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Tuesday, October 26, 2010

चीन के द्वारा भारत की घेराबंदी

वर्ष 2007 में चीन द्वारा वास्‍तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण या उससे मिलती-जुलती लगभग 140 घटनायें हुई, वर्ष 2008 में 250 से भी अधिक तथा वर्ष 2009 के प्रारम्‍भ में लगभग 100 के निकट इसी प्रकार की घटनायें हुई इसके बाद भारत सरकार ने हिमालयी रिपोर्टिंग, भारतीय प्रेस पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया। आज देश के समाचार पत्रों एवं इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया को सूचनायें मिलना बन्‍द हैं। क्‍या उक्‍त प्रतिबन्‍ध से घुसपैठ समाप्‍त हो गयी या कोई कमी आयी। इस प्रतिबन्‍ध से चीन के ही हित सुरक्षित हुये तथा उनके मनमाफिक हुआ। जरा हम चीन के भारत के प्रति माँगों की सूची पर गौर करें - वह चाहता है अरुणाचल प्रदेश उसे सौंप दिया जाये तथा दलाईलामा को चीन वापस भेज दिया जाये। वह लद्‌दाख में जबरन कब्‍जा किये गये भू-भाग को अपने पास रखना चाहता है तथा वह चाहता है। भारत अमेरिका से कोई सम्‍बन्‍ध न रखे इसके साथ-साथ चीन 1990 के पूरे दशक अपनी सरकारी पत्रिका ‘‘पेइचिंग रिव्‍यू'' में जम्‍मू कश्‍मीर को हमेशा भारत के नक्‍शे के बाहर दर्शाता रहा तथा पाक अधिकृत कश्‍मीर में सड़क तथा रेलवे लाइन बिछाता रहा। बात यही समाप्‍त नहीं होती कुछ दिनों पहले एक बेवसाइट में चीन के एक थिंक टैंक ने उन्‍हें सलाह दी थी कि भारत को तीस टुकड़ों में बाँट देना चाहिये। उसके अनुसार भारत कभी एक राष्‍ट्र रहा ही नहीं। इसके अतिरिक्‍त चीन भारत पर लगातार अनावश्‍यक दबाव बनाये रखना चाहता है। वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्‍थाई सदस्‍यता पाने की मुहिम का विरोध करता है तो विश्‍व बैंक और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष में अरुणाचल प्रदेश की विकास परियोजनाओं के लिये कर्ज लिये जाने में मुश्‍किलें खड़ी करता है। इसके साथ-साथ तिब्‍बत में सैन्‍य अड्‌डा बनाने सहित अनेक गतिविधियाँ उसके दूषित मंसूबे स्‍पष्‍ट दर्शाती हैं।

आज से लगभग 100 वर्षों पूर्व किसी को भी भास तक नहीं रहा होगा, वैश्‍विक मंच पर भारत तथा चीन इतनी बड़ी शक्‍ति बन कर उभरेंगे। उस समय ब्रिटिश साम्राज्‍य ढलान पर था तथा जापान, जर्मनी तथा अमेरिका अपनी ताकत बढ़ाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे थे। नये-नये ऐतिहासिक परिवर्तन जोरों पर थे। आज उन सबको पीछे छोड़ चीन अत्‍यधिक धनवान तथा ताकतवर राष्‍ट्र बनकर उभरा है। कुछ विद्वानों का मत है चीन अनुमानित समय से पहले अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। भारत भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ लोकतंत्र को सीढ़ी बना अपनी चहुमुखी प्रगति की ओर अग्रसर है। चीन अपने उत्‍पादन तथा भारत सेवा के क्षेत्र में विश्‍व पटल पर अपनी उपस्‍थिति अग्रणी भूमिका के रूप में बनाये हुए है। यह बात सत्‍य है कि चीन भारत के मुकाबले अपनी सैन्‍य क्षमता में लगभग दोगुना धन खर्च कर रहा है। अतः उसकी ताकत भी भारत के मुकाबले दोगुनी अधिक है। उसकी परमाणु क्षमता भी भारत से कहीं अधिक है। इन सबके साथ यह भी सत्‍य है कि चीन की सीमा अगल-अलग 14 देशों से घिरी है अतः वह अपनी पूरी ताकत का उपयोग भारत के खिलाफ आजमाने में कई बार सोचेगा। परन्‍तु चीन की उक्‍त बढ़ती हुई सैन्‍य एवं मारक शक्‍ति भारत के लिए चिन्‍तनीय अवश्‍य है।

एक तरफ चीन अपनी जी.डी.पी. से कई गुना रफ्‍तार से रक्षा बजट में खर्च कर रहा है वहीं वह अपने रेशम मार्ग जहाँ से सदियों पहले रेशम जाया करता था, पुनः चालू करना चाहता है। वह अफगानिस्‍तान, ईरान, ईराक और सउदी अरब तक अपनी छमता बढ़ाना चाहता है। निश्‍चित ही वह वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने हित में करना चाहता है। जिसके उक्‍त कार्य में निश्‍चित ही पाकिस्‍तान की भूमिका महत्‍वपूर्ण रहने वाली है। देखना यह है कि उसकी यह सोच कहाँ तक कारगर रहती है।
चीन महाशक्‍ति बनने की जुगत में है, जिससे भारत को चिन्‍तित होना लाजमी है, उसकी ताकत निश्‍चित ही भारत को हानि पहुँचाएगी। लगातार चीनी सेना नई शक्‍तियों से लैस हो रही है। पाकिस्‍तान तथा बांग्‍लादेश में समुद्र के अन्‍दर अपने अड्‌डे बनाकर वह अपनी भारत के प्रति दूषित मानसिकता दर्शा रहा हैं। वर्ष 2008 में चीन पाकिस्‍तान में दो परमाणु रिएक्‍टरों की स्‍थापना को सहमत हो गया था। जिसका क्रियान्‍वयन होने को है।

हमारे नीति निर्धारकों को उक्‍त विषय की पूरी जानकारी भी है। परन्‍तु फिर भी वे एकतरफा प्‍यार की पैंगे बढ़ाते हुए सोच रहे हैं। कि एक दिन चीन उनपर मोहित हो जाएगा, तथा अपनी भारत विरोधी गतिविधियाँ समाप्‍त कर देगा। हमारे देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का वैश्‍विक मंच पर कहना अन्‍तर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार की दुनिया में चीन हमारा सबसे महत्‍वपूर्ण सहोदर है तथा भारतीय विदेशमंत्री का कहना तिब्‍बत चीन का अंग है। उचित प्रतीत नहीं होता। उक्‍त दोनों बयान भारत को विभिन्‍न आयामों पर हानि पहुँचाने वाले प्रतीत होते हैं। चाणक्‍य तथा विदुर के देश के राजनेता शायद यह भूल गये कि राष्‍ट्र की कोई भी नीति भावनाओं से नहीं चलती। अलग-अलग विषयों पर भिन्‍न-भिन्‍न योजनाएँ लागू होती हैं। परन्‍तु भावनाओं का स्‍थान किसी भी योजना का भाग नहीं है। आज भारत को चीन से चौकन्‍ना रहने की आवश्‍यकता है। उसे भी कूटनीति द्वारा अपनी आगामी योजना बनानी चाहिए। उसे चाहिए चीन की अराजकता से आजिज देश उसके विषय में क्‍या सोच रहे हैं। उसके नीतिगत विकल्‍प क्‍या हैं ? भारत को अमेरिका के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया के महत्‍वपूर्ण देशों के साथ खुली बात-चीत करनी चाहिए। चीन का स्‍पष्‍ट मानना है कि भारत में कई प्रकार के आंतरिक विवाद चल रहे हैं चाहे वह अंतर्कलह हो, आतंकवाद हो या साम्‍प्रदायिक खींच-तान। भारत क्षेत्रीय विषयों पर भी बुरी तरह बटा हुआ है। चीन उक्‍त नस्‍लीय विभाजन का लाभ देश को बाटने के लिए कर सकता है। वहाँ के दूषित योजनाकारों के अनुसार प्रांतीय स्‍तर पर अलग-अलग तरीके से क्षेत्रीय वैमनस्‍यता एवं विवादों को भड़का भारत का विभाजन आसानी से किया जा सकता है।
निश्‍चित रूप से आगे आने वाले वर्ष भारत के लिए काफी मुश्‍किलों भरे हो सकते हैं। वर्ष 2011 के बाद पश्‍चिमी सेना काबुल से निकल जाएगी। इसके बाद बीजिंग-इस्‍लामाबाद-काबुल का गठबंधन भारत के लिए मुश्‍किलें खड़ी करेगा। चीन नेपाल के माओवादियों को लगातार खुली मदद कर रहा है। वहाँ की सरकार बनवाने के प्रयासों में उसकी दखलंदाजी जग जाहिर है। पाकिस्‍तान भारत में नकली नोट, मादक पदार्थ, हथियार आदि भेज भारत को अंदर से नुक्‍सान पहुँचाने की पूरी कोशिश कर रहा है। उसकी आतंकी गतिविधियाँ लगातार जारी हैं। भारत चीन के साथ व्‍यापार कर चीन को ही अधिक लाभ पहुँचा रहा है। वहाँ के सामानों ने भारतीय निर्माण उद्योग को बुरी तरह कुचल डाला है। यदि आगे आनेवाले समय में भारत सरकार चीनी उत्‍पादनों पर पर्याप्‍त सेल्‍स ड्‌यूटी या इसी प्रकार की अन्‍य व्‍यवस्‍था नहीं करती है तो भारत का निर्माण उद्योग पूरी तरह टूट कर समाप्‍त हो जाएगा। इसे भी चीन का भारत को हानि पहुँचाने का भाग माना जा सकता है।

भारत को चाहिए 4,054 किलोमीटर सरहदीय सीमा की ऐसी चाक-चौबन्‍द व्‍यवस्‍था करें कि परिंदा भी पर न मार सके। इसके साथ-साथ देश के राज्‍यीय राजनैतिक शक्‍तियों को अपने-अपने प्रान्‍तों को व्‍यवस्‍थित करने की अति आवश्‍यकता है। जिससे वह किसी भी सूरत में भारत की आंतरिक कमजोरी का लाभ न ले सके। देश की सरकार को जल, थल तथा वायु सैन्‍य व्‍यवस्‍थाओं को और अधिक ताकतवर बनाना चाहिए। जिससे चीन भारत पर सीधे आक्रमण करने के बारे में सौ बार विचार करे। 1954 के हिन्‍दी-चीनी भाई-भाई तथा वर्तमान चिन्‍डिया के लुभावने नारों के मध्‍य चीन ने 1962 के साथ-साथ कई दंश भारत को दिये हैं। भारत को आज सुई की नोक भर उस पर विश्‍वास नहीं करना चाहिए। चीन जैसे छली राष्‍ट्र के साथ विश्‍वास करना निश्‍चित ही आत्‍मघाती होगा। हमें अपनी पूरी ऊर्जा राष्‍ट्र को मजबूत एवं सैन्‍य शक्‍ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

लेखक- राघवेन्‍द्र सिंह

Thursday, June 03, 2010

क्या इस देश में कोई वकील बनना चाहता है?

देश में करियर बनाने के विकल्पों पर बात हो तो शायद ही कोई युवा होगा जो ये कहेगा कि हमें तो वकील बनना है। ऐसी हालत तब है जब देश में कम से कम 900 विधि (यानी लॉ) कॉलेज हैं और 14 उच्चस्तरीय केंद्रीय विधि संस्थान हैं। अगर कुछ साल पहले (दस साल) तक की बात करें तो लॉ कॉलेजों का ये आंकड़ा देश में मौजूद कुल इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की संख्या पर भी बीस पड़ता था...(इन दो विभागों से तुलना इसीलिए क्योंकि देश में कैरियर के तौर पर इन्हीं दो विकल्पों को रामबाण माना जाता रहा है)। विडंबना ये है कि आज इंजीनियरिंग के पेशे में उम्र में बित्ते भर के छोकरे लाखों-करोड़ों में खेल रहे हैं और वकीलों की हालत ऐसी है कि ज़्यादातर दोधारी पतलून पहनकर दस-बीस रुपये की दिहाड़ी का जुगाड़ ढूंढते उम्र गुज़ार देते हैं ! ऐसा नहीं है कि देश में लॉ कॉलेज से निकलने वाले छात्रों को चमचमाता भविष्य नसीब ही नहीं होता, मगर उनकी संख्या बेहद कम है। ज़रा सोचिए, जिस देश में करोड़ों मामले तारीख के इंतज़ार में बरसों फाइलों में दबे रहते हैं, वहां इतने लॉ कॉलेज होने के बावजूद ऐसी दुर्दशा क्यों है ? अमूमन हर छोटे-बडे विश्वविद्यालय में विधिशास्त्र का अलग विभाग होता ही है। मगर, उन विभागों की दुर्दशा प्राइमरी स्कूलों से भी बदतर होती है। ऐसे में कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उन संस्थानों से वकालत की डिग्री लेकर निकले विधि विशेषज्ञ ऐसी समझ रखते हों कि देश की सबसे विश्वसनीय संस्था न्यायपालिका को दुरुस्त बनाए रखने में अहम योगदान दे सकें।
दरअसल, हाल ही में विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में इन्हीं सब मुद्दों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि विधि की शिक्षा में हर इलाके के लोगों को समान अवसर नहीं मिले तो सिर्फ वरिष्ठ जजों या अधिकारियों के बेटे ही जज की कुर्सी तक पहुंच पाएंगे। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे और उन्होंने भी माना कि देश में विधि शिक्षा दोहरे तरीके से चल रही है और छोटे शहर-बड़े शहर, छोटे-संस्थानों-बड़े संस्थानों का फर्क वकीलों के स्तर पर साफ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि 50 साल पहले पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि हमारे देश में विधि शिक्षा का स्तर दुनिया के मंच पर कहीं भी नहीं ठहरता और इसमें सुधार की ज़रूरत है। पचास साल बाद भी हालात और बदतर ही हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री या संबंधित मंत्री सिर्फ चिंता ज़ाहिर कर क्या बदलाव ला देंगे। आपके पास शक्तियां हैं, सोच है, लोग हैं, फिर आपको विधि शिक्षा की अहमियत क्यों नहीं समझ आती ? बहुतायत में पाए जाने वाले फटीचर वकीलों के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारें ज़िम्मेदार रही हैं।
मोइली कहते हैं कि देश भर में लॉ की पढ़ाई एक जैसी करने की कोशिश की जाएगी। एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार किया जाएगा जिसमें देश भर के वकीलों और विधि से जुड़े छात्रों का ब्योरा होगा।
फिर, इसमें से प्रतिभावान लोगों की पहचान की जाएगी। क्या ऐसा संभव है ? और पहचान हो भी गई तो क्या करेंगे। देश में न्यायपालिका की जो वर्तमान स्थिति है उस पर गौर करें तो शायद ही कोई बड़ी अदालत हो जहां मामलों की सुनवाई क्षेत्रीय भाषाओं या फिर हिंदी में की जाती है। सुनवाई हो भी जाए तो पेचीदा कानूनी धाराएं और मामलों से जुड़ी कागज़ी कार्रवाई शत-प्रतिशत अंग्रेज़ी में होती है। अब देश की हालत देखें तो ठीक से अंग्रेज़ी बोलने-समझने वाले कितने लोग हैं ? जिन धाराओं में मुजरिम को सज़ा मिलती है, जिन अनुच्छेदों के तहत सुनवाई पूरी होती है, वो इतनी पेचीदा होती हैं कि गुनाह की सज़ा भुगतने वाले तक को पता नहीं होता कि न्यायपालिका की कार्रवाई किस दिशा में गई और उसे सज़ा किस-किस आधार पर मिली। हमारी न्यायिक शब्दावली किसी भी देशी भाषा से मेल नहीं खाती मगर देश के कई लॉ संस्थानों में पढ़ाई का माध्यम अब भी अंग्रेज़ी से अलग भाषाएं ही हैं। अब ऐसी पढाई कर निकलने वाला वकील न्यायिक पेंचों को कंठस्थ करने के बावजूद पहले ही ‘’हीन भावना’’ से ग्रसित हो जाता है क्योंकि उसे अंग्रेज़ी नहीं आती ! ऐसे में उसका जज बनने का सपना सपना ही रह जाता है और बहुतेरे वकीलों की जमात में चंद ‘’ साफ-सुथरे’’ वकील ही जज बनने का सपना देख पाते हैं।(और उनमें से गिनती भर ही, जो या तो वकालत की आबोहवा में पले-बढ़े हैं या फिर किसी न्यायिक पदधारी की संतान हैं, इस कुर्सी तक पहुंच पाते हैं।)
क्या भारत देश में कई होनहार जज सिर्फ इसी आधार पर नहीं बन पाएं कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती, कहीं से भी उचित है ?
देश में विधि शिक्षा में एक जैसी प्रणाली लागू करने की बात कहना आसान है, कर पाना लगभग नामुमकिन। लॉ की पढ़ाई की स्थिति देश में एक ही ट्रेन के अलग-अलग श्रेणी के डिब्बों जैसी है। पहली श्रेणी के डिब्बों में बैंगगलोर, पुणे के बेहतरीन लॉ स्कूल आते हैं जिनके उत्पाद संस्थान से बाहर निकलते ही अक्सर देश से बाहर निकल जाते हैं और फिर किसी लॉ फर्म या विदेशी कंपनी के विधि विशेषज्ञ बन डॉलर कमाते हैं। दूसरी श्रेणी और तीसरी श्रेणी के स्कूलों से निकले वकील अलग-अलग अदीलतों में जज बनने की दौड़ में घिसते रहते हैं और देश में हर रोज़ मामलों का अंबार बढ़ता जाता है। मतलब, देश के सबसे अच्छे वकील देश की हालत सुधारने के काम बिल्कुल भी नहीं आ सके और व्यवस्था पंगु ही रह गई। दोयम दर्जे के लॉ स्कूलों में बड़ी तादाद उन छात्रों की होती है, जो या तो 60 साल की नौकरी के बाद रिटायर हो चुके होते हैं या फिर जिनके पास युवा उम्र में ही बेरोज़गारी के मुहाने पर पहुंचकर वकालत करने के सिवा कोई चारा नहीं बचता !
क्या विधि यानी लॉ के कैरियर को बाक़ी चमकदार विकल्पों के साथ खड़ा नहीं किया जा सकता ? किया जा सकता है, अगर सरकारें चाहें तो। कानून की समझ की ज़रूरत किसे नहीं पड़ती। लगभग हर किसी को। मगर, कानून की बेहतर समझ रखते कितने लोग हैं। शायद न के बराबर लोग । सबसे पहले तो ज़रूरी ये होगा कि विधि की पढ़ाई को ‘आयातित (इंपोर्टेड) शैली’ से निकालकर देशी अंदाज़ में सरलीकृत किया जाए ताकि पढ़ाई रुचिकर बने और ज़्यादा से ज़्यादा लोग (युवा छात्र) विकल्पहीन होने से पहले भी इस विकल्प के बारे में सोच सकें। ऐसा करने में वक्त तो लगेगा मगर करना ज़रूरी है। देश में अच्छे वकीलों और जजों की सख्त दरकार है जो मामलों की समझ रखते हों और पेंडिंग मामलों को निपटाने में अहम भूमिका निभा सकते हों। हमारे देश में कई बदनसीब ऐसे भी हैं जो मामले की सुनवाई के चक्कर में आधी ज़िंदगी जेल में गुज़ार देते हैं और जब मामले की सुनवाई हो पाती है, तो उनको मुकर्रर सज़ा उनकी कैद में गुज़ारी गई ज़िंदगी से बेहद कम होती है।
इसके अलावा देश में अच्छे विधि शिक्षकों की बेहद कमी है। जब अच्छे शिक्षक ही नहीं होंगे, तो विधि की समझ रखने वाले अच्छे छात्र कहां से आएंगे। ये ज़िम्मेदारी वर्तमान जजों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को उठानी होगी ताकि न्यायपालिका का हिस्सा बनने वाली अगली पीढ़ी बेहतर समझ रखने वाली हो और वो भी बेहतर शिक्षक बन सके।
वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल जैसे मंत्री अपने पूरे कार्यकाल में कई घोषणाएं करते दिखे हैं, मगर इन पर कितना अमल हो सका है, किसी से छिपा नहीं है। उनके बयान मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह आते हैं और गायब हो जाते हैं। मगर, विधि की पढ़ाई को लेकर सरकार का गंभीर होना ज़रूरी है क्योंकि न्यायपालिका बिना लाठी-डंडे के, सिर्फ विश्वास के ज़ोर पर चलने वाली संस्था है। इस संस्था से आम आदमी का विश्वास जुड़ा है। और, दयनीय शिक्षा प्रणाली से पास होकर वकील और जज बनने वालों पर कब तक हम विश्वास करेंगे, कहना मुश्किल है। पूरा लेख लिखने के बाद भी मेरा मन तो नहीं हुआ कि मैं वकील बन जाऊं। शायद इसीलिए कि वकालत की पढ़ाई से लेकर जज और न्यायपालिका का बाहरी-भीतरी ढांचा तक देशी नहीं लगता, समझ और पहुंच के लिहाज से बाहर की चीज़ लगता है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?

निखिल आनंद गिरि

Saturday, March 27, 2010

इंडिया बनाम भारतवर्ष

~शंकर शरण

अंग्रेजी कहावत है, नाम में क्या रखा है! लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह कहने पर लोग आपकी ओर अजीब निगाहों से देखेंगे कि कैसा अहमक है! पिछले कुछ महीनों से वहां के कुछ बड़े शहरों, प्रांतों के नाम बदलने को लेकर देशव्यापी विवाद चल रहा है। प्रीटोरिया, पॉटचेफ्स्ट्रोम, पीटर्सबर्ग, पीट रेटिफ आदि शहरों, प्रांतों के नाम बदलने का प्रस्ताव है। तर्क है कि जो नाम लोगों को चोट पहुंचाते हैं, उन्हें बदला ही जाना चाहिए।
यह विषय वहां इतना गंभीर है कि साउथ अफ्रीका ज्योग्राफीकल नेम काउंसिल (एसएजीएनसी) नामक एक सरकारी आयोग इस पर सार्वजनिक सुनवाई कर रहा है। प्रीटोरिया का नाम बदलने की घोषणा हो चुकी थी। किसी कारण उसे अभी स्थगित कर दिया गया है। प्रीटोरिया पहले त्सवाने कहलाता था जिसे गोरे अफ्रीकियों ने बदल कर प्रीटोरिया किया था। त्सवाने वहां के किसी पुराने प्रतिष्ठित राजा के नाम से बना था जिसके वंशज अभी तक वहां हैं।
इस प्रकार नामों को बदलने का अभियान और विवाद वहां लंबे समय से चल रहा है। पिछले दस वर्ष में वहां 916 स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं। इनमें केवल शहर नहीं; नदियों, पहाड़ों, बांधों और हवाई अड्डों तक के नाम हैं। सैकड़ों सड़कों के बदले गए नाम अतिरिक्त हैं। वहां की एफपीपी पार्टी के नेता पीटर मुलडर ने संसद में कहा कि ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदलने के सवाल पर अगले बीस वर्ष तक वहां झगड़ा चलता रहेगा। उनकी पार्टी और कुछ अन्य संगठन प्रीटोरिया नाम बनाए रखना चाहते हैं।
इसलिए नाम में बहुत कुछ है। यह केवल दक्षिण अफ्रीका की बात नहीं। पूरी दुनिया में स्थानों के नाम रखना या पूर्ववत करना सदैव गंभीर राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्त्व रखता है। जैसे किसी को जबरन महान बनाने या अपदस्थ करने की चाह। इन सबका महत्त्व है जिसे हल्के से नहीं लेना चाहिए। इसीलिए कम्युनिज्म के पतन के बाद रूस, यूक्रेन, मध्य एशिया और पूरे पूर्वी यूरोप में असंख्य शहरों, भवनों, सड़कों के नाम बदले गए। रूस में लेनिनग्राद को पुन: सेंट पीटर्सबर्ग, स्तालिनग्राद को वोल्गोग्राद आदि किया गया। कई बार यह सब भारी आवेग और भावनात्मक ज्वार के साथ हुआ। हमारे पड़ोस में भी सीलोन ने अपना नाम श्रीलंका और बर्मा ने म्यांमा कर लिया। खुद ग्रेट ब्रिटेन ने अपनी आधिकारिक संज्ञा बदल कर यूनाइटेड किंगडम की। इन सबके पीछे गहरी सांस्कृतिक, राजनीतिक भावनाएं होती हैं।
हमारे देश में भी शब्द और नाम गंभीर माने रखते हैं। अंग्रेजों ने यहां अपने शासकों, जनरलों के नाम पर असंख्य स्थानों के नाम रखे, कवियों-कलाकारों के नाम पर नहीं। फिर, जब 1940 में मुसलिम लीग ने मुसलमानों के अलग देश की मांग की और आखिरकार उसे लिया तो उसका नाम पाकिस्तान रखा। जैसा जर्मनी, कोरिया आदि के विभाजनों में हुआ था- पूर्वी जर्मनी, पश्चिमी जर्मनी और उत्तरी कोरिया, दक्षिणी कोरिया- वे भी नए देश का नाम ‘पश्चिमी भारत’ या ‘पश्चिमी हिंदुस्तान’ रख सकते थे। पर उन्होंने अलग मजहबी नाम रखा। इसके पीछे एक पहचान छोड़ने और दूसरी अपनाने की चाहत थी। यहां तक कि अपने को मुगलों का उत्तराधिकारी मानते हुए भी मुसलिम नेताओं ने मुगलिया शब्द ‘हिंदुस्तान’ भी नहीं अपनाया। क्यों?
इसलिए कि शब्द कोई उपयोगिता के निर्जीव उपकरण नहीं होते। वे किसी भाषा और संस्कृति की थाती होते हैं। कई शब्द तो अपने आप में संग्रहालय होते हैं, जिनमें किसी समाज की सहस्रों वर्ष पुरानी परंपरा, स्मृति, रीति और ज्ञान संघनित रहता है। इसीलिए जब कोई किसी भाषा या शब्द को छोड़ता है तो जाने-अनजाने उसके पीछे की पूरी अच्छी या बुरी परंपरा भी छोड़ता है। इसीलिए श्रीलंका ने ‘सीलोन’ को त्याग कर औपनिवेशिक दासता के अवशेष से मुक्ति पाने का प्रयास किया। हमने वह आज तक नहीं किया है।
सन 1947 में हमसे जो सबसे बड़ी भूलें हुईं उनमें से एक यह थी कि स्वतंत्र होने के बाद भी देश का नाम ‘इंडिया’ रहने दिया। लब्ध-प्रतिष्ठित विद्वान संपादक गिरिलाल जैन ने लिखा था कि स्वतंत्र भारत में इंडिया नामक इस ‘एक शब्द ने भारी तबाही की’। यह बात उन्होंने इस्लामी समस्या के संदर्भ में लिखी थी। अगर देश का नाम भारत होता, तो भारतीयता से जुड़ने के लिए यहां किसी से अनुरोध नहीं करना पड़ता! गिरिलाल जी के अनुसार, इंडिया ने पहले इंडियन और हिंदू को अलग कर दिया। उससे भी बुरा यह कि उसने ‘इंडियन’ को हिंदू से बड़ा बना दिया। अगर यह न हुआ होता तो आज सेक्युलरिज्म, डाइवर्सिटी, ह्यूमन राइट्स और मल्टी-कल्टी का शब्द-जाल और फंदा रचने वालों का काम इतना सरल न रहा होता। अगर देश का नाम भारत या हिंदुस्तान भी रहता तो इस देश के मुसलमान स्वयं को भारतीय मुसलमान कहते। इन्हें अरब में अब भी ‘हिंदवी’ या ‘हिंदू मुसलमान’ ही कहा जाता है। सदियों से विदेशी लोग भारतवासियों को ‘हिंदू’ ही कहते रहे और आज भी कहते हैं।
यह पूरी दुनिया में हमारी पहचान है, जिससे मुसलमान भी जुड़े थे। क्योंकि वे सब हिंदुओं से धर्मांतरित हुए भारतीय ही हैं (यह महात्मा गांधी ही नहीं, फारूक अब्दुल्ला भी कहते हैं)। अगर देश का सही नाम पुनर्स्थापित कर लिया जाता, तो आज भी मुसलमान स्वयं को हिंदू या हिंदवी ही कहते जो एक ही बात है। यह विचित्र है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे अनेक प्रांतों और शहरों के नाम बदले, लेकिन देश का नाम यथावत छोड़ा हुआ है। जिन लोगों ने मद्रास को तमिलनाडु, बोंबे को मुंबई, कैलकटा को कोलकाता या बैंगलोर को बंगलुरु, उड़ीसा को ओडीशा आदि पुनर्नामांकित करना जरूरी समझा- उन्हें सबसे पहले इंडिया शब्द को विस्थापित करना चाहिए था। क्योंकि यह वह शब्द है जो हमें पददलित करने और दास बनाने वालों ने हम पर थोपा था।
विदेशियों द्वारा जबरन दिए गए नामों को त्यागना अच्छा ही नहीं, आवश्यक भी है। इसमें अपनी पहचान के महत्त्व और उसमें गौरव की भावना है। इसीलिए अब तक जब भी भारत में औपनिवेशिक नामों को बदल स्वदेशी नाम अपनाए गए, हमारे देश के अंग्रेजी-प्रेमी और पश्चिमोन्मुखी वर्ग ने विरोध नहीं किया है। पर यह उन्हें पसंद भी नहीं आया। क्योंकि वे जानते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। ऐसे में एक दिन अंग्रेजी को भी राज-सिंहासन से उतरना पड़ेगा। इसीलिए, जब देश का नाम पुनर्स्थापित करने की बात उठेगी, वे विरोध करेंगे। चाहे इंडिया को बदलकर भारतवर्ष करने में किसी भाषा, क्षेत्र, जाति या संप्रदाय को आपत्ति न हो। वैसे भी भारतवर्ष ऐसा शब्द है जो भारत की सभी भाषाओं में प्रयुक्त होता रहा है। बल्कि जिस कारण मद्रास, बोम्बे, कैलकटा, त्रिवेंद्रम आदि को बदला गया, वह कारण देश का नाम बदलने के लिए और भी उपयुक्त है। इंडिया शब्द भारत पर ब्रिटिश शासन का सीधा ध्यान दिलाता है। आधिकारिक नाम में इंडिया का पहला प्रयोग ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ में किया गया था जिसने हमें गुलाम बना कर दुर्गति की। पर जब वह इस देश में व्यापार करने आई थी तो यह देश स्वयं को भारतवर्ष या हिंदुस्तान कहता था। क्या हम अपना नाम भी अपना नहीं रखा सकते?
अगर देश का नाम पुन: भारतवर्ष कर लिया जाए तो यह हम सब को स्वत: इस भूमि की गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति से जोड़ता रहेगा जो पूरे विश्व में अनूठी है। अन्यथा आज हमें अपनी ही थाती के बचाव के लिए उन मूढ़ रेडिकलों,वामपंथियों, मिशनरी एजेंटों, ग्लोबल सिटिजनों से बहस करनी पड़ती है जो हर विदेशी नारे को हम पर थोपने और हमें किसी न किसी बाहरी सूत्रधार का अनुचर बनाने के लिए लगे रहते हैं।
इसीलिए जब देश का नाम भारतवर्ष या हिंदुस्तान करने का प्रयास होगा- इसका सबसे कड़ा विरोध यही सेक्युलर-वामपंथी बौद्धिक करेंगे। उन्हें ‘भारतीयता’ और ‘हिंदू’ शब्द और इनके भाव से घोर शत्रुता है। यही उनकी मूल सैद्धांतिक टेक है। इसीलिए चाहे वे कैलकटा, बांबे आदि पर विरोध न कर सकें, पर इंडिया को बदलने के प्रस्ताव पर वे चुप नहीं बैठेंगे। यह इसका एक और प्रमाण होगा कि नामों के पीछे कितनी बड़ी सांस्कृतिक, राजनीतिक मनोभावनाएं रहती हैं। वस्तुत: समस्या यही है कि जिस प्रकार कोलकाता, चेन्नई और मुंबई के लिए स्थानीय जनता की सशक्त भावना थी, उस प्रकार भारतवर्ष के लिए नहीं दिखती। इसलिए नहीं कि इसकी चाह रखने वाले देश में कम हैं। बल्कि ठीक इसीलिए कि भारतवर्ष की भावना कोई स्थानीयता की नहीं, राष्ट्रीयता की भावना है। लिहाजा, देशभक्ति और राष्ट्रवाद से किसी न किसी कारण दूर रहने वाले, या किसी न किसी प्रकार के ‘अंतरराष्ट्रीयतावाद’ से अधिक जुड़ाव रखने वाले उग्र होकर इसका विरोध करेंगे।
यानी चूंकि इंडिया शब्द को बदल कर भारतवर्ष करना राष्ट्रीय प्रश्न है, इसीलिए राष्ट्रीय भाव को कमतर मानने वाली विचारधाराएं, हर तरह के गुट और गिरोह एकजुट होकर इसका प्रतिकार करेंगे। वे हर तरह की ‘अल्पसंख्यक’ भावना उभारेंगे और आधुनिकता के तर्क लाएंगे।
वैसे भी, उत्तर भारत की सांस्कृतिक-राजनीतिक चेतना और स्वाभिमान मंद है। यहां वैचारिक दासता, आपसी कलह, विश्वास, भेद और क्षुद्र स्वार्थ अधिक है। इन्हीं पर विदेशी, हानिकारक विचारों का भी अधिक प्रभाव है। वे बाहरी हमलावरों, पराए आक्रामक विचारों आदि के सामने झुक जाने, उनके दीन अनुकरण को ही ‘समन्वय’, ‘संगम’, ‘अनेकता में एकता’ आदि बताते रहे हैं। यह दासता भरी आत्मप्रवंचना है।
डॉ राममनोहर लोहिया ने आजीवन इसी आत्मप्रवंचना की सर्वाधिक आलोचना की थी जो विदेशियों से हार जाने के बाद ‘आत्मसमर्पण को सामंजस्य’ बताती रही है। अत: इस कथित हिंदी क्षेत्र से किसी पहलकदमी की आशा नहीं। इनमें अपने वास्तविक अवलंब को पहचानने और टिकने के बदले हर तरह के विदेशी विचारों, नकलों, दुराशाओं, शत्रु शक्तियों की सदाशयता पर आस लगाने की प्रवृत्ति है। इसीलिए उनमें भारतवर्ष नाम की पुनर्स्थापना की कोई ललक या चाह भी आज तक नहीं जगी है। अच्छा हो कि देश का नाम पुनर्स्थापित करने का अभियान किसी तमिल, मराठी या कन्नड़ हस्ती की ओर से आरंभ हो। यहां काम दक्षिण अफ्रीका की तुलना में आसान है, पर हमारा आत्मबल क्षीण है।

(जनसत्ता से साभार)

Thursday, November 05, 2009

महात्मा गांधी के नाम एक ख़त

नीलेश माथुर गुवाहाटी में व्यापर करते हैं। कवि-हृदयी हैं। देश की हालत को बापू के नाम एक पत्र लिखकर बयाँ कर रहे हैं।

पूज्य बापू,

सादर प्रणाम, आशा ही नहीं हमें पूर्ण विश्वास है कि आप कुशलता से होंगे। हम सब भी यहाँ मजे में हैं। देश और समाज की स्थिति से आपको अवगत करवाने के लिए मैंने ये ख़त लिखना अपना कर्त्तव्य समझा। कुछ बातों के लिए हम आपसे माफ़ी चाहते हैं जैसे कि आपके बताए सत्य और अहिंसा के सिद्धांत में हमने कुछ परिवर्तन कर दिए हैं, इसे हमने बदल कर असत्य और हिंसा कर दिया है, और इसमें हमारे गांधीवादी राजनीतिज्ञों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, वो हमें समय समय पर दिशाबोध कराते रहते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं। इन्हीं के मार्गदर्शन में हम असत्य और हिंसा के मार्ग पर निरंतर अग्रसर हैं, बाकी सब ठीक है।

आपने हमें जो आज़ादी दिलवाई उसका हम भरपूर फायदा उठ रहे हैं। भ्रस्टाचार अपने चरम पर है, बाकी सब ठीक है।
हर सरकारी विभाग में आपकी तस्वीर दीवारों पर टँगवा दी गयी है और सभी नोटों पर भी आपकी तस्वीर छपवा दी गयी है। इन्हीं नोटों का लेना-देना हम घूस के रूप में धड़ल्ले से कर रहे हैं, बाकी सब ठीक है। स्वराज्य मिलने के बाद भी भूखे नंगे आपको हर तरफ नज़र आएँगे, उनके लिए हम और हमारी सरकार कुछ भी नहीं कर रहे हैं, हमारी सरकार गरीबी मिटाने की जगह गरीबों को ही मिटाने की योजना बना रही है, बाकी सब ठीक है।

बापू हमें अफ़सोस है की खादी को हम आज तक नहीं अपना सके हैं, हम आज भी विदेशी वस्त्रों और विदेशी वस्तुओं को ही प्राथमिकता देते हैं, बाकी सब ठीक है।

अस्पृश्यता आज भी उसी तरह कायम है। जिन दलितों का आप उत्थान करना चाहते थे, उनकी आज भी कमोबेश वही स्थिति है, बाकी सब ठीक है।

बापू आजकल हम सत्याग्रह नहीं करते, हमने विरोध जताने के नए तरीके इजाद किये हैं। आज कल हम विरोध स्वरुप बंद का आयोजन करते हैं और उग्र प्रदर्शन करते हैं, जिसमें कि तोड़फोड़ और आगज़नी की जाती है, बाकी सब ठीक है।
जिस पाकिस्तान की भलाई के लिए आपने अनशन किये थे, वही पाकिस्तान आज हमें आँख दिखाता है, आधा काश्मीर तो उसने पहले ही हड़प लिया था, अब उसे पूरा काश्मीर चाहिए। आतंकियों की वो भरपूर मदद कर रहा है। हमारे देश में वो आतंक का नंगा नाच कर रहा है। आये दिन बम के धमाके हो रहे हैं और हजारों बेगुनाह फिजूल में अपनी जान गँवा रहे हैं, बाकी सब ठीक है।

बांग्लादेश के साथ भी हम पूरी उदारता से पेश आ रहे हैं, वहां के नागरिकों को हमने अपने देश में आने और रहने की पूरी आज़ादी दे रखी है, करोड़ों की संख्या में वे लोग यहाँ आकर मजे में रह रहे हैं, और हमारे ही लोग उनकी वजह से भूखे मर रहे हैं, बाकी सब ठीक है।

बापू हम साम्प्रदायिक भाईचारा आज तक भी कायम नहीं कर पाए हैं। धर्म के नाम पर हम आये दिन खून बहाते हैं। आज हमारे देश में धर्म के नाम पर वोटों की राजनीति खूब चल रही है। साम्प्रदायिक हिंसा आज तक जारी है। बाकी सब ठीक है।

बापू आज आप साक्षात यहाँ होते तो आपको खून के आंसू रोना पड़ता, बापू आपने नाहक ही इतना कष्ट सहा और हमें आज़ादी दिलवाई, हो सके तो हमें माफ़ करना।

आपका अपना-
एक गैर जिम्मेदार भारतीय नागरिक

Monday, August 17, 2009

किंग खान पर हंगामा है क्यूं बरपा ?

फौजिया रियाज़ दिल्ली के एफएम रेनबो में रेडियो जॉकी हैं.......बैठक पर इनका ये पहला लेख है....आप पढ़कर बताएं कि बैठक की ये नई सदस्य कैसा लिखती हैं....



हाल ही में अमेरिका के एक एयरपोर्ट पर शाहरुख़ खान "द सुपर स्टार" के साथ दो घंटों तक पूछताछ चली। इस पर इस कदर हंगामा बरपा कि भारतियों की इज्ज़त से खिलवाड़ हो रहा है और भी न जाने क्या क्या...कई लोगों का कहना है कि ये भारतीयों के साथ ज़्यादा होता है, मुसलमान के साथ ज़्यादा होता है,अमेरिका एक रेसिस्ट देश है, वहां नाम देख कर पूछताछ की जाती है, साथ ही कि ये हमारे मान की बात है, हमे भी अमेरिकियों से इसी तरह पेश आना चाहिए...या रब! हद हो गई!! हम ख़ुद कितने रेसिस्ट हैं, दोगले हैं, इसका एहसास ही नही है, ख़ुद हमारे यहाँ हर दाढ़ी वाले को शक की नज़र से देखा जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ नॉर्थ ईस्टर्न लोगों को अपना नही समझा जाता, ख़ुद हमारे यहाँ विदेशी पर्यटकों को तंग किया जाता है, ख़ुद हमारे यहाँ लोगों को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है...इतना हल्ला किसलिए क्यूँकि वो शाहरुख़ खान है? न जाने कितने कश्मीरी नौजवानों के सर पर आतंकवादी का लेबल लगा कर मार दिया जाता है, न जाने कितने मुसलमान नौजवानों को कॉलेज में एडमिशन के दौरान तिरछी नज़रों से देखा जाता है, न जाने कितने गरीब मासूम लोगों को माओवादी बताकर एनकाउंटर किया जाता है...तब कोई उफ़ भी नही करता, अपने देश में होता है तो सब चुप्पी साध लेते हैं और गैर मुल्क में हुआ तो हाय तौबा...क्यूँ? माना जो हुआ वो ग़लत हुआ लेकिन उससे ज़्यादा ग़लत तो पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के साथ हुआ...लेकिन तब न्यूज़ चैनल वाले ही चिल्लाये थे, अभी आम इंसान को भी चिल्लाता देख रही हूँ...अरे ज़्यादा जोश में आने की ज़रूरत नही है..इनका कोई भरोसा नही कल को इमरान हाश्मी की तरह कह देंगे "मेरे साथ कोई बदसलूकी नही हुई,मेरे बयां को तोड़-मरोड़ के पेश किया गया था"

फौजिया रियाज़