Saturday, January 17, 2009

हमारे सपने तुम्हारे क्यों नहीं हो सके?? (1)

डॉ अजित गुप्ता की यादों का सफ़र फिर प्रस्तुत है....धनवान होते अमेरिका में ग़रीब होती संवेदना और बिछोह का दुख झेलते दूर देश के मां-बाप इनके लेख में कई-कई बार हैं.. पिछली बार आपने इस लंबी कड़ी का पहला भाग पढा...अब पढिए इसी कड़ी में आगे....


सोने का पिंजर
अध्याय 1


तू मेरे ख्वाबों में भी कभी नहीं आया, मेरे मन में तेरे लिए कभी किसी चाहत ने जन्म भी नहीं लिया। बस तेरा एक अस्तित्व है, इतना भर ही तो जानती रही हूँ मैं। लेकिन मुझे नहीं पता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे जीवन का अंग बन जाएगा। तेरी विशालता के आगे मेरा व्यक्तित्व एकदम बौना बन जाएगा। बेटा जब बड़ा होने लगता है तो माँ के मन में एक धुकधुकी सी होने लगती है। कभी उसका घर बसाने के सपने आते हैं तो कभी उसके भविष्य के। एक कोना आशंका से ग्रस्त भी रहता है। एक अनजान भय मुंडेर पर चिड़िया के बोलने के साथ ही चला आता है। परायेपन का डर नींदे भी उड़ा देता है। लेकिन डर इस रूप में आएगा यह तो चिंतन में ही नहीं था। सभी कुछ तो ठीक चल रहा था। एक ठहरी हुई जिन्दगी की तरह साफ-सुथरा।
लेकिन तुम्हारे नाम का कंकड़ जब कलकल बहती नदी में फेंका गया तब भी मन में उद्वेग नहीं आया था। एक प्रसन्नता का भाव ही मन में था। एक ऐसा स्थान जहाँ सुरक्षा है, भविष्य की सम्भावनाएँ हैं, तब तुम्हारा नाम अच्छा ही लगा था। सपने ताजिन्दगी देखे नहीं तो तब भी नहीं देखे। अच्छा या बुरा कुछ भी तो नहीं सोच पाया था मन। बस एक विश्वास था, एक अटूट प्यार था। पल-पल, क्षण-क्षण अपने मन के कण-कण से निर्माण किया था अपनी ही एक प्रतिकृति को। प्यार सागर सा दिखाई पड़ता था, जिसका न कोई ओर था और न कोई छोर। लेकिन तभी तुम आ गए थे, हमारे मध्य। उस विशाल सागर में पहली बार लगा कि यहाँ नमक भी है जिस कारण यहाँ का पानी आँसुओं की तरह खारा भी है। अब कई समुद्र उग आए थे मेरे और मेरी प्रतिकृति के मध्य। मन उसे छूने का करता लेकिन यही समुद्र दूरी बनकर बीच में खड़ा हो जाता। लेकिन सुरक्षा बोध उस पार से निकल-निकलकर आता रहा। चिन्ता का सैलाब आता और चले जाता। हर शब्द में बसी थी केवल सुरक्षा। अपने आस-पास खून की होली दिखाई देती। अनाचार, अत्याचार सामने ही तो खड़े थे। भविष्य की चिन्ता रातों को सोने नहीं देती थी। अब मन आश्वस्त हो चला था। छू नहीं सकती तो क्या, सुरक्षा तो है। लेकिन सुरक्षा का भाव भी कितने दिन टिक पाया? जो कभी स्थाई लगता था वह चन्द दिनों में ही कपूर की तरह उड़ गया। अभी एक माह भी तो नहीं हुआ था, मन तड़पता और सुरक्षा का आश्वासन, मरहम लगा देता। हमारा क्या है, बच्चों का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए।
वो कैसी तो शाम थी? लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सुबह थी।
शाम का भी क्या फितूर होता है? अपने साथ एक घुटन लेकर आती है। एकान्त के पल धुएँ से घिरे दिखाई देते हैं। कभी यह धुआँ आँखों में समा जाता है, जलन के साथ पानी बनकर बहने लगता है। कभी इस धुएँ में भविष्य धुँधला हो जाता है। भला हो टी.वी. का, एकान्त में भी साथी बना डटा रहता है। रिमोट पकड़ो और आपका साथी बोलने लगता है, आपको गुदगुदाने लगता है। लेकिन वह शाम गुदगुदाने नहीं आयी थी, एक मिथक को तोड़ने आयी थी। एक डर का विस्तार करने आयी थी। सुरक्षा-चक्र के घेरे को तोड़ने आयी थी। तुम्हारे तन पर भी खून की होली खेलने आयी थी। मेरी वो शाम, रात बन गयी थी, तुम्हारी वो सुबह कभी न खत्म होने वाले डर में बदल गयी थी।
मेरे देखते ही देखते एक हवाई-जहाज जा टकराया था विशाल 110 मंजिला इमारत से। ताश के महल की तरह ढह गयी थी वो इमारत, जिसमें करोड़ों टन लोहा लगा था, करोड़ों टन सीमेंट लगा था। कितने पल लगे उसे भरभराकर ढहने में? वह 11 सितम्बर 2001 तुम्हारे लिए प्रारम्भ था एक डर का, हमारे लिए अन्त था सुरक्षा-बोध का। सारा जीवन ही बदल गया। आसान रास्ते, कंटकों से भर गए। दूरियाँ अब अन्तहीन हो चली। लेकिन समय कब रुकता है? समय तो चलता ही रहता है। घाव बनते हैं, समय भर भी देता है। लेकिन चिह्न तो वहीं रह जाते हैं। डर का चिह्न भी सदा के लिए रह गया।
दिन सरकते रहे, एक दिन इच्छा जागृत हुई, खून ने खून को पुकार लिया। तब न तो सात समुन्दर पार जाने में भय दिखाई दिया और न ही कोई व्यवधान मन में आया। सभी कुछ सरल लग रहा था। लेकिन 26 अप्रेल 2002 हमारे लिए बहुत बड़ा सबक लेकर आया। तुम तक पहुँचना इतना आसान नहीं है। तुम्हारी धरती पर पाँव रखने के लिए न तो करोड़ों की जायदाद थी, न ही तुम्हारे काम आने वाली शिक्षा। एक साधारण सी बात ने समाप्त कर दिया बरसों के सिंचित स्वाभिमान को। वीजा के रूप में तुमने नकार दिया हमारे व्यक्तित्व को। मेरी धरती पर तुम्हारा उपयोग नहीं है, अतः तुम्हें वीजा नहीं मिल सकता। ऐसे साधारण लोग मेरी धरती को भी साधारण नहीं बना दें, शायद यही डर तुम्हारे मन में रहा हो। तुम एक विशेष देश हो, दुनिया के सारे ही देशों में अग्रणी। अब तो तुम्हारी ही चौधराहट पूरी दुनिया में चलती है। लेकिन तुमने एक मिनट भी नहीं सोचा कि पुत्र तुम्हारे पास, तुम्हारे वैभव से चकाचौंध और माँ सात समन्दर पार! तुमने न टूटने वाले ताले लगा दिए? कैसी मानवता है तुम्हारी? तुम तो सारी दुनिया को श्रेष्ठता का संदेश देते हो, मानवता की बात करते हो, फिर होनहार पुत्रों के माँ-बापों को तरसाते क्यों हों? क्यों नहीं पूछते उनसे कि तुम्हारे माँ-बाप का भविष्य क्या होगा? लेकिन मैं भी तुमसे कैसे प्रश्न पूछने लगी? तुमने कब परिवार को महत्त्व दिया है? तुम तो एक व्यापारी हो। जो भी दुनिया का श्रेष्ठ हो उसे तुम ले लेते हो। बाकि भावनाओं से तुम्हें क्या मतलब? भारत का व्यक्ति हजारों में कमाता है लेकिन जैसा तुम्हारा आकार बड़ा है वैसे ही तुम्हारे डॉलर का आकार भी बहुत बड़ा है। भला भारत के माँ-बापों के पास इतना धन कहाँ जो तुम्हारे डॉलर का मुकाबला कर सकें? हाँ हमारा दिल जरूर बहुत बड़ा है। हम संतानों को अपनी छाती से लगाकर रखते हैं। हमारे सुख-दुख साँझी होते हैं। तुम बात-बात में उपहार देते हो, हम पल-पल अपना कर्तव्य पूरा करते हैं। हमारी संताने बैंक-लोन पर आश्रित नहीं रहती, वे हम पर ही आश्रित रहती हैं।
तुम्हारा वीजा-ऑफिस, स्वर्ग में जाने वाले चित्रगुप्त के दरबार जैसा ही है। सारे ही जीवन का लेखा-जोखा देखा जाता है। जरा सी चूक हुई कि दरवाजे बन्द। बेचारे लोग लम्बी-लम्बी कतारों में घण्टों खड़े रहते हैं। उनके हाथ में लदे होते हैं बही-खाते। जिसे स्वीकृति मिल जाती है, उसके घर में दीवाली मनती है और जिसे नहीं, वह अमावस में रहने को ही मजबूर होता है।
तुम अकस्मात् ही मेरे जीवन में आ गए। मेरे बरसों के सिंचित स्वाभिमान पर तुमने एकदम से प्रहार कर दिया। मैं, मेरा समाज और मेरा देश, तुमने गौण कर दिया, हमारी संतानों के समक्ष। मैं तो समझती थी कि शिक्षा का अर्थ स्वाभिमान जागृत करना होता है, लेकिन तुम्हारे यहाँ कि शिक्षा ने तो सम्पूर्ण भारत के स्वाभिमान को ही पददलित कर दिया। हमारे यहाँ जब गाँव का नौजवान पहली बार महानगरों में जाता है तब वह एकदम से बौरा जाता है। वह स्वयं को गँवार समझ बैठता है और महानगर में बसने के ख्वाब पाल बैठता है। कभी कच्ची बस्ती में, कभी चाल में, कभी सोसायटी में। वह सारे दुख उठाकर भी गर्व से तना रहता है कि मैं महानगर में रह रहा हूँ। छूट जाते हैं पीछे कहीं, शुद्ध हवा, प्रकृति के साथ जीने का तरीका, घर, चौबारे। तुम्हारे यहाँ भी ऐसा ही है, एक बार तुम्हारी धरती पर पैर रखा नहीं कि तुम्हारे सौंदर्य की चकाचौंध से हमारे पुत्रों की आँखें चुँधिया जाती हैं। साफ-सुथरा शहर, चौड़ी-चौड़ी सड़के, चारों तरफ रोशनी से नहाया शहर। रात को मद्धिम रोशनी, एक खुमारी सा जगा देती है। इसी खुमारी में वह विस्मृत कर देता है अपना अतीत। भूल जाता है उस माँ को जो उसके लिए सिगड़ी जलाए बैठी होती है, गर्म रोटी खिलाने को। भूल जाता है उस बाप को जिसके मजबूत कंधों पर खेलते हुए उसका बचपन बीता था, भूल जाता है उस बहन हो, जिसकी चोटी खींचते हुए वह बड़ा हुआ था। बस वर्तमान की सुंदरता में खो जाता है उसका तन और मन।
मुझे एक वाकया स्मरण में आता है। मैं एक बार एक कार्यक्रम के निमित्त सुदूर पहाड़ों और जंगलों के मध्य बसे एक छोटे से गाँव में गयी थी। शहर का व्यक्ति भला क्यूँ गाँव में जाता है? वह सोचता है कि मैं विकसित हूँ और ये लोग अभी अविकसित हैं, अतः उन्हें विकसित करने का भ्रम लेकर हम भी वहाँ गए थे। गर्मी अपने पूर्ण यौवन पर थी, शायद 45 डिग्री सेल्शीयस तापमान रहा होगा। हमारे यहाँ गर्मी में इतना ही तापक्रम रहता है। साथ में लाया थर्मस का पानी भी गर्म हो गया था। पास में ही चरस चल रहा था। कुएं से बैल की शक्ति के द्वारा पानी निकाला जाता है। बैल घूमता रहता है और छोटी-छोटी बाल्टियों में पानी भर-भरकर निकलता रहता है। वह जल इतना निर्मल और शीतल था कि हमारा अन्दर तक तृप्त हो गया। वहाँ छोटी-छोटी मगरियों पर झोपड़े बने थे। कुछ दूरी पर ही नदी बह रही थी। नदी के सहारे-सहारे सड़क चले जा रही थी और सड़क का अवलम्ब बने थे पहाड़। पहाड़ों पर कहीं गूलर था तो कहीं नीम। कहीं पलाश था तो कहीं महुवा। छोटे-छोटे खेतों में कहीं तुअर खड़ी थी तो कहीं अदरक और कहीं हल्दी के ढेर लगे थे। शाम को सारा क्षेत्र चिड़ियाओं के चहकने से गुंजायमान हो गया। बच्चे उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगे।
आम भी पेड़ों पर लदा था, हमें पेड़ों को निहारते देख, एक बच्चा झट से पेड़ पर चढ़ गया और कच्ची अमिया तोड़ लाया। घर से चुटकी भर नमक ले आया, हम कुएं की मेढ़ पर बैठकर चटखारे लेकर अमिया खाने लगे। जैसे ही सूरज ने पश्चिम की ओर प्रस्थान किया आकाश पर चाँद और तारे निकल आए। पूरा ही आकाश भर गया, ऐसा लगा कि यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं छोड़ी है तारों ने। झोपड़ियों के बाहर ढोल और मांदल की आवाजें आने लगी हैं। सारे ही पुरुष और महिलाएं एक साथ झूम रहे हैं, नाच रहे हैं। कोई अभाव नहीं, कोई शिकायत नहीं।
मन में प्रश्न उठने लगा कि हम शहरवाले इन्हें क्या देने आए हैं? या इनसे छीनने आए हैं इनका चैन-सुकून? यहाँ के नौजवान को क्षणिक भर का तो सुख देते हैं ये महानगर, लेकिन एक कालावधि के बाद टूटने लगता है इनका भ्रम। उन्हें याद आने लगता है वही अपना छोटा सा गाँव जो उससे कभी का पीछे छूट गया है। अब उसके पास होली पर टेसू के फूलों का रंग नहीं है, अब उसके पास तारों भरी रात नहीं है, अब उसके पास अमिया से लदा पेड़ नहीं है। बस अब उसके पास है अकेलापन, बस अकेलापन। ऐसा ही तो तुम भी करते हो। तुम्हारे यहाँ की सुन्दरता से बौराए हमारे पुत्र जब भारत को याद करते हैं तब बहुत देर हो जाती है वापस लौटने को।
मेरे देश की लाखों बूढ़ी आँखों को तुमसे शिकायत नहीं है, बस वे तो अपने भाग्य को ही दोष देते हैं। वे यह नहीं जान पाते कि गरीब को धनवान ने सपने दिखाएँ हैं, और उन सपनों में खो गये हैं उनके लाड़ले पुत्र। मैं समझ नहीं पाती थी कि तुम क्यों नहीं आने देते हो, बूढ़े माँ-बापों को तुम्हारे देश में? लेकिन तुम्हारी धरती पर पैर रखने के बाद जाना कि तुम सही थे। क्या करेंगे वे वहाँ जाकर? एक ऐसे पिंजरे में कैद हो जाएँगे जिसके दरवाजे खोलने के बाद भी उनके लिए उड़ने को आकाश नहीं हैं। अपने देश में, अकेले घर में कम से कम अपनी सी साँस तो ले सकेंगे। कोई तो भूले-भटके उनका हाल पूछने चला ही आएगा। लेकिन तुम्हारे यहाँ आकर तो कैसे कटेंगे उनके दिन? तुम ठीक करते हो, उन्हें अपनी धरती पर नहीं आने देने में ही समझदारी है। कम से कम वे यहाँ जी तो रहे हैं, वहाँ तो जीते जी मर ही जाएँगे।

क्रमशः

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2 बैठकबाजों का कहना है :

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

beahatarin anubhav....
ALOK SINGH "SAHIL"

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

प्रवासी समस्या के मानवीय पक्ष और विडंबनाओं का मार्मिक यथार्थ वर्णन...साधुवाद

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