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Monday, January 24, 2011

इजिप्त की सैर- पिरामिडों के देश में

पंडित सुरेश नीरव


विश्वप्रसिद्ध पिरामिडों,ममियों और विश्व सुंदरी नेफरीतीती और क्लियोपेट्रा के देश इजिप्त के लिए 11जनवरी2011 को गल्फ एअर लाइंस की फ्लाइट से हम लोग बेहरीन के लिए दिल्ली से सुबह 5.30 बजे की फ्लाइट से रवाना हुए। इजिप्त की राजधानी केरों पहुंचने के लिए बेहरीन से दूसरी फ्लाइट लेनी होती है। जोकि पूरे चार घंटे बाद मिलती है। यहां का समय भारत के समय से पूरे तीन घंटे पीछे चलता है। बेहरीन के हवाई अड्डे पर उतरे तो वहां भारतीय चेहरों की बहुतायत देखने को मिली। यूं तो फ्लाइट में ही हमारे साथ जो लोग सफर कर रहे थे उससे हमें कुछ-कुछ अंदाजा लग गया था कि बेहरीन के निर्माण में मजदूर और इंजीनियर भारत के ही हैं। और फिर वहां जब ड्यूटी फ्री शॉप्स में जाकर खरीदारी की तो वहां के सेल्समैन ये जानकर कि हम भारत से आए हैं हम से हिंदी में ही बात करने लगे। एअरपोर्ट पर उड़ानों की सूचना अरबी,इंगलिश और हिंदी भाषा में दी जा रही थी इससे सिद्ध हो गया कि शेखों के पास भले ही पेट्रोल के कुएं हों मगर बेहरीन की ज़िंदगी के धागों का संचालन हिंदुस्तानियों के ही हाथ में है। और हिंदुस्तान के दफ्तरों में भले ही हिंदी को हिंदुस्तानी अधिकारी दोयम दर्जे का मानकर अपनी टिप्पणी अंग्रेजी में देते हों मगर बेहरीन में हिंदी की ठसक पूरी है। बेहरीन में वनस्पति बहुत कम है। हरियाली के मामले में बेहरीन का दिल्ली से कोई मुकाबला नहीं। यहां के बाशिंदे भारतीयों-जैसे ही नाक-नक्श और कद-काठी के ही हैं। जब तक बोलते नहीं पता नहीं चलता कि कि ये भारतीय हैं या बेहरीनी। दो घंटे बेहरीन में गुजारकर हम लोग दूसरी उड़ान से इजिप्त की राजधानी केरो के लिए रवाना हुए। और तीन घंटे की उड़ान के बाद केरो एअरपोर्ट पर उतरे। यहां का मौसम खुशगवार था और तापक्रम 13 डिग्री सेल्सियस था। दिल्ली की ठिठुरती सर्दी से घबड़ाए लोग जितनें ऊनी कपड़े लेकर आए थे वे कुछ जरूरत से ज्यादा साबित हुए। एअरपोर्ट से 11 किमी दूर गीजा शहर की होटल होराइजन में हमें ठहराया गया। यह इजिप्त की बेहतरीन होटलों में एक है। रास्तेभर उड़ती धूल और सड़कों पर फैली पोलीथिन थैलियों और बीड़ी-सिगरेट के ठोंठों को देखकर यकीन हो गया कि मिश्र की सभ्यता पर भारतीय सभ्यता की बड़ी गहरी छाप है। और नील नदी तथा गंगा नदी के बीच पोलीथिन का कूड़ा एक सांस्कृतिक सेतु है। नेहरू और नासिर की निकटता शायद इन्हीं समानताओं के कारण उपजी होगी। और निर्गुट देशों के संगठन का विचार इसी रमणीक माहौल को देखकर ही इन महापुरुषों के दिलों में अंकुरित हुआ होगा।
दिल्ली के सरकारी क्वाटरों के उखड़े प्लास्टर और काई खाई पुताई से सबक लेकर इजिप्तवासियों ने मकान पर प्लास्टर न कराने का समझदारीपूर्ण संकल्प ले लिया है। यहां मकान के बाहर सिर्फ ईंटें होती हैं।प्लास्टर नहीं होता। पुताई नहीं होती। दिल्ली की तरह मेट्रो यहां भी चलती है।लाइट और सड़कों के मामले में इजिप्त दिल्ली से आगे है। पिरामिड और ममियोंवाले इस देश की राजधानी केरों में एक अदद ग्रेवसिटी भी है। यानी कि कब्रों का शहर। जहां सिर्फ मुर्दे आराम फरमाते हैं। इनकी कब्रें मकान की शक्ल में हैं। जिसमें खिड़की और दरवाजे तक हैं। छत पर पानी की टंकी भी रखी हुईं हैं। और इन कब्रीले मकानों पर प्लास्टर ही नहीं पुताई भी की हुई है। मुर्दों के रखरखाव का ऐसा जलवा किसी दूसरे देश को नसीब नहीं। कब्रों की ऐसी शान-शौकत देखकर हर शरीफ आदमी का मरने को मन ललचा जाता होगा। ऐसा मेरा मानना है। यहां का म्यूजियम भी ममीप्रधान संग्राहलय है। हजारों साल से सुरक्षित रखी ममियां दर्शकों को हतप्रभ करती हैं। मन में प्रश्न उछलता है, इन निर्जीव शरीरों को देखकर कि अपना सामान छोड़ कर कहां चले गए हैं ये लोग। क्या ये वापस आंएंगे अपना सामान लेनें। हमारे यहां के सरकारी खजाने में किसी की अगर एक लुटिया भी जमा हो जाए तो उसे छुड़ाने में उसकी लुटिया ही डूब जाए। मगर इस मामले में इजिप्त के लोग बेहद शरीफ हैं। वो बिना शिनाख्त किए ही तड़ से किसी भी रूह को उसका सामान वापस लौटा देंगे। शायद इसी डर के कारण इनके मालिक अभी तक आए भी नहीं हैं। आंएंगे भी नहीं। मगर इंतजार भी एक इम्तहान होता है। और बार-बार इस इम्तहान में फेल होने के बाद भी इस मुल्क के लोग फिर-फिर इस इम्तहान में बैठ जाते हैं। और फिर हारकर खुद उनके मालिकों के पास पहुंच जाते हैं तकाज़ा करने। कि भैया अपना माल तो उठा लाओ। सब आस्था का सवाल है। गीजा में कुछ पिरामिड हैं मगर असली पिरामिड जो दुनिया के सात आश्चर्यों में शुमार हैं वे गीजा से 19 कि.मी. दूर सकारा में बने हैं। इन पिरामिडों की तलहटी में भी शाही ताबूतों में जन्नत नशीन बादशाहों के जिस्म आराम फरमा रहे हैं। इजिप्त के सर्वाधिक चर्चित 19 वर्षीय सम्राट तूतन खातून भी शुमार हैं। तमाम खोजों के बाद पता चला कि इतना बहादुर सम्राट सिर्फ 19 साल में मलेरिया के कारण जिंदगी से हार गया। एक साला मच्छर कब से आदमी के पीछे पड़ा है। उसे ममी बनाने के लिए। ममीकरण की केमिस्ट्री भी बड़ी अजीब है। हमारे गाइड ने हमें बताया कि ममीकरण के लिए पहले मृतक शरीर को बायीं तरफ से काटकर उसके गुर्दे,जिगर और दिल को निकालकर बाहर फेंक दिया जाता है।। फिर नाक में कील घुसेड़कर खोपड़ी की हड्डी में छेद कर के दिमाग को भी खरोंचकर बाहर फेंक दिया जाता है। फिर पूरे शरीर में सुइयां घुसेड़ कर शरीर का सारा खून भी निकाल दिया जाता है। इस प्रकार सड़नेवाली सारी चीजों को शरीर से निकाल दिया जाता है। इसके बाद मृतक शरीर को नमक के घोल में 40 दिन के लिए रख दिया जाता है। चालीस दिन बाद इस शरीर को नमक के घोल से बाहर निकालकर 30 दिन के लिए धूप में रखा जाता है। तीस दिन बाद फिर इस शरीर पर लहसुन,प्याज के रस और मसालों का लेप कर के तेज इत्र से भिगो दिया जाता है ताकि सारी दुर्गंध दूर हो जाए। ममियों के बाद बात करते हैं-पिरामिडों की। पिरामिडों में सबसे पहला पिरामिड सम्राट जोसर ने बनवाया। जिसे बनाने में पूरे बीस साल लगे। इजिप्त का हर किसान साल के पांच महीने इसके बनाने में लगाता था। सम्राट जोसर की कल्पना को अंजाम दिया उनके इंजीनियर मुस्तबा ने। इस पिरामिड में छह पट्टियां हैं। कहते हैं कि खोजकर्ताओं को इसकी तलहटी में 14000 खाली जार मिले थे। जो पड़ोस के किसी राजा ने फैरो को बतौर तोहफे भेंट किए थे। इससे लगा ही एक दूसरा पिरामिड है जो सम्राट जोसर के बेटे ने बनवाया था। पिता की इज्त के कारण उसने इस पिरामिड का आकार पिताजी के पिरामिड से जानबूझकर छोटा रखा था। इसके साथ ही एक और सबसे छोटा पिरामिड बना हुआ है। यहीं कुछ दूरी पर बना है-टूंब ऑफ लवर..यानीकि प्रेमी का मकबरा। जोकि साढ़े बासठ मीटर ऊंचा और अठ्ठाइस मीटर गहरा है। फैरो यहां के सम्राट की पदवी हुआ करती थी। इन्हीं मे एक फैरो था-एकीनातो। विश्वसुंदरी नेफरीतीती इसी फैरो की पत्नी थी। नेफरीतीती का इजिप्तियन में भाषा में मतलब होता है-सुंदर स्त्री आ रही है। सुराहीदार लंबी गर्दनवाली नेफरीतीती इजिप्त की पहचान और शान है। तमाम ऐतकिहासिक धरोहरों को संजोए केरो में दिल्ली की तरह मेट्रो भी चलती है। गीजा से एलेक्जेंड्रीया जाते हुए बीच में एक इंडियन लेडी पैलेस भी बना है। कौन थी वह भारतीय महिला इसका पता किसी को नहीं है। पर महल पूरी आन-बान शान के साथ आज भी मौजूद है।
ईसा से 300 साल पहले इजिप्त में ग्रीक आए। अलेक्जेंडर ने आकर फैरों की सल्तनत खत्म कर दी। और बसाया एलेक्जेंड्रिया। एक नया राज्य। लुक्सर को बनाया अपनी राजधानी। गीजा से एलेक्जेंड्रिया 290 किमी दूर है। बस से यहां तक आने में हमें पूरे चार घंटे लगे। रास्तेभर केले,अंगूर,आम,खजूर,आलू,बेंगन और ब्रोकली के खेत मन को लुभाते रहे। भूमध्यसागर की बांहों में तैरता एलेक्जेंड्रिया ग्रीक शिल्प से बना खूबसूरत शहर है। समुद्रतल इतना ऊंचा है लगता है अभी अभी किनारों को तोड़करप समुद्र सारे शहर को अपनी जद में ले लेगा। सन 1414 मे एलेक्जेंडर ने यहां अपना किला बनवाया था। और समुद्र किनारे ही बनाए थे अपने लाइट हाउस। इस शहर की खासियत यह है कि यहां जब चाहे बारिश हो जाती है। इसलिए यहां की सड़कें हमेशा पानी में में डूबी रहती हैं। गीली तो हमेशा ही रहती हैं। यह शहर मछली के आकृति का है। इसलिए इसे राबूदा भी कहा जाता रहा है। राबूदा का अर्थ है-मछलीनुमा स्थान। इस शहर के भीतर होरीजेंटल और वर्टिकल गलियां हैं। जो शहर के जिस्म में नाड़ियों की तरह फैली हुई हैं। इस शहर में बना है एक मकबरा-कैटैकौब मकबरा। इस टूंब में 92 सीढ़ियां हैं। दिलचस्प बात ये कि इस मकबरे की खोज सन 1900 में एक बंदर ने की थी। होता क्या था कि वहां जो भी बंदर जाकर उछलता उसकी टांग जमीन में फंस जाती। लोगों को ताज्जुब हुआ। वहां खुदाई की गई और उसका नतीजा रहा ये मकबरा। इतना विशाल मकबरा जमीन के दामन में छिपा मिला। इस मकबरे में भी सौंकड़ों जारों का जखीरा मिला था। कहा जाता है कि ग्रीक लोग जार में ही खाना खाते थे और एक बार जिस जार में वो खाना खा लेते थे उसे दुबारा उपयोग में नहीं लाते थे। इसलिए इतने जार यहां इकट्ठा हो गए। ग्रीक लोग इस मकबरे में रहते भी थे। इन ग्रीक लोगों ने इस भूमिगत मकबरे की दीवारों में सुरंगें बना रखी थीं, जिसमें कि वे शव दफनाया करते थे। इस तरह यह एक किस्म का सामुदायिक मकबरा है। एक बात बहुत महत्वपूर्ण है कि ग्रीक और रोमन में कभी युद्ध नहीं हुए क्योंकि ग्रीकों ने इजिप्शियन भगवानों का कभी अपमान नहीं किया। उस वक्त इजिप्त में 300 भगवान थे। रोमनों ने जब यहां कब्जा किया तो उन्होंने इन भगवानों को अस्वीकृत कर दिया और क्रिश्चियन धर्म का प्रचार करने लगे। इस कारण लोगों में असंतोष व्याप्त हो गया जिसके परिणामस्वरूप यहां इस्लाम धर्म अस्तित्त्व में आ गया। जो अभी तक है। वैसे रोमन राज्य की निशानी के बतौर यहां आज भी विशाल रोमन थिएटर मौजूद है। इस प्रेक्षाग्रह में एक साथ पांच हजार दर्शक बैठ सकते थे। और खासियत यह कि ईको सिस्सटम ऐसा कि बिना माइक के सारे लोग भाषण सुन सकें। आगे चलकर एक और स्मारक है-मौंबनी स्तंभ। अब वक्त बदलता है। जिसकी ताकीद करती है-मुहम्मद फरीद की प्रतिमा। इस बहादुर आदमी ने तुर्क और रोमनों से इजिप्त को आजाद कराया था। थोड़ा और आगे चलकर है- सम्राट इब्राहिम की मूर्ति। जो इजिप्तवासियों के शौर्य का प्रतीक हैं। दिल्ली के इंडिया गेट की ही तरह यहां भी इजराय़ल-इजिप्त युद्ध के दौरान शहीद सैनिकों की स्मृति में एक स्मारक बना हुआ है। नालंदा और तक्षशिला की टक्कर पर यहां भी है -एलक्जैंड्रिया लाइब्रेरी। जहां रखीं हैं लाखों दुर्लभ पुस्तकें। आगे है रेड सी। इस लाल सागर और भूमध्यसागर को जोड़ने का बीड़ा उठाया था-फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट नें। जो बाद में स्वेज नहर के रूप में आज भी हमारे सामने है। एलेक्जेंड्रिया में ट्रामें भी चलती हैं। एक उल्लेखनीय बात और...पूरे इजिप्ट में ट्रैफिक भारत से उलट दांयीं और चलता है।

हमारी संस्कृति में भोजपत्र बहुत महत्वपूर्ण है। इजिप्ट में वैसे ही महत्वपूर्ण है- पपाइरस। इसमें सुंदर कलात्मक कृतियां उकेरकर यहां पर्यटकों को रिझाया जाता है। पपाइरस केले के तने-जैसा रेशेदार-गूदेदार स्तंभ होता है। जिसमेंकि पिरामनिड की आकृति कुदरतन बनी होती है। इसलिए इजिप्शयन इसे भोजपत्र की तरह पवित्र मानते हैं। ये इसके रेशों को पीट-पीटकर कमरे की दीवार तक बड़ा कर लेते हैं और उस पर कलाकृतियां बनाते हैं। कुछ कलाकृतियां मैं भी खरीद कर लाया हूं। तन्नूरा और वेली नृत्य पर थिरकता इजिप्ट सूती कपड़ों और मलमल के लिए मशहूर है। खलीली स्ट्रीट और मुबेको मॉल यहां खरीदारी के मशहूर ठिकानें हैं। भारत की हिंदी फिल्में यहां खूब लगाव से देखी जाती हैं। इसलिए यहां के व्यापारी भारतीयों को देखकर..इंडिया...इंडिया.. अमिताभ बच्चन...शाहरुख खान और करिश्माकपूर के जुमले उछालने लगते हैं। इजिप्त में भारत के राजदूत के. स्वामीनाथन ने हमें अपनी मुलाकात में बताया कि यहां 4000 हिंदुस्तानी वैद्य रूप से रह रहे हैं। और भारत का यहां की अर्थव्यवस्था में 2.5 मिलियन डॉलर का निवेश है। पेट्रोकेमिकल,,डाबर, एशिया पेंट्स, और आदित्य बिड़ला ग्रुप ने यहां के बाजार पर अपने दस्तखत कर दिये हैं। भारतीय भोजनों से लैस यहां तमाम शाकाहारी होटलें भी हैं। शाकाहारी खाने को यहां जैन-मील्स कहा जाता है। इजिप्ट मे बिना प्याज-लहसुन के भी शाकाहारी भोजन मिल सकता है यह विचित्र किंतु सत्य किस्म की एक सुखद हकीकत है। इन सारे अदभुत अनुभवों को दिल में समेटे जब भी कोई भारतीय इजिप्ट से भारत लौटता है तो उसकी यादों की किताब में एक पन्ने का इजाफा और हो जाता है जिस पर लिखा होता है-इजिप्ट। पिरामिडों की तरह स्थाई यादों का प्रतीक- इजिप्ट।


*आई-204,गोविंदपुरम,ग़ज़ियाबाद-201001

Saturday, August 01, 2009

फ्रेंच का पिद आ त्रि और एक भारतीय पदयात्री

श्याम सखा की यूरोप-यात्रा- भाग 1

हिन्द युग्म के जाने माने लेखक श्याम सखा 'श्याम' पिछले ३ सप्ताह से यूरोप यात्रा पर हैं। उनकी यात्रा लगभग तीन माह चलेगी, यात्रा के दौरान वक़्त मिलने पर उन्होंने हमें अपने अनुभव भेजने के हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए पहली किश्त भेजी है आप भी आनन्द लें-


आपस में खेलते बच्चे

हम आज जेनेवा से 45 किलोमीटर दूरी पर बसे फ़्रेंच कस्बे अन्सी की सैर पर आए हैं। यह कस्बा एक विस्तृत झील के किनारे पर बसा है और यह झील एक नहीं कई झीलों से मिलकए बनी है या कह सकते हैं कि एक ही झील को अलग-अलग जगह कई नाम दे दिये गये हैं। कारण कई जगह इस झील का पाट संकरा हो जाता है और इस संकरे पाट के दोनों ओर के हिस्सों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। कसबे की खासियत इसका 300 साल पुराना बाजार है जो संकरी गलियों में बसा है। बिल्कुल हमारे पुराने शहरों जैसा। बस इन लोगों ने अपने आर्किटेक्चर को बिल्कुल 200-300 साल पुराना ही रहने दिया है- वही ईंटो वाली दुकानें, यहां तक की बाजार की सड़कें भी कोबल स्टोन हमारी छोटी ईंटों जैसे पत्थरों की बनी हैं। बाजार के दोनों तरफ़ झील से निकली एक नहर है। यह नहर पहले खेत सींचती थी, अब सैलानियों हेतु इस पर होटल हैं, कुछ व्यापारिक संस्थान भी हैं तथा कुछ रिहाइश भी।


बाज़ार का एक दृश्य


नहर और उसके किनारों की दुनिया

आज जिस बात ने सबसे पहले ध्यान खींचा, वह था इस नहर पर बने एक छोटे पुल पर जाने वाले रास्ते पर लगे बोर्ड ने आप भी देखें चित्र-


फ़्रेंच भाषा में लिखा है- फ़्रेंच भाषा में अगर शब्द के अंत में व्यंजन आजाए तो वह मूक रहता है जैसे restorent को फ़्रांसिसी रेस्तरां बोलते हैं यानी अन्तिम अक्षर टी (t) मूक रहता है। अब आप चित्र को दोबारा देखें और पढें; यह बनेगा पिद आ त्रि और इसे हिन्दी में देखें पदयात्री। ऐसे अनेक शब्द है जो लगता है संस्कृत भाषा से मिलते-जुलते हैं और इनका अर्थ भी वही है।

Saturday, May 02, 2009

सोने का पिंजर (अंतिम अध्याय)

तेरहवां अध्याय

अमेरिका का उत्तरी छोर, बर्फीली ठण्डी हवाएं चलना प्रारम्भ हो गयी हैं, कुछ ही दिनों में यहाँ बर्फ ही बर्फ होगी। तब किसी भी पक्षी का यहाँ रहना सम्भव नहीं होगा। पक्षियों के एक दल का नेता आकाश को निहार रहा है, बर्फ का गिरना महसूस कर रहा है। अब मुझे दक्षिण छोर की ओर चले जाना चाहिए, मन में चिन्तन चल रहा है। कहीं तो नवीन आशियाना तलाशना ही होगा! क्या हम इस बार सुदूर देश की यात्रा कर लें? मन में अचानक प्रश्न कौंध गया। भारत का नाम सुना था, क्या हम सात समुद्र पार कर भारत जा सकेंगे, मन में संशय बना हुआ था। बुजुर्ग और युवा पक्षियों से सलाह-मशविरा किया गया।
युवाओं ने कहा कि जब हमारा सैनिक, ईराक पर युद्ध कर सकता है तो क्या हम भारत में आश्रय की तलाश नहीं कर सकते? हम में भी हवाईजहाज जितनी ताकत है, उड़ने की।
अचानक सिकन्दर याद आ गया, उसने कैसे भारत पर चढ़ाई की थी? वह भी तो आज से दो हजार वर्ष से भी पूर्व समुद्र और रेगिस्तान को पार करता हुआ भारत पहुँचा था, तो फिर हम क्यों नही? हमारे यहाँ भी 500 वर्ष पूर्व यूरोप से कोलम्बस आया था।
प्रश्न पूर्ण हुए, उत्तर केवल एक ही था कि पक्षियों में असीमित शक्ति होती है और वे पूर्ण आकाश को नापने की क्षमता रखते हैं। बस फिर क्या था, दल को संकेत मिल गए, उड़ने को तैयार हो जाओ। संकेत मिलते ही सारा दल पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया। उन्हें कहाँ मनुष्यों की तरह सामान लादना था, बस उन्हें तो अपने दल के नेता के एक इशारे पर उड़ जाना था। वे सब उड़ चले, अपना लक्ष्य निर्धारित कर, अपनी मंजिल की ओर। युवा पक्षियों के मन में कौतुहल था, भारत को जानने की इच्छा थी, प्रश्न मन में कुलबुला रहे थे। आखिर पूछ ही लिया एक युवा पक्षी ने, कैसा है भारत?
प्रौढ़ पक्षियों के संक्षिप्त ज्ञान ने बाहर झाँकने की इच्छा जागृत की। वे बता रहे थे कि भारत एक प्राचीन देश हैं, वहाँ की जलवायु सभी प्रकृतिजन्य जीवों के अनुकूल हैं। वहाँ के पक्षियों को दूसरे देश की तलाश नहीं करनी होती। वहाँ के जंगल हरे-भरे हैं। बहुत प्रकार की वनस्पतियां वहाँ होती हैं। जंगलों में इतने फल होते हैं कि अधिकतर पक्षी वहाँ शाकाहारी हैं।
एक पक्षी ने प्रश्न कर लिया कि ये सब तुमको कैसे मालूम?
उसने कहा कि यहाँ चिड़ियाघर में भारत से पक्षी लाए जाते हैं। मुझे उनसे एकाध बार बात करने का अवसर मिला है।
फिर आपकी जानकारी ठीक ही होगी, वे सब खुश होकर बोले। यदि ऐसा अद्भुत देश हमारी धरती पर है तब तो उसे अवश्य देखना चाहिए।
सुना है कि वहाँ साइबेरिया आदि देशों से तो नियमित पक्षी जाते हैं। वो भारत से पास अवश्य हैं लेकिन हमारे हौंसले भी बुलन्द हैं। हम भी भारत की धरती को देखकर ही आएंगे। हमारे बच्चे भी हम पर गर्व करेंगे कि हमारे पूर्वज कभी भारत जाकर आए थे।
अब वे सब खुश होकर उड़ रहे थे और सम्वेत स्वरों में गा रहे थे।

एक पक्षी- जाना है उस देश जहाँ पंछी चहचाते
दूसरा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल मदमाते
तीसरा पक्षी- पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
चौथा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल बौराते।

एक पक्षी- हमने सुना है भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
दूसरा पक्षी- हमने सुना है भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
तीसरा पक्षी- जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
चौथा पक्षी- जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना है उस देश जहाँ जंगल इठलाते।

कई समुद्र पार करते हुए, आखिर एक दिन उनकी निगाहें मंदिर के गुम्बज पर पड़ी, जहाँ कतारबद्ध पक्षी बैठे थे।
शहर आ गया, भारत भूमि आ गयी, खुशी की लहर छा गयी।
एक सुंदर सी झील में, छोटा सा एक टापू, उसमें अनेक पेड़ लगे थे, उन्होंने वहीं अपना डेरा डाल दिया। झील में मछलियां भी खूब थी, तो भोजन की समस्या भी हल हो गयी। कई महिने यहाँ गुजारने थे, घौंसले बनाने शुरू हुए, कई अन्य भारतीय पक्षी भी उनके स्वागत में आ जुटे। भूरे और कृष्ण वर्ण के भारतीय पक्षी, उनके धवल स्वच्छ रंग को देख-देखकर आर्किर्षत होते, उनके साथ रहने का अवसर तलाशते। यहाँ के युवा पक्षियों ने उनकी आवाभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहाँ के स्वादिष्ट फलों को चखाया, जंगल की गंध से परिचित कराया। वे कभी बड़ के पेड़ से, कभी गूलर से, कभी आम से, कभी अमरूद से, कभी जामुन के पेड़ से फल तोड़कर लाते और उन फलों से उनको परिचित कराते। वे सब मछलियों पर निर्भर थे, उन्होंने कभी भी ये फल नहीं देखे थे। मीठे, खट्टे, तीखे फल उन्हें अच्छे लगने लगे थे। वे सारे ही इतने भांत-भांत के पेड़ों को देखकर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कभी भी अपने जंगल में फलदार पेड़ देखे ही नहीं थे।
आखिर, एक दिन उनके वापस जाने का समय आ गया। भारत के कुछ पक्षियों ने उनसे निवेदन किया कि हम भी तुम्हारा देश देखना चाहते हैं, क्या हम तुम्हारे साथ चल सकते हैं? उन्होंने सहजता से स्वीकृति दे दी।
अमेरिकी पक्षियों के दल के पीछे-पीछे भारतीय दल मुक्त गगन में उड़ान भर रहा था। उनका मन बल्लियों उछल रहा था, वे बड़े खुश थे कि हम एक बेहद खूबसूरत देश को देखने जा रहे हैं। कुछ पक्षी कल्पना करते और सोचते कि क्यों न हम वहीं रह जाएं? हमारे यहाँ की गर्मी, पानी की समस्या से हमें निजात भी मिल जाएगी। सुना है कि वहाँ के जंगल बहुत विशाल हैं! वहाँ रेत के अंधड़ भी नहीं हैं।
लेकिन वहाँ बर्फिली आँधियां हैं।
अरे कौन सा हमें हमेशा के लिए वहाँ रहना है। फिर किसी का रहने को मन भी करेगा तो क्या हम वहाँ नहीं रह पाएंगे? वहाँ भी तो इतने पक्षी रहते हैं।
पक्षियों का दल उड़ रहा था, समुद्र की सीमा प्रारम्भ हुई। रात में विश्राम लेने के लिए एक पहाड़ी का सहारा लिया गया। अमेरिकी पक्षी समुद्र में गोता मारकर मछलियां पकड़ लाए। अब भारतीय पक्षियों के होश उड़ गए। वे मछली नहीं खाते, उनका भोजन तो फल होता था। पहाड़ के पेड़ों पर भी फल नहीं, आखिर समुद्री बेलों के फलों से ही जैसे-तैसे करके काम चलाया। लम्बी यात्रा और भोजन की समस्या उनके सामने मुँह-बाए खड़ी थी। रास्ते में शहर आने लगे और अब वे बगीचों से फल चुराने लगे, क्योंकि जंगल में ही उनका हक था और जंगल में फल नहीं थे। लम्बी थका देने वाली यात्रा, भूखे-प्यासे रहकर जैसे-तैसे कटी। सोचा अमेरिका पहुँचकर सब कुछ ठीक हो जाएगा।
आखिर एक दिन उनके सपनों का शहर अमेरिका आ ही गया। वहाँ बर्फ विदा ले चुकी थी, पेड़ों पर पीत पत्तियां, सुनहरी आभा का निर्माण कर रही थी। कहीं-कहीं कोपलें भी फूटने लगी थीं। आभास हो रहा था कि बसन्त शीघ्र ही हरितिमा को जन्म देगा। लम्बे रास्ते की थकान उनके चेहरों पर थी, भूख-प्यास से उनकी ताकत क्षीण हो गयी थी। लेकिन फिर यहाँ घने जंगलों को देखकर उनकी थकान फुर्र हो गयी और अपने छितराए जंगलों पर शर्म आने लगी। अमेरिकी पक्षी ने बताया कि बहुत जल्दी ही यहाँ हरीतिमा छा जाएगी, तब चारों तरफ केवल हरियाली होगी। तुम देखना हमारे यहाँ का जंगल, कितना विशाल है!
सभी ने पेड़ पर अपना ठिकाना बना लिया। अब भोजन की तलाश शुरू हुई। पेड़ों पर कहीं भी फल नहीं थे, एक पेड़ से दूसरे पेड़, एक जंगल से दूसरे जंगल जाते रहे, लेकिन खाने को कुछ नसीब नहीं हुआ। पत्तियां खाकर भला कितने दिन जिन्दा रहा जा सकता है? कभी चोरी-छिपे बगीचों में पहुँच जाते और वहाँ के फलों से अपना गुजारा चलाते। लेकिन वहाँ हमेशा खुद के ही शिकार होने का खतरा मंडराता रहता। एक दो बार मछली खाने का भी प्रयास किया, लेकिन भारतीय शरीर उन्हें पचा नहीं पाया। एक दिन जंगल में फलों की तलाश करते-करते उनकी आशा ने दम तोड़ दिया। आखिर समय से पहले ही उन्होंने वापस जाने का मन बना लिया।
वे आपस में बतिया रहे थे कि इतने घने जंगल, फिर भी एक भी फल नहीं! ऐसे जंगलों से तो हमारे जंगल ही अच्छे, जहाँ सारे पेड़ों पर ही फल लगा करते हैं। पंछी भी कितने कम है यहाँ, हमें भी अपने अस्तित्व का खतरा पैदा होता जा रहा है। बहेलिया यहाँ नहीं हैं, लेकिन शिकारी तो हैं, चिड़ियाघर तो हैं!
आज वे सब बहुत खुश थे, वापस जाने को कतारबद्ध खड़े थे। अपने दल के नेता के इशारे का इंतजार कर रहे थे। इशारा हुआ और वे उड़ चले भारत के आकाश की ओर। वे सब गा रहे थे, वही गीत, जो विदेशी पक्षियों ने बनाया था। एक-एक पक्षी अपने स्वर में गीत गा रहा था और एक लम्बी यात्रा पर इस उत्साह से उड़ा जा रहा था कि मैं अपने देश में वापस लौट रहा हूँ।

पक्षी गा रहे थे -
जाना अपने देश जहाँ हम मिलजुल गाते
जाना अपने देश जहाँ जंगल चहचाते
पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
जाना अपने देश जहाँ जंगल मदमाते।

भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना अपने देश जहाँ जंगल इठलाते।

भारत में तो जंगल में भी भँवर उड़ा करते हैं
भारत में तो पेड़ों से भी गंध बहा करती है
मद झरते, गदराए, बौराए पेड़ों से
उड़ते प्रतिपल, कण पराग के रहते हैं
देखो मधुमक्खी भी शहद बनाया करती
जाना अपने देश जहाँ जंगल बौराते।



नोट- हमें यह बताते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि डॉ॰ अजित गुप्ता की इस यात्रा-संस्मरण की यह शृंखला जल्द ही मुद्रित संस्करण के रूप में उपलब्ध होगी, जिसे हिन्द-युग्म अपने आने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम में लोकार्पित करेगा।

Saturday, April 25, 2009

सोने का पिंजर (12)

बारहवां अध्याय

मैंने पचास दिन तक अमेरिका तुझे देखा है, तेरे यहाँ की मानसिकता को अनुभव किया है। लेकिन केवल पचास दिनों की ही मैं बात नहीं कर रही है। मैंने तो तुम्हें तभी से जानना शुरू कर दिया था तब बेटा तुम्हारे आकर्षण से बँधा तुम्हारे यहाँ पढ़ने गया था। सितम्बर 2001 से तुम्हें मैंने जाना और धीरे-धीरे पहचाना। तभी से अपने आसपास, घर-बार में देखती रही हूँ तुम्हारे विभिन्न रूप और साथ ही भारतीय युवा-पीढ़ी का एक नवीन रूप। जो तुम पर आसक्त है। तुम पर मोहित है। भारत के बंधनों से दूर वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं। हमारे यहाँ तो ठेठ गाँव से निकल कर आप कितनी ही दूर किसी भी महानगर में जाकर बस जाओ, आपके घरवाले और रिश्तेदार घूमते हुए आ ही जाएँगे। यदि आप दर्शनीय स्थानों पर रह रहे हैं तब फिर तो एक बहाना ही रहता है कि अरे अब तो अपना बेटा, भाई, भतीजा वहाँ रहता है, चलो उससे मिल भी आएँगे और जगह देख भी आएँगो। लेकिन अमेरिका जाना इतना आसान नहीं!
लेकिन अब अमेरिका भी तो कहाँ दूर रह गया है? अब तो माता-पिता और रिश्तेदार वहाँ भी पहुँचने लगे हैं। मुझे एक कहानी याद आ रही है। राजस्थान के एक राजा, युद्ध में हार जाते हैं। मरने के भय से वापस अपने शहर लौट आते हैं। लेकिन रानी इस कायरता को बर्दास्त नहीं कर पाती। वे शहर के दरवाजे बन्द करवा देती है। राजा सहित सारी फौज कई दिनों तक शहर के बाहर ही पड़ी रहती है।
आखिर एक दिन राजा की माँ आदेश देती है कि नगर के दरवाजे खोल दिए जाएं और मेरे बेटे को सम्मान सहित राजमहल में प्रवेश दिया जाए।
दरवाजे खुल गए और राजा रनिवास में आ गए।
माँ ने बहु से कहा कि बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद युद्ध से लौटा है, जाओ इसके लिए हलुवा बनाकर लाओ।
रानी हलुवा बनाने लगी। वह गुस्से में तो थी ही। कढ़ाई में हलुवे को जोर-जोर से पलटे से हिला रही थी।
माँ वहीं से चिल्लाई, बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद घर लौटा है। वहाँ लोहे से लोहे के टकराने की आवाज सुनकर माँ के आँचल में छिपने चला आया था, यहाँ भी तू लोहे से लोहा टकरायेगी तो फिर बेचारा अब छिपने के लिए कहाँ जाएँगा?
राजा तत्काल अपनी फौज लेकर रण के लिए चला गया।
हमारी नवीन पीढ़ी भी गृह-युद्ध से बचने के लिए तुम्हारे आँचल में शरण ली है, यदि अब पुनः उनके परिवारजन वहाँ भी जा पहुँचे तो फिर बेचारे किसकी शरण में जाएँगे? मेरा तो तुम से यही कहना है कि तुम हमारी राजमाता की तरह मन बनना। उन्हें कभी अपना कर्तव्य याद मत दिलाना। नहीं तो बेचारे वे कहाँ जाएँगे? उन्होंने यहाँ एक धारणा बना रखी है कि वे बहुत खुश है, खुशहाल भी हैं बस इसे बनाए रखना। भारत तो वैसे भी बूढ़ा हो चुका है। हजारों वर्षों से जी रहा है। आखिर कब तक और जीएगा? कभी तो इसका भी अन्त होना ही चाहिए न! तुम अभी जवान हो, अतः दुनिया के जवानों को अपने यहाँ एकत्र करो। अपना उत्थान करो। भारत के बूढ़ों का क्या है, उन्हें तो वैसे भी एक दिन मरना ही है।
भारत में राजस्थान ऐसा प्रदेश है जहाँ रेत के गुबार थे। पानी का नामोनिशान नहीं। फिर भी सेठाना था, लोग बड़ी-बड़ी हवेलियाँ बनाते थे। 10-20 कमरे तो आम बात थी, बड़े लोगों की हवेली में 100-100 कमरे हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे युवा-पीढ़ी को लगा कि यदि हम इन रेत के धोरों से बाहर निकलेंगे तो ज्यादा रईस हो जाएँगे और वे निकल गए, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास आदि बड़े महानगरों में। घर में बड़ी-बड़ी हवेली और मुम्बई में एक छोटी सी चाल! लेकिन जब गाँव लौटकर आते तो उनके लिए बग्गी लगती, ड्रेस वाला कोचवान सजता। धीरे-धीरे आकर्षण बढ़ा और राजस्थान के ये रेतीले धोरे रिक्त हो गए युवा-पीढ़ी से। रह गयी सुनसान, बाट जोहती हवेलियाँ। हवेलियों में उनके बूढ़े। शुरू-शुरू में तो बेचारा अकेले ही जाता था, अपनी नई नवेली दुल्हन को भी हवेली में ही छोड़कर जाता था। लेकिन फिर दुल्हन भी साथ ही जाने लगी। हवेली छोड़कर वो भी एक या दो कमरे के फ्‍लेट में रहने लगी।
मैं एक बार ऐसे ही एक सेठाने में गयी। मेरी एक सहेली वहाँ ब्याह करके गयी थी। देखा बड़ी सी हवेली है, बड़े-बड़े कमरे हैं। एक बैठक खाने में मोटे-मोटे गद्दे बिछे हैं, उनपर सफेद दूधिया चादरे बिछी हैं। दूसरे बैठक खाने में सोफे लगे हैं, गलीचे बिछे हैं। हमारे लिए बड़े से थाल में नाश्ता आया। जिसमें नाना प्रकार के व्यंजन थे। हवेली के पीछे धोबीखाना था, बड़ी सी गाड़ी का गेराज था। नौकरों के रहने की जगह थी। दिन में बहु-बेटियाँ बाजार में नहीं निकलती, रात होगी तब गाड़ी में पर्दे लगेंगे और फिर बहु-बेटियाँ शहर देखेंगी। हम अभिभूत थे, वो सेठाना देखकर। फिर महानगरों में भी इन्हीं सेठों का जीवन देखने का अवसर मिला। कोई चाल में रह रहा था और कोई दो कमरों के लेट में। ऐसी कोठियाँ तो शायद वहाँ टाटा-बिरला के पास भी न हो!
लेकिन अब वे हवेलियाँ उजड़ गयी हैं। रह गए हैं चैकीदार या किराएदार। मालिक कभी-कभार आते हैं। घर में जब विवाह का प्रसंग उपस्थित होता है तब ही गाँव की हवेली याद आती है। महानगर में तो शादी करें तो कहाँ करें? फिर दादा लोग अपना टेक्स वसूलने भी आ जाते हैं। इसलिए ये हवेलियाँ तभी सजती हैं और तभी इनमें चहल-पहल होती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सेठों के बच्चे नहीं गए, वे तो हमारे जैसे आम आदमी के बच्चे हैं। लेकिन अब वे आम घर भी सूने हो गए हैं। पहले राजस्थान में ही हवेलियाँ सूनी पड़ी थी लेकिन अब तो पूरे भारत के ही घर सूने हो रहे हैं।
बूढ़ों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वे बेचारे नौकरों के भरोसे रह रहे हैं और नौकर भी मौका देखकर उनका गला काट लेते हैं। रोज ही की खबर है, बूढ़ों की हत्या। सरकार भी क्या तो करे? कोई भी नहीं समझ पा रहा कि जिस देश ने दुनिया को ही एक परिवार के रूप में माना आज वहीं परिवार संस्था टूटती जा रही है। अब भारत की सरकारें भी कानून बना रही है, उनके पालन-पोषण का। कैसा जमाना आ गया है, पहले मेरे घर में भी ताले नहीं हुआ करते थे। अब तो मुझे रोज ही नए ताले खरीदने पड़ते हैं। वे हवेलियां कम से कम वार-त्यौहार, शादी-ब्याह के अवसर पर तो गूँजती हैं, लेकिन यहाँ तो सारे घर ही सूने हो गए। किसी के भी घर चले जाओ, एकेले बूढ़े माता-पिता बाहर बराण्डे में बैठे मिलेंगे। वे खोज रहे हैं उस आवाज को जो उन्हें पुकार ले। उनसे बतिया ले।
अमेरिका तुम वो अप्सरा हो, जिसके पीछे हमारी नौजवान पीढ़ी भाग रही है। वे तुम्हें पाना चाहती है, तुम में रमना चाहती है। हमारे यहाँ से श्रवण कुमार, राम, भीष्म जैसे पुत्रों की परम्परा समाप्त हो गयी है। अब उन्हें वे भी मिथक मानने लगे हैं। उन्हें तो बस याद है केवल तुम्हारा भौतिक स्वरूप। वे उसे पाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन फिर भी मेरा तुझको सलाम! कम से कम तुमने हमारी पीढ़ी को अहंकार से तो निजात दिला दी। पुरुष और महिला के अन्तर को तुमने इक सीमा तक समाप्त भी कर दिया। मुझे तो गर्व है कि अब हमारी महिलाएं भी वहाँ पति की तरह रहती हैं।
अमेरिका तुझे मेरा नमन! तेरे भौतिक स्वरूप को नमन! तेरे यहाँ बसी हमारी भारतीय पीढ़ी को नमन! नमन! किसलिए?
नमन इसलिए कि भारत अब भारत नहीं रहा। लेकिन वहाँ बसे भारतीयों के मन में भारत जन्म ले रहा है। हमारे त्यौहार बस एक परम्परा बनकर रह गये हैं जबकि तुम्हारे यहाँ वे उत्सव बने हुए हैं। युवा-पीढ़ी के आकर्षण के कारण बड़े लोगों का आकर्षण भी तुम्हारे प्रति बढ़ा है। अतः वे भी अब तुम्हें देखने जाने लगे हैं और तुम्हारा सच बाहर आने लगा है। जो कल तक तुमने हमारे अन्दर हीन भावना भरी थी अब वो मिटने लगी है। तुम्हारे यहाँ से आए माता-पिता अब कहने लगे हैं कि नहीं सुख तो भारत में ही है। जुबान का स्वाद तो भारत में ही है। तब मैं अपनी नवी पीढ़ी से कहती हूँ कि जब तुम्हें वहाँ अपनी खुशबू, अपने स्वाद की याद आए तब तुम भारत में आना। हमारे लिए नहीं आना। जब भी आओ स्वयं के लिए ही आना, तभी तुम भारत की कद्र कर सकोंगे। मेरी ये चंद पंक्तियां उन सभी को समर्पित हैं -

पीर गंध की जगने पर
हूक उठे तब तुम आना
मन के डगमग होने पर
अपने देश में तुम आना।

सन्नाटा पसरे मन में
दस्तक कोई दे न सके
चींचीं चिड़िया की सुनने
अपने देश में तुम आना।

घर के गलियारे सूने
ना ही गाड़ी की पींपीं
याद जगे कोलाहल की
अपने देश में तुम आना।

शोख रंगों की चाहत हो
फीके रंग से मन धापे
रंगबिरंगी चूंदड़ पाने
अपने देश में तुम आना।

सौंधी मिट्टी, मीठी रोटी
अपना गन्ना, खट्टी इमली
मांगे जीभ तुम्हारी जब
अपने देश में तुम आना।

बेगानापन खल जाए
याद सताए अपनों की
सबकुछ छोड़ छाड़कर तब
अपने देश में तुम आना।

कोई सैनिक दिख जाए
मौल पूछना धरती का
मिट्टी का कर्ज चुकाने तब
अपने देश में तुम आना।

वीराना पसरे घर में
दिख जाए बूढ़ी आँखें
अपनी ठोर ढूंढने तब
अपने देश में तुम आना।

तेरे वैभव से लौटने के बाद मेरी निगाहें पक्षियों पर चले गयी। यहाँ की गुलाबी सर्दियों में हजारों पक्षी विदेश से भारत चले आते हैं। उन्हें किसने बताया कि भारत स्वर्ग है? लेकिन उन्होंने खोज लिया। मुझे लगा कि हमारे पक्षी भी तो कभी चाहते होंगे, तेरे जैसे देशों का वैभव देखना। तो मैंने एक कल्पना की। तू देख कितना सच है और कितनी कल्पना है?

Wednesday, March 18, 2009

खंडहर होता सूर्य का रथ

पिछले दिनों पुरी की यात्रा के बारे में आपसे जिक्र किया। पुरी से आधा घंटा और भुवनेश्वर से करीबन डेढ़ घंटे दूरी पर स्थित है कोणार्क। पुरी और कोणार्क दोनों ही समुद्र तट से सटे हुए हैं। आज आपको कोणार्क लेकर चलूँगा। सूर्य भगवान को समर्पित यह मंदिर पूर्व की ओर मुख करे हुए है। कहते हैं पहले समुद्र की लहरें इस मंदिर के द्वार को छूती थीं लेकिन अब सागर इससे तीन किलोमीटर दूर हो गया है और बीच में आ गये हैं पेड़ व दुकानें। कोणार्क, कोण व अर्क (सूर्य) की संधि से बना एक शब्द है। सन १२५० में बने सूर्य को समर्पित इस मंदिर को राजा नरसिंह देव ने बनवाया।





इस की संरचना रथ के समान है जिसमें १२ जोड़ी पहिये लगे हुए हैं और इसे ७ घोड़े खींच रहे है। जी हाँ घोड़े....



शायद ही कोई एक घोड़ा आपको पूरा दिखाई देगा।

इस मंदिर की खासियत यह भी है कि यहाँ आप सूर्य की किरणों से समय जान सकते हैं। १२-१२ चक्र १२ महीनों के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के बारे में बताते हैं।



मंदिर परिसर में अंदर घुसते ही आपको दो मूर्तियाँ दिखेंगी। ज़रा गौर से देखिये।



सबसे नीचे इंसान, उसके ऊपर हाथी और फिर शेर। गाइड ने बताया कि हाथी लक्ष्मी को दर्शाता है और सिंह शक्ति को। इसका अर्थ यह हुआ है कि जब व्यक्ति के पास लक्ष्मी और शक्ति दोनों आ जाती हैं तो उसको घमंड हो जाता है और उसकी हालत असहाय व्यक्ति की तरह हो जाती है जैसा कि आप चित्र में देख पा रहे हैं।

इस दिशा द्वार को सिंह द्वार भी कहा जाता है। सिंह कहाँ है, इसके बारे में बाद में बताऊँगा।

मंदिर में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इस मंदिर के पत्थरों को लोहे से जोड़-जोड़ कर बनवाया गया। समुद्री हवाओं से मंदिर टूटता जा रहा है और इसी के मद्देनज़र पहले १९०३ में इसको ठीक करवाया गया और फिर बाद में १९८५ में इसकी मरम्मत हुई।



जमीन पर अंकित १९८५....



और ये १९०३..



मंदिर के अंदर आप घुस नहीं सकते क्योंकि उसको पत्थरों और सीमेंट से भरा जा चुका है। यदि उन खम्भों को निकाला गया तो मंदिर कभी भी ढह सकता है।



मंदिर में कुछ लोहे के खंभे लगे हुए थे वे अब एक ओर रखे गये हैं। खासियत यह कि इस पर जंग नहीं लगाया हुआ है और इसे देखने वैज्ञानिक भी आते हैं। जमीन से कुछ लोहे के टुकड़े अब निकाल दिये गये हैं।



स्तम्भों पर मूर्तियों की नक्काशी देखिये।



अब जरा मंदिर के प्रवेश द्वार को देखिये। बाईं और दाईं ओर आपको घोड़े दिख रहे होंगे जो रथ को खीच रहे हैं। यदि दिक्कत है तो आपको नीचे के चित्रों में दिखाई देंगें।



यहाँ कुछ नहीं है... जो थे वो अब नहीं हैं...



मंदिर की शिल्पकारी को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। सबसे नीचे आपको छोटे-छोटे हाथी बने हुए दिखाई देंगे। बच्चों को जानवरों की कहानियाँ पसंद होती हैं और उन्हें हाथी घोड़े अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसलिये उनके लिये राजा ने सबसे नीचे ऐसी ही नक्काशी करवाई।



बीच में आपको यौवन दिखाई देगा। कामसूत्र से प्रेरित उसकी विभिन्न मुद्रायें दर्शाती ये मूर्तियाँ जीवन के दूसरे पड़ाव को बताती हैं।



सबसे ऊपर हैं देवी-देवताओं की मूर्तियाँ। वृद्धाश्रम में इंसान ईश्वर का स्मरण करता है इसलिये राजा ने सबसे ऊपर उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाई। इस तरह पूरी हुई इंसान की जीवन यात्रा।



कालचक्र जिससे आप समय पता लगा सकते हैं।



पहियों के बीचों बीच लगे पत्थर की परछाई खम्भे के जिस हिस्से पर पड़ती है उससे समय की गणना होती है। चित्र के दाईं ओर पूरब है जहाँ से शुरु में सूर्य की किरणें आयेंगी। चक्र में ६ का अंक उस जगह है जहाँ हमारी घड़ी में ९ का अंक होता है। इस तरह पहली परछाई उसी पर पड़ेगी उसके बाद घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में उसके अंक चलते हैं। चक्र के चारों ओर बिंदु हैं जिनके बीच की दूरी तीन मिनट के बराबर होती है। इसी गणना के सहारे समय निकाला जाता है।


इन चक्रों के मध्य भी आपको युवतियों और देवी-देवताओं की आकृतियाँ दिखाईं पड़ जायेंगी।


यह है अश्व द्वार



यहाँ मंदिर की मरम्मत का काम चल रहा है। समुद्री हवा के थपेड़ों ने मंदिर को बेजान सा कर दिया है।



परिसर का तीसरा भाग... जो आप देख रहें हैं वो अब अपनी ऊँचाई का आधा हो चुका है। ऊपरी हिस्सा ढह चुका है।



ढही हुई कुछ और दीवारें।



ये सिंह द्वार का टूटा हुआ शेर....सिंह जंगल का राजा होता है... पर यहाँ....



गज द्वार... दोनों हाथी अब तक सही सलामत...कमाल है!!



बहुत मुश्किल से मंदिर को सम्भाल कर रखा हुआ है। उड़ीसा की मूर्तिकला को प्रदर्शित करता यह मंदिर अपने आप में अनूठा है। सरकार इस खंडहर होते मेंदिर को बचा ले तो ये बहुत बड़ी कामयाबी होगी। हमारे देश में वैसे भी इन ऐतिहासिक इमारतों व मंदिरों को कोई नहीं पूछता, वरना आमेर जैसे कितने ही किले और कोणार्क जैसे मंदिर असहाय से धूप में खड़े पथरीली आँखों से हमारी ओर नहीं ताकते.....

ओड़िशा से तपन शर्मा