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Tuesday, September 01, 2009

मेरी बहन लता का बिना नाम वाला प्रेमी सपने में दिखा ...

ब्लू फिल्म भाग-8

पिताजी किसी का उधार चुकाने के लिए बैंक से बीस हज़ार रुपए निकलवाकर लाए थे। शायद किसी बाहर के आदमी को भनक लग गई होगी। उस दोपहर मैं अकेला घर में था, जब दो लड़के घर में घुस आए। बाहर का दरवाज़ा खुला छूट गया था। एक के हाथ में देसी कट्टा था। उसने मेरी कनपटी पर उसे रख दिया और बीस हज़ार रुपए माँगे। मैं डर गया। मैंने अन्दर जाकर बक्से में से रुपए लाकर उसे दे दिए। वे चले गए। मैं उनके जाने के बाद चिल्लाया। गली में उस वक़्त कोई नहीं था, इसलिए किसी ने उन्हें देखा भी नहीं होगा। यह कहानी मैंने माँ और पिताजी के आने पर सुनाई। उनके चेहरे, आँखों और शरीर की जो प्रतिक्रिया थी, उसे विशेषणों का इस्तेमाल करके नहीं समझाया जा सकता। उसे वह व्यक्ति कुछ कुछ समझ सकता है, जिसने आठ सौ रुपए महीना कमाने वाले स्कूल मास्टर के बच्चों को तनख़्वाह वाली शाम घर की छत पर खड़े होकर पिता की बाट जोहते देखा हो। वह कुछ और अधिक समझ सकता है जिसने उनकी लकड़ी जैसी टाँगों और खुरदरे हाथों पर भी ग़ौर किया हो। वे भी कुछ कुछ समझ सकते हैं जिन्होंने जीवविज्ञान के प्रेक्टिकल में बेहोश मेंढ़क काटते हुए ग़लती से उसकी आँखों में देख लिया हो या जो जेठ की गर्मी में घर्र-घर्र करते टेबल फैन के आगे चौथे नम्बर की खाट पर सोए हों और उमस भरी काली रात हो, जिसमें तारे न दिखाई देते हों।
मुझे महसूस होता था कि मैं जंगल के किसी छोटे पेड़ पर बने घोंसले में बैठा नीला कबूतर हूं और पेड़ के तने के पास बहुत सारी जंगली बिल्लियाँ बैठी हैं। मैं उनसे प्रेम करता हूं और उन्हें भूखा मरते नहीं देख सकता, इसलिए उन्हें दूसरे कबूतरों का पता बता देता हूं। दूसरे कबूतर सफेद हैं, जिन्हें शाँति की झूठी तलाश में उड़ाया गया है। बिल्लियाँ लड़कियों जैसी थी।
कुछ दिनों तक रागिनी मुझसे ज़्यादा बातें करने लगी थी। उन दिनों हमने बर्फ़ से ढके ऊँचे सफेद पहाड़ों पर तिकोनी छत वाली
झोंपड़ियों में हनीमून के सपने देखे। उन सपनों में हमने एक दूसरे की कसमें खाई और चिकोटियाँ काटीं। हमने आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर एक दूसरे को ढूंढ़ने छूने का खेल खेला, जिसमें मैं बार-बार हारा। मैंने उससे कहा कि मेरी आँखें ठीक हो जाएँगी तो मैं जीतूंगा। उसने सुना और वह भूल गई। उसने मुझसे यह भी कहा कि मैंने पहले उसे आँखों की तकलीफ़ के बारे में क्यों नहीं बताया? मैंने कहा कि मैंने बताया था। उसने कहा, नहीं। मुझे भी ऐसा याद आ गया कि मैंने नहीं बताया था। हम हँसे, मुस्कुराए।
हम साइकिल पर बैठकर निकलते और वह किसी ढलान वाली सड़क पर से मुझे गहराई तक ले जाती। हम अकेले पवित्र पेड़ों पर लाल चूनरें बाँधते और उनके नीचे सो जाते। सपने में सो जाना, सोते हुए सपने देखने का उल्टा था। जागने के सपनों में सो जाना दुविधा में डाल देता था कि सो रहे हैं या जाग रहे हैं? नींद के सपनों में सोना दो बार सोना था। इस तरह दो बार जागना नहीं हो सकता था। जागना एक ही बार होता। फिर भी जागना सोने से लम्बा खिंच जाता था।
मैंने एक रात सोते हुए सपने में लता को उस लड़के के साथ देखा जो उसके पीछे आता था और जिससे वह प्रेम करने लगी थी। मैं लता से उसका नाम भी पूछना भूल गया था, इसलिए वह सपने में बिना नाम के ही दिखा। मैंने लता को लगभग निर्वस्त्र देखा और चौकंकर जग गया। दुनिया का वह हिस्सा, जिसे हम अक्सर फास्ट फॉरवर्ड करके अपनी आँखों के आगे से हटा देना चाहते हैं, वही केकड़े की तरह हमारी पुतलियों पर चिपककर बैठ जाता है और हर समय दिखाई देता है। आँखें बन्द कर लेने पर भी। मैं न चाहते हुए भी उसके रिश्ते के प्रति असहज था। अपना ध्यान बाँटने के लिए मैंने कुछ और चीजों के बारे में सोचना शुरु कर दिया, जैसे कश्मीर समस्या का क्या हल निकल सकता है या गोल्फ़ सच में कोई खेल है या नहीं? मैंने अख़बार में गोल्फ़ खेलने वाले लोगों के बारे में पढ़ा ज़रूर था, लेकिन मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता था जिसे गोल्फ़ खेलना आता हो। यादव के पिता अमीर थे और उनके घर में फ़्रिज़ भी था, लेकिन वह भी किसी ऐसे आदमी को नहीं जानता था। कुछ साल पहले तक मैं समझता था कि यह किसी जानवर का नाम है। मैंने एक दोपहर लता से पूछा,” तुम्हारा लौंग और इलायचियों के बारे में क्या ख़याल है?” घर में हम दोनों ही थे। वह अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी।
- ख़याल मतलब क्या? -
मतलब तुम क्या सोचती हो?
वह हँस पड़ी- कोई लौंग इलायची के बारे में क्या सोचेगा भला? -
हम अपने शब्दों को खाते जा रहे हैं। मुझे लगता है कि बीस साल बाद मैं तुमसे लौंग और इलायची के बारे में पूछूंगा तो शायद तुम इनका नाम भी सालों के बाद सुन रही होगी...तुम चौंक जाओगी। यह और बात थी कि मैं बीस साल नहीं जिया। वह कुछ सेकंड रुककर मुझे देखती रही और फिर लिखने लगी। -
क्या लिख रही हो? -
कम्प्यूटर के नोट्स हैं... -
मुझे चिढ़ सी है कम्प्यूटर से। -
क्यों?
उसने हैरानी से मेरी ओर देखा। -
यूं ही। बहुत सी चीजों से है...बिना वज़ह...
- तुम्हें थोड़ा आध्यात्मिक हो जाना चाहिए। -
और बादाम के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है? - हम उसे भी खाते जा रहे हैं। है ना?
-तुम कुछ नया नहीं सोच सकती। मुझे याद नहीं कि मैंने बादाम कब खाए थे? - मैंने तो कभी नहीं खाए। मुझे याद है। - अगर हम अपने दरवाज़े के बाहर...दहलीज़ पर खड़े होकर या बेहतर होगा कि किसी ऊँचे पत्थर पर खड़े होकर चिल्लाकर यही बात कहें तो क्या लोग हमारा यक़ीन करेंगे? - मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा चिल्लाऊँगी। चिल्लाने का मौका मिले तो मेरे पास इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी बातें हैं कहने के लिए...
- मैं चिल्लाना चाहता हूं लता।
- मैं सही कह रही हूं कि तुम्हें थोड़ा धार्मिक हो जाना चाहिए।
- पहले तुमने आध्यात्मिक कहा था।
- मुझे तो दोनों एक से ही लगते हैं।
- कौन दोनों?
- तुम और बादाम।

ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसी। मैं मुस्कुरा उठा।
- नाम क्या था उस लड़के का?
- किस... (‘किस’ पर उसका और उसकी हँसी का अचानक रुकना मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे उस वक़्त यह नहीं पूछना चाहिए था।)
लड़के का? - जिसने पिताजी को गाली दी थी।
वह चुप हो गई और चुप ही रही। मैं हमेशा बातों को गलत ढंग से शुरु करता था। मैं अक्सर वह सिरा पकड़ता था, जिसके बाद संवाद की संभावनाएँ ही समाप्त हो जाती थीं। मैंने कहा- माँ बूढ़ी हो रही है। माँ के घुटनों में दर्द रहता है। - माँ ने कहा तुमसे?
- नहीं, वह कहेगी नहीं। - देखो तुम उन्हें बताना मत प्लीज़। - तुम भाग तो नहीं जाओगी?
- मुझे नहीं पता...
- हमारे पास कैमरा होता तो मैं तुम्हारी फ़ोटो खींचकर रख लेता। मैं चाहता था कि वह कह दे कि इसकी क्या ज़रूरत है? मैं कहीं भागी नहीं जा रही। लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा। मैं बोला- मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे।
- यह सब मत सोचा करो। यह डर सबको लगता है।
- बड़ी बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम ख़ुद उन्हें जलाएँगे लता। मुझे जलाना होगा...
- अच्छा अब चुप हो जाओ बस...
- माँ की आँखें भी जल जाएँगी लता...माँ के बाल...माँ की हथेलियाँ। जाने क्या हो रहा था! मैं बेचैन हो उठा। यदि वह फ़िल्म का दृश्य होता तो लता मेरे लिए पानी लेकर आती। पानी पीकर मैं कुछ बेहतर महसूस करता।
- उसका नाम वीरेन्द्र है।
........
...............
(हम बहुत सी चीजों के बारे में कभी बात नहीं करते ना लता? जैसे हम मुर्गों और माँसाहारियों के बारे में बात नहीं करते, हम मरने और जन्म की बातों से भी कतराते हैं। हमने स्त्री और पुरुष के रिश्ते पर भी कभी बात नहीं की। मैं तुम्हें सारे सपने भी नहीं सुना सकता। मैं वे सब बातें भी नहीं बता सकता, जो मुझे दिन रात कचोटती हैं। हम सब ट्रेन में अचानक मिल गए अजनबियों या दो सभ्य साथी कर्मचारियों की तरह ही उम्र भर बात करते हैं। हम कभी शरीर की बात नहीं कर पाते, न ही आत्मा की। दार्शनिक होने का बहुत मन होता है तो भगवान की बात करने लगते हैं। मैं तुम्हारे लिए जो सोचता हूं और जो अपरिभाषित सा स्नेह मेरे पास है, वह मैं नहीं बता सकता। वीरेन्द्र या कोई और तुम्हारे जीवन के बड़े अंश पर अधिकार कर लेगा, यह सोचकर ही मैं काँप जाता हूं। यह पाप या पागलपन नहीं है। यह गंगा या सती सीता जितना पवित्र है, लेकिन तुम्हें कहूंगा तो पाप जैसा बन जाएगा। अहं अस्पष्ट और असहज है लता, जिसे कहना और सुनना ही हमें नहीं सिखाया गया। सबका ज़ोर हमें मुहावरे, लोकोक्तियाँ व्याकरण और कविताओं की सप्रसंग व्याख्याएँ सिखाने पर रहा है। एक समझदार साज़िश के तहत हमें यह विकल्प बताया ही नहीं गया कि कविताएँ गढ़ी भी जा सकती हैं। तुम नहीं जानती लता...इस सदी के सबसे महान कवियों की कविताएँ उनकी आँखों से खून बनकर टपकी हैं और तुम विश्वास नहीं करोगी, जब उन्हें पागलखानों में ले जाया जा रहा थ तो उनका गर्म ख़ून सड़कों पर कविताएँ लिखता हुआ चला। बाद में इन्होंने उन सड़कों को तोड़कर चिकने राजमार्ग बना दिए लता, जिन पर हम फर्राटे से गाड़ियाँ दौड़ाते हुए बड़े-बड़े शहरों से और बड़े-बड़े शहरों की ओर जाते हैं। स्कूल की किताबों में मैंने और तुमने उन कविताओं को कभी नहीं पढ़ा। हमने साखियाँ पढ़ी और उनके ऊपर आधी छुट्टी में परांठे रखकर खाए। हम सब एक गहरे अँधेरे में हैं लता और यह पहला या आखिरी अंधकार नहीं है। हमने बड़ी-बड़ी लाइटें जला ली हैं और हम अपनी अपनी रोशनी के लिए खुश हैं। हम इतने डरपोक हैं कि आँखें बन्द करते हैं तो डर जाते हैं। मैं ये लैम्प, ट्यूबलाइटें, बल्ब, दिए और मोमबत्तियाँ तोड़कर उस लम्बे गहन अँधेरे में आँखें खोलकर सीधा तनकर खड़ा हो जाना चाहता हूं, जैसे हम स्कूल में प्रार्थना में हुआ करते थे और उसके बाद जन-गण-मन गाते थे। मुझमें प्रेम ख़त्म होता जा रहा है लता और मैं सच में तुम पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता, लेकिन इसकी दोषी तुम भी हो। मैं नहीं समझा सकता कि मेरा जीना कितना भयानक है? हम धर्मशालाओं में शादियाँ करेंगे लता, हमें रातों में किसी अकेले कमरे में छिपकर बच्चे पैदा करने होंगे और हम अपने पिताओं को जलाते जाएँगे। यह दुनिया मेरी नहीं है लता। मैं यहाँ नहीं रहना चाहता...मैं थूकता हूं इसके अस्तित्व पर।)

गौरव सोलंकी

Saturday, February 07, 2009

सोने का पिंजर (4)

चौथा अध्याय

"बेटा कमाता है डॉलर और मां-बाप रुपैया..."

ख़ैर, हम भी लाखों माँ-बापों की तरह दौबारा भी असफल हो गए। कहते हैं भारत में व्यक्ति के पास पैसा हो या न हो लेकिन स्वाभिमान पूरा होता है। ग़रीब आदमी के पास तो कुछ ज्यादा ही होता है। धनवान तो स्वाभिमान बेचकर ही धनवान बना है तब उसके पास तो यह नहीं होता लेकिन बेचारा ग़रीब तो ग़रीब ही इसलिए है कि उसने कभी अपने लिए किसी से नहीं माँगा। जो भी मिला उसे भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। अतः हमारे स्वाभिमान ने भी हमें प्रताड़ित किया और कहा कि बस अब बहुत हो गया, अमेरिका जाने का चाव। बार-बार जाकर अपना अपमान कराने से तो अच्छा है कि अपनी ममता का ही गला घोंट लो। बच्चों से कह दो कि यदि तुम्हें भारत की और वहाँ बसे माता-पिता की याद आ जाए तब तुम्हीं आ जाना। लेकिन परिस्थितियां कब किसके रोके रुकी हैं? वे तो कभी भी एक-दूसरे की आवश्यकता अनुभव करा ही देती है। किसका मन नहीं होता कि बेटे की गृहस्थी जाकर देखें या बेटी का सुख। लेकिन जब रिश्तों पर पहरे बिठा दिए गए हों तब तो आदमी मन मसोसकर ही रहेगा न? बेचारा इंसान कर भी क्या सकता है।
मुझे बचपन में माँ के द्वारा सुनी कहानी याद आती है। जब बहन की शादी दूर-दराज के गाँव में हो जाती थी और भाई उससे मिलने जाता था तब कितने पापड़ बेलने पड़ते थे? लेकिन वो दूरी तो दस-बीस कोस की ही थी अतः सारे संघर्षों के बाद भी मिलना सम्भव हो ही जाता था। लेकिन सात समुन्दर पार ऐसे ही तो नहीं पहुँचा जा सकता? फिर कोलम्बस वाला जमाना भी गया कि स्वयं का जहाज लेकर निकल पड़े दुनिया नापने, या खोजने। अब तो सारी व्यवस्था ही चाक-चौबंद हैं।
हमारे एक मित्र ने एक ताना मारा, बोले कि अरे अमेरिका नहीं गए? फिर स्वतः ही बोले कि अरे अभी तुम्हारा वहाँ क्या काम? जब बाल-बच्चा होता है तब जाते हैं भारतीय माता-पिता तो। हम जानते हैं कि तुम्हारे यहाँ तब भी जरूरत नहीं होती हमारी। हमारे जैसे नहीं कि घर में जापा होने वाला है तो कम से कम दो-तीन औरते तो चाहिए हीं। एक अस्पताल जाएगी, एक घर देखेगी और एक बारी-बारी से उनका सहयोग करेगी। हमारे यहाँ कितनी निकटता आ जाती है, सास-बहू के रिश्तों में। जब बहू दर्द से छटपटा रही होती है तब सास उसके सर पर हाथ फिराती है, भगवान से प्रार्थना करती है। जापे में कैसे तो खुशी-खुशी सारे ही काम करती है। तभी तो प्यार बढ़ता है। लेकिन तुमने इन सारे सुखों को भी छीन लिया है। हमारे यहाँ से बहुत सी सास और बहुत सी माँ वहाँ जाती हैं लेकिन फिर कहती हैं कि अरे मेरा तो यहाँ कोई काम ही नहीं है। लेबर रूम तक में पति ही जाता है, बेचारी महिला तो बाहर ही बैठी रहती है। पोतड़े धोने और सुखाने का सुख भी नहीं। सब कुछ डिस्पोज़ेबल है, पति ही सबकुछ कर देता है। लेकिन फिर भी लगता है कि कोई न कोई तो पास रहना ही चाहिए। भारतीय मन मानता ही नहीं। कैसे अकेला छोड़ दे? हमारे यहाँ तो कहा जाता है कि औरत का दूसरा जन्म होता है। सचमुच में होता भी है, उस एक मिनट में एक नवीन जीव जन्म लेता है तो दूसरा अपना अस्तित्व बचाता है। ऐसे में कैसे छोड़ दें अकेला?
तुमने परिवार की जरूरतों को समाप्त किया है, लेकिन हमने नहीं किया। हमें तो आज भी लगता है कि हमारी जरूरत है। मेरे साथ तो कैसा संयोग था कि जब पोता आने वाला था तब वह स्वयं ही आकर मुझे न्यौता दे गया था कि दादी मैं आ रहा हूँ। बहू भारत आयी थी, जैसे ही उसने भारत की धरती पर कदम रखा, पोते के आने के संकेत मिलने लगे। मेरा खून सबसे पहले मुझे बताने चला आया कि मैं आ रहा हूँ। अब हमारी चिन्ताएं बढ़ गयी। तुम्हारे पहरे को कैसे तोड़ेंगे? मैंने पहले गुस्से में भगवान से कह दिया था कि अब मैं मेरे स्वाभिमान को नहीं गिरवी रखूँगी। अब तू ही मुझे ससम्मान अमेरिका भेजेगा तभी वहाँ जाऊँगी। अब मेरा धर्म-संकट पैदा हो गया। एक तरफ पोता खुद न्यौत गया था तो दूसरी तरफ मेरी प्रतिज्ञा। क्या करूँ और क्या न करूँ? लोग कहते हैं कि भगवान नहीं होता, मैं कहती हूँ कि होता है। मैंने प्रतिज्ञा की, भगवान ने सुनी और मुझे मौका दे दिया। तभी मेरे पास सूचना आयी कि विश्व हिन्दी सम्मेलन इस बार अमेरिका में हो रहा है। मेरे लिए भगवान ने पुल बना दिया था, जैसे राम ने रामसेतु बनाया था। लेकिन फिर कठिनाई वीज़ा की ही थी। भगवान ने फिर मदद की। एक दिन संदेशा आया कि भारत सरकार तुम्हें सम्मानित कर रही है। मुझे वीज़ा की कार्यवाही नहीं करनी पड़ी। बस भारत सरकार का कागज़ लिया और चले गये तुम्हारे चित्रगुप्त के कार्यालय। साथ में पति भी थे, जिनकी डॉक्टरी के कारण हमारे पर प्रतिबंध लगा हुआ था। अब वे बोले कि मुझे तुम्हारे साथ जाने देंगे? मैंने कहा कि जब भगवान ने इतना किया है तो यह भी करेंगे। जीत गया हमारा भगवान और हार गए तुम। जीत गया हमारे खून का प्यार और धरे रह गए तुम्हारे पहरे। कृष्ण ने जब जन्म लिया था तब सारे पहरे तोड़कर वह यशोदा मैया की गोद में चले ही गए थे। कंस देखता ही रह गया था। ऐसे ही आखिर में ससम्मान तुम्हें हमें बुलाना ही पड़ा।
हम तुम्हारी धरती पर आ रहे थे, इसलिए नहीं कि तुम्हारी धरती को छूने में कोई गर्व था। बस हमारा रक्त हमें पुकार रहा था, सारा प्रयोजन बस यही था। मेरे स्वाभिमान की जीत हुई थी, मेरे प्रेम की जीत हुई थी। मैं जान गयी थी कि प्रेम में कितनी ताकत होती है? तुम हमारे रक्त को कितना ही हमसे दूर कर दो लेकिन संसार की कोई ताकत नहीं जो तुम्हारे मंसूबों को पूरा कर दे। हम भारतीय प्रेम को सबसे बड़ा मानते हैं, हम परिवार को अपने दिल में बसाकर चलते हैं, हम से परिवार छूट नहीं सकता। तुम एक पीढ़ी को हमसे दूर ले जा सकते हो, लेकिन दूसरी पीढ़ी स्वतः ही हमारी ओर खिंची चले आती है। मेरे इस उदाहरण से तो तुम भी मानने पर मजबूर हो जाओगे। तुम्हारा भौतिक सुख केवल चार दिनों की चाँदनी हैं, बस तुम देखते रहो, कुछ दिनों में ही हमारे भारतीय प्रेम की जीत होगी।
लेकिन जो कुछ भगवान ने किया, इसलिए नहीं कि मुझे साहित्यकारों के मध्य सम्मानित करवाना था अपितु इसलिए कि इस माध्यम से मुझे ससम्मान अमेरिका भेजना था। मेरे साथ राजस्थान का दल भी था। मैं उस दल की नेत्री भी थी, लेकिन भगवान चाहता था कि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो, मैं सम्मान सहित वहाँ जाऊँ। तुमने मेरे अंदर जो हीनता लाने का सकंल्प किया था उसे मेरे भगवान ने समाप्त कर दिया।
तुमने सिद्ध करने का प्रयास किया था कि तुम मेरे वैभव के समक्ष कुछ भी नहीं हो। मैं तुम जैसे नाचीज़ों को अपनी धरती पर पैर भी नहीं रखने दूँगा। तुमने हमारी संतानों में भी यही भाव भरने का प्रयास किया कि तुम्हारे माँ-बाप तुच्छ हैं, तुम डॉलर में कमाते हो और तुम्हारे माँ-बाप रूपयों में?
कहाँ तुम्हारा वैभव और कहाँ उनका?
तुम्हारे यहाँ बसे भारतीय हमें कहते हैं कि तुम डर्टी फैलो हो, तुम्हारे यहाँ क्या है? आओ हमारा वैभव देखो। हमारे घरों में गलीचे बिछे हैं, और तुम्हारे घरों में?
हमारी सड़कें काँच-सी चमकती हैं और तुम्हारी?
हम कहते कि वो तुम्हारा कैसे हो गया और यह केवल हमारा कैसे हो गया? चलो अच्छा है कि तुम्हारा वैभव बड़ा है तो थोड़ा हमें भी सुख दे दो।
वहाँ से गुर्राहट आती है कि यह सुख हमने अर्जित किया है, भला तुम्हें कैसे दे दें? तुम्हारा और हमारा स्टेटस बराबर कैसे हो सकता है? भले ही तुम हमारे माँ-बाप हो लेकिन अन्तर दिखायी देना चाहिए दो पीढ़ियों में।
बेचारा भारतीय पूछता है कि तुम जब छोटे थे तब हमने तो अन्तर नहीं रखा था, हमने सारे ही अपने सुख त्याग दिए थे जिससे तुम्हारा भविष्य सुखी हो सके। फिर आज क्या हुआ? हम भारतीय मानते हैं कि पच्चीस वर्ष हम संतान के लिए सुख तलाशते हैं और आने वाले पच्चीस वर्ष संतान तलाशे सुख माँ-बापों के लिए।
लेकिन तुमने ऐसी पट्टी आँखों पर बाँधी है कि उन्हें अब माता-पिता दिखायी ही नहीं देते। बेचारे वे भी क्या करें, यहाँ भारतीयों को लगता है कि डॉलर में बहुत ताकत है, लेकिन जब वहाँ देखते हैं कि अरे इनकी स्थिति तो हम से बहुत ही खराब है। भला दो-तीन हजार डॉलर में होता ही क्या है? हमारे यहाँ जिसे पाँच हजार रूपया मिलता है, वह भी पेट ही भरता है और वार-त्योहार मिठाई खा लेता है, मेले में जा आता है। तुम्हारे यहाँ भी पाँच हजार डॉलर वाला इंसान यही कर पाता है। कैसे बताए वह अपने माँ-बापों को कि केवल मुँह पर चिकनाई लगाकर घी खाना दिखा रहा हूँ।
खैर हमें भी अब अपने आप पर गर्व होने लगा। हमें भी लगा कि हम भी इंसानों की बिरादरी में शामिल हो गए हैं। शायद अब हमें भी हमारी संतानें इज्ज़त के साथ देख लें? मैंने देखे हैं भारत में ऐसे-ऐसे बागबां कि अमिताभ बच्चन जो अपने आप में सेलेब्रिटी थे, उनकी संताने तुम्हारे यहाँ चली गयीं और वे बेचारे रातो-रात बौने हो गए। उनका अस्तित्व नगण्य हो गया। सारी दुनिया उन्हें सम्मान से बात करती है लेकिन उनकी संताने उन्हें दो कौड़ी का समझती हैं। यह है तुम्हारा प्रभाव। क्या कोई सुंदर पिंजरे में रहने से श्रेष्ठ हो जाता है? हम भारत में पढ़ाते हैं कि जो दूसरों को श्रेष्ठ समझे वो श्रेष्ठ होता है। हमारे यहाँ माता-पिता भगवान सदृश्य होते हैं। उनकी सेवा करना ही सबसे बड़ा पुण्य होता है। लेकिन तुमने सभी कुछ तो छीन लिया है। जो कभी भगवान थे आज वे तुम्हारे दर पर भिखारियों की तरह तुम्हारे रहमो-करम पर पड़े हैं। हमारे गाँव का व्यक्ति पूरे गाँव का चाचा, ताऊ बनकर राज करता है लेकिन तुम्हारे यहाँ ममता के लिए, दो रोटी खाकर वक्त बिताता है।
कितने हैं जो ममता को परास्त कर पाते हैं? कितने हैं जो दूसरों में अपनी ममता तलाशते हैं? शायद मुट्ठीभर होंगे हम जैसे स्वाभिमानी लोग जो दुनिया को अपना परिवार मानते हैं और भारत के प्रत्येक बच्चे को अपना बच्चा। हम ममता का विस्तार करते हैं इसलिए तुम्हारे द्वारा दिए हीनबोध को स्वीकार नहीं करते। हमारा भगवान भी नहीं करता, हमें वह भी कहता है कि मत स्वीकार करो हीनबोध, अपने स्वाभिमान से रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।
आखिर 12 जुलाई 2007 को मेरे हाथ में टिकट था। मैं तुम्हारी धरती पर आ रही थी। मेरा खून मुझे पुकार रहा था। उसे तुम्हारा नागरिक बने पाँच माह हो चुके थे और मैंने उसे अभी तक केवल कम्प्यूटर के सहारे ही देखा था। मेरे सामने केवल उसकी सूरत थी, और था एक काँच का पर्दा। मैं उसे देख सकती थी, बात कर सकती थी लेकिन उसे छू नहीं सकती थी। मेरी ममता कसमसा रही थी। मैंने उसे संसार में आते हुए नहीं देखा था, उस पारिवारिक अनुभव से मैं दूर रह गयी थी लेकिन अब मुझे उसके पास जाने से कोई नहीं रोक सकता था, तुम भी नहीं। मेरा मन कह रहा था कि मैं ज़ोर से चिल्लाऊँ और कहूँ कि ‘मैं आ रही हूँ अमेरिका’। तेरा सुख देखने, तेरा वजूद देखने, तेरा अभिमान देखने। मैं भी तो देखूँ कि तू कितना बड़ा है? ऐसा तेरा वैभव कितना बड़ा है? जो तू ममता को ही विस्मृत करा देता है? ऐसा क्या है तुझमें, जो मेरे भारत में नहीं है? मैंने तुझ पर विश्वास किया और अपने सारे दुखों को, अभावों को भारत में ही छोड़ दिया, केवल अब तो मुझे सुख ही सुख जो देखना था। मेरा तन और मन यहाँ तक की आत्मा भी आप्लावित होने वाली थी तेरे सुख से। देखूँ कितना सुख है तेरी धरती पर?

डॉ अजित गुप्ता

Saturday, January 31, 2009

सोने का पिंजर (3)

तीसरा अध्याय

गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम....!

एक नाम सबको याद हो जाता है, वीजा। लेकिन यह होता क्या है? कैसे बनता है? अधिकांश नहीं जानते। तुम्हारे यहाँ से संदेशा आता है कि वीजा बनवाना है, तो पासपोर्ट चाहिए।
अरे आप लोगों ने अपना पासपोर्ट भी नहीं बनवाया? कैसे लोग हैं आप?
लेकिन बेटा हम पासपोर्ट का क्या करते? यहाँ तो एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए केवल टिकट चाहिए।
नहीं, नहीं, सब फालतू की बाते हैं, आधुनिकता का यही तकाज़ा है कि आपके पास पासपोर्ट हो, क्रेडिट कार्ड हो, एटीएम कार्ड हो। चलिए अब बना लीजिए फटाफट।
तीन महीने पासपोर्ट में लग गए, अब वीज़ा की तैयारी शुरू करो। आपकी इनकम का स्टेटमेंट चाहिए। बेंक में कम से कम दो-चार लाख रूपए पड़े होने चाहिए। वह भी सेविंग अकाउण्ट में। दो-चार एफ.डी. भी होनी चाहिए। लगना चाहिए कि आप के पास धन-दौलत है, आप वापस आएँगे। घर का मकान होना तो निहायत ज़रूरी है। स्वयं का व्यापार है तो वीज़ा मिलना आसान है, क्योंकि अपना व्यापार करने तो वापस आना ही पड़ेगा। आपके बैंक में इतना रूपया होना चाहिए कि आपको अमेरिका में अकेले भी रहना पड़े तो रह सकें। क्या पता आपका बेटा आपको धक्का मारकर निकाल दे या फिर आपको ही वहाँ उसके साथ रहना नहीं भाए। फिर क्या करेंगे आप? सरकार क्यों आपका बोझा उठाए? इसलिए मकान के कागज़ भी चाहिए, इनकम टेक्स के कागज़ भी। जितने सबूत ले जा सको, ले लो। पता नहीं कब किसकी जरूरत पड़ जाए। यहीं से शुरू होता है हमारा हीनता-बोध। बात-बात पर झुँझलाहट सुनायी पड़ती है कि अरे, आपके पास यह नहीं है, यह नहीं है। अरे आपका वेतन इतना कम है? यहाँ तो चपरासी को भी इससे ज़्यादा मिलता है। हमे लगने लगता है कि हम वाकई बहुत ग़रीब हैं। हमारे पास दिखाने को तो कुछ भी नहीं है। क्या हुआ जो हम यहाँ स्वाभिमान से रहते हों, लेकिन तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है।
अब कैसे बताएँ कि हमने तो पूरे परिवार का पेट पाला है। भारत में वेतन हज़ारों में ही मिलता है। एक डॉक्टर हो या फिर इंजीनियर, वेतन तो कुछ हज़ार बस। अब उसमें से कहाँ से लाएं लाखों की जमा रकम? भारत में तो बुद्धि-सम्पन्न संतानों की प्राप्ति के लिए संस्कार किए जाते हैं। बस एक ही बात का ध्यान रखा जाता है कि संतान बुद्धिशाली हो, जिससे वह पढ़-लिखकर माँ-बाप का सहारा बन सके। घर में बेईमानी का पैसा नहीं आना चाहिए, नहीं तो संतान बिगड़ जाएगी, पैसे का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए, नहीं तो संतान के संस्कार बिगड़ जाएँगे। बस एक ही बात रहती है कि कैसे भी हों, संतान को संस्कारवान बना दें। बस एक बार संतान कुछ बन जाए तो हम गंगा नहायें। हमारा धर्म तो संतान में ही सीमित रहता है। संतान कुछ बन गयी तो पुण्य, नहीं बनी तो पाप। हम तो बुद्धि के भरोसे ही संतानों को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। पैसे के भरोसे तो विद्या नहीं खरीदी जाती है। कोई भी नहीं चाहता कि हम हमारे बच्चों के लिए विद्या खरीदें। लेकिन अब तो चलन ही दूसरा हो गया। बच्चे पूछते हैं कि तुमने हम पर कितना रूपया खर्च किया? रूपया खर्च किया हो तो ठीक, नहीं तो तुमने कुछ नहीं किया।
सारा खेल ही पैसे का हो गया। हमने तो बुद्धि को महत्त्व दिया और तुमने कहा कि नहीं पैसा होना चाहिए। अब कहाँ से लाएं पैसा, जिसके सहारे वीजा मिले? खैर, जैसे-तैसे करके दिखा ही दिए कि कुछ लाख रूपये तो हमारे पास भी हैं। मकान भी है, गाड़ी भी है आदि, आदि। थैला भरकर सबूत एकत्र कर लिए और चल दिए खुशी-खुशी तुम्हारे दरबार में। हमने सोचा था कि भला तुम्हें क्या तकलीफ होगी हमारे वहाँ जाने में? हम कौन सा बसने जा रहे हैं, हम तो बस देखने ही तो जा रहे हैं तुम्हारा स्वर्ग। लेकिन तुमने कहा कि नहीं। तुम सब लालची देश के हो, जब तुम्हारी युवा-पीढ़ी हमारे लालच में आ जाती है, तब तुम क्यों नहीं? क्या गारंटी है कि तुम वहाँ बसना नहीं चाहोगे? फिर तुम्हारे पास तो ममता का कारण भी है।
वीजा साक्षात्कार के समय एक प्रश्न उछाला गया- “क्या करते हो?”
मेरे पति ने कहा- “डॉक्टर हूँ। “
“तुम्हारे पेशेंट को बाद में कौन देखेगा? नहीं, तुम्हें नहीं मिल सकता वीजा।“
एक मिनट के कुछ हिस्सों में ही फरमान जारी हो गया कि, स्वर्ग के दरवाजे तुम्हारे लिए नहीं खुल सकते। बहस की गुंजाइश नहीं, धक्के मारकर बाहर कर दिए जाओगे।
लोग कहने लगे कि डाक्टर से उन्हें डर लगता है कि कहीं वहीं बस नहीं जाए।
लेकिन वहाँ तो दो साल और पढ़ना पड़ता है, तब ही नौकरी सम्भव है? और इस उम्र में कौन पढ़ेगा? क्या कोई भी डॉक्टर अपनी कमाई छोड़कर वहाँ बसेगा, इस उम्र में?
लेकिन तुम्हारा स्टैम्प मौत का फरमान जैसा होता है। सारे सपने एक बार में ही बिखर जाते हैं। बरसों का सिंचित स्वाभिमान चूर-चूर हो जाता है।
लोग पूछते हैं- “अरे तुम्हें नहीं मिला वीजा? उसे तो मिल गया था। “
“क्या पूछा था तुमसे?”
“तुम्हें बताना ही नहीं था कि हम डॉक्टर हैं।“ जितने मुँह उतनी सलाह। आप क्षण-क्षण टूटते रहते हो। तुम्हारे वीजा-ऑफिस में लोग घण्टों बैठे रहते हैं, अब आस जगे? कुछ हँसते हुए बाहर निकलते हैं और कुछ रोते हुए। बाहर घूम रहे भिखारियों को कोई सौ रूपया दान देता है तो कोई दस रूपया। भिखारी भी जानते हैं कि किसे वीजा मिला है और किसे नहीं। तुम्हारे लिए तो रोज़ की ही बात है लेकिन हमारे लिए तो जीवन में पहली बार होती है। ‘बे मुरव्वत से तेरे कूँचे से हम निकले’ कहते हुए हमारे जैसे जाने कितने ही लोग तुम्हारे यहाँ से धकियाए जाते हैं। क्या पैसे वाले और क्या बिना पैसे वाले।
आदमी को कहा जाता है कि एक बार और प्रयास कर लो, पहले तो तुमसे चूक हो गयी अब सावधानी बरतना। कितने ही ऐसे लोग हैं जो दूसरी बार में भी धकियाए जाते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें किस बात के लिए उम्र-कैद की सजा सुनायी गयी है। क्यों नहीं वह अपने बच्चों से मिलने जा सकता? एक असुरक्षा-बोध मन में समाने लगता है। कहीं ऐसा नहीं हो कि हम कभी जा ही नहीं पाएँ? जरा सा बुखार भी मन को चिन्तित कर देता है कि हम बेटे के पास नहीं हैं, उसके सर पर हाथ फेरने को मन तरस जाता है। हर तरफ बेचारगी छा जाती है। बार-बार तुम्हारे यहाँ आकर बेइज्जत होने का मन भी नहीं करता। भारत में हर आदमी अपनी इज्जत को ही रोता है, उसे चाहे रोटी नहीं मिले लेकिन वह जिल्लत की रोटी कभी नहीं चाहता।
कितने चक्कर काटे आखिर तुम्हारे यहाँ? फिर कौन सी तुम्हारी फीस कम है? एक बार मैं पूरे दस हजार से भी ज्यादा खर्च हो जाते हैं, एक आदमी के। हजारों रूपयों में कमाने वाला भारतीय भला इतना पैसा तो अपने ऊपर कभी एक-बारगी में भी खर्च नहीं करता है और वह एक मिनट में ही तुम्हें दे आता है! केवल तुम्हारी ना सुनने के लिए! लोग तो कहते हैं कि यह भी तुम्हारे लिए एक धंधा है, पैसे कमाने का। रोज ही लोगों को धकियाते हो और उनकी फीस डकार जाते हो। बेचारे कुछ करना चाहें तो फिर डरा देते हो। बच्चे कहते हैं कि ऐसा भूल कर भी नहीं करना, नहीं तो जिन्दगी भर कम्प्यूटर में फीड हो जाएगा आपका नाम-ब्लैक लिस्ट में। फिर क्या पता बेटे-बेटियों को भी कठिनाई का सामना करना पड़े? ना बाबा ना, ऐसा काम नहीं करना। अपमान का घूँट पीकर रह जाओ।
मुझे तो लगता है कि तुम शरीफों के साथ ही ऐसा व्यवहार करते हो, बदमाशों को तो तुम रोक नहीं पाते। सारे ही आतंककारियों के पास तुम्हारा ग्रीन कार्ड है। सभी को तो तुमने सुरक्षा प्रदान की है। हाँ शायद तुम्हें ऐसे आतंककारियों की भी तो जरूरत पड़ती होगी न? तुम्हें तो कभी अफगानिस्तान को, कभी ईराक को नेस्तनाबूत करना जो पड़ता है। सारी दुनिया पर बादशाहत करने के लिए हिंसक लोग भी चाहिए ही न?। कैसी है तुम्हारी दुनिया, सारी दुनिया ही तुमने समेट रखी है। तुम भी क्या करो? यूरोपियन्स ने तुम पर आकर अधिकार जो कर लिया है। तुम्हारे वाशिंदे तो बेचारे बहुत सीधे-सादे लोग हैं। वे इतने आराम-तलब हैं कि उन्हें केवल आराम से मतलब है, काम से नहीं। उनके इतने बड़े देश को न जाने कितने यूरोपीय देशों के वासियों ने अपने कब्जे में कर रखा है?
जब तुम्हारी भूमि वीरान पड़ी थी, कुछ लाख लोग ही तो थे तुम्हारे पास। उस समय अंग्रेज वहाँ घुस आए थे। उन्होंने कितनी मार-काट की थी तुम्हारे यहाँ, तुम्हें कुछ याद है? तुम्हारा इतिहास कहता है कि अंग्रेज यहाँ आए और उन्होंने लाखों अमेरिकन्स को मारा। जो जितने अमेरिकन्स को मारता था उसे उतना ही बड़ा पुरस्कार मिलता था। उन्हें लगा कि अरे यह स्थान तो सुरक्षित है। यूरोप तो एशिया से लगा हुआ है, यहाँ तो सुरक्षा पर खतरा मँडरा सकता है। उन्होंने तुम्हारी धरती पर ही अपना आशियाना बनाने का प्रण कर लिया। सौलहवीं शताब्दी में तुम्हारे यहाँ जंगल और समुद्र के अलावा और क्या था? इंसानों की बस्ती कैसे बसे यही प्रश्न था अंग्रेजों के पास। तब वे अफ्रीका से गुलामों के रूप में ले आए थे वहाँ के वाशिंदों को। कुदरत भी कैसा खेल खेलती है, गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम! तुम्हें तब जरूरत थी ऐसे मेहनतकश इंसानों की जो तुम्हारी धरती को निखार सके, उसे रूप दे सके। तब तुमने किसी को भी वीजा से नहीं बाँधा। बस बेचारे काले लोग बँधे तुम्हारे एग्रीमेंट से। आज जो तुम देख रहे हो, वह सब उन काले लोगों की मेहनत का ही परिणाम है। कल क्या आज भी तो तुम्हारे यहाँ काले लोग ही तुम्हारे शहरों को साफ-सुथरा रख रहे हैं। तुम्हारे यहाँ के गोरे तो आज भी आराम-तलब ही बने हुए हैं।
मैं तुम्हारे वीजा-नियमों की बात कर रही थी। मैंने लाइन में खड़े लोगों के मन में एक भय देखा है जो उनकी आँखों में उतर आता है।
तुम कहते हो कि हमारे यहाँ हर कोई आकर बसना चाहता है। हम क्या करें? हमें नियम कड़े रखने पड़ते हैं।
लेकिन क्या तुम्हारे ये कड़े नियम सुपरिणाम देते हैं? कितने पंजाबी, कितनी बार शादी कर-कर के तुम्हारे यहाँ अपने पूरे परिवार को ले गए हैं? तुमने कितनों को रोक लिया? एक बार रोका, दो बार रोका, लेकिन उन्होंने कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया। लेकिन बेचारे वो माँ-बाप जिनके लाड़ले वहाँ पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं, तुमने उन्हें भी रोक लिया। एक तरफ तो तुम अपने नियमों की दुहाई देते हो, दूसरी तरफ तुम लाचार दिखायी देते हो।
तुम्हारे शहरों के नियम इतने कड़े हैं कि आदमी वीजा समाप्त होने के बाद एक दिन भी नहीं रह सकता तो फिर तुम्हें वीजा देने में डर क्यों है? लेकिन यह बात नहीं है, तुम केवल माँ-बाप को ही रोकते हो। पंजाबी व्यक्ति जो वहाँ बसे भारतीयों को भोजन खिलाते हैं भला उन्हें तुम क्यों रोकोगे? यदि तुमने उन्हें रोक लिया तो भारतीय भूखा नहीं मर जाएगा? आज सारे ही अमेरिका में पंजाबी लोग अपने खाने से भारतीयों को वहाँ टिकने में सहयोग कर रहे हैं। यदि उन्हें भारतीय खाना नहीं मिलेगा तब फिर वे कैसे आजीवन तुम्हारी सेवा कर सकेंगे? इसलिए तुम्हारा वीजा-कार्यालय केवल डर पैदा करता है, वह भी केवल सीधे लोगों के मन में। तुम जिसे चाहते हो उसे बुला लेते हो और जिसे नहीं, उसे भगा देते हो।
फिर तुम बूढ़े माँ-बापों को अपने यहाँ आने भी क्यों दो? यदि भारत के सारे ही माता-पिता वहाँ जाकर बस गए तब तो तुम्हारा बहुत नुक्सान हो जाएगा। तुम तो सामाजिक-सुरक्षा के नाम पर बहुत बड़ा टैक्स वसूल करते हो। बूढ़े माता-पिता की सुरक्षा करना तुम्हारी सरकारों का कार्य है। अतः वे बुढ़ापे में इस टैक्स की सहायता से उन्हें आर्थिक सहयोग देते हैं। भारतीय भी टैक्स देते हैं लेकिन उनका टैक्स तो पुनः उनके माता-पिता के लिए काम नहीं आता। वह तो तुम्हारे पास ही रह जाता है। न ही इस अतुल धनराशि को तुम भारत भेजते हो। कभी देखी है तुमने भारत में आकर उन माता-पिता की स्थिति को? हमारे भारत में हमारा एक ही सपना होता है कि हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाएं जिससे हमारा बुढ़ापा सुधर जाए। इसलिए बेचारे माता-पिता खुद रूखी खाते हैं लेकिन अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजते हैं। अपने जीवन की सारी जमा-पूँजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं। जब बच्चों के मन में आता है कि वे भी अमेरिका जाएं तब भी वे उन्हें भेजते हैं। यहाँ ऐसे बहुत से माता-पिता मिल जाएँगे जिन्होंने लाखों रूपया कर्ज लिया है अपने बच्चों को तुम्हारे पास भेजने के लिए। आज वे बेचारे कर्ज में डूबे हैं और तुम उनके बच्चों से अपना देश उन्नत कर रहे हो।
हमने हिम्मत करके एक बार और तुम्हारे वीजा-कार्यालय में दस्तक दी। इस बार हमारी बेटी कि जिद थी कि नहीं भैया से मिलकर आएँगे। हम इस बार भी बड़ी आशा से तुम्हारे दरबार में चले आए कि शायद इस बार तुम्हारे यहाँ हमारी सुनाई हो जाए। लेकिन इस बार भी तुमने हमें टका सा जवाब दे दिया। कारण भी बड़ा अजीब था, हमारे आगे एक वृद्ध दम्पत्ति थे, उनका साक्षात्कार पूरा हुआ और हम आगे बढ़े।
मेरी बेटी ने उनसे पूछ लिया कि अंकल क्या हुआ?
तुम्हारी ऑफीसर ने देख लिया। बस फिर क्या था, वह एकदम चिढ़ गयी। गुस्से में बोली कि उनसे क्या पूछ रही थीं?
मैंने बात को सम्भालने की कोशिश भी की लेकिन बात तो बिगड़ गयी थी। उनका डर कायम रहना चाहिए, यदि यह डर ही मिट गया तब फिर कैसे काम चलेगा?
बस हमसे पूछा कि वेतन कितना है? बेचारे भारतीयों का वेतन तो हजारों में ही होता है, बता दिया। अरे यह तो बहुत कम है, और धड़ाक से लगाया स्टेम्प और हो गया हजारों रूपयों का नास। बेटी कुछ बोलने को हुई तो जवाब मिला कि तुम चुप रहो, तुम्हारे कारण ही नहीं दे रही हूँ, इन्हें तो मैं एक बार कन्सीडर कर भी लेती लेकिन तुम्हें तो कदापि नहीं।
कैसा मानसिक अवसाद दे जाते हैं तुम्हारे ये अफसर? कभी तुमने सोचा है? लेकिन तुम क्यों सोचोंगे? तुम्हारे लिए तो हम केवल कीड़े-मकोड़े हैं। तुम्हारे यहाँ आकर भीड़ बढ़ाने वाले और तुम्हारे संचित धन को हड़पने वाले। तुम जानते हो कि हमारी संताने कभी प्रतिक्रिया स्वरूप तुम्हें नहीं छोड़कर आएँगी। तुम्हें तो उनसे मतलब है। वे तुम्हारे देश की उन्नति में सहायक जो हैं। फिर तुम चालीस प्रतिशत के करीब उनसे टेक्स भी तो वसूलते हो। तुम उन्हें क्या देते हो? वे तो वहाँ जाकर अपना शाही जीवन ही भूल जाते हैं। बेचारे किस मानसिक तनाव में रहते हैं। आधे के करीब तो तुम पैसा वापस ले लेते हो, फिर वे क्या तो खाए और क्या बचाए? वे कैसे अपने माता-पिता को पैसे भेजे? वे तो स्वयं पाई-पाई बचाकर वीकेण्ड मनाते हैं। उनसे ज्यादा सुख से तो उनके माता-पिता भारत में रहते हैं जो हजारों रूपया ही कमाते हैं।
हमारे यहाँ टैक्स बचाने के कितने साधन हैं, लेकिन तुम्हारे यहाँ नहीं। चालीस प्रतिशत मतलब चालीस प्रतिशत। कहीं कमी नहीं। तुम्हारे यहाँ एक साधारण भारतीय को पाँच या छः हजार डॉलर मिलते हैं, तुम उसमें से दो हजार डॉलर से अधिक तो काट ही लेते हो। एक-डेढ़ हजार मकान किराए में चला जाता है। बाकी बचते हैं दो या तीन हजार। अब उसमें क्या खाए और क्या बचाए? हमने जिन बच्चों को फूल जैसा पाला था, पानी भी जिन्होंने कभी हाथ से नहीं पीया था आज वे ही हाथ बर्तन माँज रहे हैं। हमारे यहाँ लड़के तो कभी हिलते भी नहीं, लड़कियों को तो हम कह भी देते हैं कि हमारा रसोई में हाथ बँटा दो। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो बेचारे लड़के ही बर्तन माँजते रहते हैं।
यहाँ हर आदमी पूछता है कि अरे नौकर नहीं है क्या? कितना ही समझा दो लेकिन यहाँ के आदमी के सर से नौकर का भूत निकलता ही नहीं। वे समझ ही नहीं पाते कि वहाँ नौकर रखना आसान नहीं है? एक घण्टे के दस डॉलर देने पड़ते हैं। नौकर को इतना पैसा दे दें तो फिर खाएँगे क्या? हमारे जैसे नहीं कि हजार-पाँच सौ में बाई मिल जाती है जो सारा दिन काम कर देती है। गरीब से गरीब आदमी भी बर्तन-वाली तो रख ही लेता है। हमारे यहाँ घर की बहू को अगर बर्तन माँजने पड़े तो हमें शर्मिंदगी होती है। लोग कहते हैं कि कैसा घर है जहाँ बेचारी बहु को बर्तन माँजने पड़ रहे हैं? लोग बहु के आते ही बर्तनवाली तो लगा ही लेते हैं। अब तुम्हारे यहाँ क्या बहु और क्या दामाद, सभी तो गू-मूत साफ करते हैं।
फिर भी होड़ लगी है तुम्हारे यहाँ आने की। जैसे स्वर्ग किसी ने नहीं देखा लेकिन सभी स्वर्ग ही जाना चाहते हैं। वैसे ही तुम्हारा जाप करते हैं लोग यहाँ। अमेरिका जाने का अर्थ है जीवनभर के पापों का धुलना। जब कुछ लोगों को वीजा नहीं मिलता तो वे भी गलत तरीके अपनाते हैं। दलालों के झाँसे में आते हैं और कभी तो उन्हें दलाल अमेरिका के जहाज में बैठा पाता है और कभी नहीं। न जाने कितने ही युवा और बुजुर्ग इस झाँसे में आकर अपना सब कुछ खो बैठते हैं। एक तरफ तुम्हारा ऐलान है कि हमारे यहाँ नियम इतने कड़े हैं कि हमारी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। और दूसरी तरफ तुम इतने डरते हो वीजा देने से? क्या तुम्हारी पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकारा है जो बिना वीजा के वहाँ रहते हैं? यह दोष तो हमारी पुलिस पर ही तुम लगाते हो। फिर तुम्हें डर कैसा?

डॉ अजित गुप्ता
क्रमश:

Saturday, January 24, 2009

सोने का पिंजर (2)

दूसरा अध्याय

क्या धरा है ऐसी ममता में जहाँ की धरती पर मच्छर हैं, मक्खी हैं।

चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा है, अल्मारी से शक्कर का डिब्बा जैसे ही उतारा तो पता लगा कि अरे शक्कर तो है ही नहीं। अब चाय कैसे बने? बैठकखाने में मेहमान बैठे हैं। माँ धीरे से बेटी को पुकारती है, और फुसफुसाहट करती हुई बेटी को समझाती है कि ‘पीछे के दरवाजे से जा और पड़ौस की काकी से एक कटोरी शक्कर माँग ला।’ शक्कर पीछे के दरवाजे से आ जाती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ, बहुत कठिन है, रीत गये डिब्बे में शक्कर की आवक, वह भी पीछे के दरवाजे से। बेटा-बहू नौकरी पर गए, माँ अकेली है। घर का सारा काम निपट गया है, अब घर की डोली पर बैठकर पास वाली से बातें करेंगे। कितना सकून भरा है यह क्षण। एक पल भी एकान्त नहीं, अकेले होने का डर नहीं।
तुम्हारे पास एकान्त-साधना का बहुत समय है। बेटा-बहू या बेटी-दामाद नौकरी पर गए और अकेले हो गए बूढ़ा-बूढ़ी।
बूढ़ा बोलने लगा कि "अरी भागवान कैसे सुंदर दिन आए हैं, सारा जीवन बीत गया लेकिन तुझ से एकान्त में बात करने का अवसर ही नहीं मिला। अब देख यहाँ केवल तू है और मैं हूँ। सारा दिन अपना है।"
बुढ़िया भी खुश हो गयी, बोली कि "हाँ तुम सच कहते हो। और देखो कैसा आराम भी है! नल में गर्म और ठण्डा पानी दोनों ही आते हैं, फटाफट बर्तन साफ हो जाते हैं। अपने देस में तो मरी महरी के सौ नखरे थे, कभी आती और कभी नहीं। सर्दी में उसे गर्म पानी चाहिए था तो पहले मरी सिगड़ी पर गर्म करके देती थी पानी और बाद में जब गैस आ गयी तब उस पर पानी गर्म करके देती थी, तभी उसके हाथ चलते थे। यहाँ सारे नखरों से ही दूर हैं, देखों तो हम कैसे सब मिलजुल कर काम कर लेते हैं।" फिर हँसकर बोली कि "वहाँ तो तुम भी खटिया तोड़ते थे, लेकिन यहाँ तो मेरे साथ हाथ बँटा ही लेते हो।"
बूढ़ा बोला कि "मेरे मन में विचार आता है कि हम गाँव में बेचारी बड़ी बहू को बेकार में ही डाँटते रहते थे। सारा काम वो ही करती थी, तू भी खटिया पर पड़ी चाय पीती थी और बेचारी बहू खाना भी वहीं खिला देती थी। तब भी तू उसे गाली दिए बिना रहती नहीं थी। आज क्या हुआ तेरी जुबान को? अब तो तू एकदम चुपचाप है, कभी तूने अपने हाथ से पानी भी नहीं पीया और यहाँ तो तू बर्तन भी माँज रही है।"
सब समय-समय का खेल है। क्या करें, अब दोनों ही नौकरी करे हैं तो हमें भी तो कुछ करना ही पड़ेगा न! फिर ठाले बैठे यहाँ करे भी तो क्या? मरा टी.वी. पर भी तो अंग्रेजी में ही गिट-पिट आती रहे है। फिर अचानक ही मायूस हो जाती है और बोलती है कि "जी, अपने देस कब चलोगे?"
"क्यों यहाँ आने को तू ही तो बड़ी तड़प रही थी।"
"वो तो सही है, लेकिन अपने घर-बार की याद आने लगी है। पड़ौसन की बहु के बाल-बच्चा होने वाला था, अब तक हो गया होगा। घर में गीत गँवे होंगे। सारी ही मुहल्ले की औरते आयी होंगी।"
"लेकिन तेरे बिना तो गीतों में मजा ही नहीं आया होगा। तेरा गला ही तो सबसे अच्छा था।"
"अजी ऐसा नहीं करें कि अपन भी यहाँ गीत गवा लें।"
"कहाँ गवाएँगी? आस-पड़ौस से गौरी-काली औरतों को बुलाएँगी कि मेरे साथ गीत गाओ।"
"नहीं जी, तुम तो मजाक करो हो, मैं कह रही थी कि एक दिन मंदिर ही चलें, वहाँ भजन ही गाएँगे।"
"चल अच्छा है, बेटे को आने दे, बात करेंगे।"
"अरे अपन ही चल चलें, नीचे मोटर-गाड़ी कुछ तो मिल ही जाएगी, पूछते-पूछते चले जाएँगे।"
"नीचे मोटर-गाड़ी? यहाँ तेरा शहर है जो घर के बाहर ही टेम्पों मिल जाएगा? तूने देखा नहीं कैसी बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। सड़कों पर बस गाड़ियाँ ही दौड़ती रहे हैं, आदमी तो दिखे ही ना है। किससे पूछेगी रास्ता? अब बेटे को आने ही दे।"
"अरे बेटा तो नौकरी से थका-हारा आएगा, रात को। तब कौन सा मन्दिर और कौन से भजन?"
"अब के शनिवार को कह देखेंगे।" बूढ़े ने आश्वासन दिया।
"कल ही तो शनिवार है। आज शाम को ही बात चलाएँगे।"
शुक्रवार की शाम है, बेटा-बहू दोनों ही काम से जल्दी आ गए हैं। आते ही बेटा बोला कि "माँ, कल हम सब घूमने जाएँगे। बहुत दिनों से कहीं गए नहीं हैं तो इस वीकेंड पर समुद्र किनारे घूमेंगे। वहाँ के होटल की बुकिंग बहुत मुश्किल से मिली है।"
"बेटा हम वहाँ जाकर क्या करेंगे? हमें कहीं किसी मंदिर में ही छोड़ आ। सारा दिन भजन गाने में ही निकल जाएगा।"
"अरे यहाँ इतना आसान नहीं है, जितना अपने गाँव में था। वहाँ छोड़ भी दूँगा तो सारा दिन क्या करोगे? फिर आप मेरा मूड मत बिगाड़ो। बस मैं जैसा कहता हूँ वैसा करो।
समुद्र किनारे देखना कैसी-कैसी मछलियाँ हैं? ऐसा सी-वर्ल्‍ड तुम्हारे गाँव में नहीं है।"
"बेटा, गाँव तो वह तेरा भी है।"
"हाँ, वही।" बेटे ने बड़ी अनिच्छा से कहा।

देखा तुमने, कैसे बेटा अपने ही गाँव को अपना कहने में शर्म कर रहा है। वह तुम्हें अपना बता रहा है। भला तुम उसके कैसे हो सकते हो? तुम क्या नहीं जानते कि मनुष्य की तन की और मन की जरूरते अलग-अलग होती हैं। तन कुछ और चाहता है और मन कुछ और। तन तो सारे ही सुख चाहता है लेकिन मन अपने अतीत में ही लौट जाना चाहता है। मुझे लगता है कि तुमने दुनिया को कितना दिया है इसका हिसाब तो मेरे पास नहीं है, लेकिन लोगों के मन के संतोष को तुमने जरूर छीन लिया है। सारे ही सुखों के बीच भारतीय व्यक्ति तुम्हारी धरती पर रहता है, लेकिन उसका मन उसे अपनी धरती की ओर खींचता है। मैं अपने मन की बात बताऊँ, मेरी उम्र 57 वर्ष होने को है, मैंने अपना बचपन जिस धरती पर बिताया उसे छूटे तैतीस वर्ष से भी अधिक हो गए। लेकिन आज भी सपने चाहे किसी के आएँ, सपने में घर तो वहीं बचपन का होता है। यह क्या रहस्य है, मुझे अभी तक समझ नहीं आया! मैं तुम्हें बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि मन का ऐसा ही रहस्य है। बचपन का स्वाद ही उसकी जुबान पर होता है। बचपन में जब माँ गुड़ का हलुवा बनाती थी, तो उसकी महक आज भी नथुनों में बसी है। तुम्हारे यहाँ कहाँ है वह महक? बस जब मन उस बचपन की महक के लिए तड़पता है तब तुम्हारे गुदगुदे बिस्तर पर उसे नींद नहीं आती। यौवन में तो मन के ऊपर तन हावी रहता है लेकिन जैसे ही यौवन ढलने लगता है, मन अपना करतब दिखाना शुरू कर देता है।
यौवन में तुम्हारी चकाचौंध सभी को तो अपनी ओर आकर्षित करती है। भारत के घर से बाहर कदम रखते ही नाक पर रूमाल रखना पड़ता है। टूटी सड़क पर, पानी का जमाव आम बात है। घर से धुले-साफ कपड़े पहनकर बाहर निकले, सड़क पर आए और तेज गति से आती मोटर-साइकिल ने छपाक से पानी को उछाल दिया। सफेद कलफ लगे कपड़े कीचड़ से सन गए। कहीं कच्ची बस्तियाँ बसी हैं, नीले प्लास्टिक के कपड़ों से तने है छोटे-छोटे घर। वहीं सूअर भी हैं और कुत्ते भी। मनुष्य के बच्चे और जानवरों के बच्चों में अंतर नहीं दिखायी देता इन बस्तियों में। एक तरफ ऐसी बस्तियाँ हैं तो दूसरी तरफ आलीशान कोठियाँ खड़ी हैं। यही अन्तर लोगों को तुम्हारी ओर आकर्षित करता है। सपने सत्य करने के लिए तुम्हारी धरती उन्हें पुकारती है। वे अपने चारों तरफ पसरी गन्दगी को मिटाने का संकल्प नहीं लेते, अपितु स्वयं ही भागने का मार्ग ढूँढ लेते हैं। जरा सा पढ़ने में तेज क्या हुआ, वह सपने में तुम्हें ही देखता है। पंजाब का लड़का तो तुम्हारे यहाँ ही ढाबा खोलना चाहता है। उसे पता है कि भारत की जीभ बहुत चटोरी होती है, उसे यहीं के मसालों की आदत होती है। वह तुम्हारे यहाँ आ जाता है अपना तंदूर लेकर। नान बनने लगती है, भटूरे बनने लगते हैं।
तुम भी जानते हो कि भारत के खाने का जवाब नहीं, अतः आने दो पंजाबियों को। भारत से इतने इंजीनियर, डाक्टर यहाँ आएँ हैं, उन्हें भारत का खाना नहीं मिलेगा तब कहीं वे भाग नहीं जाएँ? तुमने उन्हें आने दिया। तुमने हर उसको आने दिया जो तुम्हारे काम का था। लेकिन तुमने उसे नहीं आने दिया जो तुम्हारे काम का नहीं था। इसी आवाजाही में हमारी अँगुली से भी हाथ छूट गया। तुम्हारे यहाँ की शिक्षा का एक स्तर है, ऐसा विश्वप्रसिद्ध हो चला है। हमारे जैसे लाखों माँ-बापों ने सोचा कि बेहतर शिक्षा जरूरी है। हम भी गाँव की देहरी से निकलकर बेहतर शिक्षा के लिए शहर आए थे तो आज हमारे बच्चों का भी अधिकार बनता है कि वे भी बेहतर शिक्षा पाएँ। हम गौरव से भरे हुए थे, कि हमने हमारे बच्चों को बेहतर शिक्षा का विकल्प दे दिया। हम भी फूले नहीं समा रहे थे, हम भी अपने आपको विशेष अनुभव करने लगे थे। लेकिन हमारी विशेषता तो हीनता में बदल गयी। तुम्हारी धरती का सम्मोहन ऐसा ही था। वे कहने लगे कि ऐसी स्वर्ग सी धरती पर बसने का सौभाग्य यदि हमें मिला है तब हम आपकी नरक सी धरती पर क्यों आएँ? हम रातों-रात हीन हो गए। हमारा प्रेम, हमारी ममता, इस धरती का जुड़ाव सभी कुछ जाया गया।
क्या धरा है ऐसी ममता में जहाँ की धरती पर मच्छर हैं, मक्खी हैं। अकेले स्वाद के लिए तो उस नरक में आकर नहीं रहा जा सकता। एक प्रश्न भारतीयों से तुम्हारे पास से आया कि तुम भी छोड़ दो इस धरती को।
कैसे छोड़ दें हम हमारी धरती को, हमारे सुख-दुख को? लेकिन बच्चों को लगने लगा कि एक बार यदि माँ-बाप इस धरती को देख लेंगे तब फिर भारत का नाम ही नहीं लेंगे। वे भी जुट जाएँगे, तुम्हारी धरती पर आने के लिए। यह बात तुम भी जानते हो, तभी तो तुमने इतने कड़े नियम बना रखे हैं। भारत में बसे माता-पिता बेचारे अपनी संतानों के मोह में तुम्हारे यहाँ का सुख देखने को लालायित हो उठते हैं। वे सोचते हैं कि एक बार तो जा ही आएँ। जैसे-तैसे पैसा एकत्र करते हैं, कभी बेटा भेजता है, कभी बेटी भेजती है और मन सपने देखने लगता है तुम्हारी धरती के। क्योंकि भारत में स्वर्ग के बाद दूसरे नम्बर पर तुम्हीं आते हो, बस एक बार तुम्हारे यहाँ जा आएँ, यही एकमात्र इच्छा रहती है। व्यक्ति बात-बात में तुम्हारा उदाहरण देता है कि जब मैं अमेरिका में था उन दिनों यह हुआ था, आदि, आदि। वह कैसे न कैसे बता ही देता है कि वह अमेरिका जा आया है। एक बार मैं एक मीटिंग में थी। मेरे पास एक घरेलू सी महिला बैठी थी। उसने अपनी कोई बात रखी लेकिन जो महिलाएँ स्वयं को बहुत ही पढ़ा-लिखा समझ रही थीं वे उनकी किसी भी बात पर ध्यान नहीं दे रही थीं। आखिर उन्होंने भी तुम्हारी ही तुरूप काम में ली। वे बोली कि -वेन आई वाज इन अमेरिका..........। इतना बोलना था कि वे अचानक विशेष हो गयीं। यह है तुम्हारा प्रभाव।
क्रमश:

डॉ अजित गुप्ता