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Saturday, July 03, 2010

शन्नो अग्रवाल को गुस्सा क्यों आता है?

मेरे शांत चित्त में एक चिंगारी सी भड़क पड़ती है जिसके बारे में पीड़ित महसूस करते हुए भी..अधिकतर नारियाँ चुप रहती हैं..मैं भी चारों तरफ का माहौल देख-भाल के सहम जाती हूँ कि कौन लोगों के मुँह लगे...लेकिन कुछ बातें जो नश्तर की तरह चुभ जाती हैं अन्दर ही अन्दर..जो समस्त नारी जाति पर लागू होती हैं..और जिन बातों को अब भी लोग जबरदस्ती करने/ कहने पर तुले हुए हैं..तो मेरा शांत चित्त कुछ समय के लिये भड़क पड़ता है... जिसकी बात से मन में ज्वाला धधकी उसे लिखने वाला एक पुरुष ही है.. स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन.... इस पंक्ति को पढ़ते ही मन बहुत ख़राब सा हो गया...चिंगारी पैदा हुयी और आग बन गयी...कोई इंसान नारी को स्वाहा करने की बात करता है ताकि वह एक शक्ति बन सके...तो पढ़ते ही मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि लोग क्यों हर समय नारी को आगे कर देते हैं स्वाहा होने को..ये रटी-रटाई पंक्तियाँ बिना इनकी विस्तृत समालोचना किये ही लोग कह देते हैं..जैसे कि वह कोई घास-फूस या समिधा-सामग्री हो..जिसे स्वाहा किया जा सकता है.
लोग उसे भस्म करके उससे शक्ति की अपेक्षा रखते हैं..अरे वो तो वैसे भी इतना कुछ करती और सहती आई है युग-युग से कई रूपों में..बिना किसी के कहे ही वह अपने कर्तव्यों को निभाती रही है. और फिर एक तरफ तो उसे अबला कहा जाता है..तो दूसरी तरफ उसे भस्म करके शक्ति की आशा करते हैं..तो भई, उसे किस तरह भस्म होना चाहिये और किस तरह की शक्ति मिलेगी उसे भस्म करके ? अपने मन में तो वह समाज के लोगों की किसी ज्यादती या रीतियों-कुरीतियों का शिकार बन कर भस्म होती ही रहती है...उसके बाद भी लोग पता नहीं क्या चाहते हैं..कभी तो उसे दुर्गा कहते हैं तो यह नहीं सोचते की उसमे वो दैविक शक्ति नहीं है जिससे सीता जी जल गयीं थी..और कभी जब औरत के बलिदानों की बात चलती है की '' आज की औरत सतयुग की सीता से भी अधिक अग्नि परीक्षाएं देती है '' तो तमाम गहन धार्मिक प्रवृति के लोग इसे सीता जी का अपमान समझते हैं..और भड़क पड़ते हैं कहते हुये कि सीता जी से आज की औरत की कोई समानता नहीं...और तरह-तरह के उदाहरण देते हुये पूरी रामायण ही उठा लाते हैं बहस करने के लिये..अगर ऐसा है तो फिर आज के पढ़े लिखे लोग ये क्यों कहते हैं बिना सोचे समझे कि '' स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन ''.
यह पढ़कर व सोचकर मेरे मन को लगा कि नारी को लोग कोसने से बाज नहीं आते..समय बदला है, और वह पढ़ी-लिखी व समझदार है फिर भी समय-समय पर उसकी अवहेलना की जाती है और जरा-जरा सी बातों में मखौल उड़ाया जाता है उसका..और अपने को बहादुर कहने वाली औरतें भी सहमी रहती हैं पुरुषों के मगरूर व्यवहार पर अपनी गलती न होने पर भी...औरत डर से व पुरुष अपने बचाव में कहते रहते हैं कि अब समय बदल गया है..अब वह हालत नहीं रही औरत की..वह मजबूत है समझदार है..आदि-आदि.. लेकिन यह बातें कितनी लागू होती हैं...और तुर्रा यह कि औरत को भस्म करके उससे शक्ति हासिल करने की भी बात की जाती है...अरे, उसे भी तो पुरुष की इन्ही खूबियों की जरूरत हो सकती है जीवन में कभी...तो कितने पुरुष हैं जो उसकी शक्ति बनते हैं..अधिकतर को तो जलन होने लगती है..और औरत की उपेक्षा करके उसे सताने लगते हैं..औरत कोई घास-फूस या लकड़ी तो है नहीं जो उसे आज्ञा दी जा रही है कि '' स्वाहा हो जा '' और फिर ऐसा होने पर तो वह राख बन जायेगी और किसी काम की ना रहेगी..तो उसे अपनी स्वाभाविक मौत ही क्यों नहीं मरने दिया जाता..क्यों उसके लिये जीते-जी चिता सुलगा कर झोंकने का प्रयास करते हैं लोग ऐसी बातें करके...औरत की इज्ज़त की बात करने वाले समाज के ठेकेदार खुद बुरी नज़र रखते हैं उसपर..और अपनापन दिखाने वाले लोग उसपर मुसीबत आने पर निगाहें बचाकर बगलें झाँकने लगते हैं...ऊपर से जुर्रत यह कि उसे जीते जी भस्म भी करना चाहते हैं..क्यों...आखिर क्या बिगाड़ा है उसने किसी का..क्या उसे दर्द नहीं होगा...क्या उसे अपने तरीके से जीने का अधिकार नहीं है..??????
वास्तव में लोगों की इस तरह की बातें पढ़कर या विचार जानकर मेरे मन को बहुत पीड़ा होती है और लगता है कि नारी को समाज में बस दिखावे के लिये ही ऊँचा दर्ज़ा दिया जाता है लेकिन '' भस्म '' , '' स्वाहा '' या अन्य तमाम शब्दों का इस्तेमाल करके उसे कोसा जाता है...कोई मुझे बताये कि यह शब्द कह कर लोग कोस नहीं रहे है तो क्या कर रहे हैं..? अगर वह भस्म हो गयी तो कहाँ से ताकत देगी ? ये शब्द मुझे नारियों के लिये एक गाली से लगते हैं....

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं और हिंदयुग्म पर इनकी आवाजाही बहुत पुरानी है। बैठक पर आप इन्हें पहले भी पढ़ चुके हैं...)

Friday, April 09, 2010

महिला आरक्षण बिल – एक लंबे सफर की शुरूआत (3)

0प्रेमचंद सहजवाला


॰॰॰दूसरे भाग से आगे

राज्यसभा में केवल ‘समाजवादी पार्टी’ (सपा) व ‘राष्ट्रीय जनता दल’ (आर.जे.डी) के कुछ सदस्यों की शर्मनाक व गैर-संसदीय गतिविधियों यथा राज्यसभा अध्यक्ष व देश के उप-राष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी की सीट तक लपकने तथा उन से बिल छीन कर फाड़ देने के कारण यह बिल ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर पारित न हो सका. यदि उस दिन हो जाता तो यह ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर देश की महिलाओं के लिए एक उपहार होता. उप-राष्ट्रपति के पास बार बार सदन को स्थगित करने के अतिरिक्त कोई विकल्प था ही नहीं. यह बिल जो कि देश के चौथे प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का स्वप्न था, संसद में सन् 1996 में ही जा कर प्रस्तुत किया जा सका, जब एच.डी. देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे. उस समय भी यह विषय क्यों कि जीवंत था, जनता खुशखबरी सुनने के लिए दूरदर्शन से चिपकी रही, लेकिन सपा नेता मुलायम सिंह यादव व कुछ अन्य नेताओं के आकस्मिक हस्तक्षेप के कारण सपना चूर सा हो गया था. ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ यानी OBC पल्टन को ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ चाहिए था तथा बिल को रोकना पड़ा और यह बिल उस के बाद 14-15 वर्ष तक दिन का प्रकाश नहीं देख सका. सन् ’96 के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली ‘राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबन्ध’ (NDA) सरकार द्वारा कुल पांच बार - सन् 98, 99,2002 व 2003 (दो बार) में - प्रस्तुत किया गया पर बार बार इसे पटरी से उतारा गया और तब तक यह एक टेढ़ी खीर सा लगने लगा. डॉ. मनमोहन सिंह की ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन’ (UPA) सरकार सन् 2004 में सत्ता में आई तो उस ने इसे ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ (Common Minimum Programme) का हिस्सा बनाया और सन् 2008 में संसद में प्रस्तुत किया. OBC नेताओं ने हमेशा आरक्षण को ले कर अधिकाधिक टुच्चे किस्म के राजनीतिक खेल खेले. पहले सन् ’90 में विश्वनाथ प्रताप सिंह व चौधरी देवीलाल ने एक दूसरे को धूल चटवानी चाही. उप-प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल ने दिल्ली के ‘बोट क्लब’ की अपनी आगामी जन्म-दिवस रैली में ‘मंडल आयोग’ की सफरिशें लागू करने की मांग रख कर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को सांसत में डाल देने की योजना बनाई. पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी चित्त कर देने का कच्ची गोलियाँ नहीं खाई थी. इस से पहले कि चौधरी देवीलाल का जन्मदिन आए, उस ने ‘मंडल आरक्षण’ की सफरिशें लागू करने का निर्णय ले कर देवीलाल को चारों खाने चित्त सा कर दिया. न अन्य राजनीतिक दलों से सलाह-मशविरा और न कोई ज़रूरी बहस! . देश अचानक हक्का-बक्का सा हो कर नौजवानों के आत्म-दाह व विश्वनाथ प्रताप सिंह के पुतले जलाए जाने की खबरें सुनने लगा. एक नवयुवक राजीव गोस्वामी, (जो अब मर चुके हैं) जो आत्म-दाह के बाद बुरी तरह जली हुई स्थिति में सफ़दरजंग हस्पताल में दाखिल थे, को देखने जब मदनलाल खुराना व लालकृष्ण अडवानी गए तो ज्यों ही वे हस्पताल से बाहर आए, कई बौखलाए हुए नौजवान उन दोनों पर झपटे और दौड़ कर मदनलाल खुराना की तो कमीज़ ही फाड़ दी. अडवानी चुस्ती से खिसक कर कार में घुस गए. देश के कई पिछड़े वर्गों को आरक्षण का इंतज़ार था पर यहाँ बेहद घटिया स्तर की राजनीति शुरू हो चुकी थी. आखिर सरकारी नौकरियों में ‘मंडल आरक्षण’ नरसिम्हा राव के कार्यकाल (’91 -’96) में एक अदालती फैसले के बाद ही लागू हो सके. परन्तु उस के बाद भी लालू प्रसाद जैसे निकृष्ट नेताओं का टुच्चापन चलता रहां जो या तो Creamy Layer’ पर या अन्य मसलों पर चद्दर को अपनी ओर खींचते रहे. परन्तु आश्चर्य कि जब लालू प्रसाद सन् 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह की UPA सरकार में रेलमंत्री बने व उन के ही OBC समर्थक राजनीतिक शत्रु नितीश कुमार ने सन् 2005 में बिहार के मुख्यामंत्री पद की शपथ ली तब उन्होंने OBC के सवाल पर केवल हल्की मौखिक बयानबाजी करते रहना काफी समझा. लालू प्रसाद को तो देसी घी की स्वादिष्ट कचौड़ियाँ तभी से पसंद थी जब वे बिहार के मुख्यमंत्री थे सो अब केंद्रीय सत्ता की उस से भी बड़ी व स्वादिष्ट कचौड़ी मुंह में रखे रहना उन्हें अच्छा लगता होगा. नतीजतन सन् 2006 में जब संसद ने OBC को शिक्षा संस्थानों में भी आरक्षण देने का विधेयक पारित किया, तब इन दोनों नेताओं ने अधिक कुछ कहा ही नहीं, जबकि उच्च-जातियों के विद्यार्थी विरोध के गुस्से में देश को सिर पर उठाए थे. मीडिया उन्हें पूरी ‘कवरेज’ दे रहा था पर OBC की तरफ से कोई आवाज़ थी ही नहीं. इन प्रदर्शनों के लिए भा.जा.पा व कांग्रेस पर अंगुलियां उठ रही थी कि OBC को खुश करने के बाद वे अपनी गिरगिटिया शैली में उच्च-जातीय वोट बचाने के लिए इन प्रदर्शनों को भीतर ही भीतर से हवा दे रहे हैं. ‘महिला आरक्षण बिल’ पर भी लालू व मुलायम जैसे नेताओं की नज़र बिहार व उत्तर प्रदेश में क्रमशः 2010 व 2012 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर रही. सौभाग्य से तीन पार्टियां जिन का हमेशा आपस में झगड़ते रहने का ही रिकॉर्ड रहा, यानी भा.ज.पा कांग्रेस व वाम-मोर्चा, एकजुट हो कर ‘महिला आरक्षण बिल’ के समर्थन में आ खड़ी हुई थी**. दूरदर्शन चैनलों पर तीन महिलाओं - सोनिया गाँधी, सुषमा स्वराज व बृंदा करात को बार बार देखा गया जो इस बिल को पारित कराने के लिए अधिकाधिक उत्तेजित लग रही थी. इन के साथ जयंती नटराजन व नजमा हेप्तुल्ला जैसी उत्साही महिलाएं भी थी. मीडिया ने खुश हो कर सोनिया-सुषमा- बृंदा की तिकड़ी में से सोनिया को ‘बिल की ड्राईवर’ की उपाधि दे दी.
* *
बिल के विरोध में पार्टी-निरपेक्ष हो कर कई मुस्लिम नेता भी आ खड़े हुए हैं जिन्हें लगता है कि उनका प्रतिनिधित्व संसद व विधान सभाओं में पहले से ही कम है और इसी सबब मुस्लिम महिलाओं के लिए भी इस बिल में एक ‘सब-कोटा’ (sub-quota) होना चाहिए. पर उसी सांस में उन्हें अपनी सीमाएं भी निरंतर कचोटती हैं. उदाहरणार्थ ‘मुस्लिम लीग’ नेता बशीर अली का फरमान है कि ‘मुस्लिम महिलाओं की निम्न साक्षरता को देखते हुए हमें लगता है कि बहुत अधिक मुस्लिम महिलाऐं आगे नहीं आएंगी और इसीलिये उन्हें सांसद बनने के मौके नहीं हो पाएंगे’. ‘मजलिसे इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन’ के कर्ता-धर्ता असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा के अपने भाषण में फरमाया – ‘जबकि 1952 से 2009 तक 7,906 प्रत्याशी 15 लोकसभाओं में चुने गए, केवल 14 ही मुस्लिम महिलाऐं जीतने का जुगाड़ कर पाई. यदि बिल कम प्रतिनिधित वर्गों के लिए एक निश्चित कदम है तो मुझे लगता है कि पहला अधिकार मुस्लिम महिलाओं को जाना चाहिए’. और यह लेख लिखते लिखते अचानक दूरदर्शन पर एक शिया संप्रदाय के धर्मनेता कल्बे जव्वाद बड़े हास्यास्पद तरीके से यह कहते हुए सामने आते हैं कि ‘महिलाओं का काम केवल बच्चे पैदा करना है, राजनीति में उनका कोई काम नहीं है’! दूरदर्शन चैनल इस के बाद ‘Muslim Women’s Personal Law Board’ की अध्यक्षा शायस्ता अम्बर को दिखाता है जो उक्त धर्मनेता को इस बयान के लियी आड़े हाथों लेती हैं! समाचार पत्र ‘All India Shia Personal Law Board’ अध्यक्ष मौलाना मिर्ज़ा मुहम्मद अथर द्वारा ऐसे धार्मिक किस्म के ‘महिला-विरोधी दृष्टिकोण’ की निंदा की रिपोर्ट देते हैं. शायद मुस्लिम नेताओं को अभी निर्णय लेना है कि उन्हें आखिर चाहिए क्या!
दरअसल हिंदू सामाजिक विसंगतियों, जिन का ज़िक्र पहले ‘Hindu Code Bill ’ व Age of Consent Bill के सन्दर्भ में किया जा चुका है, की तरह मुस्लिम समाज में भी कई विसंगतियाँ हैं. यदि मुसलमानों को अपनी महिलाओं की दुर्गति पर दर्द महसूस होता है तो इस के ज़िम्मेदार वे स्वयं ही हैं. ब्रिटिश काल के दौरान महात्मा गाँधी ने असेम्बली के एक जाने-माने विधायक राय साहब हरबिलास शारदा को सुझाव दिया था कि वे असेम्बली में लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 15 वर्ष व लड़कों की 18 वर्ष तय करने का एक विधेयक प्रस्तुत करें. विधेयक प्रस्तुत होने के लिए तैयार पड़ा था लेकिन ‘मुस्लिम लीग’ नेता मौलाना मुहम्मद अली के आक्रोशपूर्ण हस्तक्षेप से यह ‘शारदा अधिनियम’ केवल हिंदुओं तक ही सीमित रह पाया. मौलाना मुहम्मद अली इंग्लैण्ड गए हुए थे और वे जब लौटे तो उन्हें ‘शारदा बिल’ के बारे में बताया गया था. मुहम्मद अली का आक्रोश अचानक चेतावनी के स्तर तक पहुँच गया और राजमोहन गाँधी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Understanding The Muslim Mind’ के ‘मुहम्मद अली’ पर ही लिखे अध्याय के अनुसार ‘अपनी नींद व भोजन दोनों को कुर्बान कर के मुहम्मद अली ने 24 घंटे जाग कर इस बिल के विरुद्ध वाईसरॉय को देने हेतु 25 पृष्ठ का एक ज्ञापन तैयार किया’ (p 116). यह सब इस तथ्य के बावजूद कि मुहम्मद अली भलीभाँति जानते थे कि संबंधित विधेयक किसी भी प्रकार से ‘शरीयत’ के आक्रोश को आमंत्रित नहीं करेगा क्यों कि ‘शरीयत’ छोटी या बड़ी उम्र के विवाहों को व्यक्तिगत चयन के मामला मानती है (वही पृष्ठ). उसी पृष्ठ पर राजमोहन गाँधी आगे लिखते हैं कि बाल-विवाह व उन का खतरनाक तरीके से समय-पूर्व शारीरिक संभोग में बदल जाना अभी तक ग्रामीण क्षेत्रों के मुसलमानों व कस्बाई क्षेत्रों के निम्न वर्गों में लगभग पूर्णतः प्रचलित था और है. मौलाना मुहम्मद अली इस मामले में अंततः सफल हुए कि यह बिल मुसलमान समुदाय पर कतई थोपा न जाए. जब राय साहेब ने बिल प्रस्तुत किया तो ब्रिटिश सरकार ने पहले इसे सर मोरोपंत विश्वनाथ जोशी के नेतृत्व वाली एक दस- सदस्यीय समिति को सौंप दिया. कई महिला संस्थाओं ने इस ‘जोशी समिति’ के सामने जा कर पक्षधरता जताई जिन में कई मुस्लिम महिलाएं भी थी, हालांकि उन सब को पता था कि मुस्लिम उलेमा लोग कभी भी अभागी मुस्लिम बालिका को कोई राहत देने वाले नहीं होंगे. यह तो केवल एक उदाहरण है. ‘शरीयत’ की पगबाधा ने ही मुस्लिम महिलाओं की प्रगति में असंख्य रोड़े अटकाए हैं. क्या हम उस गरीब औरत शाह बानो की व्यथा-कथा भूल सकते हैं जिस के ‘मासिक खर्चे’ के मुक़दमे को मुस्लिम पुरुष समाज ने सहसा ‘शरीयत बचाओ’ के रुदन से ज़ख़्मी कर दिया था? एक मुकदमे के ज़रिये शाह बानो ब-मुश्किल अपने पति से, जिस ने उसे परित्यक्त कर के दूसरा विवाह कर लिया था, मात्र 179.20 रूपए मासिक व्यय बटोर पाई थी. परन्तु मुस्लिम कट्टरपंथियों को लगा कि इस अदालती निर्णय का मतलब था उनकी पवित्र पुस्तक कुरआन से छेड़खानी और उन्होंने इस फैसले के विरुद्ध छाती पीटनी शुरू कर दी. कई महारैलियां कर डाली. वातावण को चीर डालने वाले नारे गूँज उठे – ‘शरीयत बचाओ’ ... ‘शरीयत बचाओ’... सांसदों ने संसद सिर पर उठा ली. शहाबुद्दीन जैसे नीच-स्तर नेताओं ने सरकार की नींद हराम कर दी. नतीजतन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी एक जाल में फंस गए. उन्होंने मुस्लिम वोटों को मद्दे- नज़र रखते हुए संविधान को ही आहत कर दिया. उन्होंने संसद में पीछे की तारिख लगा कर संविधान को संशोधन करने का बिल पारित करवा दिया और 75 वर्ष की एक बूढ़ी औरत से 179.20 रूपए प्रतिमाह का तुच्छ मासिक खर्चा छीन लिया. ‘महिला आरक्षण बिल’ के सन्दर्भ में प्रमुख इस्लामी संस्था ‘नद्वा तुल उलेमा’ के मुखिया मौला सईद्दुर रहमान को क्या कहना है, वह पढ़ें - ‘सभ्य महिलाओं के लिए राजनीति एक असंभव सा पेशा है... इस्लाम महिलाओं को पर्दे की अवमानना व जनता के बीच खड़ी हो कर भाषण करने और अपने अधिकार मांगने की इजाज़त नहीं देता. उन के पास अनुसरण के लिए स्पष्ट मार्ग-दर्शन हैं: घर के भीतर हिजाब से रहो और घरेलू ज़िम्मेदारियां संभालो’ (Times of India 12 मार्च 2010 p 14). देवबंद के ‘दारुल-उलूम’, जो कि मुस्लिम संप्रदाय की नाड़ियों के केंद्र में है, ने सन् 2005 में एक फ़तवा दिया था कि ‘महिलाओं का चुनाव लड़ना एक गैर-इस्लामी व्यवहार है’. पिछड़े हुए हिंदू समाज की तरह मुस्लिम महिला के दुःख-दर्द की भी एक लंबी दास्तान है. मैंने एक मुस्लिम महिला की राम्-कहानी को बेहद संतप्त हो कर पढ़ा था जो पति से झगड़े के बाद मायके चली गयी थी. उस के पति ने उस की अनुपस्थिति में ही केवल तीन बार ‘तलाक तलाक तलाक’ का उच्चारण कर के अपने दोस्तों व संबंधियों के सामने उसे तलाक दे डाला. महिला कुछ दिन बाद मायके से लौट भी आई और पति ने उस के साथ रहना भी जारी रखा! लेकिन कुछ ही दिन बाद जब एक संबंधी उन के घर आया तो पत्नी को वहां देख बौखला उठा और तलाक के बावजूद उस के वहां होने पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया. महिला को तलाक की जानकारी थी ही नहीं. आगंतुक ने पत्नी को झाड़ते हुए बताया कि तुम्हें तो कब का तलाक दिया जा चुका है! तुमने इस घर में कदम भी कैसे रखा? इस के बाद जो विद्रूपता भरी बात हुई वह यह कि पत्नी वहां से निकल कर सीधी पुलिस-थाणे गई और वहां पति के खिलाफ उस ने FIR लिखवाया बलात्कार का! उस के पास ‘अनुपस्थिति में ही तलाक’ दिए जाने के मूर्खतापूर्ण क़ानून पर कोई प्रश्न-चिह्न लगाने का विकल्प जो नहीं था!
...
** दुर्भाग्य कि इस लेख की यह किस्त लिखते लिखते वह स्थिति भी बदल चुकी है. भा.ज.पा, ममता बैनर्जी व वाम-मोर्चा आदि, अपने अपने स्वर बदल चुके हैं.

(क्रमशः...............................)

Sunday, March 21, 2010

महिला आरक्षण बिल – एक लंबे सफर की शुरूआत (2)

0प्रेमचंद सहजवाला


॰॰॰प्रथम भाग से आगे

शास्त्रों को एक तरफ कर दें, तो भी इस पुरुष-प्रधान समाज में नारी-वेदना का एक लंबा इतिहास रहा है। केवल उदहारण के तौर पर सही, कोई सन् 1891 में ब्रिटिश द्वारा पारित ‘Age of Consent Bill’ को ही एक नज़र देख ले. यह बिल मुख्यतः पूना व बंगाल के समाज सुधारकों द्वारा दो दशक से भी अधिक तक चलाए गए अथक अभियान के बाद पारित हुआ. तत्कालीन ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ (1860) के अनुसार किसी भी विवाहित लड़की का पति तब तक उस का शारीरिक संभोग नहीं कर सकता, जब तक कि वह 10 वर्ष की आयु की न हो जाए. सुधारकों ने इस बात के कड़े प्रयत्न शुरू कर दिये कि यह आयु कुछ वर्ष बढ़ाई जाए. बंबई में एक दस वर्ष व कुछ महीनों की लड़की के पति ने उस का संभोग किया तो वह इस प्रक्रिया को न सहन कर के मर गई. पुलिस ने उस के पति को गिरफ्तार कर के बलात्कार व हत्या का मुकदमा चलाया. लेकिन अदालत ने उसे इसीलिये बरी कर दिया कि कानूनन, वह लड़की क्योंकि दस वर्ष से बड़ी थी, इसलिए यह मृत्यु मात्र एक दुर्भाग्य है और पति किसी प्रकार के दंड का भोगी नहीं हो सकता. अंततः सुधारकों के गहरे प्रयासों के बाद ब्रिटिश ने विधेयक पारित कर के यह आयु दस से बढ़ा कर बारह कर दी. दुर्भाग्य कि देश के शास्त्रांध लोगों के गले यह विधेयक उतर नहीं पा रहा था. उन सब को पृथ्वी बुरी तरह कांपती महसूस हुई और लगा जैसे देवता सहसा खून के आंसू बहाने लगे हैं. नतीजतन इस विधेयक के विरुद्ध रैलियों का एक तांता लग गया. इस विधेयक के कड़े से कड़े विरोधियों में सब से अग्रणी थे लोकमान्य तिलक, जिन्होंने विधेयक की तथा उन तमाम लोगों की कड़ी भर्त्सना की जो कह रहे थे कि विधेयक किसी भी प्रकार से शास्त्रों की आत्मा को ठेस नहीं पहुंचाता. तिलक- अनुयायियों के कोप का भाजन बने प्रसिद्ध सुधारक गोपाल गणेश अगरकर, जिन का एक पुतला बना कर पुतले के एक हाथ में उबला हुआ अंडा और दूसरे में व्हिस्की की बोतल पकड़ा दी गई, ताकि वे ब्रिटिश की पश्चिमी संस्कृति के पिट्ठू से नज़र आएं ! पुतले को पूरे शहर में घुमाया गया और उस का अन्तिम संस्कार कर दिया गया। सुधारकों को तिलक यह कह कर लताड़ने लगे कि ‘अगर आप शास्त्रों के बारे में पता ही नहीं तो बेहतर कि आप सब अपनी ज़बान न खोलें’. कलकत्ता में दो लाख लोगों की एक महारैली होनी लगी और खूब त्राहि त्राहि मच गई. सुधारकों पर ढेरों ज़हर उगलने के बाद अनेक तो ऐसे भी थे जो एक शिष्ट-मंडल लंदन भेजना चाहते थे कि वहां जा कर महारानी विक्टोरिया के आगे साष्टांग प्रणाम किया जाए और उन्हें नमन कर के प्रार्थना की जाए कि कृपया हमारी ‘हिंदू सभ्यता’ को बचा लें! तिलक एक महान देशभक्त थे, लेकिन एक बार जब पूना में महिला-शिक्षा के विषय पर वाद-विवाद के उद्देश्य से एक जनसभा का आयोजन किया गया, तब तिलक समर्थक हर उस वक्ता की हूटिंग करने लगे, जो महिला-शिक्षा के पक्ष में बोल रहा था. यहाँ तक कि जब सभा में उपस्थित दो महिला विचारक भी बारी बारी बोलने आई तो सुधार-विरोधियों ने उन की भी हूटिंग कर दी. तिलक ने इसीलिये महिला-शिक्षा समर्थकों का इतना कोप अर्जित कर लिया कि वे जब स्वयं बोलने आए तो मंच पर टमाटरों, चप्पलों और अण्डों की धुआंधार वर्षा होने लगी. एक पोलिस- इंस्पेक्टर को मंच पर फुर्ती से छलांग लगानी पडी और तिलक को बांहों के घेरे में में घेर कर किसी प्रकार मंच से कहीं सुरक्षित जगह ले जाना पड़ा.

लेकिन भारतीय लोकतंत्र ने 28 दिसंबर 1885, से ले कर 9 मार्च 2010 तक, एक बेहद लंबा सफर तय किया है. यानी जब बंबई में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ का जन्म हुआ, तब से उस दिन तक जब देश के वरिष्ठ लोगों के सदन राज्यसभा ने देश की अधिकाधिक महिलाओं को क़ानून निर्माता (सांसद) बनने के लिए सशक्तीकृत कर देने में पहला कदम उठाया. कम से कम भारत की शहरी महिला का चेहरा कोई कम कान्तिमय नहीं है और वह गौरवशाली तरीके से अपनी तमाम उपलब्धियों के होते पुरुष की प्रशंसा का पूरा अधिकार रखती है. ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की प्रथम महिला अध्यक्ष ऐनी बेसेंट से ले कर भारतीय मूल की अंतरिक्ष-वैज्ञानिक सुनीता विलियम्स, जिस ने अधिक से अधिक समय तक अंतरिक्ष में रहने का गौरवशाली विश्व-कीर्तिमान स्थापित किया, यहाँ तक कि अंतरिक्ष में ‘मैरेथन’ दौड़ दौड़ने वाली विश्व की पहली महिला बनी, तक नारी के चेहरे की चमक के अंतहीन आयाम हैं, जिस में आज इस देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति व लोकसभा की प्रथम महिला अध्यक्षा भी शामिल हैं. ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की पहली भारतीय अध्यक्षा सरोजिनी नायडू जो कि आज़ादी के बाद भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल भी थी, भारत के किसी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपालानी, ‘संयुक्त-राष्ट्र महासभा’ की भारत व विश्व में पहली महिला अध्यक्षा विजयलक्ष्मी पंडित, भारत की पहली व एकमात्र महिला प्रधानमंत्री तथा पहली महिला भारत-रत्न इंदिरा गाँधी, ‘रमन मैग्सेसे पुरस्कार’ प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला तथा नोबेल-पुरस्कार प्राप्त एकमात्र भारतीय महिला मदर टेरेसा... इन सब को कोई हल्के तौर पर नहीं ले सकता... पहली ‘भारतीय पोलिस सेवा’ (IPS) अधिकारी किरण बेदी, गौरवशाली बचेन्द्री पाल जो हिमालय के सब से ऊंचे शिखर माऊँट एवरेस्ट पर पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला थी तथा उतनी ही गौरवशाली संतोष यादव जिस ने वही करिश्मा जीवन में दो बार कर दिखाया... ये सब भी तो विश्व फलक पर भारत का नाम ऊंचा करने में शामिल रही! और पी.टी उषा (ओलंपिक फाईनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला जो केवल 0.01 सेकण्ड से पदक प्राप्त करते करते रह गयी), गीता जुत्शी, अंजू बौबी जार्ज, अपर्णा पोपट, अंजलि भागवत, करनम मालेश्वरी, सानिया मिर्ज़ा व सायना नेहवाल...और गिनती के लिए अनेकों और! ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ से केवल कुछ दिन बाद NDTV चैनल पर भारीय महिलाओं की उपलब्धियों का विश्लेषण करते हुए विनोद दुआ कह रहे थे कि ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर ‘एयर इंडिया’ ने देश की महिलाओं के खाते में एक और सितारा जोड़ दिया, अपनी ‘सर्व-महिला उड़ान’, द्वारा जो मुंबई से शुरू हो कर 11 देशों से उड़ान भर्ती हुई न्यू यार्क पहुँची! (हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के अनुसार जिस उड़ान में शराब का सेवन होता हो उस में कम से कम दो पुरुष अवश्य होने चाहियें. ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ ने 9 मार्च को पृष्ठ 15 पर पहले ही यह खबर दे दी थी कि –‘ केवल उन दो पुरुषों के अतिरिक्त 15 घंटे की लगातार उड़ान ने ‘सर्व-महिला क्रू’ के तौर पर कीर्तिमान स्थापित कर दिया होता’).

हमें इस बात का अक्सर खेद अवश्य रहता है कि यही बात समस्त भारतीय भूखंड पर लागू नहीं होती. केवल कुछ ही दिन पहले एक दूरदर्शन चैनल पर एक बदकिस्मत महिला को दिखाया जा रहा था जिसे पंचायत ने सिर्फ इसलिए गांव की बिरादरी से बाहर कर दिया क्योंकि किसी बाहर से आए एक पुरुष अधिकारी ने उसे असावधानी से छू लिया! इस अभागी महिला के पति ने पत्नी को खोया हुआ दर्जा दिलाने के लिए इन्साफ के ठेकेदारों पर खूब मोटी चढ़ावे के तौर पर चढ़ाई! इन सर्वाधिक पिछड़ी हुई महिलाओं से ले कर सुष्मिता सेन व लारा दत्ता जिन्हें ‘ब्रह्माण्ड सुन्दरी’ जैसे गौरवशाली खिताबों से नवाज़ा गया तथा रीता फेरिया ऐश्वर्य राय डायना हेडन युक्ता मुखी व प्रियंका चोपड़ा जिन्हें ‘विश्व सुन्दरी’ खिताब के ताज पहनाए गए तक भारतीय नारी की एक अंतहीन विविधता है, जो बहुत प्रसन्नता-पूर्ण परिदृश्य प्रस्तुत नहीं करती. पृथ्वी के सब से बड़े लोकतंत्र जिस के साथ परमाणु शक्ति होने की पहचान संलग्न है, तथा जो विश्व-मार्केट का सर्वाधिक स्पर्धा-शील देश कहलाता है, व पास में रोबदार भारत-अमरीका परमाणु समझौता रखे है, को अभी अपनी नारी को Justice (न्याय) Liberty(स्वतंत्रता) व Equality(समानता) जो कि भारतीय संविधान की आत्मा हैं, दिलाने तक एक लंबा सफर तय करना है...

(क्रमशः)
(अगले अंक में: पिछले 14-15 वर्षों में किन कारणों से भटकता रहा ‘महिला आरक्षण बिल’– लालू-मुलायम की टुच्ची राजनीति और क्या अपनी महिलाओं के सन्दर्भ में मुस्लिम समाज की स्थिति हिंदू समाज से बेहतर है?)

Monday, March 15, 2010

महिला आरक्षण बिल - एक लंबे सफर की शुरूआत

0 प्रेमचंद सहजवाला

मंगलवार 9 मार्च 2010, ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ से एक दिन बाद का दिन भारतीय समाज के लिए एक ऐतिहासिक दिन है, जब विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के उच्च-सदन ने बाबा साहब के संविधान में रेखांकित ‘समानता’ शब्द की प्रगति के लिए एक बड़ी छलांग लगाई है. राज्य सभा ने संविधान का 108 वां संशोधन बिल पारित कर दिया है, जिसके अनुसार देश की लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी गई. यह एक लंबे सफर के लिए उठाया गया मात्र पहला कदम होते हुए भी एक बड़ी छलांग माना जा रहा है क्योंकि निम्न-सदन लोकसभा की तरह उच्च-सदन को भी इसे दो तिहाई बहुमत से पारित करना था और ऐसा करना टेढ़ी खीर ही माना जा रहा था. यू.पी.ए सरकार के विलंबित तिकड़मों, शरद यादव की जनता दल (यू) में दो फाड़ा जिसके अंतर्गत नितीश कुमार ने पार्टी के फैसले के विरुद्ध बगावत का झंडा गाड़ दिया तथा अन्य कारणों से बिल को 186:1 मतों से पारित होने में सफलता मिल गई.
दूरदर्शन चैनलों पर यह सब देख कर मुझे सहसा वह दिन याद आ गया जब बाबा साहेब आम्बेडकर देश के प्रथम क़ानून मंत्री की हैसियत से सदन में ‘हिंदू कोड बिल’ प्रस्तुत करते हुए कह रहे थे – ‘आखिर हमारे पास यह आज़ादी है किस लिए? हामारे पास आज़ादी अपने सामाजिक तंत्र में सुधार लाने के लिए है जो कि विषमताओं असमानताओं तथा अन्य बातों से भरा है और हमारे ‘मूल अधिकारों’ के प्रति कई विरोधाभास लिए मौजूद है (Dr. BR Ambedkar and untouchability by Chritoffe Jaffrelot p 115).
सदन में हिंदू कोड बिल के माध्यम से बाबा साहेब वास्तव में हिंदू नारी का सशक्तीकरण करना चाहते थे जिसमें बुद्ध, जैन तथा सिख धर्मं की नारियां भी सम्मिलित थी. बिल में कई प्रावधान थे जिन के माध्यम से वे नारी-पुरुष के बीच असमानता के प्रतीकों का उन्मूलन कर देना चाहते थे. उदाहरण के तौर पर बाबा साहेब ने तर्क दिया कि वर्त्तमान नियमों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का देहांत होता है तो उस की विधवा को, उस के बेटे की विधवा को (यदि वह मर चुका है और विवाहित था) और यहाँ तक कि उस के पोते की विधवा को (यदि वह भी मर चुका है और विवाहित था) संपत्ति में हिस्सा मिलता है. फिर अपनी पेट-जायी सगी बेटी को क्यों भुला दिया जाए? बाबा साहेब ‘कोड बिल’ द्वारा नारी अधिकारों में धुआंधार परिवर्तन करना चाहते थे ताकि वह समाज में पुरुष के बराबर खड़ी होने का साहस कर सके. मसलन उस समय तक पति के देहांत के बाद कोई भी नारी पति की संपत्ति पर केवल ‘Limited Estate’ (सीमित स्तर) जितना अधिकार सकती थी. वह उस संपत्ति से आने वाली आय का फायदा तो उठा सकती थी पर केवल कुछ कानूनी मसलों के अलावा उस का मूल-संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था. लेकिन कोड बिल ने ‘Limited Estate’ को Absolute Estate (पूर्ण स्तर) में बदल कर नारी को पुरुष के बराबर ला कर खड़ा कर दिया ((The Essential Writings of BR Ambedkar p 498 and India After Gandhi by Ramchandra Guha pp 228-229). इसी प्रकार बिल ने गोद लेने के मसले पर भी नारी को सशक्तीकृत कर दिया, पुरुष पर यह बंधन डाल कर कि वह किसी भी बच्चे को गोद ले तो पत्नी की सहमति अनिवार्य रूप से ले ले तथा गोद लेने की इस क्रिया को वह असालत पंजीकृत ज़रूर करवा दे (Essential Writings… p 501). उस समय तक एक विवाहिता नारी की स्थिति यह थी कि यदि वह किसी कारण पति के साथ एक ही घर में नहीं रहती थी तो वह खुद को पति से एक पाई तक प्राप्त करने से वंचित कर देती थी. लेकिन इस बिल ने स्वीकारा कि निश्चय ही कुछ परिस्थितयां हैं जिन में यदि पत्नी पति से अलग रहती है तो वह कुछ ऐसे कारणों से ऐसा करती होगी जिन पर उस का वश नहीं है तथा उसे पति की ओर से कोई भी खर्चा न दिया जाना उस के साथ सरासर ना इंसाफी है (वही पुस्तक p 499). अतः इस बिल ने किसी विवाहिता को कुछ विशिष्ट परिस्थितयों यथा पति की कोई जघन्य बीमारी, उस के द्वारा किया जा रहा अत्याचार या वेश्या गमन या पत्नी के परित्यक्ता होने पर पति से खर्चे का अधिकार दिलाया. इस बिल ने तलाक का एक सर्वथा नया कदम भी उठा जिसका कि हिंदू समाज में इस से पहले कोई चलन था ही नहीं! बिल ने बहुनिष्ठता की जगह एकनिष्ठता को स्थापित किया क्यों कि हिंदू समाज में भी उस समय तक बहु-विवाह की प्रथा थी.
लेकिन दुर्भाग्य कि बाबा साहेब के इस बिल की पैदा होते ही हत्या करनी पड़ी क्योंकि इस बिल के विरोध में सहसा सदन के गणमान्य सदस्यों की एक सेना खड़ी हो गई और विरोध की ऐसी तेज़ आंधी आई कि बाबा साहेब का ह्रदय छलनी हो गया और उन्होंने कानून मंत्री के पद से ही इस्तीफ़ा दे दिया. पंडित नेहरु और बाबा साहेब के रास्ते अलग हो गए. जो महापुरुष इस बिल का विरोध कर रहे थे वे सब के सब Hindu Personal Law (हिंदू व्यक्तिगत क़ानून) के परम भक्त थे तथा जो महापुरुष इस बिल से सख्त नफरत करते थे उन के मुखिया कोई और नहीं, देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे ! कुछ वर्षों बाद जब तक पंडित नेहरु ने अनेक तिकडमों व संशोधनों से तथा बिल को कई हिस्सों में बाँटकर आखिर उसे पारित नहीं करवा कर छोड़ा तब तक नारी को शक्ति प्रदान करने वाला यह बिल देश के शास्त्र प्रेमी महापुरुषों की हठ की वेदी पर बालि चढ़ा रहा. पंडित नेहरु ने पहली बार विरोध की आंधी से घबरा कर सदन में यह बिल मतदान तक के लिए प्रस्तुत नहीं किया था क्योंकि विरोध के चक्रवात में उन की अपनी कुर्सी तक डूबने को आ गई थी. परन्तु इस बार उन्होंने सब को कड़ी चेतावनी भी दी और ‘व्हिप’ भी जारी किया. इस बिल का विरोध इतना प्रचंड रहा कि देश में एक जगह साधुओं ने एक महारैली कर डाली. साधुओं ने खोज बीन कर जिस हिंदू नारी को एक आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत किया, वह थी रामायण की सीता. रामायण की सीता ! जिस ने कुछ नहीं किया, फिर भी उसे महल से निकलना पड़ा, अग्नि से गुज़रना पड़ा और पृथ्वी में समा जाना पड़ा ! देश की ‘संविधान-सभा’ के उच्च-शिक्षित किन्तु शास्त्रांध कानून-निर्माता यह भी भूल गए कि हमारे पवित्र (!) शास्त्रों के नारियाँ तो हमेशा पुरुष की ज़ालिम तानाशाही की शिकार रही, चाहे वह अभागी द्रौपदी हो जिसे उस का सब से बड़ा पति युधिष्ठिर राजसी जुए में पापी दुर्योधन के हाथों हार गया, चाहे निर्दोष अहिल्या जिसे उस के पवित्र (!) ऋषि पति ने पत्थर बना दिया या सुलोचना ही क्यों न हो जिसे राम-रावण युद्ध में पति मेघनाथ के मरते ही समाज की पाप-मय ‘सती प्रथा’ के होते जल मरना पड़ा! बेचारी सावित्री ने तो खुद को बच्चे पैदा करने वाली एक मशीन ही समझा और एक दो नहीं पूरे सौ पुत्र मान डाले ताकि मृत्यु देवता यमराज उस के पति सत्यवान को जीवित लौटा दें! केवल कुछ बच्चों की मांग रखने पर भी यमराज उस के पति को जीवित वापस न करते क्या!...

(क्रमशः ... अगले अंक में सन 1891 में विवाहित लड़की संबंधी क़ानून की गत लोकमान्य तिलक जैसे महापुरुषों ने क्या बना दी...)

Friday, March 12, 2010

महिला आरक्षण के सख्त विरोध में

O राजकिशोर

महिला आरक्षण विधेयक अगर पास हो गया तो कोई प्रलय नहीं आ जाएगा। लेकिन मीडिया में और खासकर महिला जगत में इसे लेकर उत्सव का जो माहौल है, वह लगभाग अश्लील जान पड़ता है। इनके मूड से ऐसा लगता है जैसे जन्नत का एक तिहाई हिस्सा महिलाओं को सौंप दिया जाने वाला है और कुछ गंवार लोग इसके विरोध में लट्ठ लेकर घूम रहे हैं। जो आरक्षण के भीतर आरक्षण चाहते हैं, उनकी जाति चिंता उनकी समाज चिंता के स्तर का पर्दाफाश करती है। पुराने द्विज संस्कारों की भुतही नकल करते हुए पिछड़ी जातियों के ये तथाकथित नेता आमतौर पर अपनी बहू-बेटियों को सार्वजनिक जीवन में उतरने से रोकते हैं। लेकिन जब स्त्री मात्र के लिए विधायिका की कुछ जगहें स्थायी रूप से खाली कराने का मौका आता है तब ये चौंक कर जाग उठते हैं और अपना फर्रा पेश कर देते हैं कि जब तक हमारे समुदाय की स्त्रियों को उनका हिस्सा नहीं दिया जाता, तब तक हम यह कानून नहीं बनने देंगे। इन शूरवीरों में यह कहने की हिम्मत नहीं है कि महिलाओं को तमाम तरह की नौकरियों और पदों में एक-तिहाई या उससे ज्यादा हिस्सा दो, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से सम्मानित महसूस कर सकें।

यह हिम्मत तो द्विजों में भी नहीं हैं, क्योंकि उनका एक बड़ा हिस्सा वास्तव में स्त्री-विरोधी है और नहीं चाहता कि स्त्रियों को आगे लाने के लिए कुछ दिनों के लिए खुद पीछे बैठा जाए। चूंकि लोकसभा में 543 और विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या 4,109 है, इसलिए अगर लोकसभा में181 और विधानसभाओं में कुल मिला कर 1,167 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं तो पुरुष वर्ग का, वास्तविक जीवन में, कोई नुकसान होने वाला नहीं है।

पुरुषों की दरियादिली, जो अन्य मामलों में कम ही दिखाई पड़ती है, इस खास मामले में कबड्डी-कबड्डी का ध्वनि-घोष कर रही है, तो यह बहुत रहस्यमय नहीं है। वे बहुत कम कीमत चुका कर दानवीर का तमगा खरीदना चाहते हैं। असल बेचैनी सामान्य पुरुष सांसदों और विधायकों में है लेकिन वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि उनके आका किसी भी कीमत पर लोकसभा का अगला चुनाव जीतना चाहते हैं। इनके लिए चुनावी जीत देश और उसके भविष्य से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। स्त्रियों के शुभैषी शायद यह उम्मीद कर रहे हैं कि संसदीय जीवन में स्त्रियों के इतनी बड़ी संख्या में उतरने से राजनीति का चरित्र ही बदल जाएगा। मेरी भविष्यवाणी यह है कि राजनीति का चरित्र बदले या न बदले, स्त्रियों का चरित्र जरूर बदल जाएगा। वे पुरुष मुट्ठियों में बंधे चुनाव टिकट के लिए जन सेवा के बल पर नहीं, बल्कि अपने स्त्रीत्व के बल पर वीभत्स और दयनीय प्रतिद्वंद्विता करेंगी, जैसे पुरुषों को पैसे, बाहुबल और शक्ति पीठों से सामीप्य के आधार पर प्रतिद्वंद्विता करते हुए देखा जाता है।

यह सारा मायालोक राजीव गांधी का खड़ा किया हुआ है, जिन्होंने शाह बानो नामक एक बेसहारा और बूढ़ी मुसलमान औरत से उसका मानवीय और संवैधानिक हक छीनने के लिए देश का कानून ही बदल डाला था। पंचायतों और नगर निकायों में स्त्रियों के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देकर राजीव ने भारत के इतिहास में अपने दस्तखत जोड़ दिए हैं। पर यह कठोर सत्य बहुत आसानी और बेदर्दी से भुला दिया जाता है कि राजीव गांधी का लक्ष्य न तो पंचायतों को गांव की और न नगरपालिकाओं को शहर की संसद के रूप में विकसित करना था।

तब भी यह सच था और आज भी यही सच है कि स्थानीय निकाय केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं को लागू करने की प्रशासनिक इकाइयां मात्र हैं और निर्वाचित सरपंच को सरकार द्वारा नियुक्त खंड विकास अधिकारी के सामने भीगी बिल्ली बन कर रहना पड़ता है।

महिलाओं के नए हिमायती-कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी, सभी-पंचायतों और नगरपालिकों पर से सरकारी अंकुश हटाने के लिए अब भी राजी नहीं हैं। अपनी-अपनी पार्टियों में स्त्रियों को अधिक से अधिक जगह और सम्मान देने की बात तक उनके दिलों में पैदा नहीं होती। फिर भी वे महिला आरक्षण विधेयक के शैदाई बने हुए हैं, ताकि कोई एक दल अपने को महिला आरक्षण का एकमात्र पैरवीकार साबित कर वोटों का मैदान न चर जाए। पढ़ने-लिखने वाली महिलाएं भी खुश हैं कि लोकसभा की अध्यक्षता का काम एक महिला को सौंप दिया गया, तब जाकर संसद में महिलाओं के लिए अलग से एक टॉयलेट बन सका। अपनी बिरादरी को कानून के बल पर तैंतीस प्रतिशत तक ले जाने की ख्वाहिश रखने वाली महिला सांसद क्या अंधी हैं कि इसके पहले इस असाधारण स्त्री-विरोधी चूक पर उनकी नजर तक नहीं गई?

सरपंच या नगरपालिका अध्यक्ष का काम प्रशासनिक जिम्मेदारी का है। सरकार जैसी शक्ति न होते हुए भी बेचारों को, जिनके अधीन स्थानीय पुलिस तक नहीं होती, तमाम तरह के सरकारी काम निपटाने पड़ते हैं। इस व्यवस्था का सही विस्तार यह होता कि प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर- चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक- स्त्रियों को तैंतीस या पचास प्रतिशत तक आरक्षण दे दिया जाता। इससे आम महिलाओं का ज्यादा भला और सशक्तीकरण भी होता। वर्तमान विधेयक स्त्रियों को पंद्रह सौ से भी कम सीटों के लिए आमंत्रित करता है। इसलिए महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से भी यह विधेयक घाटे का सौदा है। दक्षिण एशिया में चुनिंदा सीटों पर महिलाओं को बैठते हुए हम पहले भी देख चुके हैं और आज भी देख रहे हैं। कौन दावा कर सकता है कि इससे राजनीति के चरित्र में कोई उल्लेखनीय फर्क आया है?

यह सही है कि परिमाण में वृद्धि होने से गुण भी बदल जाता है, पर भारत की राजनीति यह नहीं होने जा रहा है। पुरुषों की तरह महिलाएं भी अपने समय और संस्कृति की उपज होती हैं। विधायिका में पिछड़ी जातियों और दलितों के बेशी संख्या में आने से बेईमानी और सत्तावाद बढ़ा है या कम हुआ है? अगर आप चाहते हैं कि पैसा, पद और पॉवर के इस दलदल में नाक तक धंसने का अधिकार स्त्रियों को भी मिलना चाहिए तो आप ऐसे समानतावादी हैं जो जन्नत और दोजख के फर्क को मिटा देना चाहता है। आपका एतराज यह है कि बदनीयती और बेईमानी पर किसी एक जेंडर का एकाधिकार क्यों हो? अगर लोकसभा का चुनाव लड़ने में दस-पंद्रह करोड़ और विधानसभा का चुनाव लड़ने पर दो-तीन करोड़ का न्यूनतम खर्च आता है, तो महिलाएं भी इसका जुगाड़ कर लेंगी। बेशक अपने पिता या पति की कमाई पर उनका अधिकार भरण-पोषण से ज्यादा न हो और अपनी कमाई पर वे सिर्फ अपना अधिकार रखना चाहें तो यह दांपत्य कलह का कारण बन जाता हो, लेकिन चूंकि सांसद और विधायक का पद हर तरह से लाभ का पद है, इसलिए महिला उम्मीदवारों को अपनी फाइनेंसिंग कराने में दिक्कत पेश नहीं आएगी।
चुन लिए जाने के बाद उन्हें यह कर्ज उतारना भी होगा, जो जनता की कमाई हड़पने के पाप में हिस्सेदारी के बगैर मुमकिन नहीं है। अंतत: सचाई यही ठहरती है कि इस विधेयक के माध्यम से लोभी और छलात्कारी पुरुष महिलाओं को अपनी भ्रष्ट बिरादरी में शामिल करने पर आमादा हैं। यह बहुत खुशी की बात होगी अगर महिलाएं इस चक्रव्यूह को भेद सकें। लेकिन यह तैंतीस प्रतिशत और सड़सठ प्रतिशत यानी दीये और तूफान का मुकाबला होगा। फिर संसद के बाहर तो पुरुष वर्चस्व को बने ही रहना है।

मूल आपत्ति लेकिन दूसरी है। इसका संबंध राजनीति की परिभाषा से है। राजनीति क्या है? क्या यह पैसा, पद और पॉवर हासिल करने में प्रतिद्वंद्विता का खेल है? क्या राज्य की शक्तियां मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को अधिक से अधिक लूट का अवसर देने के लिए हैं? जो भी व्यक्ति ऐसा सोचकर राजनीति में आता है या राजनीति में बना हुआ है, वह राजनीति, संविधान और जनता के साथ खुल्लमखुल्ला बलात्कार करता है। जब कोई व्यक्ति राजनीति में आरक्षण की मांग करता है तो यह मांग बलात्कारियों के इस नापाक क्लब में शामिल होने की मांग बन जाती है। कोई कह सकता है कि बेईमानी कहां नहीं है- धर्म में नहीं है, संस्कृति में नहीं है, शिक्षा में नहीं है या साहित्य में नहीं है? इसका त्वरित जवाब यह है कि भेड़ की खाल में कुछ भेड़िए भी टहल रहे हैं, इसलिए धर्म, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य की परिभाषा तो नहीं बदल दी जाएगी? इसी तरह, अगर आज राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर दिखाई पड़ रही है और राजनेता, एक वर्ग के रूप में, श्रद्धा और विश्वास के नहीं, बल्कि नफरत के पात्र हो गए हैं तो इससे प्रभावित होकर राजनीति की परिभाषा कैसे बदल दी जा सकती है? सांसद और विधायक चुने जाने पर संविधान की आत्मा और उसके शब्दों के अनुसार काम करने की जो शपथ ली जाती है, उस पर काली स्याही कैसे पोती जा सकती है?

राजनीति की एकमात्र वैध परिभाषा यह है कि यह जनता की सेवा करने का एक पवित्र माध्यम है। तकनीकी तौर पर तो हमारे मंत्री, सांसद, विधायक आदि भी जन सेवक (पब्लिक सरवेंट) कहलाते हैं और इसलिए उन्हें कुछ विशिष्ट अधिकार भी दिए गए हैं, लेकिन इनमें से प्राय: सभी पब्लिक को ही अपना सरवेंट समझते हैं।

यह राजनीति का खलनायकीकरण है। धीरोदात्त नायक तो वही राजनेता कहलाएगा, जिसे जनता की सेवा करने में आनंद आता है और जो अपने लिए कम से कम की कामना करता है। यही वह बिंदु है जहां आकर राजनीतिक और नैतिक का द्वंद्व मिट जाता है। इसी अर्थ में हर नैतिक कर्म एक राजनीतिक कर्म है और हर राजनीतिक कर्म एक नैतिक कर्म।

इसीलिए यह प्रश्न भी वैध है कि नैतिकता में आरक्षण कैसा? अच्छा बनने के लिए तैंतीस या पचास प्रतिशत आरक्षण की कामना क्यों? सेवा के क्षेत्र में विशेषाधिकार के लिए जगह कहां है? जो स्त्री या पुरुष जन सेवा करना चाहता है, उसकी राह कौन रोक सकता है? जो संसद या विधानसभा में पहुंच कर जनता की सेवा करना चाहता है, उसके लिए दरवाजा पहले से ही खुला हुआ है-लोगों की भलाई करने में अपने आप को झोंक दीजिए, लोग आपको अपने कंधों पर बैठा कर संसद और विधानसभा के दरवाजे तक ले जाएंगे।

अगर संसद या विधानसभा में सीट आरक्षित कर दिए जाने के बाद ही कोई जन सेवा के मैदान में उतरना चाहता है, तो उसकी नीयत पर शक करने का हमें पूरा हक है। महिला आरक्षण विधेयक राजनीति की पतित परिभाषा को मान्यता देता है और स्त्रियों को आमंत्रित करता है कि हम पुरुष जो कर रहे हैं, आओ तुम भी वही करो। अन्यथा यह विधेयक पेश करने के पहले सरकार चुनाव कानून में ऐसे संशोधन जरूर करती, जिससे गरीब से गरीब आदमी भी चुनाव लड़ना चाहे तो लड़ सके। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन सिर्फ तैंतीस प्रतिशत नहीं, सौ प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए खुल जाएंगी।

(जनसत्ता से साभार)