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Monday, August 17, 2009

किंग खान पर हंगामा है क्यूं बरपा ?

फौजिया रियाज़ दिल्ली के एफएम रेनबो में रेडियो जॉकी हैं.......बैठक पर इनका ये पहला लेख है....आप पढ़कर बताएं कि बैठक की ये नई सदस्य कैसा लिखती हैं....



हाल ही में अमेरिका के एक एयरपोर्ट पर शाहरुख़ खान "द सुपर स्टार" के साथ दो घंटों तक पूछताछ चली। इस पर इस कदर हंगामा बरपा कि भारतियों की इज्ज़त से खिलवाड़ हो रहा है और भी न जाने क्या क्या...कई लोगों का कहना है कि ये भारतीयों के साथ ज़्यादा होता है, मुसलमान के साथ ज़्यादा होता है,अमेरिका एक रेसिस्ट देश है, वहां नाम देख कर पूछताछ की जाती है, साथ ही कि ये हमारे मान की बात है, हमे भी अमेरिकियों से इसी तरह पेश आना चाहिए...या रब! हद हो गई!! हम ख़ुद कितने रेसिस्ट हैं, दोगले हैं, इसका एहसास ही नही है, ख़ुद हमारे यहाँ हर दाढ़ी वाले को शक की नज़र से देखा जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ नॉर्थ ईस्टर्न लोगों को अपना नही समझा जाता, ख़ुद हमारे यहाँ विदेशी पर्यटकों को तंग किया जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ लोगों को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है...इतना हल्ला किसलिए क्यूँकि वो शाहरुख़ खान है? न जाने कितने कश्मीरी नौजवानों के सर पर आतंकवादी का लेबल लगा कर मार दिया जाता है, न जाने कितने मुसलमान नौजवानों को कॉलेज में एडमिशन के दौरान तिरछी नज़रों से देखा जाता है, न जाने कितने गरीब मासूम लोगों को माओवादी बताकर एनकाउंटर किया जाता है...तब कोई उफ़ भी नही करता, अपने देश में होता है तो सब चुप्पी साध लेते हैं और गैर मुल्क में हुआ तो हाय तौबा...क्यूँ? माना जो हुआ वो ग़लत हुआ लेकिन उससे ज़्यादा ग़लत तो पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के साथ हुआ...लेकिन तब न्यूज़ चैनल वाले ही चिल्लाये थे, अभी आम इंसान को भी चिल्लाता देख रही हूँ...अरे ज़्यादा जोश में आने की ज़रूरत नही है..इनका कोई भरोसा नही कल को इमरान हाश्मी की तरह कह देंगे "मेरे साथ कोई बदसलूकी नही हुई,मेरे बयां को तोड़-मरोड़ के पेश किया गया था"

फौजिया रियाज़

Tuesday, June 16, 2009

कोई हिंदुस्तानियों को भी आईना दिखाए....




एक मशहूर कहावत है-जिनके घर शीशे के होते हैं वे दूसरे के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते। लेकिन हम भारतीय अनूठे हैं। हम अपनी ही कही बात पर अमल नहीं करते। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमले पर भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही जगहों पर इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। नस्लभेदी हमलों पर हर कोई आगबबूला हो रहा है। हर ओर हड़कम्प मचा हुआ है।
पर मुझे लगता है कि हमें ऑस्ट्रेलिया को कुछ भी कहने का हक नहीं है। महाराष्ट्र में जब हिन्दी भाषियों पर हमले होते हैं तब हम कहाँ होते हैं? "मराठी मानुस" और हिन्दी भाषियों में लड़ाई है नौकरी की। हक की। एक आदमी दूसरे देश या राज्य में पैसा कमाने ज्यादा है इसका कारण होता है उसके खुद के देश में नौकरी व संसाधनों की कमी। या फिर और अधिक पैसा कमाने की लालसा उसे दूसरे देश ले जाती है। इसके अलावा और कोई कारण नहीं होता। आप और हम नहीं चाहेंगे कि बांग्लादेश से कोई गैरकानूनी रूप से आये और हमारा हक हमसे छीने। जब घर में ही दाल-रोटी के लाले पड़े हों तो दूसरे को निवाला कैसे दें? कमोबेश वही हाल विदेशियों का हैं। जब हम हिन्दुस्तान से लोग विदेश में गैरकानूनी तरीके से जा कर रहते हैं तब तो सरकार कुछ नहीं करती?
पूर्वांचल में बिहारियों को ट्रेन में पीटा जाता है, बुरा बर्ताव होता है तब कोई कुछ क्यों नहीं करता? शेष भारत के लोग कौन सा पूर्वोत्तर का ध्यान रखते हैं? हमारा मीडिया उन इलाकों को कितना कवर करता है? इसे मीडिया कौन सा "वाद" कहेगा? क्षेत्रवाद? जातिवाद? रंगभेद? आखिरी बार आपने नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम आदि की खबर कब सुनी या देखी थी? मुझे तो याद नहीं आ रहा। किस मुँह से किसी विदेशी पर आरोप लगायें जब हम खुद ही एक नहीं हैं? हाल ही में रूसी राजदूत ने कहा कि गोवा में रूसी पर्यटकों से ठीक वैसा ही व्यवहार होता है जैसा कि भारतीयों के साथ ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है। ये सुनकर क्या हमें शर्म नहीं आती? क्या भारत की सरकार इस पर चुप्पी साध लेगी?
दक्षिण भारतीय और हिन्दी भाषियों के बीच में मनमुटाव कुछ कम नहीं हैं। मेरे और मेरे एक मित्र के साथ चेन्नई में बुरा बर्ताव हो चुका है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग एक जैसे हैं पर असमाजिक तत्वों की कमी भी नहीं।
ये तो केवल क्षेत्र की बात करी है। हमारे देश में ऐसे अनगिनत वाद-विवाद मिल जायेंगे। गुर्जर और मीणा विवाद कैसे भूल सकते हैं? यूपी, राजस्थान और बिहार में न जाने ऐसे कितने ही वाद-विवाद रोज़ होते रहते हैं। उनपर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। जब हम स्वयं ही अपने लोगों से उसी तरह से पेश आते हैं जैसे कि ऑस्ट्रेलिया वाले तो हमें कुछ कहने का हक ही नहीं बनता। राज ठाकरे हमारे घर में है विदेश में नहीं। नस्लभेद टिप्पणियाँ कोई नई बात नहीं है। इस तरह के "भेद" हमारे घर में अधिक हैं। पर हम बेशर्म हो चुके हैं।
अपने एक मित्र संदीप के शब्दों में :
यह कहना ग़लत नही होगा की अगर कोई नस्लवाद/जातिवाद की प्रतियोगिता हो तो भारतीय प्रथम आयेंगे ये हमारे अन्दर कूट कूट के भरा हुआ है, वह तो शुक्र है कि भारत एक धनी देश नही है वरना बाकी और देशो के साथ बहुत ही बुरा बर्ताव करता देश से बाहर रह कर भारतीय नस्लवाद और भी स्पष्ट दिखता है वहाँ अगर कोई काला (अफ्रीकी) व्यक्ति दिख जाए तो भारतीय सबसे आगे होते हैं उसका मजाक उडाने में ये इस देश का दुर्भाग्य ही कह लीजिये कि जहाँ भगवान के नाम में भी काले रंग का वर्णन है, उस देश में fairness creams की बिक्री धड़ल्ले से होती है


निदा साहब ने शायद ऐसे ही मौके के लिए कहा है-


अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये,


घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये


तपन शर्मा