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Wednesday, September 09, 2009

आईए शहर और गांव के बीच की लकीर मिटाएं...


जब भी गांव के विकास की बात आती है ...शहरों की खिंचाई शुरू हो जाती है..ये थोड़ा सा अन्याय है मुझे लगता है..शहर विकास का एक नैसर्गिक पड़ाव है..ऐसा नहीं होता तो विकास के चश्मे से शहरों का भी वर्गीकरण नहीं होता..मसलन छोटा शहर..बड़ा शहर..सिटी..मेट्रो सिटी..कॉस्मोपॉलिटन सिटी..वगैरह वगैरह..छोटे शहरों के लोगों का भी मेट्रोपॉलिटन के सामने कुछ ऐसा ही रोना है...पिछड़े रह जाने की ऐसी ही दुहाई है..सबकुछ नहीं मिल पाने की ऐसी ही कसक है..लेकिन उनको नहीं मालूम कि दिल्ली का दिल भी लंदन या न्यूयार्क को देख कर जल सकता है...या फिर ये कह सकता है कि वो आगे निकल गये..हम कहां रह गये...ये शिकायत व्यक्तिगत तौर पर मुझे थोड़ी 'रिस्पेक्टिव' या 'रेलेटिव' लगती है. बहरहाल, ये सवाल कि शहरों ने गांवों को क्या दिया है.. बताने की ज़रूरत नहीं है..शहर उन लोगों का आलंब बने जो बाढ़ या सूखे में अपना सबकुछ खो बैठे..जब गांव घर में पानी घुसा तो शहरों की तंग गलियों ने आसरा दिया..जब गांव के स्कूल बदहाल हो गये..तब शहरों ने हमें ये क़ाबलियत दी कि हम पुरज़ोर ढ़ंग से अपने गांवों के लिए आवाज़ उठा पाने की ताक़त रखते है..आज हमारे गांवों की बात हमारे मुंह से सुनी और समझी जा रही है तो बीच में कहीं न कहीं एक शहर ज़रूर खड़ा रहता है..कमज़ोरी नहीं बल्कि हौसला बनकर..अत्मविश्वास बनकर. गांवों की जो तस्वीर हम अपने आनेवाले दिनों के लिए बुनते हैं..जिसे दिमाग के काग़ज से ज़मीन की ठोस परत पर उतारना चाहते है...तो कल्पना की वो जमीन भी कहीं न कहीं इन शहरों ने मिल कर बनाई है....बीच की लाईन क्यों बना देते हैं हम..मान लीजिए कि दिल अगर गांव है..वैसे बापू ने भी माना था कि भारत की आत्मा गांवो में ही बसती है...तो इस शरीर का दिमाग शहर है..शहरों का आधार गांव रहे है..इसमें कोई दो राय नहीं...यहां के फाईवस्टार होटलों में परोसा जाने वाला खाना..और उसे परोसने वाला दोनों ज्यादातर गांवों के ही होते है...शहर के हाथ गांव से आते है...लेकिन ये भी नहीं भूलना होगा..कि शहर इन हाथों को थाम भी लेते हैं..बीच की लाईन को मिटा कर बात करते हैं..ये मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि गांव पीछे छूट गये..कारणों की विवेचना नहीं करूंगा...लेकिन गांवों की बड़ी ज़रूरतें क्या हैं इस समय..उनके पास क्या कुछ है जिससे इन ज़रूरतों को पूरा किया जा सकेगा...ये समझना ज्यादा ज़रूरी है..गांवों के पास कुछ चीज़े ऐसी हैं जो शहरों के पास नहीं हैं....गांवों-ज़रूरतों को तोड़ कर देखेंगे तो शहरों के मुक़ाबले छोटी लगेंगी लेकिन ग्रासरूट लेवल पर सब मिलजुल कर अभाव की बड़ी तस्वीर बना देते हैं....तो मेरे हिसाब से हल ग्रास लेवल से शुरू होना चाहिए..गांव की ताक़त क्या है?..गांवों की असल ताक़त उनका सस्ता संसाधन है..बात चाहे प्राकृतिक संसाधनों की हो, मानव संसाधन की हो ..हर मामले में उपलब्धता ज्यादा है...लेकिन इन संसाधनो के साथ सबसे बड़ी चुनौती इनकी क्वालिटी को लेकर...सबसे ज्यादा काम की ज़रूरत मानवसंसाधन के विकास और उसके इस्तेमाल पर करने की है..डीसेंट्रलाईज़ेशन ऑफ डेवलपमेंट..अगर इस संकल्पना पर काम किया जाये तो विकास के विकेंद्रीकरण का अंतिम बिंदु गांव का कोई वही आदमी होगा..जिसे हम शहरों की ओर पलायन करने से रोकना चाहते हैं..जब बिहार के मुख्यमंत्री ने ये कहा कि राज्य की श्रम शक्ति का 50 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा राज्य से बाहर है तो पलायन की गंभीरता समझी जा सकती है..तो जब हम विकास के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं तो यहीं से शहरों की गांवों के अंदर भूमिका शुरू हो जाती है...इस प्रक्रिया में वो सबकुछ आता है जो शहरों की तरफ़ गांवों के लोगों को खींच कर ले जाता है..कारण चाहे ज़रूरत हो या सपने...आउट ऑफ द बॉक्स जाकर क्यों नहीं सोच पाते....हर चीज़ को विकेंद्रीकृत कर दे- शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय सबकुछ. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अंग्रेजी बोलने-पढ़ने का माहौल हम गांवो और छोटे शहरों में पैदा कर दे..फिर वहां से विलेज कैंपस कर वहां के युवा को किसी बीपीओ में उसे नौकरी दे दे..और ये आउटसोर्सिंग गांवो से ही हो..ये सुविधा दिल्ली से नहीं हटेगी तो लोग भागेंगे...गया का पटुआ टोली गांव एक बेहतरीन उदाहरण है..जहां जुलाहों की बस्ती से हर साल आईआईटी में बच्चे दाखिला लेते है..पटना का सुपर थर्टी भी बेहतरीन मिसाल है....ये लोग महंगी पढ़ाई करने के लिए दिल्ली नहीं जा सकते ...लेकिन अच्छी पढ़ाई अपने घर में ज़रूर कर लेते ...गांवों में और छोटे शहरों में जहां बिजली नहीं रहती वहां के लड़के-लड़कियां एजुकेशन क्लब बना कर तैयारियां करते है..और खुद को साबित करते हैं..अगर इन युवाओं को ये शहरी सुविधायें विकेंद्रित हो गांव में मिलें तो ..कौन जाये कमबख्त अपने गांव की गलियां छोड़कर....शहर की सड़कें जब हरियाणा, पंजाब, गोवा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों के गांवों तक विकेंद्रीकृत होती हुई पहुंची..तो शहर की चीज़े भी वहां तक गई..बस यही प्रक्रिया हर मामले में हो..एक बार बीबीसी में ये पूछा गया कि एक दिन के लिए पीएम बनने पर आप क्या करेंगे? तो किसी का सुझाव था कि एक दिन के लिए कैबिनेट की बैठक किसी गांव में कराऊंगा..उस एक दिन के चक्कर में उस गांव की कई चीज़े सुधर जायेंगी..मुझे अच्छा लगा..क्या शहरों में,राजधानियों में होने वाली इस तरह की बैठकों ,सम्मेलनों, सभाओं, महोत्सवों को हम गांवों में नहीं कर सकते ...यक़ीन मानिये कोई मुश्किल काम नहीं है..अलबत्ता गांवों में रोज़गार के साथ-साथ कई चीज़ो का इज़ाफा होगा...इन सब पर तो गांव का भी हक है... यानि शहरों का विकेंद्रीकरण ऐसे भी हो सकता है.. इससे शहरों को भी एक बड़ा फ़ायदा होगा...एक तो उनपर दबाव घटेगा..दूसरे आयोजनों का खर्च घटेगा...शहरों में स्लम्स के लिए टूरिज़म नाम की चीज विकसित हो जाती है..इससे लाख बेहतर है कि विलेज टूरिज़म विकसित करें..दुनियां को गांवों के दर्शन करायें..सरकार अपने किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए गांवो को प्राथमिकता दे..खेलों के स्टेडियम गांवों में क्यों नहीं बने...जगह काफ़ी है वहां ..क्यों शहरों में भीड़ बढ़ाते हैं हम... बडी बात ये है कि गांव के लोग भी ये महसूस कर पायेंगे कि हम भी इन सब चीज़ो से जुड़े है..फिर शहर और गांव के बीच की जो लाईन है वो हल्की होती जायेगी...जब मै विकेंद्रीकरण की बात करता हूं तो यही सोचता हूं...सुविधाओं के गढ़ बन चुके बड़े शहर टूटें..और ये सविधायें छोटे शहरों और गांवों तक जायें...सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात पर तो पहल बहुत तेज़ी से हुई..लेकिन दिल्ली में जमा हुई सुविधाओं के बारे में ऐसा विचार क्यों नहीं आया..आख़िऱ में मै आपको एक सपने के साथ छोड़ जाता हूं....आंखें बंद कीजिए..और देखिये...मऊ का बीपीओ सेंटर..छपरा के किसी गांव का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम..गुंटूर के गांव में बना आईआईएम....उड़िसा के चिल्का गांव में कैबिनेट मीटिंग भवन...प्रगति मैदान का मोटर एक्सपो श्रीगंगानगर के किसी गांव में....नागालैड या सिक्किम के किसी पहाड़ी गांव में राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव....आंखे खोलिये ..आपको लगता है कि इस एक क़दम से उन जगहों की इससे तस्वीर बदेलगी?..नहीं लगता तो आप इसे मेरा यूटोपिया कह सकते हैं..मुझे बुरा नहीं लगेगा...

रवि मिश्रा

Tuesday, August 11, 2009

मेरी अच्छी बहन लता किसी भी क्षण मर सकती थी

ब्लू फिल्म-भाग 6

ज़िंदगी ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं हो सकती थी। लता अस्वस्थ रहने लगी थी। वह नींद से अचानक चौंककर जग जाती और चिल्लाने लगती। कभी मेरा नाम लेकर, कभी माँ का, कभी बिल्ली, कभी दीवार, कभी छाया। शुरु में हमने सोचा कि कोई डरावना सपना देख लेती होगी। लेकिन फिर उसका पसीने में भीगकर चिल्लाते हुए जगना हर रात होने लगा तो हमें चिंता हुई। अब वह जागने के बाद भी डरी रहती और हममें से किसी को नहीं पहचानती। हम पास जाने की कोशिश करते तो डरकर और चीखती। माँ कमरे का दरवाज़ा कसकर बन्द कर देती थी कि कहीं पड़ोसी न सुन लें। अगर माँ उसके साथ किसी रात अकेली होती और वह चिल्लाती तो माँ उसे थामने से पहले दरवाज़े की ओर भागती। कई बार हड़बड़ी में दरवाज़ा जल्दी से बन्द नहीं होता था और पड़ोसी कुछ न कुछ सुन ही लेते थे। वैसे दरवाज़े इतने भी बढ़िया नहीं थे कि आवाज़ को रोक पाते। कभी-कभी तो वे हवा को भी नहीं रोक पाते थे। बंद दरवाज़े के बाहर खड़े होकर फूंक मारो तो उसका थोड़ा हिस्सा दूसरी तरफ भी महसूस होता था। यह वहम भी हो सकता था।
दस पन्द्रह मिनट बाद लता सामान्य हो जाती थी और भोलेपन से पूछती थी कि तुम सब आधी रात में बैठकर मुझे क्यों घूर रहे हो? कई दिन तक तो हम उसे कुछ नहीं बताते थे। मैं अपने कमरे में जाकर पड़ जाता। माँ उसे अपने पास खींचकर लाड़ से थपथपाकर सुलाती थी। हर रात हम अपने अपने बिस्तर पर पड़े नींद की नहीं, उसके जागने की प्रतीक्षा करते रहते थे। माँ पानी का एक गिलास और रामायण सिरहाने के पास मेज पर रखकर सोती थी। उसके सोने के बाद एक चाकू उसके तकिये के नीचे सरका देती थी, लेकिन सब बेअसर रहता था। हम हर दिन और चुप, और चिंतित, और निराश होते जाते थे।
एक रात उसके जागने के इंतज़ार में हम तीनों को ही नींद आ गई। पिताजी की आँख अचानक खुली तो उन्होंने लता के पलंग की ओर देखा। वह वहाँ नहीं थी। कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था। वे हड़बड़ाकर उठे और माँ को उठाया। माँ ने मुझे आवाज़ लगाई। तब तक पिताजी आँगन में पहुँच चुके थे। मैं और माँ दौड़कर उनके पीछे पहुँचे तो देखा कि वह मेन गेट वाली दीवार पर चढ़कर बिल्कुल सीधी खड़ी है। गली की ट्यूबलाइट की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। वह एकटक हमारी ओर देख रही थी। हम भीतर तक काँप गए। वह शुद्ध डर था, जो एक बार महसूस हो जाने के बाद जीवन भर सुख-दुख के हर क्षण में याद रहता है। लता की फ़िक्र भी उस डर के कई क्षण बाद हमारे ज़ेहन में आई।
वह दीवार करीब बारह फ़ुट ऊँची होगी। वह उस तरफ गिरती तो पक्के चबूतरे पर गिरती और इस तरफ़ गिरती तो पक्की ईंटों के फ़र्श पर। पिताजी दौड़कर लोहे के दरवाज़े पर से चढ़ने की कोशिश करने लगे। माँ दीवार के सहारे उसके बिल्कुल नीचे जाकर बाँहें फैलाकर खड़ी हो गई और मुझे कुछ भी नहीं सूझा। मैं बुत बना उसे देखता रहा। वह उस लता की तरह नहीं थी, जो मुझे हर साल राखी बाँधती थी और पैसे माँगती थी। उसकी दृष्टि का आत्मविश्वास मेरे सोने वाले कमरे में टँगी तस्वीर में कलेक्टर के हाथों ईनाम लेती लता से कई गुना अधिक था। वह बहुत भयंकर थी और बेबस भी। मैं आकर अपने बिस्तर पर लेट गया। मुझे पहली बार इतना हीन होने का अहसास हुआ। मैं जैसे कुछ भी नहीं था। मेरी अच्छी बहन लता किसी भी क्षण मर सकती थी। मुझे उसे दीवार से उतारकर अन्दर लाने में माँ-पिताजी की मदद करनी चाहिए थी, लेकिन मैं वह भी नहीं कर पाया। मैं निष्क्रियता की हद तक उदास था। यदि उस रात मेरी मौत का फ़रमान मुझे सुनाया जाता तो मैं उससे शत-प्रतिशत सहमत होता।
जब माँ और पिताजी उसे अन्दर लेकर आए तो मुझे रागिनी की बहुत याद आ रही थी। मैं उसी समय उससे बात करना चाहता था। फ़ोन मेरे कमरे में होता तो शायद कर भी लेता। लेकिन उसने अपना नम्बर मुझे नहीं दिया था। मैं पहले शिल्पा के घर तीन बार घंटी बजाता और यदि वह जग रही होती और इशारा समझ जाती तो रागिनी को फ़ोन करके मुझसे बात करने के लिए कहती। मगर इतनी रात को यह सब होना बहुत मुश्किल था और वह भी तब, जब फ़ोन दूसरे कमरे में रखा हो।
माँ रोती जाती थी, लता बेहोश थी, पिताजी उसका माथा मल रहे थे और मैं एक लड़की को याद कर रहा था, जो अपने पति के बिस्तर पर आराम से सो रही होगी। मैं यह भी सोच रहा था कि किसका हाथ कहाँ होगा और किसके पैर कहाँ? लेकिन मैं बुरा नहीं था, मज़बूर था। बहुत कमज़ोर भी।
आख़िर मैं उठकर दूसरे कमरे में गया। बल्ब की पीली रोशनी में पिताजी और भी बूढ़े नज़र आ रहे थे। लता के माथे पर तेजी से चलती उनकी उंगलियाँ कहीं ठहरकर रो लेना चाहती थीं। मेरे मन में आया कि जब तक नई सरकार नहीं आती, मुझे किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा लेना चाहिए। मैंने पिताजी से लेट जाने के लिए कहा। उन्होंने रुककर मेरी ओर देखा और उठकर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए। मैं लता के सिरहाने बैठकर उसका सिर दबाता रहा। माँ रोती रही।

गौरव सोलंकी
कहानी जारी है...