Saturday, April 04, 2009

सोने का पिंजर (11)

ग्यारहवां अध्याय
आम भारतीय के लिए सचमुच स्वर्ग है अमेरिका.....

पश्चिम और फैशन दोनों शब्द अपने आप में भारत में पूरक समझे जाते हैं। लेकिन अमेरिका में फैशन सड़कों पर दिखायी नहीं देता, हो सकता है फिल्मों तक ही सीमित हो। वहाँ की वेशभूषा हमसे अलग है लेकिन उसे फैशन का नाम नहीं दिया जा सकता। फिर अमेरिका में इतने देशों के बाशिंदे रहते हैं कि सभी कुछ गड्डमड्ड हो गया है। पैन्ट और टी-शर्ट एक कॉमन ड्रेस बन गयी है। उच्च स्तरीय अमेरिकी कुछ नफासत से रहता है जबकि आम अमेरिकी या अन्य नागरिक बहुत ही साधारण वेशभूषा में, जिसे कतई फैशन का नाम नहीं दिया जा सकता। हम भारत के गाँव में भी निकलते हैं तब भी कपड़ों के प्रति सावचेत रहते हैं लेकिन वहाँ कही भी जाना हो, जैसे बैठे हो, उठकर चले जाओ। एक दिन कुछ लोग सूटेड-बूटेड दिखायी दे गए, मालूम पड़ा कि कोई सेमिनार है। व्यक्तित्व को निखारना भी यहाँ की आदत नहीं। जैसी आवश्यकता है, वैसी वेशभूषा है। भारत में सोना, चाँदी, हीरे, मोती, अमूमन महिलाओं के शरीर पर लदे हुए दिखायी दे जाएँगे। लेकिन वहाँ तो इनके दर्शन कभी-कभार ही होते हैं। मैंने हाथों में सोने की चूड़ियां पहन रखी थी। मुझे समझ नहीं आया कि इनमें भी क्या कोई बम छिपा सकता है? एयरपोर्ट पर कहा गया कि इन्हें भी उतारिए और ट्रे में रखकर एक्सरे कराइए। वहाँ चूड़ी क्या होती है, शायद कोई जानता ही नहीं। कभी शाम पड़े घूमने जाते, तब लगता कि नहीं भारत की तरह बन-सँवरकर जाना चाहिए, लेकिन वहाँ कोई देखने वाला ही नहीं।

जब व्यक्तित्व की बात आ ही गयी है तब एक बात बताना चाहती हूँ कि वहाँ जाकर लगा कि हम जैसे लोग अपना व्यक्तित्व खो देते हैं। क्या कभी आपने जिन्दगी में ऐसे दिन बिताए हैं, जब आपकी पहचान मिट जाए या खो जाए। आप अपने आपको खोजते रहें कि मैं कौन हूँ? अमेरिका में रहकर पूरा एक महीना से भी अधिक समय ऐसे ही अपने आपसे रिक्त होकर बिताया है। कुछ लोग कहते हैं कि अरे आप इन दिनों में माँ के रूप में रहे, कुछ कहेंगे कि आप इन दिनों में दादी के रूप में रहीं, लेकिन सच क्या है? अमेरिका आने के बाद समझ आता है कि व्यक्ति केवल एक जीव है। चलता-फिरता, खाता-पीता, सोता-जागता। इसके शरीर का कोई शिकार नहीं करता लेकिन इसके मन का शिकार प्रतिपल होता है। लाखों भारतीय यहाँ बसे हैं और कभी न कभी उनके माता-पिता यहाँ आकर रहते हैं, कुछ ज्यादा दिन और कुछ महीने-दो महीने। कुछ ने यहाँ ही बसेरा बना लिया है और कुछ आते-जाते रहते हैं। गाँव में चाची होती थी, ताई होती थी, जो सारे गाँव पर हुकम चलाती थी, फिर शहर में अपने मोहल्ले में हम सिमट गए और महानगरों में अपनी सोसायटी तक। लेकिन यहाँ विदेश में आप केवल आप हैं, आपकी पहचान आपके घर में भी नहीं होती। आप अच्छे से अच्छा खा सकते हैं, घूम सकते हैं लेकिन अधिकार आपके पास कुछ नहीं होता। अपने अधिकारों के लिए हमने शिक्षा पायी थी, जैसे-जैसे हम शिक्षित हुए, हम अधिकार विहीन हो गए।

मेरी एक मित्र भी उन दिनों न्यूयार्क में ही थी। मैंने भारत आने के बाद उनसे पूछा कि आपके क्या अनुभव रहे?

वे बोली कि सबसे अच्छी बात यह थी कि मुझे अपने आपसे बात करने का अवसर मिला। हम अक्सर जीवन की आपाधापी में सभी से बात करते हैं लेकिन कभी अपने आपसे बात नहीं करते। मुझे वहाँ इतना समय था कि मैं स्वयं से बात कर सकूँ। बेटा-बहू नौकरी पर चले जाते थे और मैं अकेली रह जाती थी। उस खाली समय में मैंने या तो पुराने पत्र पढ़े या फिर स्वयं से बातें की।

ऐसे ही एक मेरे पड़ोसी हैं, उनसे भी मैंने कभी प्रश्न किया था कि आप वहाँ क्या करते हैं? आपका समय कैसे व्यतीत होता है?

उन्होंने बताया कि घर के नीचे ही एक किताबों की दुकान है, मैं वहाँ चले जाता हूँ। सारा दिन किताबें पढ़ता हूँ। लेकिन सर्दियों में कठिनाई आती है, जब बर्फ के कारण घर में ही रहना पड़ता है, तब हम भारत लौट आते हैं।

भारत में हमारा ध्यान व्यक्तित्व विकास की ओर रहता है, हम बाह्य और आन्तरिक व्यक्तित्व विकास के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं। बाहरी सौंदर्य के लिए हमारी वेशभूषा, सौंदर्य प्रसाधन के लिए हम चिंतित रहते हैं वहीं आन्तरिक विकास के लिए रोजगार प्रधान शिक्षा के अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त करने के लिए और अपनी सृजनात्मक क्षमता विकसित करने के लिए भी प्रयत्नरत रहते हैं। लेकिन अमेरिका में ऐसा नहीं है। यहाँ शारीरिक सुंदरता के लिए लोग चिंतित नहीं हैं। कुछ भी पहनो, कैसे भी घर से बाहर निकल जाओ, किसी को चिन्ता नहीं। कुछ उच्च वर्ग है जो सूटेड-बूटेड दिखायी देते हैं, बाकि देशी तो बस वार-त्यौहार ही सजते हैं। केवल कमाना और ऐश्वर्य भोगना जहाँ की संस्कृति का मूल मंत्र हो वहाँ व्यक्तित्व विकास के लिए कोई प्राथमिक स्थान नहीं है। बस पाँच दिन काम करो और दो दिन आनन्द। इसलिए मेरा यहाँ आना केवल आनन्द लेने तक ही सीमित होकर रह गया। मैंने अपने आप से पूछा कि बता तू कौन है? मन ने कहा कि एक लेखक, लेकिन वातावरण ने कहा कि एक नारी मात्र।

ऐसा नहीं है कि अमेरिका में भी लोग सृजन की ओर नहीं खिंचते। वे सारे हैरतअंगेज़ कार्य करते रहते हैं। लेकिन उनमें भारतीय नहीं हैं। भारतीयों का वहाँ पैसा कमाना ही जीवन का उद्देश्य है, इसी के लिए शिक्षा प्राप्त की जाती है और इसी के लिए व्यापार किया जाता है। इस कारण भारतीयों का ध्यान एक सूत्र तक ही सीमित होकर रह जाता है। अमेरिका में अर्थसंचय को प्रमुखता नहीं है। शिक्षा, मकान, गाड़ी सभी के लिए ऋण सुविधाएं हैं और शत-प्रतिशत लोग इसी का उपयोग करते हैं। सामाजिक बंधन नहीं के बराबर हैं और विवाह आदि पर खर्च भी न के बराबर ही है। वृद्धावस्था में सरकार अच्छी-खासी पेंशन देती है अर्थात वृद्धावस्था परिवार के अधीन न होकर सरकार के अधीन है। भारतीयों को सामाजिक बंधनों के कारण अर्थसंचय की मानसिकता है और यह हमारे खून में शामिल हो चुकी है। जो भारतीय वहाँ बसे हैं, वे अब सारे सामाजिक बंधनों से मुक्त हैं लेकिन फिर भी अर्थसंचय की मानसिकता समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि वे केवल अर्थ की ही भाषा जानते हैं। वे किसी भी सृजन की ओर नहीं मुड़ पाते। हाँ, जब से वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर आक्रमण हुआ है तब से भारतीयों के मन में भी असुरक्षा का भाव आया है और उन्हें अपने देश की चिन्ता होने लगी है। क्योंकि वे जानते हैं कि हम अमेरिकी कभी नहीं कहला सकते। इसलिए इस दुनिया में हमारे लिए भी कहीं जमीन का टुकड़ा सुरक्षित रहना चाहिए। जैसे-जैसे दुनिया में लादेन का भय फैल रहा है और भारत में भी धार्मिक आतंकवाद दहशत पैदा करता है, वैसे-वैसे विदेश में बसा भारतीय भी अपने देश को सुरक्षित देखने के लिए प्रयासरत हो रहा है। इसलिए अब कुछ मात्रा में भारतीयों का ध्यान अपने देश की सुरक्षा की ओर भी जाने लगा है। वे भारतीय सामाजिक संस्थाओं को पैसा देने लगे हैं। इतना भर ही भारतीय जीवन शैली में बदलाव आया है।

जब सृजन की बात निकली है तो साहित्य की बात अछूती नहीं रह सकती। वहाँ साहित्य और लेखन के क्षेत्र में बहुत काम हो रहा है। उसका पता इसी बात से लगता है कि जहाँ भारत में पुस्तकों की दुकाने छोटी से छोटी होती जा रही हैं वहाँ पुस्तकों की विशाल दुकाने हैं। लोग वहाँ आते हैं और सारा दिन वहीं बैठकर पुस्तकें पढ़ते हैं। पुस्तकालयों में भी लोग आकर पढ़ते हैं और पुस्तकालयों से अधिक भीड़ पुस्तकों की दुकान पर होती है। क्योंकि वहाँ नयी से नयी पुस्तक उपलब्ध रहती है। अमेरिकन्स या यूँ कहूँ कि यूरोपियन्स मूलतः व्यापारी बुद्धि के होते हैं। अमेरिका में प्रमुख रूप से यूरोपियन्स ही आकर बसे हैं और आज वे ही अमेरिकन्स कहला रहे हैं। उन्हें मालूम है कि मुनाफा कैसे कमाया जाता है। हाल ही में हेरी पौटर की पुस्तक के नवीन खण्ड का विमोचन हुआ। मैं उस दिन वहीं थी। मालूम पड़ा कि उन्होंने सम्पूर्ण शहरों के विभिन्न केन्द्रों पर पुस्तक का विमोचन समारोह आयोजित किया। बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम रखे गए और उन्हें पुरस्कार भी दिए गए और फिर पुस्तक की बिक्री हुई। हम भारतीय साहित्यकार कहाँ ऐसी व्यापारी बुद्धि रखते हैं? तभी तो हमारे यहाँ 500 से एक हजार प्रतियां भी बिकना दूभर हो जाता है और उनकी पुस्तकें करोड़ों की संख्या में बिकती हैं। हम साहित्य के स्थान पर टेलीविजन से चिपक गए हैं लेकिन वे अभी भी साहित्य को महत्त्व देते हैं। उनका वीकेण्ड किसी जंगल में या समुद्र किनारे बीतता है और वे उन फुर्सत के क्षणों में साहित्य पढ़ते हैं। हम पर्यटन स्थानों में केवल पर्यटन करने ही जाते हैं, जबकि वे उन स्थानों में एकान्त ढूँढते हैं। लेकिन कुछ भारतीय भी अब अभिव्यक्ति के साधन ढूँढने लगे हैं और साहित्य की ओर मुड़ने लगे हैं। उन्हें समझ आने लगा है कि हमारी पहचान हिन्दी साहित्य से ही हो सकती है अतः वे हिन्दी की ओर लौट रहे हैं। वहाँ वे हिन्दी के पत्र निकाल रहे हैं, पत्रिकाएं निकाल रहे हैं और अपनी सोच को अभिव्यक्त कर रहे हैं। लेकिन उनकी सोच भी क्या? किसी भारतीय की सोच भारतीयता के अतिरिक्त क्या हो सकती है? वे भारत की बात लिखते हैं, भारतीय संस्कृति की बात लिखते हैं, लेकिन भारत को सम्पन्न बनाने के लिए प्रयत्न नहीं करते।

आम भारतीय सोचता है कि मैं अमेरिका में नहीं, स्वर्ग में रह रहा हूँ और भारत में लोग नरक में रह रहे हैं। वाकई अमेरिका स्वर्ग है। हमारे पुराणों में स्वर्ग की सारी कल्पना वहाँ साकार है। सुरा और सुन्दरी का भरपूर प्रयोग, कोई प्रतिबन्ध नहीं। अप्सराओं को बच्चे पैदा करने की छूट नहीं, उनका यौवन अक्षुण्ण रहना चाहिए। कभी भ्रमण के लिए निकली उर्वशी, पुरुरवा से मिलती है और मनुष्य के सुख और दुख, मिलन और विरह से परिचित होती है। एकरसता भंग होती है, सारे ही रसों को प्राप्त करने के लिए उर्वशी पृथ्वी पर रह जाती है। ऐसा ही है अमेरिका का स्वर्ग। वहाँ भी नारियां बच्चे नहीं चाहती, पुरुष को आनन्द समाप्त होने का भय सताता रहता है। किसी जीवन्त प्राणी को खिलाने का मन करे तो कुत्ता पाल लो। शायद युद्धिष्ठिर इसीलिए कुत्ते को अपने साथ स्वर्ग ले गए थे। सब कुछ साफ-सुथरा, एक सी बनावट, प्रकृति के साथ जीवन। केवल मनुष्य और मनुष्य की सत्ता। कोई किसी को रोकता नहीं, टोकता नहीं। कोई पारिवारिक बंधन नहीं, कोई मानसिक बंधन नहीं। लेकिन वास्तविक स्वर्ग में भी उर्वशी जैसी अप्सराएं कहाँ मानी थी? वे भी संतान के सुख को चखना चाहती थी, वहाँ भी एक दिन संतान की इच्छा अंकुरित हो ही जाती है और फिर संतान होने के बाद उस अद्भुत सुख के आगे स्वर्ग के सारे सुख फीके लगने लगते हैं।

अमेरिका में बच्चों के लिए विशेष मापदण्ड हैं। जैसे भारत में गाड़िये-लुहारों का जीवन गाड़ी से शुरू होता है और गाड़ी में ही समाप्त होता है वैसे ही अमेरिका में भी जीवन बिना गाड़ी के सम्भव नहीं है। बच्चे को गोद में बैठने की इजाज़त नहीं है, उसके लिए ‘कार-सीट’ का प्रबन्ध किया गया है। कार-सीट में बच्चे को बेल्ट से बाँधकर, उसका मुँह पीछे की तरफ रखो। बच्चे को चोट नहीं आनी चाहिए। लेकिन बच्चे तो मचलते रहते हैं, गोद में बैठने को, या फिर खिड़की से झाँकने को। बच्चा कब बंधन की भाषा समझता है? लेकिन उसे बंधन की भाषा तो समझनी ही पड़ेगी, यदि अमेरिका में रहना है तो। फिर अमेरिका में पैदा हुआ है तो वह अमेरिकी नागरिक बन गया है। वहाँ भारतीय बच्चे और अमेरिकी बच्चों में अन्तर दिखाई देता है। शायद यह अंतर हमारे जीन्स का ही होगा। वहाँ के बच्चे चुपचाप कार-सीट या स्ट्रोलर में बँधकर, चूसनी के सहारे पड़े रहते हैं, लेकिन भारतीय बच्चे बंधन पसन्द नहीं करते। हमारे यहाँ माँ की गोद चाहिए, सोते समय माँ की गर्मी चाहिए, लेकिन वहाँ पृथकता का सिद्धान्त ही लागू है। न गोद में बिठाओ और न बिस्तर में साथ सुलाओ। ममता का विस्तार नहीं होना चाहिए। बच्चे को दुनिया में संघर्ष करना है, उसे मजबूत होना है, तो अकेले रहने दो। बच्चा भी सोलह साल का होते-होते पंछी की तरह नीड़ से उड़ जाता है। तुम्हारी दुनिया अलग और मेरी दुनिया अलग। कुछ भी साँझा नहीं। न सुख साँझे और न दुख साँझे। जिन प्रश्नों को भारत में पूरा परिवार ही नहीं, पूरा समाज हल करता है, वे सारे प्रश्न वहाँ निजी हैं। यदि माता-पिता साथ भी रहते हैं तो परायों की तरह, क्योंकि उनके भविष्य के बारे में पूछने का अधिकार उन्हें नहीं हैं। माता-पिता अपने भविष्य के बारे में तो खैर बात कर ही नहीं सकते।

भगवान ने या प्रकृति ने ममता नामक एक भावना मनुष्यों में ऐसी भर दी है जिससे न तो वह निजात पा सकता है और न ही उसे धारण कर सकता है। इसलिए वहाँ का युवा ममता के इस अंकुर को अपने अंदर पनपने ही नहीं देना चाहते। वे जानते हैं कि हम कुछ दिन ही बच्चे के साथ रह सकेंगे और फिर जब हमारे हाथ धूजने लगेंगे, थर-थराने लगेंगे तब मन करेगा कि कोई मजबूत, जवान हाथ इन्हें आकर थाम ले। वे जानते हैं अपना भविष्य, इसलिए इस ममता को अंकुरित नहीं होने का प्रयास करते रहते हैं। फिर जिस देश की परम्परा में ही सहारा नहीं हो, वहाँ तो व्यक्ति परम्परा मानकर संतोष कर लेता है, लेकिन जिस देश में कूट-कूटकर एक ही भावना भरी गयी हो कि हम एक-दूसरे के सहारा हैं, वहाँ का व्यक्ति क्या करे? कैसे अपने मन को समझाए कि नहीं अब यह परम्परा भारत के बच्चों ने यहाँ आकर समाप्त कर दी है अतः तुम भी इसे भूलने का प्रयास करो। वहाँ जन्मे बच्चों का पालन-पोषण अमेरिकी बच्चों की तरह ही करना पड़ता है, क्योंकि अब वे अमेरिकी नागरिक बन गए हैं और उन्हें वैसे ही विकसित होना चाहिए। उनको वहीं के स्वाद का आस्वादन करना पड़ेगा। वहाँ बच्चों के लिए खिचड़ी, दलिया नहीं है। पैक फूड उपलब्ध है। कुछ अमेरिकी, बच्चे नहीं चाहते और कुत्ते-बिल्लियों से ही काम चलाते हैं, जबकि कुछ अमेरिकी ढेर सारे बच्चे चाहते हैं। वे बच्चों को जन्म भी देते हैं और गोद भी लेते हैं।

अमेरिका में सभी देशों के लोग रहते हैं अतः आपको कई घरों में कई देशों के बच्चे मिल जाएँगे, जिनको गोद लिया गया है। अमेरिका में ताकत की पूजा है अतः वे बच्चों को ताकतवर बनाना चाहते हैं। केवल उच्च शिक्षा में उनका विश्वास नहीं हैं। किताबी कीड़ा नहीं बनाना चाहते, वे जानते हैं कि दुनिया में जीवित रहना है तो अपने दम पर रहना पड़ेगा, अतः ताकतवर बनो।

मेरा मानना है कि भारत और अमेरिका की संस्कृति में रात-दिन का अन्तर है अतः अमेरिका देश अमेरिकन्स के लिए तो श्रेष्ठ स्थान है लेकिन भारतीयों के लिए संघर्ष करने का स्थान है। वहाँ प्रतिपल स्वयं से लड़ना पड़ता है। कभी जीभ के स्वाद को मारना पड़ता है, कभी पहनावे के साथ समझौता करना पड़ता है। सरकार को टेक्स दे-देकर कभी मन में अपने देश के उत्थान की बात को भी मन में ही दबाना पड़ता है। परिवार के प्रेम को मन में ही दफनाना पड़ता है। सबसे कठिन संघर्ष तो तब शुरू होता है, जब बच्चे 16 साल के हो जाते हैं। उनका नीड़ अलग बस जाता है, आप केवल अकेले होते हैं, केवल अकेले। तब तक भारत आने के रास्ते बन्द हो चुके होते हैं और वहाँ रहना एक मजबूरी बन जाती है। तब याद आती है, अपने देश की मिट्टी, अपनी बोली, अपने लोग। फिर हाथ में आ जाती है कलम, जो बिखेरने लगती है स्याही। फिर हम अपने देश पर लिखते हैं, भारतीय संस्कारों पर लिखते हैं और लिखते हैं अकेलेपन पर। भौतिक साधनों के आदि हुए हम, मन को मारते रहते हैं। भारत गरीब, पिछड़ा देश है, वहाँ कैसे सभ्य इंसान रह सकता है, यही सोच उन्हें वापस नहीं आने देती। इसलिए जब तक उनमें तड़प उत्पन्न न हो, तब तक भारतीयों को उस पारिवारिक-उष्माविहीन शीतल देश में रहने दो। एक दिन यही अपनेपन की उष्मा उन्हें भारत में खींच लाएगी, जब तक आप इंतजार कीजिए।

डॉ अजित गुप्ता

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3 बैठकबाजों का कहना है :

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है कि -

बहुत अच्छा आलेख है। जो जानकारियाँ आप ने उपलब्ध कराई हैं। वे महत्वपूर्ण हैं। सामुहिक जीवन अमरीका में बहुत सूक्ष्म रह गया है। लेकिन वह विकास की एक अवस्था मात्र है। किसी दिन पुनः सामुहिक जीवन की ओर लौटना पड़ेगा।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आपने अपनी अमरीका यात्रा का इतना सजीव वर्णन किया है कि लगता है मैं भी साथ ही दे रहा होऊँ. देखे को विश्लेषित कर कह पाना वह भी इस तरह कि पढ़नेवाले को अपना सा लगे सहज नहीं होता...साधुवाद...

श्यामसखा श्याम का कहना है कि -

सही सटीक एवम्‌ संक्षिप्त होते हुए भी संपूर्ण-मेरा भी यही अनुभव है लेखक व निखिल जी को साधुवाद
श्यामसखा श्याम


मेरा मानना है कि भारत और अमेरिका की संस्कृति में रात-दिन का अन्तर है अतः अमेरिका देश अमेरिकन्स के लिए तो श्रेष्ठ स्थान है लेकिन भारतीयों के लिए संघर्ष करने का स्थान है। वहाँ प्रतिपल स्वयं से लड़ना पड़ता है। कभी जीभ के स्वाद को मारना पड़ता है, कभी पहनावे के साथ समझौता करना पड़ता है। सरकार को टेक्स दे-देकर कभी मन में अपने देश के उत्थान की बात को भी मन में ही दबाना पड़ता है। परिवार के प्रेम को मन में ही दफनाना पड़ता है। सबसे कठिन संघर्ष तो तब शुरू होता है, जब बच्चे 16 साल के हो जाते हैं। उनका नीड़ अलग बस जाता है, आप केवल अकेले होते हैं, केवल अकेले। तब तक भारत आने के रास्ते बन्द हो चुके होते हैं और वहाँ रहना एक मजबूरी बन जाती है। तब याद आती है, अपने देश की मिट्टी, अपनी बोली, अपने लोग। फिर हाथ में आ जाती है कलम, जो बिखेरने लगती है स्याही। फिर हम अपने देश पर लिखते हैं, भारतीय संस्कारों पर लिखते हैं और लिखते हैं अकेलेपन पर। भौतिक साधनों के आदि हुए हम, मन को मारते रहते हैं। भारत गरीब, पिछड़ा देश है, वहाँ कैसे सभ्य इंसान रह सकता है, यही सोच उन्हें वापस नहीं आने देती। इसलिए जब तक उनमें तड़प उत्पन्न न हो, तब तक भारतीयों को उस पारिवारिक-उष्माविहीन शीतल देश में रहने दो। एक दिन यही अपनेपन की उष्मा उन्हें भारत में खींच लाएगी, जब तक आप इंतजार कीजिए।

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