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Thursday, March 18, 2010

मैंने अपने लिये सबसे सेफेस्ट खान को चुना हैः करीना कपूर

आज कल करीना कपूर फिल्मों की व्यस्तता को छोड कर अपने परिवार के साथ व्यस्त हैं। और हो भी क्यों नहीं , क्योंकि हाल ही में उन्हें दूसरी बार मासी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हमने उन्हें इस दूसरी बार मासी बनने की खुशी में बधाई देते हुए उनके व्यक्तिगत जीवन फिल्मों के बारे में लंबी बातचीत कर ली।

कैसा लग रहा है जब आपको दूसरी बार मासी बनने का सौभाग्य मिला है?
- यह तो अच्छा ही लग रहा है। नया बच्चा ‘कियान’ वाकई बहुत ही ख़ूबसूरत है। सामरिया बहुत कुछ संजय कपूर पर लगती है परन्तु यह नया बच्चा बहुत कुछ करिश्मा पर गया है। यह हमारे परिवार के लिए एक उत्सव मनाने का समय आया है क्योंकि बहुत दिनों बाद इस परिवार में लड़‌के का आगमन हुआ है।

आपकी फिल्म 3 ईडियट ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं और आपने आमिर के साथ अपनी फिल्मी ज़मीन मजबूत कर ली है, कैसा लग रहा है आपको?
-मैं समझती हूँ कि यह सब इसलिए भी हुआ है क्योंकि यह राजू हिरानी की फिल्म थी तथा मैं और आमिर पहली बार साथ में आ रहे थे इसलिए लोगों को फिल्म से बहुत उम्मीद भी थी। मैं समझती हूँ कि हमारी जोड़ी को लोगों ने पसंद भी किया।

क्या आपने इस फिल्म को राजू और आमिर के होने के कारण किया?
-मेरी हर फिल्म में चाहे वो अच्छी हो या बुरी हो, मैंने दूसरे कलाकारों के सामने अपनी मौजूदगी को बनाए रखी है। मेरा ‘ एजन्ट विनोद ’ व ‘ गोलमाल 3 ’ में भी जबरदस्त रोल है। मैं अपनी हर फिल्म में बहुत मेहनत करती हूँ क्योंकि मैं अपने आपको एक स्टार के पहले एक अच्छे कलाकार के रूप में पेश करना चाहती हूँ। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि कोई मुझसे कहे कि मैं अपनी फिल्म में अच्छी लग रही थी क्योंकि मैं जानती हूं कि कोई भी मुझे अपनी खूबसूरती के लिए नहीं अपने टेलेंट के लिए अपनी फिल्म में लेता है। मैं यहां अपना टेलेंट दिखाने के लिए हूं न की अपनी खूबसूरती और इसी कारण से मुझे लडकों की प्रमुखता वाली फिल्म 3 ईडियट में भी लिया गया। मुझे लगता है कि मेरा दर्शक वर्ग मुझे ‘ कम्बक्त इश्क ’ जैसी फिल्मों में देखना पसंद नहीं करता है और यह गलती मैं दोबारा दोहराना नहीं चाहती।

फिल्मकुर्बानका रिव्यू अच्छा है फिर आपने उसमें काम क्यों नहीं किया?
- जरूरी नहीं कि मैं हर फिल्म करूँ। जो वक्त के अनुसार सही लगे वही करना चाहिए। एक एक्टर को एक एक्टर की तरह रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि दो सुपरहिट देने के बाद कलाकार सुपर स्टार बन जाता है उसे अपनी फ्लाप फिल्मों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि दर्शकों कह निगाह में वह महत्वपूर्ण होता है।

आपकी फिल्म साइन करने के लिए एक लंबे प्रोसेस से गुजरना पड़ता है?
- कई बार ऐसा होता है और कई बार नहीं भी। हम एक्टर एक वैज्ञानिक की तरह होते है जो अलग-अलग प्रयोग करता रहता है। लोग जानते है कि करीना रिस्क ले सकती है और मैंने ‘चमेली’ जैसी फिल्म करना स्वीकार किया। मैं इस बात की परवाह नहीं करती कि लोग टशन के बारे में क्या कहते है। मैंने फिल्म में अपना किरदार को जीवंत करने के लिए अपनी बॉडी लेंगवेज को हर तरह से चेंज किया। कितनी एक्ट्रेसेस हैं जो इस प्रकार की चुनौती को स्वीकार कर पाती है वो भी इस पुरूष प्रधान इंडस्ट्री में। टशन मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि उसी दौरान मैं सैफ से मिली थी। कभी-कभी फ्लाप फिल्म भी एक्टर के लिए एक बडी न्यूज बन जाती है।

आप सभी खान कलाकारों में चुनने में क्या ध्यान करती हैं?
- मैंने अपने निजी जीवन के लिए सबसे सेफेस्ट खान का चुनाव कर लिया है। बाकी सभी खानों में सभी एक दूसरे से अलग लगते हैं। सैफ और मैं एक दूसरे के करीबी दोस्त हैं और आमिर और शाहरूख हमारे परिवार जैसे हैं। मेरी बहन सलमान को पसंद करती है।

पर सबमें हो रही प्रतिस्पर्धा जग जाहिर है?
- यहां केवल बीकाऊ 3 या 4 है तो यह प्रतिस्पर्धा तो होनी ही है लोगों के पास कोई चाइस भी तो नहीं है।

आज कल फिल्म इंडस्ट्री में आपको सबसे महंगी एक्ट्रेस के रूप में आंका जा रहा है?
- मैं नहीं जानती । पर आप बताइये हर दिन यह रिपोर्ट आती है कि फलानी एक्ट्रेस इतना लेती है, फलानी इतना। यदि सबसे ज्यादा प्राइज लेने वाली एक्टेªसों की लिस्ट बने तो शायद मेरा उसमें आखरी दस में नाम आयेगा।

आपके और सैफ के संबंधों को लेकर बहुत सारी चर्चाए होती रहती हैं आप उनको किस प्रकार से लेती हैं?
- मेरे व सैफ के संबंध स्पष्ट हैं। हमारे बारे में बहुत कुछ छपता रहता है कि आज हमनें शादी करली, कल तलाक हो गया इन सब गौसिफ का हम मजा भी लेते है। पर हां , जब हम शादी करेंगे तब सारा जमाना जान जाएगा। ये सब कुछ जल्द होने वाला भी है।

आप अपने व्यस्त समय में से परिवार के लिए समय किस प्रकार निकाल पाती हैं?
-मैं बहुत सा समय निकाल लेती हूँ। एक एक्टर के लिए जो लगातार काम कर रहा हो समय निकालना जरूरी है। मैं साल में चार फिल्मों से ज्यादा नहीं करती । मैंने अपने सेक्रेट्री से भी कह रखा है कि हर तीन महीनों के बाद मुझे ब्रेक चाहिए। मैं सारा साल एक साथ काम नहीं कर सकती।

सुना गया था कि आप भी आई पी एल टीम खरीदने वाली थीं?
- हम इसके लिए गये भी थे व पेपर वर्क भी पूरा किया था पर ये सब केंसल हो गया। यदि दोबारा मौका मिला तो यह सब सैफ के समझ का काम है मैं तो केवल फिल्मों के बारे में जानती हूं।

तो क्या आप प्रोडक्शन हाउस खोलने में रूचि रखती है?
- मैं अपने लिए तो फिल्म बनाने से रही। अभी तो बाहर की फिल्मों से ही समय नहीं मिल पा रहा हैं। अभी एक फिल्म मधुर भंडारकर के साथ करने का प्लान चल रहा है। पटकथा लिखी जा रही है पर अभी सब कुछ तय नहीं हुआ है।

‘मिलेंगे-मिलेंगे’ के बारे में रोज सुना जा रहा है पर पता नहीं कब मिलेंगे?
- यह तय हो चुका है कि फिल्म जल्द रिलीज होने जा रही है । मैंनें अपनी ओर से निर्माता बोनी कपूर को कह दिया है कि मैं फिल्म के प्रमोशन के लिए तैयार हूं । बाकी जो कुछ मीडिया में छप रहा है मेरे व ‘ााहिद के बारे में उसके लिए हम आदि हो चुके है।

प्रस्तुतिः अशोक भाटिया

Tuesday, March 16, 2010

सुनिए राजेन्द्र यादव का 93 मिनट का इंटरव्यू

पिछले 6 दशकों से रचनाकर्म में सक्रिय राजेन्द्र यादव साहित्य में महानायक की हैसियत रखते हैं। साल 2006 में वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश और युवा कवि-लेखक रामजी यादव की टीम (पीपुल्स विजन प्रोडक्शन कम्पनी) ने राजेन्द्र यादव का लम्बा इंटरव्यू लिया। पीपुल्स विजन यादव जी के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व पर फिल्म बना रहा है। यदि आप भी इस प्रोजेक्ट से किसी भी तरह से जुड़ना चाहें तो रामजी यादव से (yadav.ramji2@gmail.com या 9015634902 पर) संपर्क करें। इस साक्षात्कार में राजेन्द्र यादव ने कविता की विलुप्ति, कहानी-नई कहानी, दलित और महिला लेखन, मार्क्सवाद की भारत में असफलता, साहित्य और राजनीति के पारस्परिक संबंधों इत्यादि पर खुलकर बोला। हमें यह साक्षात्कार संग्रहणीय लगा और यह भी लगा कि शायद हिन्द-युग्म के बहुत-से पाठक भी इसे सुनकर ऐसा महसूस करेंगे कि बहुत कुछ जानने और समझने को मिला।



यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं या अपनी सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और गांधी शांति प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मासिक कार्यक्रम "अनहद" में राजेन्द्र यादव का कथापाठ शुक्रवार, 19 मार्च 2010 की शाम 5‍ः30 बजे आयोजित होगा। अध्यक्षता निर्मला जैन करेंगी। जरूर पधारें।

Sunday, March 14, 2010

शापित से बहुत कुछ सीखने को मिलाः श्वेता अग्रवाल

श्वेता अग्रवाल फिल्म ‘शापित’ से पहले टर्की की एक फिल्म ‘मिरार’ में और ओलिवर पॉलिस की स्विस जर्मन फिल्म ‘तंदूरी लव’ में भी अभिनय कर चुकी हैं। ‘स्टार प्लस’ पर प्रसारित धारावाहिक ‘देखो मगर प्यार से’ में मोटी-सी लडकी के किरदार में नज़र आ चुकीं श्वेता अग्रवाल इन दिनों फिल्म सर्जक विक्रम भट्ट की खोज के रूप में उनकी आगामी फिल्म ‘शॉपित’ में अभिनय करके चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इस फिल्म में उनके हीरो है मे मशहूर संगीतकार उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण हैं। देखा जाए तो यह फिल्म श्वेता के लिए डेब्यू होगी व अपनी बॉलीवुड की पहली ही फिल्म विक्रम भट्ट की हॉरर फिल्म 'शापित’ से कर रही है।

प्रश्न- कैसा लग रहा है अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म को करके ?
- पहले मैं बहुत ही डरी हुई थी कि बॉलीवुड में मेरी पहली फिल्म ही विक्रम भट्ट जैसे महान निर्देशक के साथ करने को मिल रही है । फिल्म 'शापित’ एक हॉरर फिल्म होने के साथ साथ प्रेम कहानी वाली भी फिल्म हैं। विक्रम भट्ट उन निर्देशकों में से हैं, जो अपने दर्शकों को अपनी फिल्म के द्वारा एक जगह पर बैठे रहने के लिए मजबूर कर देते हैं। मुझे पूरा यकीन हैं कि उनकी फिल्म ‘शापित’ दर्शकों निराश नहीं करेगी। इन्ही सब कारणों से मुझे इस फिल्म को करने में मजा आ रहा हैं।

प्रश्न- इस फिल्म में अपने किरदार के बारे में बताइए?
- इस फिल्म में मैंने काया का किरदार निभाया है जो कि एक रायल परिवार की कॉलेज में पढने वाली लडकी है । काया को इस बात की जानकारी नहीं है कि उसके परिवार को 300 साल पहले एक श्रॉप मिला था जिसकी वजह से इस परिवार की कोई लडकी जब भी शादी करना चाहेगी तो बुरी ताकत उसे खत्म कर देगी ।प्यार के सागर में डूबी काया अपने प्रेमी अमन से सगाई करके जैसे ही सगाई की अंगूठी पहनती हैं वैसे ही वह बुरी आत्मा उसके पीछे पड जाती हैं । तब काया के माता पिता काया को उसके शापित होने की बात बताते हैं। इसके बाद भी काया का प्रेमी अमन उससे रिश्ता नहीं तोडता क्योंकि काया और अमन ने तो पूरी जिन्दगी एक साथ रहने का इरादा पक्का किया हुआ हैं । फिर यह दोनों उस बुरी आत्मा से बचने के लिए क्या क्या नहीं करते हैं यह डरावना मंजर इस फिल्म में दिखाया गया है ।

प्रश्न- आपको नहीं लगता कि आपको अपना कैरियर हॉरर फिल्म से शुरू करना महंगा पड़ सकता हैं?
- मैं मानती हूं कि बॉलीवुड में हॉरर फिल्म के साथ कैरियर शुरू करना काफी रिस्की है। लेकिन मुझे इसमें कोई रिस्क नहीं लगता और न ही किसी से मेरी इस बारे में शिकायत है। मुझे विक्रम भट्ट की फिल्म होने से इस फिल्म पर पूरा भरोसा है। वैसे ‘शापित’ में पागलपन वाला हॉरर नहीं हैं। इसमें एक प्रेम कहानी है। काया और अमन एक दूसरे से बहुत ज्यादा प्यार करते हैं। वे एक दूसरे पर जान न्यौछावर करने वाला प्यार करते है। बुरी आत्मा से बचने के लिए वे क्या क्या नहीं करते हैं और बुरी आत्मा किस तरह उनका पीछा करता है और कई तरह के घटनाक्रम होते है। इस फिल्म की कहानी में रोचकता के साथ डरावनापन भी है।

प्रश्न- फिल्म की शूटिंग के दौरान क्या अनुभव रहा ?
- इस फिल्म में काम करना मेरे लिए बहुत बडी चुनौती के रूप में था क्योंकि मैं भी एक जगह बैठकर हॉरर को नहीं देख सकती थी। इसी वजह से इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं खुद डरी हुई रहती थी। एक बार एक ऐसा दृश्य फिल्माया जा रहा था, जिसके लिए मुझे एक जगह बंद कर दिया जाता हैं। वहां मिट्टी थी, गंदगी थी और जगह इतनी सकरी थी कि मैं हिल डुल भी नहीं सकती थी। दीवार से चेहरा सटा हुआ था। मैं न बाहर वालों की आवाज सुन सकती थी, न बाहर वाले मेरी। कैमरा अपना काम कर रहा था। तभी अचानक एक मकड़ी वहां आ गयी। मकड़ी से तो मैं बहुत डरती हूं। मुझे लगा कि मेरी जिन्दगी खत्म हो गयी। मैं बुरी तरह डर व सहम गई थी। जैसे ही सीन ओ.के. हुआ व दरवाजा खुला, मैं जोर-जोर से रोने लगी। डरी सहमी मैं आधे घंटे तक रोती रही। विक्रम भट्ट वगैरह ने मुझे काफी समझाया। बडी मुश्किल से दो घंटे बाद मेरे अंदर का डर खत्म हुआ और मैं नॉर्मल हो सकी।

प्रश्न- निर्देशक विक्रम भट्ट के साथ काम करने का क्या अनुभव रहा?
-बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। हर फिल्मकार की काम करने की अपनी अलग स्टाइल होती है। विक्रम भट्ट की तो स्टाइल ही अलग हैं। वह तो हमारे गुरू की तरह हमें काम के बारे में बता रहे थे। उन्होंने हमारी बहुत मदद की । वह खुद सीन करके बताते थे कि हमें किस प्रकार करना है। इसके बावजूद जब समस्या हल नहीं होती थी तो वह दृश्य में कुछ बदलाव भी करते थे। विक्रम भट्ट जी खुल विचारों के है। उनके साथ काम करके बहुत ही मजा आया। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा।

प्रश्न- क्या कारण है कि ‘शापित’ बन कर तैयार है और आपने अभी तक कोई दूसरी फिल्म साइन नहीं की है?
-मैं पिछले डेढ साल से ‘शापित’ के साथ इस तरह जुडी हुई हूँ कि कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिला। मेरे दिमाग में ही नहीं आया कि मुझे किसी नये प्रोजक्ट से भी जुडना चाहिए। अब जब आप लोग सवाल कर रहें हैं तो मुझे लगता हैं कि अब मुझे दूसरी तरफ भी ध्यान देना पडेगा। मुझे हर निर्माता-निर्देशक व कलाकार के साथ काम करना हैं बशर्ते अच्छी पटकथा व उसमें मेरा किरदार दमदार हो। मैं यहां तब तक रहूंगी जब तक मुझे काम मिलेगा और लोग मुझे परदे पर देखना पसंद करेंगे। मैं अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ परफार्मेंस देने का पूरा प्रयास करूंगी।

प्रश्न- आप अंतरराष्ट्रीय फिल्मों से पहले अपने कॉलेज के दिनों में ‘देखो मगर प्यार से’ एक धारावाहिक भी कर चुकी हैं तो क्या अब टी वी सीरियल भी करेंगी?
-फिलहाल तो मैं फिल्में ही करना चाहूँगी जो मेरी प्राथमिकता है पर भविष्य में कुछ अच्छा ऑफर मिला तो टी वी भी कर सकती हूँ।

प्रस्तुतिः अशोक भाटिया

Tuesday, March 09, 2010

मैं एकता कपूर से नहीं डरती - ज्योति गाबा


फिल्म 'इडियट बॉक्स' का एक दृश्य'

ज्योति गाबा का नाम लेने पर लोगों के जहन में उनका चेहरा नहीं आयेगा पर यह निश्चित हैं कि फिल्म ‘इडियट बाक्स’ के रिलीज होते ही यह नाम घर-घर में चर्चा का विषय होगा। इस फिल्म की कहानी इस बात पर आधारित है कि टी वी ने लोगों की जिन्दगी में कितना अहम दखल देना शुरू कर दिया है। इस फिल्म में ज्योति टी वी की चर्चित सुपर स्टार क्वीन एकता कपूर से प्रभावित किरदार अनेकता कपूर निभा रही हैं। हाल ही में फिल्म के प्रचारक आई एम पन्नू ने फिल्म पत्रकार अशोक भाटिया की बातचीत ज्योति से करवाई। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंशः-

प्रश्न- जब आपको इस फिल्म में इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए चुना गया तब आपको कैसा महसूस हुआ?
ज्योति- यह एक अलग ही प्रकार का अनुभव है। जब मुझे पहली बार इस फिल्म में मुझे मेरा किरदार सुनाया गया तो मुझे लगा कि यह मेरे लिए बहुत ही चुनौतिपूर्ण किरदार है। आज एकता कपूर बहुत बड़ा नाम है और यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं ऐसी भूमिका कर रही हूँ जो एकता कपूर से प्रभावित है।

प्रश्न- आपने इस भूमिका को करने के लिए किस तरह की तैयारी की और फिल्म के पर्दे पर उसे उतारने में किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
ज्योति- सच बताऊँ तो मुझे इस तरह की भूमिका कैमरे के सामने करने में जरा भी कठिनाई नहीं आई क्योंकि मुझे पहले से ही इस भूमिका के बारे में बहुत कुछ बता दिया गया था। इस फिल्म के निर्देशक सुनन्दा मित्रा ने पहले ही से इस भूमिका के बारे में विस्तार से समझा दिया था और स्पष्ट था कि मुझे कैमरे के सामने किस प्रकार प्रस्तुत होना है। इसके अलावा मुझे इसके लिए कुछ खास होमवर्क नहीं करना पडा था।

प्रश्न- इस समय आप इस फिल्म को लेकर कितना उत्साहित हैं?
ज्योति- मैंने इसके पहले फिल्म ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’, ‘सुनो ना’ वगैरह की है तथा बहुत से धारावाहिक किये हैं पर पहली बार कुछ अलग करने को मिला है। यह मेरे पिछले काम से बिल्कुल ही अलग है। मैंनें अब तक 300 विज्ञापन फिल्में की है उसमें से बहुत-सी जवान गृहिणी अथवा जवान प्यारी माँ की भूमिकाए वाली थीं। इस फिल्म में मेरे लिए एक मौका था कि मैं अनेकता कपूर के रूप में अपने को एक अच्छे कलाकार के रुप में स्थापित कर सकूँ। इसलिए इस फिल्म को लेकर उत्साहित होना स्वाभाविक है।

प्रश्न- नाम व आपके मेकअप के अलावा आपकी कौन-सी बात एकता कपूर से मिलती है?
ज्योति- एकता कपूर बालाजी टेलिफिल्म की मुखिया हैं और इस फिल्म में मेरी कंपनी का नाम लालाजी टेलिफिल्म है। एकता हाथ में अंगुठियाँ पहनना पसंद करती हैं और फिल्म में मैं भी बहुत सी रिंगस् पहनती हूँ। मेरी चाल-ढाल, पहनावे को भी बिल्कुल एकता के समान दिखाया गया है।

प्रश्न- आप असल जिन्दगी में एकता से मिल चुकी हैं?
ज्योति- दुर्भाग्यवश नहीं, पर एक अवार्ड फंक्शन में मैंने उनको बहुत ही करीब से देखा था, बस। परन्तु मैंने उनके बारे में बहुत कुछ अखबारों में पढ़ा है। कुछ बातें मुझे उसके करीबी दोस्तों से भी जानने को मिली और उन सब बातों की जानकरी होने के कारण मुझे अपनी भूमिका निभाने में सहायता भी मिली। मैंने जो जानकारी प्राप्त की थी उसके अनुसार एकता बहुत ही कड़क व मेहनती महिला है।

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि एकता इस फिल्म को देख कर कुछ नाराज़ होंगी?
ज्योति- नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। हमारा ऐसा कुछ विचार नहीं था कि उनको इस फिल्म के माध्यम से थोड़ा भी अपसेट किया जाए। वह स्वयं एक समझदार फिल्म निर्माता हैं। उन्हें पता है कि फिल्म को फिल्म की दृष्टी से ही देखा जाता है, व्यक्तिगत तौर पर नहीं। हमने फिल्म में उनको सकारात्मक रुप में पेश किया है और फिल्म देख कर उन्हें फिल्म पर गर्व होगा।


प्रश्न- फिल्म के रिलीज के समय यदि आपका सामना एकता कपूर से हो गया तो आप क्या करेंगी?
ज्योति- मैं उनसे डरूँगी नहीं बल्कि उनके पास जाकर नम्रता से अपना परिचय दूँगी कि ....हाय मैं अनेकता कपूर हूँ।

प्रश्न- भविष्य में और कोई जिन्दा आदमी का किरदार जिसे आप अपने अभिनय द्वारा पर्दे पर साकार करना चाहें?
ज्योति- हाँ, ऐसा मौका मिला तो मैं सोनिया गांधी की भूमिका करना चाहूँगी।

प्रश्न- अंत में आप ‘इडियट बाक्स’ के बारे में चंद शब्दों में क्या कहना चाहेंगी?
ज्योति- यह कोई हकीकत नहीं है। एक हास्य फिल्म है। जब भी दर्शक इस फिल्म को देखे तो महसूस करें कि यही आज घर-घर की कहानी है और उसे अपने ही घर की कहानी समझे। मुझे आशा है कि दर्शक इस फिल्म को अवश्य स्वीकार करेंगे।

प्रस्तुति: अशोक भाटिया

Sunday, March 07, 2010

आज की शिक्षा एकलव्य का अँगूठा ही नहीं उसकी गर्दन भी माँगती है

हिम्मत सेठ प्रतिष्ठित पाक्षिक महावीर समता सन्देश के प्रधान सम्पादक हैं और अपनी जनपक्षधरता, बेबाकी तथा जुझारूपन के लिये जाने जाते हैं। दक्षिणी राजस्थान की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर बहस के केन्द्र में लाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हाल में समान बचपन अभियान की प्रीति शर्मा उनसे की गयी बातचीत का प्रमुख अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं-सम्पादक

प्रश्न - पूँजीवादी और पीत पत्रकारिता के इस दौर में नागरिक पत्रकारिता को अपना माध्यम बनाने के पीछे
आपकी कौन-सी मूल भावना काम कर रही थी?
उत्तर - हिन्दुस्तान जिंक मे काम करते हुए जब मैंने देखा कि मजदूरों की समस्याओं को नहीं सुना जाता है तो 1968 में कुछ लोगों के साथ मिल कर मैंने मजदूर यूनियन बनाया और इस यूनियन के माध्यम से हम मजदूरों की आवाज़ को प्रशासन के समक्ष लाने लगे। हिन्दुस्तान जिंक छोड़ने के बाद भी नागरिक पत्रकारिता के माध्यम से मैं वंचित वर्ग के मुद्दों को सामने लाने के लिए काम करता रहा, क्योंकि हमे लगता था कि वंचित और निम्न वर्ग के लोगों की आवाज़ को दबा दिया जाता है। हमारे देश में आज़ादी के 63 वर्ष बीत जाने के बाद विकास तो हुआ है पर निचले तबके के लोगों पर ध्यान नहीं दिया गया और उनके साथ गैरबराबरी की जाती रही है। मैं शुरू से समाजवादी विचारधारा से जुड़ा रहा हूँ और गैरबराबरी पर काम करता रहा हूँ। मेरा मानना है कि नागरिक पत्रकारिता ही बहुसंख्यक जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सकती है।

प्रश्न - समता संदेश के माध्यम से आप शिक्षा में भेदभाव के खि़लाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। आपकी समझ से शिक्षा व्यवस्था के लगातार समाज के बहुसंख्यक वंचित तबके के प्रति संवेदन शून्य होते चले जाने के पीछे कौन से कारक ज़िम्मेदार हैं?
उत्तर- यह एकदम सही है कि आज की शिक्षा व्यवस्था समाज के बहुसंख्यक वंचित तबके के प्रति संवेदन शून्य है क्योंकि
इस शिक्षा व्यवस्था का माफियाकरण हो चुका है। शिक्षा में दलाली होने लगी है और पूँजीवादी लोग चाहते हैं कि शिक्षा को उच्च वर्ग के लिए सुरक्षित रखा जाए। जिस तरह की शिक्षा उच्च तबके के बच्चों को मिल रही है वैसी शिक्षा निचले तबके के लोगों को नहीं मिले। शिक्षा में यह जो गैरबराबरी की व्यवस्था है यह नयी नहीं है। यह तो महाभारत काल से ही ज़ारी है। उस काल में भी जब एकलव्य द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखना चाहता था तो गुरू ने मना कर दिया क्योंकि एकलव्य निम्न जाति का भील था। इतना ही नहीं जब एकलव्य अपने प्रयत्नों से धनुर्धारी बन गया तो द्रोणाचार्य ने छल से उसका अँगूठा ही कटवा दिया। इस प्रसंग से लगता है कि शिक्षा हमेशा से राजा महाराजाओं और श्रेष्ठ लोगों के लिए ही रही है। आज जब हमारे देश में लोकतन्त्र है जिसमें सभी को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है तो अमीर और सत्ताधारी लोग, सरकार तथा प्रशासन से जुड़े लोग नहीं चाहते कि शिक्षा सभी के पास हो। वे नहीं चाहते कि हमारे बच्चे वहाँ तक पहुँच पाएँ जहाँ पर उनके बच्चे पहुँचते हैं। वे समाज में गैरबराबरी को कायम रखना चाहते हैं। आज वे एकलव्य से केवल उसका अँगूठा नहीं बल्कि उसकी गर्दन भी मांग रहे हैं। मेरा मानना है कि जितने भी एनजीओ हैं उनको अपने उद्देश्यों में शिक्षा का मुद्दा रखना चाहिए और जो एनजीओ सक्षम हैं उन्हें एक स्कूल ज़रूर खोलना चाहिए।

प्रश्न - आपके अनुसार वर्तमान शिक्षा में व्याप्त विषमता और वर्गीय भेदभाव के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं?
उत्तर - उच्च वर्ग के व पूँजीवादी लोग कभी नहीं चाहते कि शिक्षा में समानता हो। अगर समानता होगी तो सब पढ़-लिखलेंगे और उच्च वर्ग के बच्चों से प्रतियोगिता करेंगे। इसलिए वे चाहते हैं कि विषमता बनी रहनी चाहिए और आज की जो शिक्षा है वह स्वयं विषमता को बढ़ावा दे रही है। आज कहीं दून स्कूल, कहीं केन्द्रीय विद्यालय, कहीं औपचारिक तो कहीं अनौपचारिक स्कूल खुले हुए हैं जो समाज में विषमता पैदा करते हैं। आज वही लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जिनके पास शिक्षा को खरीदने की क्षमता है। शिक्षा प्राप्त करने के लिए बच्चों को डोनेशन देना पड़ता है। आज अगर किसी को डॉक्टर बनना होता है तो 40-50 लाख रुपये तक डोनेशन देना पड़ता है। अब जो बच्चे डोनेशन देकर पढ़ेंगे वे भला क्यों सामाजिक हित के बारे में सोचेंगे। उनका लक्ष्य तो जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक मुनाफा कमाना ही रहेगा।

प्रश्न - सरकार द्वारा शिक्षा की संवैधानिक जवाबदेहियों से पलायन और निर्बाध निजीकरण-बाज़ारीकरण कीनीतीयों के क्या परिणाम होंगे?
उत्तर - निजीकरण व बाज़ारीकरण से नीचे के तबके के लोग शिक्षा से वंचित रह जाएँगे और पूँजीपतियों के बच्चे ही शिक्षा प्राप्त कर पाएँगे। पर क्या वे सभी वर्ग के लोगों के लिए सोच पाएँगे? आज अखबारों में हम पढ़ते हैं कि फलाने आई.ए.एस. के घर में छापा पड़ा और उसके पास करोड़ों की सम्पत्ति बरामद हुई। तो क्या इस तरह की लूट मार वाली संस्कृति वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का परिणाम नहीं है? दरअसल यह सब सरकार, विश्व बैंक, तथा यूनिसेफ की साज़िश है। हम देखते हैं कि अमेरिका जो सबसे बड़ा पूँजीवादी देश है उसकी शिक्षा व्यवस्था सरकार के हाथ में है और भारत में दिन-दूने रात-चौगुने की रफ़्तार से रोज़ नये-नये निजी स्कूल खुलते जा रहे हैं। एक तरफ हमारे देश में दिल्ली पब्लिक स्कूल हैं जहाँ छोटी कक्षाओं की फ़ीस भी 50 हजार रुपये तक होती है और दूसरी तरफ गाँव के वे स्कूल हैं जहाँ बच्चों को पढ़ाने के लिये शिक्षक नहीं हैं। अब गाँव से पढ़ने वाला बच्चा दिल्ली पब्लिक स्कूल के बच्चे के साथ प्रतियोगिता कैसे कर पाएगा? उदयपुर में काफी जोर-शोर से आईआई. टी. खुलवाने का आन्दोलन चला पर कोई बताये कि इस आई.आई.टी. के खुलने का फ़ायदा क्या है। जितना बजट आई.आई.टी. व आई.आई.एम. में खर्च होगा उससे तो गाँव के स्कूलों का कायापलट हो सकता है। गाँव के स्कूलों में पूरी सुविधा नहीं मिल पाती है। सोचने की बात है कि गाँव से जो बच्चे दसवीं व बारहवीं करके निकलते हैं क्या वे इन संस्थानों मे प्रवेश पा सकेंगे? तो फिर क्या इन संस्थानों में बाहर से आकर बच्चे पढ़ेंगे? अभी कपिल सिब्बल द्वारा संसद लाया गया विधेयक जिसमें 6 से 14 साल के बच्चों के लिए मुफ़्त व अनिवार्य शिक्षा की बात की गई है। उसी विधयक लिए प्राइवेट स्कूलों को 25 प्रतिशत का अनुदान देने का प्रस्ताव भी है। कपिल सिब्बल संसद के इसी सत्र में यह भी कहते है कि नये स्कूल खोलने के लिये हमारे पास बजट का प्रावधान नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि थोड़े से गरीब बच्चे भी वहाँ पढ़ सकें लेकिन बाकी बच्चों का क्या होगा?

प्रश्न - वर्तमान मुख्यधारा मंे मीडिया का शिक्षा अथवा आम जनता के सरोकार के दूसरे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं दिखाई देता। इस मीडिया को ज़िम्मेदार बनाने के लिये किस तरह के प्रयासों की ज़रूरत है?
उत्तर - मैं मीडिया को दोषी नहीं मानता क्योंकि व्यवस्था ही गड़बड़ है। इस व्यवस्था में सभी पूँजी के पीछे भाग रहे हैं। आज सरकारें बदल जाती हैं पर नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं होता। इससे पता चलता है कि तमाम सत्ताधारी पार्टियाँ आम जनता के हितों से जुड़े मुद्दों की अनदेखी करने के मामले में लगभग एक जैसी राय रखती हैं और मौका मिलने पर वही काम करती हैं जिनसे पूँजीपति वर्ग का फ़ायदा हो। आज का मुख्यधारा का मीडिया एक उद्योग है और वह केवल अपना व्यवसाय चमकाने में लगा है। अगर लोग चाहते हैं कि आम जनता का मुद्दा मीडिया में आए तो उन्हें उन मुद्दों को लेकर आन्दोलन करना पड़ेगा। स्कूलों में अध्यापकों की कमी पहले भी रही है पर जब स्कूलों में ताले लगा दिए गए तभी यह खबर अखबारों में छपी। इसलिए मीडिया को जवाबदेह बनाने के लिये जनता को आगे आना होगा।

प्रश्न -दक्षिणी राजस्थान में शिक्षा में समान अवसर की मांग को लेकर जो अभियान चल रहा है उसे प्रभावशाली बनाने के लिए आपकी समझ से क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर - समान बचपन अभियान अच्छा अभियान है क्योंकि यह बचपन से समानता की बात करता है और समान अवसर की लड़ाई लड़ते हुए शिक्षा की गैरबराबरी को ख़त्म करना चाहता है। पर इसके साथ ही और भी जो सामाजिक विषमताएँ हैं जैसे जाति प्रथा व स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव आदि उन पर भी ध्यान देना होगा।

Wednesday, November 04, 2009

यह केवल उत्सवधर्मी विश्विविद्यालय नहीं रहेगा- विभूति नारायण राय

पिछले दिनों हिन्द-युग्म के रामजी यादव और शैलेश भारतवासी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय से बात की। विभूति नारायण राय हिन्दी के चर्चित लेखक और साहित्यकार हैं जिनकी दंगों के दौरान पुलिस के सांप्रदायिक रवैये पर लिखी पुस्तक 'शहर में कर्फ़्यू' बहुत प्रसिद्ध रही। विभूति उ॰ प्र॰ में पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्य कर चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा को समर्पित दुनिया का एक मात्र विश्वविद्यालय है। तो हमने जानने की कोशिश की कि हिन्दी भाषा-साहित्य की गाड़ी में गति लाने के लिए इनका विश्वविद्यालय क्या कुछ करने जा रहा है॰॰॰॰॰


(इंटरव्यू को उपर्युक्त प्लेयर से सुन भी सकते हैं)

रामजी यादव- महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 10-12 वर्ष पहले हुई थी। पूरी दुनिया में फैला हुआ जो हिन्दी समाज है, उसके प्रति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यह उत्तरदायी है। लेकिन यह एक उत्सवधर्मी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। और लगभग इसकी उत्सवधर्मिता इसके कुलपति की महात्वकांक्षाओं तक सीमित करके देखी जाती है। इस पूरी छवि को आप कैसे बदलेंगे?

वी एन राय- विश्वविद्यालय केवल उत्सवधर्मिता का केन्द्र न रहे, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध का क्षेत्र भी बने, और इसके साथ-साथ इस विश्वविद्यालय की हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में ज़रूरी उपकरण प्रदान करने की जो इसकी खास भूमिका है, उसे पूरा करने में भी इसका सक्रिय योगदान हो, इस समय दिशा में यह विश्वविद्यालय काम कर रहा है। इस वर्ष नये विभाग खुले हैं। मानवशास्त्र और फिल्म-थिएटर दो विभाग शुरू किये गये हैं। इसके अलावा डायस्पोरा स्ट्डीज का नया विभाग शुरू होने वाला है। ये तीनों नये विभाग महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की उस भूमिका को निभाने में भी मदद करेंगे, जिसकी कल्पना इस विश्ववविद्यालय के एक्ट में की गई है और प्रथम अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में इसकी निर्मिती के पीछे जो एक परिकल्पना रही है। इसे अंतरर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए, शायद आप अवगत हों, विश्वविद्यालय एक बहुत महात्वपकांक्षी योजना पर काम कर रहा है वो है कि हिन्दी में जो कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसे ऑनलाइन किया जाये ताकि दुनिया के कोने-कोने में बैठे हिन्दी के पठक उन्हें पढ़ सके। हमारी कोशिश है कि दिसम्बर 2009 तक लगभग 100000 पृष्ठ ऑनलाइन कर दिये जायें। इसके अलावा हम इन सभी महत्वपूर्ण कृतियों को दुनिया की तमाम भाषाओं में जैसे चीनी, जापानी, अरबी, फ्रेंच इत्यादि में अनुवाद करके ऑनलाइन करना चाहते हैं।

रामजी यादव- एक चीज़ मानी जाती है कि हिन्दी एक बड़ी भाषा है जो तमाम तरह के संघर्षों से निकली है। लेकिन हिन्दी में विचारों की स्थिति बहुत दयनीय है। एक विश्वविद्यालय के रूप में आपका विश्वविद्यालय किस तरह का प्रयास कर रहा है कि हिन्दी में विचार मौलिक पैदा हों और दुनिया के दूसरे अनुशासनों से इनका संबंध बने?

वी एन राय- इसके लिए भी हमने कुछ महात्वकांक्षी योजनाएँ बनाई है। हमारे विश्वविद्यालय का जो पाठ्यक्रम है वो गैरपारम्परिक पाठ्यक्रम हैं। जो विषय हमारे यहाँ पढ़ाये जा रहे हैं वह भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं। जैसे स्त्री-अध्ययन है, शांति और अहिंसा है, हिन्दी माध्यम में मानव-शास्त्र है, फिल्म और थिएटर या डायस्पोरा स्ट्डीज की पढ़ाई है। अनुवाद भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें हमारे यहाँ पढ़ाई हो रही है। लेकिन ज्ञान के इन अनुशासनों में मौलिक पुस्तकों की कमी है, मौलिक तो छोड़ दीजिए जो एक आधार बन सकती हों, ऐसे पाठ्यपुस्तकों की कमी है। इसलिए हमने योजना बनाई है कि हम ज्ञान के इन सारे अनुशासनों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में उपलब्ध है, उसके कुछ चुनिंदा अंशों का अनुवाद हो और उसे छापें। और यह योजना शुरू भी हो गई है, हमने स्त्री-अध्ययन के लिए 10 पुस्तकों को चुना है जिसका साल भर में हम अनुवाद करा लेंगे। इसके बाद अन्य अनुशासनों में जायेंगे।

शैलेश भारतवासी- सवाल हमारा यह था कि जो हिन्दी का साहित्यिक या वैचारिक परिदृश्य हैं, वो पूर्णतया मौलिक नहीं है। विश्वविद्यालय की तरफ से ऐस कोई प्रयास है जिससे मौलिक विचार निकलकर आये?

उत्तर- मौलिक लेखन को भी हम प्रोत्साहन देंगे, लेकिन सवाल यह है कि मौलिक लेखन के लिए भी आधारभूत सामग्री उपलब्ध हो, जिन्हें पढ़कर आप अपनी बेसिक तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से गंभीर समाज शास्त्रीय विषयों पर हिन्दी में मौलिक सामग्री या तो बहुत कम है या ज्यादातर अनुवाद के माध्यम से मिल रही है। पर हमारा प्रयास यह होगा कि जब हम महत्वपूर्ण चीज़ों का अनुवाद करायेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें पढ़कर जो मौलिक सोचने वाले हैं, वे मौलिक लेखन करेंगे और उन्हें भी हम प्रकाशित करेंगे।

रामजी यादव- क्या दुनिया के अन्य देशों के विश्ववद्यालयों में जहाँ प्राच्य विद्या किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, उनके साथ विश्वविद्यालय का कोई अंतर्संबंध बन रहा है?

वी एन राय- जी, हम यह कोशिश कर रहे हैं कि बाहर के 100 विश्वविद्यालयों में जहाँ हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, भाषा के तौर पर, प्राच्य विद्या का एक अंग होकर या साउथ-एशिया पर विभाग हैं, उनमें हिन्दी का इनपुट है, इन सभी विश्वविद्यालयों के बीच में हम एक समन्वय सेतु का काम करें, उनमें जो अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहे हैं, उनके लिए रिफ्रेशर कोर्सेस यहाँ पर हम संचालित करें, उनके लिए ज़रूरी पाठ्य-सामग्री का निर्माण करायें और सबसे बड़ी चीज़ है कि विदेशों से बहुत सारे लोग जो हिन्दी सीखने के लिए भारत आना चाहते हैं, उनके लिए हमारा विश्ववद्यालय एक बड़े केन्द्र की तरह काम करें, इस दिशा में भी काम चल रहा है।

शैलेश भारतवासी- जहाँ एक ओर आप विदेशी विश्वविद्यालयों से अंतर्संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं अपने ही देश के बहुत से लोग जो हिन्दी भाषा या साहित्य में ही अपनी पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं, उन्हें भी आपके विश्वविद्यालय के बारे में पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भी इस विश्वविद्यालय का नाम एक नई चीज़ है। तो क्या आप चाहते ही नहीं कि सभी लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचेया कोई और बात है?

वी एन राय- नहीं-नहीं, आपकी बात सही है। विश्वविद्यालय को बने 11 साल से ज्यादा हो गये, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत बड़ा हिन्दी समाज इससे परिचित नहीं है, या उसका बहुत रागात्मक संबंध नहीं बन पाया या कोई फ्रुटफुल इंटरेक्शन नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते, और हम इसके लिए हम प्रयास भी कर रहे हैं। मसलन हमारी वेबसाइट ही देखिए। हालाँकि हिन्दी-समाज बहुत तकनीकी समाज नहीं है, बहुत कम लोग हिन्दी वेबसाइट देखते हैं। लेकिन मुझे देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी वेबसाइट को रोज़ाना 150-200 लोग आते हैं और वो भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। तो ऐसा नहीं है, धीरे-धीरे लोगों ने इसे जानना शुरू किया है।

शैलेश भारतवासी- लेकिन यहीं पर मैं रोकूँगा, आपने कहाँ कि आप 150-200 लोगों से संतुष्ट हैं (कुलपति ने यहीं रोककर इंकार किया), मेरा कहना है कि आपको 150 विजिटरों से आशा की एक किरण नज़र आती है। मैं एक साहित्यिक-सांस्कृतिक वेबसाइट चलाता हूँ, जिसे रोज़ाना 10,000 हिट्स मिलते हैं (यह दुनिया भर की वेबसाइटों के एस्टीमेटेड हिट्स निकालने वाली वेबसाइट का आँकड़ा है), फिर भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ और इसे एक बहुत छोटी संख्या मानता हूँ। आपकी वेबसाइट पर मैं 2-3 बार गया भी हूँ। मेरा जो अनुभव है वह कहता है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है वह बहुत प्रयोक्ता-मित्र नहीं है, वह समय के साथ नहीं चल रही है। क्या इस दिशा में कोई परिवर्तन हो रहा है?

वी एन राय- पिछले 5-6 महीनों में जो परिवर्तन हुए हैं, उसमें दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शामिल किया जा रहा है। एक तो मैंने पहले भी बताया कि हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखन के 1 लाख पृष्ठ ऑनलाइन किये जायेंगे और हिन्दी के जो समकालीन रचनाकार हैं, लेखक है, उनकी प्रोफाइल, इनके पते वेबसाइट पर डाल रहे हैं ताकि दुनिया भर में फैले इनके प्रसंशक, इनके पाठक, प्रकाशक इनसे संपर्क कर सकें। तकनीक के स्तर पर भी हम परिवर्तन करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा विश्वविद्यालय कोई तकनीकी विश्वविद्यालय तो है नहीं, फिर भी हम सीख करके, दूसरों की सहायता लेकर अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रामजी यादव- भारत में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसमें गैर हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी का विकास हो रहा है, जिससे नये तरह के डायलेक्ट्स बन रहे हैं, भाषा जिस तरह से बन रही है, बाज़ार दूसरी तरह से इन चीज़ों को विकसित कर रहा है। इस पूरी पद्धति में भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से, विश्वविद्यालय किस रूप से देशज और भदेस को मुख्यधारा का विषय बना सकता है?

वी एन राय- इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद हैं। आज हम जिसे हिन्दी भाषा कह रहे हैं, वह भी एक समय बोली थी। खड़ी बोली। जब आप 'हिन्दी' शब्द का उच्चारण करते हैं तो 'खड़ी बोली' दिमाग में आती है। आज से 130 साल पहले भारतेन्दु तक यह नहीं मानते थे कि 'खड़ी बोली' में कविता भी लिखी जा सकती है। गद्य की भाषा तो 'खड़ी बोली' थी, लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा रखते थे भारतेन्दु। छायावाद आते-आते लगभग यह स्पष्ट हुआ कि 'खड़ी बोली' ही 'हिन्दी' होगी। और एक मानकीकरण शुरू हुआ। 30-40 साल बहुत संघर्ष चला। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी होगी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों के साथ हम कैसा व्यवहार करेंगे, कैसे हम इस भाषा को पूरे देश के लिए एक मानक और एक स्वीकार्य भाषा बना पायेंगे, यह सारे संघर्ष चलते-चलते कमोबेश यह तय हो गया है कि 'खड़ी बोली' ही हिन्दी होगी और सभी बोलियाँ इसे मदद करेंगी, खाद का काम करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक दूसरी प्रवृत्ति दिखलाई दे रही है, जो मेरे हिसाब से खतरनाक है। बहुत सारी बोलियाँ इस छटपटाहट में हैं कि वो हिन्दी को रिप्लेस करके एक स्वतंत्र भाषा जैसी स्थिति हासिल करें। विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने अभी मैं मॉरिशस गया था,, वहाँ भी बहुत सारे लोग अतिरिक्त उत्साह में यह कह रहे थे कि हिन्दी क्या है, हमारी राष्ट्रभाषा तो भोजपुरी है, मातृभाषा भोजपुरी है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ कि वहाँ के एक बड़े कार्यक्रम में जब एक राजनेता हिन्दी में बोलने लगे तो जनता में से कुछ लोग कहने लगे ये कौन सी भाषा इस्तेमाल कर रहे हो, छत्तीसगढ़ी हमारी राजभाषा है। यह एक डिवाइसिव, फूट डालने वाली स्थिति है, जिससे हमें बचना होगा। मतलब हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद भी बनें और हिन्दी का नुकसान भी न करें। हमारा विश्वविद्यालय चूँकि हिन्दी का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है, इसलिए इस दिशा में निश्चित ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। हमलोग फरवरी-मार्च में बोलियों को लेकर एक सम्मेलन करने जा रहे हैं। हिन्दी का लोक बहुत समृद्ध है, कई अर्थों में बहुत प्रगतिशील है। अगर आप देखें तो पूरी दुनिया में इतनी विविधता लिए हुए लोक दिखलाई नहीं देगा। हमें इस प्रवृत्ति पर नज़र रखनी पड़ेगी कि वो लोक आगे जाकर नुकसान न करे, यह खाद का काम करे न कि विषबेन बन जाय।

शैलेश भारतवासी- यह तो हमारी बोलियों की बात है। दक्षिण भारतीय जो गैर हिन्दी भाषी हैं, हालाँकि हिन्दी को वे सम्पूर्ण भारत की भाषा के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनकी शिकायत रहती है कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, चलो हम इसे सीख लेते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी हमारी भाषा को नहीं सीखते। क्या विश्वविद्यालय कोई इस तरह का कार्यक्रम चलाया रहा है जिससे गैरहिन्दी भाषा को सीखने पर प्रोत्साहन मिले?

वी एन राय- देखिए यह तो सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। यह बात आपने बिल्कुल सही कही कि त्रिभाषा कार्यक्रम को लेकर सबसे अधिक बेईमानी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुई। हम यह तो चाहते थे कि जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, वहाँ तो शुरू से बच्चे हिन्दी पढ़े, लेकिन जब हमारे यहाँ तीसरी भाषा की बात आई तो हमने संस्कृत को डाल दिया जो किसी भी जनसमूह की भाषा नहीं थी। हमें कोई जीवित भाषा सीखनी चाहिए थी। लेकिन विश्वविद्यालय का तो बहुत सीमित दायरा होता है। हम तो सरकार से बस अपील कर सकते हैं।

Saturday, June 06, 2009

नदियों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये व्यापक नीतिगत परिवर्तन की ज़रूरत

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। हम हैं तो हमारा पर्यावरण है, हमारा पर्यावरण है तो हम हैं। हमारा पर्यावरण अगर सेहतमंद नहीं हैं तो हम अपने स्वास्थ्य के प्रति निश्चिंत नहीं हो सकते। भारत की बहुत सी नदियों पर जलप्रदूषण-संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हालाँकि बहुत सी योजनाएँ और सरकारी प्रयास नदियों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये किये जा रहे हैं। फिर भी पर्यावरण विशेषज्ञ गोपाल कृष्ण इसे पर्याप्त नहीं मानते और नदियों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए व्यापक नीतिगत परिवर्तन की वक़ालत करते हैं। युवा पत्रकार रेशमा भारती ने उनसे बात की, प्रस्तुत है उसके कुछ अंश-

रेशमा- भारत में प्रदूषण स्तर को कम करने के लिये हो रहे वर्तमान प्रयास अपर्याप्त क्यों हैं?

गोपाल कृष्ण- जल की गुणवत्ता, मात्रा और भूमि का उपयोग आपस में संबन्धित विषय हैं। इसे हम संग्रहण क्षेत्र से अलग करके नहीं सुलझा सकते, जिसे ब्रिटिश साम्राज्यकाल से ही अलग-अलग कर दिया गया था। नदी के संग्रहण क्षेत्र आधारित औद्योगिकीय कदम कोई यथार्थ विकल्प नहीं है। हमारी लचर कानून व्यवस्था से जुड़ी कुछ समस्याओं और हमारे सीवेज प्लाँट की कमियों की ओर पहले ही ध्यान दिया जा चुका है। लेकिन औद्योगिकीकरण और शहरणीकरण के वर्तमान स्वरूप के कारण नदियों की बिगड़ती हालत की ओर अभी भी लोगों का ध्यान नहीं गया है। अगर हम सही मायनों में नदियों के प्रदूषण को कम करने में सफल होना चाहते हैं तो या तो हमें नियमों में व्यापक परिवर्तन करने होंगे या संपूर्ण नीति में ही बदलाव करना होगा।
दूसरा कारण यह भी है कि जो प्रदूषण के लिये जिम्मेदार हैं विशेषतरूप से वह समुदाय नदियों के किनारे निवास करते हैं और जो इसे कम करने में योगदान दे सकते हैं, दोनो में शक्ति संतुलन चाहिये। लेकिन ये शक्ति संतुलन वर्तमान में प्रदूषणकर्ता का पक्षपाती है। वर्तमान प्रणाली प्रदूषण फैलाने वालों के पक्ष में और विरोध करने वालों के विपक्ष में है। इसमें बदलाव होना चाहिये। और जो समुदाय प्रदूषण को बचाने के काम में संलग्न हैं, उन्हें इतने अधिकार मिलने चाहिये कि वो प्रदूषणकर्ताओं के सामने डटकर खड़े हो सकें। और जो समुदाय पर्यावरण की सुरक्षा में रत हैं उनके काम को महत्व मिलना चाहिये।

रेश्मा- क्योंकि नदियों को बहुत से लोग पवित्र मानते हैं तो क्या जनसाधारण को प्रदूषण समाप्त करने के लिए लामबंद किया जा सकता है?

गोपाल कृष्ण- हाँ, कुछ उदाहरण हैं जो लोगों के सम्मिलित प्रयास की क्षमता को बताते हैं। पंजाब में बाबा बलबीर सिह सीँचेवाल ने एक पवित्र नदी काली बेन जोकि 160 किमी लम्बी है। यह नदी छः कस्बों और चालीस गाँवों के लिये गंदा नाला बन चुकी थी। उसे सींचेवाल ने लोगों के सहयोग से साफ किया। ये बहुत रोचक बात है कि उन्होंने उनको चुनौती दी जिन्होंने उनका प्रतिरोध किया और कहा कि आप कोई ऐसा कानून दिखाओ जो पानी को प्रदूषित करने की अनुमति देता हो।

पवित्र नदियों पर व्यापक तर्क-वितर्क होने चाहिये। सभी नदियों के पानी के स्रोत और उनके आस पास की ज़मीन पवित्र है। हम गंगा जैसी केवल एक या दो नदियों पर ही खुद को केंद्रित नहीं कर सकते। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बड़े देश में अलग-अलग स्थानों के लोगों लिए अलग-अलग नदियाँ पवित्र हैं। इसलिये नदियों में प्रदूषण को बचाने के लिये हमारी चिन्ता देश की सभी नदियों के लिये लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिये होनी चाहिये। अगर कोई जबरन हमारे घर में घुसता है तो वो सीमा अतिक्रमण का अपराधी माना जाता है। औद्योगिक प्रदूषण हमारी रक्त वाहनियों में घुस कर स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है।

राजनैतिक दल जिन्हें उद्योगपति ही फंड (धन) देते हैं, वे केवल लोगों को भावनात्मक और मौखिक आश्वासन ही देते हैं और ऐसे नीति परिवर्तन से मुँह चुराते हैं, जो नदियों के संरक्षण के लिये जरूरी हैं। सरकार चुनाव लड़ने और जनसाधारण को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जब तक पार्टियों को धन मुहैया नहीं कराती है, तब तक नदियों की जल-गुणवत्ता, जल-उपलब्धता और भूस्वास्थ्य को सुनिश्चित कर पाना मुश्किल होगा।

रेशमा- नदियों के संरक्षण के लिये कौन से व्यापक नीति परिवर्तनों की आवश्यकता है?

गोपाल कृष्ण- नदियों का संरक्षण हमारी शहरीकरण, उद्योग, जल, भूमि, कृषि और ऊर्जा नीतियों का अभिन्न अंग होना चाहिये। नदि-घाटी के लगातार क्षरण के विपरीत परिणामों की दृष्टि में, प्राकृतिक संसाधन आधारित अंतरपीढ़ी समानता को सुनिश्चित करने के लिए मौज़ूदा नीतियों में उलट देने के अटूट तर्क हैं। तभी हम यह सुनश्चित कर पायेंगे कि नदियों का उनके सामर्थ्य से अधिक दोहन न हो। हमें इस भ्रम में भी नहीं रहना चाहिये कि प्रदूषण चाहे किसी भी स्तर तक चला जाये, हम ट्रीटमेन्ट प्लाँट लगाकर नदियों को सुरक्षित कर लेंगे। नीतियों की जटिलता, जो ये निर्धारण करती हैं कि कितना पानी नदियों में रखना है, कितने खतरनाक रसायन नदियों मे छोडे जा रहे हैं, सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण की कितनी अधिकता होगी, ये सभी बहुत महत्वपूर्ण है। इन सभी समस्यायों के समाधान के लिए हमारे प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्रण की नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।

(यह साक्षात्कार मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में किया गया है, जिसे हिन्दी में अनूदित करने का काम निर्मला कपिला ने किया है)

Thursday, May 07, 2009

सन् 84 का दर्द और सिक्ख मत-दाता

समाज सेवक कुलदीप सिंह चन्ना के साथ अन्तरंग बातचीत - प्रेमचंद सहजवाला

उपरोक्त बातचीत के विषय में लिखने से पहले मुझे याद आ रहा है सन 2004, जब लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की शपथ ले रहे थे. शपथ-समारोह को देश के सभी चैनल दिखा रहे थे पर मैं यह कार्यक्रम देख रहा था बी.बी.सी पर. प्रारम्भ में ही बी.बी.सी पर दो पत्रकार बड़ी गरमागरम गुफ्तगू कर रहे थे. मनमोहन सिंह के शपथ लेने पर एक अजीब सा उत्साह पत्रकारों में भी था. एक पत्रकार दूसरे से भारत देश की तारीफ कर रहा था कि भारत एक सच्चे अर्थों में secular देश है जिस का राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम मुस्लिम है और अब एक सिख नेता प्रधानमंत्री की शपथ लेने जा रहा है. यानी दोनों अल्प-संख्यक समुदायों से. पर दूसरे साथी पत्रकार ने उसे तुंरत रोकते हुए कहा कि ये दोनों शख्सियतें इन महत्वपूर्ण पदों पर इसलिए नहीं पहुँची कि वे अल्पसंख्यक हैं, वरन् दोनों ही देश की राजनैतिक मुख्यधारा के माध्यम से अपनी योग्यताओं के आधार पर आगे आए हैं. उस समय एक जिज्ञासा सब के मन में थी कि यदि सोनिया ने प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार कर दिया तो आख़िर मनमोहन सिंह को ही क्यों चुना. कुछ लोग अपनी ओर से अटकल लगा रहे थे कि सन 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जिस नृशंस तरीके से अबोध सिक्खों की हत्याएं हुई, उस के बाद सिक्ख समुदाय कांग्रेस पार्टी को कभी क्षमा नहीं करेगा क्यों कि दिल्ली के कतिपय कांग्रेसी नेताओं पर यह इल्जाम लगता रहा है कि उन नृशंस हत्याओं के पीछे उन्हीं का हाथ है. इसलिए सोनिया जी सिक्ख समुदाय से अपने टूटे रिश्तों को जोड़ने के लिए उनके ज़ख्मों पर अपने तरीके से मरहम लगना चाहती हैं. पर जहाँ एक तरफ़ मनमोहन सिंह के पाँच वर्ष के शासन काल में बी.बी.सी पत्रकारों द्वारा कही हुई बात साबित हो गई कि वे किसी विशेष समुदाय के प्रधानमंत्री नहीं हैं, वहीं पाँच वर्षों में उन्होंने किसी भी समुदाय विशेष को प्रसन्न करने के लिए कोई अलग से कदम नहीं उठाया, वरन वे देश की आर्थिक स्थिति व आतंकवाद से जूझते रहे, जिसमें उन्हें कभी सफलता मिली कभी असफलता. पर हाल ही में मैंने जब अपने निर्वाचन क्षेत्र में अजय माकन का भाषण एक पत्रकार के रूप में कवर किया तो यह देख कर चकित था कि मंच पर अच्छी खासी मात्रा में सिख भी उपस्थित थे क्यों कि मानसरोवर गार्डन व राजौरी गार्डन के आसपास के इस इलाके में जहाँ भाषण हो रहा था, वहां सिक्ख जनसँख्या भी अच्छी खासी है. ऐसे में किसी के भी मन में यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि क्या सिख समुदाय कांग्रेस को क्षमा कर चुका है? या कि अब वह कांग्रेस के साथ इसलिए है कि कांग्रेस एक सिक्ख नेता को प्रधानमंत्री बनाए हुए है. दोनों प्रश्नों के उत्तर मेरे मन में मिले जुले से हैं. पिछले महीने जगदीश टाईट्लर को टिकट मिलने के सवाल पर एक सिख पत्रकार ने गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंक दिया. उधर अदालत जब टाईट्लर पर फ़ैसला देने वाली थी तब बाहर जमा सिख समुदाय व उस का आक्रोश काबिले-गौर था. पर उस भीड़ का थोड़ा सा विश्लेषण करने पर यह भी स्पष्ट था कि उस आक्रोश का नेतृत्व अकाली-दल कर रहा था. यानी सिक्ख परिवार, जिनके घरों से कई प्यारे लोग चले गए, उन के साथ न्याय तो जाने कब हो, पर उस पर राजनीती भी कम नहीं हो रही. यही कहना है इस इलाके के प्रसिद्ध समाज-सेवी सरदार कुलदीप सिंह चन्ना का कि सिक्ख समुदाय तो सदियों से अत्याचार सहन करता आ रहा है. उनकी लाचार आस्था है ईश्वर में कि ईश्वर कभी न कभी गुनाहगारों को सज़ा देगा ही, पर वे गुजरात में सन 2002 में हुई नृशंस मुस्लिम हत्याओं का सन्दर्भ दे कर कहते हैं कि कुछ पार्टियाँ सन 84 की नृशंस हत्याओं को केवल चुनाव के दौरान ही उठाती हैं. यह पूछने पर कि क्या मनमोहन सिंह के प्रति उन का उत्साह इसलिए है कि वे उन के ही मज़हब के हैं, यानी सिक्ख हैं, वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि नहीं, मनमोहन सिंह एक काबिल प्रधानमंत्री हैं जिन की विदेशों में भी बहुत अच्छी साख है. अलबत्ता वे कांग्रेस के प्रति आभार भी प्रकट करते हैं कि कांग्रेस ने ही देश को सिक्ख राष्ट्रपति दिया, सिक्ख सेना-अध्यक्ष दिया और अब सिक्ख प्रधान मंत्री. उनकी बात आइये, हम उनकी ही ज़बान से सुनें, शायद इसे सुनने से हम एक झलक सिक्ख समुदाय के हृदय की पा सकेंगे.



बातचीत-1बातचीत-2
-----बातचीत-3

Friday, December 19, 2008

बिहार-रत्न भिखारी का साक्षात्कार

समय को पहचानने का एक माध्यम लोकरंग की विविध रंगों को समझना भी है। २०वीं शताब्दी के बिहार और उसके आसपास के भारत का मन टटोलना हो तो भिखारी ठाकुर का लोकसाहित्य बहुत उपयोगी है। पौष मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को इसी महान कलाकार का जन्म हुआ था। आपने हिन्द-युग्म के आवाज़ पर इनका संक्षिप्त परिचय, इनकी आवाज़ में काव्यपाठ, इनका लिखा लोकगीत 'हँसी, हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा' कल ही पढ़-सुन चुके हैं। हम चाहते हैं कि इंटरनेट का हर पाठक भी इस बिहार-रत्न से रुबरू हो। इसलिए हम 'बिदेसिया डॉट को डॉट इन' से साभार इनका एक दुर्लभ साक्षात्कार प्रकाशित कर रहे हैं। जस का तस। फ्लैश से यूनिकोड में बदलने में हमे सहयोग दिया है फैज़ाबाद से आशीष दुबे ने।



एक जनवरी 1965 के दिन के एक बजे लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की 77वीं वर्षगांठ के शुभ अवसर पर धापा (कोलकाता के पूर्वी सीमांत) स्थित श्री सत्यनारायण भवन परिसर में भव्य अभिनंदन समारोह का आयोजन हुआ था। अभिनंदन के समापन समारोह के उपरांत संत जेवियर कालेज, रांची के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रामसुहाग सिंह ने भिखारी ठाकुर का साक्षात्कार किया। प्रो. सिंह द्वारा किये गये इस साक्षात्कार को काफी वर्षों बाद रांची से प्रकाशित होने वाली अश्विनी कुमार पंकज की पत्रिका विदेशिया में 1987 में प्रकाशित किया गया था.
लोकरंग की दुनिया में इसे एक दुर्लभ साक्षात्कार भी कह सकते हैं। इस साक्षात्कार को पढ़ने के बाद भिखारी ठाकुर के व्‍यक्तित्‍व के बारे में कई बातें स्वत: ही सामने आ जायेंगी। कैसे बुलंदियों के दिन में भी भिखारी अपने बारे में कुछ बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहते थे. भिखारी को शायद तब ही इस बात का अहसास था कि आनेवाले दिनों में तमाशाई संस्कृति लोकरंग को निगल लेगी, तभी तो एक सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि अगले जनम में वे यही करना चाहेंगे, अभी से नहीं कह सकते। भिखारी अपने निजी व सार्वजनिक जीवन में कोई रहस्य का पर्दा नहीं डालना चाहते थे, इसीलिये जब उनसे नाच का उद्देश्य पूछा गया तो उन्होंने धनार्जन को भी स्वीकारा।

यहां हम विदेशिया से साभार उसी साक्षात्कार को प्रस्तुत कर रहे हैं-

प्रो.सिंह:- भिखारी ठाकुर जी आपकी जन्म तिथि क्‍या है?

भिखारी ठाकुर- सिंह साहब, 1295 सा ल पौष मास शुक्‍ल पक्ष, पंचमी, सोमवार, 12 बजे दिन।

प्रो.सिंह:- आपका जन्म स्थान कहां है?

भिखारी ठाकुर-कुतुबपुर दियर, कोढ़वापटी, रामपुर,सारण

प्रो.सिंह:- आपके पिताजी का क्‍या नाम है?

भिखारी ठाकुर-दलसिंगार ठाकुर।

प्रो.सिंह:- आपके दादाजी का नाम क्‍या है?

भिखारी ठाकुर- गुमान ठाकुर।

प्रो.सिंह:-क्‍या आपके पिताजी पढ़े-लिखे थे?

भिखारी ठाकुर- वे अशिक्षित थे.

प्रो.सिंह:- आपकी शिक्षा किस श्रेणी तक हुई?

भिखारी ठाकुर- स्कूल में केवल ककहरा तक, मैंने एक वर्ष तक पढ़ा, लेकिन कुछ नहीं आया। भगवान नामक लड़के ने मुझे पढ़ाया।

प्रो.सिंह:-आपके पिताजी की आर्थिक स्थिति कैसी थी?

भिखारी ठाकुर-जमीन तथा अन्य संपत्ति बहुत ही कम थी, गरीब थे।

प्रो.सिंह:-आपके जमींदार कौन थे?

भिखारी ठाकुर-मेरे जमींदार आरा के शिवसाह कलवार थे।

प्रो.सिंह:-आपके साथ उनका व्यवहार कैसा था?

भिखारी ठाकुर-उनका व्यवहार अच्छा था।

प्रो.सिंह:-क्‍या लड़कपन से ही नाच-गान में आपकी अभिरुचि है?

भिखारी ठाकुर-मैं तीस वर्षों तक हजामत करता रहा।

प्रो.सिंह:-कैसे नाच-गान और कविता की ओर आपकी अभिरुचि हुई?

भिखारी ठाकुर-मैं कुछ गाना जानता था। नेक नाम टोला के एक हजाम रामसेवक ठाकुर ने मेरा गाना सुनकर कहा कि ठीक है। उन्होंने यह बताया कि मात्रा की गणना इस प्रकार होती है। बाबू हरिनंदन सिंह ने मुझे सर्वप्रथम रामगीत का पाठ पढ़ाया। वे अपने गांव के थे।

प्रो.सिंह:-आपके गुरुजी का नाम क्‍या था?

भिखारी ठाकुर- स्कूल के गुरुजी का नाम याद नहीं है।

प्रो.सिंह:-आपने अपना पेशा कब तक किया?

भिखारी ठाकुर-तीस वर्ष की उम्र तक।

प्रो.सिंह:-क्‍या अपने पेशे के समय भी आप नाच-गान का काम करते थे?

भिखारी ठाकुर-तीस वर्ष के बाद से नाच-गान का काम कभी नहीं रुका।

प्रो.सिंह:-सबसे पहले आपने कौन कविता बनायी?

भिखारी ठाकुर- बिरहा-बहार पुस्तक।

प्रो.सिंह:-सबसे पहले आपने कौन नाटक बनाया?

भिखारी ठाकुर-बिरहा-बहार ही नाटक के रूप में खेला गया।

प्रो.सिंह:-सबसे पहले बिरहा-बहार नाटक कहां खेला गया?

भिखारी ठाकुर- सबसे पहले बिरहा-बहार नाटक सर्वसमस्तपुर ग्राम में लगन के समय खेला गया।

प्रो.सिंह:-क्‍या आपके पहले भी इस तरह का नाटक होता था?

भिखारी ठाकुर-मैंने विदेशिया नाम सुना था, परदेशी की बात आदि के आधार पर मैंने बिरहा-बहार बनाया।

प्रो.सिंह:-इस तरह के नाम की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

भिखारी ठाकुर- कोई पुस्तक मिली थी, नाम याद नहीं है।

प्रो.सिंह:- क्‍या आप छंद-शास्‍त्र के नियमों के अनुसार कविता बनाते हैं?

भिखारी ठाकुर-मैं मात्रा आदि जानता हूं, रामायण के ढंग पर कविता बनाता हूं।

प्रो.सिंह:- आपकी लिखी हुई कौन-कौन पुस्तकें हैं?

भिखारी ठाकुर-बिरहा-बहार, विदेशिया, कलियुग बहार, हरिकीर्तन, बहरा-बहार, गंगा-स्नान, भाई-विरोधी, बेटी-वियोग, नाई बहार, श्रीनाम रत्न, रामनाम माला आदि।

प्रो.सिंह:- सबसे हाल की रचना कौन है?

भिखारी ठाकुर-नर नव अवतार।

प्रो.सिंह:- आपकी अधिकांश पुस्तकें कहां-कहां से प्रकाशित हैं?

भिखारी ठाकुर- पुस्तकों से मालूम होगा.

प्रो.सिंह:- आपके विचार में सबसे अच्छी रचना कौन है?

भिखारी ठाकुर- भिखारी हरिकीर्तन और भिखारी शंका समाधान.

प्रो.सिंह:- आप जब कोई पुस्तक लिखते हैं तो क्‍या दूसरों से भी दिखाते हैं?

भिखारी ठाकुर- मानकी साहक्‍गांव के ही हैं। वे अभी जीवित हैं। वे सिर्फ साफ-साफ लिख देते हैं। उन्हें शुद्ध-अशुद्ध का ज्ञान नहीं है। रामायण का सत्संग बाबू रामानंद सिंह के द्वारा हुआ। श्लोक का ज्ञान दयालचक के साधु गोसाईं बाबा से हुआ।

प्रो.सिंह:- रायबहादुर की उपाधि आपको कब मिली?

भिखारी ठाकुर-रायबहादुर आदि की जो मुझे उपाधियां मिलीं उन्हें मैं नहीं जानता हूं। कब क्‍या उपाधियां मिलीं मुझे कुछ मालूम नहीं है।

प्रो.सिंह:- क्‍या आपको आशा है कि आपका कोई उत्तराधिकारी होगा?

भिखारी ठाकुर- मेरे भतीजा गौरीशंकर ठाकुर मेरी रचनाओं के आधार पर काम कर रहे हैं।

प्रो.सिंह:- आपकी संतानें कितनी हैं? आपके लड़के क्‍या करते हैं?

भिखारी ठाकुर- एक लड़का है शिलानाथ ठाकुर। वह घर-गृहस्थी का काम करता है। उसे नाच आदि से कोई संबंध नहीं है।

प्रो.सिंह:- क्‍या आप विश्रामपूर्ण जीवन बिताना चाहते हैं?

भिखारी ठाकुर- मैं इस काम से अलग रहकर जीवित नहीं रह सकता।

प्रो.सिंह:- आप तो जनता के कवि हैं, इस लिये स्वतंत्रता के पहले और बाद में क्‍या अंतर पाते हैं?

भिखारी ठाकुर- मैं कुछ कहना नहीं चाहता।

प्रो.सिंह:- वर्तमान शासन से क्‍या आप खुश हैं?

भिखारी ठाकुर- उत्तर देना संभव नहीं।

प्रो.सिंह:- अभी तक कितने पुरस्कार-पदक मिले हैं?

भिखारी ठाकुर- याद नहीं है।

प्रो.सिंह:- हाल में आपको क्‍या कोई उपाधि मिली है?

भिखारी ठाकुर-हां, बिहार रत्न की।

प्रो.सिंह:- बिहार के बाहर आप अपना नाच दिखाने कहां-कहां गये हैं?

भिखारी ठाकुर- आसाम, बनारस, कलकत्ता और बम्बई सिनेमा में एक गीत देने के लिये।

प्रो.सिंह:- कैसे आप समझते हैं कि आपके नाच से लोग प्रसन्न हो रहे हैं?

भिखारी ठाकुर- कोई उत्तर नहीं।

प्रो.सिंह:- क्या आप पूजा-पाठ, संध्या वंदना भी करते हैं? किन देवताओं की पूजा करते हैं?

भिखारी ठाकुर-सिर्फ राम-नाम जपता हूं।

प्रो.सिंह:- जिंदगी को आप सुखमय या दुखमय समझते हैं. हिंदी छोड़कर और कोई भाषा जानते हैं?

भिखारी ठाकुर- मौन।

प्रो.सिंह:- आपके आधार पर अभी कौन-कौन नाच हैं?

भिखारी ठाकुर- अनेक नाच इसी आधार पर हो गये हैं।

प्रो.सिंह:- क्या कुछ दिनों तक सिनेमा में भी आप थे? सिनेमा का जीवन आपको कैसा मालूम हुआ था?

भिखारी ठाकुर-नहीं।

प्रो.सिंह:- आप अपने दल के लोगों का क्या खुद अभ्यास करवाते हैं?

भिखारी ठाकुर-उस्ताद से सिखवाते हैं।

प्रो.सिंह:- आप जो नाटक दिखाते हैं उसका लक्ष्य धनोपार्जन के अतिरिक्त और क्या समझते हैं?

भिखारी ठाकुर-उपदेश और धनोपार्जन।

प्रो.सिंह:- स्वास्थ्य कैसा रहता है?

भिखारी ठाकुर- अब तक सिर्फ तीन दांत टूटे हैं।

प्रो.सिंह:- नाटक के बाद की थकावट कैसे दूर होती है?

भिखारी ठाकुर- मौन।

प्रो.सिंह:- आप क्या राजनीति में भाग लेना चाहते हैं?

भिखारी ठाकुर- मौन।

प्रो.सिंह:- पुन: आपका जन्म इसी देश में हुआ तो क्यया आप यही कार्य करना चाहते हैं?

भिखारी ठाकुर- कोई निश्चित नहीं।

प्रो.सिंह:- कविता लिखने या नाटक करने के लिये क्या आपको तैयारी करनी पड़ती है?

भिखारी ठाकुर- पहले तैयारी करनी पड़ती थी पर अब नहीं।

प्रो.सिंह:- अपने नाटकों के कथानक आप कहां से लेते हैं?

भिखारी ठाकुर- समाज से।

प्रो.सिंह:- इस समय आपके अनन्य मित्र कौन-कौन हैं?

भिखारी ठाकुर- अब कोई नहीं है। पहले बाबू रामानंद सिंह थे।

प्रो.सिंह:- क्या आपकी कोई स्थायी नाट्यशाला है?

भिखारी ठाकुर- कोई स्थायी जगह नहीं है।

प्रो.सिंह:- अच्छे नाटक या कविता के आप क्या लक्षण समझते हैं?

भिखारी ठाकुर- जनता की भीड़ से।

प्रो.सिंह:- क्या आपको मालूम है कि इस समय आपका उच्च कोटी के कलाकारों में स्थान है?

भिखारी ठाकुर-जो प्राप्त हुआ है वही मेरे लिये पर्याप्त है।

प्रो.सिंह:- भूतपूर्व राष्ट्रपति देशरत्न डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से सबसे पहले और अंत में भेंट कब हुई?

भिखारी ठाकुर- मुझे याद नहीं।

प्रो.सिंह:- क्या आप वर्तमान राष्ट्रपति डॉ॰ राधाकृष्ण्न और वर्तमान प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री से मिले हैं?

भिखारी ठाकुर- कभी नहीं।

प्रो.सिंह:- पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने कभी आपका नाटक देखा?

भिखारी ठाकुर-कभी नहीं।

प्रो.सिंह:- गांधीजी ने आपका नाटक देखा या कभी भेंट हुई थी?

भिखारी ठाकुर- निकट से साक्षात्कार नहीं हुआ।

प्रो.सिंह:- आपकी ससुराल कहां है?

भिखारी ठाकुर- मेरा प्रथम विवाह मानपुरा, आरा के स्वर्गीय देवशरण ठाकुर की लड़की से हुआ। उसके निधन के बाद दूसरा विवाह आमडाढ़ी, छपरा में हुआ. उसका गंगालाभ होने के बाद तीसरा विवाह हुआ, उसकी भी मृत्यु...

प्रस्तुति:- निराला