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Saturday, September 12, 2009

फूहड़ चुटकलों से कितनी देर हंस पाएगा आम दर्शक?


कई दिन से इक अजीब-सी उधेड़बुन में हूँ, कि ये किस तरह कि फिल्में बन रही हैं, ना कहानी, ना पटकथा, ना ही कोई ढंग का संगीत, गीत के तो क्या कहने, फिर भी लोग देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं, और इक तरफ जो अच्छी फिल्में बन रही हैं उन्हें कोई घास भी नहीं डालता.. बल्कि अब तो इक नया चलन चला है, फिल्में सीधा डीवीडी से बाज़ार में उतरने का. चलो ये भी ठीक ही है, कम से कम फालतू के खर्चे से तो बचे, और जो कमाया, कुछ जरुरी खर्चों के बाद, सीधा जेब में, लेकिन इक बात जो इन सब की आपाधापी में समझ नहीं आती वो ये है कि आज दर्शक देखना क्या चाहता हैं.
चटपटी फिल्में, डेली सो़प, कॉमेडी या कुछ और.. और जैसे रियलिटी शो...
कमाल की बात है, लोग कहते हैं व्यस्तता बढ़ गई है, इस लिए डेली सो़प देखने का मन नहीं करता, कौन कहानी के चक्कर में पड़े, कॉमेडी भली है, इक बार में ख़त्म तो हो जाती है, पर कोई ये पूछे कि अगर इक बार में ख़त्म हो जाती है तो फिनाले के इन्तेज़ार में काहे को रहते हो भैया, और कॉमेडी भी किस तरह की, कॉमेडी के नाम पर बेहूदा मज़ाक हो रहा है, आज इक कॉमेडी शो चल रहा था, जिसमें मज़ाक हो रहा था की जनाब का पेट खराब है और वो अपनी प्रेमिका का दरवाजा खटका रहे हैं की प्रिय दरवाज़ा खोल दो वरना मेरी पतलून खराब हो जायेगी. अब कहिये ये किस तरह का बेहूदा मज़ाक है.
फिल्में भी तीन घंटे में ख़त्म हो जाती हैं, पर ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं, जो कि फिल्म को सच में देखने जाते हैं, इक सर्वे में बताया गया कि लगभग ४० प्रतिशत लोग तो यूँ ही घूमने के मकसद से पैसा बर्बाद करते हैं, २५ प्रतिशत पॉप कॉर्न का मज़ा लेने या दोस्तों के साथ चले जाते हैं, और जो बचे बाकी तीस प्रतिशत लोग, उनकी सुनता कौन है, बस धूम धड़ाका संगीत और हो गई पिक्चर हिट. कितने ही दिन हुए कोई गीत दिमाग पर नहीं छाया, वरना जब तक कोई फिल्म देखें और उसके गीत ज़हन में ना घूमें तो बात नहीं बनती, कोई बात, कोई सीन, कुछ भी तो याद नहीं रहता और फिल्म को मिलते हैं पांच स्टार, लोगो कि भीड़ को देख कर या जाने किस बात पर.
डेली सो़प लोग देखना पसंद नहीं करते पर फिर भी देखते उसी को हैं, कहने को सभी कहते हैं कि वही सास-बहू का ड्रामा, वाही रोज़ की चिकचिक. फिर भी 75 फीसदी घरों में सात बजते ही अगर कुछ चलता है तो वो हैं डेली सो़प और रात ग्यारह बजे से पहले तो ख़त्म होने वाले नहीं, अब श्रीमती जी का बहाना करें या और कुछ देखते तो सब वही हैं, वरना अगर ना देखें तो डेली सो़प का बाज़ार इतना गर्म कैसे हो.
रियलिटी शो की तो बात मत पूछिये. कोई पूछे कि क्या ये ड्रामा नहीं है. किसी को सोने नहीं दिया जाता तो किसी को अपशब्द सुनाये जा रहे हैं, खुलेआम, कहीं कोई स्वयंवर हुआ तो सभी को स्वयंवर का चस्का लग गया, फिर चाहे वो किसी का भी हो, चाहे लोग उसे पसंद ना करें पर बातें फिर भी उसी की करते हैं, देखा जाये तो रियलिटी शो भी किसी सास-बहू के ड्रामे से कहीं कम नहीं हैं, फर्क इतना है कि किरदार अलग हैं, और अब तो सास-बहू भी रियलिटी शो करेंगी, तो कहीं सासबहू ढूँढने निकली हैं रियलिटी शो के जरिये.
और इन सबसे बढ़कर सबसे बुरा हाल है, न्यूज़ चैनलों का, न्यूज़ यानि के समाचार.. देश-विदेश की खबरें.. देश में क्या चल रहा है इस बारे में जानकारी, लेकिन क्या ये सब हो रहा है चैनलों पर, नहीं.. बल्कि उनपर तो चल रहा है, कि एक-दूसरे कि टांग कैसे खीची जाए, किसी शो को पकड़ लिया तो उसे बंद करा के ही छोडेंगे, बस तीन तीन घंटे तक वही चलता रहता है, शो ने दर्शकों के घर बर्बाद कर दिए, कोई इनसे पूछे क्या दर्शक बेवकूफ हैं, कि इक शो से अपना घर बर्बाद कर लेंगे, और अगर ऐसा है तो मत देखो ना, किसी ने जबरदस्ती तो नहीं की आपके साथ, अजीब है हमारा दर्शक वर्ग भी, देखेगा और फिर बुरा भी कहेगा.
इक न्यूज़ चैनल पर इक कार्यक्रम देखा जिसमें इक घंटे की इक ख़ास कहानी दिखाई जाती है, कि हीरो अपनी प्रेमिका के कहीं और ब्याहे जाने पर सबका खून कर देता है, कहिये, क्या सीखेगा फिर हमारा समाज इस तरह के कार्यक्रमों से, और क्या ये खबर है, या चटपटा मसाला, सिर्फ अपने चैनल चलाने के लिए, यूँ ही तो इनकी टीआरपी बढती है !
कुल मिलकर, लोगो को कहानी, खबर, देश से कोई ख़ास सरोकार नहीं है, ना ही फर्क पड़ता है कि चल क्या रहा है, बस मसालेदार कुछ हो जाये.
मेरी नानी कहा करती थी अपनी ख़ास हरयाणवी शैली में "बस रोला रुक्का चाहिए" यही कुछ दीखता है आज के दर्शक वर्ग के साथ भी.
सबको मसाला चाहिए और वो भी शॉर्टकट में...

(सिनेमा हॉल की जगह मल्टीप्लेक्स लेते जा रहे हैं और आगे की सीट का दर्शक गायब होता जा रहा है....दीपाली की टीस के साथ इस वीडियो को देखना भी आपको शायद अच्छा लगे....)

दीपाली 'आब'
(दीपाली कविताएं भी लिखती हैं। हिंदयुग्म पर कविताएं भी भेजती रही हैं। बैठक पर ये इनका पहला लेख है)

Saturday, July 11, 2009

धुँआ होती जिन्दगी...



नशा कोई भी हो, हर हाल में नुकसानदेह है. लेकिन सिगरेट पीना एक ऐसा नशा हैं जो पीने वालों के साथ-साथ ना पीने वालों को भी अपना शिकार बनाता है. सिगरेट से निकलता धुआँ सैकड़ों लोगों की जिन्दगियों में अँधेरा कर देता है. टी.बी, फेफडों का कैंसर, मुँह का कैंसर आदि बीमारियाँ तथा प्रजनन क्षमता में कमी जैसे भयानक परिणाम सामने आते हैं. किन्तु आज समाज में "हर फिक्र को धुँए में उड़ाने" की प्रवृति जन्म ले चुकी है. सिगरेट पर रोक लगाने के लिये कई कानून भी बनाये गये हैं, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों में सिगरेट पीना कानूनन अपराध है. ऐसा करने पर जुर्माना तथा सजा हो सकती है. लोगों को जागरूक करने के लिए सिगरेट के पैकेट पर बड़े-बड़े अक्षरों तथा चित्रों में चेतावनी दिये जाने का कानून बना है. यहाँ तक की अट्ठारह साल से कम उम्र के लोगों को सिगरेट न बेचना तथा स्कूल/कालेजों से सौ ग़ज की दूरी तक सिगरेट की कोइ भी दुकान न होना कानून लागू किया गया है.

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या केवल कानून बनाना देना ही इस समस्या का हल है. कानून तो पहले भी बने थे उनका नतीजा क्या निकला, कुछ नहीं. जब तक कानून को पूरी इमानदारी से लागू ना किया जाए, हल निकल भी कैसे सकता है. आप अपने आस-पास कितने ही उदाहरण देख सकते हैं जहाँ स्वयं पुलिस वाले ही कानून की धज्जियां उड़ाते हुए मिल जायेगें. बसों में लिखा होता है कि "धूम्रपान निषेध है" लेकिन वहाँ कंडक्टर और ड्राइवर ही सिगरेट पीते मिल जायेगें तो वो दूसरों से क्या कहेगें ?

खै़र यहाँ मेरा मक़सद कानून को कोसना नहीं है वरन लापरवाहियों की तरफ ध्यान दिलाना था. अगर सरकार सही में सिगरेट मुक्त वातावरण चाहती है तो उसे समय-समय पर नशा मुक्त कैम्प लगाने चाहिये और लोगों को नशे से मुक्त होने में मदद करनी चाहिये.

दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

Friday, July 03, 2009

बोर्ड खत्म करने से क्या हासिल होगा?


आजकल बोर्ड का इम्तहान चर्चा का विषय बना हुआ है. हो भी क्यों ना, भई इसी से तो बच्चों के भविष्य की डोर बँधी हुयी है. इस विषय में सभी ने अपने-अपने विचार रखे. किसी ने बोर्ड परीक्षा को बच्चों पर बोझ और आत्महत्या का कारण बताया तो किसी ने कहा कि परीक्षा बच्चों को मज़बूत बनाती है साथ ही आगे आने वाली परीक्षाओं के लिये तैयार करती है.मुझे दोनों ही वर्गों की बातें अपनी-अपनी जगह ठीक लगीं. मैं यहां विस्तार से कहना चाहूंगी. जो लोग बोर्ड की परीक्षाओं को आत्महत्या का कारण मानते हैं उन्हें ये भी जानना चाहिये कि आखिर बोर्ड की परीक्षा आत्महत्या का कारण क्यों बनती है. यहां कई कारण हैं जैसे कि--माँ-बाप की उम्मीदें, शिक्षकों का व्यवहार और कापियाँ चैक करने की तथा रिजल्ट बनाने की प्रक्रिया में गलतियां.
अगर हम पहला कारण देखें तो सभी इस बात से सहमत होगें कि आजकल ज्यादातर माँ-बाप अपने बच्चों से कल्पना चावला, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा़ आदि जैसे कई आइकॉन की तरह बनने की उम्मीदें लगाते हैं, बच्चे की उम्र, रूचियाँ और उसकी मानसिक तथा शारीरिक क्षमता को अनदेखा करते हुए हर वो काम करवाने की कोशिश करते हैं जो बच्चे की सामर्थ्य से बाहर होता है. दूसरों की होड़ में हाई प्रोफाइल स्कूलों में दाखि़लाकरवाते हैं, चाहे बच्चा वहाँ सीखने की बजाय जो आता है वो भी भूल जाये. लेकिन उन्हें तो अपने बच्चे को जीनियस बनाना होता है.
दूसरामहत्वपूर्ण कारण है, बच्चों की क्षमता. जब भगवान ने इतने सारे इंसान बनाये हैं तो जाहिर है कि हर किसी की मानसिक वा शारीरिक क्षमता भी अलग-अलग होगी. इसी तरह उनमें गुणों तथा अवगुणों में भी अंतर होगा. अगर हम अपनी क्षमता के विपरीत कार्य करेंगे तो नतीजा गलत ही होगा. कहा गया है कि "जाको काम वाही को साजे ,कोइ और करे तो डंडा बाजे".यानि बच्चों को उनकी रूचियों, शारीरिक व मानसिक क्षमता के अनुसार ही विषय चुनने दें. साथ ही उनकी कमियों को सुधारने की कोशिश की जाये ना कि उनका मजाक बनाये और दुत्कारें.
तीसराकारण है शिक्षकों का व्यवहार. मैं इस कारण को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानती हूँ. वो इसलिये घर-आँगन से निकलकर जब बच्चा स्कूल जाता है तो शिक्षक ही उसका अभिभावक होता है. बच्चे के सम्पूर्ण विकास में शिक्षक का बहुत ज्यादा योगदन होता है. बच्चे शिक्षक पर अंधविश्वास करते हैं चाहे वो सही बताये या गलत. आपने कई बार देखा होगा ,अगर हम शिक्षक द्वारा बतायी गयी किसी विषय की गलती को सुधारने का प्रयास करते हैं तो बच्चे मानने से साफ़ इंकार कर देते हैं, क्योंकि बच्चों को उन पर पूर्ण विश्वास होता है. अत: उन्हें गलत जानकारी न दें. इसी तरह शिक्षक का डाँटना-फटकारना, उत्साह बढ़ाना आदि बातें भी बच्चों के नाजुक मन पर असर डालती हैं. शिक्षकों को ध्यान में रखना चाहिये कि हर बच्चे की मानसिक क्षमता एक जैसी नहीं होती और हर बच्चे की पारिवारिक, शैक्षिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमि भी अलग होती है. ऐसे में केवल होशियार बच्चों पर ध्यान देना, कमजोर बच्चों को मारना-पीटना, उनका मजाक बनाना आदि भी बच्चों को अंधकार में ढकेलने का काम करता है.
अब मैं बात करती हूँ चौथे कारण की. कापियाँ चैक करना तथा रिजल्ट बनाना बहुत ही जिम्मेदारी का काम है. इन पर बच्चों का भविष्य टिका होता है. शिक्षकों की जरा सी लापरवाही हजारों बच्चों के भविष्य तथा जिन्दगियों के साथ खिलवाड़ कर सकती है. इससे हम अच्छी तरह वाकि़फ हैं आज बोर्ड की परिक्षाओं में प्राइमरी विद्यालयों के शिक्षक तक कापियां चैक करते हैं. उन्हें ना तो विषय की जानकारी होती है और ना ही वो उस स्तर के होते है जो कि बोर्ड की कापियां चैक कर सकें. उऊपर से ज्यादातर शिक्ष्क कापियां चैक करने के लिए संजीदा कम ,उससे मिलने वाले पैसे के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं. ऐसे में जल्दबाजी में चैक की गयी कापियां क्या रिजल्ट देगीं कहने की जरूरत नहीं है. यही नहीं हमने कइ बार कापियां गायब होने, कूड़े में पायी जाने आदि की भी ख़बरें पढ़ी सुनी हैं यह भी बच्चों के रिजल्ट पर असर डालती हैं. आजकल बोर्ड के रिजल्ट में बहुत ही ज्यादा गल्तियां सामने आ रही हैं. इसी के चलते कई बार बच्चों ने आत्महत्या की है और बाद में पता चला है कि वो बच्चे फर्स्ट क्लास पास हुए थे.
अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि बोर्ड परीक्षा का ना कराया जाना समस्या का हल नहीं है बल्कि इससे जुड़े कारणों में सुधार लाने की आवश्यकता है. बच्चों को मानसिक रूप से सशक्त बनाया जाये साथ ही उन्हें परीक्षाओं से डराने की बजाय परीक्षा के लिये तैयार किये जाने की जरूरत है. जीवन में पग-पग पर एक परीक्षा है वो कहाँ-कहाँ से भागेगें. इसलिए मेरा यह निवेदन है कि बच्चों के भविष्य के साथ-साथ देश के भविष्य से खिलवाड़ ना किया जाये. अगर नींव ही कमजोर होगी तो इमारत कहाँ से खड़ी होगी.

दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

Saturday, June 27, 2009

बाग़-ए-बाहू सुभानअल्लाह....



बाहू का किला जम्मू की सबसे पुरानी इमारत है. यह शहर के मध्य भाग से ५ किलोमीटर दूर तवी नदी के बांए किनारे स्थित है. कहते है कि यह किला ३००० वर्ष पूर्व राजा बाहूलोचन ने बनवाया था. लेकिन बाद में डोंगरा शासकों ने इसका नवनिर्माण तथा विस्तार किया. खूबसूरत झरनों, हरे-भरे बाग तथा फूलों से भरे हुए इस किले की शोभा देखते ही बनती है. ऐसा लगता है जैसे कि इससे खूबसूरत जगह पहले कहीं ना देखी हो. बाहू के किले को महाकाली के मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर किले के अंदर ही है तथा भावे वाली माता के नाम से प्रसिद्ध है. सन १८२२ में महाराजा गुलाबसिंह के राजा बनने के तुरंत बाद बनाया गया था. इस मंदिर की महत्ता वैष्णो देवी मंदिर के बाद दूसरे नंबर पर है. बल्कि यह काली माता का मंदिर भारत के प्रसिद्ध काली मंदिरों में से एक है. किले के अंदर दूर तक फ़ैला हुआ खूबसूरत बाग है. इसे ही लोग बाग-ए-बाहू नाम से जानते है. इस बाग कि संरचना और प्राकृतिक सुंदरता इतनी अनोखी है कि मन मयूर नृत्य करने लगता है.
तरह-तरह के फव्वारे, सीढ़ीनुमा संरचना इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देती है. प्राकृतिक सुंदरता से ओत-प्रोत यहां का माहौल आपको मुग्ध कर देता है और यहां से जाने का मन ही नही करता. यहां का जादुई वातावरण हजारों लोगों को आकर्षित करता है. इसलिये यह एक पिकनिक स्पाट भी बन गया है. आप चाहें पिकनिक के लिए आयें या फिर एक बार देखने के लिये, इस बाग की खूबसूरती से आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकेंगे.
दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

Friday, June 19, 2009

भक्ति के नाम पर लूटते हैं पुजारी

दीपाली पन्त तिवारी "दिशा" बैंगलोर में रहती हैं..... बारहवीं कक्षा से ही कविताओं का शौक लगा....शादी से पूर्व शिक्षण कार्य भी किया है और इलैक्ट्रोनिक मीडिया से भी जुडी रही हैं....बरेली के चैनल वी एम दर्पण में न्यूज रिपोर्टर, न्यूज एंकर तथा एंकर भी रही हैं.....आजकल ब्लॉगिंग में जी-जान से जुटी हैं..... अपने ब्लॉग "दिशा" तथा वेबसाइट दैट्स हिन्दी डाट काम, मोहल्ला पर भी पाई जाती हैं...हिंद युग्म से हाल ही में जुड़ने के बाद इन्हें लगता है जैसे इनकी कई खूबियों को राह मिल गयी है. आमीन....


कह्ते हैं कि भगवान श्रद्धा-भक्ति और विश्वास के भूखे होते हैं. श्रद्धा से किया गया स्मरण मात्र भी प्रभु को खुश करने के लिये काफ़ी है. लेकिन उनका बनाया इंसान इन बातों को नही समझता. उसकी नजरों में पैसों के बिना किसी चीज का कोई मोल नही है.
जी हाँ मैं बात कर रही हूँ. वैष्णो धाम तथा ऐसे ही कई तीर्थों की, जहां श्रद्धालु दूर-दूर से अपनी मुरादें पूरी होने की आस लिये प्रभु दर्शन को आते हैं लेकिन वहां आकर उन्हें मिलता है तिरस्कार. 'जय माता दी' के नारों के बीच रास्ते की कठिनाईयों को भुलाते हुए जो श्रद्धालु माता के द्वार पहुँचते हैं, उन्हें क्या पता होता है कि यहां उनके द्वारा लायी गयी भेंट का कोई आदर नहीं अपितु उसे तो कूड़े की तरह एक कोने में फ़ेंक दिया जायेगा और प्रसाद स्वरूप उन्हें धक्के मिलेंगे, प्रभु दर्शन तो दूर की बात है.
इसी तरह अन्य स्थानों पर भी यही हाल है. अब आप जम्मू स्थित रघुनाथ मंदिर का ही उदाहरण ले लीजिये. रघुनाथ मंदिर एक ऐसा धर्म स्थल जो बहुत प्रसिद्ध है. वैष्णो धाम से लौटते हुए हजारों श्रद्धालु जम्मू स्थित इस स्थल पर प्रभु दर्शन के लिये अवश्य आते हैं. रघुनाथ मंदिर की प्रसिद्धता को देखते हुए और आतंकी हमले के बाद यहां चौकसी बढा़ दी गयी है. दरवाजे पर ही पुलिस चौकी है जो सभी आने जाने वालों की तलाशी लेती है ताकि कोइ लूटेरा या आतंकी मंदिर में प्रवेश न कर सके. लेकिन वे यह नही जानते कि असली लुटेरे तो मंदिर के भीतर ही हैं. अब आप सोचेंगे कि मैं किन लुटेरों कि बात कर रही हूं. आजकल पुजारी किसी लुटेरे से कम हैं क्या? यहां मंदिर में प्रवेश करने के बाद पुजारी पाँच सौ तथा हजार के नोट दिखाकर आपको जताते हैं कि आप भी इसी तरह की दक्षिणा उनकी थाली में रखें, यदि आप ऐसा नही करते तो वो आपको खरी-खोटी सुनाने से और तिरस्कृत करने से भी नहीं चूकेंगे. इस मंदिर के प्रांगण में कई अन्य मंदिर भी हैं. अत: लूटने का ये सिलसिला हर मंदिर में होता है. आज सभी तीर्थस्थानों में प्रोफ़ेशनलिज्म इस कदर हावी हो गया है कि लोगों की भावनायें कहीं भी मायने नहीं रखती. तीर्थस्थानों में बैठे पुजारियों को तो अपने नोटों से मतलब. इनका शीश प्रभु के आगे नहीं बल्कि ५०० और १००० के नोटों की हरियाली के आगे झुकता है.
कहा जाता है कि "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी".अर्थात जिसकी जो भावना हो उसे वैसा ही दिखाई देता है. जहां श्रद्धालुओं के लिये पत्थर की मूरत साक्षात प्रभु हैं, वहीं पुजारियों के लिये केवल लूटने का एक जरिया है.

दीपाली तिवारी