Saturday, March 07, 2009

सोने का पिंजर (7)

सातवां अध्याय

ऐसा भी कौन हैं कि सब अच्छा कहें जिसे...

भारत की निन्दा स्तुति मेरे जेहन में उभर-उभर आती है कि भारतीय रेल और बस का कोई समय नहीं। देर से आना इनकी नियति है। लेकिन जब हमने न्यूयार्क से सेनफ्रांसिसको की हवाई उड़ान ली, तब पहले से ही एक घण्टे विलम्ब से चले. हवाईजहाज में बैठने के बाद अनाउन्स हुआ कि यात्रा में एक घण्टे का विलम्ब और होगा। क्योंकि हमारे आगे अभी चालीस विमान उड़ने की कतार में हैं। यहाँ कोई नहीं कहता कि अमेरिका में हवाई यात्राओं की ऐसी स्थिति क्यों हैं? प्रश्न करो भी तो कहेंगे कि ये तो हो जाता है, इसमें कोई क्या करे? अरे तो अपने देश में भी तो हो जाता है, फिर वहाँ को छोड़कर यहाँ क्यों भाग आया? भारत में दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है, यहाँ रेल के नाम पर नाम-मात्र का नेटवर्क है। बस-सर्विस तो नहीं के बराबर हैं, केवल हवाईजहाज ही इतने बड़े देश को जोड़ने में समर्थ हैं। जैसे हमारे यहाँ हर मिनट बस और रेल रवाना होती हैं, ऐसे ही यहाँ हवाईजहाज हैं। देर सभी जगह है, बस गालियां केवल भारत के लिए ही बनी हैं।
एक बार मुझे उदयपुर से मुम्बई जाना था, मैने एजेण्ट को फोन किया कि एक टिकट इण्डियन एयर लाइन्स की ले दो। वह बोला कि अरे आप भी कैसी फ्‍लाइट की बात करती हैं, यह तो रनवे पर आने के बाद भी रुक जाती है। यहाँ हम रनवे पर पूरा एक घण्टा धीरे-धीरे सरकते रहे, हम देखते रहे कि एक जहाज उड़ा, हम आगे खिसके, फिर दूसरा उड़ा, हम और खिसके। वास्तव में यह भौतिकता का एक हिस्सा है, हमें इसी प्रकार सारे ही देशों में स्वीकारना चाहिए। हम केवल भारत को ही गाली दें, यह ठीक नहीं है। हमारे यहाँ तो कभी-कभी ही रनवे पर जहाज रुकता है लेकिन वहाँ तो रोज़ ही ऐसा होता है।
धीरे काम करना वहाँ की आदत है, इसे हम सुस्ती का नाम भी दे सकते हैं। सबसे मजेदार बात तो यह है कि यहाँ बसे भारतीय भी इसी सुस्ती का हिस्सा हैं। उनकी फुर्ती केवल हिन्दुस्थान की निन्दा-स्तुति में दिखायी देती है। हिन्दुस्थान का नाम लेकर जिन्दा हैं, हिन्दू कहलाकर जिन्दा हैं, हिन्दी भाषा के साथ जिन्दा हैं फिर भी अपने देश को सम्मान दिलाने की बात नहीं है। उन्हें अमेरिका में भी अपना भारत दिखना चाहिए, जिसे वे छोड़ आए थे। उसको याद करके साहित्य लिखा जा रहा है, आँसू बहाए जा रहे हैं, लेकिन अपनी भारतमाता की दुर्दशा को ठीक करने के लिए आना कोई नहीं चाहता।
सम्मेलन में एक कविता सुनाई गयी, कि यहाँ बड़ी सारी कोठी बनाकर भी छोटे से मकान का भाई से बँटवारा कराकर, ताला ठोंककर आना हमारी मानसिकता है, और फिर आशा करना कि काश कोई अच्छा पड़ोसी मिल जाए, जो उस ताले की हिफाजत कर जाए। अरे तुमने भारत देश के करोड़ों घरों में ताले लगा दिए हैं, करोड़ो बूढ़े माँ-बापों की आशाओं को छीन लिया है, कम से कम उस छोटे से मकान का ताला तो अपने गरीब भाई के लिए खोल आओ। लेकिन अभी हम इतने विकसित नहीं हुए हैं, कि दूसरे के लिए कुछ त्याग कर दें!
तुम भारतीय केवल त्याग की ही बात करते हो और दुखी होते हो, इसलिए ही विकसित नहीं हो। जितना छीन सको छीन लो, जितना भोग सको भोग लो, विकसित हो तो त्याग की बात मत करो। यही है विकास का राज।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की खोज जब कोलम्बस ने की थी तब यहाँ के निवासियों को नाम दिया था ‘रेड इंडियनस’। आज यहाँ रेड इन्डियन्स अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं और दुनिया जहान से आए व्यक्ति अमेरिकी नागरिक बनते जा रहे हैं। यहाँ बड़ी संख्या में यूरोप से लोग आए, उनका गोरा रंग यहाँ से मेल खाता था अतः वे सब स्वाभाविक अमेरिकी बन गए। यहाँ एशिया से भी लोग आए, लेकिन उनकी कद-काठी गोरे लोगों से नहीं मिलती थी तो वे आज भी एशिया मूल के ही कहलाते हैं। भारतीय भी यहाँ आकर बरसों से रह रहे हैं लेकिन अपने रंग के कारण कभी अमेरिकी नहीं कहला सकते, चाहे वे कितनी ही यहाँ की नागरिकता ले लें। लेकिन फिर भी एक होड़ मची है कि कौन यहाँ का नागरिक बन जाए। भारत से तीन गुणा जमीन और जनसंख्या केवल 30 करोड़, तो जमीन तो बहुत है न! फिर जो असली दावेदार है वे तो कुछ बोलते नहीं, बस जो यूरोप से आकर बसे हैं उनके चिल्लाने से क्या असर होगा? जब तुम यहाँ रह सकते हो तो हम क्यों नहीं? अभी यहाँ एशियायी 25 प्रतिशत हैं, भविष्य तो दिख ही रहा है। सारे ही बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय यहाँ है और उन सबमें एशियायी। भारत जिस प्रकार से तरक्की कर रहा है उससे लगता है कि या तो भारतीय सारे वापस चले जाएँगे या फिर वे सम्मान सहित अमेरिका में रहेंगे। उनकी आवश्यकता अमेरिका अनुभव करेगा।
अमेरिका एक पूर्ण विकसित देश कहलाता है, क्योंकि यहाँ व्यक्ति के लिए भौतिक संसाधनों की भरमार है। आम व्यक्ति के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की यहाँ कोई कमी नहीं है। पानी यहाँ भरपूर है। किसी भी देश के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए तीस प्रतिशत जंगल होने अनिवार्य हैं और इस अनिवार्यता को यह महाद्वीप पूर्ण करता है। यहाँ इतने गहरे और बड़े जंगल सुरक्षित देखकर आश्चर्य होता है। यहाँ के सारे मकान लकड़ी से बनते हैं, लेकिन जंगल नहीं कटते। लकड़ी आती है अविकसित या विकासशील देशों से। प्रकृति यहाँ पूर्ण रूप से अटखेलियाँ करती है। एक तरफ विशाल पहाड़ों की दीवार से आरक्षित समुद्र, तो दूसरी तरफ सफेद बालू पर बल खाता, सफेद झाग उड़ाता, नीला समुद्र।
केलिफोर्निया में समुद्र के मुहाने पर एक गहरा जंगल है रेड-वुड फोरेस्ट। मीलों तक पसरा यह जंगल, दो हजार वर्ष पुराने पेड़ों का संरक्षक बना हुआ है। पेड़ के तने की चौड़ाई चार आदमियों के हाथ फैलाने से भी पकड़ में नहीं आए और लम्बाई तो 300 फीट से भी अधिक। कई पेड़ नीचे से खोल मात्र रह गये हैं लेकिन ऊपर से पुनः हरे हो गए हैं। भारत के जंगल और यहाँ के जंगलों में रात-दिन का अंतर है। भारत में जंगलों में कई प्रकार के पेड़ मिलते हैं, लेकिन यहाँ केवल रेडवुड। पशु और पक्षी भी आमतौर पर यहाँ नजर नहीं आते। शाम पड़ी तो सोचा की अपनी तरह ही पक्षियों का कलरव सुनने को मिलेगा, लेकिन नहीं, शाम को भी यहाँ शान्ति ही थी। फिर पेड़ों को देखा, देखा वहाँ फल नहीं थे, जब फल ही नहीं है तब पक्षी क्या करेंगे, यहाँ आकर?
शहर में भी ऐसे पेड़ नहीं हैं जहाँ पक्षी अपना बसेरा कर सके। बस कभी-कभी कबूतर दिखायी दे जाते हैं। दूसरे जानवरों का देखना तो दुर्लभ ही है। गाय और कुत्ते को रोटी देना तो यहाँ चाँद-सितारे तोड़ने के समान है। ताजा दूध के लिए मन मसोस कर रह गए और केन बन्द पुराने दूध को पीने के लिए मन को तैयार नहीं कर पाए। लेकिन फिर सेनफ्रांसिस्को के पास के समुद्री क्षेत्र जाते समय देखा कि दूर-दूर तक वीराना छाया हुआ है। दूर से देखा तो घास के इन वीरान पहाड़ों पर कुछ काले धब्बे चलते से दिखायी दिए। कार जैसे ही पास गयी और मुँह से खुशी की आह निकल गयी, अरे ये तो गायें हैं। फिर तो वहाँ बस गायें ही गायें थी। सोचा उनके फार्म हाउस में जाकर ताजे दूध की माँग कर ली जाए। मन ताजा दूध के स्वाद की कल्पना में खो गया, लगा कोई कहेगा कि बैठो और चाहे जितना दूध पीओ। लेकिन हमें निराशा ही हाथ लगी, ताजा दूध का रिवाज नहीं है तो नहीं है। एक बात और आश्चर्य में डालती है कि गाय शाकाहारी पशु है, लेकिन वे लोग पता नहीं क्यों गाय को मांसाहारी बनाने में जुट गए हैं? यूरोप में ‘मेड-काउ’ रोग हुआ था और हजारों गायों को मौत के घाट उतारा गया था। फिर भी क्यों नहीं समझ आ रहा है कि मनुष्य के अलावा शेष पशु-पक्षी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप ही जीवन जीते हैं। यदि वे मांसाहारी हैं तो मांसाहारी हैं और यदि वे शाकाहारी हैं तो शाकाहारी। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो सभी कुछ उदरस्थ कर लेता है।
पहली बार वहीं पहाड़ों में हिरण भी दिखायी दिए, लगा कि जंगल जीवन्त हो उठा है। अमेरिका में प्रकृति को न केवल सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है अपितु उसे दर्शनीय बनाने का भरपूर प्रयास भी किया है। समुद्र के हर कोने की सुन्दरता को विभिन्न कोणों से दिखाने का एक सफल प्रयोग है यहाँ।
रुको बाहर कोई आ गया है, अरे यह तो प्लम्बर है। कल से नल टपक रहा था। एक सवा छः फीट का आदमी अपना पूरा किट लिए आया और चुपचाप अपना काम करने लगा। हमारे यहाँ पाँच या सवा पाँच फीट का आदमी आता है और न जाने कितनी बाते करते हुए नल का टपकना बन्द करता है। घर की मालकिन चाय बना देती है। जब तक वह काम करता है, चाय तैयार हो जाती है। फिर वह सारे जगत की बातचीत के बीच चाय पीकर ही जाता है। लेकिन यहाँ सर्वत्र मौन है। कभी-कभी लगता है कि अमेरिका में सबकुछ है लेकिन सुख और दुख बाँटने वाला कोई नहीं। बतियाने वाला कोई नहीं। रास्ते चलते देखकर सब मुस्कान फेंक देंगे लेकिन बाते किससे करें, मन खोजता ही रहता है। जैसे आकाश में चिड़ियों का शोर नहीं, वैसे ही धरती पर मनुष्यों की आवाज नहीं। बस हैं तो कारों का काफिला, जो दौड़ रहा है बस दौड़ रहा है। अष्ट भुजाओं वाली काली-काली सड़कें, उनपर बने रावण के दस सिरों जैसे फ्‍लाई-ओवर और उन पर तेज रफ्‍तार से दौड़ती हुईं भांति-भांति की कारें। एक कार पास से निकली, अरे यह क्या? इसमें तो ड्राइवर ही नहीं! दिमाग ने झटका खाया, नहीं यहाँ लेट-हेण्ड ड्राइव है, ओह ड्राइवर तो दूसरी तरफ है।
लेकिन मैं बात समुद्र की कर रही थी। हमारी कार समुद्र किनारे घुमावदार सड़क पर सरपट दौड़ रही थी। जरा सा चूके नहीं कि कार पानी में। बार-बार डर के मारे पूछते ही रहे कि बेटा अब कितना रास्ता और है? वीराना क्षेत्र आने लगा, नंगे पहाड़, बस उनपर सूखी घास। केवल यहाँ गाय और घोड़ों के तबेले ही हैं। पूरा क्षेत्र सुरक्षित रख छोड़ा है। रास्ते में समुद्र की सुन्दरता निहारने का मन हो जाए तो रुकिए, रास्ते में विस्टा-पोइन्ट बने हुए हैं, यहाँ ही अपनी गाड़ी रोकिए और देखिए समुद्र को उफनते हुए, लहराते हुए, इठलाते हुए। हम अपनी मंजिल पर जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहते थे, हवाएं तेज बहने लगी थीं और ठण्ड भी अपनी तासीर दिखाने को बेताब थी।
सेनफ्रांसिस्को में गोल्डन ब्रिज है। समुद्र के ऊपर बना हुआ। उसका नाम गोल्डन क्यूँ है, यह पता नहीं चला। क्योंकि न तो उसका रंग गोल्डन है और न ही वह गोल्ड से बना है। हो सकता है कि अमेरिका के गोल्ड युग की शुरुआत उसके निर्माण के साथ ही हुई हो। वैसे भी अमेरिका की प्रगति 1936 के बाद की ही वहाँ नजर आती है। जहाँ भी गए लगभग 1936 का निर्माण ही दिखायी दिया। खैर हम गोल्डन ब्रिज की बात कर रहे थे। वहाँ से समुद्र को निहारना ऐसा लगता है जैसे आप मसूरी की ठण्ड में बर्फीली पहाड़ियों के स्थान पर, ठहाका मारते हुए समुद्र को देखें। कभी कल्पना नहीं की थी कि समुद्र किनारे भी इतनी ठण्ड होगी? लेकिन यहाँ तो लग रहा था कि शीघ्रता नहीं की तो कुल्फी जम जाएगी। एक तरफ समुद्र था तो दूसरी तरफ पहाड़। आकाश से बादल आ-आकर पहाड़ों से टकरा रहे थे। कभी गोल्डन ब्रिज के दरवाजे की ऊँचाई एक मंजिला हो जाती और जैसे ही बादलों से लुका-छिपी खेलता हुआ सूरज हमें ‘....ता’ कह देता तो हमें दिखाई देता कि अरे यह ब्रिज तो बहुत ऊँचा है। सिर को पीछे करो, और करो, जितना कर सकते हो करो, तब आप उसकी ऊँचाई नाप सकेंगे। अरे मैं फिर कहाँ भटक रही हूँ, मैं तो समुद्र के उस दूसरे किनारे पर जाने के लिए निकली हूँ जहाँ से चालीस मील की दूरी पर चल रहे जहाज अपनी मंजिल को पा लेते हैं। समझ गए न, मैं लाइट हाउस की ही बात कर रही हूँ। मैं समुद्र किनारे, रास्ता दिखाते, आकाशदीपों को सर उठाकर खड़ा होते हुए देखती रही हूँ, लेकिन यह भी दर्शनीय महत्व का हो सकता है, इस पर कभी विचार नहीं किया था। लाइट हाउस की केयर टेकर ने जल्दी से कहा कि ‘गो सून, इट इज गोइंग टू बी क्लोज’। नीचे देखा, अरे बाप रे तीन सौ सीढ़ियों को पार करके नीचे जाना था, खैर उतर तो जाएँगे लेकिन क्या ये जंग खाए घुटने वापस चढ़ पाएँगे? चलो जो होगा देखा जाएगा। आकाशदीप हमें पुकार रहा था, हमेशा दूर से ही इसे देखा है, आज पास से देखने का मौका मिला है तो फिर घुटने को तो भूलना ही पड़ेगा। एक सुंदर सी गाइड दिखा रही थी पुराने लाइट-हाउस की नयी, साफ-सुथरी मशीन को। अब तो इलेक्ट्रोनिक का जमाना आ गया तो पास ही दूसरी लाइट लगा दी गयी थी और इसे पुराने वैज्ञानिकों को याद करने के लिए छोड़ दिया गया था। चालीस मील दूर से जहाज इन लाइटों को देख पाते हैं और शहर आ रहा है, इस बात की खुशी मना सकते हैं।
पहाड़ों पर कहीं-कहीं केसरिया रंग बिखरा हुआ था, अरे यहाँ हनुमानजी कहाँ से आ गये? नजदीक गए, हाथ लगाकर देखा, अरे ये तो एल्गी है। हमारे यहाँ हरे रंग की होती है और यहाँ केसरिया है। यहाँ समुद्र के पानी को हाथ लगाने की मनाही है, लगाएँगे भी तो कैसे? एक तरफ तो पहाड़ है, वहाँ से आप उतर नहीं सकते, और दूसरी तरफ मीलों तक फैली छोटी लेकिन वीरान पहाड़ियां। समुद्री किनारा भी है और यह किनारा तकरीबन तेरह मील लम्बा है। ऊपर से समुद्र का और न ही उसके किनारे का कोई छोर दिखाई दे रहा था। बस दिख रहा था तो सफेद बालू रेत पर सुनसान तट पर आँचल लहलहाता समुद्र। आँचल भी कैसा? सम्पूर्ण विस्तार नीले रंग का और जब आँचल लहराए तो सफेदी जगमगा उठे। दूर-दूर तक कोई जानवर नहीं। हमारी आँखे तलाश रही थी, पहाड़ पर छिपे किसी जंगल के जानवर को। तभी आँखों ने जंगल की जीवन्तता को पा ही लिया, एक नहीं पूरे पाँच हिरण वहाँ बड़े ही धैर्य से घास खा रहे थे। इन हिरणों में चौकन्नापन नहीं था, यहाँ शेर नहीं थे।
पहाड़ के दूसरी तरफ समुद्र की खाड़ी थी। यहाँ समुद्री पक्षी आकाश से सीधे ही समुद्र में छलांग लगाते और अपनी चोंच को समुद्र में पूरा डुबोकर अपना नन्हा सा शिकार खोज ही लेते। अपनी काली मूछे निकाले उदबिलाव भी उचकते हुए दिखायी दे गए। गोल्डन ब्रिज के समुद्र किनारे हजारों की तादाद में समुद्री पक्षी थे। उनका शोर शाम को, खामोश समुद्र को भी मदमस्त करने पर मजबूर कर रहा था। वे सब उड़ रहे थे, एक साथ हजारों। समुद्र खुश हो रहा था, अपनी बाहें फैलाकर आगे बढ़ रहा था, चाँद पूर्ण यौवन के साथ उन्हें देख रहा था। पक्षी समुद्र के अँग-अँग को प्रफुल्लित कर रहे थे, उसके विशाल सीने पर अठखेलियाँ करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। कभी इस छोर पर और कभी उस छोर पर, पक्षियों का कलरव गूँज रहा था। समुद्र खुशी से उछलता और अपने साथ ले आता समुद्री वनस्पतियाँ। भारत के समुद्री किनारों पर शंख मिलेंगे, सीप मिलेंगी लेकिन यहाँ टूट कर आयीं कुछ बेले ही मिलेंगी। हो सकता है किसी दूसरे किनारे पर शंख भी हों, सीपियाँ भी हों?
ठण्डी हवाएँ तन को लग रही थीं और मन कहीं चाय और पकौड़े वाले को ढूँढ रहा था। यहाँ कहाँ पकौड़े? किनारे पर खूब लम्बी वुड-वाक है, यहाँ खाने-पीने को बहुत कुछ है, लेकिन अपने पकौड़े नहीं। रेत पर टहलिए, पाँवों में मिट्टी लेकर घर बनाइए लेकिन चना-जोर-गर्म की आवाज लगाकर कोई लड़का आपको कुछ खाने पर मजबूर नहीं करेगा। रेत पर खोमचे वाले भी नहीं हैं, तो गंदगी भी नहीं है। लेकिन फिर भी जिधर देखो उधर डस्टबीन ही डस्टबीन रखे हैं। आदमी फेंकना चाहे तो भी न फेंक सके। कभी यहाँ आकर मन होता है कि मूँगफली खायी जाए और उनको छीलकर, फूँक मार कर छिलको को उड़ाया जाए। लेकिन सारे सुख कहाँ परायी धरती पर? एक दिन ऐसी ही एक यात्रा पर निकले थे, देखा रास्ते में फल-सब्जी की दुकान सजी है। हम भी कार को उधर ही मोड़ ले गए। चेरी, स्ट्राबेरी से लेकर कितने ही जाने-अनजाने फल और सब्जियाँ यहाँ थे। यहाँ कुछ पसन्द आया हो या नहीं लेकिन यहाँ की चेरियाँ लाजवाब हैं। ढेर सारी खरीदी गयी और घूमते-घूमते वहीं खाना शुरू किया गया। खाने के बाद पहली बार गुठली को हवा में मुँह से फेंकते हुए जो मन को आनन्द आया वह अनूठा था। लगा जैसे आज जंजीरे टूट गयी हों। समुद्र किनारे पहाड़ पर चढ़कर केला खाओ और केले के छिलके को हवा में नहीं उछालो तो फिर केले खाने का मजा ही क्या? लेकिन यहाँ तो डर इतना हावी है कि सुख लेने ही नहीं देता।
घुमावदार पहाड़ी रास्ता, अपने यहाँ लिखा मिलेगा ‘हार्न बजाएं’ और यहाँ हार्न बजाना तो जैसे रात को मंदिर में घण्टी बजाना। सभी को अपनी लेन में चलना है, ओवर-टेंकिग नहीं। सड़क पर पीली लाइन खींच दी गयी है, यदि दो लाइने हैं तो आप ओवर-टेंकिग नहीं कर सकते। हाँ डोटेड पीली लाइन है तब आप ओवर-टेंकिग कर सकते हैं। सड़क किनारे साइनबोर्ड लगे हैं स्पीड के लिए, कहीं तीस, कहीं पचास तो कहीं पेसठ। ज्यादा बढ़ाई नहीं कि कैमरे ने आपको पकड़ लिया और चालान की टिकट मिल गयी। न मंत्री पुत्र और न ही अफसर पुत्र। चढ़ाई वाले रास्ते पर जा रहे थे, तीस की स्पीड निर्धारित थी। आगे गाड़ियां उसी रफ्‍तार से चल रही थीं, हमें थोड़ी जल्दी थी, वैसे भी भारतीयों को जल्दी ही रहती है, उन्हें पता नहीं कहाँ जल्दी जाना होता है? यहाँ किसी को कोई जल्दी नहीं होती। चुपचाप लाइन में खड़े रहते हैं और काउण्टर वाला धीरे-धीरे, खरामा-खरामा काम करता रहता है। खैर हम जल्दी में थे और शायद हमें गाड़ियों के पीछे चलना सुहा नहीं रहा था। अरे होर्न दो न, लेकिन होर्न बजाना तो यहाँ वार-त्यौहार ही होता है, फिर? देखा आगे वाली गाड़ी, जगह देखकर किनारे हो गयी और हम शान से आगे निकल गए। यही है यहाँ आगे निकलने का तरीका। लेकिन यह तरीका केवल गाड़ियों के लिए ही है, आप वैसे आगे निकल कर दिखाएँ तब जाने।
हम सोचते थे कि हमारे पुरातन भारत में ही टेटू या गोदने का रिवाज है। हम कैसे उन्हें गँवार कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं। कभी भी कोई गाँव से आता और उसके हाथों में या शरीर में गोदने का चिह्न देखते, उसे हिकारत की नजर से हम देखते आए हैं। लेकिन यहाँ देखा कि एक मोटी सी औरत कुछ छोटा सा पहने हुए घूम रही है। यहाँ छोटे की तो परवाह भी किसे है? लेकिन उसकी पीठ रंग-बिरंगी हो रखी थी। देखा अरे यह तो गोदना है। पूरी पीठ पर चित्रकारी करायी हुई थी। अब उसे दिखाना है तो फिर ठण्ड में भी छोटे कपड़े तो पहनने ही पड़ेंगे न! महिलाएँ ही नहीं पुरुष भी पूरी पीठ पर या शरीर पर गोदना करवाते हैं। मैं सोच रही थी कि सारे शरीर पर गोदने के लिए तो एनस्थिसीया का प्रयोग करते होंगे, लेकिन नहीं जी, फैशन के लिए इंसान सब बर्दाश्त करता है।
अमेरिका में विभिन्न देशों के लोग रहते हैं और सभी एक ही रंग में रंगे दिखायी देते हैं। कपड़े खरीदने के लिए एक मॉल में गए, यहाँ अपने जैसे कपड़ों का बाजार नहीं है। बस सिले-सिलाए कपड़े मिलते हैं। एक बार राजस्थान में अकाल पड़ा, जनजाति क्षेत्र में न तो खाने को और न ही पहनने को। भारत के महानगरों के सेठों ने ट्रक भरकर कपड़े भेज दिए। कुछ कपड़े नये और कुछ पुराने। लेकिन सभी गांठों में बँधे थे, इस कारण मुसे हुए थे। जब हमने इन्हें बाँटने के लिए निकाला तो मन किया कि सभी को प्रेस कराकर देने चाहिए। लेकिन वह सम्भव नहीं था, प्रेस कराने के ही हजारों रूपये लग जाते। लेकिन यहाँ मॉल में देखा कि बदरंगे, मुसे-तुसे, फटे हुए कपड़े, बड़े ही मँहगे दामों में मिल रहे थे। बेटे से पूछा कि कबाड़ी की दुकान है क्या? लेकिन उसने हँसकर कहा कि यही फैशन है। फिर यही फैशन हो भी क्यों नहीं, सारे ही कपड़े मशीन में धुलते हैं और प्रेस का किसी के पास समय नहीं तो एक धुलाई के बाद तो ऐसे ही पहनने हैं फिर नये ऐसे ही क्यों न खरीदे जाएं? कहाँ भारत के चटक रंग और कहाँ यहाँ के फीके रंग? राजस्थान तो देश ही रंगों का है। कितने चटकीले रंग हैं हमारे यहाँ? सात रंगों की चूंदड़ तो हमारी शान है। शादी में दुल्हन को इसीलिए चूंदड़ उढ़ाई जाती है कि उसमें विभिन्न रंग हैं और उसका चटकीला लाल रंग तो आपसी आकर्षण का प्रतीक। बच्चों के कपड़े भी सारे ही बदरंग। लगता जैसे पुराने हों, लेकिन पास जाने पर पता लगता कि नहीं ये तो नए ही हैं। हमारे यहाँ इतने रंग होते हैं कि कपड़ा हमेशा नया सा ही दिखता है लेकिन वहाँ इतने फीके रंग होते हैं कि नया भी पुराना सा ही दिखता है। इसलिए ही रोज नया खरीदने का मन करता है। शायद यह भी बिक्री का एक और फण्डा हो?
जब कोलम्बस यहाँ आया था तब उसने अमेरिका को ही इण्डिया समझ लिया था और इसी कारण उसने यहाँ के लोगों का नाम दिया था, रेड-इण्डियन। अब यहाँ से रेड शब्द हटता जा रहा है और सब जगह इण्डियन ही लिखा मिलता है। हम पहले तो खुश हुए कि अरे इण्डियन फूड यहाँ है फिर पता लगा कि ये सब रेड-इण्डियन्स के लिए लिखा है। हम जैसे नए लोगों के लिए अन्तर समझना कठिन हो जाता है। लेकिन भारत से आए लोगों ने यहाँ भारतीयों के खाने का पूरा इंतजाम कर रखा है। सभी कुछ उपलब्ध है, बस स्वाद में अन्तर है। यहाँ संकर प्रजाति बनाने का बड़ा शौक है तो सेव कई प्रकार के, आडू कई प्रकार के और दोनों को मिलाकर अलग से कई प्रकार के फल। तुरई एक-एक हाथ से भी अधिक लम्बी, शिमला मिर्च इतनी बड़ी की भरवा बनाने का उत्साह ही समाप्त हो जाए। किसी को बैंगन के भुर्ते का शौक हो तो अकेला एक बैंगन का भुर्ता नहीं खा सकता। एक ही बैंगन आधे किलो से अधिक का। प्याज इतने बड़े और मीठे, लगता है प्याज खा रहे है या फिर ककड़ी। लहसुन भी इतना मोटा कि एक ही गुली पर्याप्त है सब्जी के लिए। लेकिन जहाँ कुछ फलों में स्वाद की विचित्रता है वहीं कुछ फल निहायत ही स्वादिष्ट हैं। चेरी और स्ट्राबेरी की साइज भी बड़ी और स्वाद भी लाजवाब। आम भी अब बड़ी तादाद में आने लगा है, लेकिन मेक्सिको में भी आम होता है तो वहाँ से भी आम और केरी दोनों ही आती हैं। एक केरी आधा किलो से अधिक।
हमें बड़े-बड़े बाजार देखने की आदत है, लेकिन यहाँ बड़े-बड़े मॉल मिलेंगे। भारत में शाम को लोग बाजारों में घूमते हैं और यहाँ मॉल में। बाजार में ठेले वाले मिलते हैं और यहाँ मॉल में रेस्ट्रा। यहाँ रात को दस बजे बाद जन-जीवन थम जाता है, जबकि भारत में दस बजे बाद शुरू होता है। अमेरिकन्स तो रात आठ बजे ही घर को बन्द कर लेते हैं। उनके रेस्ट्रा भी शाम का खाना रात आठ बजे तक ही परोसते हैं। रात आठ बजे बाद किसी को भी फोन करना तहजीब नहीं है, मिलने जाना तो बहुत दूर की बात है। हमारे यहाँ रात को ग्यारह बजे भी घर की घण्टी बज सकती है। आपका कोई मित्र बाहर खड़ा हँसी बिखेर रहा होगा।
अरे यार इतनी जल्दी सो गए क्या? मैं तो इधर से निकला था, सोचा तुम्हारे साथ कॉफी पीता चलूँ।
बेचारा मेजबान मित्र सोने की तैयारी में हैं, लेकिन हँसकर स्वागत करता है। बोलेगा कि यार आ ना, बड़े दिन बाद तो आया है। चल आ, बाते करेंगे। फिर पत्नी को आवाज लगती है - अरे भागवान सो गयी क्या? देखो तो कौन आया है?
पत्नी भी गाउन सम्भालते हुए सकुचाते हुए आती है। अरे भाईसाहब आप? चलिए आप बैठिए मैं आपके लिए कॉफी बनाकर लाती हूँ। बस फिर शुरू हो जाती है दो दोस्तों की गपशप।
भारतीय तो वहाँ भी ऐसा ही करते है। लेकिन बहुत ही कम। क्या पता आपकी तेज आवाज से पड़ौस में डिस्टर्ब हो जाए और वे पुलिस को फोन कर दे?
यहाँ बेचारी महिलाएं साड़ी पहने रात ग्यारह बजे तक भी अपने शरीर को कसा हुआ रखती हैं। क्या पता कौन कब टपक जाए? लेकिन वहाँ जिसे आना है पूर्व सूचना के साथ, वो भी रात आठ बजे तक। फिर आप स्वतंत्र हैं चाहे तो बरमूडा पहने या गाउन।

डॉ. अजित गुप्ता

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बैठकबाज का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

नमन आपको अजित जी, खूब सुना था ढोल.

मगर आपने खोल दी, अमरीका की पोल.

अमरीका की पोल, न सब कुछ श्रेष्ठ वहाँ है.

भारत जैसा अपनापन अब शेष कहाँ है?

नहीं स्वहित की तुला तौलती, यहाँ आपको.

सच उद्घाटित किया, अजित जी नमन आपको.

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