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Saturday, June 26, 2010

आसन, भाषण और अब शासन के गुरू - बाबा रामदेव

हमारी एक बड़ी बहन सरीखी मित्र जो एक अच्छी गाइनकोलॉजिस्ट भी हैं, यह बात सत्य है जहां वे अपना चिकित्सालय चलाती है, अधिकतकर बच्चों ने उन्ही के शुभ हाथो से जन्म लिया। उनके अच्छे स्वभाव के कारण युवा से लेकर बुजुर्ग तक बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक भी हैं सो उन्होने चुनाव लड़ने का मन बना लिया। एक बड़े राजनैतिक दल ने उनको टिकट भी दे दिया। उन्हे लग रहा था जिले के बड़ी संख्या में उपलब्ध प्रशंसक उनके पक्ष में मतदान कर उन्हे विजय श्री दिलवा देगें। परन्तु ऐसा नही हुआ, चुनाव में उन्हे निराशा हाथ लगी। पिछले लोकसभा चुनाव में आन्ध्र प्रदेश के सिने सुपर स्टर चिरंजीवी को भी कुछ ऐसा ही भ्रम हो गया उन्होने भी पूरे प्रदेश में अपने प्रत्याशी लड़ाये। प्रचार के समय उनकी सभाओं में अप्रत्याशित भीड़ भी उमड़ती थी मानो उक्त प्रदेश की सभी सीटें वे ही जीत रहे हों। विपक्षी दल भी सकते में आ गये। उन्हे भी भ्रम हो गया कि आन्ध्र की राजनीति में चिरंजीवी का एकछत्र राज्य होने वाला है। पर ऐसा नहीं हुआ। सिनेमा प्रेमियों ने भीड़ द्वारा उनका उत्साह तो बढ़़ाया पर वोट नहीं दिये। जनता ने इन्हे भी राजनीति के क्षेत्र में ससम्मान नकार दिया। इसी प्रकार का भ्रम जय गुरू देव को भी हो गया था। प्राप्त परिणाम से उन्हे लगभग ढाई दशक गुमनामी के अंधेरे में रहना पड़ा जब तक उस समय की पीढ़ी विषय को पूरी तरह भूल नहीं गयी। इसी प्रकार न जाने कितने विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक सम्मान प्राप्त व्यक्तियों ने अपनी लोकप्रियता को मतपेटी तक पहुंचाने का प्रयास किया परन्तु वे असफल ही रहे। व्यक्तिगत स्तर पर तो विभिन्न चुनावों में लड़ने वालो की बाढ़ सी आ जाती है। लगभग हर सीट पर कोई न कोई गैर राजनैतिक व्यक्ति अपना भाग्य आजमाता है। हार या जीत जाने पर पलटकर क्षेत्र का मुंह नहीं देखता। मेगा सुपर स्टार अमिताभ बच्चन से अच्छा उदाहरण और नहीं हो सकता।
वर्तमान में योग गुरू रामदेव जी को भी कुछ उपरोक्त नामी-गिरामी हस्तियों की तरह भ्रम उत्पन्न हो गया। उन्हे लग रहा है वे अपनी लोकप्रियता को राजनैतिक क्षेत्र में भुना सकते है। परन्तु उन्हे यह जानना चाहिए समाज आप के साथ किस विषय पर खड़ा है। स्वामी जी को यह बात भली भॉति समझकर कदम उठाना चाहिए कि जनता किसे प्यार देती है किसे सम्मान और वह किसे नोट देती है और किसे वोट। रामदेवा जी को जानना चाहिए जनता उनके साथ कपाल-भाति मे तो है पर राजनीति में साथ दे ऐसा बिल्कुल भी आवश्यक नहीं।
रामदेव कब स्वामी से लेकर योग गुरू बन गये उनके शब्द, शिक्षा, प्रवचन-भाषणों में परिवर्तित होते चले गये पता हीं नहीं चला। देखते ही देखते हरिद्वार की सड़कों पर साइकिल से चलने वाला एक साधारण व्यक्ति किस प्रकार लगभग 10 वर्षों में करीब सत्तर हजार करोड़ रूपये का स्वामी बन गया। आज स्वामी जी के पास विदेशों में भी अकूत अचल सम्पत्ति है। यह बात सत्य है भारत से विलुप्त हो चुके योग विज्ञान को उन्होने पुनः सार्वजनिक किया। इस विषय पर उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम होगी। परन्तु उसकी आड़ में धन का जो खेल चला वह उनके उक्त सम्मान का कम करता है। योग की कक्षा लगा सिनेमा की तरह श्रेणीगत टिकटों की बिक्री उनकी उक्त लोकप्रियता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। उनकी यौगिक क्रियाओं की सी0डी0 तथा साहित्य की ऊॅची कीमतों पर बिक्री भी उनके योग व्यवसायीकरण की तरफ इंगित करती है। आज वे नमक, शरबत टूथब्रश तथा अचार सहित विभिन्न छोटी-छोटी दैनिक उपयोग की वस्तुओं की भी बिक्री करने लगे। सुना जा रहा है जल्द ही वे मिनरल वाटर बनाने का भी संयत्र लगाने जा रहे है।
स्वामी जी के योग आसन तथा प्राणायाम के ज्ञान को जनता ने सिर ऑखों पर बैठाया। उनके प्रवचन से लेकर दन्त मंजन तक समाज ने स्वीकार किये। परन्तु राजनीति में भाग्य आजमाने का फैसला उनके लिए निश्चित ही मुश्किले खड़ी करेगी। वे किस प्रकार रजनीति में शुचिता की बात करेंगे। क्या जनता उनसे यह नहीं पूछेगी उनका इतना बड़़ा आर्थिक ताना-बाना किस सामाजिक शुचिता की उपलब्धि है।
स्वामी जी जिस प्रकार बीमारों का इलाज करते-करते भगवा वस्त्रों की आड़ ले राजनैतिक जनसमर्थन प्राप्त करने का प्रयास एवं प्रधानमंत्री पद की लिप्सा पाले अपने जनकल्याण के स्वरूप का व्यापारीकरण एवं अब राजनीतिकरण किया है। समाज सब देख रहा है। जिस तरह बाबा ने वर्ष 2014 में होने वाले आम लोकसभा चुनाव में सभी 542 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा की है। इस प्रकार की घोषणा किसी भी एक व्यक्ति ने पूर्व में भारत के इतिहास में नहीं की। उनकी व्यवस्थित राजनैतिक तैयारियों को देखते हुए ऐसा लगता है उनके पीछे कई बड़े समूह है जो देशी भी हो सकते है तथा विदेशी भी। बाबा की योग कक्षाओ, आयुर्वेदिक दवाओं, दिनचर्या की साधारण वस्तुओं से लेकर योग साहित्य तक की व्यवस्थित मार्केटिंग उक्त शक को और पुख्ता करती है। उक्त व्यवस्था में बाबा के विश्वस्त साथी बालकिशन महाराज जी का नाम आता है। परन्तु मार्केटिंग ऐसे कठिन विषय को महज एक व्यक्ति संचालित कर रहा है, जो समझ से परे है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति में जहॉ काग्रेस पार्टी स्वाधीनता के रथ पर सवार होकर आयी वहीं जनसंघ (वर्तमान भाजपा) ने प्रखर राष्ट्रवाद तथा हिन्दुत्व के साथ राजनीति का दामन पकड़। जय प्रकार प्रकाश नारायण जी ने युवाओं के साथ अपनी राजनैतिक पारी खेली वही कम्युनिस्ट मजदूरों के सहारे राजनैतिक अखाड़े में अपनी उपस्थिति बनाये है। बात एकदम स्पष्ट है हर दल के साथ एक न एक महत्वपूर्ण समाज जुडा है या था। जो उनके आधार मत की तरह हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। हर राष्ट्रीय दल का अपना एक गौरवशाली इतिहास है न कि स्वामी रामदेव जी की तरह आसन, भाषण, तथा अन्त में शासन की अभिलाषा वाली सिर्फ बेचैनी।
बाबा रामदेव अपनी योजना भर पूरा प्रयास कर रहे है कि उनकी राजनैतिक पारी की शुरूआत दमदार तरीके से हो। उनसे कोई छोटी सी चूक भी न हो जिसका परिणाम उन्हे भुगतना पड़े। इसीलिए देश में 18 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं पर उन्होने प्रथम डोरे डालने प्रारम्भ किये। मुस्लिम उलमाओं से सम्पर्क उनकी मुस्लिम घेरे बन्दी का प्रथम चरण था। वैश्विक स्तर पर अपनी कट्टर छवि के लिए मशहूर देवबंद मदरसे में उनका जाना, अपने उद्बोधन का प्रारम्भ कुरान शरीफ की आयातों से करना उनकी राजनैतिक योजना का हिस्सा थी।
इसी वर्ष उनकी एक देशव्यापी आन्दोलन की तैयारी भी है। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट जिसकी राजनैतिक इकाई अगला लोकसभा चुनाव लडे़गी। मजे की बात है केसरिया वस्त्र धारण किये स्वामी रामदेव ने अपनी राजनैतिक पार्टी का ध्वज वाहक हिन्दु धर्म को नहीं बनाया है। उन्हे भय है हिन्दू धर्म का विषय आते ही मुस्लिम मतदाता भड़क न जाये।
भारतीय संस्कृति में गुरू के स्थान को ईश्वर से भी उच्च आसन प्रदान किया गया है। वैश्विक योग गुरू के रूप में स्थापित रामदेव जी महाराज स्वयं को गुरू कहलाने में गौरवान्वित महसूस करते है। परन्तु स्वयं उनके गुरू शंकर देव जी कहां हैं। कभी उनके मुंह से अनायास भी नहीं निकलता इस भय से कि कहीं उनकी लोकप्रियता मे वे हिस्सेदार न हो जाये।
एक पुरानी कहावत है तेज दौड़ने वाला व्यक्ति उतनी ही तेजी से गिरता है। ऐसा लगता है मानेा स्वामी जी के साथ भी ऐसा ही कुछ घटित होने वाला है। वास्तव में रामदेव जी की माया का इन्द्रजाल समाप्त होने के कगार पर है। जिसका अन्तिम चरण उनके मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। रामदेव जी से पहले भी बडे़-बडे़ स्वामी हुए। ओशो रजनीश जिनके पास धन-धर्म तथा समाज का एक बड़ा वर्ग था। उन्होने तो स्वयं को भगवान तक कहला लिया था। महेश योगी जिनका मुख्यालय हालैण्ड में था उनके शिष्यों में रामनाथ गोयनका से लेकर सत्ता के ऊॅचे-ऊॅचे लोग थे। परन्तु इस प्रकार का स्वप्न इन्होने भी नहीं देखा। कर्ण के द्वारा कुण्डल कवच का दान हो या रावण द्वारा सीता माता का छला जाना। भारतीय समाज हमेशा धर्म की ओट में ही ठगा गया है। बाबा राम देव जी ने संत वेश का उपयोग व्यापार में किया जिसे अब राजनीति मे करना चाहते है। जो निन्दनीय है। देश की जनता की परख बहुत तीखी होती है। वह समय आने पर अपना काम अवश्य करती है। आने वाला समय स्वामी जी के दिवास्वप्न को धूलधूसरित करेगा। उनके सफल योग गुरू से सफल व्यापारी उसके बाद उनकी प्रधान मंत्री पद की लालसा उन्हे लोकप्रियता के अन्तिम पड़ाव पर पहुंचा रही है।

राघवेन्द्र सिंह

Sunday, April 19, 2009

चीनी: राजनीति का शिकार- बिकेगी 30 रुपए

देश में महंगाई की दर भले ही गिर कर 0.18 प्रतिशत रह गयी हो लेकिन यह एक कटु सत्य है कि देश में महंगाई कम नहीं हुई और चीनी के भाव तो मानो केंद्रीय सरकार को मुँह चिड़ा रहे हैं। सरकार की हर कार्यवाही के बाद चीनी के भाव में तेजी ही आ रही है। और शायद यही कारण है कि केंद्रीय सरकार चीनी के भाव पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाती आ रही है।
वास्तव में सरकार चीनी के भाव को रोकने के लिए अपने तरकश के सभी तीरों को प्रयोग कर चुकी है लेकिन किसी का स्थाई असर भाव पर नहीं हुआ है। इसका कारण सरकारी नीतियाँ ही हैं।
चीनी के भाव में तेजी की नींव तो दो वर्ष पूर्व उस समय ही पड़ गई थी जब देश में चीनी का रिकार्ड उत्पादन हुआ था और चीनी के भाव सरकारी नियंत्रण के कारण बढ़ नहीं पा रहे थे जबकि सभी जिंसों के भाव में तेजी आ रही थी। इससे चीनी मिलों को घाटा हुआ और वे गन्ना उत्पादकों को समय पर भुगतान नहीं कर पाई। परिणाम स्वरुप किसानों ने गन्ने की बुआई कम की और गन्ने का उत्पादन कम हुआ और उसका नतीजा अब उपभोक्ता को भुगतना पड़ रहा है।
यह एक कटु सत्य है कि देश में चीनी उत्पादन में सरकारी नीतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह भी हकीकत है कि गन्ने पर राजनीति भी होती है। और इसके साथ यह भी कटु सत्य है कि चीनी और गन्ना लॉबी सशक्त भी है।
चीनी और गन्ने के उत्पादन में पहला स्थान महाराष्ट का है और दूसरा उत्तर प्रदेश का। दोनों ही राज्यों में गन्ने के भाव को लेकर राजनीति होती है और गन्ना उत्पादकों के वोट प्राप्त करने के लिए राज्य सरकारें गन्ने के जो भाव तय करती हैं वे केंद्रीय सरकार द्वारा तय किए गए कानूनी भाव की तुलना में कहीं अधिक होते हैं। इससे चीनी की उत्पादन लागत बढ़ती है।
दूसरी ओर, चीनी के भाव पर केंद्रीय सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। सरकारी राशन में देने के लिए मिलों के कुल उत्पादन का 10 प्रतिशत भाग लेवी के रूप में लेती और उसके भाव बाजार भाव की तुलना में बहुत ही कम होते हैं।
मिलें शेष मात्रा को खुले बाजार में बेचती हैं लेकिन वह मात्रा केंद्रीय सरकार तय करती है। बस यहीं से गड़बड़ आरंभ होती है। केंद्रीय सरकार चीनी के भाव रोकने के लिए अधिक मात्रा जारी करती है और मिलों को अनेक बार घाटे में चीनी बेचनी पड़ती है लेकिन जल्दी ही इसकी भरपाई कर ली जाती है।
वास्तव में कानून कहता है कि जो मिलें आबंटित मात्रा को बाजार में न बेचें सरकार उसे लेवी के भाव-जो खुले बाजार की तुलना में कम हैं-पर खरीद लें। लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है। इससे मिलों में कोई डर नहीं है। वे अपनी इच्छानुसार बाजार में चीनी बेचती हैं और अनबिकी मात्रा को अगले माह बेचने के लिए सरकार से अनुमति ले आती हैं।

वर्तमान स्थिति
चीनी में वर्तमान स्थिति के लिए भी सरकार ही दोषी है क्योंकि उसने समय रहते स्थिति का अनुमान नहीं लगाया। चीनी वर्ष 2008-09 अक्टूबर-सितम्बर के दौरान आरंभ में ही चीनी का उत्पादन कम होने के अनुमान मिल गए थे लेकिन सरकार अधिक उत्पादन की बात करती रही। पहले सरकारी अनुमान 220 लाख टन के उत्पादन का था लेकिन अब इसके घटकर 150 लाख टन पर सिमट जाने का अनुमान है। गत वर्ष यह 264 लाख टन था।
बकाया स्टाक पर मिलों और सरकार के बीच मतभेद है। सरकार कहती है कि गत वर्ष का बकाया स्टाक 105 लाख था लेकिन मिलें, जिनके पास वास्तव में चीनी होती है, कहती हैं कि बकाया स्टाक 80 लाख टन से अधिक नहीं है। बकाया स्टाक और चालू वर्ष के उत्पादन को मिलाकर चीनी की कुल उपलब्धता 230 लाख टन बैठती है जबकि खपत का अनुमान लगभग 250 लाख टन का है। कुछ माह पूर्व पूर्व सरकार ने कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है और लगभग 20 लाख टन के आयात का अनुमान है लेकिन एडवांस लाईसेंस के तहत लगभग 30 लाख टन चीनी निर्यात भी की जा चुकी है।
इससे स्पष्ट है कि देश में चीनी की कुल उपलब्धता खपत की तुलना में कम होगी।
अब सरकार ने सरकारी एजेंसियों को 10 लाख टन रिफाईंड चीनी का आयात शुल्क मुक्त करने की अनुमति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इससे देया में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी लेकिन आयातित लागत देश में चल रहे भाव के आसपास ही होगी।

30 रुपए किलो
चीनी की उपलब्धता और खपत का गणित और विश्व बाजार में चीनी के भाव को देखते हुए एक बात स्पष्ट है कि इस वर्ष जल्दी नहीं तो त्यौहारों के अवसर पर तो खुदरा बाजार में चीनी 30 रुपए प्रति किलो बिक ही जाएगी और यदि यह स्तर पार कर जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
इस समय खुदरा बाजार में भाव 28 रुपए प्रति किलो तो हो ही चुके हैं।

--राजेश शर्मा

Monday, March 30, 2009

....सबको ये फिक्र है कि सरदार कौन हो ??

कहा जाता है कि वह राजनेता उतना ही बड़ा होता है जो जितना बड़ा ख्वाब देखता है। जवाहरलाल नेहरू से ले कर राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण तक की पीढ़ी ख्वाब देखते-देखते गुजर गई। पता नहीं इनमें कौन कितना बड़ा राजनेता था। जब कोई नेता अपने जीवन काल में अपना ख्वाब पूरा नहीं कर पाता, तो उसका कर्तव्य होता है कि वह उस ख्वाब को अगली पीढ़ी में ट्रांसफर कर दे। इनमें सबसे ज्यादा सफल नेहरू ही हुए। लोहिया और जयप्रकाश के उत्तराधिकारी लुंपेन बन गए। कुछ का कहना है कि वे शुरू से ही ऐसे थे, पर अपने को साबित करने का पूरा मौका उन्हें बाद में मिला। पर नेहरू का ख्वाब आज भी देश पर राज कर रहा है। नेहरू ने आधुनिक भारत का निर्माण किया था। हम आधुनिकतम भारत का निर्माण कर रहे हैं। सुनते हैं, इस बार के चुनाव का प्रमुख मुद्दा है, विकास। नेहरू का मुद्दा भी यही था। इसी मुद्दे पर चलते-चलते कांग्रेस के घुटने टूट गए। अब फिर वह दौड़ लगाने को तैयार है।

इस देश के सबसे बड़े और संगठित ख्वाब देखनेवाले कम्युनिस्ट थे। उनका ख्वाब एक अंतरराष्ट्रीय ख्वाब से जुड़ा हुआ था। इसलिए वह वास्तव में जितना बड़ा था, देखने में उससे काफी बड़ा लगता था। यह ख्वाब कई देशों में यथार्थ बन चुका था, इसलिए इसकी काफी इज्जत थी। लेकिन जब तेलंगाना में असली आजादी के लिए संघर्ष शुरू हुआ, तो नेहरू के ख्वाब ने उसे कुचल दिया। तब का दर्द आज तक कम्युनिस्ट ख्वाब को दबोचे हुए है। किताब में कुछ लिख रखा है, पर मुंह से निकलता कुछ और है। कम्युनिस्टों के दो बड़े नेता -- एक प. बंगाल में और दूसरा केरल में -- एक नया ख्वाब देख रहे हैं। समानता के ख्वाब को परे हटा कर वे संपन्नता का ख्वाब देखने में लगे हुए हैं। ईश्वर उनकी सहायता करे, क्योंकि जनता का सहयोग उन्हें नहीं मिल पा रहा है।

बाबा साहब अंबेडकर ने भी एक ख्वाब देखा था। यह ख्वाब अभी भी फैशन में है। पर सिर्फ बुद्धिजीवियों में। राजनीति में इस ख्वाब ने एक ऐसी जिद्दी महिला को जन्म दिया है जिसका अपना ख्वाब कुछ और है। वे अंबेडकर की मूर्तियां लगवाती हैं, गांवों के साथ उनका नाम जोड़ देती हैं, उनके नाम पर तरह-तरह के आयोजन करती रहती हैं। पर उन्होंने कसम खाई हुई है कि आंबेडकर वास्तव में क्या चाहते थे, यह पता लगाने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। इसके लिए अंबेडकर साहित्य पढ़ना होगा और आजकल किस नेता के पास साहित्य पढ़ने का समय है? फिर इस जिद्दी महिला का ख्वाब क्या है? इस बारे में क्या लिखना! बच्चों से ले कर बड़ों तक सभी जानते हैं। सबसे ज्यादा वे जानते हैं जो तीसरा मोर्चा नाम का चिड़ियाघर बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

हिन्दू राष्ट्र के दावेदारों ने भी एक ख्वाब देखा था। उनका ख्वाब काफी पुराना है। जब बाकी लोग आजादी के लिए लड़ रहे थे, तब वे एक छोटा-सा घर बना कर अपने ख्वाब के भ्रूण का पालन-पोषण कर रहे थे। उनकी रुचि स्वतंत्र भारत में नहीं, हिन्दू भारत में थी। वैसे ही जैसे लीगियों की दिलचस्पी आजाद हिन्दुस्तान में नहीं, मुस्लिम पाकिस्तान में थी। लीगियों को कटा-फटा ही सही, अपना पाकिस्तान मिल गया, पर संघियों को इतिहास ने ठेंगा दिखा दिया। तब से वे स्वतंत्र भारत के संविधान को ठेंगा दिखाने में लगे हुए हैं। लीगियों ने आजादी के पहले खून बहाया था, संघियों ने आजादी के बाद खून बहाया। शुरू में उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। वे सिर्फ अपना विचार फैला सके। बाद में जब भारतवाद कमजोर पड़ने लगा, तब हिन्दूवाद के खूनी पंजे भगवा दस्तानों से निकल आए। कोई-कोई अब भी दस्तानों का इस्तेमाल करते हैं,पर उनके भीतर छिपे हाथों का रंग दूर से ही दिखाई देता है।

अब कोई बड़ा ख्वाब देखने का समय नहीं रहा। कुछ विद्वानों का कहना है कि महास्वप्नों का युग विदा हुआ, यह लघु आख्यानों का समय है। भारत में इस समय लघु आख्यान का एक ही मतलब है, प्रधानमंत्री का पद। मंत्री तो गधे भी बन जाते हैं, घोड़े प्रधानमंत्री पद के लिए दौड़ लगाते हैं। अभी तक हम इस पद के लिए दो ही गंभीर उम्मीदवारों को जानते थे। अब महाराष्ट्र से, बिहार से, उड़ीसा से, उत्तर प्रदेश से -- जिधर देखो, उधर से उम्मीदवार उचक-उचक कर सामने आने लगे हैं। यह देख कर मुझे लालकृष्ण आडवाणी से बहुत सहानुभूति होने लगी है। बेचारे कब से नई धोती और नया कुरता ड्राइंग रूम में सजा कर बैठे हुए हैं। इस बार तो उनके इस्तेमाल का मौका नजदीक आते दिखाई नहीं देता। बल्कि रोज एकाध किलोमीटर दूर चला जाता है। चूंकि मैं सभी का और इस नाते उनका भी शुभचिंतक हूं, इसलिए आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने का आसान नुस्खा बता देना चाहता हूं। इसके लिए सिर्फ दो शब्द काफी हैं -- पीछे मुड़ (अबाउट टर्न)। सर, संप्रदायवाद, हिन्दू राष्ट्र वगैरह खोटे सिक्कों को सबसे नजदीक के नाले में फेंक दीजिए। आम जनता की भलाई की राजनीति कीजिए। अगली बार आपको प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकेगा।

राजकिशोर
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं...)

Wednesday, March 04, 2009

क्या आप सुन पाए संसद में सिसकी....

चौदहवीं लोक सभा की उम्र पूरी हो चुकी थी। शोक सभा में स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, लालकृष्ण आडवाणी आदि नेता अपना-अपना वक्तव्य रख चुके थे। निर्णय हुआ कि लाश को अभी श्मशान तक न ले जाया जाए। जब पंद्रहवीं लोक सभा का जन्म हो जाए, तब क्रिया-कर्म की रस्म पूरी हो। उसके पहले अंतिम संस्कार कर दिया गया, तो बीच की अवधि में लोक सभा की आत्मा कहां-कहां भटकती फिरेगी? वैसे, कुछ लोगों का मत है कि लोक सभा की आत्मा तो पहले ही कूच कर चुकी है। अब हम उसका शरीर ढो रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। जब शरीर है, तो आत्मा भी होगी ही। इसलिए पता लगाने की चीज यह है कि लोक सभा की असली आत्मा के कूच करने के बाद जिस आत्मा ने लोक सभा पर कब्जा कर लिया है, वह कैसी है, कहां की है और क्या करने पर वह अपने मूल क्षेत्र में जा बैठेगी। मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह पता लगाने के लिए तुरंत एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया जाए, जिसमें संसद का एक भी सदस्य न हो।

लोक सभा के सभी ऑनरेबल सदस्य बाहर निकल आए, तो गार्ड सदन के दरवाजे बंद करने के लिए लपका। बाकी सारे दरवाजों पर वह ताला लगा चुका था। जब वह आखिरी दरवाजे पर ताला लगाने जा रहा था, तभी उसे किसी लड़की की सिसकी सुनाई पड़ी। गॉर्ड भौंचक रह गया। सिसकी की आवाज दीवार के एक कोने से आ रही थी। गॉर्ड थोड़ा डर भी गया -- कहीं भूत-प्रेत का मामला तो नहीं है? फिर धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ा जिधर से सिसकी की आवाज आ रही थी। दूर ही से टॉर्च की रोशनी उधर फेंकी, तो देखा, सोलह-सत्तरह साल की एक लड़की बार-बार अपना माथा पीट रही थी और रो रही थी। उसका सिर सामने की ओर झुका हुआ था। उसके आंसू के कण फर्श पर बिखरे हुए थे।

गॉर्ड तीस साल से लोक सभा में नौकरी कर रहा था। कई लोक सभाओं के ताले खोल और बंद कर चुका था। इसके पहले उसने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी समझ जवाब दे रही थी। कौतूहल, जिज्ञासा और भय से वह आगे बढ़ा और दीवार पर लगे एक स्विच को ऑन कर दिया। एक ट्यूब लाइट जल उठा। उसकी रोशनी में उसने उस दुखिनी बाला का भरपूर जायजा लिया। वह कोई युवा प्रेतनी नहीं, हाड़-मांस की जिन्दा लड़की थी। उसकी शक्ल गॉर्ड की मझली बेटी से मिलती-जुलती थी। गॉर्ड का दिल सहानुभूति से भर आया।

गॉर्ड रोती हुई लड़की के नजदीक गया। उसने बहुत ही मुलायम स्वर में पूछा, 'क्या बात है बेटी, क्यों रो रही हो?'

ऐसा लगा मानो लड़की ने कुछ सुना ही न हो। उसकी सिसकी जारी रही।

गॉर्ड थोड़ा और नजदीक गया। उसने अपना प्रश्न दुहराया। लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। विचलित गॉर्ड ने लड़की के माथे पर हाथ रख कर उसे उठाने की कोशिश की। लड़की ने प्रतिरोध किया। गॉर्ड ने अपना सवाल फिर दुहराया। लड़की का रोना और तेज हो गया। गॉर्ड की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। लड़की को इस तरह अकेली छोड़ कर वह लोक सभा का आखिरी दरवाजा बंद नहीं कर सकता था। उसने एक बार फिर कोशिश की, 'बताओ न बेटी, आखिर बात क्या है? हो सकता है, मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। मुझे अपने पिता की तरह समझो। मेरी एक बेटी तुम्हारी ही उम्र की है।'

लड़की ने सिर झुकाए हुए ही कहा, 'स्पीकर साहब, अब आप क्या, कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता। इस लोक सभा की आखिरी बैठक हो चुकी है।' गॉर्ड ने उसकी गलतफहमी दूर की, 'बेटी, मैं स्पीकर नहीं हूं। वे तो जा चुके हैं। मैं यहां का गॉर्ड हूं। तुम बिना संकोच के अपना दुख मुझसे कह सकती हो।'

लड़की ने सिसकी रोक कर अपना सिर थोड़ा-सा उठाया। बोली, 'मेरा दुख सभी जानते हैं। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। लगता है, यहां से मेरी अरथी ही निकलेगी।'

गॉर्ड का सिर चकराने लगा था। उसने जानना चाहा, 'लेकिन तुम सदन में घुसी कैसे? यहां तो कोई भी गैर-मेंबर प्रवेश नहीं कर सकता। इसके लिए पास जारी कराना पड़ता है।'

लड़की ने जवाब दिया, 'बाबा, मेरा तो जन्म ही इस सदन में हुआ है। यहीं पड़े-पड़े मेरी उम्र बढ़ रही है। इंतजार करते-करते दस साल से ज्यादा हो गया। लोक सभा शुरू होती है, तो सब कहते हैं, इस बार तुम्हारा निपटारा कर देंगे। पांच वर्ष तक मैं आंख उठाए स्पीकर और दूसरे मेम्बरान की ओर देखती रहती हूं। सत्र पूरा हो जाता है और मेरा कुछ नहीं होता। अकेले बैठ कर सिसकती रहती हूं। वे मुझे मारते भी नहीं और जीने भी नहीं देते। हमेशा अधमरी हालत में छोड़ देते हैं।'

गॉर्ड ने आश्चर्य से पूछा, 'लेकिन बेटी, तुम हो कौन? तुम्हारा नाम क्या है?'

लड़की ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, 'बाबा, मुझ अभागन को सब जानते हैं। मेरा नाम है महिला आरक्षण विधेयक।'

अब गॉर्ड की समझ में सब कुछ आ गया। उसने हाथ पकड़ कर लड़की को उठाते हुए कहा, 'बेटी, उठो, मेरे घर चलो। यहां रोने से कुछ हासिल होनेवाला नहीं है।'

लड़की ने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'बाबा, रात हो रही है। तुम घर जाओ। मैं तो यहीं रहूंगी। या तो मेरा मनोरथ पूरा होगा या यहां से मेरी लाश निकलेगी।'

राजकिशोर

Thursday, February 19, 2009

देश की तक़दीर तय करेंगे नचनिये और खिलाड़ी....

दिलीप वेंगसरकर, शाहरूख खान, अजहरूद्दीन, संजय दत्त और अब नया नाम सौरभ गांगुली। क्या समानता है इन नामों में। ये बड़े नाम आते हैं बॉलीवुड और क्रिकेट से। दो ऐसे क्षेत्र जिनका भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर पूरा असर देखा जा सकता है। ये वो लोग हैं जिनके पीछे दुनिया दीवानी है। आज की तारीख में इन नामों से कोई भी अपरिचित नहीं हैं। इस देश में बच्चा बोलना सीखता है तो उसे 'स' से सचिन और 'ध' से धोनी सिखाया जाता है। 'अ' से अमिताभ होता है तो 'श' से शाहरूख। इन के नामों से जूते, चप्पल से लेकर तेल व कपड़े तक बिकते हैं। लेकिन आज इन नामों को क्यों याद किया जा रहा है। क्या है क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्मों के खिलाड़ी होने में समानता है?

पहले नेता जमीन से जुड़े होते थे। लोगों के करीब होते थे। समय बदला तो चोर,डाकू व बदमाश नेता बनने लगे। वो समय आ गया कि नेता ही चोर और बदमाश बन गये। दोनों के बीच में जो लकीर थी वो मिट गई। मुख्तार अंसारी को उम्मीदवार बनाते वक्त अब पार्टी ज्यादा नहीं सोचती। डी.पी यादव हो या अमरपाल सिंह बदमाश वहीं पार्टियाँ अलग अलग। लेकिन बात उनकी नहीं। समय ने फिर करवट ली और अब फिल्म स्टार और खिलाड़ी चुनावी मैदान में आ गये हैं। पार्टियों का वोट लेने का और इन स्टार लोगों का मौका भुनाने का अचूक और आसान रास्ता। ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ है। ज्यादा दूर न जायें तो गुज़रे जमाने के कई सितारे आज राजनीति में हैं और बखूबी काम कर रहे हैं। और सभी वही हैं जिनका पेशा अब राजनीति हो गया है और एक्टिंग अब कभी-कभार ही करते हैं। इनमें शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, राज बब्बर, जया प्रदा व कीर्ति आज़ाद आदि बड़े नाम शामिल हैं। ये लोग पार्टी की मीटिंग में जाते हैं। लोगों के पास भी जाते हैं। परेशानियाँ भी सुनते हैं। न भी सुने तो भी राजनीति में तो सक्रिय तो रहते हैं। एक और बड़ा नाम है अमिताभ बच्चन का। ये पहले राजनीति में आये कामयाब नहीं हुए। फिर दोबारा आये लेकिन सीधे तौर पर नहीं। खुद नहीं लड़ते, बल्कि जिताने की माँग करते रहते हैं।

ऊपर दिये गये लोग वे हैं जो सक्रिय राजनीति में हैं। पिछले चुनावों की बात करें तो मुझे इन क्षेत्रों से चार नाम याद आ रहे हैं जो चुनाव लड़े थे। वैसे तो सभी बॉलीवुड सितारे किसी न किसी पार्टी के लिये प्रचार करते ही रहते हैं। उन्हें सिर्फ पैसे से मतलब है। दलेर मेहंदी को कांग्रेस और भाजपा दोनों अपनी रैली में बुलाती हैं। मकसद..भीड़ को खीचना। पिछले आम चुनावों के बड़े नाम थे नवजोत सिंह सिद्धू, स्मृति इरानी, धर्मेंद्र और गोविंदा। कोई नाम भूल गया होऊँ तो कृपया याद दिलाइयेगा। इनमें से पहले दो लोगों की बात करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि ये लोग राजनीति को गम्भीरता से लेते हैं और चुनावी रैलियों के अलावा पार्टियों की मीटिंग वगैरह में भी शामिल होते रहते हैं। लेकिन बाकि दोनों फिल्मी सितारों का क्या? ये लोकसभा चुनाव तो जीत गये पर शायद इनका मकसद समाज की भलाई करना नहीं रहा। दोनों को ही फिल्में तो मिल नहीं रही थी तो सोचा कि क्यों न राजनीति में हाथ हाजमाया जाये। धर्मेंद्र की पत्नी हेमा मालिनी ओ वैसे भाजपा के लिये काफी समय से प्रचार कर रही है तो शायद भाजपा ने धर्मेंद्र को महज पुतले के रूप में खड़ा किया और बीकानेर वालों को पूरी तरह से बहकाया। शायद एक या दो बार राजस्थान गये हों...शायद वो भी नहीं...दूसरी ओर गोविंदा की बात करें तो उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया। समाज की भलाई के लिये कुछ भी नहीं किया। देखा जाये तो उन्हें तो राजनीति का 'र' भी नहीं आता। जब पिछले वर्ष सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो उन्हें इस प्रक्रिया के बारे में जानकारी ही नहीं थी। हमारे चीची भाई ने तो केवल फिल्मों में फूहड़ हास्य डाल कर हँसाना सीखा है, सदन में हाजिर होकर लोगों के लिये काम करना नहीं। इस बजट सेशन में केवल एक बार हाजिर हुए। वैसे मुझे एक भी ज्यादा लग रहा है!!

अब जसपाल राणा का नाम भी उठा। वे टिहरी से लड़ रहे हैं। राजनाथ सिंह के रिश्तेदार जो ठहरे, टिकट तो मिल ही जाना था। पॉपुलर तो हैं ही तो शायद वोट भी मिल जाये। उधर संजय दत्त समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से लड़ रहे हैं। सपा की हालत हाथी के आगे वैसे ही पतली चल रही है। अमिताभ के बाद मुन्ना...देखते हैं कि कामयाब होते हैं या नहीं। फिल्मी सितारों को पार्टी के लिये लपेटने का काम राजनैतिक दल बखूबी कर रहे हैं और बदले में फिल्मी सितारे राजनीति की 'एक्टिंग' करने का मेहनताना लेते हैं। आज बहुत कम सितारे या खिलाड़ी ऐसे हैं जो समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं। धर्मेंद्र और गोविंदा जैसे सितारे दोबारा चुनाव लड़ पायेंगे ये मुझे संदेह है क्योंकि जनता इन्हें समझ चुकी है। वैसे जनता क्या सोच कर वोट देती है? क्या हर फिल्मी सितारा या खिलाड़ी अच्छा समाजसेवी हो सकता है या राजनैतिक दलों की महज कठपुतली? यदि पुराने दिग्गजों की बात न करूं तो आज यहाँ सिद्धू और स्मृति ईरानी जैसे नेता भी हैं और धर्मेंद्र गोविंदा जैसे भी। वो समय बीत गया जब शत्रुघ्न, राज बब्बर जैसे सितारे सक्रिय राजनीति में उतर आये थे और इसी को अपना पेशा बना लिया था। आजकल राजनीति इन फिल्म-स्टारों का पार्ट-टाइम धंधा है।

मुझे इंतज़ार है ये जानने का कि क्या संजय दत्त भी गोविंदा की राह पर निकलेंगे? मुम्बई से लखनऊ साल में कितनी बार चक्कर लगायेंगे? क्या मुन्नाभाई की इमेज का असर वोटिंग पर भी पड़ेगा? क्या लोगों को बहकाना इतना सरल हो गया है कि कोई भी बड़ी शख्सियत आ कर चुनाव लड़े और जीत जाये। शायद अब तक लोगों को समझ आ जाना चाहिये। और अगर नहीं आया तो यह इस देश का दुर्भाग्य कहलायेगा और भविष्य अँधकारमय। वैसे चुनाव आते आते कईं और नाम सामने आ सकते हैं.. देखें क्या होता है इन सितारों का..क्या इन सितारों को जनता दिन में तारे दिखायेगी?

तपन शर्मा