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Saturday, January 03, 2009

....उठता है धुंआ

ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खासियत यही है कि आपकी नाराज़गी या खुशी जगजाहिर होने में चंद मिनट लगते हैं...हिंदयुग्म का वार्षिकोत्सव खत्म होते ही मुख्य अतिथि राजेंद्र यादव की कार्यक्रम में कही बातों पर तरह-तरह के मूड बनने लगे थे.... हिंदयुग्म की शोभा महेंद्रू ने सबसे पहले अपने ब्लॉग पर "शर्मिंदा हुई हिंदी" शीर्षक से नाराजगी ज़ाहिर की....फिर, हिंदयुग्म के कुछ और साथी भी अलग-अलग राय लेकर आये....
शोभा जी का गुस्सा आप यहां पढ सकते हैं....
http://ritbansal.blogspot.com/2008/12/blog-post.html
इस लेख को पढकर हिंदयुग्म की नीलम मिश्रा ने भी अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजी..आप भी पढें.....
संपादक


"राजेंद्र यादव जी के बारे में बहुत सारे पूर्वाग्रह तो पहले से ही घुले हुए थे... उन्हें खतरनाक और शर्मनाक में अन्तर नही पता है...उन्होंने कहा कि अब वो खतरनाक बातें कहने जा रहे हैं, वो सारी शर्मनाक बातें थी....
आप तो अतिथि के तौर पर शैलेश जी द्वारा बुलाए गए थे... हम भी मजबूर थे.."अतिथि देवो भव" भाव को मन में लिए बर्दाश्त करते गए...माननीय यादव जी, हमारा हिन्दयुग्म आपकी राजनीति का मंच नही था, यह काफ़ी आगे निकल गया है, हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं, मानवता की बात करते है, पर आप ............दो पंक्तियाँ कहनी है जो शायद आप जैसे लोगों के लिए ही कही गई हैं-बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर.. पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर मनु जी, आपकी टिप्पणी भी पढी...सही में कुछ बड़े नामों को हम भागदौड़ के चक्कर में मंच से आदर सहित पुकार नहीं पाये...मगर, बड़े आयोजन की छोटी गलतियां अगली बार न हों, इसका पूरा ध्यान रखेंगे...."
साभार
नीलम मिश्रा,
हिंदयुग्म