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Wednesday, June 30, 2010

एक प्यार भरी चिट्ठी, गुम हुई चिट्ठियों के नाम...

अमृत उपाध्याय बिहार के आरा से ताल्लुक रखते हैं....2005 से दैनिक प्रभात खबर में रिपोर्टिंग शुरू की, फिर एनडीटीवी में हाथ आज़माने के बाद निजी खबरिया चैनल महुआ न्यूज में बतौर एंकर/रिपोर्टर नौकरी निभा रहे हैं...बैठक पर आने का मन बहुत पहले बना चुके थे, फुरसत अब मिली है...बतौर पहला लेख एक मीठी-सी याद हमें भेजा है...आइए, उनकी चिट्ठी पढें

मेरे एक सहयोगी राकेश पाठक के पास स्याही वाली कलम है, जिससे वो सिग्नेचर किया करते हैं...मुझे बड़ा अच्छा लगता है, जब वो अपनी कमीज की जेब से कलम निकालते हैं और बड़ा सहेजकर उसे रखते हैं फिर, ये कलम उनके पिता जी ने दी थी। मुझे भी याद है पापा जो कलम देते थे मुझे, मैं भी सहेजकर रखा करता था और अक्सर उसी से अखबारों पर अपने शौक को पूरा किया करता था सिग्नेचर करके...कोई वजह तो नहीं थी हस्ताक्षर करने की, लेकिन किसी रद्दी जगह कई हस्ताक्षर करके भविष्य के सपने गढ़ा करता था मैं भी। और कलम का इस्तेमाल होता ही क्या था बचपन में.....बचपन से ज्यादा पाला तो नहीं पड़ा, फिर भी बचपन मतलब, जब छठी या सातवीं में पढ़ रहा था, तब चिट्ठियां लिखा करता था मैं....चिट्ठियों का सिलसिला चलता था तब...और फॉरमेट बिल्कुल तय था, 'पूज्य' से कहानी शुरू होती थी और 'पत्र के इंतजार में आपका फलां’ पर जाकर खत्म हो जाती थी...और हां दूसरी लाइन में होता था 'मैं यहां ठीक हूं आप सब कैसे हैं.... इसके बाद फिर शुरू हो जाता था हर शख्स की अलग-अलग खैरियत पूछने का सिलसिला...'फलां दीदी कैसी है..फलां चाचा कैसे हैं' वगैरह वगैरह...फिर पैरा चेंज के बाद 'यहां फलां ठीक हैं, भैया की पढ़ाई ठीक चल रही है...और सब लोग आप सब को याद करते हैं',....फिर अंतिम में 'जल्दी आइएगा' के बाद 'पत्र के इंतजार में' के साथ आपका के आगे रिश्ते का संबोधन..अब सोचने पर हंसी तो आती है लेकिन अफसोस भी होता है चिट्ठी नहीं लिख पाने का अब...कभी-कभार सोचता हूं, लिखूं चिट्ठी फिर से, लेकिन फिर सोचता हूं किसे...चिट्ठी लिखने को मैं मिस करता हूं आजकल....और स्याही वाली कलम को भी....पहली दफा जब टेलीफोन का दर्शन हुआ था तो घंटो लग जाते थे एसटीडी कॉल लगाने के लिए....उस समय कोई सूचना नहीं मिल पाती थी, जैसे आज मिल जाती है तुरंत, नॉट रीचेबल या फिर स्विच्ड ऑफ टाइप से। एसटीडी कॉल रेट महंगा होने और नेटवर्क की परेशानियों की वजह से चिट्ठियों का दौर बदस्तूर जारी रहा था...खूब चिट्ठी लिखा करते हम सब..और चिट्ठियों में अतिक्रमण भी खूब हुआ करता था, दीदी और भैया की चिट्ठी में सेंध मार कर कुछ अपनी तरफ से लिखने की फिराक होती थी तो अपनी चिट्ठी में किसी को लिखने देने में खीझ होती...मसलन एक ही चिट्ठी में पता चला कि भैया-दीदी ने भी लिख दिया और फिर मम्मी ने भी लिख दिया...और हां, डाकिए की आवाज़ बचपन में भावुकता के स्तर तक जेहन में समा जाती है...हमारी अगली पीढ़ी को तो शायद नसीब ही ना हो अब...लेकिन डाकिये का हांक लगाना और उसके पीछे हमारा इंतजार, चिट्ठी किसकी है ये जानने की और उसे जल्दी से खोल कर पढ़ लेने की उत्सुकता...कम्यूनिकेशन के नए जरिए आते गए और हमारे जेहन में चिट्ठियां बस यादें भर बन के रह गईं...और अब कलम की भी जरूरत कहां पड़ती है ज्यादा...कंप्यूटर पर उंगुलियां ठकठकाते रहने की आदत जो पड़ गई....लेकिन सचमुच बहुत याद आता है जब किसी की जेब में नई कलम देखकर ललचा जाता था मन, जब स्याही वाली कलम से सुंदर और मोती जैसे अक्षर उतारते थे मास्टर साहब, और जब उन्हीं अक्षरों से सजाकर खूबसूरत चिट्ठियां लिखने के दौरान कई दफे कागज फाड़ देते हम..सिर्फ इसलिए कि राइटिंग ठीक नहीं बैठी थी उन चार पंक्तियों में....स्याही वाली कलम की चर्चा आज ही हो रही थी सुबह, मेरे सहयोगी आलोक के साथ...तो यादें ताजा हो गईं जेहन में दबी हुईं थी जो...बचपन,कलम और चिट्ठियों की...और पापा की यादें जिनकी हैंडराइटिंग की नकल करके मैं स्याही वाली कलम से पोस्टकार्ड लिखने की कोशिश करता रहा था उन दिनों....

अमृत उपाध्याय

Thursday, November 05, 2009

महात्मा गांधी के नाम एक ख़त

नीलेश माथुर गुवाहाटी में व्यापर करते हैं। कवि-हृदयी हैं। देश की हालत को बापू के नाम एक पत्र लिखकर बयाँ कर रहे हैं।

पूज्य बापू,

सादर प्रणाम, आशा ही नहीं हमें पूर्ण विश्वास है कि आप कुशलता से होंगे। हम सब भी यहाँ मजे में हैं। देश और समाज की स्थिति से आपको अवगत करवाने के लिए मैंने ये ख़त लिखना अपना कर्त्तव्य समझा। कुछ बातों के लिए हम आपसे माफ़ी चाहते हैं जैसे कि आपके बताए सत्य और अहिंसा के सिद्धांत में हमने कुछ परिवर्तन कर दिए हैं, इसे हमने बदल कर असत्य और हिंसा कर दिया है, और इसमें हमारे गांधीवादी राजनीतिज्ञों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, वो हमें समय समय पर दिशाबोध कराते रहते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं। इन्हीं के मार्गदर्शन में हम असत्य और हिंसा के मार्ग पर निरंतर अग्रसर हैं, बाकी सब ठीक है।

आपने हमें जो आज़ादी दिलवाई उसका हम भरपूर फायदा उठ रहे हैं। भ्रस्टाचार अपने चरम पर है, बाकी सब ठीक है।
हर सरकारी विभाग में आपकी तस्वीर दीवारों पर टँगवा दी गयी है और सभी नोटों पर भी आपकी तस्वीर छपवा दी गयी है। इन्हीं नोटों का लेना-देना हम घूस के रूप में धड़ल्ले से कर रहे हैं, बाकी सब ठीक है। स्वराज्य मिलने के बाद भी भूखे नंगे आपको हर तरफ नज़र आएँगे, उनके लिए हम और हमारी सरकार कुछ भी नहीं कर रहे हैं, हमारी सरकार गरीबी मिटाने की जगह गरीबों को ही मिटाने की योजना बना रही है, बाकी सब ठीक है।

बापू हमें अफ़सोस है की खादी को हम आज तक नहीं अपना सके हैं, हम आज भी विदेशी वस्त्रों और विदेशी वस्तुओं को ही प्राथमिकता देते हैं, बाकी सब ठीक है।

अस्पृश्यता आज भी उसी तरह कायम है। जिन दलितों का आप उत्थान करना चाहते थे, उनकी आज भी कमोबेश वही स्थिति है, बाकी सब ठीक है।

बापू आजकल हम सत्याग्रह नहीं करते, हमने विरोध जताने के नए तरीके इजाद किये हैं। आज कल हम विरोध स्वरुप बंद का आयोजन करते हैं और उग्र प्रदर्शन करते हैं, जिसमें कि तोड़फोड़ और आगज़नी की जाती है, बाकी सब ठीक है।
जिस पाकिस्तान की भलाई के लिए आपने अनशन किये थे, वही पाकिस्तान आज हमें आँख दिखाता है, आधा काश्मीर तो उसने पहले ही हड़प लिया था, अब उसे पूरा काश्मीर चाहिए। आतंकियों की वो भरपूर मदद कर रहा है। हमारे देश में वो आतंक का नंगा नाच कर रहा है। आये दिन बम के धमाके हो रहे हैं और हजारों बेगुनाह फिजूल में अपनी जान गँवा रहे हैं, बाकी सब ठीक है।

बांग्लादेश के साथ भी हम पूरी उदारता से पेश आ रहे हैं, वहां के नागरिकों को हमने अपने देश में आने और रहने की पूरी आज़ादी दे रखी है, करोड़ों की संख्या में वे लोग यहाँ आकर मजे में रह रहे हैं, और हमारे ही लोग उनकी वजह से भूखे मर रहे हैं, बाकी सब ठीक है।

बापू हम साम्प्रदायिक भाईचारा आज तक भी कायम नहीं कर पाए हैं। धर्म के नाम पर हम आये दिन खून बहाते हैं। आज हमारे देश में धर्म के नाम पर वोटों की राजनीति खूब चल रही है। साम्प्रदायिक हिंसा आज तक जारी है। बाकी सब ठीक है।

बापू आज आप साक्षात यहाँ होते तो आपको खून के आंसू रोना पड़ता, बापू आपने नाहक ही इतना कष्ट सहा और हमें आज़ादी दिलवाई, हो सके तो हमें माफ़ करना।

आपका अपना-
एक गैर जिम्मेदार भारतीय नागरिक