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Wednesday, June 03, 2009

हिंदी का भूत और रवीश कुमार

रवीश कुमार हिंदी ब्लॉगिंग का सदुपयोग करने वाले गिने-चुने लेखकों में से हैं....ये लेख उनके ब्लॉग पर दिखा तो मन हुआ इन्हें बैठक पर न्योता दूं....जब तक उनपर उनके व्यस्त कामों का भार है तब तक बैठक पर उनके लेख साभार ही सही....

हिंदी से डर लगता है। डरावनी हो गई है। सीबीएसई अब हिंदी के सवालों को हल्का करने जा रही है। प्राइवेट स्कूल इंग्लिश मीडियम होते हैं। गांव गांव में टाट की झोंपड़ी में इंग्लिश मीडियम स्कूल के बोर्ड लगे मिल जायेंगे। सुबह सबुह बच्चे सरकती हुई पैंट और लटकती हुई टाई लगाकर जाते मिल जायेंगे। सरकारी स्कूलों के बच्चे पैदल दौड़ लगाकार स्कूल पहुंच जाते हैं। लेकिन अब गांवों में भी स्कूली बच्चों के लिए जालीनुमा रिक्शा आ गया। इनमें बच्चे किसी कैदी की तरह ठूंस कर ले जाये जाते हैं। इंग्लिश मीडियम स्कूलों की तरफ।मां बाप ने कहा कि इंग्लिश सीखो। हिंदी तो जानते ही है। घर की भाषा है। अब हिंदी से ही डर लगने लगा है। इसलिए सीबीएसई ने तय किया है कि अति लघु उत्तरीय प्रश्नों की संख्या बढ़ा देगी। अब हिंदी के भी सवालों के जवाब हां नां में दिये जायेंगे। गैर हिंदी भाषी बच्चों के लिए हिंदी का डर समझ भी आता है। घर से बाहर निकलते ही इंग्लिश सीखने वाले हिंदी से डरने लगे सुनकर हैरानी तो नहीं हुई लेकिन मन उदास हो गया। अपनी हिंदी डराती भी है ये अभी तक नहीं मालूम था। बहुत पहले विश्वात्मा फिल्म देखी थी। गुलशन ग्रोवर अजब गजब की हिंदी बोलता था। खलनायक के मुंह से शुद्ध या क्लिष्ट हिंदी के नाम पर निकले हर शब्द हंसी के फव्वारे पैदा करते थे। इस हिंदी को तो हिंदी वालों ने ही कब का काट छांट कर अलग कर दिया। मान कर चला जा रहा था कि सरल हिंदी का कब्ज़ा हो चुका है। व्याकरणाचार्यों के जाते ही हमारी हिंदी झंडी की तरह इधर उधर होने लगी। वाक्य विन्यास का विनाश होने लगा। वैसे मेरी हिंदी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन मुश्किल भी नहीं है। ठीक है कि हम व्याकरण मुक्त हो चुके हैं लेकिन हिंदी बोलने वाले घरों के बच्चे क्या इस वजह से साहित्य नहीं समझ पाते क्योंकि भाषा का इतना अतिसरलीकरण कर दिया गया है कि अब मतलब ही समझ नहीं आता। इस पर बहस होनी चाहिए।हिंदी से डर की वजह क्या हो सकती है? यह खबर हिंदुस्तान में ही पढ़ी। हिंदी का अखबार लिख रहा है कि कोई हिंदी का भूत है जिससे प्राइवेट स्कूल के बच्चे डर रहे हैं। उन्हें हिंदी के लिए ट्यूशन करना पड़ रहा है। ट्यूशन वैसे ही खराब है लेकिन अंग्रेज़ी के लिए ट्यूशन करने में कोई बुराई नहीं तो फिर अकेले हिंदी का भूत क्यों पैदा किया जा रहा है। मैं हिंदी राष्ट्रवादी की तरह नहीं लगना चाहता लेकिन मेरी ज़ुबान से उतरती हुई भाषा डरावनी कहलाने लगे चिंता हो रही है। वैसे हम भी अंग्रेज़ी से तो डरते ही हैं। कई लोग हैं जो कभी न कभी डरे। अंग्रेज़ी के भूत को काबू में करने के लिए नेसफिल्ड से लेकर रेन एंड मार्टिन और बच गए तो रैपिडेक्स इंग्लिश स्पिकिंग कोर्स का रट्टा मार गए। मेरे एक लेख की प्रतिक्रिया में शंभू कुमार ने ठीक ही कहा है कि बिहार यूपी के लड़के क्लर्क बनने की इच्छा में अंग्रेज़ी तो सीख ही जाते हैं। हम भी अंग्रेज़ी का मज़ाक उड़ाया करते थे। अंग्रेज़ी व्याकरण के कई किस्से बिहार यूपी में आबाद हैं। वह गया गया तो गया ही रह गया। घो़ड़ा अड़क कर सड़क पर भड़क गया टाइप के मुहावरे खूब चलते थे। चुनौतियां दी जाती थीं कि इसका ट्रांसलेशन करके दिखा दो। लेकिन हम कभी स्कूल से मांग करने नहीं गए कि बोर्ड को बोलो कि अंग्रेज़ी का भूत परेशान कर रहा है। इसका सिलेबस बदलो।दरअसल प्राइवेट स्कूलों के रसूख इतने बढ़ गए हैं कि वो ढंग के हिंदी टीचर रखने की बजाय बोर्ड पर दबाव डाल कर सिलेबस बदलवा देते हैं। सब आसान ही करना है तो फिर इम्तहान क्यों रहे। विद्वान तो कह ही रहे हैं कि इम्तहान की व्यवस्था खत्म कर दी जाए। ग्रेड न रहे। इसके लिए तो स्कूल वाले दबाव नहीं डालते। पश्चिम बंगाल की सरकार ने अपने बोर्ड की परीक्षाओं में ग्रेड सिस्टम लागू कर दिये हैं। बिना किसी दबाव के। सीबीएसई कब से ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने पर बहस कर रही है। क्यों नब्बे फीसदी का एलान किया जाता है। इतने नंबर वाले बच्चे क्या हिंदी में नंबर नहीं ला सकते। जब रटना ही है तो हिंदी भी रट लो। मुझे लगता है कि हिंदी का भूत पैदा किया जा रहा है। ताकि हिंदी गायब हो जाए। इंग्लिश मीडियम का हाल ये है कि अच्छी इंग्लिश लिखने वाले कम हो गए हैं। इंग्लिश के लोग ही शिकायत करते हैं कि प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को ए एन द जैसे आर्टिकलों का प्रयोग ही नहीं मालूम। प्रिपोज़िशन का पोज़िशन गड़बड़ कर देते हैं। भाषा का भूत नया है। देखते हैं कि प्राइवेट स्कूल वाले इस भूत को कितना नचाते हैं।

रवीश कुमार

Tuesday, March 10, 2009

खुशी चाहिए या प्रसन्नता....

इधर दो घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने हिन्दी-उर्दू के सवाल पर मुझे झकझोर दिया। "पंचायती राज अपडेट' में मेरी संपादकीय सहयोगी ने एक समाचार बनाते समय झंडारोहण शब्द का प्रयोग किया था। कॉपी हाथ में आते ही मैंने झंडारोहण को काट कर ध्वजारोहण लिख दिया और उसे समझाया कि सामान्यत: तद्भव और तत्सम शब्दों के बीच संधि नहीं होती। मैं उसका अफसर था, इसलिए या वह मुझे हिन्दी का जानकार समझती है, इसलिए उसने मेरे संशोधन को स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं मानता हूं कि भाषा में अफसरी नहीं चलती। यह दावा तो मेरी कल्पना में भी नहीं आता कि मैं हिन्दी का जानकार हूं। अत: मैं सोचने लगा कि झंडारोहण में बुराई क्या है। मेरी धारणा है कि हिन्दी तद्भव-प्रधान भाषा है। अगर कोई दूसरी भाषा उसके साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ती है, तो वह उर्दू है। उर्दू यानी उसके वे लफ्ज जो आम बोलचाल में आ गए हैं। उम्र हिन्दी में चलता है, पर आब नहीं। उर्दू शब्दों के भी तद्भव रूप होते हैं -- जिसे हम खामखा कहते हैं, वह उर्दू में ख्वाहमख्वाह है। लेकिन बहुत समय से हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने का एक अटूट सिलसिला चला आ रहा है, जिससे हिन्दी का नुकसान हुआ है। जो हिन्दी लोक भाषा थी, उसका एक हिस्सा विद्वानों का, विद्वानों के द्वारा और विद्वानों के लिए हो गया। इसका कुछ उपचार होना चाहिए।
दूसरी घटना का संबंध हाल ही में पढ़ी एक कहानी में प्रेमी-प्रेमिका संवाद से है। प्रेमिका कहती है, मैं हमेशा तुम्हें खुश रखने की कोशिश करूंगी। इस पर प्रेमी कुछ नाराज हो जाता है। वह कहता है, इस तरह की घटिया बात मेरे दिमाग में आ ही नहीं सकती। खुश रखना तो नौकरों या तवायफों का काम है। इस पर प्रेमिका हंसने लगती है; कहती है -- तुमने हिन्दी में पीएचडी कर ली है, पर रहे पंडित के पंडित। चलो, मैं तुम्हें हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास करूंगी। इस पर प्रेमी सोच में पड़ जाता है। क्या खुश और प्रसन्न तथा खुशी और प्रसन्नता एक ही चीज नहीं हैं? फिर खुशी कैसे तुच्छ भौतिकवादी चीज और प्रसन्नता कैसे ऊंची और उदात्त चीज हो गई? कुछ देर सोचने के बाद वह प्रेमिका से कहता है, लेकिन मैं तो तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहूंगा। लड़की हंस पड़ती है। बोलती है, यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।
हिन्दू-मुसलमान एकता की चर्चा हमारे देश में काफी समय से चली आ रही है, पर हिन्दी-उर्दू एकता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। हिन्दी में शुद्धतावाद का आग्रह अभी भी बरकरार है। जो शुद्धतावादी हैं, वे इनसान कभी नहीं लिखेंगे, हमेशा मनुष्य ही लिखेंगे। जो कुछ उदार हैं, वे कहेंगे कि इनसान भी कम हिन्दी नहीं है। मैं इससे एक कदम आगे जाना चाहता हूं और जिस आदमी की कोई इज्जत नहीं है, उसे इज्जतहीन या इज्जतविहीन लिखने की इजाजत चाहता हूं। जहां हिन्दी और उर्दू की संधि बहुत खराब लगेगी, ऐसे मामलों को अपवाद मान लेना चाहिए, जैसे आजादिओत्तर (तूफानोत्तर या बाढ़ोत्तर राहत का स्वागत है)। लेकिन उम्राधिक्य लिखने में क्या हर्ज है? अगर कोई यह कहता है कि मेरा दोस्त शरीफतम लोगों में एक है या यहां से नजदीकतम स्टेशन रिवाड़ी है, तो उसकी आलोचना क्यों की जाए?
कई मामलों में इससे लिखने में सुविधा भी हो सकती है। जैसे अंग्रेजी के मार्जिनलाइजेशन का कोई अच्छा पर्याय नहीं है। सीमांतीकरण जमता नहीं है। पर हाशियाईकरण लिखा जाए तो? सीमांत की जगह हाशिया ज्यादा लोकप्रिय है और इसकी ध्वनि अर्थ के करीब भी है। इसी तरह नई अर्थनीति लोगों को गरीब बना रही है, यह कहने के बजाय यदि यह कहा जाए कि वह लोगों का गरीबीकरण कर रही है, तो आपत्ति क्यों की जाए? गरीबीकरण से एक क्रमिक प्रक्रिया का बोध होता है, जो गरीब बनाने में गैरहाजिर है। कस्बाईकरण तो चल ही पड़ा है, शहरीकरण भी अब काफी लोकप्रिय है। जो हिन्दी में अप्सरा है, उसे उर्दू में परी कहते हैं। अगर किसी स्त्री का वर्णन करते हुए कहा जाए कि उसके परीतुल्य सौंदर्य से मुग्ध होने से कौन बचा है, तो क्या हिन्दी की तौहीन हो जाएगी? रेस को नस्ल कहा जाता है। नस्ल-भेद हिन्दी का एक पुराना शब्द है। यहां संधि नहीं, समास है, जिसके उदाहरणों की कमी नहीं है, जैसे शादी-ब्याह, सुबह-सवेरे, नशामुक्ति, चाय-पान, पर कोई नस्लीय लिखे, जिसमें उर्दू नस्ल के साथ हिन्दी ईय प्रत्यय का योग है, तो क्या यह गलत हिन्दी का नमूना होगा? अश्लीलता की तर्ज पर नस्लीयता और धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर नस्लनिरपेक्षता। तद्भव शब्द गुट के आधार पर निर्गुट बनाया जा सकता है, तो उर्दू शब्द अक्ल के आधार पर निरक्ल या अक्लविहीन में क्या बुराई है? अखबारी सच्चाई को हम जानते हैं, पर अखबारेतर सच्चाइयां भी होती हैं। दमकलवाले हमेशा अग्निग्रस्त भवन की तरफ क्यों दौड़ें? वे आगग्रस्त मकान की ओर भी जा सकते हैं। हम शराबेतर नशों का जिक्र कर सकते हैं और किसी को शराब प्रेमी या शराबग्रस्त भी कहा जा सकता है। बल्कि शराब प्रेमी एक अलग कैटिगोरी है, जिसके लिए कोई माकूल शब्द नहीं है।
इस तरह के प्रयोग शुरू में कुछ अटपटे लगेंगे, पर धीरे-धीरे वे हमारी जबान पर चढ़ जाएंगे। संस्कृतनिष्ठता के प्रति मोह या अंग्रेजी की नकल के कारण मेरे मुहल्ले का एक दुकानदार लिखता है --- यहां चाय उपलब्ध है, जबकि वह आसानी से लिख सकता था -- यहां चाय मिलती है। असल में, हम अपने सामूहिक अवचेतन में संस्कृत शब्दों को पवित्र मानते हैं (संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है) और तद्भव तथा उर्दू शब्दों को कुछ हीन दृष्टि से देखते हैं। संस्कृत अगर ब्रााहृण है, तो तद्भव ओबीसी या दलित और उर्दू म्लेच्छ। यह मद्यप और शराबी के अंतर से स्पष्ट है। वर्षा में लालित्य है, बारिश में कोई रोमांस नहीं है। रेणु के उपन्यास "परती परिकथा' में नायक जिस स्त्री को अपनी रक्षिता बताता है, उसके लिए देशी शब्द रखैल है। रक्षिता कहे जाने से वह स्त्री सहज ही सम्माननीय हो उठती है, जबकि रखैल शब्द दूर से ही बदबू देता है।
शब्दों के बीच इस जाति प्रथा को खत्म करना लोकतंत्र के हित में तो है ही, हिन्दी-उर्दू की दूरी को मिटाने में भी सहायक होगा। शायद इस मिश्रित भाषा को हिन्दुस्तानी कहा जाने लगे, जो गांधी जी की हिन्दुस्तानी का ही एक और रूप है। एक और फायदा यह है कि हिन्दी शब्दों की संख्या में डेढ़ गुनी या दुगुनी वृद्धि हो जाएगी। विकसित भाषा वही मानी जाती है, जिसमें एक चीज के कई नाम हों और एक जैसी अभिव्यक्ति के लिए कई-कई शब्द हों। यदि मेरा यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाता है, तो हमारे पास शिकायती और शिकायतगर के साथ-साथ शिकायतकर्ता भी होगा, जो पहले दोनों से बेहतर है।

राजकिशोर