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Monday, May 11, 2009

प्रथम बार वोट देने वालों का सरोकार काम से - एक चुनाव झलकी

प्रेमचंद सहजवाला

लोकसभा 2009 पर मैं अभी तक तीन बड़ी रिपोर्ट्स दे चुका हूँ. पर ब-तौर एक झलकी प्रस्तुत करने के मुझे लगा कि ज़रा उन नौजवान मतदाताओं से साक्षात्कार किया जाए, जो मन में पहली बार वोट डालने का उत्साह लिए घर से निकले थे. सन् '84 में जब राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री बने तो अपने 5 - वर्षीय कार्य-काल में जो काम किए, उन में से एक महत्वपूर्ण काम यह था कि पहले मतदान करने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होती थी, उसे राजीव गाँधी ने घटा कर 18 वर्ष किया. देश की युवा पीढ़ी बेहद प्रसन्न थी. युवा पीढ़ी को देश की समस्याओं पर गौर करने और अपने निर्वाचन-क्षेत्र के प्रतिनिधियों का मूल्यांकन करने की प्रेरणा मिली. दिनांक 7 मई 2009 को दिल्ली में भी बहुत इंतज़ार के बाद मतदान की सरगर्मी आई. मैं इस दिन नई दिल्ली लोकसभा सीट के अलग अलग मतदान केन्द्रों पर जायजा लेने घूम रहा था. कुछ देर के लिए मेरी नज़र उन नौजवान मतदाताओं को खोज रही थी, जिन्हें बेसब्री से इंतज़ार था कि पहली बार वोट देने वाली शुभ सुबह आए तो वे वोट देने जाएँ. इस बात में दो राय हो ही नहीं सकती कि वरिष्ठ पीढ़ी कि तुलना में युवा पीढ़ी अधिक प्रखर भी है, और बेहद आशावान भी. अलबत्ता कुछ युवक-युवतियां राजनेताओं के गिरते चारित्रिक स्तर के कारण खिन्न भी थे और कुछ तो कतिपय उन बड़ों जैसी बातें भी कर रहे थे जो कहते रहते हैं कि सब के सब चोर हैं बाबूजी. आख़िर किसे पसंद करें. मैंने बहुत पहले किसी चुनाव में 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' पत्रिका में एक कार्टून देखा था कि एक आदमी एक मोटा से लेंस ले कर बहुत सारे टोपी-धारी नेताओं को एक एक कर के गौर से देख रहा था. किसी के पूछने पर उस ने कहा कि आज चुनाव है. मैं देख रहा हूँ कि इन में सब से कम बुरा कौन सा है, क्यों कि अच्छा मिलना तो ना-मुमकिन है न!

पर 7 मई वृहस्पतिवार को अधिकाँश युवकों युवतियों में मुझे एक बहुत उत्साहवर्द्धक आशा-वादिता भी दिखी. नौजवानों का कहना है कि अगर नौजवानों को मौका दिया जाएगा तो मुमकिन है कि देश को एक नई और स्वस्थ दृष्टि भी दे सकें और काम भी बहुत कर सकें. 'दिल्ली का दंगल', जैसा कि इसे माना गया है, मुख्यतः दो ही पहलवान पार्टियों के बीच रहा है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा). मैं जितने भी नव-मतदाताओं से मिला (पहली बार वोट देने वाले), वे सब मुख्यतः इन्हीं दो पार्टियों के बीच बँटे हुए थे, भले ही वोटिंग-मशीन पर 40 या उस से भी ज्यादा नाम लिखे हों. किसी का चुनाव-चिह्न आसमान पर खिंचा तीर-कमान था तो किसी का
डबलरोटी या केक या बल्लेबाज़ वगैरह. पर नज़र सब की या तो हाथ पर थी या कमल पर. यह बताना मुश्किल कि कमल खिलेगा या हाथ हंसेगा. पर एक बात सब में गज़ब की समानता रखती थी कि सब का सरोकार काम करने वाले से ही था. इस निर्वाचन-क्षेत्र में कोई विजय गोयल (भाजपा) की तारीफ़ कर रहा था कि उस ने चांदनी-चौक में बहुत काम किया और हमेशा कोई न कोई नई योजना बनाता रहता है तो कोई अजय माकन के लिए तारीफों के पुल बाँध रहा था कि अब उन्होंने यमुना नदी को साफ़ करने का वादा किया है, जो कि बहुत ज़रूरी काम है. कुछ युवतियों में बहस भी ठनी क्यों कि किसी किसी को सोनिया-प्रियंका अच्छी लगती हैं तो उस के विरोध में दूसरी का कहना है कि अच्छी महिलाएं भाजपा में भी हैं, सोनिया-प्रियंका बड़ी फैमिली की हैं, इसलिए हर कोई उनकी तरफ़ है. बहरहाल जो बात मन को खुश करने वाली थी, वो यह कि युवा पीढ़ी देश से बहुत प्यार करती है और चाहती है कि देश को केवल बातें करने वाले निकम्मे नेताओं से छुटकारा मिले और देश में कुछ कर गुज़रने का वातावरण बने. यह सोच ही आशा का वह दीपक है, जिस की रौशनी में भरष्टाचार और आतंकवाद का अँधेरा भी पार हो जाएगा, ऐसी आशा की जा सकती है.


--प्रेमचंद सहजवाला

Monday, May 04, 2009

यथा-राजा तथा-प्रजा


जी हाँ वक्त के साथ-साथ न केवल कहावतों, मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं अपितु उनकी शब्दावली में भी उलट-फ़ेर हो जाता है। पिछले जमाने में राजा का पद वंशानुगत होता था और पीढियों तक चलते-चलते प्रजा मजबूरी में राज-परिवार की फ़ितरत-स्वभाव के मुताबिक खुद को ढाल लेती थी, गुजारा जो करना था। जैसा हमने सुना है कि कई रजवाड़ों में नवविवाहिता को अपनी पहली रात मजबूरन राजमहल में गुजारनी पड़ती थी। मेरे गांव में कलानौर के नवाब के महल से पहली रात को भाग कर एक नवविवाहिता ने लगभग १२५ साल पहले शरण लेने व उसके बाद गांव वालों के कलानौर पर चढाई कर नवाब के कत्ल की कथा आज भी कही जाती है। उसके महल के बुर्ज पर लगे हवा की दिशा जानने हेतु लगाए गए यंत्र व नवाब के नगाड़े जो आज भी एक संत की समाधि-स्थल पर सुरक्षित है, को सबूत बतलाया जाता है। यह कथा आसपास के गावों तथा भांदो द्वारा आज भी गाई जाती है। खैर यह कथा एक ओर।

आज देश में प्रजातन्त्र है, यानी प्रजा अपना राजा या प्रतिनिधि चुनने में स्वतंत्र है, तो हम कह सकते हैं कि जैसी प्रजा है वैसा राजा होगा। मैं, आप यानी प्रजा यह मानने को कतई तैयार न होगी कि गैंगस्टर-अपराधियों को चुनने में उसका कोई दोष है। हम सब विकल्प न होने की दुहाई देने लगते हैं- क्या मैं गलत कह रहा हूँ?
पर हम यानी जनता-जनार्दन खासी तंग है अपने चुने गये प्रतिनिधियों से। तो क्या करें ? हमें इस चुनाव तथा आगे आने वाले चुनावों में कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिये।

हम सब जानते हैं कि पिछले कुछ बरसों से देश में संयुक्त मोर्चा सरकारें राज कर रहीं है क्योंकि कांग्रेस या भाजपा दोनो तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियाँ बहुमत प्राप्त नहीं कर पा रहीं और उन्हे क्षेत्रिय दलों की वैशाखी पर आश्रित रहना पड़ता है। और उनकी ब्लैकमेलिंग तो हमने पिछली लोक सभा के शक्ति परीक्षण काल में देखी ही है, शिबू सोरेन और देवगौड़ा एक दिन में ही 3-4 बार इधर-से उधर होते नजर आए। हम यह भी जानते हैं (आज मीडीया आंकड़े दे रहा है) कि ये क्षेत्रिय दल ही सब से ज्यादा अपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी खड़े करते हैं, जो अपने धन-बल व जातीय समीकरण द्वारा जीत भी जाते हैं। अब ऐसे तत्वों की जीत की संभावनाओं के चलते राष्ट्रीय पार्टियाँ भी उन्हें टिकट देने को मजबूर हो गयीं, मैं यह नहीं कहता कि ये तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां दूध-धुलीं हैं। वे तब तक ऐसे तत्वों को टिकट देंगी, जब तक वे जीतते रहेंगे। तो हमें चाहिये कि
इस चुनाव व आगे आने वाले चुनावों में भी केवल इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को ही वोट दें चाहे वह कैसा ही हो। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां का उम्मीदवार न हो वहां भी क्षेत्रिय पार्टी के उम्मीद्वार के स्थान पर किसी निर्दलीय कोवोट दें। जहां इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों में किसी पार्टी ने दल-बद्लू को टिकट दी हो वहां उसे वोटे न दें।

इससे आज ही कोई परिणाम आएगा ऐसा नहीं है लेकिन धीरे-धीरे हवा बदलेगी और जब इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों को जनता की मनसा का ज्ञान होने लगेगा तो वे खुद भी इस और ध्यान देंगी। तब जनता इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के उस उम्म्मीद्वार को नकारना आरम्भ करेंगे जो आपराधिक पृष्ठभूमि का होगा।
हमें (हम पढे लिखे लोगों) को यह अभियान केवल चुनाव के समय ही नहीं अपितु सतत जारी रखना होगा, जिससे अगले-उससे अगले चुनाव तक आमजन इस बात को अपना ले और सच मानें आमजन जो ब्लॉगिंग नही जानता, अब इस बात को मानता है कि देश में दो पार्टियां ही होनी चहियें, उसे जरूरत है मार्ग-दर्शन की। यह विश्वास दिलाने की कि ऐसा संभव है। अब तक ये आपराधिक तत्व उन्हे विश्वास दिलाने में काम्याब रहें है कि उनकी जाती का सासंद-विधायक ही उनका भला कर सकता है, पर अब वे भी जान गये हैं कि यह केवल दिखावा है और वे आपकी रहनुमाई की राह देख रहे हैं। इस चुनाव में हरियाणा की जनता का मूड देखकर मैं यह बात कह रहा हूं और चुनाव नतीजे बतला देंगे कि मेरा आकलन सही है या गलत है। केवल कुछ दिनों की बात है।
आगे चलकर हम ब्लॉगिंग व सेमिनारों-सभाओं मे जहां ये सांसद-इन तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के बुलाए जाएंगे इन्हें ही कुछ बातें पहुंचाएं (हम हरयाणा मे ऐसा करने में लगे है)कि

  1. संसद में ऐसा नियम कानून लाया जाए कि किसी पार्टी में अगर किसी पार्टी का विघटन होता है, तो जो घटक एक पार्टी से समर्थन वापिस लेकर (जिसे अब तक पूरी पार्टी समर्थन दे रही थी) दूसरी पार्टी को समर्थन देना चाहे तो उसे इस नई पार्टी में विलय होना पड़ेगा अन्यथा उसके सदस्यों की सदन सदस्यता स्वत: खत्म हो जाएगी (ऐसा अब तक तब होता है जब इन की संख्या पार्टी की अविभाजित संख्या के एक तिहाई से कम हो)।

  2. यही नहीं अगर कोई पूरी की पूरी पार्टी भी एक मोर्चे से समर्थन वापिस लेकर दूसरे मोर्चे का समर्थन करना चाहे तो उसे भी दूसरे मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे विलय करना पड़ेगा।

  3. किसी को भी बहुमत प्राप्त न होने पर अगर कई पार्टियां मिलकर सरकार बनाना चाहें तो उन्हें अपनी पार्टी का विलय उस मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी मे करना अनिवार्य कर दिया जाए।

  4. चुनाव में अगर किसी पार्टी को कम से कम 5 राज्यों में प्रतिधित्व प्राप्त नहीं हो तो उसके सदस्यों का किसी राष्ट्रीय पार्टी में विलय अनिवार्य हो। अगर वे ऐसा न करें तो उनकी सदस्यता खत्म कर दी जाए।

  5. निर्दलीय सदस्य अगर किसी एक मोर्चे में शामिल होने के बाद अपना समर्थन वापिस लेना चाहे तो उसकी सदस्यता खत्म हो।


यह सच है कि ऐसा होना अभी संभव नहीं है लेकिन अगर देश के बुद्धिजीवी लामबंद हो जाएं तो निकट भविष्य में स्थिति अवश्य सुधरेगी।
आमजन को अगर दिशा दी जाए तो वह करने को तैयार रहता है। हमारे देश में एमरजेंसी के बाद के चुनाव, बोफ़ोर्स के बाद के चुनाव व बर्लिन की दीवार का टूटना-सोवियत संघ व ईस्टर्न यूरोप की तथाकथित तानाशाहियों का टूटना,आमजन की ताकत का नमूना नहीं तो क्या हैं ? जरा सोचें

कुछ और विकल्प
एक अन्य विचारधारा- हमें अमेरिकन यानि राष्ट्रपति पद्धति अपनानी चाहिये, जिससे यह अनिश्चितता खत्म हो जाए। सरकार गिरने का खतरा न रहे। अगर आप ध्यान करें तो देखें केवल दो उदाहरण- बिल क्लिंटन कांड अगर हिन्दुस्तान में होता (जब बिल क्लिन्टन अपने रक्षामन्त्री से बात कर रहा था तो मोनिका लेविन्सकी से संलग्न था), क्या भारतीय प्रधानमन्त्री ऐसी बात उजागर होने पर इस्तीफ़ा देने को बाध्य नहीं होता? ब्रिटेन में प्रोफ़्मयो कांड का उदाहरण देखें।
हमारे यहां न्यूक्लियर संधि में मनमोहन की कुर्सी ही नहीं, सरकार भी येन-केन प्रकारेण बची, लेकिन जनाब बुश तो गलत रिपोर्ट बनवाकर इराक पर हमला कर बैठे। क्योंकि उन्हें तानाशाह जैसी ताकत हासिल थी।

एक और विचार- चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलें उतने ही सांसद उसे मिल जाने चाहियें। दोस्तो, हमारे समाज मे जाति-धर्म का दुरुपयोग चुनाव में जिस तरह होता है, यह तरीका उसे और बढावा देगा। मित्रो, हमारे पुरखों ने जो आजादी की लड़ाई से तपकर कुन्दन बनकर निकले थे और उस वक़्त उनके दिमाग में आमजन की भलाई व आमजन की स्वतंत्रता कायम रखने व उनके मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के अलावा कोई और विचार नहीं था। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सविंधानो को पढ़कर-मनन कर एक बेहतरीन संविधान हमें दिया था, जिसमें जो कमियां नजर आईं उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता दूर भी करने के प्रयत्न जारी हैं। जैसे दल-बदल पर कानून, सूचना का अधिकार अधिनियम आदि। मुझे लगता है कि अगर वोटर सही प्रतिनिधियों को चुनकर भेजेंगे तो आमजन के कल्याण हेतु और भी नियम बनेंगे। हमारा संविधान एक बहुमूल्य दस्तावेज है। बस यह जिनके (हमारे) लिये बनाया गया है, उन्हें जागरूक रहना है।

लेखक- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

Friday, May 01, 2009

भाजपा प्रचार जानी पहचानी लीक पर

हिन्द-युग्म के प्रेमचंद सहजवाला उम्र के इस पड़ाव पर भी हाथ में कैमरा लिये कोई न कोई चुनाव रैली में शामिल हो जाते हैं। आम जनता और उनके भावी प्रतिनिधियों से एक पेशेवर पत्रकार की तरह बात करते हैं। सभाओं में श्रोता बनना इन्हें ख़ासा रुचिकर लगता है। पिछले हफ़्ते इन्होंने कांग्रेस के अजय माकन को कैमरे में कैद किया था और उसकी एक रिपोर्ट दी थी। आज कैद हुए है भाजपा के रविशंकर प्रसाद॰॰॰॰


लोक सभा चुनाव 2009 कई अर्थों में बेहद महत्वपूर्ण हो रहे हैं। एक तो यह कि 15वीं लोक सभा शायद सरकार बनाने वाली पार्टी के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण होगी। पार्टियों और नेताओं का एक लंबा जुलूस सा है। कांग्रेस के बारे में भले ही यह कहा जा रहा हो कि भाजपा की तुलना में उस की स्थिति थोड़ी सी ही बेहतर है, पर दिन ब दिन कांग्रेस की मुश्किलें भी बढ़ती नज़र आ रही हैं और कांग्रेस-भाजपा की टक्कर और अधिक तीखी होती जा रही है। कभी तो कांग्रेस को लालूप्रसाद और मुलायम सिंह छोड़ कर अपनी डफली बजाने में लगे हैं, कभी शरद पवार को प्रधानमंत्री बनने के सपने आते हैं। तो कभी अचानक क्वात्राची का पुराना भूत आकर 10 जनपथ पर मंडराने लगता है। कभी कोई कह देता है कि मनमोहन सिंह तो केवल 'नाइट वॉचमैन' हैं और चुनाव जीतते ही कांग्रेस सहसा राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बना देगी। टीवी चैनलों के भी खूब मौज हो गई है। कोई-कोई चैनल ग्लैमर को बढ़ावा देने के लिए प्रियंका गाँधी की साड़ियों की प्रदर्शनी लगा देता है, जिन में प्रियंका अपनी दादी माँ यानी इंदिरा गाँधी की साड़ियों में से अपने लिए साड़ी चुनती नज़र आती हैं। पर सारी चमक-दमक व मनमोहन सिंह की साफ़ सुथरी छवि के बावजूद कांग्रेस पर यह खतरा बना हुआ है कि जैसे 2004 के चुनावों में उम्मीद वाजपेयी की जीत की थी और जीत गई थी सोनिया, तो कहीं इस बार ठीक उल्टा न हो जाए। नए प्रधान मंत्री को शपथ दिलवाने के तैय्यारी कर रही हों सोनिया जी और बाज़ी मार ले जाएँ आडवानी जी! आडवानी और मोदी के द्वंद्व पर भी मीडिया अच्छे पैसे कमा लेता है, यह कह कर कि क्या मोदी ही भाजपा का असली चेहरा हैं?

बहरहाल, इस बीच मैं दिनांक 24 अप्रैल को जनकपुरी मेट्रो स्टेशन के नज़दीक बने 'एस के बैंकेट हाल' में आयोजित भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद का भाषण सुनने चला गया। रविशंकर प्रसाद वाजपेयी के नेतृत्त्व वाली सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं तथा भाजपा की सांप्रदायिक छवि के तुलना में एक 'सेकुलर' नेता व सुलझी हुई सभ्य शख्सियत माने जाते हैं। पर जैसा कि हर चुनाव में होता है, इस बार भी भाजपा का प्रचार नकारात्मक वोटों पर ही आधारित है। कांग्रेस के विफलताओं की रोटियां सेंक कर खाना भाजपा का बहुत पुराना खेल है। रविशंकर प्रसाद सुप्रीम कोर्ट के एक जाने माने वकील भी हैं तथा भाषण बहुत प्रभावशाली करते हैं। उन्होंने सब से पहले अपने समय की एन.डी.ए सरकार की एक बड़ी उपलब्धि यही मानी कि सन 98 में परमाणु परीक्षण कर के एन.डी.ए सरकार ने भारत को अग्रणी देशों में ला खड़ा किया। परन्तु जब मैंने भाषण के अंत में मंच पर जा कर यह प्रश्न किया कि परमाणु शक्ति होने के कारण भारत पाकिस्तान पर हमला ही नहीं कर पा रहा, वरना इतने आतंकवादी हमलों के बाद भारत के पास यही विकल्प है कि पाकिस्तान पर हमला कर के उन के आतंकवादी अड्डे नेस्तनाबूद कर दे। पर रवि शंकर प्रसाद यह मानने को तैयार नहीं हैं। बल्कि रोचक बात यह है कि उन्होंने पाकिस्तान को सीधा करने का वही तरीका बताया जो इस समय कांग्रेस को अपनाना पड़ रहा है। वे कहते हैं कि भारत के पास कई और तरीके हैं, जैसे कि सख्ती। और दुनिया के कई देश भारत की बात मानते हैं. यानी राजनयिक (diplomatic) तरीका। मुझे इस से भी अधिक रोचक बात यह लगती है कि कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक व विदेशी नीतियां एक दूसरे के फोटो-कॉपी ही हैं। कुछ दिन पहले तो रजत शर्मा ने 'आप की अदालत' में भाजपा नेता अरुण जेटली से पूछ ही लिया कि इतने ढेरों दलों के खिचडी से तो बेहतर है कि कांग्रेस और भाजपा मिल-जुल कर सरकार बनाएं। अरुण जेटली ने वही जवाब दिया जिसकी उम्मीद थी, हालांकि उपस्थित दर्शक-गण ने रजत के सवाल पर भरपूर ठहाका लगाया था। जेटली कहते हैं कि समय के साथ राजनैतिक ध्रुवीकरण भी हो चुका है। अतः भाजपा और कांग्रेस का मिलना तो अब दूर की बात ही रही। रविशंकर प्रसाद ने अपने भाषण में मंहगाई, आतंकवाद, काला धन, अफज़ल गुरू, कांधार विमान-अपहरण, बंगलादेशी घुसपैठिये, कसाब के बजाय दूसरे मृत आतंकवादी का डी.एन.ए टेस्ट पाकिस्तान भेज देना, सन 84 की सिख हत्याएं, हिंदू- मुस्लिम प्रश्न... इन सब जाने पहचाने प्रश्नों के चिरपरिचित लीक पर अपना प्रभावशाली भाषण रखा। हिंदू-मुस्लिम प्रश्न पर भाजपा की गिरगिट बाज़ी का प्रदर्शन उन्हें भी करना पड़ा शायद। वोटों के समय भाजपा एक नकली मुखौटा चढ़ाती है कि वह मुसलमानों की दुश्मन नहीं है। पर ज़रूरत पड़ने पर जैसा गुजरात में हुआ, नरसंहार अपनी आंखों से होता देखते रहने में कोई संकोच नहीं करती। न ही वह उड़ीसा की शर्मनाक ईसाई हत्याओं का कोई जवाब देती है। रोचक बात यह कि रविशंकर प्रसाद जी का कहना है कि उन की पार्टी मौलाना आजाद, परम वीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद, इरफान पठान व सानिया मिर्जा पर गर्व करती है। वास्तविकता यह है कि मौलाना आजाद की छवि पुराने जनसंघी नेता चुन-चुन कर बिगाड़ते रहे और अब्दुल हमीद के विषय में उन का प्रचार यही था कि सन 65 की लड़ाई के बाद दिखावे के तौर पर एक मुस्लिम को भी परम वीर चक्र दे दिया गया। बैंकेट हॉल में जहाँ शादी के बाद दूल्हा दुल्हन बैठते हैं, ऐसे एक हॉल में लगभग 600 लोग थे जिन में कई तो कार्यकर्त्ता थे। पर रविशंकर प्रसाद अपने प्रस्तुतीकरण में काफ़ी सशक्त रहे. वोटों के दिन जनता क्या करती है, यह जनता के गत जनता जाने।
इधर दिनांक 29 अप्रैल को मैं अपने घर बैठा चंगा भला फिल्मी गाने सुन रहा था कि नीचे कार्यकर्ताओं का शोर सा सुनाई दिया. 'भारतीय जनता युवा मोर्चा' के कार्यकर्ता एक वैन में प्रचार को निकल पड़े थे और उनके साथ थी यहाँ रमेशनगर की निगम पार्षद उषा मेहता, जो यहाँ की एक लोकप्रिय नेता हैं, अपनी सुंदर वाणी और हावभाव के लिए प्रसिद्ध। उन से मैंने पूछा कि नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र को ले कर उन की क्या योजनाएं हैं तो उन्होंने भी मंहगाई की बात कर के यह कहा कि नई दिल्ली में अजय माकन के होते जो तबाही हुई है, उस से दिल्ली को बचाना हमारा ध्येय है. हर बार की तरह कार्यकर्ताओं में उत्साह और धूमधड़ाका था पर आडवानी और मनमोहन सिंह की तुलना में आख़िर इस चुनाव का ऊँट किस करवट बैठता है, यह जानने के लिए सब को इंतज़ार है चुनाव ख़त्म होने का और 16 मई को परिणाम आने शुरू होने का।

रविशंकर प्रसाद से सवाल करते प्रेमनिगम पार्षद उषा मेहता का जवाब