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Wednesday, July 15, 2009

कपड़े की तरह कंपनियां बदलते तरक्कीपसंद युवा



इंसान हमेशा से ही अधिक से अधिक पाने की लालसा में रहा है। यही कारण है कि इंसान वैज्ञानिक दृष्टि से हमेशा ही आगे बढ़ता गया और तरक्की करता चला गया। ये आदत हर इंसान में होती है चाहे वो किसी भी पेशे से जुड़ा हो। लेकिन ये तरक्की पाने की चाह जल्द से जल्द पैसा कमाने की चाह में तब्दील होती जा रही है। अब आदमी बड़ा भी बनना चाहता है, पैसे वाला भी। मैं घुमा-फिरा कर बात नहीं करूँगा और सीधे मुद्दे पर आना चाहूँगा। मुझे और किसी क्षेत्र में अधिक जानकारी नहीं है पर मैं बात करूँगा मल्टीनेशनल कही जाने वाली कम्पनियों के कर्मचारियों की, और आपको बताऊँगा कि किस तरह से आप तेजी से पैसे कमा सकते हैं।

लोग कहते हैं (मैं नहीं जानता) कि एक जमाना था जब लोग अपने मालिक के लिये दिन-रात एक कर देते थे। एक ही कम्पनी में कईं कईं साल काम करते थे, उसके लिये वफादार थे। लेकिन क्या आज भी लोग एक ही कम्पनी में काम करते रहना पसंद करते हैं? क्या कारण था जो पहले लोग टिक पाते थे? समय बदला है, विदेशी कम्पनियाँ भारत में आई हैं, ढेरों पैसे लाईं हैं। पहले कम्पनियाँ कम होती थीं इसलिये तन्ख्वाह भी उसी हिसाब से होती थी। अब हर तरफ एक होड़ है। मंदी का दौर न देखें तो आप पायेंगे कम्पनियाँ लोगों पर मुँह माँगे पैसे देने को तैयार हो जाती हैं। उनको अपने काम से मतलब है..काम खत्म..तो उस कर्मचारी की भी ज़रूरत नहीं। वही आजकल मंदी के समय में देखा जा रहा है किस तरह से कम्पनियाँ लोगों को निकाल रही हैं। कम्पनियाँ पैसे देती हैं और लोगों को खरीदती हैं, लोग पैसे के लिये ही कम्पनियाँ बदलते हैं।

पिछले वर्ष एक आंकड़ा पढ़ा था जो बेहद चौंकाने वाला था। आई.टी के क्षेत्र में एक व्यक्ति एक कम्पनी में महज सात महीने औसतन काम करता है। मतलब हर सात महीने में नईं कम्पनी। ये औसत है तो इसका अर्थ यह भी समझिये कि लोग सात महीने से कम समय के लिये भी काम करते हैं। हर छह महीने में नईं कम्पनी बदलना ये आज से दस वर्ष पहले तक "फैशन" में नहीं था। कुछ समय पहले तक एक आई.टी में काम करने वाला एक व्यक्ति दूसरे से पूछा करता था-"अब तक एक ही कम्पनी में क्यों पड़ा है?" इस सवाल के दो अर्थ हो सकते हैं। या तो व्यक्ति को अपनी कम्पनी में अच्छा पैसा मिलता है...वो विदेश यात्रा करता रहता है। इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ पैसा कमाने के लिये ही आई.टी में घुसे हैं। उन्हें इस क्षेत्र से कोई लगाव नहीं है और न ही इसे सीखने की कोई इच्छा। उन्हें काम से कोई मतलब नहीं होता। और शायद इसीलिये ही एक ही कम्पनी में रहते हैं। हालाँकि ऐसे लोग ही मंदी की चपेट में अधिक आते हैं।

आई.टी में पैसे कमाने के कुछ नुस्खे आपके सामने रख रहा हूँ। हालाँकि ये नुस्खे मंदी के दौर में कुछ फीके पड़े हैं पर फिर भी कारगर हैं। पहला नुस्खा बार बार लगातार बिना वजह कम्पनियाँ बदलना। ऐसे लोग कुछ सीख नहीं पाते, दूरदर्शी नहीं होते और वे निकट भविष्य में जितना पैसा कमा सकते हैं उसी जुगत में रहते हैं। मुझे हैरानी होती थी ये सुनकर जब कॉलेज से निकले वाला अनुभवहीन छात्र भी अपनी बोली लगाने लग गया था। मंदी ने ये हथियार छीन लिया। दूसरा हथियार पिछले वर्ष तक कारगर था किन्तु इस साल कोई दोहराना नहीं चाहता। आप कम्पनी छोड़ने की धमकी दें, कम्पनी आपकी सैलेरी बढ़ा देगी। तीसरा नुस्खा ऐसा है जो मंदी के दौर में भी बदस्तूर जारी है। मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो इस तरह से अच्छे खासे पैसे कमा रहे हैं। इसके लिये आपको तकनीकी दृष्टि से सक्षम होना जरूरी है। करना केवल इतना है कि जुगाड़ से और विभिन्न वेबसाईट और कम्पनियों से सस्ते दामों पर प्रोजेक्ट उठाने हैं और उन्हें समय पूरा कर देना है। इस तरह से आप कम्पनी से सैलेरी तो ले ही रहे है और दूसरा आप प्रोजेक्ट से भी अच्छा कमा सकते हैं। ऐसे लोग कम्पनी के काम पर कम ध्यान दे कर अपने "दूसरे" प्रोजेक्ट पर अधिक ध्यान देते हैं और कम्पनी के काम को हाशिये पर धकेल देते हैं। नतीजतन इससे उनकी टीम पर भी असर पड़ सकता है।

जितनी तन्ख्वाह इससे पहले की पीढ़ी १०-१५ साल के अनुभव के बाद भी नहीं कमा सकती थी, वही आजकल आई.टी के क्षेत्र में आप २-३ साल में ही कमाना शुरु कर सकते हैं। इन सब नुस्खों के बाद एक बात जो मेरे जहन में उठ रही है कि क्या रूपया-पैसा कम्पनी की वफ़ादारी से ऊपर है? या वफ़ादारी की बातें करना बेकार की बातें हैं? क्या आजकल की पीढ़ी वफ़ादारी नहीं समझती? और क्या कम्पनी भी अब अपने दायित्व का निर्वाह नहीं करती? क्या पैसे की होड़ कम्पनी और कर्मचारी के बीच के रिश्तों में खटास घोल रही है?

तपन शर्मा

Monday, July 13, 2009

मुसलमानों पर बहस ज़रूरी है....

अब तक आपने पढ़ा...
मुसलमानों पर बहस ज़रूरी है-1

मीडिया संस्थानों की मांग


सम्मेलन में एक वक्ता की अपने(माने मुस्लिम) मीडिया संस्थानों की मांग चौंकाने वाली थी... देश की हर संवेदनशील खबर से वर्तमान मीडिया संस्थानों का सीधा सरोकार है.. ऐसे में कोई खबर हिन्दू या मुसलमान नहीं बल्कि सिर्फ खबर है और देश के मीडिया संस्थानों में मुस्लिम समुदाय की अच्छी-खासी भागीदारी है..... अब सवाल ये है कि कौन सा ऐसा काम है जो वर्तमान मुस्लिम मीडियाकर्मी नहीं कर पा रहे हैं....और ऐसा भी नहीं है कि मुस्लिम समुदाय से पूरी तरह से संबंधित चैनल आये नहीं, लेकिन टीआरपी के खेल में उलझ कर वह गायब हो गए..ऐसे में अपनी बात रखने का सशक्त माध्यम आप मुस्लिम मीडिया संस्थानों को कैसे कह सकते हैं...क्या तय है आपके इस माध्यम को दर्शक के रूप में अन्य लोग स्वीकार करेंगे..सवाल कई हैं...क्या कभी किसी धार्मिक चैनल को वो टीआरपी मिली जो एक न्यूज़ चैनेल को मिलती है.....आज मुसलमानों को अपनी बात रखने के लिए किसी न्यूज़ चैनल का मुंह नहीं ताकना है.....इस तरह की बातें शब्दों के अभाव में मात्र छलावा हैं....आज ज़रुरत ये है कि अपना मुंह खुद खोला जाये, अपनी बात खुद रखी जाये और ये काम हर आम आदमी का है....फिर कोई वजह नहीं कि देश की दूसरी बड़ी आबादी की बात नकारी जाये

मुस्लिमो की शैक्षणिक तथा सामाजिक समस्याएँ और बरेली सम्मेलन


बरेली सम्मेलन में एक बात जो जोर-शोर से उठी, वो थी शिक्षा का गिरता स्तर...वक्ताओं ने इस मुद्दे पर फिक्रमंदी ज़ाहिर की और ख़ास तौर पर औरतों की शिक्षा पर जोर दिया गया.....तालीम के लिए बेदारी एक सुखद अनुभूति है....वह भी तब, जब ये आवाज़ मुस्लिम नवयुवकों के बीच से उठी हो..... लेकिन यहीं देखने की बात ये है कि मुस्लिमो कि तालीमी परेशानियाँ किस तरह की हैं... आज मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका तालीम के लिए मुस्लिम मदरसों पर निर्भर करता है....और हो भी क्यूं न....वहां भले ही कॉन्वेंट स्कूल जैसा तालीमी माहौल नहीं है, लेकिन मुस्लिमो को तालीम जारी रखने के लिए बाकी सहूलते हैं.... और सच पूछा जाये तो मुसलमानों कि बड़ी तादाद मदरसों में पढने को मजबूर है.... मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर सरकारों ने मदरसों को वित्तीय सहायता का एलान तो किया, लेकिन वहां दी जाने वाली शिक्षा के प्रति संसाधनों पर ध्यान नहीं दिया.....क्या ज़रूरी नहीं कि मदरसे भी कंप्यूटर एजूकेशन, तथा अंग्रेजी से लैस हों.... इस मामले में जामिया सुफिया यूनिवर्सटी एक बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ इल्मे-दीन के साथ-साथ छात्र कम्प्यूटर, इंग्लिश, तथा संस्कृत जैसी भाषाओं के साथ अपनी तालीम पूरी कर रहे हैं....बात यहीं ख़त्म नहीं होती...लड़कियों की तालीम के लिए भी नज़रिए बदलने होंगे....लड़की ख़त पढने लगी भर की संतुष्टि आखिर कब तक ??
सामाजिक स्तर पर चीख-चीख कर खोखली तकरीरों से कुछ होने वाला नहीं है....यह बात ठीक है कि कुछ लोग अपने राजनैतिक लाभ के लिए मुसलमानों को उकसाते हैं लेकिन ऐसे लोगों की संख्या इतनी नहीं कि वो हिन्दुस्तान के प्रति एक सच्चे वतनपरस्त मुसलमान को किसी स्तर पर डिगा सकें..... फिर मुसलमान कुंठा का शिकार क्यूं ? यह देश हमारा है.... इसके ज़र्रे-ज़र्रे में हम हैं...सामाजिक परिवेश में आज भी आम हिन्दू-आम मुसलमान के साथ दिखाई देता है... अवध की तहज़ीब में ऐसी समानताएं प्रायः देखने को मिलती हैं... अवध के ही ग्रामीण इलाकों में मुस्लिमों में बच्चे की पैदाइश से पहले यह गीत गाया जाता है कि अल्लाह मियां अब कि से दीज्यो नंदलाल..... ज़रा महसूस कीजिए कि जहाँ दो संस्कृतियाँ मिल कर एक नयी तहजीब को जन्म दें, वहां अपने ही अस्तित्व पर सवाल महज़ एक अनजान डर प्रतीत होता है......आम मुसलमान को समझना होगा कि उनके प्रति संदेह करने वाले लोगों का अपना मकसद है और जिस दिन हम-आप यह समझ जायेंगे उस दिन मुसलमान बेखौफ होकर क्रिकेट मैच देख सकेगा...

हाशम अब्बास नक़वी 'बज़्मी'
(ये बहस आगे भी जारी रहेगी...आप भी अपने लेखों के साथ इस बहस में आएं...आपका स्वागत है....)

Thursday, February 12, 2009

राहुल, मनमोहन या आडवाणी: युवा कौन?

पिछले कुछ हफ्तों से अखबारो और समचार चैनलों से जाना कि राहुल गाँधी आने वाले चुनावों के लिये युवाओं की फौज तैयार कर रहे हैं। यानि कि कांग्रेस चाहती है कि युवा इस देश का नेतृत्व करें। मनमोहन सिंह तो वैसे भी पहले से ही कांग्रेस के लिए कठपुतली रहे हैं। यदि आप कांग्रेस के होर्डिंग देखेंगे तो पायेंगे कि ५० फीसदी में मनमोहन गायब होंगे। और अगर विश्व में सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की बात होती है तो सोनिया का नाम ज़रूर आता है पर अपने प्रधानमंत्री का नहीं। पिछली बार तो कांग्रेस की मजबूरी थी मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाना लेकिन इस बार राहुल बाबा पिछले २-३ सालों से मेहनत कर रहे हैं। पसीना बहा रहे हैं। अभी हाल ही में दिल्ली में मैंने बैनर देखा था.. लिखा था : "युवा देश युवा नेता" और फोटो थी केवल राहुल गाँधी की। अब इसका क्या मतलब निकाला जाये? कांग्रेस में ही विरोधाभास है। मनमोहन या राहुल? वे युवा के तौर पर राहुल को प्रोजेक्ट कर रहे हैं और प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह को। वैसे कांग्रेस की नीति कभी भी प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को प्रोजेक्ट करने की नहीं रही। हर बार चुनाव के बाद ही पासे खुले हैं। क्या इस बार भी...?

यदि कांग्रेस यह मानती है कि राहुल गाँधी युवा हैं और राहुल भी अपने जैसे युवाओं की एक ब्रिगेड खड़ा करना चाहते हैं तो उनके 'युवा' देश के मंत्रियों की एक लिस्ट देखें:
मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शरद पवार, लालू प्रसाद, ए.के.एंटनी, ए.आर. अंतुले, सुशील कुमार शिंदे, रामविलास पासवान व जयपाल रेड्डी आदि। इनमें से कितने राहुल बाबा के हमउम्र हैं, ये कांग्रेस व राहुल गाँधी को समझना चाहिये। फिलहाल तो यही लोग देश का नेतृत्व कर रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब तक यह देश बुजुर्ग हाथों में हैं?

खैर कांग्रेस तो उलझी रहेगी। उधर बीजेपी में आडवाणी के नाम पर फैसला ५ साल पहले ही तय हो गया था जब भाजपा चुनाव हारी थी। अगर वर्तमान स्थिति देखें तो मनमोहन और आडवाणी में मुकाबला... ये दोनों बुजुर्ग हैं या युवा? हो सकता है कि लोगों में बात उठे कि कहीं युवा भारत के बुजुर्ग प्रधानमंत्री तो नहीं होने जा रहे? आडवाणी ने पिछले दिनों चैट के दौरान लोगों से कहा कि देश चलाने के लिये अनुभव की जरूरत होती है। ऐसा व्यक्ति जो देश व विदेश की सभी नीतियों को जानता हो। अपने दोस्त व दुश्मन को जानता हो। बात भी सही है। अनुभव के बिना देश नहीं चलता। तो क्या राहुल गाँधी में अनुभव है कि वे देश को चला सकें?

युवा और बुजुर्ग पर बहस चली है तो मुझे एक वाकया याद आ गया। अभी पिछले महीने जनवरी में संघ के एक कार्यक्रम में जाना हुआ जिसमें दिल्ली की आई.टी और मैनेजमेंट कम्पनियों के कईं इंजीनियर, मैनेजमेंट के छात्र आदि उपस्थित थे। उसमें संघ के जनरल सेक्रेट्री मोहन राव भागवत को सुना। युवा होने की परिभाषा में उनका कहना था कि आयु युवा होने का प्रमाण नहीं होती। इंसान सोच से युवा या बुजुर्ग होता है शरीर से नहीं। उन्होंने आगे कहा कि युवा होने के लिए संवेदना होनी आवश्यक है। जिस व्यक्ति में संवेदना होती है, जो दूसरों के दुख-सुख को समझ सकता है वही युवा है। एक और लक्षण जो उन्होंने बताया वो था दृढ़ निश्चय। जो लक्ष्य हासिल करना होता है उसको पाने के लिये वो जी-तोड़ मेहनत करता है जबकि जो बुजुर्ग होगा वो थक जायेगा व हताश हो जायेगा। इसका मतलब ये हुआ कि २५ बरस में भी इंसान बूढ़ा हो सकता है और ७० वर्ष का भी युवा हो सकता है।

राहुल गाँधी को भविष्य का प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना या न करना इस उलझन में फिलहाल कांग्रेस भी है। पर राहुल देश के प्रधानमंत्री तो बनेंगे ही, आखिर ख़ास परिवार से हैं। इसमें जो पैदा हुआ वो प्रधानमंत्री बना। इस बार नहीं तो १०-१५-२० वर्षों बाद वो दिन तो आयेगा ही। पिछली बार इनका बचपन था अब युवा हैं.. उम्र से.. राजनीति में शायद अभी भी बचपन ही है...राजनैतिक समझ तो अभी बाकी है। देखें कब तक वे परिपक्व होते हैं पर तब तक भारत की जनता दो उम्रदराज़ युवाओं, मनमोहन और आडवाणी, के बीच ही फैसला करेगी।

तपन शर्मा