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Monday, July 19, 2010

हिमानी के हसीन सपने : जाति बिना समाज

जीने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है
पानी या शराब?
रोटी या कबाब?
पैसा या व्यापार?
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जाति या समाज
?

नही जानती कि जाति के मामले में मेरी जानकारी का स्तर क्या है? मैंने वर्णव्यवस्था को कितना समझा है? मैं समाज के विभिन्न धर्मो और वर्गो के बारे में कितना जानती हूं? लेकिन इसके बावजूद भी ये सब कुछ ठीक से न समझने को कहीं न कहीं मैं अपना सौभाग्य मानती हूं। ये आधा-अधूरा ज्ञान मुझे पूरा हक देता है हर किसी से बात करने का, हर किसी के साथ खाना खाने का और वो सब कुछ करने का जो समाज में रहते हुए आम व्यवहार में हम एक दूसरे के साथ करते हैं। काश कि कोई भी न जानता होता इस वर्ण व्यवस्था के बारे में । इस बारे में कि फलाना इंसान दलित है और फलाना ऊंची जाति का है। ये एक निरी कल्पना है जिसका साकार होना निरा मुश्किल भी है। लेकिन जाति के नाम पर जो कुछ समाज में होता आया है और हो रहा है उसकी कल्पना करना भी तो निहायत कठिन है। हाल की ही खबर है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज में मिड डे मील में दलित महिला के खाना बनाने को लेकर वहां के लोगों ने हंगामा किया। और अब फिर वही सवाल कि जीने के लिए जाति ज्यादा जरुरी है या बराबरी का समाज। ये जात वो बिरादरी। इसके साथ खाना ,उसके साथ मत घूमना। इसका जूठा मत खाना, उसके बर्तन भी मत छूना। अपने आस-पास के लोगों से हर वक्त इस तरह की दूरियां बनाने में न जाने कितना दिमाग और वक्त खर्च कर देते हैं लोग। कहने को भारतीय संस्कृति बहुत कुछ है लेकिन दूसरा सच ये है कि आज हम सभ्यता के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां जाति गालियों में शुमार एक ऐसा दस्तावेज है जिसकी परतें जब खुलती हैं तो इंसान का अस्तित्व ही मैला नजर आता है। अबे चमार कहीं के, अरे वो तो ब्राहम्ण कुल का है। जाति सूचक ये शब्द इस तरह इंसान का दर्जा तय कर देते हैं कि एक तबका तो जाति के बोझ तले ही दब जाता है और दूसरा जाति की छत्रछाया में अपने महल बना लेता है। छठवीं शताब्दी में उपजी समूह व्यवस्था ने जाति को सामाजिक संरचना से लेकर आर्थिक और राजनीतिक हर स्तर पर एक मुख्य पहचान और पुख्ता हथियार बना दिया। परिणाम हमारे सामने है- अनेकता में एकता वाला भारत टूट रहा है और बिखर रहा है। एक इमारत में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों से लेकर एक प्रदेश में जीवन-यापन करने वाले अलग-अलग जातियों के लोगों में आपस में दिली तौर पर इतनी दूरियां पैदा कर दी गई हैं कि लोग अपनी जाति पर आधारित एक अलग प्रदेश चाहते हैं। समाज में पैठी ये दूरियां सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी एक हथियार बन चुकी हैं। जाति बनाने वाले बनाकर चले गए शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि आने वाली पीढिय़ां इस बनावट को इतनी शिद्दत से निभाएंगी। लेकिन अब इस पीढ़ी को ये प्रथा तोडऩी होगी, बरसों पुरानी शिद्दत को तिलांजलि देनी होगी, छोडऩा होगा एक ऐसे बंधन को जो सिर्फ एक हथकड़ी है हमारे और आपके बीच में। छठवी शताब्दी की शुरूआत को भूलकर एक ऐसा प्रारंभ इक्कीसवी सदी में करना होगा जिससे ये सारे भेद मिट जाए। जाति का वो पिरामिड जिसमें सबसे ऊपर के माले पर ब्राहम्ण का सिंहासन है और दलित की झोपड़ी जमीन में धंसी हुई है, उस पिरामिड की व्यवस्था और विचारधारा को बदलना बहुत जरुरी है।
ये सब लिख्रते हुए मैं इस बात से भी पूरा सरोकार रखती हूं कि भारतीय समाज की व्यवस्था में जाति गहरे पैठी हुई है इसका त्याग करना इतना आसान नही होगा उन लोगों के लिए जिन्होंने तथाकथित नीच जाति के लोगों से कभी बात करना भी गंवारा नहीं किया लेकिन अगर वही लोग घर में भात की जगह मैगी को दे सकते हैं तो विचारधारा का ये बदलाव भी लाजंमी है जिससे जिंदगी की वास्तविक नफासत वापस आ सकती है।

हिमानी दीवान

Saturday, July 10, 2010

आओ कुछ देर के लिए नास्तिक हो जाएं...

ऐसा अक्सर होता है कि मैं जब कहता हूं ‘मैं नास्तिक हूँ’ तो लोग कहते हैं तुम निराश हो इसीलिये ऐसी बात कर रहे हो। उनके अनुसार सिर्फ असफल और निराश व्यक्ति ही नास्तिक होता है। नास्तिक होने को किसी मुम्बईया फिल्म की तर्ज़ पर भगवान से गुस्सा हो जाने की तरह लिया जाता है और माना जाता है कि अंत में व्यक्ति को भगवान के पास आना ही होगा। नास्तिकता भगवान के प्रति किसी तरह के गुस्से से नहीं बल्कि एक बहुत लम्बी विचार-प्रक्रिया तथा तर्क पर आधारित होती है। यह असफलता या निराशा से नहीं बल्कि अपने दम पर सफल हो सकने के विश्वास से पैदा होती है। अगर आप नास्तिक हैं तो आप शत-प्रतिशत प्रयास करेंगे ना कि किसी आस्तिक की तरह आधा-अधूरा काम करके भगवान से उम्मीद करेंगे कि वो साथ दे। आस्तिक लोग असफल होने पर भगवान को दोष दे सकते हैं मगर नास्तिक कहता है कि मेरे प्रयास में कमी थी क्योंकि उसके लिये किस्मत कुछ नहीं होती। सब कुछ सिर्फ कर्म और कर्म ही होते हैं।
भगवान इंसान द्वारा ही बनाया हुआ हैं। हम जिन सवालों का उत्तर नहीं जानते उन्हे भगवान पर छोड देते हैं। इसी तरह धर्म भी इंसान ने ही खुद को बांधे रखने और डराने के लिये बनाया है। धर्म की बात इसीलिये कर रहा हूं क्योंकि धर्म और भगवान एक दूसरे से जुडे हुए हैं अगर धर्म इंसान ने बनाया है तो ईश्वर भी इंसान ने ही बनाया है। आप ध्यान से सोचेंगे तो हमारी हर धार्मिक प्रथा के पीछे एक वैज्ञानिक कारण पायेंगे।
एक उदाहरण देता हूं - हम कहते हैं कि बारिश के समय देव सो जाते है इसीलिये शादी-ब्याह नहीं किये जा सकते। जब देवउठनी-ग्यारस पर देव उठते हैं तब शुभ कार्य शुरु होते हैं। जब हमारा धर्म बनाया गया तब आवागमन के साधन नहीं थे। बारिश के समय में जब नदी-नाले पूर होते थे, रास्ते बन्द हो जाते थे और लोग एक दूसरे से सम्पर्क भी नहीं कर पाते थे ऐसी स्थिति में कोई विवाह सम्बन्ध होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। इसीलिये कहा गया कि देव सो गये है और यह एक नियम बना दिया गया। चूंकि हर समय हर बात को तर्क की सहायता से नहीं समझाया जा सकता है इसीलिये भगवान का डर बता दिया गया और यह निश्चित हो गया कि अमुक समय में कोई शादी नहीं होगी। धर्म इंसान को नियमों में बांधने के लिये बनाया गया। ऐसे नियम जिनके अनुसार चलने पर जीने में सहूलियत हो। अगर नियम होते हैं तो उनके टूटने का खतरा भी होता है। लोग नियमों को ना तोडें यानि धर्म पर चलें इसके लिये कोई डर बताया जाना आवश्यक था इसीलिये भगवान को जन्म दिया गया परंतु समय के साथ जब नियमों में कोई बदलाव नही होता तो वो अप्रासंगिक हो जाते हैं जैसा कि आज हो रहा है।
वास्तव में भगवान का जन्म ही दुर्बलता से हुआ है। यह उन लोगो के लिये है जो कमज़ोर और भीरू हैं। अगर आप स्वयं अच्छा और बुरा समझते हैं; सही और गलत में भेद कर सकते हैं तो आपको भगवान की कोई ज़रूरत नहीं। अपनी यह बात एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूँ। जब बच्चा छोटा होता है तो उसे सुलाने के लिये माँ कहती है कि बेटा सो जा वरना बाबा आ जायेगा तो बच्चा बाबा के डर से सो जाता है। यहां स्वघोषित मां धर्म है बेटा आस्तिक और बाबा है ईश्वर जो वास्तव में है ही नहीं। हालांकि माँ बेटे के भले के लिये उसे सुला रही है पर गलत तरीके से। अगर बेटा समझदार है तो उसे बाबा से डराने की क्या ज़रूरत ? कुछ ऐसी ही नास्तिकता है।
नास्तिकता तर्क पर आधारित है, आस्तिकता की तरह झूठी श्रद्धा और विश्वास पर नहीं। आस्तिक स्वयं कहते है कि "भगवान आस्था का भूखा है"। वास्तव में भगवान आस्था का भूखा नहीं बल्कि उसका अस्तित्व ही आस्था से है। भगवान आस्था के बिना कुछ नहीं। तभी तो सारे चमत्कार और यहां तक की दुआयें भी विश्वास ना होने पर असर नहीं करती। आस्तिक जिसे भगवान की शक्ति कहते हैं वो वास्तव में विश्वास की शक्ति होती है परंतु नास्तिक किसी भगवान नाम की स्वनिर्मित संस्था में विश्वास करने की बजाय खुद में विश्वास करना पसंद करते हैं। आस्तिक कायर होता है जिसे अपने साथ भगवान का साथ चाहिए होता है। मुश्किल पलों का सामना करने में उसे डर लगता है। ऐसी स्थिति मे भगवान उसे एक मनोवैज्ञानिक आधार देता है जिससे प्रार्थना करके उसे थोडी राहत मिलती है। नास्तिक भगवान को नहीं मानता इसीलिये खुद ही लडता है चाहे वक़्त कैसा भी हो ।
अब एक बार फिर से सोचिये। जो नहीं मानता उसके लिये भगवान कुछ नहीं है और जो मानता है उसके लिये भगवान सब कुछ है इसका मतलब हुआ कि भगवान इतना कमज़ोर है कि वो सिर्फ मानने से ही ज़िन्दा है तब तो यह महज़ भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं!
आखिरी में एक बात फिर कहूंगा कि नास्तिकता निराशा का नहीं बल्कि खुद और सिर्फ खुद पर विश्वास का नाम है। अगर सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर आप खुले दिमाग से सोचेंगे तो शायद नवीन सागर की इस पंक्ति का मतलब समझ पायेंगे।
“जिसका कोई नहीं है उसका भगवान है... क्योंकि भगवान कोई नहीं है"
जो इतना कहने के बाद भी समझ नहीं पा रहे तो मतलब साफ है कि वो समझना चाहते नहीं है। वैसे भी उनके अनुसार भगवान तो विश्वास का नाम है तो ऐसी स्थिति में तर्क क्या कर सकता है। अगर नास्तिकता को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको इस विश्वास से मुक्त होना होगा; इस पर सन्देह करना होगा, इससे सवाल करने होंगे. और खुद ही सत्य खोजना होगा।

विपुल शुक्ला
39, प्रगति नगर, इन्दौर
मो.- 9907728575


(विपुल हिंदयुग्म के बुनियादी सदस्यों में से हैं...पढाई और नौकरी के फेर में हिंदयुग्म पर आवाजाही घटती-बढ़ती रही, मगर इंदौर में हिंदयुग्म के बैनर तले हमेशा आयोजन करवाते रहे...उम्र छोटी है पर नास्तिक होने के लिए बड़ा होना भी कोई शर्त नहीं)

Monday, August 24, 2009

हिन्दुत्व शब्द ही साम्प्रदायिक हो गया है

पंथ, धर्म व रिलीजन

इस देश में एक बहुत ही ज्वलंत मुद्दा है धर्म। हमारा देश सेक्युलर है। हम एक हैं। और न जाने ऐसे कितने ही झूठे वादे हम अपने आपसे व विदेश में करते रहते हैं। पर अभी उस झूठ पर बात नहीं करेंगे। इस विश्व में जितने भी धर्म या यूँ कहूँ कि पंथ स्थापित हुए हैं वे सभी किसी न किसी व्यक्ति विशेष द्वारा ही शुरु किये गये। चाहें इस्लाम लें, जिसका पालन करने वाले पैगम्बर मोहम्मद के अनुयायी हुए। चाहें ईसा मसीह के अनुयायी हों, जिन्हें हम ईसाई कहते हैं। और चाहें ही बौद्ध धर्म व सिख धर्म या अन्य कोई भी धर्म हुआ हो उसकी उत्पत्ति किसी न कैसी महापुरुष ने ही की है। इसमें किसी को भी संशय नहीं होना चाहिये। धर्म संस्कृत की "धृ" धातु से बना शब्द है जिसका अर्थ होता है-धारण करना अथवा पालन करना। ऊपर के सभी धर्म (?) इंसान के बनाये हुए हैं। दूसरी तरफ़ पिता धर्म, पुत्र धर्म, शिष्य-गुरु का धर्म और हर रिश्ते का अपना धर्म होता है जिसका हम पालन करते हैं जो ईश्वर ने बनाये हैं।

इसी तरह एक और धर्म है हिन्दू धर्म। पर इस धर्म को मानने वाले किसके अनुयायी हैं? इस शब्द को लेकर तो साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हैं। हिन्दुत्व शब्द ही साम्प्रदायिक हो गया है। ज्ञात हो कि हिन्दू उन लोगों को कहा गया जो सिन्धु नदी के किनारे रहा करते थे। वे किसके अनुयायी हैं, किस भगवान को मानते हैं, मानते हैं भी या नहीं, आस्तिक हैं या नास्तिक, हवन करते हैं या नहीं... इन सभी प्रश्नों से उस समय भारतवर्ष में रहने वाले हिन्दुओं का कोई लेनादेना नहीं था। वे कुछ भी हों, कहलाये गये हिन्दू ही। यानि उस समय के लोग जो आचरण, व्यवहार किया करते थे वो हिन्दू रीति रिवाज़ों में शामिल हो गया। कोई शैव हुए कोई वैष्णव। कोई वेदों को मानने हुए तो कोई नास्तिक हुए। सभी हिन्दू कहलाये गये और उनके वंशज भी। वे स्वयं को आर्य कहते थे। संस्कृत में आर्य शब्द का अर्थ है "भद्र पुरुष"। बाद में बाहर से मुगल व अंग्रेज़ आये जो साथ में इस्लाम व ईसाई धर्म लाये। कुछ धर्म भारत की भूमि से निकले जैसे बौद्ध, जैन, सिख व अन्य। लेकिन क्या हिन्दू कोई धर्म बन सकता है? और क्या ये अन्य धर्मों की तरह ही उत्पन्न हुआ? शायद नहीं..

अभी हाल ही में किसी न्यूज़ चैनल पर खबर देख रहा था-अमरीका में २४ फीसदी हिन्दू। इसका अर्थ ये कतई नहीं लगाइयेगा कि उन सब ने ईसा मसीह को मानना बंद कर दिया या वे चर्च नहीं जाते। वे मानते हैं लेकिन हिन्दू रीति रिवाज़ मनाते हुए। मसलन हवन आदि करते हैं। राम व कृष्ण को मानते हैं। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि काफी लोग अब हिन्दू रिवाज़ों से ही अंतिम संस्कार करते हैं।

लखनऊ में जारी एक शोध से पता चला है कि यज्ञ करने से हवा में फैले विषाणु खत्म हो जाते हैं व वायु को स्वच्छ रखने में सहायक होता है। सप्ताह में एक बार या महीने में एक बार हवन करने से भी फ़ायद होता है। हवन में प्रयोग होने वाली सामग्री को वैज्ञानिक दृष्टि से जाँचा गया तो ये बात सामने आई है। इसका उल्लेख कईं किताबों में होता आया है किन्तु अब वैज्ञानिकों ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी है। हजारों वर्षों से इस धरती पर रहने वाले लोग मंत्रों का प्रयोग करते आये हैं। विज्ञान से ये साबित हो चुका है कि मंत्रोच्चारण में जिन शब्दों का प्रयोग होता है उससे निकलने वाली ध्वनि व गले में हो रहे स्पंदन से ऊर्जा का संचार होता है। हिन्दू रिवाज़ों के अनुसार दिया जलाने व त्राटक करने का भी वैज्ञानिक आधार मौजूद है।

हिन्दुत्व या हिन्दुइज़्म कई मायनों में अलग हुआ। यहाँ निराकार भी पूजा जाता है और साकार भी। हिन्दू धर्म में कोई एक विशेष पुस्तक ही एकमात्र ग्रंथ नहीं है। अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार पुस्तकें हैं। कोई एक स्थापक नहीं। शायद हम पंथ शब्द को भूल गये हैं। धर्म का अंग्रेज़ी में अनुवाद करेंगे तो आप कहेंगे "रिलीजन"। अंग्रेज़ी में यही कहते है धर्म को..'रिलीजन शब्द लैटिन के 'री लीगारे' से आता है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'बाँधना' होता है। यहाँ इसका एक अर्थ मानव को ईश्वर से "जोड़ने" को लेकर किया जा सकता है। लेकिन अंग्रेजी के 'रिलीजन' शब्द का संस्कृत पर्यायवाची धर्म कतई नहीं हो सकता शायद धर्म को किसी और भाषा में समझना या अनुवाद करना कठिन है। पर इतना पक्का है कि हम "धर्म" को नहीं समझ पाये। हिन्दू शब्द उस परिभाषित "धर्म" की श्रेणी में नहीं आता जिसको आज का समाज जानता है। ये जीवन जीने के पद्धति है।

तपन शर्मा

Wednesday, July 29, 2009

संग हो बच्चा, दर्शन हो अच्छा



भारतवर्ष एक ऐसा देश है जहाँ हर चीज का जुगाड़ है. कालेज में दाखिला हो, राजनीति में प्रवेश, रेल में सीट हो या फिर नौकरी हो हर जगह जुगाड़ चलता है. यही नही अब भगवान के दर्शन के लिये भी जुगाड़ चल गया है. यह रीति तो हमेशा से ही रही है कि नियम बनते ही उसका तोड़ ढ़ूँढ लिया जाता है. इसका एक ताजा उदाहरण समाचार पत्र में पढ़ा तो रहा नही गया. सोचा क्यो न औरों को भी अवगत करा दूँ ताकि अन्य भी इसका लाभ उठा सकें.

आइये मैं आपको तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिये एक जुगाड़ बताती हूँ. जरा ध्यान से पढ़ियेगा. अगर आप तिरुपति बालाजी के दर्शन कम समय में करना चाहते हें तो एक बच्चा किराये पर लीजिये और आपको दर्शन फटाफट हो जायेंगे. अब आप सोचेंगे कि ये क्या बात हुई भला, तो मैं आपको समझाती हूँ. तिरुमुला तिरुपति देवस्थानम का मानना है कि जो महिलायें भीड़ में बच्चों को लेकर घंटों खड़ी रहती हैं उन्हें बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है. अत:तिरुमुला तिरुपति देवस्थानम द्वारा महिलाओं को सुविधा प्रदान की गयी है. अब वो महिलायें लंबी लाइन में लगने के बजाय अलग से कम समय में दर्शन कर सकेंगी. क्योंकि उनके पति भी साथ होगें तो उन्हें भी इस सुविधा का लाभ मिलेगा. इसका मतलब यह हुआ कि शादीशुदा जोड़े के साथ अगर बच्चा है तो उन्हें इस सुविधा का लाभ मिलेगा.

यह पढ़कर शायद कुछ लोगों के मन में प्रश्न उठ रहा होगा, कि इसमें हमारा क्या फायदा ? हम तो शादीशुदा नही है या शादीशुदा हैं तो बच्चा नहीं है. यह जुगाड़ हमारे किस काम का ? अरे भई मैंने कहा न कि ध्यान से पूरा पढ़िये. अब आपके काम की बात. जैसे ही यह नियम बना तो नियम का तोड़ ढूँढने वालों ने एक जुगाड़ बना लिया है, वो ये कि जिनके पास बच्चा नहीं है वो लोग उन्हें किराये पर बच्चा देते हैं. बच्चे का किराया एक घंटे के लिये २०० रुपये है और अगर डिमान्ड ज्यादा है तो ५०० रुपये तक कीमत वसूली जाती है. अब कहिये है न काम की बात. जो लोग शादीशुदा नहीं है उन्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा. या तो वो लोग शादी कर लें या फिर हो सकता है जल्द ही पति-पत्नी भी किराये पर मिलने लगे.

दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'