई-रबड़ी पर पलते हैं और श्रमजीवी अभाव, वंचना और अपमान का शिकार होते हैं। हिंदी के परजीवियों ने अपने पराक्रम से यह साबित कर दिया है कि बेईमानी, काहिली, चापलूसी और मक्कारी हमारे समय की सबसे बड़ी कलाओं का नाम है। हिंदी के मानसपुत्र श्रमजीवियों की व्यथा-कथा जितनी दर्दनाक है परजीवियों की सफलता और समृद्धि के किस्से उतने ही हैरतअंगेज।
इस बार यहाँ मैं एक ऐसा ही हैरतअंगेज किस्सा बयान कर रहा हूँ। इस किस्से का संबंध हिंदी के विख्यात लेखक कमलेश्वर और उनकी बेटी मानू से है। दो-तीन साल पहले कमलेश्वर जी की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके अभिन्न मित्र, यशस्वी कथाकार और ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि मैं ‘हंस’ के लिए कमलेश्वर के बारे में उनकी बेटी मानू से एक साक्षात्कार लूँ। इसी इंटरव्यू के दौरान मानू ने वह किस्सा मुझे सुनाया जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया।
यह उन दिनों की बात है जब कमलेश्वर मुंबई में थे और हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक हुआ करते थे। मानू तब मुंबई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में बी. ए. की छात्रा थी। वहाँ नियम था कि दाखिले का फार्म खुद अभिभावक को कॉलेज आकर लेना है। कमलेश्वर कॉलेज पहुँचे और दाखिले के फार्मवाली खिडक़ी पर कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। तभी कॉलेज के हिंदी विभाग के एक प्राध्यापक की उन पर नजर पड़ी। वह कमलेश्वर जी को यह कहते हुए कतार से निकाल लाए कि फार्म हम मंगवा देते हैं।
कमलेश्वर कॉलेज से लौटे और मानू को इस बात के लिए राजी किया कि बी. ए. में वह समाजशास्त्र की बजाए हिंदी साहित्य की पढ़ाई करे। मानू ने बताया कि वहां हिंदी विभाग में तीन प्राध्यापक थे मगर शायद पिछले कई बरसों से हिंदी विभाग में दाखिला लेने कोई विद्यार्थी नहीं आया था। और संयोग देखिए, इस कमी को कोई और नहीं हिंदी के एक यशस्वी लेखक की बेटी ने पूरा किया।
मानू ने आगे बताया कि पूरे तीन साल वह कॉलेज की ‘वीवीआईपी छात्रा’ रही। पढऩेवाली वह अकेली पढ़ाने वाले तीन!
हम मोटे तौर पर आकलन करें, किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में नियमित रूप से कार्यरत तीन प्राध्यापकों के वेतन और अन्य भत्तों पर कितना खर्च आता होगा? डेढ़ लाख? दो लाख? या इससे अधिक? और यह सिर्फ उसी कॉलेज की त्रासदी नहीं। अगर जाँच की जाए तो देश भर में ऐसे सैकड़ों महाविद्यालय-विश्वविद्यालय हैं जहां हिंदी विभाग में या तो कोई विद्यार्थी नहीं या इक्का-दुक्का विद्यार्थी हैं। ये इक्का-दुक्का छात्र-छात्राएँ वे हैं जिन्हें हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य से कोई लेना-देना नहीं। कई उदाहरण मैंने ऐसे भी देखे हैं जहां किसी फिसड्डी विद्यार्थी को नंबर कम होने या दूसरी वजहों से किसी अन्य विषय में दाखिला नहीं मिल पाता और वे ‘मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी’ की तर्ज पर हिंदी विभाग की शरण में आते हैं। खैर, विद्यार्थी हो न हो, हिंदी भाषा और साहित्य का कुछ भला हों न हों, हिंदी विभाग को तो रहना ही है। सरकार को राष्ट्रभाषा हिंदी पर अरबों रुपये जो खर्च करने हैं। चौंकिए मत, यह सरकार के ‘अजब हिंदी प्रेम की गजब कहानी’ है।
विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों के साथ-साथ सार्वजनिक उपक्रमों के राजभाषा विभागों का भी यही आलम है। सितबंर महीने में ‘हिंदी पखवारा’ के 15 दिन गुजर जाने के बाद बाकी साल भर वे क्या करते हैं, यह शोध का विषय है।
कई साल पहले एक परियोजना के तहत मुझे सार्वजनिक उपक्रम के राजभाषा विभाग के एक हिंदी अधिकारी के साथ उनके कार्यालय में पूरा हफ्ता गुजारना पड़ा। 50 हजार रुपये का मासिक वेतन पानेवाले उन अधिकारी महोदय ने हफ्ते भर में सिर्फ एक छोटा-सा अनुवाद कार्य किया।
उस अनुवाद कार्य की बानगी देखिए। एक चपरासी उनके पास आया। बोला-‘डायरेक्टर साहब ‘सेलरी पेड हॉलिडे’ की हिंदी पूछ रहे हैं। इस कागज पर लिख दीजिए।’ उन्होंने थोड़ी देर सोचने के बाद लिखा- ‘सवेतन छुट्टी।’
50 हजार मासिक वेतन के हफ्ते भर का हिसाब होगा- साढ़े बारह हजार रुपए। दो शब्दों के अनुवाद की कीमत! जबकि एक पेशेवर अनुवादक को दो शब्दों के अनुवाद के लिए 20 पैसे प्रति शब्द के हिसाब से 40 पैसे और अधिकतम 5 रुपये प्रति शब्द के हिसाब से 10 रुपये मिलते हैं। 40 पैसे बनाम साढ़े बारह हजार रुपये।
मित्रो! यह 40 पैसा हिंदी के श्रमजीवियों की कीमत है और परजीवियों की कीमत 12500 रुपये। श्रम और बेईमानी के बीच का यह लंबा-चौड़ा फर्क क्या कभी कम होगा?
खैर, जो भी हो, सरकार के इस हिंदी प्रेम की नजर उतारनी चाहिए ताकि हिंदी के परजीवी ताउम्र ‘सवेतन छुट्टी’ का आनंद लेते हुए दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें। आमीन!
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*लेखक कहानीकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं

Thursday, March 25, 2010

एक भाषा हुआ करती है

आज से हम हिन्दी भाषा, साहित्य, इसमें बाज़ार और बनियाबाज़ी की घुसपैठ पर युवा कहानीकार अभिषेक कश्यप की पड़तालों की शृंखला का प्रकाशन शुरू कर रहे हैं। 'हिन्दीबाज़ी' नामक इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रत्येक वृहस्पतिवार को अभिषेक कश्यप हिन्दी भाषा और भाषाबाजों की नीयत पर रोशनी डालेंगे॰॰॰॰॰



एक भाषा हुआ करती है!
~अभिषेक कश्यप*

हिंदी शायद संसार की इकलौती ऐसी भाषा है जिसके परजीवी मलाई-रबड़ी पर पलते हैं और श्रमजीवी आर्थिक तंगी, अभाव, वंचना और अपमान का शिकार होते हैं। यह कड़वा सच है कि हिन्दी को जिन मनीषियों ने आधुनिक दृष्टि दी, नये मुहावरों, वाक्य-विन्यासों से लैस किया, अपने कृतित्व के जरिए जिन्होंने हिंदी को जनता की जुबान बना दी, उन्हें अपमानित, प्रताडि़त और विक्षिप्त होना पड़ा। उनमें से ज्यादातर मनीषियों को ताउम्र दो वक्त की रोटी की जद्दोजहज के बीच एक कठिन जिद के बूते अपनी रचनात्मक प्रतिभा को बचाए रखना पड़ा। एक ऐसी भाषा जिसमें साँस लेते हुए रघुवीर सहाय अपमानित हुए, मुक्तिबोध अभाव, वंचना और लंबी बीमारी से ग्रस्त होकर मरे, महाकवि निराला अर्द्ध-विक्षिप्त हुए और भुवनेश्वर ने मानसिक संतुलन खोकर भीख मांगते हुए दम तोड़ा। इसके उलट जो परजीवी हुए, प्रबंधन कुशल रहे वे हिन्दी की मलाई-रबड़ी खा-खाकर अघाते रहे।
हिंदी के परजीवी बनकर भ्रष्ट नेताओं, अफसरों, चमचों और मसखरों ने ताकत और सत्ता हासिल की। विश्वविद्यालय, सरकारी अकादमियां और सार्वजनिक उपक्रमों के हिंदी विभाग तो इन परजीवियों के सबसे सुरक्षित, सबसे आरामदेह शरणगाह रहे हैं। यहां मोटी तनख्वाह के साथ सेमिनारों, गोष्ठियों, कार्यशालाओं की मौज-मस्ती और विश्व हिंदी सम्मेलनों, विदेश यात्राओं का सुख भोगते हुए ये परजीवी हिंदी के उन श्रमजीवियों को हिकारत की नजर से देखते हैं जिनके लिए हिंदी और भाषा का संस्कार ही जीवन है। ये वे लोग हैं जो हिंदी भाषा और साहित्य के लिए घर फूँक तमाशा देखने में तनिक संकोच नहीं करते। जो अपनी मेहनत की कमाई से लघु पत्रिकाएँ निकालते हैं, कहानियाँ-कविताएँ लिखकर हिन्दी ही नहीं अहिंदी भाषी प्रदेशों के वाशिंदों को भी हिंदी भाषा और साहित्य से जुडऩे के लिए प्रेरित करते हैं। देशभर में ऐसी सैकड़ों प्रतिभाएं हैं जो छोटी-मोटी नौकरियां, धंधे यहां तक कि किसी बनिये के दुकान पर हजार-पन्द्रह सौ की बेगारी खटते हुए भी तमाम अभावों के बावजूद हिंदी के लिए वह कर रही हैं, विश्वविद्यालयों के मुफ्तखोर हिंदी प्राध्यापक, सरकारी अकादमियां और सार्वजनिक उपक्रमों के हिंदी विभाग जिसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। खासकर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्राध्यापक कहे जाने वाले मसखरे तो प्रतिभाहीन नकलचियों को ‘फंटूशलाल जी की कविताओं में स्त्री-विमर्श’ सरीखे निरर्थक विषयों पर पीएचडी की डिग्री बाँटने में ही व्यस्त हैं। और सरकार ऐसे मसखरों और नकलची शोध छात्रों को तनख्वाह-वजीफे के साथ तरह-तरह की सुविधाएँ देकर धन्य होती है।
हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने अपनी भाषा-शृंखला की लंबी कविता ‘एक भाषा हुआ करती है’ में इस हौलनाक विडंबना को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है-
‘एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएँ और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं
बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती
गाती बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और
सबसे खूंखार सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और गरीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा
वह भाषा जिसे वक्त-जरूरत तस्कर, हत्यारे, नेता,
दलाल, अफसर, भंडुए, रंडियाँ और जुनूनी
नौजवान भी बोला करते हैं
वह भाषा जिसमें
लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएँ
‘ईश्वर’ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध
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एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीनेवाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बाँटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिट्ठियाँ
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भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दंडनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबंधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां वर्जित हैं विचार
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भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शाल ओढ़ते हैं मसखरे
चाकर टांगते हैं तमगे
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अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिनभर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी
राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि।’

मित्रो! इस कविता से गुजरने के बाद क्या आपको हिंदी के अज्ञात कुलशील मानस पुत्रों, हिंदी के श्रमजीवियों की असहनीय व्यथा पर दु:ख नहीं हो रहा? क्या आपको विश्वविद्यालयों, अकादमियों, सार्वजनिक उपक्रमों में मलाई काटते हिंदी के परजीवियों और अपने नितांत निजी स्वार्थों व अश्लील महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंदी का इस्तेमाल करने वाले तस्करों, नेताओं, दलालों, चमचों, मसखरों और भंडुओं पर गुस्सा नहीं आ रहा?
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*लेखक कहानीकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं