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Friday, July 09, 2010

अमेठी का नाम बदला, अब देश का भी बदलेगा?

शेक्सपियर ने कहा था "नाम में क्या रखा है?"। मुझे नहीं पता कि यह किस संदर्भ में कहा गया लेकिन इतना जरूर है कि आज की तारीख में यह कथन उपयुक्त नहीं लगता। हाल ही में "माया प्रदेश" (यूपी) में एक और शहर का नाम बदला गया। अमेठी को जिला बनाया गया और नाम रखा गया श्री छत्रपतिशाहू जी महाराज नगर। यह पहला मौका नहीं है कि किसी शहर का नाम बदला गया हो। बम्बई का मुम्बई, मद्रास बना चेन्नई और कलकत्ता का बन गया कोलकोता। लेकिन वे नाम उस जगह की भाषा व संस्कृति को ध्यान में रखते हुए बदले गये। जबकि ये दलित नेता के नाम पर रखा गया जिनका अमेठी के लिये कोई योगदान नहीं रहा है।

मायावती की "माया" को हर कोई जानता है। जो ठान लेती हैं वो कर देती हैं। आजकल अपने और हाथी के पुतले लगाये जा रहे हैं चाहे सुप्रीम कोर्ट से फ़टकार ही क्यों न लगी हो। वैसे तो वे गाँधी परिवार से पंगा लेती ही रहती हैं। रायबरेली और अमेठी में अड़ंगा पड़ा ही रहता है। इस बार भी अमेठी ही हत्थे चढ़ा। अगर कोई दूसरा शहर होता तो बात कुछ और थी। पर उन्होंने छेड़ा है गाँधी परिवार की "धरोहर" को। कांग्रेस का आग-बबूला होना बनता था।

पर कांग्रेस नहीं जानती कि उसके खुद के दामन पर कितने छींटे हैं। कोई ऐसा शहर नहीं होगा जिसमें नेहरू नगर, इंदिरा नगर या इंदिरा विहार जैसी जगह न हों। अपने खुद के नेताओं के नाम पर हर जगह के नाम रखे हैं कांग्रेस ने। कोई सड़क बने या यूनिवर्सिटी या कोई बिल्डिंग सबसे आगे कांग्रेसी ही नजर आयेंगे। इंद्रप्रस्थ विष्वविद्यालय का नाम गुरू गोबिन्द सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय रखकर शीला सरकार ने सिखों को रिझाने की पूरी कोशिश की। कनॉट प्लेस जो सी.पी के नाम से मशहूर है उसका नाम राजीव चौक रखने में यही कांग्रेस आगे थी। कनॉट सर्कस भी इंदिरा चौक बन गया। आने वाला समय इस देश को इंडिया या भारत या हिन्दुस्तान नहीं कहेगा बल्कि गाँधीस्तान के नाम से जाना जायेगा। कुल मिलाकर कहना यह कि नामों के खेल में कांग्रेस से सब पीछे ही रहेंगे। क्या पता आगे मायावती उन्हें पीछे छोड़ सके फ़िलहाल तो यह मुश्किल लगता है।

लेकिन अगर आप कांग्रेस पर उंगली उठायेंगे तो आप को यह दलील सुनने को मिलेगी कि इन नेताओं ने देश की "सेवा" की है। इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस के बाकी नेता "बेकार" और निठल्ले थे और आज भी हैं। अगर हम यह कहें कि इन "महापुरुषों" ने देश की सेवा की है तो जब सड़कों के नाम "शहाजहाँ रोड", जहाँगीर रोड, लोदी रोड, औरांगअजेब रोड और तुगलक रोड रखा जाता है तो यह दलील कहाँ तक सही है? तुगलकाबाद व लोदी कॉलोनी के बारे में क्या कहा जाये? लोदी ने इस देश को लूटा, औरंगजेब ने देश को लूटा, मुगलों ने देश पर राज किया तो फिर उनके नाम पर सड़कों के नाम? तुगलक के आतंक को हम लोग भूल जाते हैं !!! इन सड़कों व जगहों के नाम लेते हुए दिल में आक्रोश सा भर जाता है।

किसी जाति व सम्प्रदाय को खुश करना हो तो इन्हीं नामों का सहारा लिया जाता। अम्बेडकर स्टेडियम हो या अम्बेडकर नगर या फिर उनके "मेमोरियल" पर बना कोई इंजीनियरिंग अथवा मेडिकल कॉलेज। भगत-तिलक-लाला लाजपत राय-राजगुरु-चंद्रशेखर आज़ाद-राम प्रसाद बिस्मिल-इन्होंने शायद देश के लिये ज्यादा योगदान नहीं दिया या फिर ये नाम किसी अल्पसंख्यक धर्म-सम्प्रदाय से नहीं जुड़े-ये दलित नहीं थे-वगैरह वगैरह और भी कारण हो सकते हैं (शायद इनके नाम में "गाँधी" नहीं था । शायद इसलिये इनके नाम पर सड़क-बिल्डिंग-कॉलेज का नाम रखते हुए दस बार सोचा जाता है। ये नाम किसी दल को वोट नहीं दिला सकते। बस इतनी सी बात है और यही सच्चाई है।

क्या आप जानते हैं कि वाघा बॉर्डर कहाँ है? आप कहेंगे कि अमृतसर में तो मेरा जवाब होगा कि नहीं। वाघा तो पाकिस्तान की सीमा में आता है, हमारे देश में तो अटारी आता है। शायद हमें वाघा नहीं अटारी बॉर्डर कहना चाहिये। यही उपयुक्त है या फिर वाघा-अटारी बॉर्डर। इस पर बहस हो सकती है। राज नेताओं को छोड़िये। लोगों की अंग्रेज़ी में लिखने की स्पेलिंग बदल जाती है। तो कोई अपनी फ़िल्म का नाम एक ही अक्षर से शुरु करता है। लोग अपनी किस्मत बदलने के लिये नाम तक बदल लेते हैं। ’राम’ व ’अल्लाह’ के नाम पर दुनिया टिकी है और आप कहते हैं कि "नाम में क्या रखा है!!!" अरे जनाब नाम का ही सारा खेल है। अब अगर राजनीति भी इस खेल में कूद जाये तो फिर कहना ही क्या!!

तपन शर्मा

Wednesday, May 27, 2009

फार्मूलों से न जिंदगी चलती है न राजनीति

अब हर कोई यह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया। जब इस फार्मूले के बल पर मायावती उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गईं, उस वक्त कहा जा रहा था कि मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला चल निकला। उन दिनों बसपा नेता की कुशाग्र बुद्धि की जम कर प्रशंसा की जा रही थी और यह उम्मीद की जाने लगी थी कि जल्द ही वे भारत की प्रधानमंत्री बन जाएं, तो यह हैरत की बात नहीं होगी। बहन जी खुद भी ऐसा सोचती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि बहन जी खुद ऐसा सोचती थीं, इसलिए हमारे विद्वान लोग भी ऐसा ही सोचने लगे थे। हमारे विद्वान देखते तो हैं – पर उधर नहीं जिधर सत्य होता है, बल्कि उधर जिस तरफ हवा चल रही होती है। अब हवा मायावती के उलटी दिशा में चल रही है, तो कहा जाने लगा है कि उन्होंने अपनी बनती हुई इमारत को अपने ही पैरों से धक्का दे कर नेस्तनाबूद कर दिया। विद्वानों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सोशल इंजिनियरिंग क्या चीज है, यह कैसे काम करती है और इसका संचालन कैसे करना चाहिए।

अनाड़ी हाथों में पड़ कर अच्छा से अच्छा फार्मूला भी फेल हो सकता है। लेकिन मूल बात यह नहीं है। मूल बात यह है कि फार्मूले गणित और विज्ञान में ही गुल खिला सकते हैं, जहां दो और दो हमेशा चार होते हैं तथा दस में से पांच निकाल दो तो हमेशा पांच ही बचेगा। जिंदगी में ऐसा नहीं होता। यहां चार करो तो नतीजा आठ भी हो सकता है और दो भी हो सकता है। इसी में जिंदगी का रोमांच है। नहीं तो वह एकरस हो जाती। इसीलिए जब से जिंदगी की पेचीदगी बढ़ी है, दुनिया भर में ऐसी किताबों की बाढ़ आ गई है जो सुख से जीने और सफलता पाने के गुर सिखाती हैं। ऐसी किताबों की एक पीढ़ी लोकप्रिय हो जाने के बाद जब बाजार में दम तोड़ देती है, तो उनकी दूसरी पीढ़ी जन्म लेती है। इस तरह सुख-शांति-सफलता-समृद्धि-नेतृत्व देने के फार्मूले पानी के बुलबुलों की तरह पैदा होते रहते हैं और उन्हीं की तरह शीघ्रमृत्यु के शिकार हो जाते हैं। पर जिंदगी इतनी पेचीदा चीज है कि समस्याओं का पैदा होना बंद नहीं होता। बताते हैं कि चुनाव प्रचार के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी को जब भी थोड़ा-सा वक्त मिलता था, वे डेल कार्नेगी की एक समय बहुत बिकनेवाली पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लुएंस पीपल’ पढ़ने लगते थे। इसमें दी गई शिक्षाओं के आधार पर आडवाणी ने कितने मित्र बनाए और कितने लोगों को प्रभावित किया, यह कोई नहीं जानता। अगर फार्मूलों पर अमल करने से हर विवाह सफल हो जाता, हर संबंध सरस हो जाता, हर व्यवसाय प्रगति करने लगता और हर क्षेत्र में सफलता मिलती होती, तो धरती पर इतना दुख-दैन्य दिखाई नहीं देता।

फिर भी फार्मूलाबाजी चलती रहती है तो इसीलिए कि सभी लोग सफलता का शॉर्टकट खोजते रहते हैं। पैदल, साइकिल या मोटरगाड़ी के लिए शॉर्टकट हो सकते हैं, पर जिंदगी का सफर इतना सीधा नहीं है। यहां कोई भी फार्मूला काम नहीं करता। हर आदमी को हर चीज की खोज अपने ढंग से करनी होती है। टाटा घराना अपने ढंग से सफल हुआ तो अंबानी ग्रुप अपने ढंग से। बिड़ला परिवार का तरीका कुछ और था। बीआर चोपड़ा और ह्मषीकेश मुखर्जी, दोनों की फिल्में हिट होती थीं, पर दोनों का फिल्म बनाने का तरीका अलग-अलग था। अमिताभ बच्चन अगर राजेश खन्ना की तरह अभिनय करते और गुलजार आनंद बख्शी की तरह गीत लिखते, तो वे आज इतिहास के डस्टबिन में होते।

मायावती ने जब अवर्ण-सवर्ण एकता तथा सद्भाव की खोज की – किसी नई राजनीति की पीठिका के तौर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक सफलता के शॉर्टकट के रूप में, तो वे एक फार्मूले की रचना कर रही थीं – न उनका निजी परिप्रेक्ष्य बदल रहा था, न उनकी राजनीति में परिवर्तन आ रहा था, न उनके कामकाज के तरीके बदल रहे थे। वे जानती थीं कि ओबीसी उनके साथ आएँगे नहीं, मुसलमान उनके बाएं बाजू की तरह जाना शुरू कर चुके हैं, इसलिए दलितों के साथ चलने के लिए ऊंची जातियों को ही लुभाया जा सकता है, जो अब तक की अपनी उपेक्षा से संतप्त थे। यही मायावती ने किया -- अपनी बुद्धि से किया या किसी सवर्ण सलाहकार की बात मान कर किया, यह मायावती के जीवनीकार जानें। फार्मूला हिट हो गया और उत्तर प्रदेश का मुकुट उड़ते हुए बहन जी के सिर पर आ बैठा। दुर्भाग्यपूर्ण घटना यह हुई कि इसके नतीजे में, इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, बहन जी का दायित्व बोध तो नहीं जागा, उनकी महत्वाकांक्षा के पटाखे में दियासलाई जरूर लग गई। अब उनके पैर उत्तर प्रदेश नामक अभागे राज्य के जूते से बहुत बड़े हो गए और वे प्रशासन तथा विकास की चुनौतियों को भुला कर दिल्ली का सिंहासन खरीदने के लिए रुपयों का हिमालय खड़ा करने में लग गर्इं। वे अपनी पार्टी के हर सांसद, विधायक और कार्यकर्ता को, सरकार के हर विभाग को, हर विभाग के हर अफसर को अपने ‘प्रधानमंत्री सहायता कोष’ का चलता-फिरता एटीएम समझने लगीं। यहीं से उनके पैर डगमगाने लगे।

सत्ता महत्वाकांक्षा का बोझ सहन करती है, लेकिन एक हद तक ही। जब उसने एक समय इंदिरा गांधी की आदमकद से बड़ी महत्वाकांक्षाओं का बोझ वहन करने से इनकार कर दिया और उत्तर भारत में कांग्रेस की एक भी सरकार न रहने दी, तो मायावती किस खेत की मूली हैं। अब वे कार्यकर्ताओं और अफसरों को डांट-फटकार रही हैं कि तुम्हीं लोगों के कारण मेरी हार हुई। इसके बजाय अगर वे किसी आदमकद आईने के सामने खड़ी हो जातीं, तो उन्हें अपनी हार के लिए जिम्मेदार एकमात्र व्यक्ति तुरंत दिख जाता। पर यह प्रकृति की माया है कि आंखें खुद को देखने के लिए बनाई ही नहीं गई हैं और आईने के सामने हर आदमी को अपना चेहरा प्यारा लगता है।

सड़क सभी को चाहिए – चाहे वह दलित हो, या पिछड़ा या मुसलमान या बाभन-ठाकुर। बिजली भी सभी को चाहिए। अच्छा प्रशासन किसी एक जाति का जीना सुगम नहीं करेगा, इससे सभी को राहत मिलेगी। यही हाल शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से संबंधित संस्थानों का है। गुंडागर्दी सभी के लिए दुखमय है। संक्षेप में यह कि सुशासन का कोई विकल्प नहीं है। मायावती को दिल्ली ले जाने का रास्ता सुशासन से हो कर ही जाता था -- अब भी जाता है, पर उन्होंने सोचा कि नीति, कार्यक्रम और अमल की त्रयी के स्थान पर तिकड़म का अद्वैतवाद ही काफी है। यह सोशल इंजिनियरिंग नहीं, राजनीतिक इंजिनियरिंग थी। इसका फेल होना उतना ही निश्चित था जितना नीम के पेड़ पर आम के उगने की उम्मीद का फेल होना। विधान सभा चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ पर तो अवर्ण-सवर्ण एकता हो गई थी, पर इससे सत्ता की जो मदांध राजनीति पैदा हुई, उसने उस अवर्ण समूह के बीच भी दरारें पैदा कर दीं जिसे मायावती अपना फिक्स्ड अकाउंट मानती रही हैं। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों से मायावती के उम्मीदवारों का हारना और क्या बताता है? बहरहाल, मई 2009 का सवाल यह है कि एक फार्मूले के फेल होने के बाद दलित की बेटी कोई और फार्मूला खोजने का यत्न करेगी या कांशीराम के वचन याद करते हुए यह समझने की कोशिश कि राजनीति की नौटंकी क्या होती है और असली राजनीति क्या होती है।

राजकिशोर
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)