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Wednesday, February 09, 2011

शमशेर सहज मित्र थे



अचानक जनसत्ता में यह खबर देखकर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि शमशेर जी नहीं रहे। 14 दिसंबर को उनसे बात हुयी थी तब उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य ख़राब है लेकिन मुझे न इतनी गम्भीर बीमारी की उम्मीद थी और न ही उन्होंने कोई संकेत दिया। वे मेरे परिचित और लगभग मित्र तभी हो गए थे जब मैं दिल्ली 1997 में आया। इसकी एक दिलचस्प कहानी यह है कि उन दिनों नफीस अफरीदी हिंद पॉकेट बुक्स में संपादक थे और उन्होंने मेरे और शमशेर सहित 3-4 और लोगों को एक पुस्तक श्रृंखला के लेखक के रूप में नामित किया था। लेकिन चूँकि वह योजना और सदिच्छा अफरीदी साहब की ही थी इसलिए उसे प्रकाशक दीनानाथ मल्होत्रा ने स्वीकृत नहीं किया। उनका कहना था कि यह योजना बनाने से पहले उनसे एक बार पूछ लेना चाहिए था। लेकिन अफरीदी साहब ने हमारी ख़ुशी का ज्यादा ख्याल किया और पहले हमें ही नियुक्त कर लिया। भले ही यह योजना सफल न रही हो लेकिन मैं तो फूल कर कुप्पा हो गया कि अच्छा, चलो किसी ने तो मुझे योग्य समझा। यह देखकर मुझे और ख़ुशी हुयी कि मेरे ही साथ एक और सज्जन इस कदर फूले हुए हैं हैं कि बस छलक छलक पड़ रहे हैं। वे शमशेर अहमद खान थे।

धीरे-धीरे हमारा बात-विचार-व्यव्हार आगे बढ़ने लगा। शमशेर अत्यंत मिलनसार, सहज, महत्वाकांक्षी, योजनावीर लेकिन मेहनती व्यक्ति थे। वे अक्सर अपना समय और पैसा खर्च करके संस्कृति और साहित्य के लिए अनेक काम करते। अनेक पत्रिकाओं के लिए उन्होंने गृहमंत्रालय के केन्द्रीय हिंदी संसथान में खरीदे जाने की स्वीकृति दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वे अपने चित्रों और लेखों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाना चाहते थे।

जो सबसे महत्वपूर्ण बात गौर करने की है कि वे बच्चों के लिए वृत्तचित्र और फिल्मे बनाना चाहते थे और पर्यावरण पर उनकी कई पुस्तकें बच्चों के लिए ही छपीं। वे संभवतः एक सहज पाठक वर्ग तक पहुँचना चाहते थे और इसीलिए लगातार सक्रीय रहते थे।
उन्होंने एक मित्र से से मुझे मिलवाया जो इग्नू में हैं और चाहते थे कि जो वृत्तचित्र मैंने बनाया है वह वहाँ से प्रसारित हो। वह मित्र दलजीत सिंह सचदेवा यारबाश और सच्चा जाट जरूर है लेकिन फिल्मों के मामले में उसकी किसी से तुलना नहीं है। बिलकुल अपने ढंग का है। लिहाज़ा मेरी फ़िल्में क्या प्रसारित होतीं लेकिन वह साला दोस्त जरूर बढ़िया बन गया। शमशेर जब भी मिलते पूछते क्या उसने कोई काम कराया और उनके जीते जी जवाब नहीं ही था।

विगत दिनों अंदमान यात्रा से लौटकर शमशेर कुछ फूटेज लाये जिसपर वे एक डॉक्यूड्रामा बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मुझे घर बुलाया। हैंडी कैम से लिया गया वह फूटेज इतना ख़राब और नाकाफी था कि उसपर कुछ भी बनाना संभव नहीं था। इस बात से वे बहुत दुखी थे। वे किसी ऐसे काम के माध्यम से लोगों के सामने आना चाहते थे जिससे लोग उन्हें लम्बे समय तक याद रखें।
अचानक बीमार होना और इस तरह चले जाना मुझे इसलिए भी अखर रहा है क्योंकि वे अपने ऑर्थराइटिस से पीड़ित बेटे को स्वस्थ देखना चाहते थे। एक बार उसके बारे में बहुत भावुक होकर वे बोले- "यह भी एक ख़राब फूटेज है यादवजी, मैं इसे एक अच्छी फिल्म कि तरह शानदार देखना चाहता हूँ।"

---रामजी यादव

Tuesday, March 16, 2010

सुनिए राजेन्द्र यादव का 93 मिनट का इंटरव्यू

पिछले 6 दशकों से रचनाकर्म में सक्रिय राजेन्द्र यादव साहित्य में महानायक की हैसियत रखते हैं। साल 2006 में वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश और युवा कवि-लेखक रामजी यादव की टीम (पीपुल्स विजन प्रोडक्शन कम्पनी) ने राजेन्द्र यादव का लम्बा इंटरव्यू लिया। पीपुल्स विजन यादव जी के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व पर फिल्म बना रहा है। यदि आप भी इस प्रोजेक्ट से किसी भी तरह से जुड़ना चाहें तो रामजी यादव से (yadav.ramji2@gmail.com या 9015634902 पर) संपर्क करें। इस साक्षात्कार में राजेन्द्र यादव ने कविता की विलुप्ति, कहानी-नई कहानी, दलित और महिला लेखन, मार्क्सवाद की भारत में असफलता, साहित्य और राजनीति के पारस्परिक संबंधों इत्यादि पर खुलकर बोला। हमें यह साक्षात्कार संग्रहणीय लगा और यह भी लगा कि शायद हिन्द-युग्म के बहुत-से पाठक भी इसे सुनकर ऐसा महसूस करेंगे कि बहुत कुछ जानने और समझने को मिला।



यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं या अपनी सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और गांधी शांति प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मासिक कार्यक्रम "अनहद" में राजेन्द्र यादव का कथापाठ शुक्रवार, 19 मार्च 2010 की शाम 5‍ः30 बजे आयोजित होगा। अध्यक्षता निर्मला जैन करेंगी। जरूर पधारें।

Tuesday, November 17, 2009

रामकृष्ण पाण्डेय- आंदोलनों में अपनी भूमिका तलाशने वाला पत्रकार

हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार और कवि रामकृष्ण पांडेय का सोमवार शाम निधन हो गया। न्यूज एजेंसी यूएनआई से रिटायर हुए रामकृष्ण पाण्डेय लम्बे समय से मधुमेह से पीड़ित थे। सोमवार, 16 नवम्बर को इनकी तबियत अचानक खराब हो गई जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनका देहान्त हो गया। आज शाम उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इनके परिवार में इनकी पत्नि के अलावा इनकी दो बेटियाँ भी हैं।

कम्यूनिस्ट आंदोलन से जुड़े रामकृष्ण पाण्डेय को इनके कुछ करीबी और जानकार कुछ यूँ करते हैं। हम इस माध्यम से हिन्द-युग्म की ओर से श्रद्धाँजलि दे रहे हैं।


वे अपनी भूमिका देश में चल रहे आंदोलनों में तलाशते थे

सुबह रंजित वर्मा से रामकृष्ण पाण्डेय की मृत्यु का समाचार सुनकर एकबारगी यकीन नहीं हुआ की हर हफ्ते हँसते-मुस्कराते मिलाने वाले पाण्डेय जी इतनी जल्दी धोखा दे जायेंगे। वे हमारे बीच एक अपरिहार्य उपस्थिति थे। हाल में ही उन्होंने यूएनआई में अपनी दूसरी पारी शुरू की थी और अपनी कई किताबों के प्रकाशन की योजनाएँ बना रहे थे। पाण्डेय जी से मेरा परिचय दस साल पहले हुआ था। वे जल्दी ही आत्मीय हो गए। काफी दिनों बाद उन्होंने अपना संकलन भी दिया। मिलना-
एक प्रतिबद्ध पत्रकार थे

रामकृष्ण पाण्डेय एक वरिष्ठ पत्रकार थे, कवि भी थे। वे इतने सज्जन थे कि किसी भी बात के लिए मना नहीं करते थे। हमेशा जन के लिए प्रतिबद्ध पत्रकार की तरह लगे रहे। वे इस वय में भी लगातार काम करते रहे, अपनी अस्वस्थता की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। हालाँकि मेरा कभी उनसे बहुत व्यक्तिगत संबंध नहीं रहा, लेकिन प्रोफेशनल सम्बंध ज़रूर रहा। मैंने जब कभी भी उन्हें समयांतर के लिए लिखने के लिए कहा, उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावज़ूद लिखा। अक्टूबर 2009 अंक में भी उनकी लिखी एक समीक्षा छपी है। उन्होंने कभी भी अपनी पीड़ा, अपनी बीमारी का प्रचार नहीं किया। कल जब उनकी मृत्यु का समाचार मिला तो पता चला कि वे पिछले 1 सप्ताह से गंभीर रूप से बीमार थे। यूएनआई के अलावा उन्होंने लघुपत्रिकाओं में प्रतिबद्ध किस्म का लेखन किया। इनके लेखों और कविताओं में समाज की चिंताएँ रिफ्लैक्ट होती हैं। इनका एक कविता-संग्रह भी प्रकाशित है। एक और तैयार है। आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न नहीं थे, इसके बावज़ूद भी वे जन संघर्ष और मानवीय पीड़ा की कलम बनते रहे।

--पंकज बिष्ट, संपादक- समयांतर
जुलना बाद में कम हो गया था लेकिन समयांतर में लगातार अपनी टिप्पणियों और लेखों से उन्होंने न केवल ध्यान खिंचा बल्कि समकालीन प्रश्नों पर बेहद सादे ढंग से लिखा। पिछले साल रंजित, कुमार मुकुल, अजय प्रकाश, पाण्डेय जी आदि ने मंडी हाउस में नियमित मिलने और रचना पाठ का एक कार्यक्रम शुरू किया जिसमे मैं भी शामिल हो गया, हालाँकि कुछ मित्रों ने निहित स्वार्थों के लिए तोड़फोड़ करने और हूट करने की कोशिश की लेकिन यह आयोजन लगातार चलता रहा। पाण्डेय जी अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण गोष्ठी के अनिवार्य हिस्सा थे। सही मायने में वे साहित्य के गंभीर अध्येता थे और समकालीनता बोध से भरे पूरे थे। कविता के नए सौंदर्य,सवाल,भाषा और चुनौतियों के प्रति वे निरंतर सचेत थे और नए से नए कवियों को लगातार पढ़ते थे। आनंद प्रकाश जी की तरह पाण्डेय जी नयी पीढ़ी में अपने समकालीन धुन्ध्ते इ अपनी जगह थे। स्वयं पाण्डेय जी हिंदी साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा से पूरी तरह उपेक्षित थे लेकिन इसकी उन्हें परवाह ही कहाँ थी। वे अपनी भूमिका देश में चल रहे आंदोलनों में तलाशते थे और लगातार अपनी टिप्पणियों से उसमें भागीदार भी होते। पांडेय जी इस मामले में बेहद संकोची थे कि कोई उन्हें साहित्यकार माने ही। इसी झोंक में वे अपनी जगह ब्रेख्त या किसी और कवी की कविता सुनाने लगते। यह आज के आत्ममुग्ध लोगों की दुनिया में दुर्लभ बात है। शायद यह खूबी अपने दौर में एक गंभीर सांस्कृतिक कर्म के प्रति इमानदार सरोकारों से ही पैदा होती होती है। उनका जाना हमारे एक जरूरी दोस्त का जाना है लेकिन वे हमारी भावनाओं और संवेदना में हमेशा मौजूद रहेंगे।

--रामजी यादव, युवा कवि, सहसंपादक- पुस्तक वार्ता


पाण्डेय जी प्रगतिशील आंदोलन के लिए लगातार खाद-पानी का काम करते रहे

रामकृष्ण का बहुत लम्बा कैरियर रहा। पटना में जन्मे, वहीं से इनके कैरियर की शुरूआत हुई। पटना से जेएनयू आ गये।
बहुत अधिक परिचित नहीं था। हालाँकि उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व से लगातार प्रभावित ज़रूर रहा। उनके पत्रकारी कैरियर में कोई कंट्रोवर्सी नहीं रही, वे पूरी तरह बेदाग रहे। यही क्या कम बड़ी उपलब्धि है!

--विमल झा, फीचर संपादक, दैनिक भास्कर
कविताएँ लिखते रहे। पाण्डेय जी मूल रूप से कवि ही थे, लेकिन चूँकि बाद में पत्रकारिता से भी जुड़ गये,इसलिए एक लम्बा कैरियर पत्रकारीय भी रहा। पाण्डेय जी प्रगतिशील आंदोलन के लिए लगातार खाद-पानी का काम करते रहे। उनकी कविताएँ प्रमुख रूप से नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित कविता संग्रह में प्रकाशित हुई, जिसमें इनके अलावा उदय प्रकाश और अरुण कमल की कविताएँ भी संकलित थीं। इनकी समझ बहुत ही अच्छी थी। मार्क्सवादी नज़रिया रखते थे। कविताओं की साफ समझ रखते थे। गोष्ठियों में जब किसी कविता पर अपने विचार देते थे तो कुछ न कुछ नया दृष्टिकोण लेकर उपस्तित होते थे। नई बात खोज ही लेते थे। युवा कवियों के बीच भी काफी लोकप्रिय थे। हालाँकि उनकी रचनाएँ समकालीनता से पूरी तरह लैश थीं, फिर भी उन्हें हिन्दी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हक़दार थे। यह पूरे हिन्दी साहित्य के लिए चिंता की बात है।

--रंजीत वर्मा, कवि-लेखक

Friday, November 06, 2009

प्रभाष जोशी- एक प्रकाश-पुंज अस्त हो गया (श्रद्धाँजलि)

श्रद्धांजलि - प्रेमचंद सहजवाला

जीवनवृत्त
प्रभाष जोशी (जन्म- 15 जुलाई 1936, निधन- 05 नवम्बर 2009) हिन्दी पत्रकारिता के एक स्तंभ थे। ये हिंदी दैनिक 'जनसत्ता' के सम्पादक रह चुके हैं और सम्प्रति 'तहलका हिंदी' के लिये लिखते थे।

इंदौर (म॰प्र॰) में जन्मे प्रभाष जोशी ने 'नई दुनिया' के साथ अपने पत्रकारिता-कैरियर की शुरूआत की। नवंबर 1983 में वे जनसत्ता से जुड़े और इस अखबार के संस्थापक संपादक बने। नवंबर 1995 तक वे अखबार के प्रधान संपादक रहे लेकिन उसके बाद से अबतक वे जनसत्ता के सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े रहे। उन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीयता को लगातार पुष्ट किया। वैचारिक प्रतिबद्धता का जहाँ तक सवाल है तो उन्होंने सत्य को सबसे बड़ा विचार माना. इसलिए वे संघ और वामपंथ पर समय-समय पर प्रहार करते रहे।

प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबार बनाया। उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है। देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया. इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए।

अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे। अभी भी जनसत्ता में हर रविवार उनका कॉलम कागद-कारे छपता था। हाल में ही इन्होंने 'तहलका-हिन्दी' में 'औघट-घाट' नाम से स्तम्भ लिखना शुरू किया था।

ऊषा से प्रभाष जोशी का विवाह हुआ, जिससे इन्हें 2 बेट संदीप और सोपान तथा एक बेटी सोनल हुए। सोपान जोशी पर्यावरण की प्रसिद्ध पत्रिका 'डाऊन-टू-अर्थ' के प्रबंध संपादक हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान- हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल 2007-08 का शलाका सम्मान।
विकिपीडिया से साभार
आज की सुबह सचमुच मेरे लिए एक दुखद समाचार लाई. दिन बहुत सामान्य तरीक़े से शुरू हुआ कि मोबाइल पर एक सन्देश आया, जिसे पढ़ कर हृदय को बहुत गहरा धक्का पहुंचा. सन्देश सुनीता शानू ने भेजा था - 'प्रभास जोशी जी नहीं रहे. आज का दिन बहुत दुखद है'. मैं इस खबर पर विश्वास करने को तैयार नहीं हूँ, इस लिए दो चार फ़ोन खड़खड़ा देता हूँ, पर सब के सब दोस्त मुझ पर कितना अत्याचार कर रहे हैं, कह रहे हैं 'हाँ, प्रभास जोशी नहीं रहे'!

हिंदी पत्रकारिता के महास्तंभ, 73 वर्षीय प्रभास जोशी जैसे पावन हृदय व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे. 'जनसत्ता' समाचार पत्र को अख़बार जगत में चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने वाली एक शख्सियत के रूप में मैं उन के नाम से पहले ही परिचित था. पर इस रूप में तो उनका परिचय जग-प्रसिद्ध रहा. इतना जान कर मैंने कौन से तीर मार लिए. पर क्या मैं खुद कभी उनके निकट खड़ा या बैठा भी था? ऐसा सौभाग्य भला मेरा कहाँ? पर हाँ, एक दिन वह शुभ घड़ी भी आ गई, जब दूरदर्शन के NDTV चैनल के स्टूडियो में मैं प्रभास जोशी के बहुत निकट बैठा था. यह पहली बार था कि ज्यों ही वे आए, मुझे उठ कर उनके चरण स्पर्श करने का मौका मिला. NDTV स्टूडियो में शूटिंग थी साप्ताहिक कार्यक्रम 'हम लोग' की, और उस में प्रभास जी व्यस्तता के कारण कुछ देर से आए थे. उन के आते ही मैं उत्तेजित सा था कि जिस महान शख्सियत की पवित्र छवि मैं मन में कई वर्षों से समेटे हूँ, वह महान शख्सियत अब स्टूडियो की इन सीढ़ियों पर मेरे सामने, वहां, केवल तीन चार कदम ही दूर बैठेगी. कितनी बढ़िया जिंदगी है मेरी. मैं ने जब कैमरा की परवाह किये बिना उठ कर उन के चरण स्पर्श किये, तो जो सौम्यता व आर्शीवाद के भाव उन के चेहरे पर आए, उन का वर्णन सचमुच मुश्किल है. मैं एक कहानीकार भी हूँ, सो उस गहराई, विद्वता और बड़प्पन से भरे चेहरे का चरित्र-चित्रांकन करने की चेष्टा करने लगा. कुछ वर्ष सोचता रहा, कि आखिर क्या भिन्न था, अन्य बड़े लोगों में और प्रभास जी में? यह बात जा कर मुझे तब समझ आई, जब इस वर्ष मैं 'हिंदी अकादमी' के एक कार्यक्रम में गया. 'हिंदी अकादमी' ने महात्मा गाँधी की विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' व 'सत्य के प्रयोग' को प्रकाशित कर के 18 अगस्त 2009 को दिल्ली की मुख्य-मंत्री शीला दीक्षित द्वारा उन के लोकार्पण का कार्यक्रम रखा था. दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में मैं अपना कैमरा ले कर प्रविष्ट होता हूँ. अभी शीला जी का तो इंतज़ार है, हाल भी अभी आधा भरा है, पर दर्शक-गण में सब से पहली पंक्ति में वो... अपने प्रभास जी ही तो बैठे हैं! मैं तेज़-तेज़ कदम बढ़ाता हुआ वहीं पहुँचता हूँ और एक मौका और, उन के चरण स्पर्श करने का! 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' की निदेशक डॉ. वर्षा दास के साथ बैठे प्रभास जी से मैं कहता हूँ - 'मैं NDTV में आप के साथ ही था'! और वे यह कह कर मुझे चकित कर देते हैं - 'याद आ गया!'. मैं उन्हें कहता हूँ - 'उस दिन NDTV के 'हम लोग' कार्यक्रम में इस बात पर चर्चा थी कि दूरदर्शन ग्लैमर का शिकार होता जा रहा है. केवल अभिनेता, क्रिकेटर और नेता ही दूरदर्शन पर छाए रहते हैं'. प्रभास जी मुस्कराते हैं, बहुत ही आत्मीयता भरी और प्रोत्साहन भरी मुस्कराहट. अपनी साहित्य व पत्रकारिता यात्रा में मैं हर किस्म के लोगों से मिला हूँ. कुछ ऐसे भी, जो एक कहानी छपते ही रातों-रात ओ. हेनरी या तोल्स्तॉय हो जाते हैं और कुछ ऐसे, जैसे प्रभास जी, जो छोटों से बात करें तो लगे, साहित्य से जुडे सभी लोग एक ही परिवार के तो हैं. 'हम लोग' कार्यक्रम में प्रभास जी दूरदर्शन मीडिया को लताड़ रहे हैं. कह रहे हैं- 'देश में कितने लोग भूखों मरते हैं, यह कोई खबर नहीं. पर अभिनेता मंदिरों में घूम रहे हैं, यह बड़ी खबर है'. स्टूडियो में ठहाका बिखेरते हुए प्रभास जी कार्यक्रम संचालक पंकज पचौरी से कह रहे हैं - 'आप के लिए कैटरिना कैफ बड़ी खबर है, पर सूखे में मर रहे लोग खबर नहीं हैं... बस नेता... अभिनेता...खिलाड़ी, इन तीनों के बीच ही तो झूलता है दूरदर्शन'...

प्रेमचंद सहजवाला प्रभास जोशी के साथ
...पहले देश की जनता सुबह होने का इंतज़ार करती थी कि अख़बार आए तो खबरें पढ़ें. दिन आधा बीते तो 'सांध्य टाईम्स' या 'evening news ' आ जाता था. कुछ शौकीन लोग आकाशवाणी पर हर घंटे 'पिप पिप पिप...' की ध्वनि बजते ही अशोक वाजपेयी या देवकी नंदन पांडे की कठोर आवाज़ों में समाचार सुनने बैठ जाते थे. पर जब से 'पल पल की खबर' देने वाले, या 'सब से तेज़' जैसे चैनल आए हैं, देश की सूरत ही बदल गई. खबरें घटती बाद में हैं, अचानक दूरदर्शन पर आ पहले ही जाती हैं शायद, कभी कभी तो मुझे ऐसा ही लगता है. किसी खबर को कई गुना सनसनीखेज़ बनाने की कला में माहिर चैनलों ने देश के आम आदमी को बहुत उत्तेजित सा कर दिया. मुझे एक रोचक प्रसंग याद आ रहा है, जब दिल्ली के गंगाराम हस्पताल के कमरा नं. 214 में प्रियंका गाँधी दाखिल थी और इंतज़ार था उनके वैवाहिक जीवन की पहली ख़ुशी का यानी पहली डिलिवरी का. दूरदर्शन के पत्रकार बेचैन से हस्पताल का कॉरिडोर पर कब्ज़ा किये थे और चैनलों के स्टूडियो से बेताब से समाचार संपादक चिल्ला कर पूछ रहे थे - 'हेलो दिव्या (मालिक लहरी), क्या कोई ताज़ा बुलेटिन आई है'? दिव्या मालिक लहरी बुरी तरह हिलती-डुलती, उत्तेजना में अपना संतुलन बिगाड़ती सी चिल्ला रही हैं 'नहीं आशुतोष, अभी तो डॉक्टर अन्दर किसी को जाने ही नहीं दे रहे'!... एक और चैनल पर एक और समाचार रीडर चिल्ला रहा है - 'प्रियंका गाँधी को क्या लग रहा है, उन्हें बेटा होगा या बेटी'?... मैं चकित हूँ. दूरदर्शन वाले चाहते हैं कि खबर पहले ही घट जाए, अगर नहीं घटेगी तो हम उसे घटवा कर ही दम लेंगे... मैं ने इसीलिए एक व्यंग्य शेर लिखा था:

खबरनवीस वहां पर खबर से पहले गए,
अगर न जाते तो ये वारदात होती क्या!


देशी पत्रकारिता के मज़बूत स्तम्भ
प्रभाष जोशी केवल इस मायने में वरिष्ठ नहीं थे कि वे एक राष्ट्रीय अखबार के संस्थापक, संपादक या वयोवृद्ध पत्रकार थे, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता के लिए तय अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरोकारों को लगातार विकसित करने का काम किया। और इस मामले में उनकी भूमिका अग्रणी थी। वे अपने कई संपादकीयों और बयानों को लेकर विवादों में भी घिरे और उसे स्वीकारा भी, लेकिन प्रभाष जोशी दरअस्ल पत्रकारीय अस्मिता और कर्तव्य की एक भारतीय परम्परा बनाने और जनसाधारण से उसे जोड़ने का निरंतर प्रयत्न करते रहे। इस प्रक्रिया में अंग्रेजीयत में डूबी बहुराष्ट्रीय आधुनिकता को उन्होंने पर्याप्त रूप से कोसा और इसके ख‌़िलाफ़ लिखते रहे। 'सेज़-विरोध' तथा विस्थापन विरोधी आंदोलनों से उन्होंने अपना एक जीवंत रिश्ता बनाया और यथार्थ को जानने के लिए लगातार जगह-जगह की यात्राएँ करते रहे। इससे ज़ाहीर होता है कि वे महज़ सूचनाओं के आधार पर विचार बनाने और गुरु-गंभीर टिप्पणीकारिता के क़तई ख़िलाफ़ थे। प्रभाष जी पत्रकारिता की जिस मर्यादा और गौरवपूर्ण अतीत के हिस्से थे, उसमें बेशक जातिवादी व्यवस्था और पूँजीवाद के नये गठजोड़ों को समूल ध्वस्त करने की कुबत न रही हो, लेकिन उसके प्रति सच्चा आलोचनात्मक रूख लगातार बना रहा। लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यपद्धति और भारतीय जनता के साथ उनके संबंधों और कर्तव्यों को लेकर उन्होंने ताउम्र एक सचेतन पत्रकार की भूमिका निभाई। इसीलिए उनमें न केवल व्यक्तिगत ईमानदारी और कबीराना स्वभाव प्रचूर मात्रा में मौज़ूद रहा बल्कि आनेवाले समय में भी आदर्शवादी विचारशील और प्रतिबद्ध पत्रकारों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त चारित्रीक विशेषता रही है। वे अपने लेखन की वज़ह से समकालीन हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक जीवंत-सेतु बनाते रहे। भाषा के साथ इनका संबंध और सूचनाओं के प्रति सुचिंता उन्हें लगातार किसी विचार, नीति और कानून को भारतीय जनता की खुशहाली की कसौटी पर कसने को प्रेरित करती थी जो वस्तुतः उन्हें अंतिम आदमी के प्रति जवाबदेही की गाँधी के परिकल्पना के नज़दीक ले जाती रही है। उनके निधन से एक बड़ी और गौरवशाली परम्परा बाधित हो गई है।

-रामजी यादव
पर बात तो प्रभास जोशी की हो रही थी, मैं शायरी क्यों करने लगा! पर बात दरअसल उस संतुलन की है, जो प्रिंट मीडिया में था, पर दूरदर्शन के आते ही वह संतुलन जाता रहा, भले ही प्रिंट मीडिया पर भी खबर को चटपटी बनाने और सनसनीखेज़ बनाने के इल्जाम अक्सर लगते रहे. पर प्रभास जोशी जैसे पत्रकार जिन अख़बारों में रहे वहां नहीं. यह लेख लिखते-लिखते मैंने हिंदी कवियत्री ममता किरण को फ़ोन किया और कहा कि प्रभास जी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी. ममता जी ने कहा कि वे 'जनसत्ता' में प्रभास जी के नियमित कालम 'कागद कारे' को लगातार पढ़ती रही और बेहद प्रभावित थी. उनके अनुसार प्रभास जी चाहे क्रिकेट हो या फिल्म, या राजनीती-जगत, देश के हर विषय पर लिखने में अपना सानी नहीं रखते थे. साथ ही यह कि वे चाहते तो सत्ता के नैकट्य का भरपूर लाभ उठा सकते थे, पर वैसा करना उनकी फितरत का हिस्सा नहीं था. ममता जी का फ़ोन रखा तो आकाशवाणी दिल्ली के निदेशक लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने जो सन्देश भेजा वह इस प्रकार है - 'प्रभास जी ने अनेक बंधी-बंधाई लीकों को तोड़कर हिंदी पत्रकारिता को नई भाषा, नई शैली, नया मुहावरा दिया. वे राष्ट्रीय जीवन में नैतिक मूल्यों के पहरेदार थे. इस नैतिक पतन के युग में उनका जाना नैतिकता की मशाल का बुझना है'. और ठीक उसी समय एक ओर सन्देश आया - 'पत्रकारिता जगत का एक और सितारा डूब गया. मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि'...

मैंने जब NDTV के उस कार्यक्रम में यह कहा कि दूरदर्शन चैनल तो अभिनेता को सर चढा देते हैं, अभिनेता संजय दत्त पर कितने भी संगीन इल्ज़ाम हों, पर दूरदर्शन उस की खबर देते समय बड़े प्यार से उसे 'संजू बाबा' या 'मुन्ना भाई' कहते हैं, तब स्टूडियो में तालियों की गड़गडाहट हुई सो अलग, पर जैसे छोटा बच्चा शाबासी के लिए अपनी बात कह कर किसी बड़े की तरफ देखता है, मेरी नज़र भी अपनी बात कहते ही प्रभास जोशी पर टिक गई. जो मुस्कराहट उन के चेहरे पर आई, वह भी मैं कई दिन तक सोचता रहा, कि कैसी थी वह मुस्कराहट?... क्या था उस में? स्टूडियो में बाद में उन्होंने मेरी पीठ भी थपथपाई, और मैंने उनको अपना पूरा परिचय दे डाला (शुक्र कि यह नहीं कहा कि मैं तो हिंदी का मोपांसा या चार्ल्स डिकेंस हूँ). शायद उसी को याद कर के वे यहाँ, त्रिवेणी सभागार में कह रहे थे - 'याद आ गया'. और उनके चेहरे पर मुस्कराहट भरी रेखाओं से मैं समझ गया, वे साहित्यकारों पत्रकारों से मिल कर उन्हें कभी भूलते नहीं. सब को अपना समझते हैं, सो उनकी मुस्कराहट में वह आत्मीयता का मोती, मैं अपनी अदना सी शख्सियत में पिरो कर फूला नहीं समा रहा था. आत्मीयता ऐसी, जैसे वे अभी, मित्रों की तरह बैठ कर मेरे साथ बहुत देर तक गप्पें मारने लगेंगे...

शीला जी आईं तो उनके साथ-साथ प्रभास जी भी मंच तक पहुँच गए और कुछ ही मिनटों में गाँधी की पुस्तकों का विमोचन हो गया. त्रिवेणी सभागार की वह रिपोर्ट मैंने हिन्दयुग्म में ही 'गाँधी की पुस्तकों पर 'हिंदी अकादमी' द्वारा यादगार कार्यक्रम' शीर्षक से 24 अगस्त को दी थी. शीला जी अपना भाषण कर के व्यस्तता के कारण चली गई और मंच पर प्रभास जी छा गए. उन्होंने गाँधी पर अपने विचार जब प्रकट करने शुरू किये तब मेरी कई दिनों की गुत्थी सुलझी कि प्रभास जी को ही मैं एक दो मुलाकातों में अपना इतना करीबी क्यों समझने लगा हूँ. गाँधी मेरी भी स्तुत्य शख्सियत रहे, और प्रभास जी की बातों से लग रहा है, जैसे गाँधी की विरासत को मन में समेटे रखने वाले मुट्ठी भर भारतवासियों में से एक हैं प्रभास जी, जो समझा रहे हैं कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटते हुए 'हिंद स्वराज' 10 दिन में ही लिख डाली. जब उनका दाहिना हाथ थक गया तब उन्होंने बाएँ हाथ से लिखना शुरू किया. और कि उन्होंने वर्षा दास से कह कर बाएँ हाथ से लिखते हुए गाँधी का एक चित्र भी बनवाया था'...

गाँधी की अहिंसा और सादगी जैसे मूल्यों को आत्मसात करने वाले कितने लोग हैं देश में? पता नहीं. पर एक प्रभास जी तो हैं न, सामने ही, मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानने जो लगा हूँ, और इस समय मैं जिन के भाषण का विडियो-क्लिप मैं अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करता जा रहा हूँ!...

और फिर गाँधी के सन्दर्भ में ही प्रभास जोशी के दर्शन एक बार फिर हो जाते हैं मुझे. कितनी खुशकिस्मत जिंदगी है मेरी. प्रभास जी तो वो आ रहे हैं... वो रहे... दि. 1 अक्रूबर 2009 को 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' में आने का निमंत्रण मुझे स्वयं वर्षा दास जी ने ही कुछ दिन पहले दिया था और यह भी कहा था कि गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' पर उस दिन प्रभास जी बोलेंगे... बस.. मैं कार्यक्रम के निर्धारित समय से पहले ही पहुँच जाता हूँ. कौन-कौन लोग आ गए हैं, यह ध्यान नहीं, पर इतनी देर की प्रतीक्षा के बाद देखो, प्रभास जी वो तो आ रहे हैं...

...प्रभास जी कह रहे हैं कि गाँधी का स्वराज न तो राजनैतिक स्वराज था, न सामाजिक, न ही वह आर्थिक स्वराज था, वह तो अध्यात्मिक स्वराज था...



...मुझे गर्व हो रहा है कि आज मैं फिर उनके भाषण का वीडियो बना रहा हूँ और घर आते ही उनका भाषण लैपटॉप में उतार कर उसे यूट्यूब में डाल देता हूँ, ताकि जो उनके विचार सुनना चाहें वे सुनें. इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी मैं ने हिन्दयुग्म में 'हिंद स्वराज' के 100 वर्ष और विचार-गोष्ठियों पुस्तक-विमोचनों का गर्मागर्म-सिलसिला' शीर्षक से दि. 10 अक्टूबर को दी थी. हिन्दयुग्म पर प्रभास जी के भाषण की विडियो क्लिप देख कर मैं बहुत प्रसन्न था. इसलिए भी कि वह विडियो क्लिप प्रभास जी का था और इसलिए भी कि प्रभास जी का वह विडियो क्लिप मैंने बनाया था.

मैंने कार्यक्रम के लगभग अंत में उठ कर यह पूछा था कि गाँधी जी तो रेल के भी खिलाफ थे, भला रेल के बिना हम सब कैसे रह सकते हैं... तब तो प्रभास जी ने कहा था कि अब काफी समय हो चुका है, हम लोग बाद में चाय पीते पीते-पीते भी बात कर सकते हैं, पर मैं एक बार फिर उनके चेहरे पर वही सौम्य मुस्कराहट देख अभिभूत था, क्यों कि वे मुस्कराते हुए मुझे ही संबोधित कर रहे थे...

...और चाय के दौरान मुझ से भी अधिक बड़े बड़े जिज्ञासु मुझ से बाज़ी मर ले गए और प्रभास जी को घेर लिया. मैं चाय देने वाले 'गाँधी संग्रहालय' के सेवाधारी से अपनी चाय बटोरता ही रह गया कि लोग वहां पहले ही पहुँच गए. पर मैं चाय समेत उस घेरे के बाहर पहुँच हल्की सी धक्का-मुक्की करते प्रभास जी के पास पहुँच जाता हूँ. प्रभास जी सब की जिज्ञासाओं को दूर करते गाँधी के मूल्यों की शाश्वतता बता रहे हैं, बारीकी से समझा रहे हैं, कि गाँधी जी ने जब-जब जो जो बात कही, तब तब उस का तात्पर्य क्या था. यही वह क्षति थी, जो मुझे लगा कि देश को हुई है, प्रभास जी के अचानक चले जाने के बाद. देश अब न्यूयार्क और शांघाई से बराबरी के रास्ते पर है. आधुनिकता अपने चरम पर है. पैसा भगवान हो गया है. आज का आदमी नंगा हो कर अपनी मूल्यहीनता ओर दिवालियेपन का प्रदर्शन कर रहा है. गाँधी के मानवीय मूल्यों को एक पूंजी की तरह सीने में संभाले दूसरों के बीच बांटने वाला आज सुबह चला गया. एक प्रकाश-पुंज अस्त हो गया... क्या इस से अधिक दुखद कोई खबर हो सकती है? नहीं, प्रभास जी जैसी शख्सियत, अन्यत्र मिलनी असंभव है...

...और इतनी बड़ी हस्ती की आत्मीयता से अब वंचित हो जाने की क्षति तो मेरी व्यक्तिगत क्षति है, शुद्ध व्यक्तिगत...

Wednesday, November 04, 2009

यह केवल उत्सवधर्मी विश्विविद्यालय नहीं रहेगा- विभूति नारायण राय

पिछले दिनों हिन्द-युग्म के रामजी यादव और शैलेश भारतवासी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय से बात की। विभूति नारायण राय हिन्दी के चर्चित लेखक और साहित्यकार हैं जिनकी दंगों के दौरान पुलिस के सांप्रदायिक रवैये पर लिखी पुस्तक 'शहर में कर्फ़्यू' बहुत प्रसिद्ध रही। विभूति उ॰ प्र॰ में पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्य कर चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा को समर्पित दुनिया का एक मात्र विश्वविद्यालय है। तो हमने जानने की कोशिश की कि हिन्दी भाषा-साहित्य की गाड़ी में गति लाने के लिए इनका विश्वविद्यालय क्या कुछ करने जा रहा है॰॰॰॰॰


(इंटरव्यू को उपर्युक्त प्लेयर से सुन भी सकते हैं)

रामजी यादव- महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 10-12 वर्ष पहले हुई थी। पूरी दुनिया में फैला हुआ जो हिन्दी समाज है, उसके प्रति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यह उत्तरदायी है। लेकिन यह एक उत्सवधर्मी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। और लगभग इसकी उत्सवधर्मिता इसके कुलपति की महात्वकांक्षाओं तक सीमित करके देखी जाती है। इस पूरी छवि को आप कैसे बदलेंगे?

वी एन राय- विश्वविद्यालय केवल उत्सवधर्मिता का केन्द्र न रहे, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध का क्षेत्र भी बने, और इसके साथ-साथ इस विश्वविद्यालय की हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में ज़रूरी उपकरण प्रदान करने की जो इसकी खास भूमिका है, उसे पूरा करने में भी इसका सक्रिय योगदान हो, इस समय दिशा में यह विश्वविद्यालय काम कर रहा है। इस वर्ष नये विभाग खुले हैं। मानवशास्त्र और फिल्म-थिएटर दो विभाग शुरू किये गये हैं। इसके अलावा डायस्पोरा स्ट्डीज का नया विभाग शुरू होने वाला है। ये तीनों नये विभाग महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की उस भूमिका को निभाने में भी मदद करेंगे, जिसकी कल्पना इस विश्ववविद्यालय के एक्ट में की गई है और प्रथम अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में इसकी निर्मिती के पीछे जो एक परिकल्पना रही है। इसे अंतरर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए, शायद आप अवगत हों, विश्वविद्यालय एक बहुत महात्वपकांक्षी योजना पर काम कर रहा है वो है कि हिन्दी में जो कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसे ऑनलाइन किया जाये ताकि दुनिया के कोने-कोने में बैठे हिन्दी के पठक उन्हें पढ़ सके। हमारी कोशिश है कि दिसम्बर 2009 तक लगभग 100000 पृष्ठ ऑनलाइन कर दिये जायें। इसके अलावा हम इन सभी महत्वपूर्ण कृतियों को दुनिया की तमाम भाषाओं में जैसे चीनी, जापानी, अरबी, फ्रेंच इत्यादि में अनुवाद करके ऑनलाइन करना चाहते हैं।

रामजी यादव- एक चीज़ मानी जाती है कि हिन्दी एक बड़ी भाषा है जो तमाम तरह के संघर्षों से निकली है। लेकिन हिन्दी में विचारों की स्थिति बहुत दयनीय है। एक विश्वविद्यालय के रूप में आपका विश्वविद्यालय किस तरह का प्रयास कर रहा है कि हिन्दी में विचार मौलिक पैदा हों और दुनिया के दूसरे अनुशासनों से इनका संबंध बने?

वी एन राय- इसके लिए भी हमने कुछ महात्वकांक्षी योजनाएँ बनाई है। हमारे विश्वविद्यालय का जो पाठ्यक्रम है वो गैरपारम्परिक पाठ्यक्रम हैं। जो विषय हमारे यहाँ पढ़ाये जा रहे हैं वह भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं। जैसे स्त्री-अध्ययन है, शांति और अहिंसा है, हिन्दी माध्यम में मानव-शास्त्र है, फिल्म और थिएटर या डायस्पोरा स्ट्डीज की पढ़ाई है। अनुवाद भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें हमारे यहाँ पढ़ाई हो रही है। लेकिन ज्ञान के इन अनुशासनों में मौलिक पुस्तकों की कमी है, मौलिक तो छोड़ दीजिए जो एक आधार बन सकती हों, ऐसे पाठ्यपुस्तकों की कमी है। इसलिए हमने योजना बनाई है कि हम ज्ञान के इन सारे अनुशासनों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में उपलब्ध है, उसके कुछ चुनिंदा अंशों का अनुवाद हो और उसे छापें। और यह योजना शुरू भी हो गई है, हमने स्त्री-अध्ययन के लिए 10 पुस्तकों को चुना है जिसका साल भर में हम अनुवाद करा लेंगे। इसके बाद अन्य अनुशासनों में जायेंगे।

शैलेश भारतवासी- सवाल हमारा यह था कि जो हिन्दी का साहित्यिक या वैचारिक परिदृश्य हैं, वो पूर्णतया मौलिक नहीं है। विश्वविद्यालय की तरफ से ऐस कोई प्रयास है जिससे मौलिक विचार निकलकर आये?

उत्तर- मौलिक लेखन को भी हम प्रोत्साहन देंगे, लेकिन सवाल यह है कि मौलिक लेखन के लिए भी आधारभूत सामग्री उपलब्ध हो, जिन्हें पढ़कर आप अपनी बेसिक तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से गंभीर समाज शास्त्रीय विषयों पर हिन्दी में मौलिक सामग्री या तो बहुत कम है या ज्यादातर अनुवाद के माध्यम से मिल रही है। पर हमारा प्रयास यह होगा कि जब हम महत्वपूर्ण चीज़ों का अनुवाद करायेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें पढ़कर जो मौलिक सोचने वाले हैं, वे मौलिक लेखन करेंगे और उन्हें भी हम प्रकाशित करेंगे।

रामजी यादव- क्या दुनिया के अन्य देशों के विश्ववद्यालयों में जहाँ प्राच्य विद्या किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, उनके साथ विश्वविद्यालय का कोई अंतर्संबंध बन रहा है?

वी एन राय- जी, हम यह कोशिश कर रहे हैं कि बाहर के 100 विश्वविद्यालयों में जहाँ हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, भाषा के तौर पर, प्राच्य विद्या का एक अंग होकर या साउथ-एशिया पर विभाग हैं, उनमें हिन्दी का इनपुट है, इन सभी विश्वविद्यालयों के बीच में हम एक समन्वय सेतु का काम करें, उनमें जो अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहे हैं, उनके लिए रिफ्रेशर कोर्सेस यहाँ पर हम संचालित करें, उनके लिए ज़रूरी पाठ्य-सामग्री का निर्माण करायें और सबसे बड़ी चीज़ है कि विदेशों से बहुत सारे लोग जो हिन्दी सीखने के लिए भारत आना चाहते हैं, उनके लिए हमारा विश्ववद्यालय एक बड़े केन्द्र की तरह काम करें, इस दिशा में भी काम चल रहा है।

शैलेश भारतवासी- जहाँ एक ओर आप विदेशी विश्वविद्यालयों से अंतर्संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं अपने ही देश के बहुत से लोग जो हिन्दी भाषा या साहित्य में ही अपनी पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं, उन्हें भी आपके विश्वविद्यालय के बारे में पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भी इस विश्वविद्यालय का नाम एक नई चीज़ है। तो क्या आप चाहते ही नहीं कि सभी लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचेया कोई और बात है?

वी एन राय- नहीं-नहीं, आपकी बात सही है। विश्वविद्यालय को बने 11 साल से ज्यादा हो गये, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत बड़ा हिन्दी समाज इससे परिचित नहीं है, या उसका बहुत रागात्मक संबंध नहीं बन पाया या कोई फ्रुटफुल इंटरेक्शन नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते, और हम इसके लिए हम प्रयास भी कर रहे हैं। मसलन हमारी वेबसाइट ही देखिए। हालाँकि हिन्दी-समाज बहुत तकनीकी समाज नहीं है, बहुत कम लोग हिन्दी वेबसाइट देखते हैं। लेकिन मुझे देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी वेबसाइट को रोज़ाना 150-200 लोग आते हैं और वो भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। तो ऐसा नहीं है, धीरे-धीरे लोगों ने इसे जानना शुरू किया है।

शैलेश भारतवासी- लेकिन यहीं पर मैं रोकूँगा, आपने कहाँ कि आप 150-200 लोगों से संतुष्ट हैं (कुलपति ने यहीं रोककर इंकार किया), मेरा कहना है कि आपको 150 विजिटरों से आशा की एक किरण नज़र आती है। मैं एक साहित्यिक-सांस्कृतिक वेबसाइट चलाता हूँ, जिसे रोज़ाना 10,000 हिट्स मिलते हैं (यह दुनिया भर की वेबसाइटों के एस्टीमेटेड हिट्स निकालने वाली वेबसाइट का आँकड़ा है), फिर भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ और इसे एक बहुत छोटी संख्या मानता हूँ। आपकी वेबसाइट पर मैं 2-3 बार गया भी हूँ। मेरा जो अनुभव है वह कहता है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है वह बहुत प्रयोक्ता-मित्र नहीं है, वह समय के साथ नहीं चल रही है। क्या इस दिशा में कोई परिवर्तन हो रहा है?

वी एन राय- पिछले 5-6 महीनों में जो परिवर्तन हुए हैं, उसमें दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शामिल किया जा रहा है। एक तो मैंने पहले भी बताया कि हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखन के 1 लाख पृष्ठ ऑनलाइन किये जायेंगे और हिन्दी के जो समकालीन रचनाकार हैं, लेखक है, उनकी प्रोफाइल, इनके पते वेबसाइट पर डाल रहे हैं ताकि दुनिया भर में फैले इनके प्रसंशक, इनके पाठक, प्रकाशक इनसे संपर्क कर सकें। तकनीक के स्तर पर भी हम परिवर्तन करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा विश्वविद्यालय कोई तकनीकी विश्वविद्यालय तो है नहीं, फिर भी हम सीख करके, दूसरों की सहायता लेकर अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रामजी यादव- भारत में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसमें गैर हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी का विकास हो रहा है, जिससे नये तरह के डायलेक्ट्स बन रहे हैं, भाषा जिस तरह से बन रही है, बाज़ार दूसरी तरह से इन चीज़ों को विकसित कर रहा है। इस पूरी पद्धति में भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से, विश्वविद्यालय किस रूप से देशज और भदेस को मुख्यधारा का विषय बना सकता है?

वी एन राय- इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद हैं। आज हम जिसे हिन्दी भाषा कह रहे हैं, वह भी एक समय बोली थी। खड़ी बोली। जब आप 'हिन्दी' शब्द का उच्चारण करते हैं तो 'खड़ी बोली' दिमाग में आती है। आज से 130 साल पहले भारतेन्दु तक यह नहीं मानते थे कि 'खड़ी बोली' में कविता भी लिखी जा सकती है। गद्य की भाषा तो 'खड़ी बोली' थी, लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा रखते थे भारतेन्दु। छायावाद आते-आते लगभग यह स्पष्ट हुआ कि 'खड़ी बोली' ही 'हिन्दी' होगी। और एक मानकीकरण शुरू हुआ। 30-40 साल बहुत संघर्ष चला। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी होगी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों के साथ हम कैसा व्यवहार करेंगे, कैसे हम इस भाषा को पूरे देश के लिए एक मानक और एक स्वीकार्य भाषा बना पायेंगे, यह सारे संघर्ष चलते-चलते कमोबेश यह तय हो गया है कि 'खड़ी बोली' ही हिन्दी होगी और सभी बोलियाँ इसे मदद करेंगी, खाद का काम करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक दूसरी प्रवृत्ति दिखलाई दे रही है, जो मेरे हिसाब से खतरनाक है। बहुत सारी बोलियाँ इस छटपटाहट में हैं कि वो हिन्दी को रिप्लेस करके एक स्वतंत्र भाषा जैसी स्थिति हासिल करें। विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने अभी मैं मॉरिशस गया था,, वहाँ भी बहुत सारे लोग अतिरिक्त उत्साह में यह कह रहे थे कि हिन्दी क्या है, हमारी राष्ट्रभाषा तो भोजपुरी है, मातृभाषा भोजपुरी है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ कि वहाँ के एक बड़े कार्यक्रम में जब एक राजनेता हिन्दी में बोलने लगे तो जनता में से कुछ लोग कहने लगे ये कौन सी भाषा इस्तेमाल कर रहे हो, छत्तीसगढ़ी हमारी राजभाषा है। यह एक डिवाइसिव, फूट डालने वाली स्थिति है, जिससे हमें बचना होगा। मतलब हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद भी बनें और हिन्दी का नुकसान भी न करें। हमारा विश्वविद्यालय चूँकि हिन्दी का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है, इसलिए इस दिशा में निश्चित ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। हमलोग फरवरी-मार्च में बोलियों को लेकर एक सम्मेलन करने जा रहे हैं। हिन्दी का लोक बहुत समृद्ध है, कई अर्थों में बहुत प्रगतिशील है। अगर आप देखें तो पूरी दुनिया में इतनी विविधता लिए हुए लोक दिखलाई नहीं देगा। हमें इस प्रवृत्ति पर नज़र रखनी पड़ेगी कि वो लोक आगे जाकर नुकसान न करे, यह खाद का काम करे न कि विषबेन बन जाय।

शैलेश भारतवासी- यह तो हमारी बोलियों की बात है। दक्षिण भारतीय जो गैर हिन्दी भाषी हैं, हालाँकि हिन्दी को वे सम्पूर्ण भारत की भाषा के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनकी शिकायत रहती है कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, चलो हम इसे सीख लेते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी हमारी भाषा को नहीं सीखते। क्या विश्वविद्यालय कोई इस तरह का कार्यक्रम चलाया रहा है जिससे गैरहिन्दी भाषा को सीखने पर प्रोत्साहन मिले?

वी एन राय- देखिए यह तो सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। यह बात आपने बिल्कुल सही कही कि त्रिभाषा कार्यक्रम को लेकर सबसे अधिक बेईमानी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुई। हम यह तो चाहते थे कि जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, वहाँ तो शुरू से बच्चे हिन्दी पढ़े, लेकिन जब हमारे यहाँ तीसरी भाषा की बात आई तो हमने संस्कृत को डाल दिया जो किसी भी जनसमूह की भाषा नहीं थी। हमें कोई जीवित भाषा सीखनी चाहिए थी। लेकिन विश्वविद्यालय का तो बहुत सीमित दायरा होता है। हम तो सरकार से बस अपील कर सकते हैं।

Monday, September 21, 2009

कादम्बिनी के सरोकार और समकालीनता के सवाल (परिचर्चा)

पिछले दिनों मोहल्लालइव पर किसी प्रबुद्ध बेनामी लेखक ने लिखा कि 'कादम्बिनी क्या खाकर निकल रही है और क्यों निकल रही है'। किसी समय में कादम्बिनी की बहुत प्रतिष्ठा थी जो सांस्कृतिक और साहित्यिक जागरण के संस्कारों से सिंचित थी। हमें लगा कि हिन्द-युग्म भी एक साहित्यक-सांस्कृतिक पत्रिका है, ऐसे में इस बहस को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रबुद्ध लोगों से राय ली जा सकती है कि क्या इस पत्रिका को छपते रहना चाहिए, इसी तरह के विषय वस्तु के साथ? इस संदर्भ में हमारी टीम ने राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ट, भारत भारद्वाज, मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, रामजी यादव, प्रमोद कुमार तिवारी, विमल चंद्र पान्डेय और गौरव सोलंकी से बातचीत की। मंगलेश डबराल ने कहा कि मैं हर विषय पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। बाकी लोगों ने जो कहा वह संपादित रूप में आपके सामने प्रस्तुत है। कुछ बातचीत की रिकॉर्डिंग भी सुनने के लिए उपलब्ध है॰॰॰


बड़े घरानों की पत्रिकाओं में तीखी बहसें नहीं हो पाती- राजेन्द्र यादव

ये कादम्बिनी नाम दिया था बालकृष्ण राव ने, उन्होंने यह पत्रिका निकाली थी। राजेन्द्र अवस्थी के पास आकर यह भूत-प्रेत, अंधविश्वास और ज्योतिष की पत्रिका हो गई, यानी लगभग अपठनीय हो गई। बाद में विष्णु नागर आये तो इन्होंने कुछ सम्हालने की कोशिश की, पठनीय बनाया और उपयोगी चीज़ें दी। और धीरे-धीरे लगा था कि इसका एक स्थान बनेगा। लेकिन हुआ ये कि विष्णु नागर चले गये और फिर से उसी तरह की मैगजीन हो गई जैसी सरिता ग्रुप की पत्रिकाएँ होती हैं। इनमें कोई सीरियस बात तो होती नहीं, बस पाठक होते हैं और उनका मनोरंजन होता है।

एक बात साफ कर दूँ कि बड़े घरानों की पत्रिकाओं में वो चाहे साप्ताहिक हिन्दुस्तान हो, चाहे धर्मयुग हो या चाहे कुछ तीखी बहसें नहीं हो पातीं। इन्होंने कभी नहीं की। ख़ासकर राजनीति को लेकर और सेक्स लेकर, इनमें तरह-तरह के बंधन हैं कि यह बहू-बेटियों की या परिवार की पत्रिका है। इसलिए यह उम्मीद कि यहाँ कोई बहस होगी, यह सोचना बेकार है।

हम समझते हैं कि बहुत निकल ली, काफी चल लीं। हम समझते हैं कि इसकी सामाजिक या पाठकीय उपयोगिता शून्य है। यदि प्रकाशकों को मुनाफा है तो निकाले नहीं तो नहीं।

विष्णू नागर के वक्त में मैं इसका रेगुलर पाठक था। नागर को यह पत्रिका जिस रूप में मिली थी, उससे उन्होंने बहुत बढ़िया स्थिति में ला खड़ा किया था। लेकिन जो भी थी, पठनीय हो गई थी पत्रिका। यदि विष्णू नागर जैसा कोई दूसरा संपादक इस पत्रिका को मिलता है तो इसे 1-2 सालों में फिर से पठनीय पत्रिका बनाया जा सकती है। जहाँ तक आवश्यक फेरबदल का सवाल है तो उसमें पहली बात तो मौलिक रचनाएँ छपनी चाहिएँ तथा इसे यह तय करना चाहिए कि यह कविता की पत्रिका है, कहानी की, बहस की, कला या फिर कुछ और।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰॰राजेन्द्र यादव(प्रख्यात साहित्यकार, संपादक- हंस)


कादम्बिनी एक दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है- पंकज बिष्ट

इस पत्रिका का पूरा इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव भरा है। शुरू में जब यह इलाहाबाद से निकलनी शुरू हुई थी तो यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, और इसमें सभी गंभीर लोग रुचि लेते थे। लेकिन जब यह हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के पास आई तो इन लोगों ने रीडर-डाइजेस्ट और नवनीत के तर्ज पर चलाना शुरू किया। इसके बाद जब राजेन्द्र अवस्थी इसके संपादक बने तो इन्होंने इसे तंत्र-मंत्र की पत्रिका बना दी। तबसे इसका पाठक-वर्ग बिलकुल बदल गया। यह एक पापुलर पत्रिका बन गई। जब विष्णु नागर जी आये तो उन्होंने सम्हालने की कोशिश की, एक गंभीर पत्रिका बनाने की कोशिश की। लेकिन दुर्भाग्यवश वे ज्यादा समय तक इसमें नहीं बने रह पाये, उसी का परिणाम है कि अब यह लगभग दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है। इसके संपादकों को यह नहीं समझ में आ पा रहा है कि उन्हें छापना क्या है, इसका टारगेट-रीडर्स कौन है।

एक बात मैं कहना चाहूँगा कि साप्ताहिक या मासिक पत्रिकाओं का संपादन बहुत मुश्किल है। दैनिक पत्रों में समाचार का फ्लो इतना तेज़ है और अलग-अलग पत्र एक ही ख़बर को इतने तरह से कवर कर देते हैं कि मासिक पत्रिका के संपादकों के सामने यह चुनौती होती है कि कैसे वह कुछ नया और सार्थक परोसे और अपना पाठक-वर्ग बचाये रखे।

अगर मालिक चाहे, उसमें इच्छाशक्ति हो तो एक समर्थ संपादक वह चुन सकता है जो बड़े आसानी से पत्रिका को बचा सकता है। हिन्दुस्तान में यह हालत नहीं है कि यह पत्रिका न चले, इस तरह के कंटेंट वाली कोई और मासिक पत्रिका है भी नहीं जिसे इतने बड़े घराने का समर्थन प्राप्त हो। वे चाहें तो इसे बहुत बढ़िया बना सकते हैं। लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों है कि व्यवसायिक घराने अपनी हिन्दी पत्रिकाओं के लिए कभी भी बहुत अच्छे सम्पादक चुनते ही नहीं। यदि कोई पत्रिका जो टेलीविजन में दिखाया जाता है, उसी की प्रिंटेंड नकल हो तो उसका कोई भविष्य नहीं है।

मैं विष्णु नागर के समय में इस पत्रिका को स्थाई तौर पर देखता था। राजेन्द्र अवस्थी के समय में मैंने इसे देखना भी पसंद नहीं किया। अब मैं इसपर ध्यान नहीं देता।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰पंकज बिष्ट (वरिष्ठ कथाकार, संपादक- समयांतर)


गीली लकड़ी की तरह धुँआने से बढ़िया है भभककर जल जाये- भारत भारद्वाज

कादम्बिनी हिन्दी में निकलने वाली कुछ पुरानी पत्रिकाओं में है। कादम्बिनी का संपादन 1961 में इलाहाबाद से बालकृष्ण राव ने किया था और उस समय इसका पूर्णतः साहित्यिक स्वरूप था। लेकिन बाद में संपादक बदलते-बदलते इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदलते-बदलते पूरी तरह से बदल गया। पत्रिका की साहित्यिक प्रवृति नष्ट करने में सबसे बड़ा योगदान है राजेन्द्र अवस्थी का। यह भूत-प्रेत और तमाम धार्मिक अंधविश्वास से लदी पत्रिका तो थी ही विष्णु नागर में टाइम में सेलिब्रिटीज की पत्रिका हो गई। बाद में विजय किशोर मानव ने इसी में थोड़ा-बहुत बदलाव कर दिया।

कादम्बिनी के हर तरह के पाठक थे। साहित्य के तो थे ही, साहित्येत्तर अनुशासन की बहुत सी चीज़े इसमें होती थीं। आर्थिक अभाव के कारण यह पत्रिका बंद नहीं हो रही बल्कि नई अर्थनीति के कारण यह बंद हो सकती है। लगभग 50 साल से यह पत्रिका निकल रही है। मेरा अंदाज़ है वीणा के अलावा (जो 81 साल से निकल रही है) बाद हिन्दी की यह दूसरी पत्रिका है जो इतने लम्बे समय से निकल रही है। अब बहुत निकल ली।

इस पत्रिका के चरित्र में लगातार फेर-बदल हुए। ख़ास तरह की पत्रिका के ख़ास तरह के पाठक होते हैं। इस पत्रिका के हमेशा से ही पाठक बदलते रहे। राजेन्द्र अवस्थी ने इसे जहाँ पहुँचा दिया था उससे इसका जो पाठक-वर्ग तैयार हुआ था, उसे विष्णु नागर से बिलकुल बदल दिया।

हाँ, मैं इस पत्रिका को लम्बे समय से देखता रहा हूँ। 70 के दशक के भी मैंने इसे देखा है, विष्णु नागर के ज़माने में भी और मैंने इसका पिछला अंक भी देखा है। एक अच्छी पत्रिका थी अपने जमाने में, इसकी एक प्रतिष्ठा थी। मेरा कहना है कि गीली लकड़ी की तरह धूँ-धुँआने से बढ़िया है कि भभक कर जल जाये। जब किसी पत्रिका की भूमिका खत्म हो रही हो, उसका तात्पर्य ही न हो तो क्या मतलब है निकलने का! लेकिन बिना किसी सामाजिक भूमिका और हस्तक्षेप के बहुत सी पत्रिकाएँ निकलती रहती हैं। 41 साल से गोपाल राय का संबोधन उदाहरण है। किसी से पूछिए कि आप 'समीक्षा' देखते हो? इसी तरह मुझे लगा कि 'वीणा' बंद हो गई है।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰भारत भारद्वाज (आलोचक, संपादक-पुस्तक-वार्ता)


कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है- मदन कश्यप

सुनें-
कादम्बिनी तो इन दिनों मैं पढ़ भी नहीं रहा हूँ, पहले भी नहीं पढ़ता था। लेकिन नागर जी जब सम्पादक हुए, तो उन्होंने कुछ ऐसी चीजें छापी, जिसके कारण उसको पढ़ने और लिखने में हमारी रुचि हुई थी। जब से नागर जी हटे हैं, मैंने इसका कोई अंक नहीं देखा है। तो अब क्या छप रहा है, यह भी मुझे नहीं मालुम है।

लेकिन मुझे लगता है कि लगातार इसकी पाठक-संख्या घटने का एक बड़ा कारण यह रहा कि हमारे समय के सांस्कृतिक सवालों से जूझने की बात तो छोडिए, तालमेल मिलाकर चलने वाली भी पत्रिका नहीं रही। बिलकुल अपनी डफली-अपना राग की तरह। अगर नागर जी के पीरियड को आप छोड़ दीजिए तो इस पत्रिका में कुछ नहीं था।

हर पत्रिका का अपना एक चरित्र होता है। फिर भी नागर जी ने हर स्तम्भ को रोचक बनाने की कोशिश की। लेकिन जिस तरह से एक कवि की एक कविता और दो पेज़ पर 4,5-6 कवियों की कविताएँ छापते थे। इस शिल्प में इसका कोई स्वरूप बन ही नहीं सकता है। फिर भी कुछ बन रहा था, लेकिन लग रहा था कि कुछ बन रहा है।

कोई पत्रिका महत्वपूर्ण कब होती है, जब वो समय में हस्तक्षेप करे। कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। अगर उससे मुनाफ़ा हो रहा हो तो ओचित्य हो सकता है, लेकिन मालिकान के लिए।

शुरू में यह इतनी बुरी नही थी। लेकिन दिन-दिन प्रतिदिन बुरी होती चली गई। राजेन्द्र अवस्थी के टाइम में भूत-प्रेत की झूठी कहानियाँ छपती थीं, वो भी पैसे लेकर। एक बार कादम्बिनी में छपा कि पटना में बुद्ध मार्ग में एक मंदिर में बाबा है जिन्हें वनदुर्गा सिद्ध है। यह मंदिर तो मेरे कॉम्प्लेक्स के बगल में था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं ऐसे किसी बाबा के बारे में नहीं जानता, जो मेरे बगल में रहते हैं। लेख भगवती शरण मिश्र का था। बहुत पता लगाया तो मालुम पड़ा कि वह बाबा भगवती शरण मिश्र के संबंधी हैं।

बाद में पता चला कि उसी बाबा ने एक पत्रिका निकाली। जब बाबा से पूछा गया कि आपने पत्रिका क्यों निकाली, तो उन्होंने बताया कि राजेन्द्र अवस्थी छापने के लिए 3 लाख रुपये माँग रहे थे, तो मैंने सोचा कि इतने में तो एक इस तरह की पत्रिका हम खुद निकाल सकते हैं।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

मदन कश्यप (कवि, संपादक- द पब्लिक एजेंडा)


एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो - रामजी यादव

सुनें-
किसी भी पत्रिका का महत्व इस बात में है कि वह समकालीन विमर्श में क्या भूमिका निभाती है। इस हिसाब से देखा जाये तो अलग-अलग दौर में, अलग-अलग पत्रिकाओं की अपनी जगह रही है और वे लगभग अनियतकालिन और साधनहीन स्थितियों में निकलती रही है। ढेरों अध्यापक और साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होनें उस पत्रिका को विकसित करना अपना एक महत्वपूर्ण सरोकार समझा और उन्होनें इसे निभाया भी, लेकिन 80 के दशक में कुछ पत्रिकाएँ ऐसी निकलीं जो बड़े घरानों की पत्रिकाएँ थी। मसलन टाइम्स ऑफ़ इंडिया का धर्मयुग और हिन्दुस्तान टाईम्स का साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बनी इत्यादि। इससे पहले इन्हीं दोनों घरानों में से किन्हीं का रविवार और दिनमान भी हुआ करता था, रविवार और दिनमान एक बहुत अच्छे सम्पादकीय टीम का बहुत अच्छा उदाहरण हैं। जिसमें एक साथ रघुवीर सराय और अज्ञेय जैसे लोग एक समय में काम करते थे।

धर्मयुग ने स्वयं एक ज़माने में बहुत बड़े-बड़े लेखकों को एक बडा मंच दिया और वे लेखक मुख्य धारा के साहित्य में आये लेकिन आज शायद मुश्किल से ऐसे लोगों की गिनती की जा सकती है जो किसी ज़माने में धर्मयुग में छपते थे और हीरो हो जाते थे। आज उनकों हम नहीं जानते, किसी भी रुप में नहीं जानते। वे सारे दोयम दर्जे के कहानीकार-रचनाकार है जिनको दोहराना आज के सन्दर्भ में संभव नहीं है।

जहाँ तक कादम्बिनी की बात है, कादम्बिनी ने साहित्य के इतिहास में या समकालीन इतिहास में कोई मील का पत्थर रखा हो ऐसा कहना मुशिकल है और एक तरह से ज्यादती भी है क्योंकि उस पत्रिका की जो सीमायें थीं वह उसके सम्पादकों की भी अपनी सीमायें थीं। सम्पादक प्रायः नौकरियाँ करते थे और साहित्यकार थे इसलिये उन्होंने साहित्य को एक कैप्सूल की तरह अपने यहाँ से बेचने का काम किया।

एक ज़माने में इस कादिम्बनी में काफी साहित्यिक चीज़ें होती थीं, लोग समझते थे लेकिन जो भूमिका सामान्य जन के भीतर सरिता आदि ने निभाई, जैसे हिन्दू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास इत्यादि कालमों और दूसरे ऐसे अंधविश्वास विरोधी लेखों से समाज को जो रास्ता दिखाया, कादिम्बनी की ऐसी ज़गह कभी नहीं रही। कादिम्बनी मुख्यधारा से साहित्यकारों के प्रेम प्रसंगों, उनके कुछ चर्चित-कुचर्चित प्रसंगों और गैर ज़रूरी बहसों और साक्षात्कारों को छापती रही, जिसमें संवेदना में किसी किस्म का विचलन नहीं पैदा होता या विचार में किसी किस्म की दृढ़ता नहीं पैदा होती थी, लेकिन हम देखते हैं कि बाद में कादिम्बनी में आमूल-चूल परिवर्तन हुये, खासतौर पर विण्णु नागर के सम्पादकत्व में। जब इसको विष्णु नागर ने सम्पादित करना शुरू किया तो पहले तो इसका रूपाकार बदला। हम देखते हैं जिस तरह की सामग्री वह लगातार छापते रहे हैं, उस सामग्री में उस तरह की बात नहीं थी जिसे कहा जाये कि इन्होनें कोई नई बात कही है, वो बहुत पुरानी चीज़ें, बहुत पुरानी कहानियाँ, बहुत स्थापित किस्म के सेलिब्रिटीज और लेखक अभिनेता और गायक और दूसरे-दूसरे महफिलबाज़ किस्म के लोगों की आकांक्षाओं की पत्रिका रही है। इस पत्रिका का दाम तमाम लघुपत्रिकाओं के मुकाबले एक दुखदायी पक्ष रहा है। 25 या 30 रूपये दाम रखना भारत जैसे गरीब देश के, साधारण निम्नवर्गीय पाठक के साथ बड़ी ज्यादती है। चूँकि यह घराने की है और इसको पर्याप्त रूप से विज्ञापन भी मिलते हैं, इसके पास आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी बनी हुयी है तो यदि अपना सरोकार वो जनता और निम्न समाज से तय करती है तो उसे अपने दाम में कटौती कर देनी चाहिये और लगातार इस तरह की सामग्री देनी चाहिये जिससे कि लोगों को लगे कि कादिम्बनी पढ़ने से उनके विचारों में खूबी पैदा होगी या कादिम्बनी में ऐसी सूचना होगी जो दूसरी कहीं नहीं है या अभी तक नहीं मिली।

जहाँ तक उसके चलने या पढ़ने या बंद करने का सवाल है, इन हालात में उसके बंद होने से किसी को कोई हानि नहीं होगी और चलते रहने से किसी को कोई लाभ भी नहीं होगा। ये कहीं भी साहित्य के इतिहास में किसी मुकाम पर नहीं पहुँचती है। यह एक घराने की है और घराने के नौकर इसके संपादको की भूमिका निभाते हैं, जिनकी समझ बहुत कम है। इसलिये अगर लोगों का इरादा बिरला घराने, टाटा घराने या जैन-साहू घराने से या इस तरह से पैसे को लेकर है तो जैन साहू घराने, बिरला घराने को भी लोगों की आकांक्षओं का ध्यान रखना चाहिये, अगर वे नहीं रखते हैं तो उनकी पत्रिकाओं के बंद होने या चलने में किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

मैं कभी इस तरह की पत्रिका नहीं पढता। दूर दराज़ के छोटे शहरों और बाकि जगहों से प्रतिबद्ध और सरोकारों वाली पत्रिकाएँ ही पढ़ने की जरुरत पड़ती है और मैं कादिम्बनी इसलिये भी नहीं पढ़ता क्योंकि इसमें मेरे पढने लायक कोई सामग्री नहीं होती।

ऐसा नहीं है की कोई मैं अपनेआप को महान या बौद्धिक लेखक समझता हूँ बल्कि एक ऐसे बेचैन युवक के रूप में अपने आप को देखता हूँ जिसे बहुत कुछ जानना है और साहित्य उसके लिये बड़ा माध्यम है। मुझे दिखता है कि एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो जबकि उसके अभी के सभी अंक देख चुका हूँ।
(शैलेश भारतवासी से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰रामजी यादव (कवि-कथाकार, फिल्ममेकर, आलोचक)


कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है- प्रमोद कुमार तिवारी

कादम्बिनी पत्रिका बहुत से उतार-चढ़ाव से होकर गुजरी है। राजेन्द्र अवस्थी के समय यह काल-चिंतन और भूत-प्रेत की पत्रिका रही, वहीं विष्णु नागर जी के दौर में इसमें साहित्य और सरोकार की गूँज सुनाई देने लगी। और फिर से अपनी प्रतिष्ठा पाने लगी। आज की तारीख में यह साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका होने की बजाय आनंद, मस्ती, सैर-सपाटा आदि की एक पापुलर पत्रिका होने की तरफ अपने कदम बढ़ा रही है। पत्रिकाएँ दो तरह की होती हैं, एक वो जिन्हें पाठक खोजकर पढ़ता है, दूसरी वो जिससे पाठक टाइम पास करता है। कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है। मुझे याद है कि नागर जी के समय में इस पत्रिका में मेरे लिए कम से कम 30-35 मिनट की सामग्री होती थी, लेकिन आज 5 मिनट का कंटेंट भी नहीं होता।

अब हिन्दुस्तान समूह में मृणाल पाण्डेय के बाद शशि शेखर आये हैं। जब नया व्यक्ति आता है तो उसके अपने नये संस्कार होते हैं। लेकिन किसी चल रहे सिस्टम को समझने में वक्त तो लगता है। इनसे उम्मीदें हैं कि शायद कादम्बिनी फिर से अपना मुक़ाम हासिल करे। लेकिन इतनी जल्दी मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।

कादम्बिनी की अपनी एक सामाजिक उपयोगिता रही है। बहुत पुरानी पत्रिका है, जिसने सामाजिक जागरुकता फैलाने वाले कई स्तम्भ चलाये। एक समय में यह पत्रिका बाल पत्रिकाओं और गंभीर पत्रिकाओं की बीच की कड़ी थी। इसके वर्तमान रूप से मुझे निराशा हुई है, लेकिन हर पत्रिका का यह दौर आता है, मुझे लगता है कि यह परिस्थितियाँ बदल जायेंगी।

॰॰॰प्रमोद कुमार तिवारी (युवा लेखक व पत्रकार)


कादम्बिनी चर्चा करने लायक पत्रिका ही नहीं है- विमल चंद्र पाण्डेय

किसने कहा कि कादम्बिनी की रीडरशीप घट रही है! मुझे लगता है कि कादम्बिनी को स्यूडो-इंटलैक्चयूल तरह के बहुत से पाठक अभी भी इससे जुड़े हैं और अब तो यह पूरी तरह से बाज़ारू पत्रिका हो गई है। और इसपर हमारे बोलने न बोलने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे पिताजी इस पत्रिका को घर लाया करते थे। तब उनका उद्देश्य अलग था, इसमें बहुत सी ज्ञानवर्धक बातें होती थीं, लेकिन अब तो भूतों-प्रेतों पत्रिका बनकर रह गई है। यह पत्रिका कभी भी इतनी स्तरीय नहीं रही कि इसपर राजेन्द्र यादव जैसे लोगों को टिप्पणी करनी पड़े। मेरी कविताएँ भी इसमें 'पहचान' स्तम्भ के अंतर्गत छपी थी, जिसमें से एक कविता का सार जो कि उसके अंतिम पंक्तियों में था ही उड़ा दिया गया था। मेरा मानना है कि इसके बंद होने या चलने, पाठक संख्या घटने-बढ़ने पर कोई चर्चा ही नहीं होनी चाहिए।

॰॰॰विमल चंद्र पाण्डेय (नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हिन्दी युवा कहानीकार)


कादम्बिनी ने अपने ही पाठकों को ठेंगा दिखलाया है- गौरव सोलंकी

मैं कभी कादम्बिनी का नियमित पाठक नहीं रहा लेकिन मैंने इसके बदलते हुए रूप पर ज़रूर ग़ौर किया है और इसके बारे में लोगों से बात भी करता रहा हूँ। छ:-सात महीने पहले का कोई अंक मैंने देखा था। मैं यदि कुछ साल पहले की स्थिति को याद करूँ तो यह प्रबुद्ध पाठकों की पत्रिका थी जिसे पढ़ने पर एक किस्म की बौद्धिक समृद्धि का अनुभव होता था। इसका पाठक वर्ग यदि कम हो रहा है तो कम होने का सीधा सा कारण है कि इसने अपने उन्हीं पाठकों को ठेंगा दिखलाते हुए अपना रूप बदल लिया है जो इसकी नींव से जुड़े हुए थे। बाज़ार के चक्कर में कादम्बिनी ने अपना स्तर बच्चों या किशोरों की पत्रिकाओं जैसा बना लिया है। मैंने हाल ही में कादम्बिनी देखी तो मुझे किशोरों की पत्रिका 'सुमन सौरभ' की याद आई। मैं तो बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूँ। इसे छापने वाले लोग भी शायद ठीक से नहीं जानते कि वे किसके लिए पत्रिका निकाल रहे हैं। यदि वे कम पढ़े लिखे आम पाठक की पसन्द तक आना चाहते हैं तो याद रहे कि उन पाठकों के पास इससे कहीं बेहतर विकल्प पहले से ही मौज़ूद हैं। कोई भी उस सामग्री से कैसे संतुष्ट हो सकता है जो दैनिक अख़बारों के बालमंच वाले पृष्ट जैसी हो या इंटरनेट से उठाई गई 'ज्ञानवर्द्धक' सामग्री। मैं कभी कादम्बिनी में प्रकाशित नहीं हुआ।

॰॰॰गौरव सोलंकी (चर्चित युवा कहानीकार व कवि)


आज यानी 25 सितम्बर 2009 को हमें कुछ और प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं।


कादम्बिनी पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई- प्रियदर्शन

एक अरसे से कादंबिनी देख नहीं पाया हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल अखबारों और किताबों से फुर्सत नहीं मिल पाती। इत्तेफाक से कादंबिनी छूटती चली गई। सच कहूं तो कभी खरीद कर पढ़ने की ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। इसकी कोई वैचारिक वजह भी नहीं। बस इसे पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। विष्णु नागर जी संपादक थे तो ओलंपिक पर कवर स्टोरी लिखी थी। और भी थोड़ा-बहुत लिखना तभी हुआ था। तब थोड़ा अच्छी भी लगती थी कादंबिनी।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰प्रियदर्शन (वरिष्ठ पत्रकार)


कादम्बिनी को बंद करने की बात एक अतिरेकी कथन है- पंकज सिंह

रामानंद दोषी के ज़माने से कादंबिनी को देख रहा हूं। उस वक्त इसका डाइजेस्ट वाला स्वरूप था, अच्छा भी लगता था। फिर राजेंद्र अवस्थी संपादक हुए तो कुछ परिवर्तन भी किए। उन्होंने परिचर्चाओं के ज़रिए कादंबिनी को समकालीन से जोड़ने की कोशिश भी की। कोई भी पत्रिका ये तो दिखाती ही है कि उसकी बौद्धिक तैयारी कैसी है। बाद में कादंबिनी राजेंद्र माथुर की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं (व्यापक अर्थ में) का शिकार हो गई। फिर विष्णु नागर ने पत्रिका का बड़ी विनम्रता (इतनी ज़रूरी भी नहीं थी) से कायांतरण किया। कई नए स्तंभ, कई नई परिकल्पनाएं दिखीं।

फिर भी किसी का ये कहना कि कादंबिनी जैसी पत्रिका को बंद हो जाना चाहिए, कोरी बकवास है। ये अतिरेकी कथन है। मैं तो कहता हूं कि हंस को बंद हो जाना चाहिए। हंस राजेंद्र यादव की मानसिक विकृतियों का आईना रहा है। पत्रिका सिर्फ संपादक की नहीं होती। कादंबिनी में हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे युवा कवि भी शामिल हैं। कादंबिनी में लिखने वाले हंस में लिखने वालों से बेहतर हैं। ये हो सकता है कि पढ़नेवालों को कादंबिनी से अपेक्षाएं ज़्यादा हों।

मैंने नागपुर के पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में युवाओं के बड़े समूह का नेतृत्व किया था। कादंबिनी ने फोटो के साथ इंटरव्यू छापा था। विष्णु नागर ने भी कुछ कविताएं छापीं, फिर पति-पत्नी का संयुक्त लेख भी छपा। नियमित लेखक कभी नहीं रहा, पाठक अभी भी हूं। मेरे अनुसार जीवन में सिर्फ साहित्य ही महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने बीए किया इतिहास में, जेएनयू से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर शोध किया, साहित्य से जुड़ाव भी है। मतलब, कादंबिनी ज़िंदगी के पूरे विस्तार को समेटने की कोशिश करती है, तो ये सराहनीय कदम है। वर्तमान संपादक ने कम से कम कोई क्षरण किया हो, ऐसा नहीं लगता।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰पंकज सिंह (कवि, आलोचक)


जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसका तो सम्मान करें- पूर्णिमा वर्मन

अबकी बार अगस्त में जब मैं भारत से इमारात लौटी तब इकोनॉमी क्लास का टिकट नहीं मिला मजबूरन बिजनेस क्लास में बैठना पड़ा। एअर होस्टेस पत्रिकाओं वाली ट्रे लेकर आयी तो एक दो पत्रिकाएँ हटाकर देखा कि क्या कोई हिंदी पत्रिका है। मुझे कादंबिनी दिखी तो उठा ली। रूप रंग अलग, आकार अलग, पहला पन्ना खोलते ही ऐसा तमाचा पड़ा कि यात्रा का स्वाद ही खराब हो गया। लेख था- "हिंदी जेहादियों से डर लगता है।" लेख में सिद्ध किया गया था कि हिंगलिश ही बोलनी चाहिए। लिखने पढ़ने वाली हिंदी बोलना जेहाद है।

इस प्रकार के लेख प्रकाशित करने वाली हिंदी पत्रिका का प्रकाशित होना हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने वालों के लिए कलंक की बात है। हम जैसे लोग जो दिन-रात विदेशों में हिन्दी के प्रसार के लिए प्रयत्न कर रहे हैं भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में ऐसा कुछ देखें तो दिल टूटना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब घर में इसकी प्रतियाँ डाइजेस्ट की तरह संभाल कर रखी जाती थीं। सब पुरानी पत्रिकाएँ अखबारों के साथ रद्दी में बिकती थीं लेकिन यह नहीं बेची जाती थी। रुपरंग बदलना स्वाभाविक है लेकिन जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसके प्रति सम्मान तो होना चाहिए।

कुल मिलाकर यह कि गलती पत्रिका की नहीं क्लास की है। बिजनेस क्लास का टिकट लिया तो भुगतना तो था ही। आराम से इकोनॉमी में बैठती। वहाँ एअर होस्टेस पत्रिकाओं के लिए परेशान नहीं करती। दो घंटे सोती और चैन से घर पहुँचती।
(ईमेल द्वारा प्राप्त)

॰॰॰पूर्णिमा वर्मन (बहुतचर्चित ऑनलाइन हिन्दी पत्रिकाएँ अनुभूति और अभिव्यक्ति की संपादिका)


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