Saturday, February 21, 2009

सोने का पिंजर (5)

नौ गज साड़ी लपेटने में क्यूँ करें वक्त बरबाद....

पाँचवा अध्याय

मैं भारत की धरती से हजारों मील दूर अमेरिका की उन्नत धरा पर आयी हुई हूँ। यहाँ लाखों भारतीय बसे हुए हैं, उनकी आँखों में कहीं न कहीं भारत का पानी छलकता दिखाई देता है। पूर्ण विकसित देश, मनुष्य के लिए सारे साधनों की भरमार, किसी भी गरीब देश के बाशिंदे को यहाँ आकर्षित कर खींच ही लाएगी। चारों तरफ मकानों की कतारें और धरती पर बिछी दूब, धूल और गुबार के लिए कहीं जगह नहीं। भारत में झाडू और फटका मारते हाथ यहाँ आकर महिने में एकाध बार वेक्यूम क्लीनर तक पहुँचते हैं। वहाँ हाथों की मेंहदी और चूड़ी, कपड़ों में साबुन लगाने में ही अपनी रंगत भूल जाती हैं, ऐसे में यहाँ तीन-चार दिन में एक बार, कपड़े धो-सुखाकर मशीन आपको दे देती है। खाने में भी इतनी खट-पट नहीं, सभी कुछ तो शोपिंग मॉल में उपलब्ध है। सारी बाते करते समय कपड़ों की बात भला कैसे भूल सकती हूँ, भारत में नौ गज साड़ी लपेटते-लपेटते और अपना तन ढकते हुए न जाने कितना समय बर्बाद हो जाता है, लेकिन यहाँ तन की इतनी चिन्ता नहीं है। ऐसा कुछ पहनो, जो आसान हो, कुछ भी ढकने का प्रयास मत करो, सभी का शरीर एक है। यदि आप की वसा जगह-जगह से लटक रही है तो क्या? दिखने दो, क्यों साड़ी की परतों में छिपाते हो? ऐसा जीवन, खुला जीवन, स्वच्छन्द जीवन, भला कौन नहीं चाहेगा? तो लाखों युवा अपनी टिकट कटाकर चले आते हैं, इस स्वर्ग जैसे देश में।
हमारा तन कुछ माँगता है और हमारा मन कुछ और। सारे साधनों को, सारे ऐश्वर्य को, हमारा मन दिखाना चाहता है, अपनों को, अपने देश में बसे अपने छूटे हुओं को। पराये देश में सबकुछ है लेकिन इतनी आजादी तो नहीं मिल सकती कि अपनों को भी यहाँ बसा लिया जाए। इस देश का ऐश्वर्य दिखाने की छूट है, यहाँ बसने की छूट नहीं। सारी चाहतों को समेटे, इस स्वर्ग जैसी धरती पर अपना आशियाना बसाने निकले लाखों युवा, मन की एक परत भारत में छोड़ आते हैं। हमारा तन भौतिक सुखों की ओर भागता है और मन अपनों के पास। हर भारतीय, धरती की सुगंध को यहाँ बसाने में जुट जाता है, लेकिन मिट्टी की खुशबू तो अपनी-अपनी ही होती है। जैसे ही बादलों का फेरा लगता है, कोई न कोई झोंका आ ही जाता है और बरसा जाता है अपना देश का पानी। सूखे हुए उपवन में कोई न कोई अंकुर फूट ही जाता है। तब फोन पर अँगुलियां मचल उठती है और दूर देश से दो बूढ़ी आवाजें सारे सुख को एकबारगी में ही नेस्नाबूत कर जाती है। बस यहीं तन और मन में संघर्ष होने लगता है। एक मन के अंदर का सच है जो रह-रहकर पीछे धकेलता है और एक तन का निर्मम सत्य, जो सुख के सारे साधनों के बीच सबकुछ भुला देने में लगा रहता है।
बड़ी-बड़ी कोठी बनाकर भी अपने देश के मकान का एक छोटा सा दरवाजा अपने ताले से देखने का मन करता है। अपना हिस्सा अपने देश में होना चाहिए। डोर नहीं टूटती, यही तो आस है। दुनिया बचपन में अपने आपको तलाशती है, यहाँ बसे भारतीय भी उस छोटे से ताले लगे दरवाजे पर अपनी मन की खट-खट सुनते रहते हैं। सपनों में ही सही, लेकिन हर रोज ही अपनी धरती होती है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन में ढेरों अप्रवासी भारतीय भी थे, एक शाम अपना लिखा पद्यमय मन सुनाने का दिन था। उन सभी के स्वर में भारत बसा हुआ था, कोई नहीं कह रहा था कि देखो हम जीते जी स्वर्ग चले आए हैं, हम कितने भाग्यशाली हैं! देखो हमारा सुख तुम भी देखो। मैं तो अपना दुख वहाँ छोड़ आयी थी लेकिन यह क्या यहाँ तो प्रवासियों के मन का दुख मेरे दुख को खटखटाने लगा। क्यों हो गयी मन की ऐसी हालत? क्यों नहीं मन की तलाश स्वर्ग में भी पूरी होती? क्या तलाशना चाहता है आखिर मन? मुझे अनायास ही एक तोता याद आ गया। राजमहलों के सोने के पिंजर में बन्द। खाने को भरपूर। लेकिन तोता कैसे कहे कि यह पिंजरा मेरा है। उसे तो अपना जंगल ही याद आता है, वह तो उसे ही कह सकेगा कि वह जंगल मेरा था, और आज भी वहीं मेरा जीवन है। यदि इस पिंजर से उड़ गया तो जंगल मेरा स्वागत करेगा, मैं अधिकार पूर्वक वहाँ रहूँगा लेकिन दोबारा इस पिंजरे में अधिकार पूर्वक नहीं आ पाऊँगा। यहाँ तो फिर कोई और होगा।
जब देश से चला था, तब सारे त्यौहार, सारी रश्में, सारे धर्म वहीं तो छोड़ आया था, लेकिन फिर यहाँ आकर खालीपन क्यों लगने लगा?
क्यों चिन डाले अपने हाथों से बड़े-बड़े मंदिर? क्यों वहाँ जाकर रोज पूजा करने का मन करता है?
जो मन वहाँ दीवाली पर केवल पटाखे, मिठाई और आतिशबाजी तक ही सिमट गया था, अब क्यों लक्ष्मी और गणेश का पाना लाकर पूजा करने लगता है? लेकिन पूजा तो आती नहीं, फिर क्या हो?
तब फिर देश की याद आ गयी, अरे वहाँ भी तो पण्डितजी आते थे, पूजा करने। फिर यहाँ क्यों नहीं?
नौकरी का विज्ञापन निकाला गया और एक पढ़े-लिखे पण्डित को वीजा और पासपोर्ट बनवा ही दिया। बस अब तो जब चाहो यज्ञ कराओ और जब चाहो पूजा।
मन मायूस नहीं है, मन बचपन में लौट आया है। दादी तुलसी की पूजा कर रही है, दादाजी मन्दिर में घण्टी बजा रहे हैं, तो यहाँ भी तुलसी का पेड़ लगा लिया है और घण्टी के लिए तो मंदिर है ही न!
हम भी घूमते-घूमते जा पहुँचे केलिफोर्निया के एक मंदिर में। भक्तों की भीड़ लगी थी, एक तरफ प्रसाद वितरण की तैयारी थी तो दूसरी तरफ यज्ञ हो रहा था। दो पण्डित लगे हुए थे यज्ञ कराने में। मंदिर दक्षिण भारतीयों ने बनवाया था, मुख्य संरक्षकों के नाम दीवार पर जड़े थे। मंदिर में कार्तिकेय, गणेश, शिव, पार्वती सभी विराजे थे। साफ सुथरा मंदिर, पूर्णतया वातानुकूलित, सारे ही संसाधनों से युक्त। एक दूसरे मंदिर में जाने का और अवसर मिला, वह जैन मंदिर था। दोनों ही पद्धतियों की पूजा और मूर्तियां वहाँ थी, श्वेताम्बर और दिगम्बर। देश से बाहर निकल कर आने पर सम्प्रदायवाद कम होने लगता है। मंदिर अर्थात हिन्दू मंदिर और सभी अपने मतों का भूलकर भगवान के दर्शन और अपनी आस्था की जड़े तलाशने चले आते हैं।
भारत से आकर दो प्रकार के लोग यहाँ बसे हैं, एक नौकरीपेशा और दूसरे व्यापारी। व्यापारी अपनी आस्थाओं के साथ रहते हैं लेकिन नौकरीपेशा लोग अपनी आस्थाओं को मन के किसी कोने में दफनाने की कोशिश करते रहते हैं। जब भी उन्हें मंदिर दिखायी दे जाते हैं, उनकी आस्था सर निकाल ही लेती है। लाखों भारतीय यहाँ बसे हैं और यहाँ अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन एक प्रश्न मन में उभर आता है, क्या उनकी सेवाओं की यहाँ किसी को कद्र है? क्या कोई अमेरिकी यह कहता है कि भारतीयों के कारण यहाँ उन्नति हुई है?
उनके लिए तो आज भी भारत अविकसित देश ही है और जहाँ शोषण ही शोषण है। जब विवेकानन्द यहाँ आए थे, तब एक ही प्रश्न उनसे किया गया था, कि भारत में महिलाओं की स्थिति क्या है? मुझे लगता है कि आज भी यह प्रश्न वहीं उपस्थित है। मेरा भांजा वहीं है, वह वहाँ मेडिकल की उच्च शिक्षा के लिए गया है। तब एडमिशन की दौड़ में दर-दर भटक रहा था। ऐसे ही भटकते हुए एक बार बस से यात्रा कर रहा था। वहाँ बस में सवारियाँ नाम मात्र की होती हैं। दो-चार होने पर तो बस फुल कहलाती है।
ड्राईवर ने उससे पूछा कि क्या करते हो?
उसने बताया कि डॉक्टर हूँ।
उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि एक डॉक्टर और बस में? वहाँ सबसे अधिक डॉक्टर ही कमाते हैं। फिर उसका दूसरा प्रश्न था कि कहाँ से हो?
भारत से, उत्तर था।
बस-ड्राईवर ने कहा कि वही भारत जहाँ शादी में दहेज लिया जाता है?
भानजा अभी-अभी शादी करके ही गया था, बोला कि अरे नहीं वह तो बहुत पुरानी बात हो गयी। कैसे बताए कि अभी भी उसका सूटकेस ससुराल के कपड़ों से भरा है। ऐसे कितने ही प्रश्न हमारे युवापीढ़ी के पास आते हैं और वे अक्सर झूठ का सहारा लेते हैं। भारत ने कितनी ही उन्नति की हो लेकिन यहाँ आकर एक बात समझ आती है कि हमने आत्मसम्मान नहीं कमाया। हम हीन-भावना से आज भी ग्रसित हैं। इसी कारण प्रतिपल अपने देश को हम दुत्कारते हैं, उसपर शर्मिंदा होते हैं। अपनी पहचान छिपाते हैं। हमें अपने आपको गाली देने में आत्मिक सुख मिलता है। लाखों भारतीय यहाँ रहते हैं लेकिन वे सब अपने आपको अमेरिकी कहलाने में ही सुख खोज रहे हैं, वे कभी भी गर्व से नहीं कहते कि हम भारतीय हैं। भारत का गौरव या तो उन्हें पता नहीं या फिर वे बताने में संकोच करते हैं कि कहीं ऐसे प्रश्नों का सामना नहीं करना पड़े जिनके उत्तर उनके पास नहीं हैं।
हम किसी भी देश का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन पीढ़ियां गुजर जाने के बाद भी हम उस देश के मूल नागरिक नहीं कहलाते। जब अंग्रेज भारत में आए थे तब यहाँ के मजदूरों को उन्होंने गिरमिटियां बनाकर कई देशों को बसाया था। उन देशों को बसाने के लिए वहाँ के बाशिंदों के पास न तो तन की शक्ति थी और न ही मन की, इसलिए भारतीय मजदूरों ने ही उन देशों को बसाया। लेकिन आज भी वे सब भारतीय मूल के नागरिक ही कहलाते हैं। जिस देश में विकास की असीम सम्भावनाएँ हो और वहाँ का युवा दूसरे देश को अपना कहने के लिए लालायित रहे, तब कैसे उस देश का विकास सम्भव है? दूसरे देशों में हमने अपनी जरूरत पैदा नहीं की, अपितु हम उनके लिए बोझ बन गए हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय कार्य कर रहा है लेकिन वे अमेरिका का निर्माण कर रहे हैं, ऐसा सम्मान दिखायी नहीं देता।
दूसरे देश में खुशहाली अधिक है, इसलिए हम चले आए, अपने देश को अकेला छोड़कर?
यहाँ आने पर एक प्रश्न हवा में तैरता रहता है, यहाँ कैसा लग रहा है?
अरे भई पराये देश में आए हैं, सुंदर देश है, तो अच्छा ही लगेगा। लेकिन इसमें प्रश्न की बात क्या है? प्रश्न तो यह होना चाहिए कि अपने देश को क्या हम ऐसा बनाने में अपना योगदान करेंगे? क्या यहाँ से कुछ सीख कर जाएँगे? परायी चूपड़ी पर क्यों मन ललचाता है?
यहाँ आकर एक बात समझ आ रही है कि भारत क्या है? हमने इसे दुनिया के सामने किस प्रकार से प्रस्तुत किया है? हम अपने आस-पास भारत बनाकर रहना चाहते हैं, मंदिर भी चाहिए, वैसा खाना भी चाहिए लेकिन भारत में कुछ अच्छा भी है इसकी चर्चा करना नहीं चाहते। दुनिया कहती है कि भारत पुरातनपंथी है, वहाँ शोषण है, तो हम भी स्वीकार करते हैं। स्वीकार नहीं करें तो चारा भी नहीं, क्योंकि यदि कहेंगे कि नहीं भारत बहुत अच्छा है, तो फिर प्रश्न आएगा कि यदि तुम्हारा देश इतना ही अच्छा है तो फिर सब कुछ छोड़-छाड़कर यहाँ क्यों चले आए हो?

डॉ. अजित गुप्ता

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बैठकबाज का कहना है :

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर आलेख अजित जी....
आलोक सिंह "साहिल"

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