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Tuesday, March 03, 2009

बूँद भर सफलता, सागर भर खुशी...

ऑस्करों की खुशी से देश दीवाना है, तो यह उचित ही है। इनमें से कई हमारे नहीं हैं। हमारे असली ऑस्कर वे हैं जो संगीत के लिए दिए गए हैं। इसके बावजूद यह कम गर्व की बात नहीं है कि दूसरी बार किसी भारतीय प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय फिल्म सम्मान मिला है। पहला ऑस्कर एक भारतीय को शेखर कपूर की फिल्म 'एलिजाबेथ' में कॉस्ट्यूम के लिए मिला था। इस बार संगीत के लिए तीन ऑस्कर सम्मान मिले हैं। इसके नशे में देश झूम रहा है। यह और बात है कि फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनर' को ले कर तरह-तरह के विवाद खड़े हो गए हैं। इस विवाद में कुछ दम भी है। फिर भी ए.आर. रहमान का सम्मान भारत की प्रतिभा का सम्मान है और इससे हम सभी गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, तो इसमें कुछ भी बेजा नहीं है। सब कुछ के बावजूद सम्मान सम्मान है।
खुशी की यह दीवानगी पहली बार नहीं देखी जा रही है। क्रिकेट में जब भारत की टीम ने विश्व कप जीता था, तब भी ऐसी दीवानगी दिखाई पड़ी थी। कपिल देव राष्ट्रीय हीरो बन गए थे। क्रिकेट का विश्व कप जीतने पर और ज्यादा दीवानगी दिखाई पड़ी, क्योंकि क्रिकेट हमारे देश के मध्य वर्ग को कुछ ज्यादा ही भाता है। गर्व की ऐसी ही लहर तब भी उठी थी, जब सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय के सौंदर्य को विश्व स्तर की मान्यता मिली थी। अर्मत्य सेन को जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, तो भारत का कद अचानक फिर बढ़ गया। जब 'फॉर्ब्स' पत्रिका द्वारा दुनिया के अमीरतम व्यक्तियों की सूची प्रकाशित की जाती है, तो उसमें भारतीयों की संख्या पढ़ कर हमें कुछ खुशी तो होती ही है। भारतीय सिर्फ साहित्य, खेल, सौंदर्य और अर्थशास्त्र की विद्वत्ता में आगे नहीं हैं, बल्कि दौलत कमाने में भी पीछे नहीं है, यह जान कर अच्छा लगना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं है।
इसके साथ ही, क्या यह भी विचारणीय नहीं है कि जो है, उसकी रोशनी में जो नहीं है, उसका गम और गाढ़ा हो जाता है? बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जो नहीं है, उसकी मात्रा इतनी ज्यादा और इतनी दुखदायी है कि जो थोड़ा-बहुत मिल जाता है, उस पर हम झूमने लगते हैं। दुनिया के भ्रष्टतम देशों की सूची छपती है, तो उसमें भारत का स्थान काफी ऊपर होता है। मानव विकास की कसौटी पर सभी देशों के हालात की जांच की जाती है, तो यही भारत बहुत नीचे चला जाता है। शिक्षा में, साक्षरता में, स्वास्थ्य सुविधाओं में, पौष्टिकता में, बाल मृत्यु दर में, स्त्रियों की सामाजिक हैसियत में, स्त्री विरोधी आचरण में, मानव अधिकारों के सम्मान में -- कौन-सा क्षेत्र ऐसा है, जहां हम सिर ऊंचा कर खड़े हो सकते हैं? कुल मिला कर स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति को देखते हुए हमें कई बार भारतीय होने में शर्म आने लगती है।
यह सच है कि दक्षिण एशिया में भारत का कद उसके आकार और उसकी आबादी के अनुरूप ही ऊंचा है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक साथ ही आजाद हुए थे -- तब वे एक ही देश थे। इन तीनों टुकड़ों में भारत ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से स्थिर रहा है और जीवन के सभी क्षेत्रों में कुछ न कुछ प्रगति की है। लोकतंत्र भी यहां कमोबेश अक्षुण्ण रहा है। इस तरह भारत उपमहादेश में भारत हर तरह से अग्रणी है। दक्षिण एशिया के पूरे संदर्भ में हम दावा कर सकते हैं कि श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि की तुलना में हमारा रिकॉर्ड प्रशंसनीय रहा है।
लेकिन एशिया के स्तर पर ? इसी एशिया में चीन है, जापान है, कोरिया है तथा अन्य कई देश हैं जिन्होंने प्रगति की दिशा में शानदार रिकॉर्ड बनाए हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में श्रीलंका भी हमसे आगे है। सवाल यह है कि हम अपने विकास की तुलना सिर्फ दक्षिण एशिया के परिदृश्य से क्यों करें, वरन पूरे एशियाई संदर्भ में क्यों न करें ? और एशिया में क्या रखा है? जब तुलना ही करनी है, तो विश्व स्तर पर अपनी तुलना क्यों न करें? भारत के लोग अपने को इतना हीन क्यों मानें कि दुनिया के विकसिततम देशों से प्रतिद्वंद्विता करने की सोच ही न सकें?
शुरू में हमने जिन उदाहरणों का हवाला दिया है, उनसे पता चलता है कि व्यक्तिगत स्तर पर भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान और कला का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें कोई न कोई भारतीय सितारा न जगमगा रहा हो। लेकिन ये सभी क्षेत्र ऐसे हैं, जहां व्यक्तिगत प्रतिभा और साधना से खास-खास व्यक्तियों ने शिखर की ऊंचाई छू ली है। हुसैन और ए.आर. रहमान बनने में परिस्थितियों का योगदान अवश्य है, पर मुख्य योगदान इन कलाकारों का अपना ही है। ध्यान देने की बात यह भी है कि इन दोनों कलाकारों का बचपन अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में बीता था, लेकिन इन्होंने लगातार तपस्या कर अपने को बनाया और नाम हासिल किया। हम फेल वहां होते हैं, जहां सामाजिक नियोजन और सामूहिक कर्म की चुनौती आती है। तो क्या हमारी सामाजिक दृष्टि और सामाजिकता में कोई भारी कमी है जिसकी वजह से हम समूह के तौर पर उल्लेखनीय विकास नहीं कर पा रहे हैं? व्यक्ति के स्तर पर उत्कर्ष हासिल करना हमारे लिए आसान रहता है, पर राष्ट्र के स्तर पर विकास करने में हम अपने महादेश एशिया के ही अनेक देशों से पिछड़ जाते हैं। इस सवाल पर गहराई से विचार नहीं किया गया और हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो हमारे चमकते हुए सितारों की छवि भी धूमिल होने को बाध्य है।
इसके अलावा, सामूहिक विकास का संबंध व्यक्तिगत विकास से भी है। इतने बड़े फिल्म उद्योग में अभी तक सिर्फ चार ही ऑस्कर क्यों ? नोबेल पुरस्कारों की बारी आती है, तो हम मुंह देखने लगते हैं। इतने विशाल देश में कुछ ही चित्रकार, कुछ ही संगीतकार, कुछ ही खिलाड़ी, कुछ ही अभिनेता, कुछ ही विद्वान और कुछ ही वैज्ञानिक क्यों चर्चित हो कर रह जाते हैं? पश्चिमी जगत का कोई भी देश, रूस को छोड़ कर, आबादी में हमसे बड़ा नहीं है। किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति हमसे ज्यादा पुरानी नहीं है। अगर हम सामूहिक रूप से विकास करने में सफल होते हैं, तो इनसे सौ गुना ज्यादा कलाकार और ज्ञानी-विज्ञानी हम पैदा कर सकते हैं। जो है, उसकी मात्रा बताती है कि जो नहीं है, उसमें कितनी बड़ी संभावनाएं छिपी हुई हैं। इसलिए निवेदन यह है कि जो है, उस पर उत्सव मनाते समय उसे न भुलाया जाए जो नहीं है पर हो सकता है।

राजकिशोर

Friday, February 13, 2009

विदेशी फिल्म "स्लमडॉग..." पर काहे झूमे इंडिया??

एक साल पहले मैंने "तारे ज़मीन पर" देखी। सिनेमा हॉल में शायद ही कोई हो जो फिल्म देखकर रोया न हो। जिसने खड़े होकर आखिर में दिखाया जाने वाला गाना देखा हो, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों का मासूम बचपन खोता हुआ दिखाया जाता है। कोई ऐसा नहीं है जिसने "माँ" वाला गाना न सुना हो। शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें न भर आई हों। एक ऐसी कहानी जिसने सच्चाई से परिचय कराया। एक बच्चे की कहानी जो बीमार है। माँ-बाप की बढ़ती उम्मीदों के बीच अपने बचपन की मासूम शरारतों से दूर है। डिस्लेक्सिया बीमारी के शिकार बच्चे की कहानी। भारत के लगभग हर एक घर की कहानी। जहाँ बच्चे पर बोझ डाल दिया जाता है किताबों का, उम्मीदों का।

जब ये फिल्म आई तो लगा कि यही वो फिल्म है जिसका हमें इंतज़ार था। ये वो फिल्म है जो हमें ऑस्कर दिलवायेगी। क्या निर्देशन किया है आमिर ने? क्या एक्टिंग की छोटे-से बच्चे दर्शिल सफारी ने। इतनी बढ़िया अदाकारी कि आमिर खान आधी फिल्म होने के बाद कहानी में आते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा सिर्फ दर्शिल के बूते चलता है। शंकर-एहसान-लॉय का जबर्दस्त संगीत। प्रसून जोशी के गीत। शंकर की आवाज़, कहानी। सब कुछ बढ़िया।
फिर, खबर आई कि फिल्म ऑस्कर से बाहर हो गई.... पैरों तले ज़मीन खिसक गई। अगर ये फिल्म नहीं, तो और कैसी फिल्म बनायें कि ऑस्कर में जा सके। 'लगान' से किसी मामले में कम नहीं। "रंग दे बसंती" के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

अब "स्ल्मडॉग मिलेनियर" को १० श्रेणियों में नामांकित किया गया है। इससे ज्यादा सिर्फ एक और फिल्म को ही नामांकन मिले। पर इस फिल्म में ऐसा क्या जो "तारे ज़मीन पर' में नहीं। "स्लमडॉग.." की भारत में हर ओर आलोचना भी हो रही है। इस बात पर भी बहस हुई कि भारत को केवल झुग्गी बस्ती का देश दिखाने और भारतीयों को ठग और विदेशियों को उदार दिखाने के बाद क्या ये फिल्म भारत में रिलीज़ होनी चाहिये? किस बात में आमिर की फिल्म पीछे हो गई? कहानी, संगीत, गीत, निर्देशन, अदाकारी या कुछ और। किन मापदंडो पर ऐसा किया जाता है। पहले मैं समझता था कि हिन्दी फिल्मों में नाच-गाने अधिक होते हैं और कहानी न के बराबर-शायद इसलिये पीछे रह जाते हैं। पर "स्ल्मडॉग.." भी तो भारतीय पृष्टभूमि पर आधारित है। इसमें भी ढेरो गाने हैं। जो बात दोनों फिल्मों को अलग करती है वो है फिल्म में अधिकतर विदेशी टीम का होना। कहीं ऐसा तो नहीं कि "स्लमडॉग.." केवल इसलिये आगे निकल गई क्योंकि ये एक विदेशी ने बनाई है। इसमें उन्हें उदार दिखाया गया है। ये केवल मेरी सोच हो सकती है, लेकिन जो घटा है मैं उसको झुठला नहीं सकता। और कोई दूसरा कारण मुझे नजर नहीं आता। आप बता सकें तो मुझे खुशी होगी। हम खुश हो रहे हैं कि ये फिल्म ऑस्कर के लिये नामांकित हुई। हमें खुशी केवल तभी होनी चाहिये जब संगीतकार ए.आर.रहमान को अवार्ड मिले। क्योंकि सिर्फ तभी ये अवार्ड भारतीय कहलायेगा।

तपन शर्मा

Friday, February 06, 2009

जय हो, जय हो, जय हो!!!.....जय, जय, जय हो......



पटना में एक शख्स ने फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के खिलाफ याचिका दायर की है....नाम पर उन्हें आपत्ति तो है ही, इस फिल्म की साधारण विषयवस्तु को इतना आगे तक पहुंचने में भी उन्हें सोची-समझी चाल दिखती है.... बहरहाल,बैठक में एक चिट्टी आयी है शिवानी की....शिवानी त्रिपाठी महुआ न्यूज़ चैनल में कैमरे के आगे ड्यूटी बजाती हैं....चुपके-चुपके बैठक में आती रही हैं....चूंकि, शिवानी गोरखपुर की हैं तो कृपया इस चिट्ठी को पटना के शख्स की याचिका न समझें....

फिल्म बेहतरीन है.....निर्देशन गज़ब का है....केबीसी के हर सवाल का नायक के अतीत से जुड़ाव बेहतरीन था...पर सबसे बेहतर था मलिन बस्ती के उन बच्चों से इतना उम्दा अभिनय करवा लेना....
और कोयले को बाज़ार में हीरे के भाव बेच मुनाफ़ा कैसे कमाया जाता है, ये कोई इन निर्देशकों से सीखे जिन्होंने हमारा ही कचरा हमें खूबसूरती के साथ चांदी की तश्तरी में अति आत्मविश्वास के साथ परोस दिया....और हमने निवाला दर निवाला मुंह में डालना भी शुरु कर दिया....मगर, जो फिल्म वैश्विक स्तर पर डंका बजवा रही हो, फिल्म क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण और सम्मानित ऑस्कर की मजबूत दावेदार हो, भारत के सिनेमाघरों में पहले हफ़्ते में ही दर्शक नहीं जुटा पायी....

बहरहाल, सभी बातों पर गौर करने के बाद अगर कोई पूछे कि क्या स्लमडॉग को ऑस्कर में जाना चाहिए या ये अवार्ड मिलना चाहिए (जो लगभग तय ही है) तो होगा हां....क्योंकि ऑस्कर की दौड़ में पहुंचनेवाली हर भारतीय फिल्म का हाल कुछ ऐसा ही था....जी हां, चाहे बात 80 के दशक की मदर इंडिया की हो या लगान की, स्माइल पिंकी या स्लमडॉग.....इन सभी फिल्मों में एक चीज़ कॉंमन है....ग़रीबी, दरिद्रता, भूखी-नंगी जनता, क्योंकि इनमें ही दिखता है इन्हें “रियल इंडिया...."

माना कि फिल्म के दृश्यों में मुंबई की मलिन बस्तियों से काफी साम्य था, मुंबई की इन बस्तियों में रहने वालों की यही दशा होती है, मगर मुंबई ऐसी ही है ये भी नहीं कह सकते..... मुंबई सिर्फ गंदी ही नहीं है....यही मुंबई समंदर के खूबसूरत किनारों, ऊंची इमारतों, ग्लैमर की चकाचौंध और आधुनिकता के चरम के लिए भी अग्रणी मानी जाती है...तो इतने वृहद और संपन्न पक्ष की अनदेखी क्यों कर दी गयी...आखिर इस पक्ष को शून्य कर बाहर की दुनिया को इस फिल्म के माध्यम से क्या दिखाने और जताने की कोशिश की गयी....यही कि हम जो थे, वही हैं और वही रह गये....
ठीक है कि डायरेक्टर की प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि गंदगी बेचने का उसका तरीका लह गया....और अगर इस फिल्म को ऑस्कर मिलता है तो केवल इसलिए नहीं कि वाकई ये फिल्म बेहतरीन बनी और संगीत ज़बरदस्त रहा....कारण और भी हैं.....मसलन, ये एक हॉलीवुड के डायरेक्टर ने बनायी है और इसमें भारत की ग़रीबी का वीभत्स और लाचार रूप दिखाया गया है....आप भी जानते हैं कि भारत घूमने आने वाले पर्यटकों के कैमरे भी झोपड़ियों और भीख के कटोरे पर ही ज़्यादा फ्लैश चमकाते हैं....ठीक वैसे ही जैसे किसी वीआईपी भारतीय मेहमान जैसे बिल क्लिंटन, प्रिंस चार्ल्स, मिलिबैंड आदि को घूमने के लिए सूरत, अहमदाबाद, दिल्ली, कश्मीर की वादियां, गोवा की बेरोकटोक हवा या केरल-कन्याकुमारी की खूबसूरती और सागर की गहराई में खो जाने वाला सूरज नहीं मिलता....उन्हें तो बस दिखता है राजस्थान के किलों के साये में सूखा बंजर नज़ारा, उन्हें देखकर आंखें फाड़ सकने वाले ग्रामीण....यहां तक तो गनीमत थी.....पर इस बार तो हद हो गयी, जब ब्रिटेन के विदेश मंत्री के भारतीय गांवों को देखने की इच्छा पर अमेठी का सबसे ग़रीब, दरिद्र परिवार दिखाया गया....किसे दोष देंगे हम??

ख़ैर, इतना तो कहा जा सकता है कि बवाल इस फिल्म के नाम में स्लम के साथ डॉग पर नहीं बल्कि पूरे देश को स्लमडॉग साबित करने की उनकी चाही-अनचाही कोशिशों पर मचना चाहिए था....स्लमडॉगों का ऐसा देश जहां जन-गण-मन अधिनायक जय का गान होता है, वहां अब सबके होठों पर है “जय हो....” का स्वर...

शिवानी त्रिपाठी