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Wednesday, September 09, 2009

आईए शहर और गांव के बीच की लकीर मिटाएं...


जब भी गांव के विकास की बात आती है ...शहरों की खिंचाई शुरू हो जाती है..ये थोड़ा सा अन्याय है मुझे लगता है..शहर विकास का एक नैसर्गिक पड़ाव है..ऐसा नहीं होता तो विकास के चश्मे से शहरों का भी वर्गीकरण नहीं होता..मसलन छोटा शहर..बड़ा शहर..सिटी..मेट्रो सिटी..कॉस्मोपॉलिटन सिटी..वगैरह वगैरह..छोटे शहरों के लोगों का भी मेट्रोपॉलिटन के सामने कुछ ऐसा ही रोना है...पिछड़े रह जाने की ऐसी ही दुहाई है..सबकुछ नहीं मिल पाने की ऐसी ही कसक है..लेकिन उनको नहीं मालूम कि दिल्ली का दिल भी लंदन या न्यूयार्क को देख कर जल सकता है...या फिर ये कह सकता है कि वो आगे निकल गये..हम कहां रह गये...ये शिकायत व्यक्तिगत तौर पर मुझे थोड़ी 'रिस्पेक्टिव' या 'रेलेटिव' लगती है. बहरहाल, ये सवाल कि शहरों ने गांवों को क्या दिया है.. बताने की ज़रूरत नहीं है..शहर उन लोगों का आलंब बने जो बाढ़ या सूखे में अपना सबकुछ खो बैठे..जब गांव घर में पानी घुसा तो शहरों की तंग गलियों ने आसरा दिया..जब गांव के स्कूल बदहाल हो गये..तब शहरों ने हमें ये क़ाबलियत दी कि हम पुरज़ोर ढ़ंग से अपने गांवों के लिए आवाज़ उठा पाने की ताक़त रखते है..आज हमारे गांवों की बात हमारे मुंह से सुनी और समझी जा रही है तो बीच में कहीं न कहीं एक शहर ज़रूर खड़ा रहता है..कमज़ोरी नहीं बल्कि हौसला बनकर..अत्मविश्वास बनकर. गांवों की जो तस्वीर हम अपने आनेवाले दिनों के लिए बुनते हैं..जिसे दिमाग के काग़ज से ज़मीन की ठोस परत पर उतारना चाहते है...तो कल्पना की वो जमीन भी कहीं न कहीं इन शहरों ने मिल कर बनाई है....बीच की लाईन क्यों बना देते हैं हम..मान लीजिए कि दिल अगर गांव है..वैसे बापू ने भी माना था कि भारत की आत्मा गांवो में ही बसती है...तो इस शरीर का दिमाग शहर है..शहरों का आधार गांव रहे है..इसमें कोई दो राय नहीं...यहां के फाईवस्टार होटलों में परोसा जाने वाला खाना..और उसे परोसने वाला दोनों ज्यादातर गांवों के ही होते है...शहर के हाथ गांव से आते है...लेकिन ये भी नहीं भूलना होगा..कि शहर इन हाथों को थाम भी लेते हैं..बीच की लाईन को मिटा कर बात करते हैं..ये मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि गांव पीछे छूट गये..कारणों की विवेचना नहीं करूंगा...लेकिन गांवों की बड़ी ज़रूरतें क्या हैं इस समय..उनके पास क्या कुछ है जिससे इन ज़रूरतों को पूरा किया जा सकेगा...ये समझना ज्यादा ज़रूरी है..गांवों के पास कुछ चीज़े ऐसी हैं जो शहरों के पास नहीं हैं....गांवों-ज़रूरतों को तोड़ कर देखेंगे तो शहरों के मुक़ाबले छोटी लगेंगी लेकिन ग्रासरूट लेवल पर सब मिलजुल कर अभाव की बड़ी तस्वीर बना देते हैं....तो मेरे हिसाब से हल ग्रास लेवल से शुरू होना चाहिए..गांव की ताक़त क्या है?..गांवों की असल ताक़त उनका सस्ता संसाधन है..बात चाहे प्राकृतिक संसाधनों की हो, मानव संसाधन की हो ..हर मामले में उपलब्धता ज्यादा है...लेकिन इन संसाधनो के साथ सबसे बड़ी चुनौती इनकी क्वालिटी को लेकर...सबसे ज्यादा काम की ज़रूरत मानवसंसाधन के विकास और उसके इस्तेमाल पर करने की है..डीसेंट्रलाईज़ेशन ऑफ डेवलपमेंट..अगर इस संकल्पना पर काम किया जाये तो विकास के विकेंद्रीकरण का अंतिम बिंदु गांव का कोई वही आदमी होगा..जिसे हम शहरों की ओर पलायन करने से रोकना चाहते हैं..जब बिहार के मुख्यमंत्री ने ये कहा कि राज्य की श्रम शक्ति का 50 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा राज्य से बाहर है तो पलायन की गंभीरता समझी जा सकती है..तो जब हम विकास के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं तो यहीं से शहरों की गांवों के अंदर भूमिका शुरू हो जाती है...इस प्रक्रिया में वो सबकुछ आता है जो शहरों की तरफ़ गांवों के लोगों को खींच कर ले जाता है..कारण चाहे ज़रूरत हो या सपने...आउट ऑफ द बॉक्स जाकर क्यों नहीं सोच पाते....हर चीज़ को विकेंद्रीकृत कर दे- शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय सबकुछ. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अंग्रेजी बोलने-पढ़ने का माहौल हम गांवो और छोटे शहरों में पैदा कर दे..फिर वहां से विलेज कैंपस कर वहां के युवा को किसी बीपीओ में उसे नौकरी दे दे..और ये आउटसोर्सिंग गांवो से ही हो..ये सुविधा दिल्ली से नहीं हटेगी तो लोग भागेंगे...गया का पटुआ टोली गांव एक बेहतरीन उदाहरण है..जहां जुलाहों की बस्ती से हर साल आईआईटी में बच्चे दाखिला लेते है..पटना का सुपर थर्टी भी बेहतरीन मिसाल है....ये लोग महंगी पढ़ाई करने के लिए दिल्ली नहीं जा सकते ...लेकिन अच्छी पढ़ाई अपने घर में ज़रूर कर लेते ...गांवों में और छोटे शहरों में जहां बिजली नहीं रहती वहां के लड़के-लड़कियां एजुकेशन क्लब बना कर तैयारियां करते है..और खुद को साबित करते हैं..अगर इन युवाओं को ये शहरी सुविधायें विकेंद्रित हो गांव में मिलें तो ..कौन जाये कमबख्त अपने गांव की गलियां छोड़कर....शहर की सड़कें जब हरियाणा, पंजाब, गोवा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों के गांवों तक विकेंद्रीकृत होती हुई पहुंची..तो शहर की चीज़े भी वहां तक गई..बस यही प्रक्रिया हर मामले में हो..एक बार बीबीसी में ये पूछा गया कि एक दिन के लिए पीएम बनने पर आप क्या करेंगे? तो किसी का सुझाव था कि एक दिन के लिए कैबिनेट की बैठक किसी गांव में कराऊंगा..उस एक दिन के चक्कर में उस गांव की कई चीज़े सुधर जायेंगी..मुझे अच्छा लगा..क्या शहरों में,राजधानियों में होने वाली इस तरह की बैठकों ,सम्मेलनों, सभाओं, महोत्सवों को हम गांवों में नहीं कर सकते ...यक़ीन मानिये कोई मुश्किल काम नहीं है..अलबत्ता गांवों में रोज़गार के साथ-साथ कई चीज़ो का इज़ाफा होगा...इन सब पर तो गांव का भी हक है... यानि शहरों का विकेंद्रीकरण ऐसे भी हो सकता है.. इससे शहरों को भी एक बड़ा फ़ायदा होगा...एक तो उनपर दबाव घटेगा..दूसरे आयोजनों का खर्च घटेगा...शहरों में स्लम्स के लिए टूरिज़म नाम की चीज विकसित हो जाती है..इससे लाख बेहतर है कि विलेज टूरिज़म विकसित करें..दुनियां को गांवों के दर्शन करायें..सरकार अपने किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए गांवो को प्राथमिकता दे..खेलों के स्टेडियम गांवों में क्यों नहीं बने...जगह काफ़ी है वहां ..क्यों शहरों में भीड़ बढ़ाते हैं हम... बडी बात ये है कि गांव के लोग भी ये महसूस कर पायेंगे कि हम भी इन सब चीज़ो से जुड़े है..फिर शहर और गांव के बीच की जो लाईन है वो हल्की होती जायेगी...जब मै विकेंद्रीकरण की बात करता हूं तो यही सोचता हूं...सुविधाओं के गढ़ बन चुके बड़े शहर टूटें..और ये सविधायें छोटे शहरों और गांवों तक जायें...सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात पर तो पहल बहुत तेज़ी से हुई..लेकिन दिल्ली में जमा हुई सुविधाओं के बारे में ऐसा विचार क्यों नहीं आया..आख़िऱ में मै आपको एक सपने के साथ छोड़ जाता हूं....आंखें बंद कीजिए..और देखिये...मऊ का बीपीओ सेंटर..छपरा के किसी गांव का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम..गुंटूर के गांव में बना आईआईएम....उड़िसा के चिल्का गांव में कैबिनेट मीटिंग भवन...प्रगति मैदान का मोटर एक्सपो श्रीगंगानगर के किसी गांव में....नागालैड या सिक्किम के किसी पहाड़ी गांव में राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव....आंखे खोलिये ..आपको लगता है कि इस एक क़दम से उन जगहों की इससे तस्वीर बदेलगी?..नहीं लगता तो आप इसे मेरा यूटोपिया कह सकते हैं..मुझे बुरा नहीं लगेगा...

रवि मिश्रा

Monday, August 31, 2009

ये....स्वाईन फ्लू नहीं है !!

30 साल...
10 हज़ार बच्चों की मौत...
साल 2009 ...150 बच्चों की मौत....
साल 2009....180 लोगों की मौत....
अभी मौत से लड़ते लोग....750 से ज्यादा


मरने वालों का ये टेबल अफ्रीका के किसी ग़रीब देश का नहीं है..हमारे अपने देश के आंकड़े है...वैसे ये आंकड़े पूरी तरह से सही हों मै दावा नहीं कर सकता ..पर इतना दावा कर सकता हूं ..कि ये संख्या ज्यादा हो सकती है कम नहीं..कहां मर गये इतने सारे बच्चे हमारे देश में इस साल..तो जवाब है गोरखपुर, उत्तर प्रदेश....लेकिन ये स्वाईन फ्लू नहीं है....ये बाताना ज़रूरी है..नहीं तो सरकार डर जायेगी...इंटरनेशनल बीमारियों से सरकारें ज्यादा ख़ौफज़दा रहती हैं...ये सारे लोग शिकार बने हैं...इंसेफेलाईटिस से...पिछले तीस सालों में हज़ारों लोगों को निगल लिया..जिसमें सिर्फ बच्चों की संख्या 10 हज़ार है..यहां हमारे चैनल में रोज रिपोर्ट्स आ रही है..हर दूसरे दिन कुछ बच्चों की मौत की ख़बर आ जाती है यहां से ...लेकिन बता दूं कि ये स्वाईन फ्लू नहीं है....ये जुमला मै बार-बार लिखूंगा ...समझने की कोशिश कीजिये..गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल(बीआरडी) कॉलेज में अभी कई बच्चे मौत से लड़ाई लड़ रहे है...हो सकता है कि किसी ने लड़ना भी बंद कर दिया हो ..जब मै ये सबकुछ लिख रहा हूं..या जब आप ये सबकुछ पढ़ रहे हों...इस मेडिकल कॉलेज में बिहार के चंपारण, सीमावर्ती नेपाल से भी मरीज़ पहुंचते है..साथ ही यूपी के ही देवरिया, महाराजगंज और कुशीनगर जैसे ज़िलों से भी मरीज़ पहुंचते हैं...तो इतनी बड़ी देसी समस्या को छोड़ नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे स्वाईन फ्लू में लगा हुआ है..पूर्वी उत्तर प्रदेश में जो लोग इस बीमारी से लड़ रहे हैं..कुछ दिनों पहले उन्होने अपने ख़ून से लिखी चिट्ठी राहुल गांधी और केंद्र सरकार को लिखी..लोकिन उन नासमझ लोगों को भी बताना पड़ेगा कि ये स्वाईन फ्लू नहीं है....गोरखपुर बाढ़ से लड़ रहा है..इसके पहले सूखा था..बाढ़ का पानी जब लौट रहा है तो बीमारियों की अतिरिक्त खेप यहां के लोगों को दिये जा रहा है..खाने की दिक्कत , रहने की दिक्कत , ईलाज की दिक्कत. पर सूखा हर साल तो नहीं आता...बाढ़ आती है तो चली जाती है..पर ये बीमारी यहां पिछले 30 सालों से मौत का क्रूर खेल खेल रही है..10 हज़ार बच्चों की मौत का आंकड़ा सरकार को इस लिए कम लग रहा होगा..क्योंकि ये स्वाईन फ्लू नहीं है...सरकार का दावा है कि यहां इंसेफेलाईटिस से लड़ने के लिए टीकाकरण का काम पूरा कर लिया गया है..फिर तो बच्चों के मां-बाप बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में जरूर पिकनिक मनाने आये होंगे....और पिकनिक ख़त्म हो जाने के बाद ये ग़रीब मां-बाप गिफ्ट भी ले जाते है..अपने दोनों हाथों से उठा कर..देखने में छोटा ..लेकिन ज़िन्दगी भर न भूलने वाला...लखनउ में पत्थर के हाथियों को खड़ा करने वाली सरकार कितनी अंधी है ...समझना मुश्किल नही है..रायबरेली और अमेठी का चक्कर मारने वाले कांग्रेस के राहुल बाबा और सोनिया गांधी की दौड़ भी अपनी-अपनी मस्जिदों तक ही है..कहां आयेंगे यूपी के इस अफ्रूटफुल बेल्ट में..फिर चाहे ये लोग खून से लिखे अपने व्यथा पत्र ही उन तक क्यों न भेजें...एक तो इन इलाकों की जनता ग़रीब है....दूसरे बेहतर चिकित्सा सुविधायें भी नहीं हैं..ऐसे में कई मां-बाप पैसे खत्म होने पर घर वापसी के लिए भी मजबूर हो जाते हैं...कोई है जो तीस साल से पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस मातमी चीत्कार को सुन सके? ...पिछले तीस सालों में यूपी में बहुत सी बातें बदली..सरकारें बदली..मस्जिद गिरीं...दंगे हुए...कल्याण बदले..मुलायम बदले...माया बदलीं....बहुत कुछ बदल गया...लेकिन मौत का ये सिलसिला पूर्वी उत्तर प्रदेश में बदस्तूर जारी है...10 हज़ार लाशें सरकारी फाईलों में दफ़न हैं..असल में बाबू लोग जो नहीं लिख पाये वो आंकड़ा कहीं आगे होगा...जसवंत को मरे जिन्ना की चिंता है..भाजपा मरे जिन्ना के भूत से डरती है..उधर स्वाईन फ्लू का चेहरा ज़रूरत से ज्यादा डरावना लग रहा है...सभी व्यस्त हैं..हम टीवी वाले भी..लेकिन लगा कि कुछ बच्चे की जिंदगी मरे जिन्ना से कहीं क़ीमती है..सो लोगों का ध्यान खींचा जाये..शायद कोई फर्क पड़ जाये..वैसे एक बात फिर से दुहरा दूं..कि ये ....स्वाईन फ्लू नहीं है...

रवि मिश्रा

Saturday, August 22, 2009

ये थाली बिहार से आई है...

ये सवाल कई लोग पूछ बैठते हैं कि क्या खाते है बिहार के लोग? इस सवाल को संदर्भों के शीशे से देखें तो कई तरह के अर्थ सामने आ जाते हैं। लेकिन आज सोचा कि क्यूं न लोगों को बताने की एक कोशिश की जाये कि क्या खाते हैं बिहार के लोग। यानी रोज-रोज और ख़ास मौकों पर क्या कुछ बनता है बिहार के घरों में। इससे पहले कि शुरू करूं, ये बताना ज़रूरी लगता हैं कि खान-पान की आदतें बिहार में दिनों और त्योहारों और व्रतों से तय होतीं हैं, और किसी भी बिहारी से पूछ लें, खाने के हर आईटम के साथ विविध स्मृतियाँ सुना देगा। तो चलिए ले चलते हैं आपको बिहार के किचन में और देखते हैं कि क्या-क्या है मेन्यू में। पहले ही माफ़ी मांग लेता हूं कि हो सकता है कुछ आईटम छूट जायें।


लिट्टी-चोखा- ये नाम बिहार के बाहर रहने वाले भी जानते हैं। आटा गूँथ कर इसमें चने के सत्तू की स्टफिंग की जाती है। ख़ास बात ये है कि सत्तू को ख़ास तरीके से बनाया जाता हैं जिसमें कई चीज़ें मिलाई जाती हैं। मसलन मगरैल, अज्वाइन, लहसन, अदरख, प्याज, सरसों का तेल, नींबू, हरी धनिया, हरी मिर्च, गोलमिर्च और नमक स्वादानुसार। अब इसे पकाने के कई तरीक़े होते हैं। कोयले पर भी सेंका जाता है, तलते भी हैं, गोयठे यानी उपले में भी पकाया जाता है। काफी जतन से पकाना पड़ता है। बन जाये तो कपड़े में रख कर झाड़ते हैं और घी में लपेटते हैं एक-एक लिट्टी को। वाह क्या स्वाद होता हैं, अक्सर मेरे यहां यानी छपरा में छठ के समय शाम को घर के पुरूष मिल-जुल कर इसे पकाते थे, क्योंकि सभी महिलायें तो व्रत कर रहीं होती है। लिट्टी के साथ बेस्ट कॉबिनेशन होता है चोखा का। चोखा आलू का भी होता है, बैंगन का भी। इनको भी बनाने की अपनी तकनीक है। दोनों के कांबिनेश का स्वाद किसी भी बिहारी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए काफ़ी है।


ठेकुआ- ये ख़ास कर छठ में बनता है, प्रसाद के तौर पर। अरारोट का भाई है या फिर खजूर का रिश्तेदार। वैसे जब हम बिहारी लोग घर से बाहर जाते हैं तो मम्मियां इसे बनाकर कर ज़रूर देती हैं। काफ़ी दिनों तक चलता है। आटे या मैदे से बनाता है, जिसमें गरी यानी सूखे नारियल के चॉप किये टुकड़े, सौंफ और चीनी मिला कर गूंथते हैं। फिर इसे शेप देने के लिए लकड़ी का एक डिज़ाईनर होता है जो इसे अलग-अलग डिज़ाईन देता है। फिर इसे घी या वनस्पति में तलते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की पहचान भी है ठेकुआ।


पिरूकिया- सोच रहे होंगे कि ये क्या नाम है। भई भोजपुरी में तो यही कहते है। समझने के लिए थोड़ा आसान कर दूँ, कई जगह गुजिया कहते हैं। तो समझ में आ गया होगा। ये हमारे यहां तीज में ख़ास तौर पर बनता है। हर घर में काफ़ी संख्या में बनता है। बच्चे तो दिन-दिन भर खाते हैं। मै खुद ही खाता था। टेस्टी होता है।


लाई और तिलवा- ये समझ सकते हैं कि लड्डू हैं। लाई-चूड़ा या चावल को रेत मे भून कर उसे झाड़ कर साफ किया जाता है। फिर उसमें गर्म कर पिघलाया हुआ गुड़ मिला कर बड़े-बड़े गोले बनाये जाते है, दोनों पंजों में आने वाले। थोड़ा सूखने के बाद वो बिल्कुल क्रिस्पी हो जाता हैं। तिलवा यानी तिल के लड्डू भी लगभग वैसे ही होते हैं। सफेद या काला तिल, उसमें लोग बादाम या मूंगफली भी मिलाते हैं, लेकिन ख़ास बात ये है कि लाई और तिलवा साल में कभी भी दूसरे सीज़न में नहीं बनता। घर-घर में बनने वाला ये आईटम जनवरी के महीने में मकर संक्रांति के समय ही बनता है। बच्चे लाई खाते हैं, पंतग उड़ाते-उड़ाते। पूजा में भी इसे चढ़ाते हैं खिचड़ी यानी मकर संक्रांति यानी 14 जनवरी के दिन।


खाजा और गाजा- ये क्या है? तो ये एक ऐसी मिठाई है जो शादियों में ज़रूरी तौर पर बनती है। घर के लोग नहीं बनाते। हलवाई बनाते हैं। मीठा होता है। मैदे से बनता है। चीनी की चासनी जिसको भोजपूरी में पाघ कहते है में डाल कर बनता है। जब लड़की या लड़के वालों की तरफ से गिफ्ट भेजा जाता है तो इन मिठाइयों की कई टोकरियां भी ज़रूर जाती हैं, जिसे अपने पड़ोसियों और रिश्तेतारों में बांटा जाता है। इसी में एक और आईटम है टिकरी-उसी तरह से बना हुआ। आकार ख़ास होता है गोल और चपटा। देखने और खाने पर ज्यादा समझ आयेगा। बिहार की लोक परंपरा का एक हिस्सा है-खाजा

पिट्ठा- पता नहीं कैसे समझांऊ इसे। हो सकता है बिहार की अलग अलग बोलियों में कुछ और नाम हो लेकिन भोजपुरी में यही कहते हैं। ये बस एक ही दिन बनता है भैया दूज या गोधन के दिन। दिवाली और छठ के बीच। कैसे बनता है। चावल का आटा भिगोये चने की दाल को पीस कर स्टफ तैयार करते हैं, भरते है फिर, बॉयल करते है। इडली का कुछ कुछ हमशक्ल, लेकिन हैवी होता है, टेस्टी भी। स्वाद नमकीन मसालेदार, साथ में कोई रसवाली सब्जी मज़े को दुगना कर देती है।


चने का सत्तु यानी बिहारी हॉर्लिक्स- ये तो गर्मियों का फेवरेट है। बिहार का आदमी गर्मियों में यही ढूंढ़ता नजर आ जायेगा। पानी में घोलकर, साथ में भूने जीरे का पाउडर, गोलमिर्च का हल्का पाउडर, कुछ कतरे हुए प्याज नमक और ऊपर से नींबू। बिहार के शहरों में जो भी सार्वजनिक जगह है वहां आप आसानी से पा सकते है इस बिहारी हार्लिक्स को। काफ़ी रिफ्रेशिंग होता है कम से कम यहां के लोगों के लिए।

भूंजा- ये भी बिहारी खान-पान का अहम हिस्सा है। शाम को तो अक्सर इसकी तलब होती है। ठेलों पर, खोमचों में हर नुक्कड़ पर आपको ये मिल जायेगा। इसमें कई चीज़े मिक्स करते है, मसलन, भूना हुआ चना, मक्का, मूंगफली, दालमोट, मूढ़ी या चूड़ा तला हुआ चना। ये सब मिक्स करते हैं। गांवों में लोग खुद ही घर में ये सब रखते हैं और शाम का उनका यही नाश्ता होता है। शहरों में लोग खरीद कर खाते है। काफी चटपटा और तीखा होता है।

जलेबी-पूड़ी- ये अमूमन सुबह का नाश्ता है। बिहारी लोग जलेबी, कचौडी और साथ में कोई रसवाली मसालेदार सब्जी पसंद करते हैं। मैं खुद घर जाता हूँ तो दोस्तों के साथ अगली ही सुबह पहुंच जाता हूँ इसका आनंद उठाने।

बजका- दरअसल ये एक प्रकार का पकौड़ा है, बल्कि पकौड़ा ही है। कई चीज़ो का हो सकता है- आलू, फूलगोभी, बैंगन, कच्चा केला और लौकी आदि।
चटनी- बजका की सहेली, इसके बिना इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। भोजपुरी में तो गाना भी है- फुलोरी बिना चटनी कइसे बनी। आमतौर पर खाने में भी इस्तेमाल होता है।


साग- ये भी काफ़ी अहम है। जाड़े के दिनों में चने की साग लोग शौक़ से खाते है। इसके अलावा पालक, सरसों, मूली, बथुआ इनके साग भी खाये जाते हैं। बाहर के लोगों के लिए बथुआ समझना थोड़ा मुश्किल है। मै समझा भी नहीं पाऊँगा।

रवि मिश्रा

Sunday, August 09, 2009

खदेरन की दाल-रोटी का सवाल है माई-बाप


खदेरन के हाथ में 100 रूपया था ...घर पर बच्चे थे ..पत्नी थी..बीमार मां-बाप थे...खाने पीने का सामान लेते हुए जब वह घर पहुंचा तो सारे पैसे ख़त्म हो गये..कल के लिए कुछ बचा ही नहीं..दवा के लिए भी पैसे नहीं बचे ..क्या लेके आया ..लिस्ट बता दूं...दाल थोड़ी सी..चावल थोड़ा सा...तेल थोड़ा सा..और थोड़ी-सी सब्ज़ी..भूख तो बड़ी बीमारी है..सो बाक़ी बीमारियों के लिए कल दवा ले लेगा..भूख की दवा आज..यही सोचा था खदेरन ने...रात बीत गई..सुबह हो गई...दिन निकल गया..शाम को फिर खदेरन वापस घर की ओर..सवाल वही..क्या-क्या लेना है..रोज़ की तरह खाने-पीने का सामान..और दवा....दुकान पर पहुंचा...लेकिन नई मुसीबत सामने...दाल और चावल में उसे किसी एक को चुनना था..दोनों की क़ीमते बड़ी हो गई थीं, उसकी सौ टकिया छोटी पड़ गई..सो आज घर आया ..लेकिन दो सामान कम..दाल नहीं लाया...लेकिन प्रणब मुखर्जी और शरद पवार को नहीं पता कि खदेरन की फिक्स्ड कमाई..और अनफिक्स्ड महंगाई में क्या संबंध है..संसद में दोनों ने इस बात को ऐसे कहा मानो कोई बड़ी बात नहीं..और थोड़ी बहुत है भी तो अदृश्य अंतरराष्ट्रीय शक्तियां इसके लिए जिम्मेदार है...वो बेचारे क्या कर सकते हैं...खदेरन पहले से ही दाल-रोटी खा रहा था...सब अडजस्ट कर रहे हैं..वो भी अब केवल भात ही खायेगा और अपने परिवार को खिलायेगा...बाक़ी बीमार लोगों के लिए ..एक ही रास्ता है..सीधे उपर का ..भगवान भरोसे अगर ठीक हो गये तो अच्छी बात होगी...बिल्कुल सरकार के जैसा..मानसून बरस गया तो अच्छा नहीं तो ....देश भगवान भरोसे...जब ये दोनों सम्मानीय लोग संसद में प्रवचन दे रहे थे..तब ज़हिर है इनका पेट भरा होगा..पेट में क्या होगा नहीं बता सकते..लेकिन चुनाव के दौरान दोनों की संपत्ति का हिसाब देख कर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है...कौन इनके घर में दवा-दारू की दिक्कत है...सब तो पब्लिक की कृपा से उपलब्ध है...और ये ग़रीबी तो आम लोगों की बीमारी है..फ्लू जैसी..डरावनी ..पर रोक नहीं सकते..दोनो पर सरकार चिंता जता सकती है..योजनायें बना सकती है..पर इलाज नहीं कर सकती ...सरकारी काग़जों में ही लिखा था कहीं कि इस देश में 24-25 फ़ीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं..और कमाल की बात है....इस रेखा की रिसर्च पर सरकार काफ़ी होमवर्क कर चुकी है..लकड़वाला कमेटी आई गई..पर रेखा ज्यों की त्यों बनी हुई है..और सारा खेल रेखा के इस पार और उस पार का है..इस पार खदेरन है ..उस पार सरकार...सूखा आया..तो कईयों के चेहरों पर हरियाली छा गई..बुंदेलखंड की समस्या को सुलझाने के लिए राहुल बुंदेलखंड प्राधिकरण का चालीसा पढ़ने लगे..कांग्रेसी वानरसेना सेना की तरह माया के जाल को तोड़ने के नारे लगाने लगे...मैदान में एक ही नारा है ..आम आदमी..आम आदमी..पर दोगलापना कब दिखता है..जब वित्तमंत्री और कृषि मंत्री सदन के अंदर होते हैं..ऐसे बोल रहे है मानो कोई बड़ी बात नहीं..शरम नहीं आती इनको ..लोगों का विश्वास पाया है..और नतीजा ये दे रहे है कि ..दाल रोटी नही..दाल या रोटी खाये खदेरन...बंद कीजिये ये दोगलापना...नहीं कर सकते तो गद्दी छोड़िये ..कोई मंत्री कैसे कह सकता है ..कि हिंदुस्तान के ग़रीब को वो दाल-रोटी नहीं मुहैया करवा सकता..बंद कीजिये अपना ऐशो-आराम....खदेरन एसी में बैठे, पेट में फाईवस्टार होटलों का खाना ठूसे और महंगी गाड़ियों में बैठकर संसद में आने वाले नेताओं के मुंह से अपनी बेहाली पर ऐसी अकर्मण्यता वाली भाषा नहीं सुनना चाहता..दिल्ली में क्यूं 45 डिग्री का ताप सह कर, डीटीसी में बैठ कोई भी नेता ..संसद नहीं पहुंचता..नहीं है भाई साहब वो आदत नहीं है..ये जनता के नुमाइंदे है..बात सुरक्षा की करते हैं..ये बहाना है...एक और दोगलापना...इनको चुनने वाली जनता तो दिन रात अपने चीथड़े उड़ते देख रही है..कहीं सड़कों पर..कहीं बसों में..फिर किस मुंह से ये लोग अपनी सुरक्षा का हवाला देते है..एक नागरिक के तौर पर किस मायने में इनकी जान खदेरन से ज्यादा महंगी है... नेताओं की हिम्मत क्यों नहीं कि वो तमाम फ़िजूलखर्च बंद कर त्याग का परिचय दिखाये..उस खदेरन के लिए जिसके लिए आज दाल या रोटी ही विकल्प बच गये हैं.....क्या सच में कृषिप्रधान देश इतना लाचार है कि खदेरन और उसके जैसे लाखों करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नहीं मुहैया करवा सकता....क्या हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में इतनी रक़म नहीं जमा कि हम अपने लोगों का पेट भरने के लिए कुछ ज्यादा खर्च कर सकें..क्या सरकारी पंजा इतना कमज़ोर है कि जमाखोरो की गरदन पकड़ सके..क्या सच में इतनी तरक्की का दंभ भरने वाला देश ये गवारा करेगा कि खदेरन दिन ब दिन अपना पेट काटे..अपने बूढ़े मां बाप को इलाज के अभाव में मरने के लिए छोड़ दे...दिल्ली में दौड़ती मेट्रो ट्रेन शोषण की शोभायत्रा लगती है...ऊंची-ऊंची अट्टालिकायें..भूख और बेबसी से मरे लोगों की क़ब्रे लगती हैं..गांधी को मानने वाले नेताओं को याद नहीं शायद . बापू ने भी कहा था...किसी भी काम को लेकर जब तुम्हारे मन में कोई शंका हो तो मेरा मंत्र इस्तेमाल करो..सबसे कमजोर आदमी को याद करो..और देखो कि तुम जो करने जा रहे हो..उससे उस आदमी के जीवन में क्या फर्क पड़ेगा....
हमारी क़िताबों के पिछले पन्ने पर ये लिखी बात हम तो पढ़ गये ..पर बापू का नाम रटने वाले लोगों ने शायद ये नहीं पढ़ा...मेरे हिसाब से संसद के अंदर अब उन लोगों की तस्वीरे चारों ओर लगा देनी चाहिए..जो भूख़ और ग़रीबी के ग्रास बन गये..फिर चाहे वो बुंदेलखंड का ग़रीब किसान हो..या विदर्भ में आत्महत्या करने वाला किसान. ..इन मरे हुए लोगों की तस्वीर देख शायद हमारे वित्तमंत्री और कृषि मंत्री को ये याद आ जाये ..कि ये जगह किस लिए है..वो किस लिए हैं..सारे नेता किस लिए हैं...साथ में खदेरन की भी एक फोटो हो....ताकि उसकी भी याद रहे उनको कि आज फिर वो दुकान पर जयेगा..लेकिन इसबार हमें उसे ये विकल्प नहीं देना है कि वो दाल या रोटी की सोचे...सोचे तो दोनो एक साथ..यानि जब शाम हो तो उसके घर की थाली में दाल रोटी दोनों हों....

रवि मिश्रा

Saturday, May 09, 2009

नोटिस है या नौटंकी

क्या मज़ाक़ लगा रखा है चुनाव आयोग ने। सन्नी देओल की दामिनी फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है जब वो भरी अदालत में ये कहता है कि तारीख पर तारीख़....तारीख़ पर तारीख़... मन करता है...चेप लूं...और बोलूं..नोटिस पे नोटिस ..नोटिस पे नोटिस। जया प्रदा पर चुनाव आचार संहिता का जब एक और मामला फिर से दर्ज हुआ, तो कुछ ऐसा ही लगा। एक सरकारी नोटिस से इस लोकतंत्र का तथाकथित राजा यानी आम आदमी के हाथ पैर फूलने लगते है। लेकिन जया जी पर आयोग की घुड़कियां असर डालती नज़र नहीं आती..नोटिस नहीं हो गया नौटंकी हो गयी। हम जैसे ख़बरियों के लिए हेडलाईन हो गई। साथ में पता चली नेताओं के सामने आयोग की औक़ात। ये कोई पहला मामला नहीं है। कोई पार्टी नहीं ह, जिसके नेताओं को आचार संहिता की अनदेखी करने के लिए नोटिस न जारी हुआ हो। सरकार की रेल चला रहे लालू हों या उनकी धर्मपत्नि राबड़ी हो। जया प्रदा हों। छुटभैया नेता हों। गाली गलौज़ हो, बिंदी बांटू अभियान हो या मुलायम जी और गोविंदा के नोट लुटाने जैसी दरियादिली हो। ये सब चुनाव आयोग की आँखों के सामने आया। आंखों में किरकिरी भी हुई। नतीजा नोटिस पर नोटिस। और दूसरी ओर से सफ़ाई पर सफ़ाई। जवाब पर जवाब। और हर जवाब के साथ आयोग लाजवाब। या तो चुनाव आयोग नोटिस के अलावा कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा रहा है, या फिर इन खद्दरधारियों के सामने नोटिस और उस पर सफ़ाई एक रूटीन वर्क बन गया है। सही भी है- चुनाव है तो जोश आ ही जाता है। आदमी कुछ बोल ही जाता है। कुछ ग़लत जैसा फ़ील नहीं होता। और भई दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का शो चल रहा है, कुछ तो मसालेदार आईटम होना ही चाहिए नहीं तो रंग नहीं जमेगा। पब्लिक बोलेगी कि इस बार के इलेक्शन में कुछ मजा नहीं आया। तो शो की टीआरपी बनी रहे। नेताओं की टीआरपी बनी रहे। कुछ न कुछ तो करते रहना पड़ेगा भाई। ऐसे में जनता जनार्दन का मूड देखा जायेगा या कि चुनाव आयोग की बंदरघुड़की, .डर नहीं लगता। अरे वरूण गांधी इतना कुछ बोल गया, तो चुनाव आयोग कुछ कर ही नहीं पाया। मुख्तार अंसारी का क्या कर पाया है चुनाव आयोग। इसी चुनाव आयोग के राज में फूलन देवी भी चुनाव लड़ चुकी है। शहाबुद्दीन जैसे लोग लोगों की नुमाईन्दगी करते आये हैं। ख़ून बहता रहा है। पैसा लूटता रहा है। लोग पाला बदलते रहें हैं। वोट ख़रीदते रहे हैं। वोट बिकते रहे हैं। बूथ लुटते रहे हैं। चौराहे पर बोली लगती रही है उस भरोसे की जो आम आदमी ने जताया इन तथाकथित अपने सेवकों पर। और ये सब कुछ होता रहा है चुनाव आयोग के सामने। चुनाव आयोग के रहते। तब अगर नेता इसके नोटिस को नौटंकी समझे तो समझ में आता है आयोग का असर। चावला जी इन नोट वालों को नोटिस नहीं आपका डंडा समझा सकता है। आप इस बात को समझे। नहीं तो सारी कोशिशे अंडा हो जायेंगी यानी ज़ीरो। नेताओं के फेवर में एक शायरी चुनाव आयोग के नाम-

मिटा सके हमको ये ज़माने में दम नहीं
ज़माना हमसे है ज़माने हम नहीं।


-रवि मिश्रा (लेखक ज़ी (यूपी) में न्यूज़ एंकर हैं)

Tuesday, May 05, 2009

गिरता मतदान- लोकतंत्र या अल्पतंत्र

रवि मिश्रा ओसामा से ओबामा तक और मैडोना से मल्लिका तक की ख़बर, हम तक पहुँचाने वाले एक ख़बरिया चैनल की बोलती ज़ुबान हैं। ज़ी (यूपी) में न्यूज़ एंकर रवि मिश्रा छपरा, बिहार से चलकर नोएडा पहुँचे हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 15वें महापर्व में वोटरों का घटता रूझान इन्हें चिंतित कर रहा है।

चुनाव आयोग ने जब चुनाव की घोषणा की तो कई आंकड़े दिये. सत्तर करोड़ से भी ज्यादा मतदाता बताये और ये भी बताया कि कितने नये मतदाता जुड़े हैं वोटर लिस्ट में. सुनकर लगा कि हमारे लोकतंत्र का दायारा बढ़ता जा रहा है. अब जबकी धीरे - मतदान आगे बढ़ रहा है और ये बात सामने आ रही है कि ये बड़ी संख्या में वोटर मतदान नहीं कर रहे हैं. मतदान का कम प्रतिशत भले ही चिंता की बात है- चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के लिए, लेकिन ये एक बेहद गंभीर संकेत है अल्पतंत्र की ओर बढ़ते क़दम का.पप्पू को जगाने के लिए जागो रे जैसे अभियान भी चले लेकिन लगता है पप्पू पप्पू ही बना रहना चाहता है.वोट नहीं डालता. ये सवाल तो ये है ही कि क्यों वोटिंग प्रतिशत कम है. देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश चालीस और पचास प्रतिशत के बीच झूल रहा है, जहां के चुनावी दंगल में नेता जितना ताल ठोक रहे हैं वहीं जनता ताली तक बजाने के मूड में नज़र नहीं आती. कारण कई हैं. पर इस सबसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के आलोचकों के उस तर्क को बल मिलता है जो ये कहते हैं कि लोकतंत्र कुछ लोगों का ही तंत्र हैं. बहुमत सत्ता की भागीदारी से दूर रहती है. जब उत्तर प्रदेश में 44-45 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया तो ये बात तो तय है कि नतीजे भी इन्हीं के दिये वोटों पर तय होंगे.यानि 55 प्रतिशत की आबादी बिना मत व्यक्त किए एक सरकार को स्वीकार कर लेगी. अगर पूरे भारत की भी बात कर लें तो हार जीत भी 50-60 प्रतिशत मतदान पर तय होगा. पार्टियों की हार जीत इन्ही वोटों पर तय होगी. फिर हार का अंतर कितना भी हो , जीता हुआ प्रत्याशी उस पूरे क्षेत्र के लोगों की नुमाइंदगी करेगा. सरकार बनवायेगा.ये कैसा शासन होगा जहां कम वोटिंग में भी हार जीत का फ़ैसला हो जाता है. सरकारे बन जाती हैं. अगर वोटिंग 40 प्रतिशत है जो बाक़ि के 60 प्रतिशत लोगों की राय लिए बिना हार जीत का फ़ैसला हो जाता है. और फिर फ़ैसला होता उनके पांच सालों का. इस अल्पतंत्र के तत्व के साथ पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था का दंभ कैसे भरता है हमारा सिस्टम, समझना मुश्किल है. वोटों का लगातार गिरता हुआ प्रतिशत हमें असल में एक ऐसी व्यवस्था की तरफ ले जा रहा है जहां अल्पमत बहुमत के छद्म रूप में दिखता है और लोकतांत्रिक व्यवस्थ का झूठा आभास दिलाता है. कई देशों में ख़ास कर सोवियत संघ के टूटे हूए घटकों में ऐसी व्यवस्था है जिसमें 50 प्रतिशत से कम वोटिंग होने पर हार-जीत का फ़ैसला नहीं होता. पुन: मतदान कराया जाता है. ये सुनिश्चित किया जाता है जो राज करेगा उसे असल में बहुमत का समर्थन प्राप्त है. अगर भारत में ये सिस्टम लागू हो जाये तो अल्पतंत्र की तरफ़ बढ़ते क़दम पर एक अवरोध लगाया जा सकता है. लेकिन ये स्पीडब्रेकर लगाने के लिए शायद चुनाव आयोग को ये सुनिश्चत करना होगा कि वोटिंग प्रक्रिया और ज्यादा प्रो- पीपुल हो. ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान प्रक्रिया का हिस्सा बन सके. वोटरों की उदासीनता और नेताओं का चरित्र देखकर यह निकट भविष्य में आसान नहीं दिखता. और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक पप्पू पप्पू बना रहेगा और इस लोकतंत्र के अल्पतंत्र द्वारा शासित रहेगा.