Saturday, January 31, 2009

सोने का पिंजर (3)

तीसरा अध्याय

गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम....!

एक नाम सबको याद हो जाता है, वीजा। लेकिन यह होता क्या है? कैसे बनता है? अधिकांश नहीं जानते। तुम्हारे यहाँ से संदेशा आता है कि वीजा बनवाना है, तो पासपोर्ट चाहिए।
अरे आप लोगों ने अपना पासपोर्ट भी नहीं बनवाया? कैसे लोग हैं आप?
लेकिन बेटा हम पासपोर्ट का क्या करते? यहाँ तो एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए केवल टिकट चाहिए।
नहीं, नहीं, सब फालतू की बाते हैं, आधुनिकता का यही तकाज़ा है कि आपके पास पासपोर्ट हो, क्रेडिट कार्ड हो, एटीएम कार्ड हो। चलिए अब बना लीजिए फटाफट।
तीन महीने पासपोर्ट में लग गए, अब वीज़ा की तैयारी शुरू करो। आपकी इनकम का स्टेटमेंट चाहिए। बेंक में कम से कम दो-चार लाख रूपए पड़े होने चाहिए। वह भी सेविंग अकाउण्ट में। दो-चार एफ.डी. भी होनी चाहिए। लगना चाहिए कि आप के पास धन-दौलत है, आप वापस आएँगे। घर का मकान होना तो निहायत ज़रूरी है। स्वयं का व्यापार है तो वीज़ा मिलना आसान है, क्योंकि अपना व्यापार करने तो वापस आना ही पड़ेगा। आपके बैंक में इतना रूपया होना चाहिए कि आपको अमेरिका में अकेले भी रहना पड़े तो रह सकें। क्या पता आपका बेटा आपको धक्का मारकर निकाल दे या फिर आपको ही वहाँ उसके साथ रहना नहीं भाए। फिर क्या करेंगे आप? सरकार क्यों आपका बोझा उठाए? इसलिए मकान के कागज़ भी चाहिए, इनकम टेक्स के कागज़ भी। जितने सबूत ले जा सको, ले लो। पता नहीं कब किसकी जरूरत पड़ जाए। यहीं से शुरू होता है हमारा हीनता-बोध। बात-बात पर झुँझलाहट सुनायी पड़ती है कि अरे, आपके पास यह नहीं है, यह नहीं है। अरे आपका वेतन इतना कम है? यहाँ तो चपरासी को भी इससे ज़्यादा मिलता है। हमे लगने लगता है कि हम वाकई बहुत ग़रीब हैं। हमारे पास दिखाने को तो कुछ भी नहीं है। क्या हुआ जो हम यहाँ स्वाभिमान से रहते हों, लेकिन तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है।
अब कैसे बताएँ कि हमने तो पूरे परिवार का पेट पाला है। भारत में वेतन हज़ारों में ही मिलता है। एक डॉक्टर हो या फिर इंजीनियर, वेतन तो कुछ हज़ार बस। अब उसमें से कहाँ से लाएं लाखों की जमा रकम? भारत में तो बुद्धि-सम्पन्न संतानों की प्राप्ति के लिए संस्कार किए जाते हैं। बस एक ही बात का ध्यान रखा जाता है कि संतान बुद्धिशाली हो, जिससे वह पढ़-लिखकर माँ-बाप का सहारा बन सके। घर में बेईमानी का पैसा नहीं आना चाहिए, नहीं तो संतान बिगड़ जाएगी, पैसे का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए, नहीं तो संतान के संस्कार बिगड़ जाएँगे। बस एक ही बात रहती है कि कैसे भी हों, संतान को संस्कारवान बना दें। बस एक बार संतान कुछ बन जाए तो हम गंगा नहायें। हमारा धर्म तो संतान में ही सीमित रहता है। संतान कुछ बन गयी तो पुण्य, नहीं बनी तो पाप। हम तो बुद्धि के भरोसे ही संतानों को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। पैसे के भरोसे तो विद्या नहीं खरीदी जाती है। कोई भी नहीं चाहता कि हम हमारे बच्चों के लिए विद्या खरीदें। लेकिन अब तो चलन ही दूसरा हो गया। बच्चे पूछते हैं कि तुमने हम पर कितना रूपया खर्च किया? रूपया खर्च किया हो तो ठीक, नहीं तो तुमने कुछ नहीं किया।
सारा खेल ही पैसे का हो गया। हमने तो बुद्धि को महत्त्व दिया और तुमने कहा कि नहीं पैसा होना चाहिए। अब कहाँ से लाएं पैसा, जिसके सहारे वीजा मिले? खैर, जैसे-तैसे करके दिखा ही दिए कि कुछ लाख रूपये तो हमारे पास भी हैं। मकान भी है, गाड़ी भी है आदि, आदि। थैला भरकर सबूत एकत्र कर लिए और चल दिए खुशी-खुशी तुम्हारे दरबार में। हमने सोचा था कि भला तुम्हें क्या तकलीफ होगी हमारे वहाँ जाने में? हम कौन सा बसने जा रहे हैं, हम तो बस देखने ही तो जा रहे हैं तुम्हारा स्वर्ग। लेकिन तुमने कहा कि नहीं। तुम सब लालची देश के हो, जब तुम्हारी युवा-पीढ़ी हमारे लालच में आ जाती है, तब तुम क्यों नहीं? क्या गारंटी है कि तुम वहाँ बसना नहीं चाहोगे? फिर तुम्हारे पास तो ममता का कारण भी है।
वीजा साक्षात्कार के समय एक प्रश्न उछाला गया- “क्या करते हो?”
मेरे पति ने कहा- “डॉक्टर हूँ। “
“तुम्हारे पेशेंट को बाद में कौन देखेगा? नहीं, तुम्हें नहीं मिल सकता वीजा।“
एक मिनट के कुछ हिस्सों में ही फरमान जारी हो गया कि, स्वर्ग के दरवाजे तुम्हारे लिए नहीं खुल सकते। बहस की गुंजाइश नहीं, धक्के मारकर बाहर कर दिए जाओगे।
लोग कहने लगे कि डाक्टर से उन्हें डर लगता है कि कहीं वहीं बस नहीं जाए।
लेकिन वहाँ तो दो साल और पढ़ना पड़ता है, तब ही नौकरी सम्भव है? और इस उम्र में कौन पढ़ेगा? क्या कोई भी डॉक्टर अपनी कमाई छोड़कर वहाँ बसेगा, इस उम्र में?
लेकिन तुम्हारा स्टैम्प मौत का फरमान जैसा होता है। सारे सपने एक बार में ही बिखर जाते हैं। बरसों का सिंचित स्वाभिमान चूर-चूर हो जाता है।
लोग पूछते हैं- “अरे तुम्हें नहीं मिला वीजा? उसे तो मिल गया था। “
“क्या पूछा था तुमसे?”
“तुम्हें बताना ही नहीं था कि हम डॉक्टर हैं।“ जितने मुँह उतनी सलाह। आप क्षण-क्षण टूटते रहते हो। तुम्हारे वीजा-ऑफिस में लोग घण्टों बैठे रहते हैं, अब आस जगे? कुछ हँसते हुए बाहर निकलते हैं और कुछ रोते हुए। बाहर घूम रहे भिखारियों को कोई सौ रूपया दान देता है तो कोई दस रूपया। भिखारी भी जानते हैं कि किसे वीजा मिला है और किसे नहीं। तुम्हारे लिए तो रोज़ की ही बात है लेकिन हमारे लिए तो जीवन में पहली बार होती है। ‘बे मुरव्वत से तेरे कूँचे से हम निकले’ कहते हुए हमारे जैसे जाने कितने ही लोग तुम्हारे यहाँ से धकियाए जाते हैं। क्या पैसे वाले और क्या बिना पैसे वाले।
आदमी को कहा जाता है कि एक बार और प्रयास कर लो, पहले तो तुमसे चूक हो गयी अब सावधानी बरतना। कितने ही ऐसे लोग हैं जो दूसरी बार में भी धकियाए जाते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें किस बात के लिए उम्र-कैद की सजा सुनायी गयी है। क्यों नहीं वह अपने बच्चों से मिलने जा सकता? एक असुरक्षा-बोध मन में समाने लगता है। कहीं ऐसा नहीं हो कि हम कभी जा ही नहीं पाएँ? जरा सा बुखार भी मन को चिन्तित कर देता है कि हम बेटे के पास नहीं हैं, उसके सर पर हाथ फेरने को मन तरस जाता है। हर तरफ बेचारगी छा जाती है। बार-बार तुम्हारे यहाँ आकर बेइज्जत होने का मन भी नहीं करता। भारत में हर आदमी अपनी इज्जत को ही रोता है, उसे चाहे रोटी नहीं मिले लेकिन वह जिल्लत की रोटी कभी नहीं चाहता।
कितने चक्कर काटे आखिर तुम्हारे यहाँ? फिर कौन सी तुम्हारी फीस कम है? एक बार मैं पूरे दस हजार से भी ज्यादा खर्च हो जाते हैं, एक आदमी के। हजारों रूपयों में कमाने वाला भारतीय भला इतना पैसा तो अपने ऊपर कभी एक-बारगी में भी खर्च नहीं करता है और वह एक मिनट में ही तुम्हें दे आता है! केवल तुम्हारी ना सुनने के लिए! लोग तो कहते हैं कि यह भी तुम्हारे लिए एक धंधा है, पैसे कमाने का। रोज ही लोगों को धकियाते हो और उनकी फीस डकार जाते हो। बेचारे कुछ करना चाहें तो फिर डरा देते हो। बच्चे कहते हैं कि ऐसा भूल कर भी नहीं करना, नहीं तो जिन्दगी भर कम्प्यूटर में फीड हो जाएगा आपका नाम-ब्लैक लिस्ट में। फिर क्या पता बेटे-बेटियों को भी कठिनाई का सामना करना पड़े? ना बाबा ना, ऐसा काम नहीं करना। अपमान का घूँट पीकर रह जाओ।
मुझे तो लगता है कि तुम शरीफों के साथ ही ऐसा व्यवहार करते हो, बदमाशों को तो तुम रोक नहीं पाते। सारे ही आतंककारियों के पास तुम्हारा ग्रीन कार्ड है। सभी को तो तुमने सुरक्षा प्रदान की है। हाँ शायद तुम्हें ऐसे आतंककारियों की भी तो जरूरत पड़ती होगी न? तुम्हें तो कभी अफगानिस्तान को, कभी ईराक को नेस्तनाबूत करना जो पड़ता है। सारी दुनिया पर बादशाहत करने के लिए हिंसक लोग भी चाहिए ही न?। कैसी है तुम्हारी दुनिया, सारी दुनिया ही तुमने समेट रखी है। तुम भी क्या करो? यूरोपियन्स ने तुम पर आकर अधिकार जो कर लिया है। तुम्हारे वाशिंदे तो बेचारे बहुत सीधे-सादे लोग हैं। वे इतने आराम-तलब हैं कि उन्हें केवल आराम से मतलब है, काम से नहीं। उनके इतने बड़े देश को न जाने कितने यूरोपीय देशों के वासियों ने अपने कब्जे में कर रखा है?
जब तुम्हारी भूमि वीरान पड़ी थी, कुछ लाख लोग ही तो थे तुम्हारे पास। उस समय अंग्रेज वहाँ घुस आए थे। उन्होंने कितनी मार-काट की थी तुम्हारे यहाँ, तुम्हें कुछ याद है? तुम्हारा इतिहास कहता है कि अंग्रेज यहाँ आए और उन्होंने लाखों अमेरिकन्स को मारा। जो जितने अमेरिकन्स को मारता था उसे उतना ही बड़ा पुरस्कार मिलता था। उन्हें लगा कि अरे यह स्थान तो सुरक्षित है। यूरोप तो एशिया से लगा हुआ है, यहाँ तो सुरक्षा पर खतरा मँडरा सकता है। उन्होंने तुम्हारी धरती पर ही अपना आशियाना बनाने का प्रण कर लिया। सौलहवीं शताब्दी में तुम्हारे यहाँ जंगल और समुद्र के अलावा और क्या था? इंसानों की बस्ती कैसे बसे यही प्रश्न था अंग्रेजों के पास। तब वे अफ्रीका से गुलामों के रूप में ले आए थे वहाँ के वाशिंदों को। कुदरत भी कैसा खेल खेलती है, गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम! तुम्हें तब जरूरत थी ऐसे मेहनतकश इंसानों की जो तुम्हारी धरती को निखार सके, उसे रूप दे सके। तब तुमने किसी को भी वीजा से नहीं बाँधा। बस बेचारे काले लोग बँधे तुम्हारे एग्रीमेंट से। आज जो तुम देख रहे हो, वह सब उन काले लोगों की मेहनत का ही परिणाम है। कल क्या आज भी तो तुम्हारे यहाँ काले लोग ही तुम्हारे शहरों को साफ-सुथरा रख रहे हैं। तुम्हारे यहाँ के गोरे तो आज भी आराम-तलब ही बने हुए हैं।
मैं तुम्हारे वीजा-नियमों की बात कर रही थी। मैंने लाइन में खड़े लोगों के मन में एक भय देखा है जो उनकी आँखों में उतर आता है।
तुम कहते हो कि हमारे यहाँ हर कोई आकर बसना चाहता है। हम क्या करें? हमें नियम कड़े रखने पड़ते हैं।
लेकिन क्या तुम्हारे ये कड़े नियम सुपरिणाम देते हैं? कितने पंजाबी, कितनी बार शादी कर-कर के तुम्हारे यहाँ अपने पूरे परिवार को ले गए हैं? तुमने कितनों को रोक लिया? एक बार रोका, दो बार रोका, लेकिन उन्होंने कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया। लेकिन बेचारे वो माँ-बाप जिनके लाड़ले वहाँ पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं, तुमने उन्हें भी रोक लिया। एक तरफ तो तुम अपने नियमों की दुहाई देते हो, दूसरी तरफ तुम लाचार दिखायी देते हो।
तुम्हारे शहरों के नियम इतने कड़े हैं कि आदमी वीजा समाप्त होने के बाद एक दिन भी नहीं रह सकता तो फिर तुम्हें वीजा देने में डर क्यों है? लेकिन यह बात नहीं है, तुम केवल माँ-बाप को ही रोकते हो। पंजाबी व्यक्ति जो वहाँ बसे भारतीयों को भोजन खिलाते हैं भला उन्हें तुम क्यों रोकोगे? यदि तुमने उन्हें रोक लिया तो भारतीय भूखा नहीं मर जाएगा? आज सारे ही अमेरिका में पंजाबी लोग अपने खाने से भारतीयों को वहाँ टिकने में सहयोग कर रहे हैं। यदि उन्हें भारतीय खाना नहीं मिलेगा तब फिर वे कैसे आजीवन तुम्हारी सेवा कर सकेंगे? इसलिए तुम्हारा वीजा-कार्यालय केवल डर पैदा करता है, वह भी केवल सीधे लोगों के मन में। तुम जिसे चाहते हो उसे बुला लेते हो और जिसे नहीं, उसे भगा देते हो।
फिर तुम बूढ़े माँ-बापों को अपने यहाँ आने भी क्यों दो? यदि भारत के सारे ही माता-पिता वहाँ जाकर बस गए तब तो तुम्हारा बहुत नुक्सान हो जाएगा। तुम तो सामाजिक-सुरक्षा के नाम पर बहुत बड़ा टैक्स वसूल करते हो। बूढ़े माता-पिता की सुरक्षा करना तुम्हारी सरकारों का कार्य है। अतः वे बुढ़ापे में इस टैक्स की सहायता से उन्हें आर्थिक सहयोग देते हैं। भारतीय भी टैक्स देते हैं लेकिन उनका टैक्स तो पुनः उनके माता-पिता के लिए काम नहीं आता। वह तो तुम्हारे पास ही रह जाता है। न ही इस अतुल धनराशि को तुम भारत भेजते हो। कभी देखी है तुमने भारत में आकर उन माता-पिता की स्थिति को? हमारे भारत में हमारा एक ही सपना होता है कि हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाएं जिससे हमारा बुढ़ापा सुधर जाए। इसलिए बेचारे माता-पिता खुद रूखी खाते हैं लेकिन अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजते हैं। अपने जीवन की सारी जमा-पूँजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं। जब बच्चों के मन में आता है कि वे भी अमेरिका जाएं तब भी वे उन्हें भेजते हैं। यहाँ ऐसे बहुत से माता-पिता मिल जाएँगे जिन्होंने लाखों रूपया कर्ज लिया है अपने बच्चों को तुम्हारे पास भेजने के लिए। आज वे बेचारे कर्ज में डूबे हैं और तुम उनके बच्चों से अपना देश उन्नत कर रहे हो।
हमने हिम्मत करके एक बार और तुम्हारे वीजा-कार्यालय में दस्तक दी। इस बार हमारी बेटी कि जिद थी कि नहीं भैया से मिलकर आएँगे। हम इस बार भी बड़ी आशा से तुम्हारे दरबार में चले आए कि शायद इस बार तुम्हारे यहाँ हमारी सुनाई हो जाए। लेकिन इस बार भी तुमने हमें टका सा जवाब दे दिया। कारण भी बड़ा अजीब था, हमारे आगे एक वृद्ध दम्पत्ति थे, उनका साक्षात्कार पूरा हुआ और हम आगे बढ़े।
मेरी बेटी ने उनसे पूछ लिया कि अंकल क्या हुआ?
तुम्हारी ऑफीसर ने देख लिया। बस फिर क्या था, वह एकदम चिढ़ गयी। गुस्से में बोली कि उनसे क्या पूछ रही थीं?
मैंने बात को सम्भालने की कोशिश भी की लेकिन बात तो बिगड़ गयी थी। उनका डर कायम रहना चाहिए, यदि यह डर ही मिट गया तब फिर कैसे काम चलेगा?
बस हमसे पूछा कि वेतन कितना है? बेचारे भारतीयों का वेतन तो हजारों में ही होता है, बता दिया। अरे यह तो बहुत कम है, और धड़ाक से लगाया स्टेम्प और हो गया हजारों रूपयों का नास। बेटी कुछ बोलने को हुई तो जवाब मिला कि तुम चुप रहो, तुम्हारे कारण ही नहीं दे रही हूँ, इन्हें तो मैं एक बार कन्सीडर कर भी लेती लेकिन तुम्हें तो कदापि नहीं।
कैसा मानसिक अवसाद दे जाते हैं तुम्हारे ये अफसर? कभी तुमने सोचा है? लेकिन तुम क्यों सोचोंगे? तुम्हारे लिए तो हम केवल कीड़े-मकोड़े हैं। तुम्हारे यहाँ आकर भीड़ बढ़ाने वाले और तुम्हारे संचित धन को हड़पने वाले। तुम जानते हो कि हमारी संताने कभी प्रतिक्रिया स्वरूप तुम्हें नहीं छोड़कर आएँगी। तुम्हें तो उनसे मतलब है। वे तुम्हारे देश की उन्नति में सहायक जो हैं। फिर तुम चालीस प्रतिशत के करीब उनसे टेक्स भी तो वसूलते हो। तुम उन्हें क्या देते हो? वे तो वहाँ जाकर अपना शाही जीवन ही भूल जाते हैं। बेचारे किस मानसिक तनाव में रहते हैं। आधे के करीब तो तुम पैसा वापस ले लेते हो, फिर वे क्या तो खाए और क्या बचाए? वे कैसे अपने माता-पिता को पैसे भेजे? वे तो स्वयं पाई-पाई बचाकर वीकेण्ड मनाते हैं। उनसे ज्यादा सुख से तो उनके माता-पिता भारत में रहते हैं जो हजारों रूपया ही कमाते हैं।
हमारे यहाँ टैक्स बचाने के कितने साधन हैं, लेकिन तुम्हारे यहाँ नहीं। चालीस प्रतिशत मतलब चालीस प्रतिशत। कहीं कमी नहीं। तुम्हारे यहाँ एक साधारण भारतीय को पाँच या छः हजार डॉलर मिलते हैं, तुम उसमें से दो हजार डॉलर से अधिक तो काट ही लेते हो। एक-डेढ़ हजार मकान किराए में चला जाता है। बाकी बचते हैं दो या तीन हजार। अब उसमें क्या खाए और क्या बचाए? हमने जिन बच्चों को फूल जैसा पाला था, पानी भी जिन्होंने कभी हाथ से नहीं पीया था आज वे ही हाथ बर्तन माँज रहे हैं। हमारे यहाँ लड़के तो कभी हिलते भी नहीं, लड़कियों को तो हम कह भी देते हैं कि हमारा रसोई में हाथ बँटा दो। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो बेचारे लड़के ही बर्तन माँजते रहते हैं।
यहाँ हर आदमी पूछता है कि अरे नौकर नहीं है क्या? कितना ही समझा दो लेकिन यहाँ के आदमी के सर से नौकर का भूत निकलता ही नहीं। वे समझ ही नहीं पाते कि वहाँ नौकर रखना आसान नहीं है? एक घण्टे के दस डॉलर देने पड़ते हैं। नौकर को इतना पैसा दे दें तो फिर खाएँगे क्या? हमारे जैसे नहीं कि हजार-पाँच सौ में बाई मिल जाती है जो सारा दिन काम कर देती है। गरीब से गरीब आदमी भी बर्तन-वाली तो रख ही लेता है। हमारे यहाँ घर की बहू को अगर बर्तन माँजने पड़े तो हमें शर्मिंदगी होती है। लोग कहते हैं कि कैसा घर है जहाँ बेचारी बहु को बर्तन माँजने पड़ रहे हैं? लोग बहु के आते ही बर्तनवाली तो लगा ही लेते हैं। अब तुम्हारे यहाँ क्या बहु और क्या दामाद, सभी तो गू-मूत साफ करते हैं।
फिर भी होड़ लगी है तुम्हारे यहाँ आने की। जैसे स्वर्ग किसी ने नहीं देखा लेकिन सभी स्वर्ग ही जाना चाहते हैं। वैसे ही तुम्हारा जाप करते हैं लोग यहाँ। अमेरिका जाने का अर्थ है जीवनभर के पापों का धुलना। जब कुछ लोगों को वीजा नहीं मिलता तो वे भी गलत तरीके अपनाते हैं। दलालों के झाँसे में आते हैं और कभी तो उन्हें दलाल अमेरिका के जहाज में बैठा पाता है और कभी नहीं। न जाने कितने ही युवा और बुजुर्ग इस झाँसे में आकर अपना सब कुछ खो बैठते हैं। एक तरफ तुम्हारा ऐलान है कि हमारे यहाँ नियम इतने कड़े हैं कि हमारी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। और दूसरी तरफ तुम इतने डरते हो वीजा देने से? क्या तुम्हारी पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकारा है जो बिना वीजा के वहाँ रहते हैं? यह दोष तो हमारी पुलिस पर ही तुम लगाते हो। फिर तुम्हें डर कैसा?

डॉ अजित गुप्ता
क्रमश:

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5 बैठकबाजों का कहना है :

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

बिल्कु सही कहा अजीत जी-

गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम
आलोक सिंह "साहिल"

abhinav का कहना है कि -

hay re vija.
Abhinav jha.

manu का कहना है कि -

सोच रहा हूँ...क्या वाकई इतनी मुश्किल है वहाँ की हसीं लगने वाली जिंदगी....???

Dr. Smt. ajit gupta का कहना है कि -

मनु जी
अभी और पढ़िए सारे ही भ्रम टूट जाएंगे।

pooja का कहना है कि -

अजित जी,

बहुत अच्छा चित्रण कर रही हैं. शायद इसे पढ़ कर अमेरिका जाने की जिद लगाए बैठे लोगों की आँख का परदा हट सके और स्वर्ग के दर्शन की भ्रान्ति मिट सके .

शुभकामनाएं.
पूजा अनिल

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