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Saturday, July 03, 2010

शन्नो अग्रवाल को गुस्सा क्यों आता है?

मेरे शांत चित्त में एक चिंगारी सी भड़क पड़ती है जिसके बारे में पीड़ित महसूस करते हुए भी..अधिकतर नारियाँ चुप रहती हैं..मैं भी चारों तरफ का माहौल देख-भाल के सहम जाती हूँ कि कौन लोगों के मुँह लगे...लेकिन कुछ बातें जो नश्तर की तरह चुभ जाती हैं अन्दर ही अन्दर..जो समस्त नारी जाति पर लागू होती हैं..और जिन बातों को अब भी लोग जबरदस्ती करने/ कहने पर तुले हुए हैं..तो मेरा शांत चित्त कुछ समय के लिये भड़क पड़ता है... जिसकी बात से मन में ज्वाला धधकी उसे लिखने वाला एक पुरुष ही है.. स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन.... इस पंक्ति को पढ़ते ही मन बहुत ख़राब सा हो गया...चिंगारी पैदा हुयी और आग बन गयी...कोई इंसान नारी को स्वाहा करने की बात करता है ताकि वह एक शक्ति बन सके...तो पढ़ते ही मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि लोग क्यों हर समय नारी को आगे कर देते हैं स्वाहा होने को..ये रटी-रटाई पंक्तियाँ बिना इनकी विस्तृत समालोचना किये ही लोग कह देते हैं..जैसे कि वह कोई घास-फूस या समिधा-सामग्री हो..जिसे स्वाहा किया जा सकता है.
लोग उसे भस्म करके उससे शक्ति की अपेक्षा रखते हैं..अरे वो तो वैसे भी इतना कुछ करती और सहती आई है युग-युग से कई रूपों में..बिना किसी के कहे ही वह अपने कर्तव्यों को निभाती रही है. और फिर एक तरफ तो उसे अबला कहा जाता है..तो दूसरी तरफ उसे भस्म करके शक्ति की आशा करते हैं..तो भई, उसे किस तरह भस्म होना चाहिये और किस तरह की शक्ति मिलेगी उसे भस्म करके ? अपने मन में तो वह समाज के लोगों की किसी ज्यादती या रीतियों-कुरीतियों का शिकार बन कर भस्म होती ही रहती है...उसके बाद भी लोग पता नहीं क्या चाहते हैं..कभी तो उसे दुर्गा कहते हैं तो यह नहीं सोचते की उसमे वो दैविक शक्ति नहीं है जिससे सीता जी जल गयीं थी..और कभी जब औरत के बलिदानों की बात चलती है की '' आज की औरत सतयुग की सीता से भी अधिक अग्नि परीक्षाएं देती है '' तो तमाम गहन धार्मिक प्रवृति के लोग इसे सीता जी का अपमान समझते हैं..और भड़क पड़ते हैं कहते हुये कि सीता जी से आज की औरत की कोई समानता नहीं...और तरह-तरह के उदाहरण देते हुये पूरी रामायण ही उठा लाते हैं बहस करने के लिये..अगर ऐसा है तो फिर आज के पढ़े लिखे लोग ये क्यों कहते हैं बिना सोचे समझे कि '' स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन ''.
यह पढ़कर व सोचकर मेरे मन को लगा कि नारी को लोग कोसने से बाज नहीं आते..समय बदला है, और वह पढ़ी-लिखी व समझदार है फिर भी समय-समय पर उसकी अवहेलना की जाती है और जरा-जरा सी बातों में मखौल उड़ाया जाता है उसका..और अपने को बहादुर कहने वाली औरतें भी सहमी रहती हैं पुरुषों के मगरूर व्यवहार पर अपनी गलती न होने पर भी...औरत डर से व पुरुष अपने बचाव में कहते रहते हैं कि अब समय बदल गया है..अब वह हालत नहीं रही औरत की..वह मजबूत है समझदार है..आदि-आदि.. लेकिन यह बातें कितनी लागू होती हैं...और तुर्रा यह कि औरत को भस्म करके उससे शक्ति हासिल करने की भी बात की जाती है...अरे, उसे भी तो पुरुष की इन्ही खूबियों की जरूरत हो सकती है जीवन में कभी...तो कितने पुरुष हैं जो उसकी शक्ति बनते हैं..अधिकतर को तो जलन होने लगती है..और औरत की उपेक्षा करके उसे सताने लगते हैं..औरत कोई घास-फूस या लकड़ी तो है नहीं जो उसे आज्ञा दी जा रही है कि '' स्वाहा हो जा '' और फिर ऐसा होने पर तो वह राख बन जायेगी और किसी काम की ना रहेगी..तो उसे अपनी स्वाभाविक मौत ही क्यों नहीं मरने दिया जाता..क्यों उसके लिये जीते-जी चिता सुलगा कर झोंकने का प्रयास करते हैं लोग ऐसी बातें करके...औरत की इज्ज़त की बात करने वाले समाज के ठेकेदार खुद बुरी नज़र रखते हैं उसपर..और अपनापन दिखाने वाले लोग उसपर मुसीबत आने पर निगाहें बचाकर बगलें झाँकने लगते हैं...ऊपर से जुर्रत यह कि उसे जीते जी भस्म भी करना चाहते हैं..क्यों...आखिर क्या बिगाड़ा है उसने किसी का..क्या उसे दर्द नहीं होगा...क्या उसे अपने तरीके से जीने का अधिकार नहीं है..??????
वास्तव में लोगों की इस तरह की बातें पढ़कर या विचार जानकर मेरे मन को बहुत पीड़ा होती है और लगता है कि नारी को समाज में बस दिखावे के लिये ही ऊँचा दर्ज़ा दिया जाता है लेकिन '' भस्म '' , '' स्वाहा '' या अन्य तमाम शब्दों का इस्तेमाल करके उसे कोसा जाता है...कोई मुझे बताये कि यह शब्द कह कर लोग कोस नहीं रहे है तो क्या कर रहे हैं..? अगर वह भस्म हो गयी तो कहाँ से ताकत देगी ? ये शब्द मुझे नारियों के लिये एक गाली से लगते हैं....

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं और हिंदयुग्म पर इनकी आवाजाही बहुत पुरानी है। बैठक पर आप इन्हें पहले भी पढ़ चुके हैं...)

Tuesday, March 17, 2009

पुरुषों के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव...

उस दिन मैं अचानक क्या कह गया, यह मेरी भी समझ में नहीं आया। अवसर था स्त्री-विमर्श पर केंद्रित ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ की पहली वर्षगांठ पर दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक विचार बैठक का। मधु किश्वर और सुकृता पॉल बोल चुकी थीं। दोनों के ही भाषण बहुत अच्छे थे। दोनों ने ही स्त्री अस्मिता के मुद्दों पर गहराई से विचार किया था। उनके बाद अपनी बात कहते हुए मैंने पहले तो इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि यहां मैं अकेला पुरुष वक्ता हूं। इस पर ‘चोखेर बाली’ की संचालिकाओं में एक सुजाता ने स्पष्ट किया कि हमारे ब्लॉग पर पुरुष भी लिखते हैं। मुझे यह बात मालूम थी, क्योंकि मैं भी उनमें एक हूं। फिर, मैंने कहा कि स्त्री विमर्श सिर्फ पुरुषों का मामला हो भी नहीं सकता, क्योंकि अगर यह सभ्यता विमर्श और सभ्यता समीक्षा है, तो पुरुषों की सहभागिता के बिना यह काम कैसे पूरा हो सकता है? आगे मैंने कहा कि यह भी उल्लेखनीय है कि नारी अधिकारों को प्रतिष्ठित करने में पुरुष लेखको, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मूल्यवान भूमिका रही है। यह भी कि ऐसे असंख्य पुरुष हुए हैं जिनमें स्त्री के गुण थे और ऐसी स्त्रियां भी कम नहीं हुई हैं जिनका व्यक्तित्व पुरुष गुणों के कारण विकृत हुआ है। इसी संदर्भ में मैंने कहा कि स्त्री विमर्श में पुरुषों को खुल कर सहभागी बनाइए और बनने दीजिए, लेकिन स्त्री-पुरुष संबंधों के इतिहास को देखते हुए पुरुषों पर विश्वास कभी मत कीजिए। वे कभी भी धोखा दे सकते हैं और अगर यह धोखा उन्होंने मित्र बन कर दिया, तो यह और भी बुरा होगा।

बात कुछ हंसी की थी और हंसी हुई भी, पर विचार करने पर लगा कि बात में दम है। एक बहुत पुरानी मान्यता है कि स्त्री-पुरुष का साथ आग और फूस का साथ है। दोनों निकट आएंगे, तो फूस का भभक उठना तय है। आजकल के लोग इस तरह की मान्यताओं की खिल्ली उड़ाते हैं। उनका कहना है कि यह बेहूदा बात इसलिए फैलाई गई है ताकि स्त्रियों को बंधन में रखा जा सके। मैं इस स्थापना से पूरी तरह सहमत नहीं हूं। पुरुष से अधिक कौन जानता होगा कि स्त्री को देख कर पुरुषों के मन में सामान्यत: किस प्रकार की भावनाएं पैदा होती हैं। इसलिए अगर उन्होंने आग और फूस को दूर-दूर रखने का फैसला किया, तो यह बिलकुल निराधार नहीं था। इसके साथ-साथ होना यह चाहिए था कि ऐसी समावेशी संस्कृति का विकास किया जाता जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच की सामाजिक और सांस्कृतिक दूरी घटे और दोनों मित्र भाव से जी सकें। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका। पुरानी, रूढ़िवादी संस्कृति चलती रही, बल्कि कहीं-कहीं उग्र भी हो गई, और उसके प्रति विद्रोहस्वरूप आधुनिक संस्कृति का भी विकास होता रहा, जिसमें स्त्री-पुरुष के साथ को खतरनाक नहीं, बल्कि अच्छा माना जाता है। पुरानी संस्कृति में स्त्री के शील की रक्षा उस पर पहरे बिछा कर, उसे उपमानव बना कर की जाती थी, जैसा आज के तालिबान चाहते हैं, तो दुख की बात यह भी है कि आधुनिक संस्कृति में स्त्री का उपयोग उपभोक्तावाद को बढ़ाने और कामुकता का प्रचार करने में हो रहा है तथा बलात्कार या इसकी आशंका से उसे परिमित और खामोश करने की कोशिश की जा रही है। जरूरत बीच का रास्ता निकालने की है, जहां प्रेम भी हो, निकटता भी हो और मानव अधिकारों का सम्मान भी।

‘चोखेर बाली’ की विचार-बैठक के हफ्ते भर बाद सुजाता ने उनके अपने ब्लॉग ‘नोटपैड’ पर किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भेजी गई यह टिप्पणी मुझे अग्रेषित की : ‘सविता भाभी के बहाने स्त्री विमर्श का डंका पीटनेवाले ब्लॉगर पत्रकार आकाश (मूल नाम बदल दिया गया है) जी के सारे स्त्री विमर्श की कलई उस समय खुल गई, जब उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की एक छात्रा के साथ, जहां अभी कुछ दिनों पहले वे क्लास लेने जाते थे, के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। लड़की की तबीयत ठीक नहीं थी। उन्होंने उसे किसी काम के बहाने ऑफिस में बुलाया और फिर उसके लाख मना करने के बावजूद उसे अपनी नई कार से उसे घर छोड़ने गए। फिर वहां उसे चुपचाप छोड़ कर आने के बजाय लगभग जबरदस्ती करते हुए उसका घर देखने के बहाने उसके साथ कमरे में गए। लड़की मना करती रही, लेकिन संकोचवश सिर्फ ‘रहने दीजिए सर, मैं चली जाऊँगी’ जितना ही कहा। वे उसकी बात को लगभग अनसुना करते हुए खुद ही आगे आगे गए और उसका घर देखने की जिद की। लड़की को लगा कि पांच मिनट बैठेंगे और चले जाएंगे। लेकिन उनका इरादा तो कुछ और था। उन्होंने घर में घुसने के बाद जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ा, उसके लाख छुड़ाने की कोशिश करने के बावजूद उसे जबरदस्ती चूमने की कोशिश की। लड़की डरी हुई थी और खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन इनके सिर पर तो जैसे भूत-सा सवार था। आकाश ने उस लड़की को नारी की स्वतंत्रता का सिद्धांत समझाने की कोशिश की, ‘तुम डर क्यों रही हो। कुछ नहीं होगा। टिपिकल लड़कियों जैसी हरकत मत करो। तुम्हें भी मजा आएगा। मेरी आंखों में देखो, ये जो हम दोनों साथ हैं, उसे महसूस करने की कोशिश करो।’ डरी हुई लड़की की इतनी भी हिम्म्त नहीं पड़ी कि कहती कि जा कर अपनी बहन को क्यूं नहीं महसूस करवाते। लड़की के हाथ पर ख्ररोंचों और होठ पर काटने के निशान हैं। लड़की अभी भी बहुत डरी हुई है।’

यह घटना कितनी सत्य है और कितनी मनगढ़ंत, पता नहीं। लेकिन भारत में ही नहीं, दुनिया के एक बड़े भूभाग में इस तरह की घटनाएं सहज संभाव्य हैं और होती ही रहती हैं। इसीलिए मेरा यह विश्वास बना है कि स्त्रियों को पुरुषों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए – चाहे वे गुरु हों, शिक्षक हों, चाचा, मामा, मौसा-ताऊ हों, मुंहबोले भाई हों, पड़ोसी हों, मेहमान हों, शोध गाइड हों, संपादक हों, प्रकाशक हों, अकादमीकार हों, नियोक्ता हों, मैनेजर हों, पुजारी हों, पंडे हों – कुछ भी क्यों न हों। कई हजार वर्षों की मानसिकता जाते-जाते ही जाएगी। इस संक्रमण काल में स्त्री को बहुत अधिक सावधान रहने की जरूरत है – खासकर अपने शुभचिंतकों से। इसका मतलब यह नहीं है कि हर पुरुष को संदेह की नजर से देखो। इससे तो सब कुछ कबाड़ा हो जाएगा। नहीं, किसी पर भी अनावश्यक संदेह मत करो। विश्वास का अवसर हरएक को दिया जाना चाहिए। लेकिन सावधानी का दीपक हाथ से कभी नहीं छूटना चाहिए। दीपक बुझा कि परवाना लपका।

वैसे, जीवन के एक सामान्य सिद्धांत के तौर पर भी यह सही है। पुरुष पुरुष पर कितना विश्वास करते हैं? स्त्री स्त्री पर कितना विश्वास करती हैं? जहां आत्मीयता होती है, वहां भी लोग ठगे जाने से बचने की कोशिश करते हैं। यह सावधानी स्त्री-पुरुष व्यवहार में और ज्यादा अपेक्षित है, क्योंकि अब तक के इतिहास की सीख यही है। इसलिए माता-पिता और अभिभावकों का यह एक मूल कर्तव्य है कि वे लड़की को लड़की के रूप में विकसित होते समय ही उन फंदों और गड्ढों से अवगत कराते रहें जो आगे उसकी राह में आनेवाले हैं। इसके साथ ही, उसे निर्भय होने और स्व-रक्षा में सक्षमता की शिक्षा भी देनी चाहिए। लेकिन इस कीमत पर नहीं कि मानवता में ही उसका विश्वास डिग जाए। बहुत ही प्रेम और समझदारी से उसमें यह बोध पैदा करना होगा कि लोग सभी अच्छे होते हैं, पर हमेशा सचेत रहना चाहिए कि वे बुरे भी हो सकते हैं। लड़कियों को यह सीख भी दी जानी चाहिए कि यह बहुत गलत होगा अगर अति सावधानी के परिणामस्वरूप वे किसी पुरुष से आत्मीय रिश्ता बना ही न पाएं। घृणा तो किसी से भी न करो – ज्ञात पापी से भी नहीं, सभी को प्रेम और विश्वास दो, पर अपनी सुरक्षा की कामत पर नहीं। हर संबंध की तरह स्त्री-पुरुष संबंध भी एक जुआ है, लेकिन यह जुआ खेलने लायक है, क्योंकि इसी रास्ते हम अपने मनपसंद साथी खोज सकते हैं। इस प्रक्रिया में दुर्घटनाएं होती हैं, तो होने दो। डरो नहीं, न परिताप करो। लेकिन आंख मूंद कर उस रास्ते पर कभी मत चलो जिसके बारे में तुम्हें पता नहीं कि उस पर आगे क्या-क्या बिछा और फेंका हुआ है। यह संतुलन साधना मामूली बात नहीं है, लेकिन अच्छा जीवन जी पाना भी क्या मामूली बात है?

राजकिशोर
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में वरिष्ठ फेलो हैं)