Saturday, May 02, 2009

सोने का पिंजर (अंतिम अध्याय)

तेरहवां अध्याय

अमेरिका का उत्तरी छोर, बर्फीली ठण्डी हवाएं चलना प्रारम्भ हो गयी हैं, कुछ ही दिनों में यहाँ बर्फ ही बर्फ होगी। तब किसी भी पक्षी का यहाँ रहना सम्भव नहीं होगा। पक्षियों के एक दल का नेता आकाश को निहार रहा है, बर्फ का गिरना महसूस कर रहा है। अब मुझे दक्षिण छोर की ओर चले जाना चाहिए, मन में चिन्तन चल रहा है। कहीं तो नवीन आशियाना तलाशना ही होगा! क्या हम इस बार सुदूर देश की यात्रा कर लें? मन में अचानक प्रश्न कौंध गया। भारत का नाम सुना था, क्या हम सात समुद्र पार कर भारत जा सकेंगे, मन में संशय बना हुआ था। बुजुर्ग और युवा पक्षियों से सलाह-मशविरा किया गया।
युवाओं ने कहा कि जब हमारा सैनिक, ईराक पर युद्ध कर सकता है तो क्या हम भारत में आश्रय की तलाश नहीं कर सकते? हम में भी हवाईजहाज जितनी ताकत है, उड़ने की।
अचानक सिकन्दर याद आ गया, उसने कैसे भारत पर चढ़ाई की थी? वह भी तो आज से दो हजार वर्ष से भी पूर्व समुद्र और रेगिस्तान को पार करता हुआ भारत पहुँचा था, तो फिर हम क्यों नही? हमारे यहाँ भी 500 वर्ष पूर्व यूरोप से कोलम्बस आया था।
प्रश्न पूर्ण हुए, उत्तर केवल एक ही था कि पक्षियों में असीमित शक्ति होती है और वे पूर्ण आकाश को नापने की क्षमता रखते हैं। बस फिर क्या था, दल को संकेत मिल गए, उड़ने को तैयार हो जाओ। संकेत मिलते ही सारा दल पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया। उन्हें कहाँ मनुष्यों की तरह सामान लादना था, बस उन्हें तो अपने दल के नेता के एक इशारे पर उड़ जाना था। वे सब उड़ चले, अपना लक्ष्य निर्धारित कर, अपनी मंजिल की ओर। युवा पक्षियों के मन में कौतुहल था, भारत को जानने की इच्छा थी, प्रश्न मन में कुलबुला रहे थे। आखिर पूछ ही लिया एक युवा पक्षी ने, कैसा है भारत?
प्रौढ़ पक्षियों के संक्षिप्त ज्ञान ने बाहर झाँकने की इच्छा जागृत की। वे बता रहे थे कि भारत एक प्राचीन देश हैं, वहाँ की जलवायु सभी प्रकृतिजन्य जीवों के अनुकूल हैं। वहाँ के पक्षियों को दूसरे देश की तलाश नहीं करनी होती। वहाँ के जंगल हरे-भरे हैं। बहुत प्रकार की वनस्पतियां वहाँ होती हैं। जंगलों में इतने फल होते हैं कि अधिकतर पक्षी वहाँ शाकाहारी हैं।
एक पक्षी ने प्रश्न कर लिया कि ये सब तुमको कैसे मालूम?
उसने कहा कि यहाँ चिड़ियाघर में भारत से पक्षी लाए जाते हैं। मुझे उनसे एकाध बार बात करने का अवसर मिला है।
फिर आपकी जानकारी ठीक ही होगी, वे सब खुश होकर बोले। यदि ऐसा अद्भुत देश हमारी धरती पर है तब तो उसे अवश्य देखना चाहिए।
सुना है कि वहाँ साइबेरिया आदि देशों से तो नियमित पक्षी जाते हैं। वो भारत से पास अवश्य हैं लेकिन हमारे हौंसले भी बुलन्द हैं। हम भी भारत की धरती को देखकर ही आएंगे। हमारे बच्चे भी हम पर गर्व करेंगे कि हमारे पूर्वज कभी भारत जाकर आए थे।
अब वे सब खुश होकर उड़ रहे थे और सम्वेत स्वरों में गा रहे थे।

एक पक्षी- जाना है उस देश जहाँ पंछी चहचाते
दूसरा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल मदमाते
तीसरा पक्षी- पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
चौथा पक्षी- जाना है उस देश जहाँ जंगल बौराते।

एक पक्षी- हमने सुना है भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
दूसरा पक्षी- हमने सुना है भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
तीसरा पक्षी- जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
चौथा पक्षी- जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना है उस देश जहाँ जंगल इठलाते।

कई समुद्र पार करते हुए, आखिर एक दिन उनकी निगाहें मंदिर के गुम्बज पर पड़ी, जहाँ कतारबद्ध पक्षी बैठे थे।
शहर आ गया, भारत भूमि आ गयी, खुशी की लहर छा गयी।
एक सुंदर सी झील में, छोटा सा एक टापू, उसमें अनेक पेड़ लगे थे, उन्होंने वहीं अपना डेरा डाल दिया। झील में मछलियां भी खूब थी, तो भोजन की समस्या भी हल हो गयी। कई महिने यहाँ गुजारने थे, घौंसले बनाने शुरू हुए, कई अन्य भारतीय पक्षी भी उनके स्वागत में आ जुटे। भूरे और कृष्ण वर्ण के भारतीय पक्षी, उनके धवल स्वच्छ रंग को देख-देखकर आर्किर्षत होते, उनके साथ रहने का अवसर तलाशते। यहाँ के युवा पक्षियों ने उनकी आवाभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहाँ के स्वादिष्ट फलों को चखाया, जंगल की गंध से परिचित कराया। वे कभी बड़ के पेड़ से, कभी गूलर से, कभी आम से, कभी अमरूद से, कभी जामुन के पेड़ से फल तोड़कर लाते और उन फलों से उनको परिचित कराते। वे सब मछलियों पर निर्भर थे, उन्होंने कभी भी ये फल नहीं देखे थे। मीठे, खट्टे, तीखे फल उन्हें अच्छे लगने लगे थे। वे सारे ही इतने भांत-भांत के पेड़ों को देखकर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कभी भी अपने जंगल में फलदार पेड़ देखे ही नहीं थे।
आखिर, एक दिन उनके वापस जाने का समय आ गया। भारत के कुछ पक्षियों ने उनसे निवेदन किया कि हम भी तुम्हारा देश देखना चाहते हैं, क्या हम तुम्हारे साथ चल सकते हैं? उन्होंने सहजता से स्वीकृति दे दी।
अमेरिकी पक्षियों के दल के पीछे-पीछे भारतीय दल मुक्त गगन में उड़ान भर रहा था। उनका मन बल्लियों उछल रहा था, वे बड़े खुश थे कि हम एक बेहद खूबसूरत देश को देखने जा रहे हैं। कुछ पक्षी कल्पना करते और सोचते कि क्यों न हम वहीं रह जाएं? हमारे यहाँ की गर्मी, पानी की समस्या से हमें निजात भी मिल जाएगी। सुना है कि वहाँ के जंगल बहुत विशाल हैं! वहाँ रेत के अंधड़ भी नहीं हैं।
लेकिन वहाँ बर्फिली आँधियां हैं।
अरे कौन सा हमें हमेशा के लिए वहाँ रहना है। फिर किसी का रहने को मन भी करेगा तो क्या हम वहाँ नहीं रह पाएंगे? वहाँ भी तो इतने पक्षी रहते हैं।
पक्षियों का दल उड़ रहा था, समुद्र की सीमा प्रारम्भ हुई। रात में विश्राम लेने के लिए एक पहाड़ी का सहारा लिया गया। अमेरिकी पक्षी समुद्र में गोता मारकर मछलियां पकड़ लाए। अब भारतीय पक्षियों के होश उड़ गए। वे मछली नहीं खाते, उनका भोजन तो फल होता था। पहाड़ के पेड़ों पर भी फल नहीं, आखिर समुद्री बेलों के फलों से ही जैसे-तैसे करके काम चलाया। लम्बी यात्रा और भोजन की समस्या उनके सामने मुँह-बाए खड़ी थी। रास्ते में शहर आने लगे और अब वे बगीचों से फल चुराने लगे, क्योंकि जंगल में ही उनका हक था और जंगल में फल नहीं थे। लम्बी थका देने वाली यात्रा, भूखे-प्यासे रहकर जैसे-तैसे कटी। सोचा अमेरिका पहुँचकर सब कुछ ठीक हो जाएगा।
आखिर एक दिन उनके सपनों का शहर अमेरिका आ ही गया। वहाँ बर्फ विदा ले चुकी थी, पेड़ों पर पीत पत्तियां, सुनहरी आभा का निर्माण कर रही थी। कहीं-कहीं कोपलें भी फूटने लगी थीं। आभास हो रहा था कि बसन्त शीघ्र ही हरितिमा को जन्म देगा। लम्बे रास्ते की थकान उनके चेहरों पर थी, भूख-प्यास से उनकी ताकत क्षीण हो गयी थी। लेकिन फिर यहाँ घने जंगलों को देखकर उनकी थकान फुर्र हो गयी और अपने छितराए जंगलों पर शर्म आने लगी। अमेरिकी पक्षी ने बताया कि बहुत जल्दी ही यहाँ हरीतिमा छा जाएगी, तब चारों तरफ केवल हरियाली होगी। तुम देखना हमारे यहाँ का जंगल, कितना विशाल है!
सभी ने पेड़ पर अपना ठिकाना बना लिया। अब भोजन की तलाश शुरू हुई। पेड़ों पर कहीं भी फल नहीं थे, एक पेड़ से दूसरे पेड़, एक जंगल से दूसरे जंगल जाते रहे, लेकिन खाने को कुछ नसीब नहीं हुआ। पत्तियां खाकर भला कितने दिन जिन्दा रहा जा सकता है? कभी चोरी-छिपे बगीचों में पहुँच जाते और वहाँ के फलों से अपना गुजारा चलाते। लेकिन वहाँ हमेशा खुद के ही शिकार होने का खतरा मंडराता रहता। एक दो बार मछली खाने का भी प्रयास किया, लेकिन भारतीय शरीर उन्हें पचा नहीं पाया। एक दिन जंगल में फलों की तलाश करते-करते उनकी आशा ने दम तोड़ दिया। आखिर समय से पहले ही उन्होंने वापस जाने का मन बना लिया।
वे आपस में बतिया रहे थे कि इतने घने जंगल, फिर भी एक भी फल नहीं! ऐसे जंगलों से तो हमारे जंगल ही अच्छे, जहाँ सारे पेड़ों पर ही फल लगा करते हैं। पंछी भी कितने कम है यहाँ, हमें भी अपने अस्तित्व का खतरा पैदा होता जा रहा है। बहेलिया यहाँ नहीं हैं, लेकिन शिकारी तो हैं, चिड़ियाघर तो हैं!
आज वे सब बहुत खुश थे, वापस जाने को कतारबद्ध खड़े थे। अपने दल के नेता के इशारे का इंतजार कर रहे थे। इशारा हुआ और वे उड़ चले भारत के आकाश की ओर। वे सब गा रहे थे, वही गीत, जो विदेशी पक्षियों ने बनाया था। एक-एक पक्षी अपने स्वर में गीत गा रहा था और एक लम्बी यात्रा पर इस उत्साह से उड़ा जा रहा था कि मैं अपने देश में वापस लौट रहा हूँ।

पक्षी गा रहे थे -
जाना अपने देश जहाँ हम मिलजुल गाते
जाना अपने देश जहाँ जंगल चहचाते
पेड़ जहाँ के फल से लदते, रस बिखराते
जाना अपने देश जहाँ जंगल मदमाते।

भारत में तो जंगल में भी आम लदा करते हैं
भारत में तो मरूधर में भी मोर नचा करते हैं
जाने कितने तोते, चिड़िया, बंदर, भालू,
हाथी, चीते, जंगल में सब ही रहते हैं
जंगल उनको खाना देता, रहना देता
जाना अपने देश जहाँ जंगल इठलाते।

भारत में तो जंगल में भी भँवर उड़ा करते हैं
भारत में तो पेड़ों से भी गंध बहा करती है
मद झरते, गदराए, बौराए पेड़ों से
उड़ते प्रतिपल, कण पराग के रहते हैं
देखो मधुमक्खी भी शहद बनाया करती
जाना अपने देश जहाँ जंगल बौराते।



नोट- हमें यह बताते हुए अत्यंत खुशी हो रही है कि डॉ॰ अजित गुप्ता की इस यात्रा-संस्मरण की यह शृंखला जल्द ही मुद्रित संस्करण के रूप में उपलब्ध होगी, जिसे हिन्द-युग्म अपने आने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम में लोकार्पित करेगा।

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4 बैठकबाजों का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

स्वागत है हर उस पंछी का,
जिसे चाहिए प्रेम.
जो अपने ही साथ मनाये,
औरों की भी क्षेम.
सोने का पिंजर तज आये,
माटी गले लगाने.
माटी का संसार बसने,
माटी में मिल जाने.

अजित जी! साधुवाद. कहते हैं 'बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता पर हम आपकी कलम के सहारे बिना अमरीका गए अमरीका देख आये. धन्यवाद आपको और युग्म को...

manu का कहना है कि -

अजित जी,,,
पंछियों को लेकर आज आपने बड़े कमाल से लगभग दम साध के लेख पढने पर मजबूर कर दिया,,,,
कुछ देर यूं लगा के जैसे हम ही उन पंछियों में से एक रहे हो,,,,,
बहुत सोचने को मजबूर करता लेख,,,
उस पर आचार्य की मोहक टिपण्णी,,,,वाह,,,

pooja का कहना है कि -

अजित जी,

आपके इस आलेख की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है, आपने विदेश का एक वास्तविक चित्र हम सब के सामने रख दिया है, और इस अंतिम अध्याय में तो पंछियों के माध्यम से मनुष्य को आईना दिखा दिया है. साधुवाद.

Dr. Smt. ajit gupta का कहना है कि -

सोने का पिंजर पढ़ने वालों को मेरा हार्दिक आभार। पुस्‍तक शीघ्र ही साहित्‍यागार, जयपुर से प्रकाशित हो रही है। आप सभी का स्‍नेह मुझे मिलता रहे इसी आशा और विश्‍वास के साथ ही लिखती रहूंगी। हिन्‍द युग्‍म और निखिल आनन्‍द जी का भी आभार।

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