
इंसान हमेशा से ही अधिक से अधिक पाने की लालसा में रहा है। यही कारण है कि इंसान वैज्ञानिक दृष्टि से हमेशा ही आगे बढ़ता गया और तरक्की करता चला गया। ये आदत हर इंसान में होती है चाहे वो किसी भी पेशे से जुड़ा हो। लेकिन ये तरक्की पाने की चाह जल्द से जल्द पैसा कमाने की चाह में तब्दील होती जा रही है। अब आदमी बड़ा भी बनना चाहता है, पैसे वाला भी। मैं घुमा-फिरा कर बात नहीं करूँगा और सीधे मुद्दे पर आना चाहूँगा। मुझे और किसी क्षेत्र में अधिक जानकारी नहीं है पर मैं बात करूँगा मल्टीनेशनल कही जाने वाली कम्पनियों के कर्मचारियों की, और आपको बताऊँगा कि किस तरह से आप तेजी से पैसे कमा सकते हैं।
लोग कहते हैं (मैं नहीं जानता) कि एक जमाना था जब लोग अपने मालिक के लिये दिन-रात एक कर देते थे। एक ही कम्पनी में कईं कईं साल काम करते थे, उसके लिये वफादार थे। लेकिन क्या आज भी लोग एक ही कम्पनी में काम करते रहना पसंद करते हैं? क्या कारण था जो पहले लोग टिक पाते थे? समय बदला है, विदेशी कम्पनियाँ भारत में आई हैं, ढेरों पैसे लाईं हैं। पहले कम्पनियाँ कम होती थीं इसलिये तन्ख्वाह भी उसी हिसाब से होती थी। अब हर तरफ एक होड़ है। मंदी का दौर न देखें तो आप पायेंगे कम्पनियाँ लोगों पर मुँह माँगे पैसे देने को तैयार हो जाती हैं। उनको अपने काम से मतलब है..काम खत्म..तो उस कर्मचारी की भी ज़रूरत नहीं। वही आजकल मंदी के समय में देखा जा रहा है किस तरह से कम्पनियाँ लोगों को निकाल रही हैं। कम्पनियाँ पैसे देती हैं और लोगों को खरीदती हैं, लोग पैसे के लिये ही कम्पनियाँ बदलते हैं।
पिछले वर्ष एक आंकड़ा पढ़ा था जो बेहद चौंकाने वाला था। आई.टी के क्षेत्र में एक व्यक्ति एक कम्पनी में महज सात महीने औसतन काम करता है। मतलब हर सात महीने में नईं कम्पनी। ये औसत है तो इसका अर्थ यह भी समझिये कि लोग सात महीने से कम समय के लिये भी काम करते हैं। हर छह महीने में नईं कम्पनी बदलना ये आज से दस वर्ष पहले तक "फैशन" में नहीं था। कुछ समय पहले तक एक आई.टी में काम करने वाला एक व्यक्ति दूसरे से पूछा करता था-"अब तक एक ही कम्पनी में क्यों पड़ा है?" इस सवाल के दो अर्थ हो सकते हैं। या तो व्यक्ति को अपनी कम्पनी में अच्छा पैसा मिलता है...वो विदेश यात्रा करता रहता है। इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ पैसा कमाने के लिये ही आई.टी में घुसे हैं। उन्हें इस क्षेत्र से कोई लगाव नहीं है और न ही इसे सीखने की कोई इच्छा। उन्हें काम से कोई मतलब नहीं होता। और शायद इसीलिये ही एक ही कम्पनी में रहते हैं। हालाँकि ऐसे लोग ही मंदी की चपेट में अधिक आते हैं।
आई.टी में पैसे कमाने के कुछ नुस्खे आपके सामने रख रहा हूँ। हालाँकि ये नुस्खे मंदी के दौर में कुछ फीके पड़े हैं पर फिर भी कारगर हैं। पहला नुस्खा बार बार लगातार बिना वजह कम्पनियाँ बदलना। ऐसे लोग कुछ सीख नहीं पाते, दूरदर्शी नहीं होते और वे निकट भविष्य में जितना पैसा कमा सकते हैं उसी जुगत में रहते हैं। मुझे हैरानी होती थी ये सुनकर जब कॉलेज से निकले वाला अनुभवहीन छात्र भी अपनी बोली लगाने लग गया था। मंदी ने ये हथियार छीन लिया। दूसरा हथियार पिछले वर्ष तक कारगर था किन्तु इस साल कोई दोहराना नहीं चाहता। आप कम्पनी छोड़ने की धमकी दें, कम्पनी आपकी सैलेरी बढ़ा देगी। तीसरा नुस्खा ऐसा है जो मंदी के दौर में भी बदस्तूर जारी है। मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो इस तरह से अच्छे खासे पैसे कमा रहे हैं। इसके लिये आपको तकनीकी दृष्टि से सक्षम होना जरूरी है। करना केवल इतना है कि जुगाड़ से और विभिन्न वेबसाईट और कम्पनियों से सस्ते दामों पर प्रोजेक्ट उठाने हैं और उन्हें समय पूरा कर देना है। इस तरह से आप कम्पनी से सैलेरी तो ले ही रहे है और दूसरा आप प्रोजेक्ट से भी अच्छा कमा सकते हैं। ऐसे लोग कम्पनी के काम पर कम ध्यान दे कर अपने "दूसरे" प्रोजेक्ट पर अधिक ध्यान देते हैं और कम्पनी के काम को हाशिये पर धकेल देते हैं। नतीजतन इससे उनकी टीम पर भी असर पड़ सकता है।
जितनी तन्ख्वाह इससे पहले की पीढ़ी १०-१५ साल के अनुभव के बाद भी नहीं कमा सकती थी, वही आजकल आई.टी के क्षेत्र में आप २-३ साल में ही कमाना शुरु कर सकते हैं। इन सब नुस्खों के बाद एक बात जो मेरे जहन में उठ रही है कि क्या रूपया-पैसा कम्पनी की वफ़ादारी से ऊपर है? या वफ़ादारी की बातें करना बेकार की बातें हैं? क्या आजकल की पीढ़ी वफ़ादारी नहीं समझती? और क्या कम्पनी भी अब अपने दायित्व का निर्वाह नहीं करती? क्या पैसे की होड़ कम्पनी और कर्मचारी के बीच के रिश्तों में खटास घोल रही है?
तपन शर्मा



मार्कण्डेय