दिलीप वेंगसरकर, शाहरूख खान, अजहरूद्दीन, संजय दत्त और अब नया नाम सौरभ गांगुली। क्या समानता है इन नामों में। ये बड़े नाम आते हैं बॉलीवुड और क्रिकेट से। दो ऐसे क्षेत्र जिनका भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर पूरा असर देखा जा सकता है। ये वो लोग हैं जिनके पीछे दुनिया दीवानी है। आज की तारीख में इन नामों से कोई भी अपरिचित नहीं हैं। इस देश में बच्चा बोलना सीखता है तो उसे 'स' से सचिन और 'ध' से धोनी सिखाया जाता है। 'अ' से अमिताभ होता है तो 'श' से शाहरूख। इन के नामों से जूते, चप्पल से लेकर तेल व कपड़े तक बिकते हैं। लेकिन आज इन नामों को क्यों याद किया जा रहा है। क्या है क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्मों के खिलाड़ी होने में समानता है?
पहले नेता जमीन से जुड़े होते थे। लोगों के करीब होते थे। समय बदला तो चोर,डाकू व बदमाश नेता बनने लगे। वो समय आ गया कि नेता ही चोर और बदमाश बन गये। दोनों के बीच में जो लकीर थी वो मिट गई। मुख्तार अंसारी को उम्मीदवार बनाते वक्त अब पार्टी ज्यादा नहीं सोचती। डी.पी यादव हो या अमरपाल सिंह बदमाश वहीं पार्टियाँ अलग अलग। लेकिन बात उनकी नहीं। समय ने फिर करवट ली और अब फिल्म स्टार और खिलाड़ी चुनावी मैदान में आ गये हैं। पार्टियों का वोट लेने का और इन स्टार लोगों का मौका भुनाने का अचूक और आसान रास्ता। ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ है। ज्यादा दूर न जायें तो गुज़रे जमाने के कई सितारे आज राजनीति में हैं और बखूबी काम कर रहे हैं। और सभी वही हैं जिनका पेशा अब राजनीति हो गया है और एक्टिंग अब कभी-कभार ही करते हैं। इनमें शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, राज बब्बर, जया प्रदा व कीर्ति आज़ाद आदि बड़े नाम शामिल हैं। ये लोग पार्टी की मीटिंग में जाते हैं। लोगों के पास भी जाते हैं। परेशानियाँ भी सुनते हैं। न भी सुने तो भी राजनीति में तो सक्रिय तो रहते हैं। एक और बड़ा नाम है अमिताभ बच्चन का। ये पहले राजनीति में आये कामयाब नहीं हुए। फिर दोबारा आये लेकिन सीधे तौर पर नहीं। खुद नहीं लड़ते, बल्कि जिताने की माँग करते रहते हैं।
ऊपर दिये गये लोग वे हैं जो सक्रिय राजनीति में हैं। पिछले चुनावों की बात करें तो मुझे इन क्षेत्रों से चार नाम याद आ रहे हैं जो चुनाव लड़े थे। वैसे तो सभी बॉलीवुड सितारे किसी न किसी पार्टी के लिये प्रचार करते ही रहते हैं। उन्हें सिर्फ पैसे से मतलब है। दलेर मेहंदी को कांग्रेस और भाजपा दोनों अपनी रैली में बुलाती हैं। मकसद..भीड़ को खीचना। पिछले आम चुनावों के बड़े नाम थे नवजोत सिंह सिद्धू, स्मृति इरानी, धर्मेंद्र और गोविंदा। कोई नाम भूल गया होऊँ तो कृपया याद दिलाइयेगा। इनमें से पहले दो लोगों की बात करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि ये लोग राजनीति को गम्भीरता से लेते हैं और चुनावी रैलियों के अलावा पार्टियों की मीटिंग वगैरह में भी शामिल होते रहते हैं। लेकिन बाकि दोनों फिल्मी सितारों का क्या? ये लोकसभा चुनाव तो जीत गये पर शायद इनका मकसद समाज की भलाई करना नहीं रहा। दोनों को ही फिल्में तो मिल नहीं रही थी तो सोचा कि क्यों न राजनीति में हाथ हाजमाया जाये। धर्मेंद्र की पत्नी हेमा मालिनी ओ वैसे भाजपा के लिये काफी समय से प्रचार कर रही है तो शायद भाजपा ने धर्मेंद्र को महज पुतले के रूप में खड़ा किया और बीकानेर वालों को पूरी तरह से बहकाया। शायद एक या दो बार राजस्थान गये हों...शायद वो भी नहीं...दूसरी ओर गोविंदा की बात करें तो उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया। समाज की भलाई के लिये कुछ भी नहीं किया। देखा जाये तो उन्हें तो राजनीति का 'र' भी नहीं आता। जब पिछले वर्ष सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो उन्हें इस प्रक्रिया के बारे में जानकारी ही नहीं थी। हमारे चीची भाई ने तो केवल फिल्मों में फूहड़ हास्य डाल कर हँसाना सीखा है, सदन में हाजिर होकर लोगों के लिये काम करना नहीं। इस बजट सेशन में केवल एक बार हाजिर हुए। वैसे मुझे एक भी ज्यादा लग रहा है!!
अब जसपाल राणा का नाम भी उठा। वे टिहरी से लड़ रहे हैं। राजनाथ सिंह के रिश्तेदार जो ठहरे, टिकट तो मिल ही जाना था। पॉपुलर तो हैं ही तो शायद वोट भी मिल जाये। उधर संजय दत्त समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से लड़ रहे हैं। सपा की हालत हाथी के आगे वैसे ही पतली चल रही है। अमिताभ के बाद मुन्ना...देखते हैं कि कामयाब होते हैं या नहीं। फिल्मी सितारों को पार्टी के लिये लपेटने का काम राजनैतिक दल बखूबी कर रहे हैं और बदले में फिल्मी सितारे राजनीति की 'एक्टिंग' करने का मेहनताना लेते हैं। आज बहुत कम सितारे या खिलाड़ी ऐसे हैं जो समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं। धर्मेंद्र और गोविंदा जैसे सितारे दोबारा चुनाव लड़ पायेंगे ये मुझे संदेह है क्योंकि जनता इन्हें समझ चुकी है। वैसे जनता क्या सोच कर वोट देती है? क्या हर फिल्मी सितारा या खिलाड़ी अच्छा समाजसेवी हो सकता है या राजनैतिक दलों की महज कठपुतली? यदि पुराने दिग्गजों की बात न करूं तो आज यहाँ सिद्धू और स्मृति ईरानी जैसे नेता भी हैं और धर्मेंद्र गोविंदा जैसे भी। वो समय बीत गया जब शत्रुघ्न, राज बब्बर जैसे सितारे सक्रिय राजनीति में उतर आये थे और इसी को अपना पेशा बना लिया था। आजकल राजनीति इन फिल्म-स्टारों का पार्ट-टाइम धंधा है।
मुझे इंतज़ार है ये जानने का कि क्या संजय दत्त भी गोविंदा की राह पर निकलेंगे? मुम्बई से लखनऊ साल में कितनी बार चक्कर लगायेंगे? क्या मुन्नाभाई की इमेज का असर वोटिंग पर भी पड़ेगा? क्या लोगों को बहकाना इतना सरल हो गया है कि कोई भी बड़ी शख्सियत आ कर चुनाव लड़े और जीत जाये। शायद अब तक लोगों को समझ आ जाना चाहिये। और अगर नहीं आया तो यह इस देश का दुर्भाग्य कहलायेगा और भविष्य अँधकारमय। वैसे चुनाव आते आते कईं और नाम सामने आ सकते हैं.. देखें क्या होता है इन सितारों का..क्या इन सितारों को जनता दिन में तारे दिखायेगी?
तपन शर्मा

मार्कण्डेय