Saturday, April 25, 2009

सोने का पिंजर (12)

बारहवां अध्याय

मैंने पचास दिन तक अमेरिका तुझे देखा है, तेरे यहाँ की मानसिकता को अनुभव किया है। लेकिन केवल पचास दिनों की ही मैं बात नहीं कर रही है। मैंने तो तुम्हें तभी से जानना शुरू कर दिया था तब बेटा तुम्हारे आकर्षण से बँधा तुम्हारे यहाँ पढ़ने गया था। सितम्बर 2001 से तुम्हें मैंने जाना और धीरे-धीरे पहचाना। तभी से अपने आसपास, घर-बार में देखती रही हूँ तुम्हारे विभिन्न रूप और साथ ही भारतीय युवा-पीढ़ी का एक नवीन रूप। जो तुम पर आसक्त है। तुम पर मोहित है। भारत के बंधनों से दूर वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं। हमारे यहाँ तो ठेठ गाँव से निकल कर आप कितनी ही दूर किसी भी महानगर में जाकर बस जाओ, आपके घरवाले और रिश्तेदार घूमते हुए आ ही जाएँगे। यदि आप दर्शनीय स्थानों पर रह रहे हैं तब फिर तो एक बहाना ही रहता है कि अरे अब तो अपना बेटा, भाई, भतीजा वहाँ रहता है, चलो उससे मिल भी आएँगे और जगह देख भी आएँगो। लेकिन अमेरिका जाना इतना आसान नहीं!
लेकिन अब अमेरिका भी तो कहाँ दूर रह गया है? अब तो माता-पिता और रिश्तेदार वहाँ भी पहुँचने लगे हैं। मुझे एक कहानी याद आ रही है। राजस्थान के एक राजा, युद्ध में हार जाते हैं। मरने के भय से वापस अपने शहर लौट आते हैं। लेकिन रानी इस कायरता को बर्दास्त नहीं कर पाती। वे शहर के दरवाजे बन्द करवा देती है। राजा सहित सारी फौज कई दिनों तक शहर के बाहर ही पड़ी रहती है।
आखिर एक दिन राजा की माँ आदेश देती है कि नगर के दरवाजे खोल दिए जाएं और मेरे बेटे को सम्मान सहित राजमहल में प्रवेश दिया जाए।
दरवाजे खुल गए और राजा रनिवास में आ गए।
माँ ने बहु से कहा कि बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद युद्ध से लौटा है, जाओ इसके लिए हलुवा बनाकर लाओ।
रानी हलुवा बनाने लगी। वह गुस्से में तो थी ही। कढ़ाई में हलुवे को जोर-जोर से पलटे से हिला रही थी।
माँ वहीं से चिल्लाई, बहु मेरा बेटा इतने दिनों बाद घर लौटा है। वहाँ लोहे से लोहे के टकराने की आवाज सुनकर माँ के आँचल में छिपने चला आया था, यहाँ भी तू लोहे से लोहा टकरायेगी तो फिर बेचारा अब छिपने के लिए कहाँ जाएँगा?
राजा तत्काल अपनी फौज लेकर रण के लिए चला गया।
हमारी नवीन पीढ़ी भी गृह-युद्ध से बचने के लिए तुम्हारे आँचल में शरण ली है, यदि अब पुनः उनके परिवारजन वहाँ भी जा पहुँचे तो फिर बेचारे किसकी शरण में जाएँगे? मेरा तो तुम से यही कहना है कि तुम हमारी राजमाता की तरह मन बनना। उन्हें कभी अपना कर्तव्य याद मत दिलाना। नहीं तो बेचारे वे कहाँ जाएँगे? उन्होंने यहाँ एक धारणा बना रखी है कि वे बहुत खुश है, खुशहाल भी हैं बस इसे बनाए रखना। भारत तो वैसे भी बूढ़ा हो चुका है। हजारों वर्षों से जी रहा है। आखिर कब तक और जीएगा? कभी तो इसका भी अन्त होना ही चाहिए न! तुम अभी जवान हो, अतः दुनिया के जवानों को अपने यहाँ एकत्र करो। अपना उत्थान करो। भारत के बूढ़ों का क्या है, उन्हें तो वैसे भी एक दिन मरना ही है।
भारत में राजस्थान ऐसा प्रदेश है जहाँ रेत के गुबार थे। पानी का नामोनिशान नहीं। फिर भी सेठाना था, लोग बड़ी-बड़ी हवेलियाँ बनाते थे। 10-20 कमरे तो आम बात थी, बड़े लोगों की हवेली में 100-100 कमरे हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे युवा-पीढ़ी को लगा कि यदि हम इन रेत के धोरों से बाहर निकलेंगे तो ज्यादा रईस हो जाएँगे और वे निकल गए, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास आदि बड़े महानगरों में। घर में बड़ी-बड़ी हवेली और मुम्बई में एक छोटी सी चाल! लेकिन जब गाँव लौटकर आते तो उनके लिए बग्गी लगती, ड्रेस वाला कोचवान सजता। धीरे-धीरे आकर्षण बढ़ा और राजस्थान के ये रेतीले धोरे रिक्त हो गए युवा-पीढ़ी से। रह गयी सुनसान, बाट जोहती हवेलियाँ। हवेलियों में उनके बूढ़े। शुरू-शुरू में तो बेचारा अकेले ही जाता था, अपनी नई नवेली दुल्हन को भी हवेली में ही छोड़कर जाता था। लेकिन फिर दुल्हन भी साथ ही जाने लगी। हवेली छोड़कर वो भी एक या दो कमरे के फ्‍लेट में रहने लगी।
मैं एक बार ऐसे ही एक सेठाने में गयी। मेरी एक सहेली वहाँ ब्याह करके गयी थी। देखा बड़ी सी हवेली है, बड़े-बड़े कमरे हैं। एक बैठक खाने में मोटे-मोटे गद्दे बिछे हैं, उनपर सफेद दूधिया चादरे बिछी हैं। दूसरे बैठक खाने में सोफे लगे हैं, गलीचे बिछे हैं। हमारे लिए बड़े से थाल में नाश्ता आया। जिसमें नाना प्रकार के व्यंजन थे। हवेली के पीछे धोबीखाना था, बड़ी सी गाड़ी का गेराज था। नौकरों के रहने की जगह थी। दिन में बहु-बेटियाँ बाजार में नहीं निकलती, रात होगी तब गाड़ी में पर्दे लगेंगे और फिर बहु-बेटियाँ शहर देखेंगी। हम अभिभूत थे, वो सेठाना देखकर। फिर महानगरों में भी इन्हीं सेठों का जीवन देखने का अवसर मिला। कोई चाल में रह रहा था और कोई दो कमरों के लेट में। ऐसी कोठियाँ तो शायद वहाँ टाटा-बिरला के पास भी न हो!
लेकिन अब वे हवेलियाँ उजड़ गयी हैं। रह गए हैं चैकीदार या किराएदार। मालिक कभी-कभार आते हैं। घर में जब विवाह का प्रसंग उपस्थित होता है तब ही गाँव की हवेली याद आती है। महानगर में तो शादी करें तो कहाँ करें? फिर दादा लोग अपना टेक्स वसूलने भी आ जाते हैं। इसलिए ये हवेलियाँ तभी सजती हैं और तभी इनमें चहल-पहल होती है। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सेठों के बच्चे नहीं गए, वे तो हमारे जैसे आम आदमी के बच्चे हैं। लेकिन अब वे आम घर भी सूने हो गए हैं। पहले राजस्थान में ही हवेलियाँ सूनी पड़ी थी लेकिन अब तो पूरे भारत के ही घर सूने हो रहे हैं।
बूढ़ों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वे बेचारे नौकरों के भरोसे रह रहे हैं और नौकर भी मौका देखकर उनका गला काट लेते हैं। रोज ही की खबर है, बूढ़ों की हत्या। सरकार भी क्या तो करे? कोई भी नहीं समझ पा रहा कि जिस देश ने दुनिया को ही एक परिवार के रूप में माना आज वहीं परिवार संस्था टूटती जा रही है। अब भारत की सरकारें भी कानून बना रही है, उनके पालन-पोषण का। कैसा जमाना आ गया है, पहले मेरे घर में भी ताले नहीं हुआ करते थे। अब तो मुझे रोज ही नए ताले खरीदने पड़ते हैं। वे हवेलियां कम से कम वार-त्यौहार, शादी-ब्याह के अवसर पर तो गूँजती हैं, लेकिन यहाँ तो सारे घर ही सूने हो गए। किसी के भी घर चले जाओ, एकेले बूढ़े माता-पिता बाहर बराण्डे में बैठे मिलेंगे। वे खोज रहे हैं उस आवाज को जो उन्हें पुकार ले। उनसे बतिया ले।
अमेरिका तुम वो अप्सरा हो, जिसके पीछे हमारी नौजवान पीढ़ी भाग रही है। वे तुम्हें पाना चाहती है, तुम में रमना चाहती है। हमारे यहाँ से श्रवण कुमार, राम, भीष्म जैसे पुत्रों की परम्परा समाप्त हो गयी है। अब उन्हें वे भी मिथक मानने लगे हैं। उन्हें तो बस याद है केवल तुम्हारा भौतिक स्वरूप। वे उसे पाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन फिर भी मेरा तुझको सलाम! कम से कम तुमने हमारी पीढ़ी को अहंकार से तो निजात दिला दी। पुरुष और महिला के अन्तर को तुमने इक सीमा तक समाप्त भी कर दिया। मुझे तो गर्व है कि अब हमारी महिलाएं भी वहाँ पति की तरह रहती हैं।
अमेरिका तुझे मेरा नमन! तेरे भौतिक स्वरूप को नमन! तेरे यहाँ बसी हमारी भारतीय पीढ़ी को नमन! नमन! किसलिए?
नमन इसलिए कि भारत अब भारत नहीं रहा। लेकिन वहाँ बसे भारतीयों के मन में भारत जन्म ले रहा है। हमारे त्यौहार बस एक परम्परा बनकर रह गये हैं जबकि तुम्हारे यहाँ वे उत्सव बने हुए हैं। युवा-पीढ़ी के आकर्षण के कारण बड़े लोगों का आकर्षण भी तुम्हारे प्रति बढ़ा है। अतः वे भी अब तुम्हें देखने जाने लगे हैं और तुम्हारा सच बाहर आने लगा है। जो कल तक तुमने हमारे अन्दर हीन भावना भरी थी अब वो मिटने लगी है। तुम्हारे यहाँ से आए माता-पिता अब कहने लगे हैं कि नहीं सुख तो भारत में ही है। जुबान का स्वाद तो भारत में ही है। तब मैं अपनी नवी पीढ़ी से कहती हूँ कि जब तुम्हें वहाँ अपनी खुशबू, अपने स्वाद की याद आए तब तुम भारत में आना। हमारे लिए नहीं आना। जब भी आओ स्वयं के लिए ही आना, तभी तुम भारत की कद्र कर सकोंगे। मेरी ये चंद पंक्तियां उन सभी को समर्पित हैं -

पीर गंध की जगने पर
हूक उठे तब तुम आना
मन के डगमग होने पर
अपने देश में तुम आना।

सन्नाटा पसरे मन में
दस्तक कोई दे न सके
चींचीं चिड़िया की सुनने
अपने देश में तुम आना।

घर के गलियारे सूने
ना ही गाड़ी की पींपीं
याद जगे कोलाहल की
अपने देश में तुम आना।

शोख रंगों की चाहत हो
फीके रंग से मन धापे
रंगबिरंगी चूंदड़ पाने
अपने देश में तुम आना।

सौंधी मिट्टी, मीठी रोटी
अपना गन्ना, खट्टी इमली
मांगे जीभ तुम्हारी जब
अपने देश में तुम आना।

बेगानापन खल जाए
याद सताए अपनों की
सबकुछ छोड़ छाड़कर तब
अपने देश में तुम आना।

कोई सैनिक दिख जाए
मौल पूछना धरती का
मिट्टी का कर्ज चुकाने तब
अपने देश में तुम आना।

वीराना पसरे घर में
दिख जाए बूढ़ी आँखें
अपनी ठोर ढूंढने तब
अपने देश में तुम आना।

तेरे वैभव से लौटने के बाद मेरी निगाहें पक्षियों पर चले गयी। यहाँ की गुलाबी सर्दियों में हजारों पक्षी विदेश से भारत चले आते हैं। उन्हें किसने बताया कि भारत स्वर्ग है? लेकिन उन्होंने खोज लिया। मुझे लगा कि हमारे पक्षी भी तो कभी चाहते होंगे, तेरे जैसे देशों का वैभव देखना। तो मैंने एक कल्पना की। तू देख कितना सच है और कितनी कल्पना है?

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बैठकबाज का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

सोने के पिंजर में
क़ैद है युवा...

माटी की गंध से
लग रहा है डर.
स्नेहिल अनुबंध का
कुछ नहीं असर.
नातों पर हावी हैं
स्वार्थ निज मुआ...

साँस घुट रही
घर के अन्दर.
दूर निज ज़मीन से
खोज रहे घर.
धुंधलाई दृष्टि मांग
रही है दुआ..

बरगद सा चाहिए
न इनको ठहराव.
उडे बन पतंग.
झेल रहे हैं भटकाव.
बाज़ के पंजों से बचे
किस तरह सुआ?

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