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Wednesday, August 04, 2010

टीवी धारावाहिकों की नई उम्मीद 'चांद छुपा बादल में'

लगभग तीस वर्ष पहले दूरदर्शन पर एक से बढ़ कर एक टेली-फिल्में आती थी जिनमें रमेश बक्षी या अन्य अच्छे साहित्यकारों की कहानियों पर भी उच्च-स्तरीय टेली-फिल्में देखने को मिलती थी. राजीव गाँधी के कार्यकाल में मुस्लिम जीवन पर आधारित एक से बढ़ कर एक टेली-फिल्में आई और मुझ जैसे अनेक साहित्य-प्रेमियों के लिए एक क्रेज़ सी बन गयी थी. जब अचानक धारावाहिक शुरू हुए तो देश की जनता के लिए यह एक नई बात हो गई. मनोहर श्याम जोशी का धारावाहिक ‘बुनियाद’ भला कौन भूल सकता है? उस में आज़ादी के समय से लेकर उस दशक तक तीन पीढ़ियों का सशक्त लेखा-जोखा था, आज़ादी के बाद मूल्यों का ह्रास और एक मास्टरजी जी की जिंदगी व उस की पत्नी लाजो जी की जिंदगी... यह सब सचमुच एक nostalgia बन कर रह गया है. तब तो धारावाहिकों पर 13 के पहाड़े का बंधन था कि धारावाहिक 13, 26, 39 आदि एपीसोड में खत्म हो जाए. रामायण-महाभारत धारावाहिक आते ही जनता में तहलका सा मच गया. लोग रास्ते में अपना ट्रक या कोई भी वाहन रोक कर किसी भी रेस्तरां में रामायण व महाभारत देखने बैठ जाते थे. एक जूनून सा था जिस के पीछे बुद्धिजीवियों ने सवाल भी उठाए कि केवल उत्तर प्रदेश वाली रामायण ही क्यों दिखाई जाए. देश में रामायण के 300 रूप हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व शोध कार्य या जनता को यह सूचित करने के लिए कि रामायण के इतने रूप हैं, यह ज़रूरी क्यों नहीं समझा जा रहा कि देश को बौद्ध रामायण भी दिखाई जाए जिसमें राम सीता भाई-बहन हैं. ताकि जनता सभी रूप देख कर स्वयं रामायण पर अपनी धारणा बनाए. पर नहीं, जो बौद्धिक रूप से सही था, उसे राजनीतिक रूप से गलत माना गया और धारावाहिक लोकप्रियता की ओर मुड चले. पर लोकप्रियता व हल्केपन ने ही धारावाहिकों की जान ले ली. एक से बढ़ कर एक स्टंट धारावाहिक बनने लगे. एकता कपूर का धारावाहिक ‘क्यों कि सास भी कभी बहू थी’ शुरू में बहुत सुन्दर तरीके से चला. पर इन सभी धारावाहिकों को उनकी अंत-हीनता मार गई. जब अच्छा मसाला खत्म हो जाए तब जो मर्ज़ी आए परोसते जाओ. अंत में तो ‘क्यों कि सास भी कभी बहू थी’ धारावाहिक बीवियों से उनके मियाँ छीनने वाला धारावाहिक बन गया. पूरे धारावाहिक में तुलसी वीरानी के पति मैहर को तीन औरतें हड़प गई – मंदिरा, मीरा और जूही ठकराल. गंगा से उस के पति साहिल को भी तृप्ति ने छीन लिया. जब मियां छीनने से एकता कपूर उकता गई तो वीरानी परिवार में एक बीबी छीनने वाला भी आ गया जिसने गंगा पर डोरे डाले. अंत-हीनता का दूसरा नाम धारावाहिकों के लिए दिशाहीनता हो गया. लिखने का मसाला खत्म, अब किया किया जाए. जहाँ मर्ज़ी खींचते चले जाओ. हाल ही में जो धारावाहिक इसी मजबूरी के शिकार हुए उन में ‘ना आना इस देस मेरी लाडो’ ‘उतरन’ आदि हैं तथा ‘राजा की आएगी बारात’ में तो एक से बढ़ कर एक स्टंट होने लगे. जिन्हें हम साहित्य कहते हैं वैसा ‘बालिका वधु’ था पर वह भी अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है. हाल ही में स्टार प्लस पर एक नया धारावाहिक शुरू हुआ है : ‘चाँद छुपा बादल में’ जिसे देख एक बार फिर उम्मीद जागी है कि कुछ अच्छा देखने को मिलेगा. धारावाहिक की निवेदिता (नेहा सरगम) की शख्सियत बहुत आकर्षक है. वह बहुत दबी दबी सी रहती है व कहीं भी आने जाने से घबरा जाती है. भाई को पढ़ने ज़्यादा अलग अलग गाड़ियों का बड़ा शौक है. धारावाहिक मूलतः दो परिवारों के बीच का है जिन का अतीत थोड़ा अप्रिय है, इसीलिए निवेदिता के पिता केशव बहुत डिप्रेशन में रहते हैं, बहुत चिड़चिड़े व गुस्से वाले भी हैं. पर जब उस दूसरे परिवार का युवक सिद्धार्थ (अभिषेक तिवारी) इस घर में आना शुरू कर देता है तो निवेदिता उर्फ निवी का बचपन पुनर्जीवित हो उठता है. बहुत साल बाद एक बार फिर नज़दीक आए परिवारों में प्रेम और पिछली कटुता के बीच एक आकर्षक सा संघर्ष शुरू हो जाता है. इस के प्रथम कुछ अंकों में प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर का आ कर प्रस्तुतीकरण देना बहुत आकर्षक लगा. अब यह कहानी पिछली कटुता व वर्तमान प्रेम-सम्बन्ध के बीच बहुत सुन्दर तरीके से आगे बढ़ रही है जिस के कारण एक बार फिर साहित्य-प्रेमी दर्शकों के मन में एक उत्कृष्ट धारावाहिक देखने की उमीदें बंधती हैं. यदि प्रारंभ को देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि धारावाहिक की चाल धीमी है. इस में अभी तक एक प्रसंग बहुत रोचक बन गया जिसमें निवेदिता का पिता केशव बहुत गुस्से में अपने बेटे को चेतावनी देता है कि अगर परीक्षा में 90% से कम अंक आएं तो घर में आने की कोई ज़रूरत नहीं. और बेटा परीक्षा के परिणाम वाले दिन घर आता ही नहीं, गायब हो जाता है. निवेदिता सिद्धार्थ और निवेदिता की चचेरी बहन दिव्या उस खोए हुए भाई की खोज में लग जाते हैं. इस प्रसंग का फिल्माना दर्शकों को बाँध लेता है जिसमें 90% से केवल 1% कम अंक पाने वाला भाई यश एक पहाड़ी की चोटी पर बार-बार आत्महत्या की हिम्मत जुटाने की नाकाम कोशिश में वहीं पस्त सा बैठा मिलता है. धारावाहिक की शूटिंग शिमला में है पर इतनी मनोरम जगह के दृश्य इतने लुभावने नहीं दिखाए गए जितने होने चाहिए. सब के सब दृश्य व सेट एक घुटन से भरपूर से लगते हैं, और वह घुटन शायद दोनों परिवारों के बीच के कटु अतीत के कारण है क्योंकि सिद्धार्थ के पिता भीषण आग में फंस कर मर गए थे और सिद्धार्थ की दादी के मन में यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव बैठ गया है कि उस मौत के जिम्मेदार केशव हैं. अभी तक की सभी सदस्यों की मुलाकातों में केवल अतीत की ही बातें अधिक हो रही है, वर्तमान से यह धारावाहिक अभी जुड़ा नहीं है. अतीत भी फ्लैश-बैक में कम और बातों में अधिक आता है. अभिनय के स्तर पर भी यह कटु बात कहनी पड़ती है कि निवेदिता के परिवार के सभी सदस्य दिव्या, दिव्या की माँ, निवेदिता का भाई, पिता ये सब के सब अभिनेता अपना काम बहुत प्रभावशाली तरीके से कर रहे हैं. पर उधर सिद्धार्थ के अतिरिक्त कोई भी अभिनेता अधिक प्रभाव नहीं छोड़ पाता जैसे सिद्धार्थ के दादा दादी, माँ, व दूसरे सदस्य अपने अभिनय व शख्सियत द्वारा बाँध नहीं पाते. किसी किसी परिस्थिति में पात्रों की भरमार सी भी लगती है. पर कुल मिला कर एक से अधिक एक घटिया धारावाहिकों के माहौल में एक क्षमताशील धारावाहिक प्रारंभ हुआ है जो स्टार प्लस पर सोमवार से शुक्रवार रात 8 बजे आता है (वही एपीसोड दोबारा रात 11 व 1230 बजे तथा अगले दिन 3 बजे आता है). इस से हम एक बार फिर एक धारावाहिक में उम्मीद रख सकते हैं कि वह अनावश्यक लंबाई का शिकार हो कर भटकेगा नहीं और न ही किसी स्टंटबाज़ी में फंसेगा.

प्रेमचंद सहजवाला

Tuesday, July 27, 2010

क्या ‘बालिका वधु’ धारावाहिक सचमुच बाल-विवाह के विरुद्ध है?

दूरदर्शन पर अनेकों धारावाहिकों की एक बाढ़ सी नज़र आती है. अक्सर यह भी कहा जाता है कि ये धारावाहिक तो द्रौपदी की साड़ी की तरह लंबे खिंचते जाते हैं. कई एपीसोड चल कर दिशाहीन व उबाऊ से भी हो जाते हैं. ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ जैसे धारावाहिक तो अंततः ऐसे मोड़ पर आ गए जब उन्हें झेलना भी मुश्किल हो गया था. फिर भी एकता कपूर का तुर्रा यह कि वह पहुँच गई थी अदालत, कि धारावाहिक बंद न किया जाए. अदालत ने उसे उलटे पाँव लौटा दिया.
                                                            धारावाहिक ‘बालिका वधु’ जब शुरू हुआ तो मुझे चारों तरफ से अपने संबंधियों परिचितों से सन्देश आने लगे कि यह धारावाहिक साहित्यिक उपन्यास जैसा लगता है, इसे ज़रूर देखो, और मैंने इसे बड़े चाव से देखना शुरू किया, शुरू में इसे बेहद पसंद भी किया. राजस्थान में आखा तीज के दिन सामूहिक बाल विवाह होते हैं, जिस की तरफ समाज सुधारकों का ध्यान नहीं गया. सरकारें कुछ हद तक कोशिशें करती रही पर जब तक मानसिक रूप से कोई समाज नहीं बदलेगा तब तक कितने भी कड़े क़ानून बन जाएँ, समाज नहीं सुधर सकता, चाहे वे खाप पंचायतों के निर्दयी आदेश हों, चाहे Honour killings के अभिशाप. ये सब समाज में बने रहेंगे, जब तक कोई महापुरुष इन समाजों का हृदय ही परिवर्तित न कर के रख दे. राजस्थान में कहते हैं कि यदि हम बच्चों की शादियाँ न करें तो देवता नाराज़ हो जाएंगे और देवताओं के कोप के रूप में न जाने कौन सा अनर्थ हम पर आन पड़ेगा. राजा राम मोहन रॉय ने जब सती प्रथा के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया तो ब्रिटिश से केवल क़ानून ही नहीं बदलवाया, वरन दिन रात एक कर के गांव गांव जा कर लोगों की सुषुप्त चेतनाओं को झकझोरा, उन का मन बदला था. यहाँ तो यह हालत है कि राजस्थान में ‘सती महिमा’ पर भी लोग उच्च न्यायालय गए थे कि सरकार होती कौन है, हमें सती महिमा पर उत्सव करने से रोकने वाली. बहरहाल, बात तो ‘बालिका वधु’ धारावाहिक की चल्र रही थी. इस धारावाहिक में एक अबोध बालिका आनंदी का बचपन में ही ब्याह तय हो जाता है. ब्याह होता क्या है, यह उस बच्ची को पता ही नहीं. वह माँ से यह खबर सुनते ही आस पड़ोस में दौड़ी दौड़ी चली जाती है. जो जहाँ बैठा या खड़ा है, सब को खुशी से बताती जाती है – ‘मेरा ब्याह तय हो गया... मेरा ब्याह तय हो गया...’. पर जिस घड़ी सासरे जाना होता है, तब सचमुच रोने लगती है. उस की कोई टीचर पुलिस लाती है, पर आनंदी इस सारे घटनाचक्र की विभीषिका से डर कर केवल इतना ही समझ पाती है कि यदि पुलिस को पता चल गया कि उस का ब्याह हो रहा है तो पुलिस उस के बापू को पकड़ लेगी, और वह टीचर की इस चेतावनी के बावजूद कि झूठ बोलने वालों की नाक फूल जाती है, पुलिस से झूठ बोलती है. उधर टीचर को गांव छोडना पड़ता है क्यों कि गाँव के लोग उस के घर में ही तोड़-फोड़ कर के उस के घर को तहस-नहस कर डालते हैं. ये सब बहुत वास्तविक और प्रभावशाली लगा. कुछ वर्ष पहले ‘स्टार न्यूज़’ पर जब मैंने एक खबर सुनी कि बाल विवाह रुकवाने की कोशिश करने वाली एक महिला के हाथ ही काट दिए गए, तब रूह सचमुच, अविश्वसनीयता के मारे काँप गई थी. इसलिए इस धारावाहिक की साहित्यिक सामाजिक गहराई को मैं पहचान गया था. गांव के पिछड़ेपन की सूरत चंपा नाम की एक लड़की की व्यथा कथा से पता चलती है. बचपन में ही चंपा की शादी तय हो गई थी, पर चंपा अपने मंगेतर के ही एक हमनाम लड़के के साथ भाग गई और वापस आई तो बर्बाद सी हालत में थी क्यों कि वह माँ बनने वाली थी और उस का प्रेमी भाग चुका था. किशोरावस्था की अबोधता में की हुई भूल के कारण जिस स्थिति में चंपा पहुँच चुकी थी, उस में उस का सहारा बनना तो दूर, पूरा गांव अपने सरपंच की शरण में आ खडा हुआ कि अब क्या किया जाए. सरपंच उस समय दरिंदगी की एक प्रतिमा सा लगता है और घोषित करता है कि चंपा को मार डालने में गांव का एक एक व्यक्ति अब उस का साथ देगा. पूरा गांव दौड़ पड़ता है, उस अभागी लड़की की खोज में जो एक मंदिर में भयभीत, कांपती सी छुपी है और आनंदी जैसी कुछ सहेलियों की मदद से ही गांव से भाग जाती है. सासरे में आनंदी के पति की ज़ालिम दादी सा कल्याणी है, जो पिछड़े हुए गांवों के ज़ालिम समाज की गली सड़ी प्रथाओं की ही प्रतीक है. जो समाज अपनी ही बालिकाओं पर न जाने कैसे कैसे ज़ुल्म ढाता है, कोई परम्पराओं के नाम पर तो कोई देवताओं के नाम पर. आनंदी अपने पति जगदीसा के साथ एक ही मेज़ पर खाना नहीं खा सकती. पहले उस का बीं (पति) खाना खाएगा, फिर उस की जूठी प्लेट में बींदड़ी (पत्नी) खाएगी. ये सब तो आनंदी को सहना ही पड़ा. पर गांव की किसी बाल विधवा को चूडियां पहनाने के जुर्म में आनंदी को दादी सा रात भर कोठरी में बंद कर देती है. उस के सास-ससुर या पति या ताई उसे निकाल न सकें, या पानी तक न पहुंचाएं, इसलिए बंद कोठरी के बाहर कुर्सी डाल कर बैठ जाती है दादी सा. पिछले 500 एपिसोड में आनंदी पर हो रहे अत्याचारों का एक लंबा सिलसिला है, जिस में कोई बड़ी उम्र की बहूरानी भी शायद जीते जी मर जाए. आनंदी को स्कूल में पढ़ने नहीं दिया जाता, जब कि पढ़ने में वह बहुत प्रखर है, पूरे स्कूल के सभी विद्यार्थियों में. कभी किसी भूल पर उसे घर से निकाल कर मायके भेज दिया जाता है, वह भी दूसरे गांव में जाने के लिए अकेले ही बस में चढ़ा दिया जाता है. जब उस की टीचर कुछ साल बाद अचानक गांव आती है और उस के घर किसी उत्सव में शामिल होती है तो वह सब के सामने इस बात का भांडा भी फोड़ती है कि कल्याणी देवी (दादी सा) ने उस की किताबें खुद आनंदी से ही जलवा दी हैं. यही नहीं, पिता की मार खा कर आनंदी का किशोर पति गांव से भाग कर मुंबई चला जाता है और वहां किसी अपराधी गिरोह में फंस जाता है जो बच्चों के शरीर के अंग काट कर उन्हें भिखारी बना देता है. वहां भी आनंदी ही पहुँचती है ससुर के साथ और पति को अपराधियों की गोली से बचा कर खुद अपने सिर पर गोली झेलती है. पर दादी सा को इतनी बड़ी घटना के बावजूद बींदड़ी पराई और ज़ुल्मों की हक़दार ही अधिक नज़र आती है. आनंदी के बीमार हो चुके होने का बहाना बना कर वह चुपके चुपके जगदीसा का दूसरा विवाह भी करवा देती है जहाँ से महापंचायत के ज़रिये ही जगदीसा को दूसरी पत्नी से छुटकारा मिलता है. आनंदी की तरह और भी बहू-बेटियां हैं जो एक नारकीय जीवन जीती हैं. जैसे दादी सा की अपनी ही पोती सुगना जिस का पति गौने वाले दिन ही डाकुओं की गोली का शिकार हो कर मर जाता है. सुगना क्यों कि विधवा हो चुकी है, इसलिए उसे कोठरी में एक ज़लील सी जिंदगी जीनी पड़ती है, जहाँ वह फर्श पर सोए और अपना खाना खुद बनाए. दादी सा के बड़े सुपुत्र की पहली पत्नी कुल का चिराग जनने की प्रक्रिया में उस चिराग के बचने की उम्मीद में शहीद हो जाती है तो दादी सा उस बड़े पुत्र का ब्याह उस से भी बीस वर्ष छोटी लड़की से करा कर आती है. ये सब के सब एक अभिशप्त जीवन जीने को बाध्य हैं. पर सवाल ये है कि इतने अत्याचार सहने के बावजूद आनंदी का पिता खज़ान सिंह आनंदी को अपने सासरे से वापस मायके ला का उस संबंध को तोड़ क्यों नहीं सका. आनंदी तो दिन-ब-दिन सासरे से जुड़ती चली जाती है. वह जब आई तो अबोध थी पर पांच साल बीतते न बीतते वह मूर्खता की सीमा तक अबोध बन जाती है और खुद ही घोषित करती है कि क्यों कि दादी सा को मेरा पढ़ना अच्छा नहीं लगता, इस लिए मैं आगे ना पढूंगी. जगदीसा से इस कदर अटूट तरीके से जुड गई सी दिखती है आनंदी कि अब उस से बिछोह के समय उसे स्वयं पर कोई बहुत बड़ा अत्यचार सा होता लगता है. क्या आनंदी का इस कदर सासरे से अति प्यार करना और पति से बुरी तरह भावनात्मक स्तर तक जुड़ जाना बाल विवाह करवाने वालों की हिम्मत नहीं बढ़ाएगा? आनंदी हर मुसीबत सह कर भी अपने सासरे में खुश बल्कि बेहद खुश सी नज़र आती है. यदि पहली बार जब उसे किसी गलती के कारण मायके भेज दिया गया तभी वह न लौटती और अपने पिता के पास रह कर पढ़ लिख कर बड़ी होती तब उसे अपने फैसले स्वयं लेने की पूरी आज़ादी होती और उसे बचपन में हुआ वह विवाह महज़ एक मूर्खता ही लगता. पति जगदीसा भी बड़ा हो चुका होता और यदि ये दोनों बचपन के पति-पत्नी युवा हो कर पिछला सब भूल कर अपने अपने समाज में कहीं अन्यत्र प्यार कर बैठते तो? तब क्या समाज की आँखें न खुलती कि इन के प्यार करने की, अपना पति स्वयं चुनने की उम्र तो अब आई है, और वह बचपन वाली शादी सचमुच व्यर्थ सी है जिस में अत्याचारों से लड़ने की कोई चेतना तक बचपन में असंभव है. युवा आनंदी जिस से प्यार करती, बराबरी के स्तर पर करती और अपने ससुराल में वह पति के साथ एक ही मेज़ पर खाना खाती. सास-ससुर की इज्ज़त करती पर अपनी शर्तों पर जीती. दादी सा जैसी ज़ालिम औरत को दो टूक जवाब देती या उस के विरुद्ध विद्रोह करती. कोई कह सकता है कि धारावाहिक में इतनी सारी बालिका-वधुओं की जिंदगी दिखा दी गई तो धारावाहिक विफल कैसे हुआ. पर यह पूरा धारावाहिक आनंदी पर इतना अधिक फोकस करता कि बाकी सब बातें अनायास ही बेहद गौण हो जाती हैं. पिछले 10-15 एपिसोड में तो पति के प्रति आनंदी का जूनून सीमा पार कर गया है. जगदीसा और आनंदी का प्रेम वयस्क जोड़ों को भी मात कर देता है. पांच वर्ष के लिए मायके भेज दिए जाने पर आनंदी की पति के लिए असह्य तड़प और पति का स्कूल से ही बिना किसी को बताए अपने गांव जैतसर से आनंदी के गांव बेलारिया आ जाना. और रेगिस्तान में दूर से करीब आते हुए आनंदी और जगदीसा को जिस तरीके से स्लो कैमरा में फिल्मांकित किया गया है, वह सचमुच किसी वयस्क जोड़े की प्रेम कहानी सा लगता है. आनंदी का frustration तो कहीं भी नज़र नहीं आता. बाल विवाह के कारण आनंदी की कोई क्षति भी हुई होगी, यह कहीं द्रष्टव्य ही नहीं है. बल्कि मायके में एक मंदिर की तरह उस ने सब की तस्वीरें सजा रखी हैं और खाना खाते समय पहले पति को भोग भी लगाती है. वह बावलियों की तरह एक एक तस्वीर को देख पहाडा सा रटती है – ये सासू माँ ... ये बापू सा ...और ये? रेगिस्तान में 5 वर्ष प्रतिदिन दूर तक इंतज़ार में देखते देखते उस की पथराई आँखें और एक छोटी सी सहेली के पूछने पर कि किसी का इंतज़ार कर रही हो क्या, उस का कहना कि 5 साल से इंतज़ार ही तो कर रही हूँ. यह सब देख कर लगता है कि नायक- नायिका की केवल उम्र छोटी है, बाकी सब तो किसी जनम जनम के साथ की प्रेम कहानी जैसा लगता है. धारावाहिक में बीच में लम्बाई प्राप्त करने के लिए स्टंट प्रसंग भी आए जैसे कि दादी सा के देवर महावीर सिंह को पता चलना कि दादी सा का बड़ा बेटा वसंत दरअसल उस का बेटा है आदि. कुल मिला कर यह सारा धारावाहिक आनंदी पर इतना ज़्यादा केंद्रित हो गया है कि किसी भी प्रकार से यह लगता ही नहीं कि यह बाल विवाह के विरुद्ध प्रचार करता है. इसे देख देख कर तो माँ बाप अपने बच्चों को आनंदी जैसी बहादुर लड़की बनने की प्रेरणा देंगे जिसने मुसीबतों पर मुसीबतें देखी पर अपनी जगह अडिग रही और अपना पूरा जनम ऐसी मुसीबतों वाली ससुराल को दे दिया. ऐसी शिक्षा दे कर कोई आश्चर्य नहीं कि समाज में बाल-विवाह बढ़ने शुरू हो जाएँ.

प्रेमचंद सहजवाला
(लेखक स्वतंत्र लेखक और स्तम्भकार हैं)

Saturday, September 12, 2009

फूहड़ चुटकलों से कितनी देर हंस पाएगा आम दर्शक?


कई दिन से इक अजीब-सी उधेड़बुन में हूँ, कि ये किस तरह कि फिल्में बन रही हैं, ना कहानी, ना पटकथा, ना ही कोई ढंग का संगीत, गीत के तो क्या कहने, फिर भी लोग देख रहे हैं, पसंद कर रहे हैं, और इक तरफ जो अच्छी फिल्में बन रही हैं उन्हें कोई घास भी नहीं डालता.. बल्कि अब तो इक नया चलन चला है, फिल्में सीधा डीवीडी से बाज़ार में उतरने का. चलो ये भी ठीक ही है, कम से कम फालतू के खर्चे से तो बचे, और जो कमाया, कुछ जरुरी खर्चों के बाद, सीधा जेब में, लेकिन इक बात जो इन सब की आपाधापी में समझ नहीं आती वो ये है कि आज दर्शक देखना क्या चाहता हैं.
चटपटी फिल्में, डेली सो़प, कॉमेडी या कुछ और.. और जैसे रियलिटी शो...
कमाल की बात है, लोग कहते हैं व्यस्तता बढ़ गई है, इस लिए डेली सो़प देखने का मन नहीं करता, कौन कहानी के चक्कर में पड़े, कॉमेडी भली है, इक बार में ख़त्म तो हो जाती है, पर कोई ये पूछे कि अगर इक बार में ख़त्म हो जाती है तो फिनाले के इन्तेज़ार में काहे को रहते हो भैया, और कॉमेडी भी किस तरह की, कॉमेडी के नाम पर बेहूदा मज़ाक हो रहा है, आज इक कॉमेडी शो चल रहा था, जिसमें मज़ाक हो रहा था की जनाब का पेट खराब है और वो अपनी प्रेमिका का दरवाजा खटका रहे हैं की प्रिय दरवाज़ा खोल दो वरना मेरी पतलून खराब हो जायेगी. अब कहिये ये किस तरह का बेहूदा मज़ाक है.
फिल्में भी तीन घंटे में ख़त्म हो जाती हैं, पर ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं, जो कि फिल्म को सच में देखने जाते हैं, इक सर्वे में बताया गया कि लगभग ४० प्रतिशत लोग तो यूँ ही घूमने के मकसद से पैसा बर्बाद करते हैं, २५ प्रतिशत पॉप कॉर्न का मज़ा लेने या दोस्तों के साथ चले जाते हैं, और जो बचे बाकी तीस प्रतिशत लोग, उनकी सुनता कौन है, बस धूम धड़ाका संगीत और हो गई पिक्चर हिट. कितने ही दिन हुए कोई गीत दिमाग पर नहीं छाया, वरना जब तक कोई फिल्म देखें और उसके गीत ज़हन में ना घूमें तो बात नहीं बनती, कोई बात, कोई सीन, कुछ भी तो याद नहीं रहता और फिल्म को मिलते हैं पांच स्टार, लोगो कि भीड़ को देख कर या जाने किस बात पर.
डेली सो़प लोग देखना पसंद नहीं करते पर फिर भी देखते उसी को हैं, कहने को सभी कहते हैं कि वही सास-बहू का ड्रामा, वाही रोज़ की चिकचिक. फिर भी 75 फीसदी घरों में सात बजते ही अगर कुछ चलता है तो वो हैं डेली सो़प और रात ग्यारह बजे से पहले तो ख़त्म होने वाले नहीं, अब श्रीमती जी का बहाना करें या और कुछ देखते तो सब वही हैं, वरना अगर ना देखें तो डेली सो़प का बाज़ार इतना गर्म कैसे हो.
रियलिटी शो की तो बात मत पूछिये. कोई पूछे कि क्या ये ड्रामा नहीं है. किसी को सोने नहीं दिया जाता तो किसी को अपशब्द सुनाये जा रहे हैं, खुलेआम, कहीं कोई स्वयंवर हुआ तो सभी को स्वयंवर का चस्का लग गया, फिर चाहे वो किसी का भी हो, चाहे लोग उसे पसंद ना करें पर बातें फिर भी उसी की करते हैं, देखा जाये तो रियलिटी शो भी किसी सास-बहू के ड्रामे से कहीं कम नहीं हैं, फर्क इतना है कि किरदार अलग हैं, और अब तो सास-बहू भी रियलिटी शो करेंगी, तो कहीं सासबहू ढूँढने निकली हैं रियलिटी शो के जरिये.
और इन सबसे बढ़कर सबसे बुरा हाल है, न्यूज़ चैनलों का, न्यूज़ यानि के समाचार.. देश-विदेश की खबरें.. देश में क्या चल रहा है इस बारे में जानकारी, लेकिन क्या ये सब हो रहा है चैनलों पर, नहीं.. बल्कि उनपर तो चल रहा है, कि एक-दूसरे कि टांग कैसे खीची जाए, किसी शो को पकड़ लिया तो उसे बंद करा के ही छोडेंगे, बस तीन तीन घंटे तक वही चलता रहता है, शो ने दर्शकों के घर बर्बाद कर दिए, कोई इनसे पूछे क्या दर्शक बेवकूफ हैं, कि इक शो से अपना घर बर्बाद कर लेंगे, और अगर ऐसा है तो मत देखो ना, किसी ने जबरदस्ती तो नहीं की आपके साथ, अजीब है हमारा दर्शक वर्ग भी, देखेगा और फिर बुरा भी कहेगा.
इक न्यूज़ चैनल पर इक कार्यक्रम देखा जिसमें इक घंटे की इक ख़ास कहानी दिखाई जाती है, कि हीरो अपनी प्रेमिका के कहीं और ब्याहे जाने पर सबका खून कर देता है, कहिये, क्या सीखेगा फिर हमारा समाज इस तरह के कार्यक्रमों से, और क्या ये खबर है, या चटपटा मसाला, सिर्फ अपने चैनल चलाने के लिए, यूँ ही तो इनकी टीआरपी बढती है !
कुल मिलकर, लोगो को कहानी, खबर, देश से कोई ख़ास सरोकार नहीं है, ना ही फर्क पड़ता है कि चल क्या रहा है, बस मसालेदार कुछ हो जाये.
मेरी नानी कहा करती थी अपनी ख़ास हरयाणवी शैली में "बस रोला रुक्का चाहिए" यही कुछ दीखता है आज के दर्शक वर्ग के साथ भी.
सबको मसाला चाहिए और वो भी शॉर्टकट में...

(सिनेमा हॉल की जगह मल्टीप्लेक्स लेते जा रहे हैं और आगे की सीट का दर्शक गायब होता जा रहा है....दीपाली की टीस के साथ इस वीडियो को देखना भी आपको शायद अच्छा लगे....)

दीपाली 'आब'
(दीपाली कविताएं भी लिखती हैं। हिंदयुग्म पर कविताएं भी भेजती रही हैं। बैठक पर ये इनका पहला लेख है)

Thursday, July 30, 2009

बीप की आवाज़ों में रियलिटी ढूंढते 'हमलोग'


आपको कौन सा मसाला पसंद है? जी नहीं, मैं खाने वाले मसालों की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उन मसाला और चटपटी खबरों की बातें कर रहा हूँ जो आजकल हमारी आम ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन गईं हैं। इनके बिना ऐसा लगता है मानो व्यञ्जन में नमक न डला हो।
इन्हीं मसाला खबरों को और चटपटा बनाने के लिये आजकल एक नया मसाला आया है जिसे टीवी वालों ने रियलिटी शो का नाम दिया है। मुझे याद है जब दूरदर्शन पर "मेरी आवाज़ सुनो" आया करता था। जिसमें गायकी की प्रतिभा लोगों के सामने लाई जाती थी। रियालिटी शो की परिभाषा के अनुसार वो भी उसी कैटेगरी में आता है। ज़ी पर आने वाला सारेगामा हो जा सोनी का बूगी-वूगी दोनों ही उसी श्रेणी में आते हैं। फिर भी ये "रियलिटी शो" नामक शब्द अब मीडिया और लोगों की ज़ुबान पर आ रहा है। और कौन भूल सकता है सिद्धार्थ काक और रेणुका शहाणे की "सुरभि" को जिसमें आम देशवासियों की खास प्रतिभाओं व उन्हीं से जुड़ी ज्ञानवर्धक बातें सभी के सामने आती थीं।
लेकिन अब... समय बदला है। एक प्रतियोगिता का दौर शुरु हुआ है। ऐसी प्रतियोगिता जिसमें जज़्बातों से खेला जाता है, रिश्तों का मजाक बनाया जाता है और विचारों की स्वतंत्रता व लोकतंत्र के नाम पर सबकुछ ताक पर रख दिया जाता है। इंडियन आइडल आया, रियालिटी शो का नाम साथ लाया। वरना सारेगामा पहले से ही चल ही रहा था तब इस शब्द के मतलब कोई नहीं जानता था। सब कुछ कमर्शियल हुआ। रिलायंस ने मोबाइल फ़ोन हर हाथ में पहुँचाये तो इन शोज़ ने सबको एस.एम.एस करना सिखाया। इन्होंने ही हमें बताया कि बंगाल और असम, राजस्थान व गुजरात से अलग हैं। गाने के साथ-साथ नाचने के भी शोज़ आने लगे। हर चैनल को जैसे कोई मंत्र मिल गया हो। सास-बहू के धारावाहिकों को भूल हम इन शोज़ को देखने लगे। जनता के नाम पर शुरु किये गये ये शो कब जनता के मन में घुस गये पता ही नहीं चला।
उसके बाद इन शोज़ की जैसे एक बाढ़ आई। ’इंडियन आइडल’ हो या ’नच बलिये’ या और भी को नाचने-गाने के शोज़, ये सब पिछले भारतीय शोज़ की नकल पर ही बने। बस इन्हें कमर्शियल कर दिया गया। हम लोगों ने विदेश के शोज़ चुराने शुरु किये। हालाँकि केबीसी भी चुराये गये शोज़ में से ही एक था पर इसमें लोगों के दिमाग का इम्तिहान था। कुछ न कुछ सीखने को मिलता था और मनोरंजन भी होता था। पर इसके साथ-साथ बिग बॉस जैसे शो भी शुरु हुए जिनमें अश्लीलता का बीज बोया गया। इन शो में नामचीन लोग, टीवी के कलाकारों ने भाग लेना शुरु किया और गालियों की भरमार होनी शुरु हो गई। फिर तो नाच-गाने वाले कथित "रियालिटी शोज़" में बोल कम और "बीप" की आवाज़ अधिक सुनाई देनी लगी। टीआरपी के खेल ने ऐसे शोज़ बनाने वालों के दिमाग में नई नई स्क्रिप्ट लानी शुरु की। पर ये स्क्रिप्ट दर्शक भी बड़े चाव से देखने लगे।
"एम.टी.वी" और "चैनल वी" पर दो शो आते हैं। एक है "रोडीज़" व दूसरा है "स्प्लिट्ज़ विला"। इनको युवा पीढ़ी बड़े चाव से देखती है। उन्हें ये शो बहुत पसंद हैं। कौन क्या कर रहा है? आज फ़लां लड़की ने फ़लां लड़के को क्या कहा? कहाँ घूमने गये? उनमें कैसी पट रही है? और इन सबके बीच होती है "बीप" की आवाज़। हर किरदार अपना कथित "असली" रूप में होता है। निर्देशक की कहानी को हम युवा मजे से देखते हैं। हमें वो "बीप" की आवाज़ें पसंद हैं। हम देखना चाहते हैं अश्लीलता। हम देखना चाहते हैं बिगबॉस में नहाने के सीन। हमें अच्छा लगता है ऐसे शोज़ में काम करने वाले किरदारों की "निजी" ज़िन्दगी में झाँकना जो चैनल व निर्देशक-निर्माताओं के यहाँ गिरवी रखी जा चुकी है। वे बिकते हैं। वे पब्लिसिटी चाहते हैं। हम भी उन्हें ऐसा देखना चाहते हैं। हम राखी की शादी देखना चाहते हैं। हम चाहते हैं सच का सामना में हम एक करोड़ जीतें। हम दूसरे की निजी ज़िन्दगी को चटकारे लगाकर देखते हैं। हमें फ़र्क नहीं पड़ता उसके साथ क्या हो रहा है। न ही फ़र्क पड़ता है चैनल वालों को।
हमने विदेशी शोज़ को ज्यों का त्यों हमारे जीवन में उतार लिया। बिना ये जाने कि हमारा समाज उसे सहजता से स्वीकार करेगा या नहीं। निर्माताओं को इसकी चिंता नहीं। "सच का सामना" में यदि अश्लील प्रश्न होते हैं तो ये उस शो का फ़ार्मेट है जो अमरीका से उठाया गया है। उस देश में रिश्तों की कोई अहमियत नहीं होती। आज किसी की पत्नी कल किसी की प्रेमिका हो सकती है। बच्चा होता है तो उसके लिये एक अलग कमरा बनाकर दे दिया जाता है। वहाँ वो भावनायें, वो रिश्ते नहीं जो हम भारतीयों में होते हैं। हाल ही में एक सर्वे हुआ जिसमें सबसे खुशहाल देशो को रैंकिंग दी गई। १४४ देशों में अमरीका १४३ नम्बर पर रहा और भारत ७०वें। जो शोज़ वहाँ चल निकले हैं जरूरी नहीं यहां कामयाब हों। इन सबसे यहाँ किसी का परिवार खत्म हो सकता है। हालाँकि वो सब भी हमारी मर्जी से ही हो रहा है।
हममें अब वो संवेदनशीलता रही ही नहीं जब "नुक्कड़" के लोगों में हम खुद को देखा करते थे। "रियालिटी" साफ़ दिखाई दिया करती थी। पर "हम लोग" अब वैसे नहीं रहे। जैसे एक युग बदला हो। संवेदनहीनता के इस दौर में हम अब इन "रियालिटी शोज़" में "रियालिटी" खोजा करते हैं पर....

तपन शर्मा

Wednesday, July 22, 2009

बेडरूम का सच और एक करोड़ रुपए



क्या आपने कभी अपनी बेटी की उम्र की किसी लड़की के साथ सेक्स किया है?

जवाब मिलता हैं.. हां।

क्या आप कभी अपने पति के अलावा किसी और के साथ गैर मर्द के साथ नाजायज़ रिश्ता बनाने की कोशिश करेंगीं?

जवाब मिलता है.. नहीं।

लेकिन ये जवाब गलत था। ये एक बानगी भर है उस प्रोग्राम की, जो आजकल स्टार प्लस पर आता है। अमेरिकी शो 'मोमेंट ऑफ ट्रूथ'की नकल पर शुरु हुए इस प्रोग्राम के ज़रिए हिंदुस्तान में सच की गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र के इस मुल्क में जहां हज़ारों गुरु पंडितों और मुल्ला मौललवियों ने इस मुल्क की बुनियाद रखी, वहां आज लोगों को सच सिखाने की ज़रूरत पड़ रही है। जहां लाखों पीर-फकीर गंगा-जमुनी तहजीब की सीख देकर चले गये। वहां टीवी पर सच सिखाया जा रहा है। सच भी कैसा। बेडरूम का सच। नाजायज़ रिश्तों का सच। साजिशों का सच। मर्डर और दोस्ती में दरारों का सच। सेक्स और बेवफ़ाई के अजीबो-गरीब रिश्तों का सच। प्यार-मौहब्बत में नाकाम रहने का सच। फलर्ट करने का सच। सच भी ऐसा जिसमें सिर्फ़ मसाला हो, तड़का हो। वो भी किसलिए सिर्फ़ एक करोड़ रुपयों के लिए। और एक करोड़ भी तब मिलेंगे जब आप सभी 21 सवालों का सही जवाब देंगे। मुझे आचार्य धर्मेद्र की एक बात बहुत अच्छी लगी, कि आप पैसा देना बंद कर दो, लोग टीवी पर सच बोलना बंद कर देंगे। लोग टीवी पर पैसे के लिए सच बोल रहे हैं। प्रोग्राम के पीछे तर्क दिया जा रहा है, कि इसके आने के बाद लोग सच बोलने लगे हैं। मेरा उनसे यही सवाल है कि क्या इससे पहले समाज में लोग सच नहीं बोलते थे? क्या अब तक मुल्क और समाज की बुनियाद झूठ के ढर्रे पर चल रही थी? एक सच ये है कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता। आप भले ही यकीन न करें, लेकिन मुझे झूठ बोलना बिल्कुल पसंद नहीं है। आप सोच रहे होंगे कि मैं शायद स्टार प्लस पर आने वाले प्रोग्राम सच का सामना के बाद कुछ बदल गया हूं। आप सोच रहे होंगे कि इस प्रोग्राम के आने के बाद हिंदुस्तान में राजा हरिशचन्द्र कहां से पैदा हो गये। लेकिन जनाब ऐसा नहीं हैं। यहां सदियों से लोग सच का सामना करते हैं। अब अगर कोई राखी सावंत से सच बोलता है कि वो पहले से शादी-शुदा है, तो क्या ये सच का सामना का असर है। दरअसल ये भी एक ड्रामा था। जिसके पीछे भी था पैसे का बड़ा खेल। मतलब फुल ड्रामा। और फिर यहां जो भी शख्स सच बोलता है, उसकी पूरी फैमिली उसके सामने बैठती है। झूठ और सच के साथ ही उनके एक्सप्रेशन भी बदलते जाते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि कोई पति या पत्नी अपनी बीस साल की शादी-शुदा ज़िंदगी में डर की वजह से अपने राज़ एक-दूसरे से शेयर ही न करे। और जब बात एक करोड़ मिलने की आती है, तो उसके राज़ परत दर परत सारी दुनिया के सामने खुल जाते हैं। मुझे याद है कि कई साल पहले राजेन्द्र यादव जी ने अपनी पत्रिका हंस में ऐसी ही एक सीरीज़ चलाई थी। जिसमें अपनी ज़िंदगी का कच्चा चिट्ठा लिखना था। मैगज़ीन बाज़ार में आई, लेकिन लेख छपते ही हल्ला मच गया। कुछ लोगों ने बड़े उतावले पन के साथ अपनी ज़िंदगी को तार-तार करने की कोशिश की थी। लेकिन नतीजा क्या निकला। हंगामा मचा, तो हंस को सीरीज़ ही बंद करना पड़ी। अफ़सोस ये है कि इस प्रोग्राम का भी वहीं हश्र न हो। सच का सामना करने के चक्कर में कहीं रिश्ते दरक न जाएं, और भरोसे पर टिका जिंदगी का घंरौंदा एक हल्के से झोके में ही ज़र्रा-ज़र्रा करके बिखर जाए। सच के ठेकेदारों समाज पर कुछ तो रहम करो। क्योंकि कुछ झूठ ख़ूबसूरती के लिबास में ही अच्छे लगते हैं।

अबयज़ खान