Thursday, April 15, 2010

हिंदी में क्यों नहीं होते बेस्टसेलर

हिन्दीबाजी-4
~अभिषेक कश्यप*


भाग-3 से आगे॰॰॰॰

इधर मैंने अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित कई बेस्टसेलर पढ़े। इनमें से ज्यादातर सेल्फ-हेल्प पुस्तकें थीं, जिन्हें भोपाल के मंजूल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है। पहली बार साल २००३ में मैंने नेपोलियन हिल की ‘थिंक एंड ग्रो रिच’ (हिंदी अनुवाद: सोचिए और अमीर बनिए) पढ़ी और तभी से मुझे ऐसी किताबों का चस्का लग गया। कुछ वैचारिक असहमतियों के बावजूद इनमें से ज्यादातर किताबों ने आइडिया, सहज भाषा-शैली और पाठकों को मुरीद बनाने के अपने कौशल की वजह से मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्र्षित किया। पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में अपने विलक्षण योगदान के लिए जाने जानेवाले अरविंद कुमार ने भी कुछ साल पहले अपना प्रकाशन शुरू किया है-‘अरविंद कुमार पब्लिशर्स।’ इस प्रकाशन के जरिए वे नए-नए विषयों की बेहद सुंदर, उपयोगी और पठनीय पुस्तकें किफायती दाम पर पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। मगर अफसोस कि मंजूल, अरविंद कुमार पब्लिशर्स और ऐसे ऊंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद प्रकाशक पेशेगत विश्वसनीयता को बरकरार रखते हुए हिंदी में लीक से हटकर जो किताबें छाप रहे हैं, वह सब अंग्रेजी भाषा की बेस्टसेलर हैं। हिंदी में आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित इन किताबों के आवरण पर खासतौर से यह सूचना दर्ज होती है कि दुनिया भर में इस खास पुस्तक की कई लाख प्रतियां बिक चुकी हैं और यूरोप व अमेरिका के अखबारों ने इसकी प्रशंसा में ये शब्द कहे हैं। कवर पर दी गई ऐसी सूचनाएं किताब के प्रति पाठकों में उत्सूकता जगाती हैं और किताब की बिक्री का सकारात्मक माहौल तैयार करती हैं।
सवाल यह उठता है कि ऐसी किताबें हिंदी में क्यों नहीं लिखी जातीं जबकि इन किताबों का हिंदी में एक बड़ा पाठक वर्ग मौजूद है। यकीन न हो तो अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स के हिंदी संस्करण छापने वाले प्रकाशकों के आंकड़ों पर गौर करें। मंजूल पब्लिशिंग हाउस किसी भी पुस्तक के १० हजार से कम के संस्करण नहीं छापता। और इनमें से कई पुस्तकों के वह साल भर में कई संस्करण छाप कर बेच लेता है। कुछ साल पहले मंजूल ने जे.के. राउलिंग की हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तक ‘हैरी पॉटर : एन आर्डर ऑफ फीनिक्स’ की हिंदी में एक लाख प्रतियां छापी जो महीने भर में बिक गई। इसके बरक्स कहानियां-कविताएं छापनेवाले हिंदी के परंपरागत प्रकाशकों के प्रकाशन के आंकड़ों पर गौर करें तो मन खिन्न हो जाएगा। हिंदी साहित्य के परंपरागत प्रकाशकों का सरकारी खरीद और पुस्तकालयों के प्रति प्रेम जगजाहिर है। और हमारे लेखकों-बुद्धिजीवियों का तो कहना ही क्या! वे तो जैसे-तैसे किताब छप जाए उसी में खुद को धन्य मानते हैं। प्रकाशक पर पेशेगत विश्वसनीयता के लिए दबाव बनाना तो दूर, ज्यादातर लेखक तो अपनी रॉयल्टी मांगने में भी संकोच करते हैं। शायद इसलिए हिंदी साहित्य का बड़ा-से-बड़ा प्रकाशक पहला संस्करण 500 प्रतियों का छापता है और अधिकांश किताबों का तो पहला संस्करण ही नहीं बिक पाता कि दूसरे की नौबत आए।
खैर, मैं फिर अपने बुनियादी सवाल पर आता हूँ- हिंदी में बेस्टसेलर की परंपरा क्यों नहीं है? इसकी कई वजहें खोजी जा सकती हैं मगर एक सीधी और साफ वजह यह समझ आती है कि हमारे लेखकों के पास नए विचारों का अभाव है या फिर सृजन से ऊपर वे प्रक्रिया के महत्व पर गौर नहीं करते। शायद इसलिए श्रमसाध्य लेखन की संस्कृति विकसित नहीं हो पायी, जहां नए विचार हों और जो पाठकों को लुभाए भी।

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2 बैठकबाजों का कहना है :

Sachi का कहना है कि -

पहले हिन्दी में बेस्ट सेलर होते थे| शुरू शुरू में, दिनकर, निराला, प्रेमचंद, नागार्जुन, आदि हुए,फिर बाद में विमल मित्र, मन्नू भण्डारी, निर्मल वर्मा, जैसे लेखक आए, तो उसके बाद पाकेट बुक्स का जमाना आया| सुरेन्द्र मोहन पाठक, तथा और भी कई उपन्यासकार आए| जब से टीवी की संस्कृति शुरू हुई, तो लोगों ने टीवी देखने की आदत बना ली| आज भी राजेंद्र यादव बिकते हैं|

अब जबसे हम चाह रहे हैं कि हमारी अंग्रेज़ी सुधरे और हम अच्छी अंग्रेज़ी बोलें, तो हमने अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ने की आदत डाली| अंग्रेज़ी किताबों पर बात करना फैशन हो गया है| इसी आधार पर अधिकांश इन्ही अधकचरे उपन्यास का घटिया हिन्दी अनुवाद होता है| हमारी मानसिक गुलामी भी तो बढ़ती जा रही है|

फिर भी कई ऐसे लोग हैं, हैं जो कई विदेशी भाषाओं से श्रेष्ठ हिन्दी अनुवाद को प्रस्तुत करते हैं, और वे बिकती भी हैं|

प्रकाशक भी कोई रिस्क लेना नहीं चाहता| वह भी मुनाफा कमाने के लिए बैठा है| एक नए लेखक को स्थापित करने के बजाय अनुवाद का धंधा कहीं बेहतर है|

Suprem का कहना है कि -

sachhai yeh hai ki hindi me kabhi bhi bestsellers nahin hue. Hindi bhasha kabhi bhi us saambrant warg ki bhasha rahi hi nhain jo naye vichar utpann karte hain ya fi unke janne sochne ke vishay me vaasta rakhte hain. hindi sahitya jan samanya ki or hai jo sat sau rupaye ki kitab le kar nahin padh sakta. isiliye aap payenge ki hindi ka sahitya bhi thaka hua, frustrated aur samajj par chot karta hua, tane kasta hua ya pareshaniyon se grasit hota hai. Is sahitya ka promotion bhi wahi karega jo pareshaniyon se grasit ho aur jo pareshaniyon se grasit hoga wo sahitya nahin khareedga, apnee rosy aur apnee roji-roti ka jugad karega. How many of you have seen affluent literature in Hindi? Mujhe to nahin yaad, hindi ka nayak humesha pareshan, naukri ki talash me, pyar samman aur dhan ke abhav me raha hai. To na to humara hindi ka nayak khush hai to use jo janta chahegee wo bhi humare nayak ki ratah nakhush hai aur jab nakhush hai to khareede kaise. ye ek kuchakra hai.
doosra Sex aur tamam taraj ke manviye sambandh jo samaj me prachlit hai par use hindi likhne me katrati hai aur humari soch bhee aisee hai ki aise sahitya ko hum nimn ya cheap ki shreni me dal dete hain. Koi likhe to bhi use sasi okpriyata ke nam se aap ke so called aalochak mar dalte hain.
teesra hindi me contemorary writing ka abhav hai, fiction jyada hai aur wo bhi kitabi fiction. Boodhi ma beemar baap aur kul mil ake hindi kabhi premchand yug se bahar nikal hi nahin payee ..chake jitna aap nayee kahanee ayr nayee kavita ki baat karein sachhai ye hai ki hume hindi me dukh padne ki aadat hai .. rahasya romanch aur romance hindi me milta nahin to kaise banegee best seller?

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