Tuesday, March 10, 2009

खुशी चाहिए या प्रसन्नता....

इधर दो घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने हिन्दी-उर्दू के सवाल पर मुझे झकझोर दिया। "पंचायती राज अपडेट' में मेरी संपादकीय सहयोगी ने एक समाचार बनाते समय झंडारोहण शब्द का प्रयोग किया था। कॉपी हाथ में आते ही मैंने झंडारोहण को काट कर ध्वजारोहण लिख दिया और उसे समझाया कि सामान्यत: तद्भव और तत्सम शब्दों के बीच संधि नहीं होती। मैं उसका अफसर था, इसलिए या वह मुझे हिन्दी का जानकार समझती है, इसलिए उसने मेरे संशोधन को स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं मानता हूं कि भाषा में अफसरी नहीं चलती। यह दावा तो मेरी कल्पना में भी नहीं आता कि मैं हिन्दी का जानकार हूं। अत: मैं सोचने लगा कि झंडारोहण में बुराई क्या है। मेरी धारणा है कि हिन्दी तद्भव-प्रधान भाषा है। अगर कोई दूसरी भाषा उसके साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ती है, तो वह उर्दू है। उर्दू यानी उसके वे लफ्ज जो आम बोलचाल में आ गए हैं। उम्र हिन्दी में चलता है, पर आब नहीं। उर्दू शब्दों के भी तद्भव रूप होते हैं -- जिसे हम खामखा कहते हैं, वह उर्दू में ख्वाहमख्वाह है। लेकिन बहुत समय से हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने का एक अटूट सिलसिला चला आ रहा है, जिससे हिन्दी का नुकसान हुआ है। जो हिन्दी लोक भाषा थी, उसका एक हिस्सा विद्वानों का, विद्वानों के द्वारा और विद्वानों के लिए हो गया। इसका कुछ उपचार होना चाहिए।
दूसरी घटना का संबंध हाल ही में पढ़ी एक कहानी में प्रेमी-प्रेमिका संवाद से है। प्रेमिका कहती है, मैं हमेशा तुम्हें खुश रखने की कोशिश करूंगी। इस पर प्रेमी कुछ नाराज हो जाता है। वह कहता है, इस तरह की घटिया बात मेरे दिमाग में आ ही नहीं सकती। खुश रखना तो नौकरों या तवायफों का काम है। इस पर प्रेमिका हंसने लगती है; कहती है -- तुमने हिन्दी में पीएचडी कर ली है, पर रहे पंडित के पंडित। चलो, मैं तुम्हें हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास करूंगी। इस पर प्रेमी सोच में पड़ जाता है। क्या खुश और प्रसन्न तथा खुशी और प्रसन्नता एक ही चीज नहीं हैं? फिर खुशी कैसे तुच्छ भौतिकवादी चीज और प्रसन्नता कैसे ऊंची और उदात्त चीज हो गई? कुछ देर सोचने के बाद वह प्रेमिका से कहता है, लेकिन मैं तो तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहूंगा। लड़की हंस पड़ती है। बोलती है, यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।
हिन्दू-मुसलमान एकता की चर्चा हमारे देश में काफी समय से चली आ रही है, पर हिन्दी-उर्दू एकता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। हिन्दी में शुद्धतावाद का आग्रह अभी भी बरकरार है। जो शुद्धतावादी हैं, वे इनसान कभी नहीं लिखेंगे, हमेशा मनुष्य ही लिखेंगे। जो कुछ उदार हैं, वे कहेंगे कि इनसान भी कम हिन्दी नहीं है। मैं इससे एक कदम आगे जाना चाहता हूं और जिस आदमी की कोई इज्जत नहीं है, उसे इज्जतहीन या इज्जतविहीन लिखने की इजाजत चाहता हूं। जहां हिन्दी और उर्दू की संधि बहुत खराब लगेगी, ऐसे मामलों को अपवाद मान लेना चाहिए, जैसे आजादिओत्तर (तूफानोत्तर या बाढ़ोत्तर राहत का स्वागत है)। लेकिन उम्राधिक्य लिखने में क्या हर्ज है? अगर कोई यह कहता है कि मेरा दोस्त शरीफतम लोगों में एक है या यहां से नजदीकतम स्टेशन रिवाड़ी है, तो उसकी आलोचना क्यों की जाए?
कई मामलों में इससे लिखने में सुविधा भी हो सकती है। जैसे अंग्रेजी के मार्जिनलाइजेशन का कोई अच्छा पर्याय नहीं है। सीमांतीकरण जमता नहीं है। पर हाशियाईकरण लिखा जाए तो? सीमांत की जगह हाशिया ज्यादा लोकप्रिय है और इसकी ध्वनि अर्थ के करीब भी है। इसी तरह नई अर्थनीति लोगों को गरीब बना रही है, यह कहने के बजाय यदि यह कहा जाए कि वह लोगों का गरीबीकरण कर रही है, तो आपत्ति क्यों की जाए? गरीबीकरण से एक क्रमिक प्रक्रिया का बोध होता है, जो गरीब बनाने में गैरहाजिर है। कस्बाईकरण तो चल ही पड़ा है, शहरीकरण भी अब काफी लोकप्रिय है। जो हिन्दी में अप्सरा है, उसे उर्दू में परी कहते हैं। अगर किसी स्त्री का वर्णन करते हुए कहा जाए कि उसके परीतुल्य सौंदर्य से मुग्ध होने से कौन बचा है, तो क्या हिन्दी की तौहीन हो जाएगी? रेस को नस्ल कहा जाता है। नस्ल-भेद हिन्दी का एक पुराना शब्द है। यहां संधि नहीं, समास है, जिसके उदाहरणों की कमी नहीं है, जैसे शादी-ब्याह, सुबह-सवेरे, नशामुक्ति, चाय-पान, पर कोई नस्लीय लिखे, जिसमें उर्दू नस्ल के साथ हिन्दी ईय प्रत्यय का योग है, तो क्या यह गलत हिन्दी का नमूना होगा? अश्लीलता की तर्ज पर नस्लीयता और धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर नस्लनिरपेक्षता। तद्भव शब्द गुट के आधार पर निर्गुट बनाया जा सकता है, तो उर्दू शब्द अक्ल के आधार पर निरक्ल या अक्लविहीन में क्या बुराई है? अखबारी सच्चाई को हम जानते हैं, पर अखबारेतर सच्चाइयां भी होती हैं। दमकलवाले हमेशा अग्निग्रस्त भवन की तरफ क्यों दौड़ें? वे आगग्रस्त मकान की ओर भी जा सकते हैं। हम शराबेतर नशों का जिक्र कर सकते हैं और किसी को शराब प्रेमी या शराबग्रस्त भी कहा जा सकता है। बल्कि शराब प्रेमी एक अलग कैटिगोरी है, जिसके लिए कोई माकूल शब्द नहीं है।
इस तरह के प्रयोग शुरू में कुछ अटपटे लगेंगे, पर धीरे-धीरे वे हमारी जबान पर चढ़ जाएंगे। संस्कृतनिष्ठता के प्रति मोह या अंग्रेजी की नकल के कारण मेरे मुहल्ले का एक दुकानदार लिखता है --- यहां चाय उपलब्ध है, जबकि वह आसानी से लिख सकता था -- यहां चाय मिलती है। असल में, हम अपने सामूहिक अवचेतन में संस्कृत शब्दों को पवित्र मानते हैं (संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है) और तद्भव तथा उर्दू शब्दों को कुछ हीन दृष्टि से देखते हैं। संस्कृत अगर ब्रााहृण है, तो तद्भव ओबीसी या दलित और उर्दू म्लेच्छ। यह मद्यप और शराबी के अंतर से स्पष्ट है। वर्षा में लालित्य है, बारिश में कोई रोमांस नहीं है। रेणु के उपन्यास "परती परिकथा' में नायक जिस स्त्री को अपनी रक्षिता बताता है, उसके लिए देशी शब्द रखैल है। रक्षिता कहे जाने से वह स्त्री सहज ही सम्माननीय हो उठती है, जबकि रखैल शब्द दूर से ही बदबू देता है।
शब्दों के बीच इस जाति प्रथा को खत्म करना लोकतंत्र के हित में तो है ही, हिन्दी-उर्दू की दूरी को मिटाने में भी सहायक होगा। शायद इस मिश्रित भाषा को हिन्दुस्तानी कहा जाने लगे, जो गांधी जी की हिन्दुस्तानी का ही एक और रूप है। एक और फायदा यह है कि हिन्दी शब्दों की संख्या में डेढ़ गुनी या दुगुनी वृद्धि हो जाएगी। विकसित भाषा वही मानी जाती है, जिसमें एक चीज के कई नाम हों और एक जैसी अभिव्यक्ति के लिए कई-कई शब्द हों। यदि मेरा यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाता है, तो हमारे पास शिकायती और शिकायतगर के साथ-साथ शिकायतकर्ता भी होगा, जो पहले दोनों से बेहतर है।

राजकिशोर

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3 बैठकबाजों का कहना है :

Dr. Smt. ajit gupta का कहना है कि -

शाश्‍वत विषय है, इस बहस का कोई अन्‍त नहीं। लेकिन यह दुनिया ही मिश्रण से बनी है, पति और पत्‍नी का मिश्रण। दो विपरीत विचारों वाले मिलते हैं और एक नवीन दुनिया बनाते हैं। हम किस-किस के मिश्रण को रोकेंगे? यदि उर्दू वाले हिन्‍दी से परहेज करते हैं तो हम क्‍यों करें? इस दुनिया में जो भी बना है उसका उपयोग हम करेंगे। भाषा का तो प्रतिदिन नवीनीकरण होता है, शिक्षा के क्षेत्र में यह बहस समझ आती है लेकिन साहित्‍य के क्षेत्र में इस बहस का कोई औचित्‍य नहीं है। साहित्‍यकार उन्‍हीं शब्‍दों का प्रयोग करता है जो मिठास देते हैं या फिर शीघ्रता से समझ आते हैं।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

व्यर्थ विवाद न छेडिये, रचनात्मक हो काम.

भाषा-भूषा नित वरे, खुद अभिनव आयाम.

खुद अभिनव आयाम, न इनमें भेद कीजिये.

जैसी जहाँ जरूरत वैसा शब्द लीजिये.

कहे 'सलिल' बहसों से लाभ नहीं कुछ होता.

विषय-विधा जो भूले वह खा जाता गोता.

manu का कहना है कि -

हिंदी वाले-उर्दू वाले, नुक्ताचीं में रह गए,
पर ग़ज़ल वाला, ग़ज़ल में खो गया पीने के बाद

होली मुबारक,,,,,,,,,,,,

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