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Friday, August 06, 2010

हाँ जी हाँ, हम तो छिनाल हैं ही

पिछला हफ्ता छिनाल-प्रकरण का था। प्रेमचंद सहजवाला इस मुद्दे पर जितनी मुँह, उतनी बात लेकर आये थे। आज पढ़िए रंगकर्मी और कथाकार विभा रानी के विचार॰॰॰॰

लोग बहुत दुखी हैं। एक पुलिसवाले ने हम लेखिकाओं को छिनाल क्या कह दिया, दुनिया उसके ऊपर टूट पडी है। इनिस्टर-मिनिस्टर तक मुआमला खींच ले गए। अपने यहां भी ना। लोग सारी हद्द ही पार कर देते हैं। भला बताइये कि जब हम बंद कमरे में किसी को गलियाते हैं, तब सोचते हैं कि हम क्या कर रहे हैं?

अपने शास्त्रों में तो कहा ही गया है कि मन और आत्मा को शुद्ध रखो. इसका सबसे सरलतम उपाय है अपने मन की बात उजागर कर दो, मन को शान्ति मिल जाएगी. सो पुलिसवाले ने कर दिया. वह डंडे के बल पर भी यह कर सकता था. आखिर रुचिका भी तो लडकी थी ना.
अब अपने विभूति भाई स्वनाम धन्य हैं. अपने कुल खान्दान के विभूति होंगे, अपनी अर्धांगिनी के नारायण होंगे, अपनी पुलिसिया रोब से कभी कभार उतर कर कुछ कुछ राय भी दे देते होंगे. अब इसी में एक राय दे दी कि हम “छिनाल” हैं तो क्या हो गया भाई? कोई पहाड टूट गया कि ज्वालामुखी फट पडी.
छम्मकछल्लो तो खुश है कि उन्होंने इस बहाने से अपनी पहचान भी करा दी. नही समझे? भई, गौर करने की बात है कि हमलोगों को छिनाल या वेश्या या रंडी कौन बनाता है? हमसे खेलने के लिए, हमसे हमारे तथाकथित मदमाते सौंदर्य और देह का लुत्फ उठाने के लिए, हम पर तथाकथित जान निछावर करने के लिए हमारे पास क्या किसी गांव घर से कोई लडकी या औरत आती है? वे सब ही तो बनाते हैं हमें छिनाल या रंडी. तो अपने इस सृजनकारी ब्रह्मा के स्वरूप को उन्होंने खुद ही ज़ाहिर किया है भाई? पुलिसवाले आदमी हैं, इसलिए कलेजे में इतना दम भी है कि इसे बता दिया. वरना अपने स्वनाम धन्य लेखक लोग तो कहते -कहते और करते- करते स्वर्ग सिधार गए कि “भई, दारू और रात साढे नौ बजे के बाद मुझे औरतों की चड्ढियां छोडकर और कुछ नहीं दिखाई देता." इतने ही स्वनाम धन्य लेखकों की ही अगली कडी हैं अपने विभूति भाई.
इतना ही नहीं, अपने लेखकों की जमात जब एक दूसरे से मिलती है तो खास पलों में खास तरीके से टिहकारी-पिहकारी ली जाती है, “क्यों? केवल लिखते ही रहे और छापते ही रहे कि किसी को भोगा भी? और साले, भोगोगे ही नहीं तो भोगा हुआ यथार्थ कहां से लिख पाओगे?”
मूढमति छम्मकछल्लो को इसके बाद ही पता चल सका कि भोगे हुए यथार्थ की हक़ीक़त क्या है? वह तो अपने लेखन की धुन में सारा आकाश ही अपने हवाले कर बैठी थी और मान बैठी थी कि भोगा हुआ यथार्थ लिखने के लिए स्थितियों को भोगने की नहीं, उसे सम्वेदना के स्तर पर जीने की ज़रूरत है. वह तर्क पर तर्क देती रहती थी कि भला बताइये, कि कातिल पर लिखने के लिए किसी का कत्ल करना ज़रूरी है? बलात्कृता पर लिखने के लिए क्या खुद ही बलात्कार की यातना से गुजर आएं? छम्मकछल्लो ने अपनी कायरता में इन लोगों से सवाल नहीं किए. अब समझ में आया कि नहीं जी नहीं, पहले अपना बलात्कार करवाइये, फिर उस पर लिखिए और फिर देखिए, भोगे हुए यथार्थ के दर्द की सिसकी में उनकी सिसकारी भरती आवाज़! आह! ओह!
छम्मकछल्लो तो बहुत खुश है कि पुलिस के नाम को उन्होंने और भी उजागर कर दिया. छम्मकछल्लो जब भी पुलिस पर और उसकी व्यवस्था पर विश्वास करने की कोशिश करती है, तभी उसके साथ ऐसा-वैसा कुछ हो जाता है. छम्मकछल्लो के एक फूफा ससुर हैं. दारोगा थे. अब सेवानिवृत्त हैं, कई सालों से. वे कहते थे कि रेप करनेवालों के तो सबसे पहले लिंग ही काट देने चाहिये, फिर आगे कोई कार्रवाई होनी चाहिये.” छम्मकछल्लो के एक औए रिश्तेदार आई जी हैं. वे कहते हैं कि बलात्कार से घृणित कर्म तो और कोई दूसरा हो ही नहीं सकता. छम्मकछल्लो के कुछ मित्र हैं जेल अधीक्षक. वे सब भी कहते हैं कि हमें सोच कर हैरानी होती है कि लोग कैसे ऐसा गर्हित कर्म कर जाते हैं. वे बताते हैं कि जेल में जब इसका आरोपी आता है तो सबसे पहले तो अंदर के दूसरे ही कैदी उसकी खूब ठुकाई कर देते हैं. कोई भी उससे बात नहीं करता. रेप के अक्यूज्ड को दूसरे कैदी भी अच्छी नज़रों से नहीं देखते.” छम्मकछल्लो ने जब रेप पर एक लेख लिखा था तो एक सह्र्दय पाठक ने बडे ठसक के साथ उससे पूछा था, “आप जो ऐसे लिखती हैं तो क्या आपका कभी बलात्कार हुआ है?” और अगर नहीं हुआ है तो कैसे लिख सकती हैं आप इस पर?” मतलब कि फिर से वही भोगा हुआ यथार्थ.
अब छम्मकछल्लो सगर्व कह सकती है कि हां जी हां, उसके साथ बलात्कार हुआ है. भाई लोग उसे लेखिका मानें या न मानें वह तो अपने आपको मानती ही है. वह यह भी मानती है कि जिस तरह से घरेलू हिंसा दिखाने के लिए शरीर पर जले, कटे या सिगरेट के दाग के निशान ज़रूरी नहीं, उसी तरह बलात्कार करने के लिए किसी के शरीर पर जबरन काबू करना जरूरी नही. इस मानसिक बलात्कार से विभूति भाई ने तो एक साथ ही साठ हज़ार रानियों और आठ पटरानियों का सुख उठा लिया. भाई जी, हम आपके नतमस्तक हैं कि आपने अपने करतब से हम सबको इतना ऊंचा स्थान बख्श दिया. जहां तक बात चटखारे लेने की है तो जब स्वनाम धन्य लेखक भाई लोग सेक्स पर लिखते हैं तब क्या लोग चटखारे नहीं लेते? सेक्स को हम सबने अचार, पकौडे, मुरब्बे की तरह ही चटखारेदार, रसीला, मुंह में पानी ला देनेवाला बना दिया है तो सेक्स पर कोई भी लिखेगा, मज़े तो लेगा ही. सभी मंटो नहीं बन सकते कि उनके सेक्स प्रधान अफसाने बदन को झुरझुरा कर रख दे और आप एक पल को सेक्स को ही भूल जाएं या सेक्स से घृणा करने लग जाएं.
इसलिए हे इस धरती की लेखिकाओं, माफ कीजिए, हिंदी की लेखिकाओं, अब इन सब बातों पर हाय तोबा करना बंद कीजिए. अपने यहां वैसे भी एक कहावत है कि “हाथी चले बाज़ार, कुत्ते भूंके हज़ार.” तो बताइये कि उनके भूंकने के डर से क्या हाथी बाज़ार में निकलना बंद कर दे? हिंदी के, जी हां हिंदी के ये सडे गले, अपनी ही कुंठाओं और झूठे अहंकार में ग्रस्त ये लेखक लोग इस तरह की बातें करते रहेंगे, अपना तालिबानी रूप दिखाते रहेंगे. हर देश में, हर प्रदेश में, हर घर में फंदा तो हम औरतों पर ही कसा जाता है ना! इससे क्या फर्क़ पडता है कि आप लेखिका हैं. लेखिका से पहले आप औरत हैं महज औरत, इसलिए छुप छुप कर उनकी नीयत का निशाना बनते रहिये, उनके मौज की कथाओं को कहते सुनते रहिये. बस अपने बारे में बापू के तीन बंदरों की तरह ना बोलिए, ना सुनिए, ना कहिए. हां, उनकी बातों को शिरोधार्य करती रहिए. आखिरकार आप इस महान सीता सावित्रीवाले परम्परागत देश की है, जहां विष्णु और इंद्र जैसे देवतागण वृन्दा और अहल्या के साथ छल भी करते रहने के बावज़ूद पूजे जाते रहे हैं, पूजे जाते रहेंगे. आखिर अपनी एक गलत हरक़त से सदा के लिए बहिष्कृत थोडे ना हो जा सकते हैं? यह मर्दवादी समाज है, सो मर्दोंवाली प्रथा ही चलेगी. हमारे हिसाब से रहो, वरना छिनाल कहलाओ.

विभा रानी

Monday, August 02, 2010

कुछ मर्दों की निगाह में लेखिकाएं 'छिनार’ हो गई हैं?

बैठक के लिए ये बातचीत प्रेमचंद सहजवाला ने की है...विभूतिनारायण राय के विवादस्पद बयान के बाद उन्होंने कुछ साहित्य से जुड़ी कुछ हस्तियों से इस विषय पर प्रतिक्रिया मांगी है...ये लेख उन्हीं प्रतिक्रियाओं का निचोड़ है साथ ही अंग्रेज़ी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस का संपादकीय भी लगा रहे हैं जो इसी मुद्दे पर छपा है



‘लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने की कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है’ यह बयान है अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का जो उन्होंने ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा. उनकी इस बात पर साहित्य जगत में तो मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई ही है, पर मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को इस बात पर सर्वाधिक आक्रोश हुआ लगता है. कपिल सिब्बल ने तुरंत उस पत्रिका के अंक की मांग की जिसमें यह साक्षात्कार छपा है और कहा है कि यह सब अस्वीकार्य बात है. यह महिलाओं का अपमान है और विशेषकर लेखिका वर्ग का भी. कपिल सिब्बल ने कहा है कि इतने बड़े ओहदे पर बैठे किसी व्यक्ति की ओर से यह बयान उस व्यक्ति की मानसिक बुनावट की ओर संकेत करता है जो पूर्णतः उस ओहदे की गरिमा के विरुद्ध है’.

आज प्रातः के समाचार-पत्रों में यह खबर पढ़ कर मेरा मन भी स्वाभाविक रूप से विचलित हो गया और मैंने सब से पहले स्वयं विभूतिनारायण राय जी को फोन मिलाया. वे उस समय दिल्ली में थे और मैंने जब उन से इस विषय पर विचार जानने चाहे तो उन्होंने कहा कि उन्होंने दरअसल ‘बेवफाई’ शब्द का उपयोग किया है. मंत्री महोदय ने ‘छिनाल’ शब्द का अर्थ वेश्या लगाया है जो कि गलत है. उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ वे रहते हैं वहां तो यह शब्द पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है. परन्तु मुझे लगा कि इस विषय पर लेखक जगत से भी प्रतिक्रिया जानना ज़रूरी है क्यों कि उक्त बयान से तात्पर्य अगर ‘वेश्या’ से नहीं भी है और ‘बेवफाई’ से है तो भी क्या यह मान लिया जाए कि लेखिकाएं ‘छिनाल’ या ‘बेवफा’ होती हैं? इस विषय पर पहली और गुस्से भरी प्रतिक्रिया मुझे सुप्रसिद्ध कवयित्री पुष्पा राही की मिली जिन्होंने फोन पर बात सुनते ही कहा कि लेखिकाएं क्या करती हैं, इसे ले कर विभूति नारायण राय क्यों परेशान हैं? और फिर ‘बेवफाई’ का संबंध तो हमारे समाज में पुरुषों से अधिक है. फिर इतनी बड़ी कुर्सी पर बैठ कर क्या लेखिकाओं के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग अच्छा लगता है? पुष्पा जी खासी गुस्से में थी और बोली कि उन्हें तो अपने शब्दों के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए. मेरे यह बताने पर कि विभूति नारायण राय ने कहा है कि इस शब्द का सर्वाधिक उपयोग तो प्रेमचंद ने किया है, पुष्पा जी ने कहा कि आप (विभूति नारायण राय) कोई प्रेमचंद तो नहीं हैं? वे पहले प्रेमचंद का साहित्य तो पढ़ें और समझें कि प्रेमचंद ने किस सन्दर्भ में इस शब्द का उपयोग किया है. लेकिन इस विषय पर जब मेरी बात कवयित्री अर्चना त्रिपाठी से हुई तब उन्होंने ज़ोर शोर से विभूति नारायण राय का पक्ष लेते हुए कहा कि रमणिका गुप्ता जैसी कुछ लेखिकाओं ने तो अपनी आत्मकथाओं में यह तक लिखा है कि उन्होंने अपने जीवन में कितने लड़कों को बिगाड़ा है, इस का कुछ हिसाब तक उनके पास नहीं है. रमणिका ने तो यह भी लिखा है कि मेरा जो बेटा है वह किसी कामरेड का बेटा है. उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि अपने उपन्यासों में वे नारी-पुरुष सम्भोग का इतना खुला वर्णन करती हैं कि जिस की कोई ज़रूरत तक नहीं. मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ पर भी उनकी वही प्रतिक्रिया है कि कुछ पन्नों में ‘काश मैं एक उरोज होती...’ जैसे अनुच्छेदों की ज़रूरत तक नहीं. अर्चना त्रिपाठी ने कहा कि जो कुछ विभूति नारायण राय ने कहा है वही बात डॉ. धर्मवीर अपनी पुस्तक ‘तीन द्विज हिंदू स्त्री-लिंगों का चिंतन’ में कह चुके हैं. इस पुस्तक में उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान व रमणिका गुप्ता के लेखन पर प्रश्न उठाते हुए कहा है कि क्या लेखिकाएं सेक्स के खुले वर्णन के अलावा लिख ही नहीं सकती? और क्या एकनिष्ठ्त्ता व चरित्र की समाज में कोई महत्ता ही नहीं रह गई है?

प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी जी ने भी यह तो माना कहा कि जो कुछ विभूति नारायण राय ने कहा है उस में कुछ हद तक सच्चाई है, परन्तु विभूति नारायण राय जी को अपनी बात कहते समय भाषा की गरिमा का भी ख्याल रखना चाहिए था. परन्तु पुरुष साहित्यकारों में से अशोक चक्रधर जी ने फोन पर बहुत कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि महिलाएं हमारे समाज का बेहद सम्मानजनक् हिस्सा हैं और इतनी ज़िम्मेदार कुर्सी पर बैठ कर ऐसी भाषा उपयोग करने के वे घोर विरोधी हैं.

इस विषय पर जबकि इतना बड़ा बवाल खड़ा होने पर गंगाप्रसाद विमल जी को सर्वाधिक आक्रोश है और उन्होंने कहा कि आज लेखक के लिए स्वतंत्रता से कुछ भी कहने का कोई ‘स्पेस’ नहीं बचा है. विभूति नारायण राय ने यह बात अश्लीलता के सन्दर्भ में कही है और इस पर इतना बड़ा विवाद खडा ही नहीं होना चाहिए था. उन्होंने ‘छिनाल’ शब्द का अनुवाद ‘वेश्या’ करने वाले पत्रकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ऐसे पत्रकार जिनमें अनुवाद करने तक की तमीज़ नहीं है, उन के मालिकों को चाहिए कि उन्हें नौकरी से निकाल बाहर करें. उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज जितना खुलापन लेखन में आया है वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण ही सम्भव हुआ है जबकि कुछ शक्तियां इस आज़ादी को हड़प लेना चाहती हैं.

सुपरिचित कवि कथाकार रामजी यादव लेकिन विभूति नारायण के प्रति ही बेहद आक्रोश रखते हैं. उनके अनुसार वे हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं और उस पद पर बैठ कर उनका यह वक्तव्य बेहद गैर-ज़िम्मेदाराना सा है जो यह साबित करता है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है. उन्होंने कहा कि विभूति नारायण राय को तुरंत अपने पद से निकाल देना चाहिए. रामजी यादव पूछते हैं कि जो लेखिकाएं स्वयं विभूति नारायण राय के निकट हैं उनके विषय में ऐसी बात उन्होंने क्यों नहीं कही. जैसे ममता कालिया जैसी दूसरे स्तर की लेखिका को विभूति नारायण राय मैत्रेयी पुष्पा जैसी बड़ी लेखिकाओं से भी बड़ी साबित करने में लगे हैं.

इस विषय पर कई अन्य साहित्यकारों विशेषकर लेखिकाओं से बात करने का मन था पर सब से संपर्क स्थापित नहीं हो सका. मेरी अन्तिम बातचीत इस सन्दर्भ में सुविख्यात कहानीकार उपन्यासकार मृदुला गर्ग से हुई जिनका उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ अपने समय का सर्वाधिक विवादस्पद उपन्यास रहा, हालांकि मैं व्यक्तिगत रूप से यही कहूँगा कि ‘चित्तकोबरा’ की मूल आत्मा उस कृति के उत्कृष्ट होने की ओर संकेत करती है. परन्तु विरोधियों की चेतना उस के कुछ पन्नों पर टिकी थी. मृदुला गर्ग जैनेन्द्र की साहित्यिक शिष्या हैं और जैनेन्द्र के उपन्यास ‘सुनीता’ पर भी जो बावेला खड़ा हुआ था उसे उनके परवर्ती साहित्यकारों ने व्यर्थ का विवाद माना और कहा कि नारी-पुरुष संबंधों का बेबाक व खुला वर्णन आपत्तिजनक है ही नहीं. परन्तु मृदुला गर्ग लेखक और लेखन के बीच बहुत सुलझे हुए तरीके से फर्क करती हुई बोली कि किसी के भी लेखन यथा ‘चित्तकोबरा’ पर अपने विचार लिखने का अधिकार सभी को है. परन्तु विभूति नारायण के सन्दर्भ में उनका कहना स्पष्ट है कि जो उन्होंने कहा है वह लेखिकाओं के बारे में कहा है, न कि लेखन के बारे में, जो गलत है. अपनी बात कहते हुए कि विभूतिनारायण राय को शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए. यह पूछे जाने पर कि क्या जैसा कपिल सिबल ने कहा है, विभूतिनारायण राय पर कार्रवाई होनी चाहिए, मृदुला जी ने कुछ कहने से इनकार कर दिया और कहा कि यह विषय तो स्वयं कपिल सिबल जी का है और वे इस विषय पर कुछ भी नहीं कहना चाहेंगी.

कुल मिला कर मेरे मन में यह जिज्ञासा हुई कि विभूति नारायण राय ने कोई बात किसी विशेष सन्दर्भ में कही, पर क्या उस से इतना बड़ा विवाद खड़ा होना उचित था? और कि क्या शब्दों का स्वतंत्र उपयोग कोई इतनी बड़ी बात हो सकती है कि एक मंत्री को चेतावनी देनी पड़े? इस पर मैं कोई अपना निष्कर्ष दूं, बेहतर कि यह लेख पढ़ने वाले स्वयं अपनी धारणा से अवगत कराएं.

प्रेमचंद सहजवाला

Wednesday, November 04, 2009

यह केवल उत्सवधर्मी विश्विविद्यालय नहीं रहेगा- विभूति नारायण राय

पिछले दिनों हिन्द-युग्म के रामजी यादव और शैलेश भारतवासी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय से बात की। विभूति नारायण राय हिन्दी के चर्चित लेखक और साहित्यकार हैं जिनकी दंगों के दौरान पुलिस के सांप्रदायिक रवैये पर लिखी पुस्तक 'शहर में कर्फ़्यू' बहुत प्रसिद्ध रही। विभूति उ॰ प्र॰ में पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्य कर चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय हिन्दी भाषा को समर्पित दुनिया का एक मात्र विश्वविद्यालय है। तो हमने जानने की कोशिश की कि हिन्दी भाषा-साहित्य की गाड़ी में गति लाने के लिए इनका विश्वविद्यालय क्या कुछ करने जा रहा है॰॰॰॰॰


(इंटरव्यू को उपर्युक्त प्लेयर से सुन भी सकते हैं)

रामजी यादव- महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 10-12 वर्ष पहले हुई थी। पूरी दुनिया में फैला हुआ जो हिन्दी समाज है, उसके प्रति हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यह उत्तरदायी है। लेकिन यह एक उत्सवधर्मी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। और लगभग इसकी उत्सवधर्मिता इसके कुलपति की महात्वकांक्षाओं तक सीमित करके देखी जाती है। इस पूरी छवि को आप कैसे बदलेंगे?

वी एन राय- विश्वविद्यालय केवल उत्सवधर्मिता का केन्द्र न रहे, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध का क्षेत्र भी बने, और इसके साथ-साथ इस विश्वविद्यालय की हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में ज़रूरी उपकरण प्रदान करने की जो इसकी खास भूमिका है, उसे पूरा करने में भी इसका सक्रिय योगदान हो, इस समय दिशा में यह विश्वविद्यालय काम कर रहा है। इस वर्ष नये विभाग खुले हैं। मानवशास्त्र और फिल्म-थिएटर दो विभाग शुरू किये गये हैं। इसके अलावा डायस्पोरा स्ट्डीज का नया विभाग शुरू होने वाला है। ये तीनों नये विभाग महात्मा गाँधी अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की उस भूमिका को निभाने में भी मदद करेंगे, जिसकी कल्पना इस विश्ववविद्यालय के एक्ट में की गई है और प्रथम अंतरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में इसकी निर्मिती के पीछे जो एक परिकल्पना रही है। इसे अंतरर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए, शायद आप अवगत हों, विश्वविद्यालय एक बहुत महात्वपकांक्षी योजना पर काम कर रहा है वो है कि हिन्दी में जो कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसे ऑनलाइन किया जाये ताकि दुनिया के कोने-कोने में बैठे हिन्दी के पठक उन्हें पढ़ सके। हमारी कोशिश है कि दिसम्बर 2009 तक लगभग 100000 पृष्ठ ऑनलाइन कर दिये जायें। इसके अलावा हम इन सभी महत्वपूर्ण कृतियों को दुनिया की तमाम भाषाओं में जैसे चीनी, जापानी, अरबी, फ्रेंच इत्यादि में अनुवाद करके ऑनलाइन करना चाहते हैं।

रामजी यादव- एक चीज़ मानी जाती है कि हिन्दी एक बड़ी भाषा है जो तमाम तरह के संघर्षों से निकली है। लेकिन हिन्दी में विचारों की स्थिति बहुत दयनीय है। एक विश्वविद्यालय के रूप में आपका विश्वविद्यालय किस तरह का प्रयास कर रहा है कि हिन्दी में विचार मौलिक पैदा हों और दुनिया के दूसरे अनुशासनों से इनका संबंध बने?

वी एन राय- इसके लिए भी हमने कुछ महात्वकांक्षी योजनाएँ बनाई है। हमारे विश्वविद्यालय का जो पाठ्यक्रम है वो गैरपारम्परिक पाठ्यक्रम हैं। जो विषय हमारे यहाँ पढ़ाये जा रहे हैं वह भारत के बहुत कम विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं। जैसे स्त्री-अध्ययन है, शांति और अहिंसा है, हिन्दी माध्यम में मानव-शास्त्र है, फिल्म और थिएटर या डायस्पोरा स्ट्डीज की पढ़ाई है। अनुवाद भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें हमारे यहाँ पढ़ाई हो रही है। लेकिन ज्ञान के इन अनुशासनों में मौलिक पुस्तकों की कमी है, मौलिक तो छोड़ दीजिए जो एक आधार बन सकती हों, ऐसे पाठ्यपुस्तकों की कमी है। इसलिए हमने योजना बनाई है कि हम ज्ञान के इन सारे अनुशासनों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में उपलब्ध है, उसके कुछ चुनिंदा अंशों का अनुवाद हो और उसे छापें। और यह योजना शुरू भी हो गई है, हमने स्त्री-अध्ययन के लिए 10 पुस्तकों को चुना है जिसका साल भर में हम अनुवाद करा लेंगे। इसके बाद अन्य अनुशासनों में जायेंगे।

शैलेश भारतवासी- सवाल हमारा यह था कि जो हिन्दी का साहित्यिक या वैचारिक परिदृश्य हैं, वो पूर्णतया मौलिक नहीं है। विश्वविद्यालय की तरफ से ऐस कोई प्रयास है जिससे मौलिक विचार निकलकर आये?

उत्तर- मौलिक लेखन को भी हम प्रोत्साहन देंगे, लेकिन सवाल यह है कि मौलिक लेखन के लिए भी आधारभूत सामग्री उपलब्ध हो, जिन्हें पढ़कर आप अपनी बेसिक तैयारी कर सकें। दुर्भाग्य से गंभीर समाज शास्त्रीय विषयों पर हिन्दी में मौलिक सामग्री या तो बहुत कम है या ज्यादातर अनुवाद के माध्यम से मिल रही है। पर हमारा प्रयास यह होगा कि जब हम महत्वपूर्ण चीज़ों का अनुवाद करायेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें पढ़कर जो मौलिक सोचने वाले हैं, वे मौलिक लेखन करेंगे और उन्हें भी हम प्रकाशित करेंगे।

रामजी यादव- क्या दुनिया के अन्य देशों के विश्ववद्यालयों में जहाँ प्राच्य विद्या किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, उनके साथ विश्वविद्यालय का कोई अंतर्संबंध बन रहा है?

वी एन राय- जी, हम यह कोशिश कर रहे हैं कि बाहर के 100 विश्वविद्यालयों में जहाँ हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है, भाषा के तौर पर, प्राच्य विद्या का एक अंग होकर या साउथ-एशिया पर विभाग हैं, उनमें हिन्दी का इनपुट है, इन सभी विश्वविद्यालयों के बीच में हम एक समन्वय सेतु का काम करें, उनमें जो अध्यापक हिन्दी पढ़ा रहे हैं, उनके लिए रिफ्रेशर कोर्सेस यहाँ पर हम संचालित करें, उनके लिए ज़रूरी पाठ्य-सामग्री का निर्माण करायें और सबसे बड़ी चीज़ है कि विदेशों से बहुत सारे लोग जो हिन्दी सीखने के लिए भारत आना चाहते हैं, उनके लिए हमारा विश्ववद्यालय एक बड़े केन्द्र की तरह काम करें, इस दिशा में भी काम चल रहा है।

शैलेश भारतवासी- जहाँ एक ओर आप विदेशी विश्वविद्यालयों से अंतर्संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं अपने ही देश के बहुत से लोग जो हिन्दी भाषा या साहित्य में ही अपनी पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं, उन्हें भी आपके विश्वविद्यालय के बारे में पता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भी इस विश्वविद्यालय का नाम एक नई चीज़ है। तो क्या आप चाहते ही नहीं कि सभी लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचेया कोई और बात है?

वी एन राय- नहीं-नहीं, आपकी बात सही है। विश्वविद्यालय को बने 11 साल से ज्यादा हो गये, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत बड़ा हिन्दी समाज इससे परिचित नहीं है, या उसका बहुत रागात्मक संबंध नहीं बन पाया या कोई फ्रुटफुल इंटरेक्शन नहीं हो पाया। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते, और हम इसके लिए हम प्रयास भी कर रहे हैं। मसलन हमारी वेबसाइट ही देखिए। हालाँकि हिन्दी-समाज बहुत तकनीकी समाज नहीं है, बहुत कम लोग हिन्दी वेबसाइट देखते हैं। लेकिन मुझे देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी वेबसाइट को रोज़ाना 150-200 लोग आते हैं और वो भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। तो ऐसा नहीं है, धीरे-धीरे लोगों ने इसे जानना शुरू किया है।

शैलेश भारतवासी- लेकिन यहीं पर मैं रोकूँगा, आपने कहाँ कि आप 150-200 लोगों से संतुष्ट हैं (कुलपति ने यहीं रोककर इंकार किया), मेरा कहना है कि आपको 150 विजिटरों से आशा की एक किरण नज़र आती है। मैं एक साहित्यिक-सांस्कृतिक वेबसाइट चलाता हूँ, जिसे रोज़ाना 10,000 हिट्स मिलते हैं (यह दुनिया भर की वेबसाइटों के एस्टीमेटेड हिट्स निकालने वाली वेबसाइट का आँकड़ा है), फिर भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ और इसे एक बहुत छोटी संख्या मानता हूँ। आपकी वेबसाइट पर मैं 2-3 बार गया भी हूँ। मेरा जो अनुभव है वह कहता है कि इसमें जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है वह बहुत प्रयोक्ता-मित्र नहीं है, वह समय के साथ नहीं चल रही है। क्या इस दिशा में कोई परिवर्तन हो रहा है?

वी एन राय- पिछले 5-6 महीनों में जो परिवर्तन हुए हैं, उसमें दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शामिल किया जा रहा है। एक तो मैंने पहले भी बताया कि हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखन के 1 लाख पृष्ठ ऑनलाइन किये जायेंगे और हिन्दी के जो समकालीन रचनाकार हैं, लेखक है, उनकी प्रोफाइल, इनके पते वेबसाइट पर डाल रहे हैं ताकि दुनिया भर में फैले इनके प्रसंशक, इनके पाठक, प्रकाशक इनसे संपर्क कर सकें। तकनीक के स्तर पर भी हम परिवर्तन करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा विश्वविद्यालय कोई तकनीकी विश्वविद्यालय तो है नहीं, फिर भी हम सीख करके, दूसरों की सहायता लेकर अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रामजी यादव- भारत में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसमें गैर हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी का विकास हो रहा है, जिससे नये तरह के डायलेक्ट्स बन रहे हैं, भाषा जिस तरह से बन रही है, बाज़ार दूसरी तरह से इन चीज़ों को विकसित कर रहा है। इस पूरी पद्धति में भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से, विश्वविद्यालय किस रूप से देशज और भदेस को मुख्यधारा का विषय बना सकता है?

वी एन राय- इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद हैं। आज हम जिसे हिन्दी भाषा कह रहे हैं, वह भी एक समय बोली थी। खड़ी बोली। जब आप 'हिन्दी' शब्द का उच्चारण करते हैं तो 'खड़ी बोली' दिमाग में आती है। आज से 130 साल पहले भारतेन्दु तक यह नहीं मानते थे कि 'खड़ी बोली' में कविता भी लिखी जा सकती है। गद्य की भाषा तो 'खड़ी बोली' थी, लेकिन पद्य की भाषा ब्रजभाषा रखते थे भारतेन्दु। छायावाद आते-आते लगभग यह स्पष्ट हुआ कि 'खड़ी बोली' ही 'हिन्दी' होगी। और एक मानकीकरण शुरू हुआ। 30-40 साल बहुत संघर्ष चला। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी होगी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी के शब्दों के साथ हम कैसा व्यवहार करेंगे, कैसे हम इस भाषा को पूरे देश के लिए एक मानक और एक स्वीकार्य भाषा बना पायेंगे, यह सारे संघर्ष चलते-चलते कमोबेश यह तय हो गया है कि 'खड़ी बोली' ही हिन्दी होगी और सभी बोलियाँ इसे मदद करेंगी, खाद का काम करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक दूसरी प्रवृत्ति दिखलाई दे रही है, जो मेरे हिसाब से खतरनाक है। बहुत सारी बोलियाँ इस छटपटाहट में हैं कि वो हिन्दी को रिप्लेस करके एक स्वतंत्र भाषा जैसी स्थिति हासिल करें। विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने अभी मैं मॉरिशस गया था,, वहाँ भी बहुत सारे लोग अतिरिक्त उत्साह में यह कह रहे थे कि हिन्दी क्या है, हमारी राष्ट्रभाषा तो भोजपुरी है, मातृभाषा भोजपुरी है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ कि वहाँ के एक बड़े कार्यक्रम में जब एक राजनेता हिन्दी में बोलने लगे तो जनता में से कुछ लोग कहने लगे ये कौन सी भाषा इस्तेमाल कर रहे हो, छत्तीसगढ़ी हमारी राजभाषा है। यह एक डिवाइसिव, फूट डालने वाली स्थिति है, जिससे हमें बचना होगा। मतलब हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये बोलियाँ हिन्दी के लिए खाद भी बनें और हिन्दी का नुकसान भी न करें। हमारा विश्वविद्यालय चूँकि हिन्दी का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है, इसलिए इस दिशा में निश्चित ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। हमलोग फरवरी-मार्च में बोलियों को लेकर एक सम्मेलन करने जा रहे हैं। हिन्दी का लोक बहुत समृद्ध है, कई अर्थों में बहुत प्रगतिशील है। अगर आप देखें तो पूरी दुनिया में इतनी विविधता लिए हुए लोक दिखलाई नहीं देगा। हमें इस प्रवृत्ति पर नज़र रखनी पड़ेगी कि वो लोक आगे जाकर नुकसान न करे, यह खाद का काम करे न कि विषबेन बन जाय।

शैलेश भारतवासी- यह तो हमारी बोलियों की बात है। दक्षिण भारतीय जो गैर हिन्दी भाषी हैं, हालाँकि हिन्दी को वे सम्पूर्ण भारत की भाषा के तौर पर देखते हैं, लेकिन उनकी शिकायत रहती है कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, चलो हम इसे सीख लेते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी हमारी भाषा को नहीं सीखते। क्या विश्वविद्यालय कोई इस तरह का कार्यक्रम चलाया रहा है जिससे गैरहिन्दी भाषा को सीखने पर प्रोत्साहन मिले?

वी एन राय- देखिए यह तो सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। यह बात आपने बिल्कुल सही कही कि त्रिभाषा कार्यक्रम को लेकर सबसे अधिक बेईमानी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही हुई। हम यह तो चाहते थे कि जो अहिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, वहाँ तो शुरू से बच्चे हिन्दी पढ़े, लेकिन जब हमारे यहाँ तीसरी भाषा की बात आई तो हमने संस्कृत को डाल दिया जो किसी भी जनसमूह की भाषा नहीं थी। हमें कोई जीवित भाषा सीखनी चाहिए थी। लेकिन विश्वविद्यालय का तो बहुत सीमित दायरा होता है। हम तो सरकार से बस अपील कर सकते हैं।