Saturday, March 21, 2009

सोने का पिंजर (9)

नौवां अध्याय

अमेरिका में हिंदुस्तानी शान से हिंदी बोलता है....

हम अमेरिका हिन्दी सम्मेलन के निमित्त गए थे तो हिन्दी की बात भी करनी होगी। सच तो यह है कि पूरा अमेरिका घूम आइए आपको हिन्दी ही हिन्दी दिखाई और सुनाई देगी। इतने हिन्दुस्तानी वहाँ बसे हुए हैं और सभी को अपनी पहचान भी स्थापित और सुरक्षित रखनी होती है तब हिन्दी का ही सहारा रहता है। फिर जहाँ भारतीय हों वहाँ भारतीय खाना तो अवश्य ही होगा। शहर में कई-कई भारतीय रेस्ट्रा, वहाँ खाना भी हिन्दुस्तानी और भाषा भी हिन्दी। भारतीय खाने का जवाब नहीं और इसी कारण क्या अमेरिकी और क्या अन्य सभी वहाँ आते हैं। जब खाना खाने आते हैं तब कुछ न कुछ तो हिन्दी के प्रति आकर्षण पैदा हो ही जाता है। हिन्दी वहाँ खाने और फिल्मों के कारण ही पसन्द नहीं की जाती है, उसका एक ठोस कारण भी है। युवा दंपति आकर बस गए अमेरिका, कुछ दिन मौज-मस्ती कर ली, फिर बच्चे हो गए। जैसे ही बच्चे बड़े होने लगे कि डर सताने लगता है। कहीं ये अपनी भाषा नहीं भूल जाएं, अपने संस्कार नहीं भूल जाएं? हम तो भारत में अपने घर-परिवार को छोड़कर यहाँ आकर बस गए लेकिन यदि हमारे बच्चे पूर्णतया अमेरिकी बन गए तो फिर हमारा भविष्य क्या होगा? जिस राम की कथा को उन्होंने भुला दिया था उसी राम की कथा को वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। पिता का स्वार्थ है कि बच्चे अपने संस्कारों से जुड़े रहें इसलिए हिन्दी सीखे और बच्चों का स्वार्थ है कि हिन्दी फिल्में और गाना सुनना है तो फिर हिन्दी तो सीखनी ही पड़ेगी। बिना हिन्दी सीखे हिन्दी फिल्मों का आनन्द कैसे लिया जा सकता है?
इण्डियन कम्यूनिटी सेंटर पर कार्यक्रम चल रहा था, एक बच्चा बड़ा अच्छा गाना गा रहा था। उससे पूछा गया कि क्या तुम्हें हिन्दी आती है, तो वह बोला कि नहीं गाना याद कर लिया है। जब गाना याद हो गया है तब हिन्दी भी दबे पाँव उसके अन्दर उतर ही जाएगी। वहाँ सारा दिन हिन्दी और भारतीय ज्ञान की कक्षाएं लगती हैं। कोई हिन्दी सीख रहा है, कोई भारतीय शैली के विभिन्न नृत्य। फिर भारतीय बाजार इतना बड़ा है कि सभी को व्यापार करना है। इसलिए ही अमेरिका के प्रेसीडेन्ट कह उठते हैं कि हिन्दी नहीं सीखोगे तो पीछे रह जाओगे। हमारा युवा भारत में रहकर हिन्दी की उपेक्षा करता है, लेकिन वहाँ हिन्दी उसके लिए गौरव का विषय है। क्योंकि वही उसकी पहचान है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन में सारे विश्व के प्रतिनिधि थे। जब चीन और जापान के प्रतिनिधि बोलने को खडे हुए तब आश्चर्य हुआ। मैंने मजाक में कहा कि यहाँ तो पता ही नहीं चलता कि कौन हिन्दी नहीं जानता, हम यदि किसी को ऐसा वैसा हिन्दी में कह दें तो ये तो सभी हिन्दी जानते हैं, फिर क्या होगा? मेरे साथ ही सम्मानित होने वालों की सूची में कोरिया की एक सुन्‍दर सी महिला थीं। मुझे उनसे हिन्दी में बात करने में संकोच हो रहा था। बड़ा अजीब सा लग रहा था, एक विदेशी महिला को हिन्दी बोलते हुए देखते। वहाँ कोई भी प्रतिनिधि अंग्रेजी में बात नहीं कर रहा था, जबकि हमारे भारत में लोग अंग्रेजी में बात करना अपनी शान समझते हैं। भारत में सभी को हिन्दी आती है लेकिन क्या टी.वी, क्या संसद सभी ओर अंग्रेजी छायी रहती है। वह तो व्यापारीकरण के कारण टी.वी. चैनलों को समझ आ गया है कि हिन्दी में ही सफलता का सूत्र छिपा है तो वे अब हिन्दीकरण में लगे हैं।
सम्पूर्ण अमेरिका में घूम आइए, उनकी संस्कृति के मूल चिंतन का दिग्दर्शन प्रत्येक क्रियाकलाप में आपको मिलेगा। वे प्रकृति के सिद्धान्त ‘सर्ववाइवल आफ द फिटेस्ट’ के पोषक हैं। वहाँ व्यक्ति अकेला है। उसे स्वयं को ही सारे कार्य करने हैं। आपका कोई सहयोगी नहीं। यदि आप ताकतवर नहीं, आत्मविश्वासी नहीं तो फिर आप वहाँ रह नही सकते। वहाँ पब्लिक ट्रांस्पोर्ट न के बराबर हैं अतः जब तक आप गाड़ी चलाना नहीं जानते आप घर से बाहर भी नहीं निकल सकते। कमसिन सी लड़कियां, जो हवा के झोंके से भी लहरा जाए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां चलाती हैं। चलाती ही नहीं सरपट दौड़ाती हैं। वहाँ की अमूमन स्पीड है 80 मील प्रति घण्टा, कि.मी. की भाषा में कहें तो वहाँ गाड़ियां लगभग 125 से 150 कि.मी. प्रति घण्टे की रफ्‍तार से चलती हैं। सड़कों पर केवल गाड़ियां दौड़ती हैं, पुलिस भी दिखायी नहीं देती। आप रास्ता किसी से पूछ नहीं सकते, या तो आपकी गाड़ी में नेवीगेटर लगा हो या फिर आप मैप लेकर बैठे। वहाँ 99 प्रतिशत लोग अपनी गाड़ी रखते हैं केवल एक प्रतिशत लोग पब्लिक ट्रांस्पोर्ट का उपयोग करते हैं।
हम कई दिनों तक वहाँ घूमते रहे और हमें रेल कहीं दिखायी नहीं दी, आखिर हमने बेटे से पूछ ही लिया कि यहाँ की रेल तो दिखा दो। कुछ देर बाद ही उसने पास जाती दो डिब्बों की बस जैसी रेल दिखा दी। जो हमारे साथ ही शहर की सड़कों पर दौड़ रही थी, पटरी समानान्तर बिछी थी और रेल भी ग्रीन-रेड लाइट से रुकती-चलती थी। शहरों को भी आपस में जोड़ने के लिए रेलमार्ग है लेकिन वह बहुत ही कम है। उनमें भी यात्री गिने-चुने ही होते हैं। यही हाल बस का है, पूरी खाली या फिर एकाध सवारी को ले जाती हुई आपको दिख जाएगी। हमारे जैसा नहीं है कि घर से बाहर निकलो और रिक्शा, टेम्पो, बस सभी कुछ तैयार।
हाँ तो मैं वहाँ की संस्कृति के बारे में कह रही थी, जैसे वहाँ स्वयं को ही गाड़ी हाँकनी होती है वैसे ही आपको अपने पेट भरने के लिए सारे काम करने होते हैं। बाजार में न कोई दर्जी, न कोई जूते सीने वाला और न कोई मेकेनिक। यूज एण्ड थ्रो बस। हमारे यहाँ एक-दूसरे के लिए कार्य करने की प्रवृत्ति है, कोई कमाता है, कोई घर देखता है। अमेरिकन्स का तो खाना अलग तरह का होता है, तो सारी खटपट हो जाती है और शायद उन्हें तो आदत भी है। लेकिन भारतीयों की मुश्किल होती है, जब वे भारत से चलते हैं तब तक नौकर-चाकर, ड्राईवर आदि सभी होते हैं। लेकिन यहाँ अपना हाथ-जगन्नाथ। बुढ़ापे की कद्र वहाँ भी है, उनके लिए सुविधाएं भी खूब हैं लेकिन वे बूढ़े हैं इसलिए सरकार सुविधाएं देती हैं, वे परिवार के सम्मानित सदस्य हैं यह सोच नहीं है। लेकिन वे सब प्रसन्न हैं क्योंकि उन्होंने भारत नहीं देखा है। वे जब भारत के बारे में पढ़ते हैं तो उन्हें भी उत्सुकता होती है कि देखें कैसे परिवार होते हैं, जहाँ घर का मुखिया एक बूढ़ा दादा होता है।
कल तक वे भी परिवार के साथ ही रहते थे, लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता और अर्थ ने अपने पैर जमाए हैं, वैसे-वैसे परिवार टूटकर बिखरते जा रहे हैं। वहाँ एक आम नागरिक के जीवन में संघर्ष नहीं है। सभी कुछ उपलब्ध है। जो बनना चाहते हो, उस पर भी पाबंदी नहीं है। पढ़ाई के प्रति इतना आग्रह नहीं है। वहाँ का समाज अधिक पढ़ाकू बच्चे को पसन्द नहीं करता। इसीलिए खेलों के प्रति अधिक रूझान है। बच्चा खेले, कूदे या फिर कोई साहस का कार्य करे, वह ज्यादा अच्छा माना जाता है। पैसा जमा करना उनका शौक नहीं। क्या करेंगे पैसा जमा करके? सामाजिक उत्तरदायित्व कुछ नहीं। सरकार ही बुढ़ापे का सहारा है। पढ़ने के लिए लोन मिल जाता है। बस पाँच दिन कमाओ और दो दिन खर्च कर दो। आम अमेरिकी सोमवार से लेकर शुक्रवार तक काम करता है, लेकिन शुक्रवार की रात से रविवार तक पूर्ण आराम। शुक्रवार की रात जश्न की रात होती है। सड़कों पर गाड़ियां दौड़ती रहती है, पीछे बड़ी-बड़ी नावें बंधी हैं, साइकिले बंधी हैं, समुद्र किनारे कैम्प करेंगे, किसी जंगल में जाकर कैम्प करेंगे या फिर किसी होटल में जाकर दूसरे शहर रहेंगे। मुख्य शहर वहाँ डाउन टाउन कहलाता है, वहाँ शुक्रवार और शनिवार की रात को चले जाइए, दीवाली जैसा माहौल मिलेगा। लोग बैठे हैं, नाच रहे हैं, सिगरेट पी रहे हैं और क्लब में जाने के लिए लम्बी-लम्बी कतारों में लगे हैं। उस दिन दो-तीन बजे तक जश्न रहेगा। लेकिन सोमवार से फिर खामोशी, जीवन रात को आठ बजे ही थम जाएगा।
वहाँ नौकरी पर जाना भी मनमाना है, कोई सुबह सात बजे जा रहा है और फिर दिन में तीन बजे वापस आ रहा है और कोई दस बजे जाकर पाँच बजे। अधिकतर ऑफिस चौबीस घण्टे खुले रहते हैं तो काम अपने हिसाब से ही करते हैं। एक दिन रात्रि को हम भी बेटे के साथ उसके ऑफिस पहुँच गए। गेट पर कोई संतरी नहीं, चौकीदार नहीं। बस अपना कार्ड निकालिए और स्क्रेच कीजिए और गेट खुल जाएगा। वह हमें अपना ऑफिस दिखा रहा था, उसका एक साथी देर रात तक केबिन में बैठा था। वह बोला कि यार घर पर कोई है नहीं तो यहाँ ही आराम से बैठा हूँ, किताब पढ़ रहा हूँ। वहाँ अधिकतर सभी के केबिन होते हैं। मैंने पूछा कि तुम्हें कमरा कब मिलता है? वह बोला कि मेरे वाइस-प्रेसीडेन्ट भी बगल वाली केबिन में ही बैठते हैं। कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं। बस वेतन में बहुत अन्तर है। किसी को कुछ हजार डॉलर वेतन है तो कुछ को लाखों में। एक ही पद पर काम करने वाले लोगों में भी वेतन का अन्तर है। जिसका जैसा काम, उसका वैसा वेतन। कोई किसी का वेतन पूछता भी नहीं, क्योंकि यह आउट ऑफ एटिकेट है। क्या पता पूछ ले तो हमारे जैसे हड़ताल हो जाए? खैर हम सारा ऑफिस देखकर बाहर आ गए। जैसे ही उसके कक्ष से निकलकर गैलेरी में बाहर आए, मालूम पड़ा कि उसका कार्ड अन्दर ही रह गया। अब क्या हो? बाहर तो निकल सकते हैं, लेकिन वापस अन्दर नहीं जा सकते। उसने कहा कोई बात नहीं सुबह किसी के साथ भी अन्दर चला जाऊँगा। नहीं तो इमरजेन्सी में दूसरा कार्ड बनवाना पड़ेगा। वहाँ आपके पास कार्ड नहीं है तो आप कहीं भी प्रवेश नहीं कर सकते।
रात्रि भोज का रिवाज नहीं, सब आठ बजे पहले-पहले खाना खा लेते हैं। अमेरिकन रेस्ट्रा आठ बजे बन्द। सूर्य छिपता है कहीं नौ बजे और कहीं साढ़े आठ बजे। यहाँ भी भारतीय अपनी चलाते हैं, उनके रेस्ट्रा बन्द होंगे रात्रि दस बजे। किसी भी अमेरिकन को रात्रि में आठ बजे बाद फोन करना अनुशासनहीनता कहलाती है। मन में प्रश्न उचक-उचक कर आता है, कि हम भारतीयों ने देर रात तक जागना किससे सीखा? क्यों हम कहते हैं कि पश्चिम की नकल कर रहे हैं? पश्चिम में केवल दो दिन देर रात तक जागने का रिवाज है, बाकि सब कुछ मर्यादित। हमारे यहाँ तो रोज ही रात्रि में दस बजे बाद दिन शुरू होता है। रोज ही हुल्लड़, वह भी सड़कों पर। वहाँ कहीं भी शोर नहीं। होर्न बजाना तो जैसे अपराध। न कोई लाउड-स्पीकर न कोई बैण्ड-बाजे। कॉलोनियों में तो सातों दिन ही सन्नाटा पसरा रहता है।
हम जैसे भारतीयों की तो जीभ ही सूख जाती है। आलोचना रस तो गोंद जैसे सूख कर हलक में अटक जाता है। किससे बात करें? सब आते-जाते केवल मुस्कराहट फेंकते हैं। ज्यादा से ज्यादा गुडमार्निग बस। भारतीय तो कुछ भी आदान-प्रदान नहीं करते। मैंने पूछ ही लिया इसका कारण कि अमेरिकन तो गुडमार्निंग करता है और भारतीय मुँह फेर कर क्यों चलता है? उत्तर बड़ा ही मजेदार था, यहाँ भारतीय एम.वे. वालो से बड़े डरे हुए हैं। जरा सा मुस्करा दो, एम.वे. वाला एजेन्ट आपको धर दबोचेगा। भई इनसे दूर ही रहो, अपनी नौकरी के लिए अपना देश छोड़कर आए हैं और यहाँ अपनी नौकरी छोड़कर इनके तैल-शैम्पू बेचो। एक पर्यटक स्थल है ‘येशूमिटी’ हम वहाँ गए। सुबह जल्दी उठकर पैदल ही पहाड़ पर चढ़ना था, रास्ते में अमेरिकन्स मिलते गए और गुडमार्निंग होती रही। हमने सोच लिया था कि भारतीय मिलने पर हम भी नमस्ते करेंगे। दो भारतीय लड़के मिल गए, हमने दूर से कहा कि ‘नमस्ते’। अब उनके चौंकने की बारी थी, उन्होंने भी बड़े गर्व से कहा नमस्ते। हिन्दी सुनकर लगा कि उनकी आत्मा तक खिल उठी है। मुझे लगा कि हमने नाहक ही संकोच बना लिया है और दूरियां भी। लेकिन पास लाने का काम मन्दिर और कम्यूनिटी सेन्टर कर रहे हैं। सारे भारतीय रोज ही एकत्र होते हैं और सब मिलकर सारे ही त्यौहार मनाते हैं। मज़ेदार बात तो यह है कि पाकिस्तानी भी वहाँ आ जाते हैं। एक दिन इण्डियन कम्यूनिटी सेंटर पर एक सज्जन गाना गाने खड़े हुए और गाना था ‘मेरा जूता है जापानी’ फिर परिचय दिया कि मैं पाकिस्तानी हूँ। वहाँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान से अधिक एशियन ज्यादा प्रचलित नाम है।

डॉ अजित गुप्ता

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2 बैठकबाजों का कहना है :

Sachi का कहना है कि -

भाई साहब, हिंदी कहाँ नहीं है? पूरा यूरोप आप घूम लीजिये, हर जगह हिन्दुस्तानी या/ और पाकिस्तानी मिल जायेंगे. हिंदी में सारा काम होता है.. दूसरी ख़ास बात यह कि हिंदी फिल्मों ने जितना हिंदी को लोकप्रिय बनाया है, उतना किसी ने नहीं, जितनी जल्दी इस सच्चाई को स्वीकार करें, उतना बेहतर |

जब मैंने पहली बार थोड़ा सा यूरोप घूमा था, तो मैंने हिन्दी, इंग्लिश, और स्पेनी का सहारा लिया, और बहुत घूमा. अपनी भाषा के गर्व भी हुआ..

अगर हिंदी कहीं नहीं है, तो वह हिंदुस्तान में नहीं है,...., क्योंकि (अब ६० साल के बाद अँगरेज़ को गाली नहीं दे सकते, ..) हम नहीं जानना चाहते.. हमें हिंदी बोलने वाले लोग पसंद नहीं है.. यह मजदूरों, सब्जी वालों, और नीचे तबकों के लोगों की भाषा है....

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

भारत में हिन्दी गुलामों की तथा अंगरेजी शासकों की भाषा है. यह मानसिकता प्रशासनिक अधिकारियों की बनाई हुई है. माध्यम और निचला तबका बच्चों से भी गलत ही सही अंगरेजी के शिशु गीत सुनवाकर गर्वित होता है. अजित जी के जीवंत यात्रा संस्मरण ने कई भ्रमों को दूर किया...बधाई...

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