Friday, February 13, 2009

विदेशी फिल्म "स्लमडॉग..." पर काहे झूमे इंडिया??

एक साल पहले मैंने "तारे ज़मीन पर" देखी। सिनेमा हॉल में शायद ही कोई हो जो फिल्म देखकर रोया न हो। जिसने खड़े होकर आखिर में दिखाया जाने वाला गाना देखा हो, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों का मासूम बचपन खोता हुआ दिखाया जाता है। कोई ऐसा नहीं है जिसने "माँ" वाला गाना न सुना हो। शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें न भर आई हों। एक ऐसी कहानी जिसने सच्चाई से परिचय कराया। एक बच्चे की कहानी जो बीमार है। माँ-बाप की बढ़ती उम्मीदों के बीच अपने बचपन की मासूम शरारतों से दूर है। डिस्लेक्सिया बीमारी के शिकार बच्चे की कहानी। भारत के लगभग हर एक घर की कहानी। जहाँ बच्चे पर बोझ डाल दिया जाता है किताबों का, उम्मीदों का।

जब ये फिल्म आई तो लगा कि यही वो फिल्म है जिसका हमें इंतज़ार था। ये वो फिल्म है जो हमें ऑस्कर दिलवायेगी। क्या निर्देशन किया है आमिर ने? क्या एक्टिंग की छोटे-से बच्चे दर्शिल सफारी ने। इतनी बढ़िया अदाकारी कि आमिर खान आधी फिल्म होने के बाद कहानी में आते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा सिर्फ दर्शिल के बूते चलता है। शंकर-एहसान-लॉय का जबर्दस्त संगीत। प्रसून जोशी के गीत। शंकर की आवाज़, कहानी। सब कुछ बढ़िया।
फिर, खबर आई कि फिल्म ऑस्कर से बाहर हो गई.... पैरों तले ज़मीन खिसक गई। अगर ये फिल्म नहीं, तो और कैसी फिल्म बनायें कि ऑस्कर में जा सके। 'लगान' से किसी मामले में कम नहीं। "रंग दे बसंती" के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

अब "स्ल्मडॉग मिलेनियर" को १० श्रेणियों में नामांकित किया गया है। इससे ज्यादा सिर्फ एक और फिल्म को ही नामांकन मिले। पर इस फिल्म में ऐसा क्या जो "तारे ज़मीन पर' में नहीं। "स्लमडॉग.." की भारत में हर ओर आलोचना भी हो रही है। इस बात पर भी बहस हुई कि भारत को केवल झुग्गी बस्ती का देश दिखाने और भारतीयों को ठग और विदेशियों को उदार दिखाने के बाद क्या ये फिल्म भारत में रिलीज़ होनी चाहिये? किस बात में आमिर की फिल्म पीछे हो गई? कहानी, संगीत, गीत, निर्देशन, अदाकारी या कुछ और। किन मापदंडो पर ऐसा किया जाता है। पहले मैं समझता था कि हिन्दी फिल्मों में नाच-गाने अधिक होते हैं और कहानी न के बराबर-शायद इसलिये पीछे रह जाते हैं। पर "स्ल्मडॉग.." भी तो भारतीय पृष्टभूमि पर आधारित है। इसमें भी ढेरो गाने हैं। जो बात दोनों फिल्मों को अलग करती है वो है फिल्म में अधिकतर विदेशी टीम का होना। कहीं ऐसा तो नहीं कि "स्लमडॉग.." केवल इसलिये आगे निकल गई क्योंकि ये एक विदेशी ने बनाई है। इसमें उन्हें उदार दिखाया गया है। ये केवल मेरी सोच हो सकती है, लेकिन जो घटा है मैं उसको झुठला नहीं सकता। और कोई दूसरा कारण मुझे नजर नहीं आता। आप बता सकें तो मुझे खुशी होगी। हम खुश हो रहे हैं कि ये फिल्म ऑस्कर के लिये नामांकित हुई। हमें खुशी केवल तभी होनी चाहिये जब संगीतकार ए.आर.रहमान को अवार्ड मिले। क्योंकि सिर्फ तभी ये अवार्ड भारतीय कहलायेगा।

तपन शर्मा

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

17 बैठकबाजों का कहना है :

रंजन का कहना है कि -

कुछ तो मिल रहा है.. क्या देशी क्या विदेशी..

Divya Prakash का कहना है कि -

दूसरा कारण
==============
तपन भाई फ़िल्म बाहर हो गयी उसका ये मतलब नही है कि हिंदुस्तान से ही केवल फ़िल्म ओस्कर मैं पहुँची थी ...और उसको बाहर कर दिया गया ...बाकि भी जो फ़िल्म उस category मैं थी उनको भी देखना जरुरी है फ़ैसला कर ने से पहले ....जैसा कि "लगान" के वक़्त हुआ था ,No Mans land नमक फ़िल्म को ओस्कर मिला ... जो वास्तव में लागान को पीछे छोड़ती थी| रही बात रंग से बसंती कि तो ... कोई भी फ़िल्म जो ऐसे "रक्षा मंत्री को जान से मार देने जैसे Extreme solution ""सुझाये कभी भी ओस्कर कि हकदार नही ... (मेरे भी ख्याल से )
जो भी फ़िल्म फिनल नोमिनेशन के लिए पहुँची वो अपने आप में ही प्रमाण है कि फ़िल्म बहुत अच्छी थी ..
रही बात फ़िल्म को लेकर बवाल कि विदेशी ने बनाई है .. तो भइया मेरे ... ये पुरस्कार भी विदेशी ही है ... अगर खुदा न खस्ता किसी हिन्दी फ़िल्म को ओस्कर मिल भी गया तो मुझे पूरा विश्वास है बहुत लोग ये कहना शुरू कर देंगे हमें किस्सी भी विदेशी पुरस्कार कि जरुरत नही है|

saadar
Divya Prakash Dubey

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

हम भारतियों की यह बिमारी कब जाएगी। बात की तह में नहीं जाते और विरोध करना शुरू कर देते हैं।मैं दिव्य प्रकाश जी की बात से पूर्णत: सहमत हूँ। आस्कर अमेरिकन अवार्ड है, इसलिए यह अवार्ड तभी मिल सकता है जब फिल्म का निर्माण अमेरिकन कंपनी ने किया हो। यहाँ देशी-विदेशी का कोई मसला हीं नहीं है। और रही बात "तारे जमीन पर" की तो अमेरिका से बाहर के फिल्मों के लिए एक हीं कटेगरी होती है, "बेस्ट फारेन फिल्म", और उस कटेगरी के अवार्ड के लिए पूरे विश्व से फिल्में आती हैं। तो कंपीटिशन मुश्किल हो जाता है।

भाई, हमें तो खुश होना चाहिए कि हमारी हीं पृष्ठभूमि पर बनी एक फिल्म को दस नामांकन मिले हैं, और उसमें से हमारे प्यारे "रहमान" को तीन। लेकिन हम खुश क्यों हो, विदेशी ने बनाया है ना, खुद तो देशी-विदेशी का राग अलापेंगे और जब देश में सामाजिक भेदभाव की बात आएगी तो कमर कसके कहेंगे कि "गलत हो रहा है"। दोहरी मानसिकता से जाने कब हम बाहर आएँगे।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

तपन भाई, बात बिल्कुल सीधी सी है कि हमारी या फिर पृष्ठभूमि पर बनी एक फिल्म को इतना
सम्मान मिला या मिल रहा है..........
इधर तमाम दिनों से हर जगह यह बहस चल रही है कि इसमे हमारी ग़रीबी को दिखाया गया है इसलिए इसे सम्मान मिला/ इसमे विदेशी हैं इसलिए सम्मान मिला वग़ैरह वग़ैरह....
पर,हम इस पचाड़े मे क्यों फँसे.क्या इतना ही अच्छा नहीं कि हमारे प्रिय रहमान को सम्मान मिला.......
रही बात दिखाने कि तो माफी चाहूँगा पर,फिल्म बनाना एक क्राफ्ट है,शिल्प.....तो इसमे शिल्पी को कटघरे मे डालना उचित नहीं...कि उसने मारे इंटेंशन के हमारी ग़रीबी दिखाई....
भाई,इसे एक फिल्म के रूप मे ही ले ना....
आगे, तारे ज़मीन पर एक लाजवाब फिल्म थी,सच कहें तो हर एक को ही यह उम्मीद थी कि
इसे ऑस्कर मिलेगा.पर,क्या सिर्फ़ ऑस्कर मिलना ही हमारी कला कि बेहतरी का सर्टिफिकेट है.......मैं नहीं मानता.......सो, खुश होने और दुआ करने का वक्त है कि हमारे रहमान का परचम ऑस्कर मे भी बुलंद हो.....
जय हो.....!!!

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

मेरा मानना है कि विदेशियों के जुड़े रहने के कारण इसे और अधिक फायदा हुया है |
बड़े से बड़े पुरस्कार personal preference से नहीं बचे हैं |
यह नहीं कह रहा हूँ कि काम अच्छा नहीं हुया है | यह हमारे लिए फक्र की बात तो है ही लेकिन जो कुछ भी है उसका विश्लेष्ण करके बेहतर होना चाहिए |


लेख के लिए धन्यवाद |
-- अवनीश तिवारी

sumit का कहना है कि -

इस बात को झुटलाया नही जा सकता की इस फिल्म का आस्कर मे नामिनेशम होने का कारण विदेशी निर्देशक द्वारा बनाया जाना है, वैसे भी आस्कर विवादो मे रहा है

मैने सुना है मदर इंडिया फिल्म को आस्कर देने वाली टीम ने सिर्फ इसलिए नही देखा क्योकि उसमे लोगो को हाथ से खाना खाते दिखाया था, और वो बाहर हो गई थी, उनहे बडा अजीब लगा कि ये लोग हाथ से खाना कैसे खा रहे है जबकि हम(अंग्रेज) छुरी और काँटे से खाते है, उस मे वो भारतीयो से घिन्न कर रहे थे कि ये कैसे लोग है

sumit का कहना है कि -

इस बात मे मुद्दे से भटक गया था
जहाँ तक लगान के बाहर होने की बात है तो उसके जैसी एक अंग्रेजी फिल्म(longest yard शायद ये हि नाम है )
पहले भी बन चुकी है जिसके री मेक मे खली(w.w.e. ) भी है, concept एक होने की वजह शायद बाहर हुई होगी, बाकि दिव्य जी और तन्हा जी की राय से मै सहमत हूँ

aniruddha का कहना है कि -

Incredible India, अविश्वसनीय भारत - सचमुच भारत अविश्वसनीय है क्योंकि एक अविश्वसनीय देश में ही ऐसा हो सकता है कि लोग इस बात पर भौंहें तान लें और बाँहें चढा कर खड़े हो जाएँ कि एक फ़िल्म में हमारी दुर्दशा को दिखाया गया है और उस दुर्दशा के लिए कोई एक शब्द ही न कहे, सलाम इंडिया ... ऐसे होणार लोग सिर्फ़ यहीं पैदा हो सकते हैं| शायद इसलिए भी हमें ओस्कर नही मिलता हो कि यहाँ के लोग बिना रीढ़ के हैं जो असल मुद्दों को छोड़ हमेशा वाहियात बातें करते हैं |

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

अनिरूद्ध साहब!
आपकी बातों से यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि आप कहना क्या चाह रहे हैं? किन लोगों की रीढ नहीं है, जरा खुल कर बताईये।

-विश्व दीपक

तपन शर्मा का कहना है कि -

मुझे नहीं पता कि आप में से कुछ लोगों ने यह लेख पढ़ा भी है या नहीं...
मैंने ये कतई नहीं कहा कि फिल्म में गलत दिखाया है..फिल्म में सच दिखाया है बस कुछ जगह पर अतिश्योक्ति है जो मैंने पहले भी किसी लेख में टिप्पणी करते हुए कहा। मेरा मत केवल इतना था कि इसको फायदा मिला विदेशी निर्देशक होने का...
मैं केवल इस फिल्म और तारे जमीं.. में तुलना कर रहा हूँ। मैं दिव्य भाई के दिये तर्कों, और विश्व दीपक भाई व अवनीश जी के उस बात से सहमत हूँ कि फिल्म की कैटेगरी के हिसाब से हमें "बेस्ट फारेन फिल्म" मिलती है, और उस कटेगरी के अवार्ड के लिए पूरे विश्व से फिल्में आती हैं। तो कंपीटिशन मुश्किल हो जाता है।

आशा है आप लोग मेरी बात समझ गये होंगे

aniruddha का कहना है कि -

दीपकजी क्षमा चाहूँगा अगर कुछ ग़लत कह दिया हो लेकिन मेरा आशय बिल्कुल व्यक्तिगत नही था | मैंने in general कहा था और उसमे मैं भी शामिल हूँ |

Divya Prakash का कहना है कि -

अनिरुध बहुत बहुत धन्यवाद आपका .... इतने दिनों से लिख रहा हूँ पहली बार किसी ने होनहार तो कहा !!
सादर
दिव्य प्रकाश

Divya Prakash का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
pankaj vyas का कहना है कि -

tapan sharma ji ka lekha- rahul, manmohan ya aadvani, uywa koun?, accha laga, aapke vichar pasand aayen. ise ratlam, Jhabua(M.P.), Dahod(Jugarat) se prakashit dainik prasaran me prakashit karane ja raha hoon.
kripaya, postal address send karen, taki aapko prati bheji ja saken. postal address ravivar tak bhejade den.
dhanyawad
pan_vya@yahoo.co.in

सजीव सारथी का कहना है कि -

tapan bhai film sachhai ke bahut kareeb hai par jahir hai ek film ke hisaab se nirdeshak kuch aisi baten jodta hai jisse kahani rochak bane...akhir 2-3 ghante tak logon ka manoranjan karna/jagrit karna ye sab lakshy samne hote hain aur fir bahut sa paisa stake par hota hai. ek baat aur jaan lijiye film jis novel se inspired hai wo ek bhartiye ne likhi hai....to angrezi nazariya katai nahi hai ek bhartiya nazar hai do badhte hue bharat men pal rahe do muhen bharat ko dekh rahi hai...par nirasha kahin nahin hai...ek asha hai aur har hindi film kii tarah ye ek "feel good movie" hai film sabhi awaards deserve karti hai jis jis category men bhi nominate hui hai. editing camera screeplay aur music sab kuch excellent hai koi shak nahi rahi baat "taare zamin par" se comparision kii to wo tanha ji ne clear kar hi diya hai. TZP ko bharat men dhero puraskaar milen hain film kaamiyaab rahi hai aur bahuton kii jindigiyan isne badli hai yahi sab se bada puraskaar hai, rahi baat oscar ke vivaadi hone kya duniya men koi bhi aisi cheez hai jis par vivaad na hua ho. har puraskaar kahin na kahin vivaad paida karte hain par hamen ye baat maan leni chahiye ki hamen abhi hollywood ke star tak pahunchne bhi samay lagega. par khush hoyiye ki rahamaan ne ek shuruaat kar di hai....mujhe haal pradarshit Dev D se aur anuraag jaise nirdeshakon se bhi bahut si ummeden hain - sajeev

तपन शर्मा का कहना है कि -

आपकी बात से सहमत हूँ सजीव जी, विवाद सभी में होता है.. हमारे फिल्म राष्ट्रपुरस्कारों को ही ले लीजिये... हर साल विवादों में रहते हैं..
अब इन पुरस्कारों पर ज्यादा तवज्जो नहीं दूँगा मैं.. वैसे भी ऑस्कर भी तो विदेशी है.. तो काहे परेशान होऊँ..
वैसे रहमान जीते तो जयघोष तो होना ही चाहिये..इतने पुरस्कार जीतने और पब्लिसिटी के बाद उम्मीदें बढ़ गई हैं।

रजनीश मंगला का कहना है कि -

मेरी बुरी किस्मत कि अभी तक मैंने 'तारे ज़मीं पर' नहीं देखी। लेकिन 'स्लमडॉग---' दो तीन दिन पहले ही देखी। भारतीयों को भी ज़मीनी हकीकत के पास रहने की आदत डालनी होगी। इसे स्वीकार करके ही इसे मिटाया जा सकता है।

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)