Tuesday, February 24, 2009

हिंदी में बुद्धिजीवी होना भी कम दुखदायी नहीं.....

भारत में बुद्धिजीवियों का इतिहास बेहद पुराना है....पूरी दुनिया को हर क्षेत्र में भारत ने मौके-बेमौके पाठ पढाए हैं...पूरी दुनिया ने हमारी इस क्षमता को सराहा भी है....मगर, सवाल यह है कि बुद्धिजीवियों की भाषा अंग्रेज़ी होने के कारण हिंदुस्तान का आम पाठक इन बुद्धिजीवियों से कितना लाभ ले पाता है.....एक नये लेख के साथ प्रस्तुत हैं राजकिशोर

पहली बात तो यह है कि भारत में जन बुद्धिजीवी (पब्लिक इंटेलेक्चुअल) हिन्दी में नहीं हैं और अंग्रेजी में हैं, यह बात ही सिरे से ही खारिज करने लायक है। अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों का भारतीय जन से क्या रिश्ता है? कोई रिश्ता है भी या नहीं? बताते हैं कि अंग्रेजी समझनेवालों की संख्या भारत में तीन प्रतिशत के आसपास है। इन तीन प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व करनेवाले बुद्धिजीवी देश के 97 प्रतिशत लोगों से कैसे संवाद कर सकते हैं? आषीश नंदी या रामचंद्र गुहा या अमर्त्य सेन को भारत का जन बुद्धिजीवी किस तर्क से कहा जा सकता है? ये मुख्यतः या सिर्फ अंग्रेजी जाननेवाले वर्ग के लिए लिखते या बोलते हैं। निश्चय ही, इनके सरोकारों का संबंध भारत की स्थितियों से होता है, लेकिन विदेशों में रहनेवाले ऐसे दर्जनों विद्वान हैं जो अंग्रेजी में या अपनी-अपनी भाषाओं में भारत के बारे में लिखते रहते हैं। क्या इन विदेशी विद्वानों को भारत का जन बुद्धिजीवी माना जा सकता है? इन विद्वानों में और भारत में रहनेवाले भारतीय विद्वानों में मूलभूत फर्क क्या है? दोनों एक ही पाठक वर्ग के लिए लिखते हैं। दोनों एक ही तरह के परिसंवादों में भाग लेते हैं। उनकी पुस्तकें प्राय: एक ही वर्ग के प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित की जाती हैं। जैसे सिर्फ भारतीय मूल का होने से कोई विद्वान भारतीय नहीं हो जाता, वैसे ही जनता से दूर रहनेवाला बुद्धिजीवी किसी भी हाल में भारत का जन बुद्धिजीवी नहीं कहला सकता। इसलिए हमें इस जाल में पड़ना ही नहीं चाहिए कि कोई विदेशी पत्रिका किन्हें भारत के शीर्ष जन बुद्धिजीवियों में गिनती है और किन्हें नहीं। वास्तव में यह अंग्रेजी भाषा की नट लीला है, जिसकी ओर ध्यान देने से हम अपनी बौद्धिक समस्याओं का निदान नहीं निकाल सकते।

इस ट्रेजेडी के साथ एक वृहत्तर ट्रेजेडी भी जुड़ी हुई है। ऐसा नहीं है कि जन बुद्धिजीवी न होने के कारण भारत के अंग्रेजी बुद्धिजीवियों का योगदान कुछ कम महत्व का है। महत्व है, इसीलिए अफसोस होता है कि ये विद्वान अंग्रेजी में क्यों लिखते हैं जिसका भारत के आम पढ़े-लिखे वर्ग से कोई संबंध नहीं है। इसमें क्या संदेह है कि पिछले साठ वर्षों में ज्ञान और विद्वत्ता के क्षेत्र में जो ज्यादातर काम हुआ है, वह अंग्रेजी में ही हुआ है। उदाहरण के लिए, जाति, गरीबी, भूमंडलीकरण, धर्मनिरपेक्षता, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि में जितना महत्वपूर्ण काम हमारे देश में हुआ है, उसकी भाषा अंग्रेजी ही है। इसी से इसका फायदा अंग्रेजीवालों के बीच ही सीमित रहता है। अन्य भाषाओं के जिज्ञासु भी इन्हें पढ़ते हैं, पर इनकी संख्या ज्यादा नहीं है और इन बुद्धिजीवियों का व्यक्तित्व या कार्य शैली ऐसी नहीं है कि ये भारत के जनमानस को प्रभावित कर सकें। इस तरह, अंग्रेजी में उत्पादित और संग्रहित ज्ञान भंडार भारत के अधिसंख्य लोगों के लिए किसी काम का नहीं होता। रामचंद्र गुहा या अरुंधति रॉय होंगे बहुत बड़े बुद्धिजीवी, पर उनके मुहल्ले के लोग भी नहीं जानते कि यहां हमारे समय का एक बड़ा बुद्धिजीवी रहता है। भारत का अंग्रेज़ी बुद्धिजीवी लंदन, पेरिस, हेडेलबर्ग की सैर करता होगा, अंतरराष्ट्रीय परिसंवादों में भाग लेता होगा, हर साल उसकी एक नई किताब प्रकाशित होती होगी, पर असल भारतीय समाज से वह उतना ही दूर है जितना इंग्लैंड या अमेरिका भारत से दूर हैं। इसलिए इनका ज्ञान भारतीय लोगों के उपयोग में नहीं आ पाता। ये इंटेलेक्चुअल हैं, पर पब्लिक इंटेलेक्चुअल नहीं।

फिर इन्हें भारत का जन बुद्धिजीवी क्यों मान लिया जाता है? क्योंकि एक छोटा-सा वर्ग ऐसा है, जो अपने को असली भारत माने बैठा है। इस छोटे-से वर्ग के सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करते हैं और एक-दूसरे की बात का खंडन-मंडन करते रहते हैं। यह वर्ग जो लिखता है, उसे यही वर्ग पढ़ता है। इस वर्ग का अंग्रेजी के विदेशी बुद्धिजीवियों से भी संपर्क रहता है। यही कारण है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की कोई पत्रिका जब भारत के जन बुद्धिजीवियों की सूची बनाने बैठती है, तो उसकी नजर मेधा पाटकर या अरुणा रॉय या नामवर सिंह या राजेंद्र यादव पर नहीं पड़ती। ये लोग उस मंडली से बाहर हैं जिसे भारत का बौद्धिक क्रीमी लेयर कहा जा सकता है। राजेंद्र यादव की टिप्पणियों को पढ़नेवालों की संख्या रामचंद्र गुहा के पाठकों से कई गुना ज्यादा होगी, पर यादव अमेरिकी पत्रिकाओं की नजर में पब्लिक बुद्धिजीवी नहीं हैं और रामचंद्र गुहा हैं। यह यथार्थ को सिर के बल खड़ा करना नहीं है, तो और क्या है?

नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, सच्चिदानंद सिन्हा, अशोक वाजपेयी की भी सीमाएं हैं। ये काम तो कर रहे हैं जन बुद्धिजीवी का, पर जन के बीच इनकी कोई खास मान्यता होने की बात को तो छोड़िए, आम हिन्दी भाषी इन्हें जानता तक नहीं है। जिस तरह अंग्रेज़ी बोलने और लिखनेवालों का एक छोटा-सा परिमंडल बना हुआ है, उसी तरह इन लेखकों और वक्ताओं का भी एक सीमित परिमंडल है। अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों की तुलना में इनकी स्थिति ज्यादा ट्रैजिक कही जा सकती है, क्योंकि ये अपनी मातृभाषा में काम करते हैं, उसे समर्थ और सक्षम बनाते हैं, उसके जरिए तरह-तरह की बहसें छेड़ते हैं, पर इसकी आंच या महक अपने ही लोगों के बीच दूर तक नहीं जा पाती। अंग्रेजी के लेखक नदी के द्वीप हैं, तो ये लेखक छोटी-छोटी नदियां है, जिन्हें उस व्यापक जन क्षेत्र की प्रतीक्षा है, जहां ये वेग के साथ बह सकें।

मामला यह भी है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से अंग्रेजी में विचार-विमर्श की परंपरा लगभग अक्षत बनी हुई है, पर भारतीय भाषाओं में यह परंपरा छिन्न-भिन्न हो गई है। एक समय मराठी में महात्मा फुले थे, बांग्ला में ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे और हिन्दी में भारतेंदु हरिश्चंद्र और दयानंद सरस्वती थे, पर आज उनके बौद्धिक उत्तराधिकारी कहीं दिखाई नहीं देते। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अंग्रेजी से होनेवाले अनगिनत लाभों के कारण भारत की उत्कृष्ट प्रतिभाएं अंग्रेजी में पर्यवसित होती गई, जिससे भारतीय भाषाओं में बौद्धिक विकास को आघात पहुंचा। दूसरा बड़ा कारण यह है कि हिन्दी क्षेत्र में पुनर्जागरण की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। छिटपुट प्रयत्न जरूर हुए हैं, पर वे तृणमूल स्तर पर जन जीवन को प्रभावित नहीं कर सके। इसलिए तर्क-वितर्क का माहौल क्षीण हुआ है। साहित्य को ही प्रमुख बौद्धिक गतिविधि मान लिया गया। फिर भी, महात्मा गांधी के बाद राममनोहर लोहिया, रामवृक्ष बेनीपुरी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, किशन पटनायक, माहेश्वर (आइपीएफ) आदि ने अपने-अपने समय में सार्वजनिक बहसें चलाईं और बहुत बड़ी संख्या में लोगों की बौद्धिक चेतना में खलबलाहट पैदा की। यह क्रम भी अब टूटता नजर आता है। अंग्रेज़ी का प्रभुत्व भारत की हर अच्छी चीज को नष्ट कर रहा है। इसलिए हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में जन बुद्धिजीवियों का आविर्भाव हो और उनका प्रभाव क्षेत्र फैले, इसके लिए आवश्यक है कि भारत के सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी को तुरंत विदा किया जाए।

राजकिशोर

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11 बैठकबाजों का कहना है :

sushant jha का कहना है कि -

राजकिशोर जी की अधिकांश बातों से सहमत होते हुए भी ये बात कहना कि सिर्फ अंग्रेजी में लिखने के कारण रामचंद्र गुहा या अरुंधति राय जन बुद्धिजीवी नहीं कहे जा सकते, थोड़ी अपच किस्म की है। सवाल ये है कि जन की क्या परिभाषा है? क्या वो इतनी संकड़ी है कि उसमें सिर्फ हिंदी भाषी ही शामिल हैं और उसमें नर्मदा से दक्षिण वालों का कोई हिस्सा नहीं। सवाल भाषा का नहीं उनके द्वारा फैलाए जा रहे विचारों का है-हां वो समीचीन ढ़ंग से हर इलाके में फैलनी चाहिए इसकी जिम्मेवारी फिर उस खास इलाके के बुद्धिजीवियों की भी बनती है। अगर सिर्फ हिंदी की बात की जाए तो सबसे पहले देश में आम सहमति बनानी होगी कि लोग स्वेच्छया या फिर जबर्दस्ती हिंदी सीखें जो या तो अलोकतांत्रिक है या फिर हमारे नेतृत्व की कमजोर इच्छाशकक्ति दिखाता है। हां बोलने के स्तर पर देश में हिंदी कई वजहों से फैल रही है लेकिन पढ़ने और लिखने के स्तर पर वो कैसे फैले इसकी तरफ सरकार और बुद्धिजीवियों को भी ध्यान देनी चाहिए। जबतक हम अंग्रेजी में मौजूद समस्त ज्ञान भंडारों के लगभग बराबर या थोड़ा पीछे भी नहीं पहुंचते कोई हिंदी में कैसे पढ़ सकता है और ऐसी हालाता में कोई बुद्धिजीवी सिर्फ अपने इलाके के लिए हिंदी में कैसे लिख सकता है-हां वो लिखता है तो उसकी अपनी महानता है। दूसरी बात ये कि हमारे भाषाई पंडित जबतक भाषा की शुचिता का पोंगावाद अपनाते रहेंगे तबतक हम अच्छे अनुवाद भी नहीं कर पाएंगे। क्या कोई बौद्धिक आंदोलन ऐसा है जो सहज और सरल अनुवाद सभी विषयों में मुहैया करवाए। ऐसा नहीं तो फिर बनारस का बच्चा भी फिजिक्स की किताब सिर्फ अंग्रेजी में ही पढ़ पाता है जबकि मेरा भी मानना है कि अगर वो हिंदी में पढ़े तो ज्यादा बोधगम्य तरीके से तरक्की कर सकता है। इस दिशा में बुद्धिजीवियों को और सरकार को भी विचार करना चाहिए।

संगीता पुरी का कहना है कि -

बिल्‍कुल सही कहना है इनका...हिन्‍दी प्रेमियों को भी उच्‍चस्‍तरीय ज्ञान के लिए अंग्रेजी पढना अनिवार्य हो जाता है....क्‍यों विषय विशेष की जितनी जानकारी अंग्रेजी में मिल सकती है , वह हिन्‍दी में नहीं है....हिन्‍दी में हर प्रकार की पुस्‍तकों के उपलब्‍ध होने से यह समस्‍या कम हो सकती है।

अंशुमाली रस्तोगी का कहना है कि -

मुझे लगता है राजकिशोर को यह बात पहले खुद से पूछनी चाहिए क्योंकि बुद्धिजीवि तो वह भी है। वह किस तरह और किस कद के बुद्धिजीवि हैं, यह हम सब जानते हैं। वैसे यह हकीकत है कि हिंदी साहित्य का बुद्धिजीवि बेहतर शातिर और समझौतापरस्त है।

Suresh Chiplunkar का कहना है कि -

मुझे तो बुद्धिजीवी शब्द ही अटपटा सा लगता है, "बुद्धिजीवी"(?) यानी क्या बाकी के सब लोग बिना बुद्धि के जीवन यापन कर रहे हैं? और ये तथाकथित बुद्धिजीवी आम आदमी की भाषा में तो बोलते-चालते नहीं हैं, फ़िर यह जन-बुद्धिजीवी कैसे हो गये? जो भी साहित्य या लेखन आम आदमी की समझ में आये, उसे उद्वेलित करे, उसकी समस्याओं को समझे और हल करने का उपाय सुझाये, उसके दिल को छू ले, वही साहित्य "जन-बुद्धिजीवी" कहलाने लायक है… बाकी चन्द गोष्ठियों, सेमिनारों में भाग लेने भर से कोई बुद्धिजीवी नहीं हो जाता…

डॉ .अनुराग का कहना है कि -

केवल साहित्य का बुद्दिजीवियों पर मौलिक अधिकार है ...मुझे ऐसा नही लगता ...सिर्फ़ इसलिए की उनके पास अपनी बात पहुचाने के लिए एक सोत्र है...पर शायद सूचना के विस्फोटक रूप में उपलब्ध होने से ओर अभिव्यक्ति के कई माध्यम होने से अनजाने में इस नस्ल (बुद्धिजीवियों )की भी बाद सी आ गयी है .वैसे भी अब कई लोगो के निजत्व बाहर आने से उनका व्यक्तित्व रौशनी में आने से वैसे भी उनका बौधिक रूप अब उतना असर नही छोड़ता ...

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

लेख के द्वारा बात छेड़ने के लिए धन्यवाद |
मेरे विचार -
१. भाषा ज्ञान को बाँध नही सकती | और ज्ञान किसी भाषा का नही होता |
इसलिए किसी भी भाषा से विरोध होना ही नही चाहिए |

२. देश और समाज की तरक्की आपनी भाषा में सरलता से हो सकती है | इसलिए हमें हिन्दी और अन्य भाषाओँ को संवर्धित कर बढ़ाना चाहिए |

३. अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में आगे आने के लिए अंग्रेजी जानना होगा | लेकिन हिन्दी को भूलना नही होगा |

४. हिन्दी के प्रति हीन और हतास भावना हटानी ही होगी |

यदि अंग्रेज अपनी भाषा को बल पूर्वक संसार में फैला सकते हैं तो हम प्रेम पूर्वक हिन्दी का प्रचार क्यों ना करें |

मेरी कुछ पंक्तियाँ -

भारत की है आशा हिन्दी ,
प्रगति - पथ की अभिलाषा हिन्दी,
संकृति की अभिव्यक्ति हिन्दी ,
संस्कारों की अनुभूति हिन्दी ,
मै तेरा तू मेरी हिन्दी, मै तेरा तू मेरी हिन्दी |


अवनीश तिवारी

शोभा का कहना है कि -

हा हा हा बात तो सही कही है।

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

abhi kuchh kah paane ki sthiti mein nahin hu.....
ALOK SINGH "SAHIL"

Tarkeshwar Giri का कहना है कि -

किशोर जी बहुत अच्छा लिखा है आपने, लेकिन क्या किया जॉय आज कल तो पूरी दुनिया ही इंग्लिश भाषा के साथ साथ एक dusare के karib है. ab aap mujhe hi dekh li jiye, likhane ki koshis to Hindi main kar raha hun magar aadhi Hindi to aadhi Enlish main likh paa raha hun lekin yah to katu sataya hai ki, English to barsati nadi hai aane wale samay par duniya wale apne bol chal ki basha ko Hindi mai le aayenge . Baki abhi sachmuch bahut mehnat karni hai HINDI KE LIYE

चारु का कहना है कि -

राजकिशोर जी.. मैं सुशांतजी की बातों से सहमत हूँ ।
मेरा मानना है कि सिर्फ हिंदी में ही नही बेहतर ज्ञान के लिए अन्य भारतीय भाषाओं में भी लेखन होना चाहिए। हिंदी लेखन को बढ़ावा मिले ये ज्यादा ज़रूरी है, अंग्रेजी का विरोध नही।

चारु का कहना है कि -

राजकिशोर जी.. मैं सुशांतजी की बातों से सहमत हूँ ।
मेरा मानना है कि सिर्फ हिंदी में ही नही बेहतर ज्ञान के लिए अन्य भारतीय भाषाओं में भी लेखन होना चाहिए। हिंदी लेखन को बढ़ावा मिले ये ज्यादा ज़रूरी है, अंग्रेजी का विरोध नही।

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