Showing posts with label chunav. Show all posts
Showing posts with label chunav. Show all posts

Wednesday, April 29, 2009

आज़ादी से पहले और बाद के जूता-काण्ड

हि्द-युग्म के प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रेमचंद सहजवाला चंद चुनाव सम्बन्धी प्रश्न लाये हैं। इन दिनों नेता पर जूता-चप्पल फेंको प्रतियोगिता ज़ोरों पर है। उसी से जुड़े कुछ सवाल हैं। एक-एक प्रश्न के चार-चार विकल्प हैं जिन में से एक सही है और शेष ग़लत। पाठक Comment (टिप्पणी) में अपने उत्तर दे सकते हैं। शीघ्र ही मैं इनके उत्तर आपको बताये जायेंगे।

प्रश्न 1: आज़ादी से पहले कौन से कांग्रेस नेता पर एक कांग्रेस अधिवेशन में जूता फेंका गया था?
(a) मोतीलाल नेहरू
(b) मुहम्मद अली जिन्ना
(c) लोकमान्य तिलक
(d) महात्मा गाँधी

(संकेत - जूता जिस नेता पर फेंका गया उसे न लग कर दो अन्य नेताओं को लगा जिन में से एक पारसी था एक बंगाली)

प्रश्न 2 : आज़ादी के बाद एक लोक सभा चुनाव की रैली में कौन से नेता पर पत्थर फेंका गया जिस के फलस्वरूप उस की नाक fracture हो गई थी?

(a) अटल बहरी वाजपेयी
(b) इंदिरा गाँधी
(c) मार्गरेट अल्वा
(d) तारकेश्वरी सिन्हा

प्रश्न 3 : 'दो बैलों की जोड़ी' और 'हाथ' के चुनाव चिन्हों के बीच की अवधि में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह क्या था?

(a) चरखा कातती औरत
(b) हल चलाता किसान
(c) चरखा
(d) गाय-बछड़ा

सोचिए-सोचिए। हैं ना मज़ेदार सवाल!

Tuesday, January 13, 2009

वक़्त का तक़ाज़ा भी यही है....

नाज़िम नक़वी फिर हाज़िर हैं...इस बार उन्होंने देश की व्यवस्था पर अपनी कलम चलायी है...वो व्यवस्था जो आज भी सरहदों
पर सियासत करने से बाज़ नहीं आती....अपने देश में दशकों से बस रहे बांग्लादेशियों की दुर्दशा पर पढिए उनका ये आलेख...




“वो बांग्लादेशी हैं और उन्हें बांग्लादेश में रहना चाहिये, इस समस्या को धर्म के आधार पर देखने की कोई ज़रूरत नहीं है...” क़रीब तीस दिन पुराने हमारे नये गृहमंत्री ने दो टूक ये कह दिया तो यकबयक कानों पर यक़ीन नहीं हुआ। सही भी तो है, वक़्त का तक़ाज़ा भी तो यही है। जब अपना घर आफ़तों का परकाला हो गया है तो परोपकार की किसको सूझती है। इतिहास में जाने की ज़रूरत नहीं कि बांग्लादेशी हमारे देश में लगभग तीन दशक पहले कैसे और किन परिस्थितियों में आये। लेकिन आज जब ये पता लगाना मुश्किल होता जा रहा है कि हमपर ख़तरनाक हमलावर हमारे अपने हैं या पड़ोसी तो ऐसे में पहला क़दम यही होना चाहिये कि उन लोगों को देश से निकाल दिया जाय जिनके पास न वीज़ा है न वर्क परमिट। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये काम एक बयान जितना आसान है? पिछले तीन दशकों में अगर एक बांग्लादेशी अवैध रूप से यहां बसा तो आज वो परिवार वाला हो चुका है। इन अवैध लोगों की वैध संतानें किस देश की कहलायेंगी? ये एक दो दिन की बात नहीं है। ये वो अवधि है जब व्यक्ति परिवार में परिवार ख़ानदान में और ख़ानदान जन समूह में बदल जाते हैं।

हैरत इस बात पर है कि आज कांग्रेसी सरकार का गृह मंत्रालय जिसे समस्या मान रहा है उसका जन्म ख़ुद उसकी ही नीतियों की कोख से हुआ है। 1983 में इंदिरा गांधी द्वारा एक क़ानून (आईएमडीटी एक्ट) की स्थापना की गई ताकि बांग्लादेशी प्रवासियों को असमी विद्रोह से बचाया जा सके। इस क़ानू के तहत शिकायतकर्ता को 10 रपये का एक फ़ार्म भरकर शिकायत दर्ज करानी होती थी। फिर वो शिकायत अगर सही पाई गई तो अवकाश प्राप्त जजों के उस ट्रिब्यूनल के पास जाती थी जो ये फ़ैसला कर सकते थे कि अमुक व्यक्ति को वापिस भेजा जाय या नहीं। दूसरी तरफ़ जिसके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की गई है उसे सिर्फ़ अपने नाम का राशन कार्ड दिखाना होता था। इस कानून के बाद वही हुआ, राशन कार्ड बनाने वाले भगवान हो गये। इससे भी रोचक ये कि 2005 में इस कानून पर देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि “अवैध प्रवासी नागरिकों को पहचानने और उन्हें उनके देश भेजने की प्रक्रिया में ये कानून सबसे बड़ी अड़चन है।” इस देश में किसी भी चीज़, यहां तक की क़ानून, को सही और ग़लत साबित करने में 22 साल लग जाते हैं। जैसा कि इस एक्ट के साथ हुआ। इन बाइस वर्षों में क्या से क्या हो जाता है इसे बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिये।

अगर इस दशकों पुरानी समस्या का सामधान इतना आसान नहीं है तो फिर एक कांग्रेसी गृहमंत्री का ये बयान कैसे गैर-सियासी हो सकता है। सियासी तौर पर तो ये भाजपा का मुद्दा रहा है और उसने जब-तब इसे उठाया भी। 2003 के पहले सप्ताह में आंतरिक सुरक्षा के लिये ख़तरा बन चुके लगभग दो करोड़ बांग्लादेशियों को वापिस उनके देश भेजने की घोषणा करते हुए अडवाणी जी ने तो इस अभियान की तारीख भी अप्रैल 2003, तय कर दी थी। फिर पता नहीं क्यों ये अभियान शुरू नहीं हो सका। शायद फ़ील गुड के फ़ील बैड में बदल जाने का अंदेशा रहा हो। उस समय अडवाणी ने भी यही कहा था कि इतनी बड़ी तादाद में ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से रह रहे लोग दुश्मन देशों के एजेंट भी हो सकते हैं और आज यही ख़तरा चिदंबरम को भी है। उस समय के उप प्रधानमंत्री ने भी भारत के नागरिकों के लिए पहचान पत्र जारी किए जाने की बात कही थी, आज नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) बनाने की वही बात गृहमंत्री भी कर रहे हैं।

अब ये सवाल उठाना बेमानी है कि आख़िर अभी तक हम इस समस्या से क्यों नहीं निपट पाये। किसे नहीं मालूम कि हूजी जैसे आतंकवादी संगठन बनाने वाले कौन हैं, आईएसआई, हूजी और असम के अलगाववादी गुटों का तालमेल किससे छुपा हुआ है, ये बांग्लादेशी किसका वोट बैंक हैं। ऐसे में क्या नहीं हो पाया इसपर कोई सवाल कैसे किया जा सकता है। हां ये सवाल ज़रूर उठता है कि आज इस सवाल के पीछे कौन सा गणित काम कर रहा है। आ़ज कांग्रेस को ये वोट बैंक बेमानी लग रहा है तो क्यों? गृहमंत्री पूरी लगन के साथ अपने पांच महीनों के इस छोटे से टारगेट पर काम कर रहे हैं ये सबको नज़र आ रहा है। मंत्रालय में बड़े बड़े अफ़सर देर रात तक फ़ाइलों से घिरे हुए देखे जा सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियां हों या ख़ूफ़िया तंत्र सबको ज़िम्मेदारी ओढ़ने वाले सिस्टम के अंतर्गत लाया जा रहा है। फलां काम 15 जनवरी तक और फलां काम 20 जनवरी तक पूरा हो जाना चाहिये, ऐसे निर्देश आम हो गये हैं। लेकिन ये भी सच है कि चुनाव के नज़दीक चुनाव की तैय्यारियां भी इसी समय ही करनी हैं। सहयोगियों को साथ लाना है लेकिन राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को भी ठिकाने लगाना है। हम जनप्रतिनिधि हैं और जनता के प्रति हमारी जवाबदेही है ये जुम्ले चुनावी मौसम के जुम्ले हैं जो इधर-उधर सुनाई पड़ने लगे हैं।

अगले चुनाव की रणनीति कांग्रेसी आंखों से देखिये तो असम से उसे ज़्यादा उम्मीद नहीं है। त्रिपुरा और वेस्ट बंगाल में उसका जनाधार पहले से ही खिसका हुआ है। यही वो इलाक़े हैं जहां बांग्लादेशी वोट बैंक के मायने हैं। कल तक वामपंथी उसके साथ थे तो उसे बांग्लादेशी घुसपैठ को नज़रअंदाज़ करना पड़ता था। आज वामपंथी हर मोड़ पर उसके ख़िलाफ़ खड़े हैं। संसद में उनके परम विरोधी तो वही हैं, भजपा से भी ज़्यादा। दूसरी अहम बात ये कि आंतरिक सुरक्षा की बात उठाते हुए भाजपा सरकार का घेराव इन्हीं बांग्लादेशियों के नाम पर कर सकती थी तो उसे पहले ही उठाकर कांग्रेस ने उसका ये कार्ड एक तरह से छीनने का प्रयास किया है। वैसे भी विरोध के लिये मुद्दों की तलाश में भाजपा हाथ-पैर मार रही है।

हम जैसे हैं सब कुछ वैसा होता है। हमारे देश में किसी समस्या से निपटने का हमारा तरीका क्या है इसे बांग्लादेशी समस्या के आइने में देखा जाना चाहिये। ये उसी देश में संभव है जहां “देर आये- दुरुस्त आये” या “भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है”
जैसे मुहावरे जीने का आधार हों। हमें भगवान के न्याय पर भरोसा है तो हमारे सारे प्रश्न भी उसी के दरबार में जाते हैं। हम जब चाहते हैं उसे कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और उसके ख़िलाफ़ उसी के फ़ैसले का इंतेज़ार करते हैं। ऐसे में मिनिस्टर फिनिस्टर, मंत्रालय-वंत्रालय या कानून फानून की क्या औकात जो हमारे दर्द को कम कर सके।

-नाज़िम नक़वी