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Thursday, June 16, 2011

हिन्दयुग्म ने मिलवाया दो पुरानी सहेलियों को

27 साल पहले बोधगया के एक गाँव में गये स्काउट गाइड में संध्या (बायें) और संगीता (दायें)

ये बात आपको फिल्मी स्टाइल लग सकती है या कोई तिलस्म पर ये बिल्कुल सच्ची घटना है जिस पर मुझे भी आश्चर्य है। सन 1979 की बात है हम गाइडिंग के एक कैम्प में सलोगड़ा में मिले थे। वो दिल्ली से आई थी और मैं बीकानेर से। 5 दिन की हमारी छोटी से मुलाकात दोस्ती में बदल गई। उसने मेरी पता लिया और मैने उसका। वो ज़माना चिट्ठी-पत्री का था। एक दो खत उसके आए और मैंने भी लिखे। फिर हम 1980 में बोधगया में राष्ट्रीय स्काउट-गाइड जम्बूरी में मिले। वहाँ 15 दिन के साथ ने हमारी दोस्ती को नया आयाम दिया। साथ-साथ उठना-बैठना, सोना-जागना, खाना-पीना, नाचना-कूदना और ढेर सारे रोमांचक खेलों में भाग लेना। जब लौटने का समय आया तो हमारी आँखों में आँसू थे। लौट कर आने के बाद हमारे खतों का सिलसिला बढ़ गया। फिर तो हमें इंतज़ार रहता कि कब कोई कैम्प आयोजित हो और हम उसमें आएं और गले लगकर मिलें। उसके पापा और मेरे पापा रेल्वे विभाग में थे और उस के अंतर्गत हम स्काउटिंग गाइडिंग संस्था से जुड़े हुए थे।

खतों का सिलसिला चलता रहा। ना जाने कितने खत आए और कितने खत मैंने भेजे। अंतर्देशीय पत्र, लिफाफे, ग्रीटिंग कार्ड पर कभी पोस्टकार्ड नहीं था। एक बार पापा मम्मी के साथ दिल्ली जाना हुआ तो वो मुझे मिलने मेरी ताई जी के घर आई जहाँ मैं रुकी हुई थी। मेरी शादी हुई 1985 में तो शगुन के साथ उसका प्यार भरा पत्र भी आया। मैं और मेरे पति जब पहली यात्रा पर निकले तब उसके घर गये। वो प्यार से खाना खिलाना मुझे याद है। कुछ खत और भी आए पर एक ग्रीटिंग कार्ड 1986-87 आया जो शायद अंतिम था। मैंने उसे कईं खत लिखे पर उसका कोई जवाब नहीं आया। मैं हार कर बैठ गई। कुछ दिन यह सोच कर कि उसकी नई शादी हुई होगी। नई परिस्थिति में अपने आप को ढालने की कोशिश कर रही होगी। पर पूरे 25 साल बीत गए। इधर मैं भी उसे ना भुलाते हुए भी अपने जीवन में व्यस्त हो गई। उसके द्वारा भेजे गए सारे खत सम्भाल कर रखे और समय-सम्य पर निकाल्कर पढ़ती रही। फिर एक बार हिंदयुग्म पर सितम्बर माह की युनिकविता प्रतियोगिता के अंतर्गत मेरी कविता “मैं छोटी-सी गुड़िया हूँ” प्रकाशित हुई। कविता पर आई पाठकों की टिप्प्णियाँ पढ़ रही थी कि चौंक गई। कविता में टिप्प्णी करने के बजाय लिखा था संगीता तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा। जब भी तुम्हारा नाम पढ़ती सोचती तुम वही संगीता हो। राजीव का क्या हाल है। मैं बहुत खुश हूँ। “सन्ध्या गर्ग ” और अपना मेल एड्रेस था। यानी वो मेरे भाई राजीव को भी याद रखे थी। मैं एकदम पहचान गई कि ये वो ही सन्ध्या बत्रा है जिसे मैंने भी कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा। मेरी आँखों से अश्रुधारा बह गई। मैन हर्षतिरेक से चीख पड़ी। अपने पति और बच्चों को बताने भागी। अब मेल का सिलसिला शुरू हुआ और फोन नं. की माँग की।

मेल पर वो सारी बातें कर ली और समय निर्धारित कर लिया ताकि जब फोन पर इतने बरसों की बात करें तो हमारी दिनचर्या का कोई काम आड़े ना आए। फिर एक दिन फोन पर बात की और सारे गिले-शिकवे कर डाले। वो भी खुशी से पागल थी और मैं भी। उसने मुझे बताया कि वो दिल्ली के जानकी देवी कॉलेज में हिन्दी की व्याख्याता है। उसई के एक विद्यार्थी की कविता हिंदयुग्म पर प्रकाशित हुई थी और उसके आग्रह पर वो हिन्दयुग्म की साइट पर गई थी। सुखद आश्चर्य था मेरे लिए कि बचपन की दोनों सहेलियाँ जीवन-स्तर की एक ही प्रोफाइल में जी रही थी। सोचिए अगर हममें से एक भी कम पढ़ी-लिखी होती या पढ़े-लिखे होने से क्या होता है? हममें से एक भी कम्प्यूटर ज्ञान वाली ना होती। पर कम्प्य़ूटर ज्ञान से भी क्या होता है? हममें से कोई एक भी नेट सर्च करने वाली ना होती। नेट सर्च करने से क्या होता है जी? हममें से एक भी साहित्य में दखल देने वाली ना होती तो क्या हम मिल पाते? बचपन में बिछड़े दोस्तों का बड़े होकर समान क्षेत्र हो ये आश्चर्य नहीं तो और क्या है। भला हो इस कम्प्यूटर युग का और शुक्रिया हिन्द युग्म का कि जिसने बरसों से बिछड़ी सहेलियों को मिलवाया। आज मैंने सन्ध्या को फेस्बुक पर भी एड कर लिया है।

संगीता सेठी
1/242 मुक्त प्रसाद नगर
बीकानेर (राज)


मंच पर डॉ. संध्या

मंच पर संगीता

मुस्कुराती संध्या

मुस्कुराती संगीता

27 साल पहले की संध्या (मध्य में)

टूर पर बिंदास संध्या (नैनीताल)

टूर पर बिंदास संगीता (बंगलूरू)

लिखे जो खत तुझे- 1

लिखे जो खत तुझे- 2

लिखे जो खत तुझे- 3

लिखे जो खत तुझे- 4

Friday, November 06, 2009

प्रभाष जोशी- एक प्रकाश-पुंज अस्त हो गया (श्रद्धाँजलि)

श्रद्धांजलि - प्रेमचंद सहजवाला

जीवनवृत्त
प्रभाष जोशी (जन्म- 15 जुलाई 1936, निधन- 05 नवम्बर 2009) हिन्दी पत्रकारिता के एक स्तंभ थे। ये हिंदी दैनिक 'जनसत्ता' के सम्पादक रह चुके हैं और सम्प्रति 'तहलका हिंदी' के लिये लिखते थे।

इंदौर (म॰प्र॰) में जन्मे प्रभाष जोशी ने 'नई दुनिया' के साथ अपने पत्रकारिता-कैरियर की शुरूआत की। नवंबर 1983 में वे जनसत्ता से जुड़े और इस अखबार के संस्थापक संपादक बने। नवंबर 1995 तक वे अखबार के प्रधान संपादक रहे लेकिन उसके बाद से अबतक वे जनसत्ता के सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े रहे। उन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीयता को लगातार पुष्ट किया। वैचारिक प्रतिबद्धता का जहाँ तक सवाल है तो उन्होंने सत्य को सबसे बड़ा विचार माना. इसलिए वे संघ और वामपंथ पर समय-समय पर प्रहार करते रहे।

प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबार बनाया। उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है। देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया. इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए।

अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे। अभी भी जनसत्ता में हर रविवार उनका कॉलम कागद-कारे छपता था। हाल में ही इन्होंने 'तहलका-हिन्दी' में 'औघट-घाट' नाम से स्तम्भ लिखना शुरू किया था।

ऊषा से प्रभाष जोशी का विवाह हुआ, जिससे इन्हें 2 बेट संदीप और सोपान तथा एक बेटी सोनल हुए। सोपान जोशी पर्यावरण की प्रसिद्ध पत्रिका 'डाऊन-टू-अर्थ' के प्रबंध संपादक हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान- हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल 2007-08 का शलाका सम्मान।
विकिपीडिया से साभार
आज की सुबह सचमुच मेरे लिए एक दुखद समाचार लाई. दिन बहुत सामान्य तरीक़े से शुरू हुआ कि मोबाइल पर एक सन्देश आया, जिसे पढ़ कर हृदय को बहुत गहरा धक्का पहुंचा. सन्देश सुनीता शानू ने भेजा था - 'प्रभास जोशी जी नहीं रहे. आज का दिन बहुत दुखद है'. मैं इस खबर पर विश्वास करने को तैयार नहीं हूँ, इस लिए दो चार फ़ोन खड़खड़ा देता हूँ, पर सब के सब दोस्त मुझ पर कितना अत्याचार कर रहे हैं, कह रहे हैं 'हाँ, प्रभास जोशी नहीं रहे'!

हिंदी पत्रकारिता के महास्तंभ, 73 वर्षीय प्रभास जोशी जैसे पावन हृदय व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे. 'जनसत्ता' समाचार पत्र को अख़बार जगत में चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने वाली एक शख्सियत के रूप में मैं उन के नाम से पहले ही परिचित था. पर इस रूप में तो उनका परिचय जग-प्रसिद्ध रहा. इतना जान कर मैंने कौन से तीर मार लिए. पर क्या मैं खुद कभी उनके निकट खड़ा या बैठा भी था? ऐसा सौभाग्य भला मेरा कहाँ? पर हाँ, एक दिन वह शुभ घड़ी भी आ गई, जब दूरदर्शन के NDTV चैनल के स्टूडियो में मैं प्रभास जोशी के बहुत निकट बैठा था. यह पहली बार था कि ज्यों ही वे आए, मुझे उठ कर उनके चरण स्पर्श करने का मौका मिला. NDTV स्टूडियो में शूटिंग थी साप्ताहिक कार्यक्रम 'हम लोग' की, और उस में प्रभास जी व्यस्तता के कारण कुछ देर से आए थे. उन के आते ही मैं उत्तेजित सा था कि जिस महान शख्सियत की पवित्र छवि मैं मन में कई वर्षों से समेटे हूँ, वह महान शख्सियत अब स्टूडियो की इन सीढ़ियों पर मेरे सामने, वहां, केवल तीन चार कदम ही दूर बैठेगी. कितनी बढ़िया जिंदगी है मेरी. मैं ने जब कैमरा की परवाह किये बिना उठ कर उन के चरण स्पर्श किये, तो जो सौम्यता व आर्शीवाद के भाव उन के चेहरे पर आए, उन का वर्णन सचमुच मुश्किल है. मैं एक कहानीकार भी हूँ, सो उस गहराई, विद्वता और बड़प्पन से भरे चेहरे का चरित्र-चित्रांकन करने की चेष्टा करने लगा. कुछ वर्ष सोचता रहा, कि आखिर क्या भिन्न था, अन्य बड़े लोगों में और प्रभास जी में? यह बात जा कर मुझे तब समझ आई, जब इस वर्ष मैं 'हिंदी अकादमी' के एक कार्यक्रम में गया. 'हिंदी अकादमी' ने महात्मा गाँधी की विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' व 'सत्य के प्रयोग' को प्रकाशित कर के 18 अगस्त 2009 को दिल्ली की मुख्य-मंत्री शीला दीक्षित द्वारा उन के लोकार्पण का कार्यक्रम रखा था. दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में मैं अपना कैमरा ले कर प्रविष्ट होता हूँ. अभी शीला जी का तो इंतज़ार है, हाल भी अभी आधा भरा है, पर दर्शक-गण में सब से पहली पंक्ति में वो... अपने प्रभास जी ही तो बैठे हैं! मैं तेज़-तेज़ कदम बढ़ाता हुआ वहीं पहुँचता हूँ और एक मौका और, उन के चरण स्पर्श करने का! 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' की निदेशक डॉ. वर्षा दास के साथ बैठे प्रभास जी से मैं कहता हूँ - 'मैं NDTV में आप के साथ ही था'! और वे यह कह कर मुझे चकित कर देते हैं - 'याद आ गया!'. मैं उन्हें कहता हूँ - 'उस दिन NDTV के 'हम लोग' कार्यक्रम में इस बात पर चर्चा थी कि दूरदर्शन ग्लैमर का शिकार होता जा रहा है. केवल अभिनेता, क्रिकेटर और नेता ही दूरदर्शन पर छाए रहते हैं'. प्रभास जी मुस्कराते हैं, बहुत ही आत्मीयता भरी और प्रोत्साहन भरी मुस्कराहट. अपनी साहित्य व पत्रकारिता यात्रा में मैं हर किस्म के लोगों से मिला हूँ. कुछ ऐसे भी, जो एक कहानी छपते ही रातों-रात ओ. हेनरी या तोल्स्तॉय हो जाते हैं और कुछ ऐसे, जैसे प्रभास जी, जो छोटों से बात करें तो लगे, साहित्य से जुडे सभी लोग एक ही परिवार के तो हैं. 'हम लोग' कार्यक्रम में प्रभास जी दूरदर्शन मीडिया को लताड़ रहे हैं. कह रहे हैं- 'देश में कितने लोग भूखों मरते हैं, यह कोई खबर नहीं. पर अभिनेता मंदिरों में घूम रहे हैं, यह बड़ी खबर है'. स्टूडियो में ठहाका बिखेरते हुए प्रभास जी कार्यक्रम संचालक पंकज पचौरी से कह रहे हैं - 'आप के लिए कैटरिना कैफ बड़ी खबर है, पर सूखे में मर रहे लोग खबर नहीं हैं... बस नेता... अभिनेता...खिलाड़ी, इन तीनों के बीच ही तो झूलता है दूरदर्शन'...

प्रेमचंद सहजवाला प्रभास जोशी के साथ
...पहले देश की जनता सुबह होने का इंतज़ार करती थी कि अख़बार आए तो खबरें पढ़ें. दिन आधा बीते तो 'सांध्य टाईम्स' या 'evening news ' आ जाता था. कुछ शौकीन लोग आकाशवाणी पर हर घंटे 'पिप पिप पिप...' की ध्वनि बजते ही अशोक वाजपेयी या देवकी नंदन पांडे की कठोर आवाज़ों में समाचार सुनने बैठ जाते थे. पर जब से 'पल पल की खबर' देने वाले, या 'सब से तेज़' जैसे चैनल आए हैं, देश की सूरत ही बदल गई. खबरें घटती बाद में हैं, अचानक दूरदर्शन पर आ पहले ही जाती हैं शायद, कभी कभी तो मुझे ऐसा ही लगता है. किसी खबर को कई गुना सनसनीखेज़ बनाने की कला में माहिर चैनलों ने देश के आम आदमी को बहुत उत्तेजित सा कर दिया. मुझे एक रोचक प्रसंग याद आ रहा है, जब दिल्ली के गंगाराम हस्पताल के कमरा नं. 214 में प्रियंका गाँधी दाखिल थी और इंतज़ार था उनके वैवाहिक जीवन की पहली ख़ुशी का यानी पहली डिलिवरी का. दूरदर्शन के पत्रकार बेचैन से हस्पताल का कॉरिडोर पर कब्ज़ा किये थे और चैनलों के स्टूडियो से बेताब से समाचार संपादक चिल्ला कर पूछ रहे थे - 'हेलो दिव्या (मालिक लहरी), क्या कोई ताज़ा बुलेटिन आई है'? दिव्या मालिक लहरी बुरी तरह हिलती-डुलती, उत्तेजना में अपना संतुलन बिगाड़ती सी चिल्ला रही हैं 'नहीं आशुतोष, अभी तो डॉक्टर अन्दर किसी को जाने ही नहीं दे रहे'!... एक और चैनल पर एक और समाचार रीडर चिल्ला रहा है - 'प्रियंका गाँधी को क्या लग रहा है, उन्हें बेटा होगा या बेटी'?... मैं चकित हूँ. दूरदर्शन वाले चाहते हैं कि खबर पहले ही घट जाए, अगर नहीं घटेगी तो हम उसे घटवा कर ही दम लेंगे... मैं ने इसीलिए एक व्यंग्य शेर लिखा था:

खबरनवीस वहां पर खबर से पहले गए,
अगर न जाते तो ये वारदात होती क्या!


देशी पत्रकारिता के मज़बूत स्तम्भ
प्रभाष जोशी केवल इस मायने में वरिष्ठ नहीं थे कि वे एक राष्ट्रीय अखबार के संस्थापक, संपादक या वयोवृद्ध पत्रकार थे, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता के लिए तय अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरोकारों को लगातार विकसित करने का काम किया। और इस मामले में उनकी भूमिका अग्रणी थी। वे अपने कई संपादकीयों और बयानों को लेकर विवादों में भी घिरे और उसे स्वीकारा भी, लेकिन प्रभाष जोशी दरअस्ल पत्रकारीय अस्मिता और कर्तव्य की एक भारतीय परम्परा बनाने और जनसाधारण से उसे जोड़ने का निरंतर प्रयत्न करते रहे। इस प्रक्रिया में अंग्रेजीयत में डूबी बहुराष्ट्रीय आधुनिकता को उन्होंने पर्याप्त रूप से कोसा और इसके ख‌़िलाफ़ लिखते रहे। 'सेज़-विरोध' तथा विस्थापन विरोधी आंदोलनों से उन्होंने अपना एक जीवंत रिश्ता बनाया और यथार्थ को जानने के लिए लगातार जगह-जगह की यात्राएँ करते रहे। इससे ज़ाहीर होता है कि वे महज़ सूचनाओं के आधार पर विचार बनाने और गुरु-गंभीर टिप्पणीकारिता के क़तई ख़िलाफ़ थे। प्रभाष जी पत्रकारिता की जिस मर्यादा और गौरवपूर्ण अतीत के हिस्से थे, उसमें बेशक जातिवादी व्यवस्था और पूँजीवाद के नये गठजोड़ों को समूल ध्वस्त करने की कुबत न रही हो, लेकिन उसके प्रति सच्चा आलोचनात्मक रूख लगातार बना रहा। लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यपद्धति और भारतीय जनता के साथ उनके संबंधों और कर्तव्यों को लेकर उन्होंने ताउम्र एक सचेतन पत्रकार की भूमिका निभाई। इसीलिए उनमें न केवल व्यक्तिगत ईमानदारी और कबीराना स्वभाव प्रचूर मात्रा में मौज़ूद रहा बल्कि आनेवाले समय में भी आदर्शवादी विचारशील और प्रतिबद्ध पत्रकारों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त चारित्रीक विशेषता रही है। वे अपने लेखन की वज़ह से समकालीन हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक जीवंत-सेतु बनाते रहे। भाषा के साथ इनका संबंध और सूचनाओं के प्रति सुचिंता उन्हें लगातार किसी विचार, नीति और कानून को भारतीय जनता की खुशहाली की कसौटी पर कसने को प्रेरित करती थी जो वस्तुतः उन्हें अंतिम आदमी के प्रति जवाबदेही की गाँधी के परिकल्पना के नज़दीक ले जाती रही है। उनके निधन से एक बड़ी और गौरवशाली परम्परा बाधित हो गई है।

-रामजी यादव
पर बात तो प्रभास जोशी की हो रही थी, मैं शायरी क्यों करने लगा! पर बात दरअसल उस संतुलन की है, जो प्रिंट मीडिया में था, पर दूरदर्शन के आते ही वह संतुलन जाता रहा, भले ही प्रिंट मीडिया पर भी खबर को चटपटी बनाने और सनसनीखेज़ बनाने के इल्जाम अक्सर लगते रहे. पर प्रभास जोशी जैसे पत्रकार जिन अख़बारों में रहे वहां नहीं. यह लेख लिखते-लिखते मैंने हिंदी कवियत्री ममता किरण को फ़ोन किया और कहा कि प्रभास जी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी. ममता जी ने कहा कि वे 'जनसत्ता' में प्रभास जी के नियमित कालम 'कागद कारे' को लगातार पढ़ती रही और बेहद प्रभावित थी. उनके अनुसार प्रभास जी चाहे क्रिकेट हो या फिल्म, या राजनीती-जगत, देश के हर विषय पर लिखने में अपना सानी नहीं रखते थे. साथ ही यह कि वे चाहते तो सत्ता के नैकट्य का भरपूर लाभ उठा सकते थे, पर वैसा करना उनकी फितरत का हिस्सा नहीं था. ममता जी का फ़ोन रखा तो आकाशवाणी दिल्ली के निदेशक लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने जो सन्देश भेजा वह इस प्रकार है - 'प्रभास जी ने अनेक बंधी-बंधाई लीकों को तोड़कर हिंदी पत्रकारिता को नई भाषा, नई शैली, नया मुहावरा दिया. वे राष्ट्रीय जीवन में नैतिक मूल्यों के पहरेदार थे. इस नैतिक पतन के युग में उनका जाना नैतिकता की मशाल का बुझना है'. और ठीक उसी समय एक ओर सन्देश आया - 'पत्रकारिता जगत का एक और सितारा डूब गया. मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि'...

मैंने जब NDTV के उस कार्यक्रम में यह कहा कि दूरदर्शन चैनल तो अभिनेता को सर चढा देते हैं, अभिनेता संजय दत्त पर कितने भी संगीन इल्ज़ाम हों, पर दूरदर्शन उस की खबर देते समय बड़े प्यार से उसे 'संजू बाबा' या 'मुन्ना भाई' कहते हैं, तब स्टूडियो में तालियों की गड़गडाहट हुई सो अलग, पर जैसे छोटा बच्चा शाबासी के लिए अपनी बात कह कर किसी बड़े की तरफ देखता है, मेरी नज़र भी अपनी बात कहते ही प्रभास जोशी पर टिक गई. जो मुस्कराहट उन के चेहरे पर आई, वह भी मैं कई दिन तक सोचता रहा, कि कैसी थी वह मुस्कराहट?... क्या था उस में? स्टूडियो में बाद में उन्होंने मेरी पीठ भी थपथपाई, और मैंने उनको अपना पूरा परिचय दे डाला (शुक्र कि यह नहीं कहा कि मैं तो हिंदी का मोपांसा या चार्ल्स डिकेंस हूँ). शायद उसी को याद कर के वे यहाँ, त्रिवेणी सभागार में कह रहे थे - 'याद आ गया'. और उनके चेहरे पर मुस्कराहट भरी रेखाओं से मैं समझ गया, वे साहित्यकारों पत्रकारों से मिल कर उन्हें कभी भूलते नहीं. सब को अपना समझते हैं, सो उनकी मुस्कराहट में वह आत्मीयता का मोती, मैं अपनी अदना सी शख्सियत में पिरो कर फूला नहीं समा रहा था. आत्मीयता ऐसी, जैसे वे अभी, मित्रों की तरह बैठ कर मेरे साथ बहुत देर तक गप्पें मारने लगेंगे...

शीला जी आईं तो उनके साथ-साथ प्रभास जी भी मंच तक पहुँच गए और कुछ ही मिनटों में गाँधी की पुस्तकों का विमोचन हो गया. त्रिवेणी सभागार की वह रिपोर्ट मैंने हिन्दयुग्म में ही 'गाँधी की पुस्तकों पर 'हिंदी अकादमी' द्वारा यादगार कार्यक्रम' शीर्षक से 24 अगस्त को दी थी. शीला जी अपना भाषण कर के व्यस्तता के कारण चली गई और मंच पर प्रभास जी छा गए. उन्होंने गाँधी पर अपने विचार जब प्रकट करने शुरू किये तब मेरी कई दिनों की गुत्थी सुलझी कि प्रभास जी को ही मैं एक दो मुलाकातों में अपना इतना करीबी क्यों समझने लगा हूँ. गाँधी मेरी भी स्तुत्य शख्सियत रहे, और प्रभास जी की बातों से लग रहा है, जैसे गाँधी की विरासत को मन में समेटे रखने वाले मुट्ठी भर भारतवासियों में से एक हैं प्रभास जी, जो समझा रहे हैं कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटते हुए 'हिंद स्वराज' 10 दिन में ही लिख डाली. जब उनका दाहिना हाथ थक गया तब उन्होंने बाएँ हाथ से लिखना शुरू किया. और कि उन्होंने वर्षा दास से कह कर बाएँ हाथ से लिखते हुए गाँधी का एक चित्र भी बनवाया था'...

गाँधी की अहिंसा और सादगी जैसे मूल्यों को आत्मसात करने वाले कितने लोग हैं देश में? पता नहीं. पर एक प्रभास जी तो हैं न, सामने ही, मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानने जो लगा हूँ, और इस समय मैं जिन के भाषण का विडियो-क्लिप मैं अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करता जा रहा हूँ!...

और फिर गाँधी के सन्दर्भ में ही प्रभास जोशी के दर्शन एक बार फिर हो जाते हैं मुझे. कितनी खुशकिस्मत जिंदगी है मेरी. प्रभास जी तो वो आ रहे हैं... वो रहे... दि. 1 अक्रूबर 2009 को 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' में आने का निमंत्रण मुझे स्वयं वर्षा दास जी ने ही कुछ दिन पहले दिया था और यह भी कहा था कि गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' पर उस दिन प्रभास जी बोलेंगे... बस.. मैं कार्यक्रम के निर्धारित समय से पहले ही पहुँच जाता हूँ. कौन-कौन लोग आ गए हैं, यह ध्यान नहीं, पर इतनी देर की प्रतीक्षा के बाद देखो, प्रभास जी वो तो आ रहे हैं...

...प्रभास जी कह रहे हैं कि गाँधी का स्वराज न तो राजनैतिक स्वराज था, न सामाजिक, न ही वह आर्थिक स्वराज था, वह तो अध्यात्मिक स्वराज था...



...मुझे गर्व हो रहा है कि आज मैं फिर उनके भाषण का वीडियो बना रहा हूँ और घर आते ही उनका भाषण लैपटॉप में उतार कर उसे यूट्यूब में डाल देता हूँ, ताकि जो उनके विचार सुनना चाहें वे सुनें. इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी मैं ने हिन्दयुग्म में 'हिंद स्वराज' के 100 वर्ष और विचार-गोष्ठियों पुस्तक-विमोचनों का गर्मागर्म-सिलसिला' शीर्षक से दि. 10 अक्टूबर को दी थी. हिन्दयुग्म पर प्रभास जी के भाषण की विडियो क्लिप देख कर मैं बहुत प्रसन्न था. इसलिए भी कि वह विडियो क्लिप प्रभास जी का था और इसलिए भी कि प्रभास जी का वह विडियो क्लिप मैंने बनाया था.

मैंने कार्यक्रम के लगभग अंत में उठ कर यह पूछा था कि गाँधी जी तो रेल के भी खिलाफ थे, भला रेल के बिना हम सब कैसे रह सकते हैं... तब तो प्रभास जी ने कहा था कि अब काफी समय हो चुका है, हम लोग बाद में चाय पीते पीते-पीते भी बात कर सकते हैं, पर मैं एक बार फिर उनके चेहरे पर वही सौम्य मुस्कराहट देख अभिभूत था, क्यों कि वे मुस्कराते हुए मुझे ही संबोधित कर रहे थे...

...और चाय के दौरान मुझ से भी अधिक बड़े बड़े जिज्ञासु मुझ से बाज़ी मर ले गए और प्रभास जी को घेर लिया. मैं चाय देने वाले 'गाँधी संग्रहालय' के सेवाधारी से अपनी चाय बटोरता ही रह गया कि लोग वहां पहले ही पहुँच गए. पर मैं चाय समेत उस घेरे के बाहर पहुँच हल्की सी धक्का-मुक्की करते प्रभास जी के पास पहुँच जाता हूँ. प्रभास जी सब की जिज्ञासाओं को दूर करते गाँधी के मूल्यों की शाश्वतता बता रहे हैं, बारीकी से समझा रहे हैं, कि गाँधी जी ने जब-जब जो जो बात कही, तब तब उस का तात्पर्य क्या था. यही वह क्षति थी, जो मुझे लगा कि देश को हुई है, प्रभास जी के अचानक चले जाने के बाद. देश अब न्यूयार्क और शांघाई से बराबरी के रास्ते पर है. आधुनिकता अपने चरम पर है. पैसा भगवान हो गया है. आज का आदमी नंगा हो कर अपनी मूल्यहीनता ओर दिवालियेपन का प्रदर्शन कर रहा है. गाँधी के मानवीय मूल्यों को एक पूंजी की तरह सीने में संभाले दूसरों के बीच बांटने वाला आज सुबह चला गया. एक प्रकाश-पुंज अस्त हो गया... क्या इस से अधिक दुखद कोई खबर हो सकती है? नहीं, प्रभास जी जैसी शख्सियत, अन्यत्र मिलनी असंभव है...

...और इतनी बड़ी हस्ती की आत्मीयता से अब वंचित हो जाने की क्षति तो मेरी व्यक्तिगत क्षति है, शुद्ध व्यक्तिगत...

Tuesday, June 09, 2009

थिएटर के पितामह को आखिरी सलाम

कल हिन्दी कवि जगत के व्यंग्य-सूर्य ओम प्रकाश आदित्य के साथ-साथ भारतीय रंगमंच के शीर्षस्थ नाम हबीब तनवीर का सूरज भी बुझ गया। कलाजगत के इतिहास में 8 जून 2009 की तिथि रंगमंच को अनाथ कर जाने के तौर पर भी याद की जायेगी। युवा पत्राकर आलोक सिंह साहिल और चर्चित कला-समीक्षक अजित राय हबीब तनवीर को याद कर रहे हैं॰॰॰॰॰


चित्र साभार- मयंक
जिस जिस को था ये इश्क का अजार
मर गए अकसर हमारे साथ के बीमार...


मशहूर नाटककार, डायरेक्टर, कवि और एक्टर हबीब तनवीर महज एक नाम नहीं वरन ऐसी दरख्त हैं जिनकी छांव से थिएटर की दुनिया में कदम रखने वाला हर शख्स खुद को महफूज महसूस करता रहा है। एक ऐसा अंबर जिसके तले कला के न जाने कितने ही सितारे रोशन हुए। पर आज ये इंदू (नक्षत्र) खुद कहीं विलीन हो गया है। यह कुछ वैसा ही जैसे रात होने पर सूरज नजर नहीं आता....तब जबकि चांद उसकी रोशनी में ही अपनी चमक पर इतराता रहता है। काल की घनेरी छाया ने उन्हें हमसे दूर कर दिया है, लेकिन थिएटर जगत हमेशा उनकी आभा से दैदीप्यमान रहेगा।

तनवीर जन्म और आरंभिक जीवन
आगरा बाजार और चरनदास चोर जैसे कालजयी नाटकों के रचनाकार तनवीर साहब (हबीब अहमद खान) का जन्म एक सितम्बर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हफीज अहमद खान के घर हुआ था, जो मूलत: पाकिस्तान के पेशावर से यहां आए थे।
जाना रंगमंच के शताब्दी पुरुष का
हबीब तनवीर के रंगकर्म में हमें भारतीय परंपरा, लोक और वैश्विक दृष्टि का जो समन्वय दिखाई देता है, वह विकासमान जन संस्कृति का वैकल्पिक मॉडल है। उन्होंने बार-बार कहा है कि रंगमंच का मूल उद्देश्य दर्शकों को आनंद प्रदान करना है। लेकिन उनके किसी नाट्य लेख का गैर-राजनीतिक पाठ संभव नहीं है। उनका अंतिम नाटक ‘राजरक्त’ (रवींद्र नाथ टैगोर) भी धर्म और सत्ता की टकराहटों में विकसित होता है। हबीब तनवीर को जीवन में कई सम्मान और पुरस्कार मिले। उनके नाटक ‘चरणदास चोर’ के लिए उन्हें विश्व के सबसे प्रतिष्ठित नाटक समारोह में ‘फ्रिज फस्र्ट’ अवार्ड एडिनबरा, इंग्लैंड में मिला। 1969 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार भी मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की पहल पर उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनीत किया गया। हबीब तनवीर ने हालांकि दिल्ली में 1948 से ही नाटक करना शुरू कर दिया था, लेकिन 1954 में प्रस्तुत ‘आगरा बाजार’ से उन्हें अभूतपूर्व ख्याति मिली। 1973 में उन्होंने छत्तीसगढ़ी आदिवासी कलाकारों के साथ प्रयोग करना शुरू किया। विजयदान देथा की कहानी पर आधारित ‘चरणदास चोर’ (1975) से उन्हें विश्व भर में ख्याति मिली। इसी साल जनवरी में 86 साल की उम्र में उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘चरणदास चोर’ का निर्देशन-मंचन किया था। इस नाटक में हवलदार के रूप में निभाई गई उनकी भूमिका सदा याद की जाएगी। उन्होंने भारत-पाक विभाजन पर आधारित असगर वजाहत के नाटक ‘जिस लाहौर नइ वेख्यां वो जम्यइ नइ’ का 1990 में श्रीराम सेंटर रंगमंडल के कलाकारों के साथ मंचन किया था। अस्पताल में भर्ती होने से पहले वह इसे दोबारा तैयार करने में लगे हुए थे। इस वर्ष इस नाटक के मंचन के बीस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर पूरे साल दुनिया भर में इस नाटक का उत्सव मनाया जाने वाला है।

रंगमंच से क्रांति नहीं हो सकती जैसा उद्घोष
यह एक संयोग ही था कि जब 1 सितंबर, 2002 को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हबीब तनवीर का 80वां जन्मदिन मनाया जा रहा था, तो ब. व. कारंथ के निधन की खबर ने सबको शोकाकुल कर दिया। कुछ साल पहले अपनी धर्मपत्नी मोनिका मिश्र के निधन पर वह भीतर से टूट गए थे। मिलने पर वह अकसर कहते कि उन्हें अपनी आत्मकथा पूरी करनी है। कुछ वर्ष पूर्व अपने दो नाटकों के कारण वह मध्य प्रदेश में हिंदू कट्टरपंथियों के हमलों का शिकार हुए थे। विचारों से वामपंथी होने के बावजूद वह बार-बार कहते थे कि रंगमंच से क्रांति नहीं हो सकती। रंगमंच को रंगमंच रहने दिया जाए।

जिम्मेदारी विरासत बढ़ाने की
हबीब तनवीर के जाने के बाद भारतीय रंगमंच ने अपना एक ‘आइकन’ खो दिया है। उन्होंने शहरी रंगमंच को छोड़कर ग्रामीण रंगमंच को चुनने का कठिन जोखिम उठाया। उन्होंने स्थानीयता को वैश्विक पहचान दी। उनकी फिदा बाई जैसी कई अभिनेत्रियाँ जीते जी किवदंती बन गर्इं। उनकी इकलौती बेटी नगीन तनवीर के सामने ‘नया थिएटर’ भी चलाने की जिम्मेदारी है। हालांकि नगीन हमेशा इस जिम्मेदारी से बचने की घोषणा करती रही हैं। हबीब साहब अकसर कहते थे कि किसी के जाने से कोई काल नहीं रुक सकता। उन्हें यकीन था कि कोई न कोई उनके काल को आगे बढ़ाएगा। जिस हिंदी रंगमंच को उन्होंने इतना दिया, आज उन पर हिंदी में एक भी ढंग की किताब का न होना दु:खद है। हिंदी समाज कब तक अपने नाटकों के मरने का इंतजार करता रहेगा। अभी हाल तक उनका कोई नाटक प्रकाशित नहीं था। अब जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो हमें चाहिए कि हम उनकी महत्वपूर्ण विरासत को आगे बढ़ाएं। हमें नगीन तनवीर को दिलासा दिलाना चाहिए कि इस घड़ी में हम उनके साथ हैं।
--अजित राय
हाई स्कूल तक की पढ़ाई उन्होंने लौरी मुनिसिपल हाई स्कूल, रायपुर से की। फिर 1944 में नागपुर के मौरिस कॉलेज से बीए की पढ़ाई करने के बाद एमए करने वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए।
युवावस्था से ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया और इस तरह हबीब अहमद खान अब अपने तखल्लुस तनवीर के साथ हबीब तनवीर बन गए।

रेडियो से हुई करियर की शुरूआत
एमए की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे 1945 में बॉम्बे (आज की मुंबई) चले गए जहां वे ऑल इंडिया रेडियो से प्रोड्यूसर के रूप में जुड़ गए। साथ ही हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखना भी शुरू कर दिया। जल्द ही वे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से जुड़ गए। आगे चलकर वे इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन(इप्टा) से जुड़े और उसी के होकर रह गए।

जिस समय वे इप्टा से जुड़े उस समय देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। उस समय मशहूर अभिनेता और थिएटर एक्टर बलराज साहनी साहब इप्टा की कमान संभाले हुए थे। दुर्भाग्यवश ब्रितानिया हुकूमत को रंगमंच के माध्यम से इन रंगकारों की जनक्रांति रास नहीं आई और उन्होंने बलराज साहनी समेत सभी प्रमुख लोगों को सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया था।

ये वह समय था जब हबीब तनवीर ने अभिनय का ककहरा सीखना ही शुरू किया था। लेकिन सभी बड़े लोगों (गुरुओं) के जेल चले जाने से वे बिल्कुल टूट से गए थे।

तन्हा संघर्ष
इतिहास जब बनना होता है तो अकसर कुछ छोटी घटनाएं कारक के रूप में सामने आ जाती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ, तन्हा और कमजोर पड़ चुके तनवीर साहब जब जेल में बलराज साहब से मिलने पहुंचे तो बलराज साहब ने उनके कंधे पर पूरे इप्टा का भार डाल दिया। सच्चाई यह थी कि उन्हें उस वक्त न तो लिखना आता था और न ही सही से अभिनय करना, लेकिन गुरू की आज्ञा का पालन करते हुए तनवीर साहब ने जैसे-तैसे नाटक लिखना शुरू किया। वे पूरे समय कहानी लिखते, लोगों को इकट्ठा करते और उनसे नाटक करवाते। प्रॉम्टिंग से लगाए, गाना, मेकअप करना जैसे सारा काम वह खुद ही करते थे। समय के साथ-साथ उनकी कलम और अभिनय में धार आती गई और वे अभिनय के उस मकाम पर पहुंच गए...जहां उनके बाद कोई दूसरा पहुंचने की सोच भी न सका।

जब खाया थप्पड़
एक और घटना का उल्लेख मौजूं होगा। बात उस समय की है जब अभिनय का यह वटवृक्ष अभी पल्लवित हो रहा था। बलराज साहब एक नाटक का निर्देशन कर रहे थे, उस नाटक के एक दृश्य में तनवीर साहब को रोने की एक्टिंग करनी थी। लेकिन बार-बार कोशिश करने के बावजूद वे रो नहीं पा रहे थे। वास्तव में, उन्हें झिझक हो रही थी। कई बार प्रयास करने पर भी जब स्थिति जस की तस बनी रही तब बलराज साहब मंच पर चढ़े और एक जोरदार तमाचा उन्हें रसीद कर दिया, फिर क्या था तनवीर साहब ऐसे रोए कि खुद उनके गुरू भी अचंभित हो गए। इस तरह उनकी अभिनय यात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती चली गई। वे हमेशा इस बात को मानते रहे कि बलराज साहब का थप्पड़ न खाते जाने कहां खाक छान रहे होते।

दिल्ली का रुख
इसी दौरान देश आजाद हो गया। आजादी के बाद सात सालों तक वे वहीं (बॉम्बे) अपने कला को मांझते रहे। इसके बाद 1954 में उन्होंने दिल्ली का रुख किया। यहां उन्होंने कद्सिया जैदी के हिंदुस्तानी थिएटर और चिल्ड्रेंस थिएटर के साथ अनेकों नाटकों में काम किया। इसी बीच उनकी जिंदगी में मोहतरमा मोनिका मिश्रा का आगमन हुआ जो बाद में उनकी पत्नी बनीं।

इसी साल यानी 1954 में उन्होंने अपना कालजयी नाटक आगरा बाजार तैयार किया। इसकी खास बात यह थी कि इसमें उन्होंने किसी ट्रेंड एक्टर को नहीं लिया था बल्कि लोकल नॉन ट्रेंड लोगों को लिया था। इस सफल अनुभव ने उन्हें इस कदर उत्साहित किया कि फिर वे छत्तीसगढ़ में ऐसे ही नॉन ट्रेंड लोगों के साथ मिलकर उन्हें संवारने में जुट गए।

हबीब तनवीर के नाटक

आगरा बाजार (1954)
शतरंज के मोगरे (1954)
लाला शोहरत राय (1954)
मिट्टी की गाड़ी (1958)
गांव के नांव ससुराल,
मोर नांव दामाद (1973)
चरनदास चोर (1975)
उत्तर रामचरित्र (1977)
बहादुर कलरीन (1978)
पोंगा पंडित
जिस लाहौर नई देख्या (1990)
कामदेव का अपना बसंत रितु का सपना (1993)
जहरीली हवा (2002)
राज रक्त (2006)
बर्लिन के आठ महीने
उनकी जिंदगी में एक घटना और घटी जिसने उनको थिएटर को रूट लेवल तक ले जाने में मदद किया। वह था उनका 1955 में इंग्लैंड जाना, जहां उन्होंने दो सालों तक अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान उन्हें बर्लिन में तकरीबन 8 महीने रहने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने वहां बहुत सारे नाटक देखे। सौभाग्यवश उन्हें यूरोप के प्रख्यात नाटककार बर्टोल्ट ब्रेच्ट के नाटको को भी देखने का मौका मिला। इसमें उन्होंने पाया कि वे लोकल मुहावरों और लोकोक्तियों का जमकर प्रयोग करते थे। इससे वे बहुत प्रभावित हुए। बाद में भारत लौटकर उन्होंने इसी चीज को अपने नाटकों में अपनाया। इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें रूट लेवल तक अपनी पकड़ बनाने में मदद की।
नया थिएटर का जन्म 1958 में जब वे लौटकर भारत आए तो छत्तीसगढ़ी भाषा में अपना पहला महत्वपूर्ण नाटक मिट्टी की गाड़ी बनाई। इसकी सफलता ने आगे चलकर नया थिएटर के शुरुआत का मार्ग प्रशस्त किया। और 1959 में उन्होंने अपनी पत्नी मोनिका मिश्रा के साथ भोपाल में नया थिएटर की स्थापना की।

उनका रंगकर्म पूरे उफान पर था कि 1972 में में एक और बड़ी क्रांतिकारी घटना घटी। छत्तीसगढ़ की लोककथा पर उन्होंने गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद, का निर्माण किया, जिसने धमाल मचा दिया। इसने उनके नाट्य जीवन को एक अलग मुकाम और बुलंदी बख्शी।

चरनदास चोर ने गढ़ी थिएटर की नई परिभाषा
वक्त के साथ तनवीर साहब की सीमाएं बढ़ती जा रही थीं। उनकी ख्याति सरहद पार बहुत दूर तक पहुंचने लगी थी। जब भी थिएटर की बात आती तनवीर साहब को याद किया जाता। 1975 में वह समय आया जब उन्होंने मॉडर्न थिएटर की नई परिभाषा गढ़ते हुए चरनदास चोर रचा। इसकी सफलता का आलम यह रहा कि मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस नाटक को इसी नाम से स्मिता पाटिल जैसी अभिनेत्री के साथ बड़े पर्दे पर पेश किया।

थिएटर की दुनिया से इतर उन्होंने 9 फीचर फिल्मों में भी काम किया, जिसमें रिचर्ड एटनबर्ग की गांधी भी शामिल है।
हर सफल इंसान के साथ कुछ स्याह पहलू भी उनकी जिंदगी में वह दौर भी आया जब उनका नाटक पोंगा पंडित कट्टरपथियों के निशाने पर आया। अपनी दो किताबों को लेकर उनपर जानलेवा हमले भी हुए।
2005 में उनकी जिंदगी और नया थिएटर परे एक डाक्यूमेंटरी फिल्म गांव के नांव थिएटर, मोर नांव हबीब (मेरा गांव थिएटर है, मेरा नाम हबीब है) भी बनी।

आखिर के तन्हा दिन
अपनी पत्नी मोनिका से बेइंतहां मोहब्बत करने वाले हबीब तनवीर 2005 में उनकी मौत के बाद बिल्कुल तन्हा हो चले थे और टूट गए थे। उसके बाद भी अगर वह जिंदा थे तो इसकी वजह शायद उनकी रगों में दौड़ता रंगकर्म था, जो उन्हें तयशुदा मिशन को पूरा किए बगैर जाने की इजाजत नहीं देता।

उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

--आलोक सिंह साहिल

हिंदी मंचों के कविसूर्य थे ओम प्रकाश आदित्य

कल हिन्दी कविता की मंचीय परम्परा को समृद्ध करने वाले वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि ओमप्रकाश आदित्य की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। हिन्दी काव्य जगत इस कवि के चले जाने के बाद शोकाकुल है। हिन्द-युग्म के कवि अरुण मित्तल अद्‍भुत कवि आदित्य के प्रति अपनी यह श्रद्धाँजलि अर्पित की है-


हिंदी मंचो के कविसूर्य श्रद्धेय श्री ओम प्रकाश 'आदित्य'


हिंदी काव्य मंचो पर यदि तीन शब्दों को जोड़ा जाए - कविता, हास्य और छंद, तो मात्र एक ही नाम जहन में आएगा और वो होगा श्री ओम प्रकाश 'आदित्य', सुकोमल चेहरा, अल्हड भाषा, उच्चारण में मिठास, शब्दों में सम्मोहन की शक्ति, क्या नहीं था उस महान साहित्य मनीषी के पास, आज गजल और गीत में संस्कार है, जीवन दर्शन है, छंद है परन्तु वो इस पीढी के एकमात्र ऐसे रचनाकार दिखे जिन्होंने इन सभी जरूरी भावों को हास्य की सहजता के साथ प्रस्तुत किया. सचमुच आदित्य दादा ने मंचो पर हास्य का एक ऐसा युग जिया, और एक ऐसा स्तर स्थापित किया जिसे आने वाले युग में किसी कवि द्बारा छू पाना सरल नहीं होगा. उनका कोई सानी नहीं था. मंच पर आते ही मधुर सी भूमिका, सरल और अल्हड शब्दों में कवियों का अभिवादन, छोटे बड़े सभी कवियों को प्यार और सम्मान उनका नियम था.

सादगी आदित्य दा की पोशाक थी. उन्होंने काव्य पाठ के लिए कभी चुटकुलों का सहारा नहीं लिया, कभी किसी पर फब्तियां नहीं कसी, कभी किसी का भूल से भी मजाक नहीं बनाया, मंचों के स्तरहीन टोटकों से हमेशा परे रहकर अपनी बात कहने का अद्भुत हुनर हर किसी को उनका दीवाना बना देता था.
आदित्य जी घनाक्षरी छंदों से काव्यपाठ की शुरुआत करते थे दो चार छंद और एक दो प्रतिनिधि कवितायेँ और बीच बीच में उनके संस्मरण जो वास्तव में प्रेरणा दायक होते थे, मैं हरदम कहता हूँ की "हास्य में कविता" और वो भी 'छंद' के साथ, मुझे बहुत ज्यादा नाम नहीं सूझते 'गोपाल प्रसाद व्यास, काका हाथरसी और फिर घूम फिरकर आदित्य दा. उनके छंद पढने का अंदाज़ निराला था. हर शब्द को चबा चबा कर बोलना और साहित्यिक शैली में हास्य की बात घनाक्षरी छंदों में लिखना एक छोटा सा उदहारण है


"अबके चुनाव की लहर ने कहर ढाया, नदियों के साथ कैसे कैसे नाले बह गए
उल्लुओं को अम्बुआ की डाल पर देख कर, हौसले बसंत के अनंत तक ढह गए
भारत में कभी गंगू तेलियों का राज होगा, जाते जाते राजा भोज मंत्रियों से कह गए
चाँद से चरित्र वाले नेता सब चले गए, नेताओं के नाम पर ये कलंक रह गए


उनकी उपमाएं और उपमान अद्वितीय थे. उन्होंने हर प्रकार का हास्य लिखा, छोटी बहर के छन्दों में भी, घनाक्षरी तो उनका प्रिय छंद रहा ही, आल्हा छंद में पूरी राजनीति का चरित्र बांधकर जब वो सुनाते थे तो श्रोता झूम उठते थे, एक उदहारण है

सुमरण कर के मंत्रिपद का, भ्रष्टाचार का ध्यान लगाय
करुँ वंदना उस कुर्सी की, जिस पे सबका मन ललचाय
बिन बिजली के कैसा बादल, बिन पूँजी क्या साहूकार

बिन बन्दूक करे क्या गोली, बिना मूठ कैसी तलवार

बिना डंक बिच्छु क्या मारे, फन बिन सांप डसे क्या जाय,
रूप बिना वेश्या क्या पावै, घूस बिना अफसर क्या खाय

बिन जल के मछली ना जीवे, बिन जंगल न जिए सियार
बिन कुर्सी मंत्री न जीवे, जो जीवे उसको धिक्कार


इसी आल्हा में हर्षद मेहता काण्ड के कारण हुए विवाद पर लिखा-

"कुर्सी छोडो, कुर्सी छोडो गूँज उठा संसद में नाद,
दिल्ली में नरसिम्हा रोये, आँसू गिरे हैदराबाद


उन्होंने हास्य के हर पहलू को जिया, एक छंद की अंतिम पंक्ति है :

पिछले चुनावों से वो मेरा गधा लापता है,
ढूँढने आया हूँ उसे संसद भवन में


एक और कविता में उन्होंने बहुत अच्छा हास्य और व्यंग पिरोया है, जो पिछले दिनों काफी चर्चित रही :

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं
......
घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्वयनप्राश देखो


आदित्य जी के साहित्य के बारे में जितना लिखो कम है उन्होंने एक ऐसा प्रयोग भी किया जो सचमुच उनके साहित्य के प्रति समर्पण और अपने साथी और अग्रज कवियों के प्रति सम्मान को दिखता है. इतना ही नहीं उस प्रयोग से उनकी साहित्यिक प्रतिभा के विस्तार का भी सहज ही अनुमान हो जाता है. उन्होंने एक ऐसी कविता लिखी कि एक विशेष स्थिति पर यदि १०-१२ हिंदी के प्रसिद्द कवियों को लिखने के लिए कहा जाता तो वो कैसा लिखते. स्थिति थी की एक लड़की अपने घर वालों से लड़कर छत पर बैठी है और कूदकर मरना चाहती है, हालांकि इस कविता में काफी कवियों की शैली में उन्होंने लिखा है परन्तु मैं दो उदाहरण जो सचमुच विचित्र ही नहीं बल्कि विधा में भी विपरीत से ही लगते हैं प्रस्तुत कर रहा हूँ

सुमित्रा नंदन पन्त जी की शैली में :


स्वर्ण शोध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुन्दर प्रतिपल
उन्मन उन्मन अपलक नीरव
शशि मुख पर कोमल कुंतल पट
कसमस कसमस चिर यौवन घट
पल पल प्रतिपल, छल छल करती निर्मल दृगजल
ज्यों निर्झर के दो नील कवँल
ये रूप चपल ज्यों धुप धवल
अति मौन कौन, रूपसी बोलो
प्रिय बोलो न


काका हाथरसी जी की शैली में

गौरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है, भली करै करतार
भली करै करतां, न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार के नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना
उधर कूदना, मेरे ऊपर मत गिर पड़ना



और न जाने कितनी ही कवितायेँ मेरे मन में रम, रच बस गयी हैं, विद्यार्थी की प्रार्थना, दुल्हे की घोडी, संपादक पर कविता, बूढा, आधुनिक शादी, नोट की आरती आदि आदि ..... आदित्य जी ने देश के स्वाभिमान की बात जहाँ भी आई वहाँ वहाँ खुलकर बोला, अंग्रेजी के प्रसिद्द लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह द्बारा हिंदी भाषा पर की गयी अपमानजनक टिप्पणी पर उन्होंने "ओ खुशवन्ता" नाम से कविता लिखी जिसे मंचो पर काफी स्नेह मिला...

कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ थी


ओ खुशवन्ता
भारत में चरता विचरंता
अंग्रेजी की बात करंता
हिंदी दिए दरिद्र दिखंता
क्यों लन्दन जा नहीं बसंता


केवल हास्य ही नहीं जहाँ कही भी उन्हें लगा की रस परिवर्तन की जरूरत है, उन्होंने वो भी किया उनकी कविता "सैनिक की पत्नी का पत्र" इस बात का प्रमाण है जिसमे एक छंद में उन्होंने लिखा:

"आप सीमा पर गए चिंता इसकी नहीं है
दुःख यही है की प्राण मैं भी कुछ धारती
मुझे एक बन्दूक थमा के चले जाते
चुन चुन कर यहाँ देश द्रोहियों को मारती
आप क्रुद्ध होके वहां सीमा पर युद्ध करें
पूजा पाठ में समय मैं यहाँ गुजारती
मात्रि भूमि मंदिर में वन्दे मातरम गाके
विजयी तिरंगे की उतारती हूँ आरती


मैंने उनको बचपन से सुना है, पढ़ा है और मनन भी किया है, मेरे पापा श्री महावीर प्रसाद मित्तल न केवल कविताओं के शौकीन रहे बल्कि उन्होंने मुझे आदित्य जी की कई कवितायेँ सुनाई भी और याद भी करवा दी, आदित्य जी की पहली कविता जो मुझे याद हुई वो चुनावी परिप्रेक्ष्य में थी जिसमे प्रधानमंत्री की कुर्सी की पीडा का वर्णन था.

देखो पी एम् की कुर्सी बिचारी बताओ मैं किसको वरूं
न मैं ब्याही रही न कुवांरी बताओ मैं किसको वरूं


और अनेक कवितायेँ और अनेक रूप हैं आदित्य जी के साहित्य सृजन के, जीवन की सरलता के सम्बन्ध में उनका एक सार्थक छंद, भाई चिराग जैन जी के ब्लॉग से उठाकर परोस रहा हूँ,

दाल-रोटी दी तो दाल-रोटी खा के सो गया मैं
आँसू दिये तूने आँसू पिए जा रहा हूँ मैं
दुख दिए तूने मैंने कभी न शिक़ायत की
जब सुख दिए सुख लिए जा रहा हूँ मैं
पतित हूँ मैं तो तू भी तो पतित पावन है
जो तू करा ता है वही किए जा रहा हूँ मैं
मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाउंगा
तूने कहा जिए जा तो जिए जा रहा हूँ मैं


सचमुच "दुल्हे की घोडी", एक विशुध्ध हास्य कविता में "जीवन दर्शन" की इतनी सार गर्भित पंक्तियाँ सुनकर उन्हें नमन करने पर विवश हो गया: (घोडी भाग रही है और दूल्हा पीठ से चिपका हुआ है, घोडी के भागने की गति पर)

घोडी चलचित्र सी
युग के चरित्र सी
कुल के कुपात्र सी
आवारा छात्र से
पथ भ्रष्ट योगी सी
कामातुर भोगी सी
उच्छल तरंग सी
अतुकांत कविता सी
और छंद भंग सी

दौडी चली जा रही थी ...........


१५ नवम्बर, २००७ को दस्तक नयी पीढी नाम से एक काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसमे १५ युवा कवियों ने काव्य पाठ किया, जिनमे एक मैं भी था, सञ्चालन भाई चिराग जैन ने किया, आदित्य दादा, अल्हड बीकानेरी जी और डॉ कुंवर बेचैन जी उसमे विशेष रूप से युवा कवियों में संभावनाएं तलाशने के लिए उपस्थित थे, पूरे कवि सम्मलेन में न केवल उन्होंने हर कवि को मन से सुना बल्कि अंत में आदित्य जी ने सबकी प्रतिभा की सराहना भी की और लगभग हर कवि से सम्बंधित बात करते हुए आशीर्वचन भी कहे.... ये प्रमाण था उनके साहित्य के प्रति समर्पण का, वो चाहते थे की मंच पर अच्छे स्तर की कविता हो और उसी की तलाश में उन्होंने हर नौसीखिए कवि के एक एक शब्द को सुना.

यह तय है की आदित्य जी की रचना धर्मिता को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता, वो एक ऐसा व्यक्तित्व था जो हमेशा हमेशा के लिए अपनी कविताओं से हमारे दिल में बस गया. उनका कवि परवार से अकस्मात चले जाना एक अपूर्णीय क्षति है, आदित्य जी आज भी कहीं आँखों में तस्वीर बनकर बसे हैं सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम दिल्ली में, काव्य पाठ करते कवि ओमप्रकाश आदित्य, हिंदी भवन में "दस्तक नयी पीढी की' कार्यक्रम में श्री जगदीश मित्तल जी के जन्मदिवस पर युवा कवियों को आर्शीवाद देते पितामह कवि आदित्य जी. हर समय उतने ही सरल, सौम्य, और सचमुच के बड़े कवि. कौन कहता है की वो चले गए ......... साहित्यकार कभी नहीं मरते, अमर होते हैं .... आदित्य दादा आज भी हम सब के दिलों में हैं, हर मंच पर आज भी उनकी अमिट छाप है, हमारी जुबान पर आज भी उनकी कवितायेँ हैं, वो हम सब में बसे हैं ........ समस्त हिंदी साहित्य उनके ईमानदार साहित्य सृजन का ऋणि रहेगा

Saturday, January 17, 2009

हमारे सपने तुम्हारे क्यों नहीं हो सके?? (1)

डॉ अजित गुप्ता की यादों का सफ़र फिर प्रस्तुत है....धनवान होते अमेरिका में ग़रीब होती संवेदना और बिछोह का दुख झेलते दूर देश के मां-बाप इनके लेख में कई-कई बार हैं.. पिछली बार आपने इस लंबी कड़ी का पहला भाग पढा...अब पढिए इसी कड़ी में आगे....


सोने का पिंजर
अध्याय 1


तू मेरे ख्वाबों में भी कभी नहीं आया, मेरे मन में तेरे लिए कभी किसी चाहत ने जन्म भी नहीं लिया। बस तेरा एक अस्तित्व है, इतना भर ही तो जानती रही हूँ मैं। लेकिन मुझे नहीं पता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे जीवन का अंग बन जाएगा। तेरी विशालता के आगे मेरा व्यक्तित्व एकदम बौना बन जाएगा। बेटा जब बड़ा होने लगता है तो माँ के मन में एक धुकधुकी सी होने लगती है। कभी उसका घर बसाने के सपने आते हैं तो कभी उसके भविष्य के। एक कोना आशंका से ग्रस्त भी रहता है। एक अनजान भय मुंडेर पर चिड़िया के बोलने के साथ ही चला आता है। परायेपन का डर नींदे भी उड़ा देता है। लेकिन डर इस रूप में आएगा यह तो चिंतन में ही नहीं था। सभी कुछ तो ठीक चल रहा था। एक ठहरी हुई जिन्दगी की तरह साफ-सुथरा।
लेकिन तुम्हारे नाम का कंकड़ जब कलकल बहती नदी में फेंका गया तब भी मन में उद्वेग नहीं आया था। एक प्रसन्नता का भाव ही मन में था। एक ऐसा स्थान जहाँ सुरक्षा है, भविष्य की सम्भावनाएँ हैं, तब तुम्हारा नाम अच्छा ही लगा था। सपने ताजिन्दगी देखे नहीं तो तब भी नहीं देखे। अच्छा या बुरा कुछ भी तो नहीं सोच पाया था मन। बस एक विश्वास था, एक अटूट प्यार था। पल-पल, क्षण-क्षण अपने मन के कण-कण से निर्माण किया था अपनी ही एक प्रतिकृति को। प्यार सागर सा दिखाई पड़ता था, जिसका न कोई ओर था और न कोई छोर। लेकिन तभी तुम आ गए थे, हमारे मध्य। उस विशाल सागर में पहली बार लगा कि यहाँ नमक भी है जिस कारण यहाँ का पानी आँसुओं की तरह खारा भी है। अब कई समुद्र उग आए थे मेरे और मेरी प्रतिकृति के मध्य। मन उसे छूने का करता लेकिन यही समुद्र दूरी बनकर बीच में खड़ा हो जाता। लेकिन सुरक्षा बोध उस पार से निकल-निकलकर आता रहा। चिन्ता का सैलाब आता और चले जाता। हर शब्द में बसी थी केवल सुरक्षा। अपने आस-पास खून की होली दिखाई देती। अनाचार, अत्याचार सामने ही तो खड़े थे। भविष्य की चिन्ता रातों को सोने नहीं देती थी। अब मन आश्वस्त हो चला था। छू नहीं सकती तो क्या, सुरक्षा तो है। लेकिन सुरक्षा का भाव भी कितने दिन टिक पाया? जो कभी स्थाई लगता था वह चन्द दिनों में ही कपूर की तरह उड़ गया। अभी एक माह भी तो नहीं हुआ था, मन तड़पता और सुरक्षा का आश्वासन, मरहम लगा देता। हमारा क्या है, बच्चों का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए।
वो कैसी तो शाम थी? लेकिन तुम्हारे यहाँ तो सुबह थी।
शाम का भी क्या फितूर होता है? अपने साथ एक घुटन लेकर आती है। एकान्त के पल धुएँ से घिरे दिखाई देते हैं। कभी यह धुआँ आँखों में समा जाता है, जलन के साथ पानी बनकर बहने लगता है। कभी इस धुएँ में भविष्य धुँधला हो जाता है। भला हो टी.वी. का, एकान्त में भी साथी बना डटा रहता है। रिमोट पकड़ो और आपका साथी बोलने लगता है, आपको गुदगुदाने लगता है। लेकिन वह शाम गुदगुदाने नहीं आयी थी, एक मिथक को तोड़ने आयी थी। एक डर का विस्तार करने आयी थी। सुरक्षा-चक्र के घेरे को तोड़ने आयी थी। तुम्हारे तन पर भी खून की होली खेलने आयी थी। मेरी वो शाम, रात बन गयी थी, तुम्हारी वो सुबह कभी न खत्म होने वाले डर में बदल गयी थी।
मेरे देखते ही देखते एक हवाई-जहाज जा टकराया था विशाल 110 मंजिला इमारत से। ताश के महल की तरह ढह गयी थी वो इमारत, जिसमें करोड़ों टन लोहा लगा था, करोड़ों टन सीमेंट लगा था। कितने पल लगे उसे भरभराकर ढहने में? वह 11 सितम्बर 2001 तुम्हारे लिए प्रारम्भ था एक डर का, हमारे लिए अन्त था सुरक्षा-बोध का। सारा जीवन ही बदल गया। आसान रास्ते, कंटकों से भर गए। दूरियाँ अब अन्तहीन हो चली। लेकिन समय कब रुकता है? समय तो चलता ही रहता है। घाव बनते हैं, समय भर भी देता है। लेकिन चिह्न तो वहीं रह जाते हैं। डर का चिह्न भी सदा के लिए रह गया।
दिन सरकते रहे, एक दिन इच्छा जागृत हुई, खून ने खून को पुकार लिया। तब न तो सात समुन्दर पार जाने में भय दिखाई दिया और न ही कोई व्यवधान मन में आया। सभी कुछ सरल लग रहा था। लेकिन 26 अप्रेल 2002 हमारे लिए बहुत बड़ा सबक लेकर आया। तुम तक पहुँचना इतना आसान नहीं है। तुम्हारी धरती पर पाँव रखने के लिए न तो करोड़ों की जायदाद थी, न ही तुम्हारे काम आने वाली शिक्षा। एक साधारण सी बात ने समाप्त कर दिया बरसों के सिंचित स्वाभिमान को। वीजा के रूप में तुमने नकार दिया हमारे व्यक्तित्व को। मेरी धरती पर तुम्हारा उपयोग नहीं है, अतः तुम्हें वीजा नहीं मिल सकता। ऐसे साधारण लोग मेरी धरती को भी साधारण नहीं बना दें, शायद यही डर तुम्हारे मन में रहा हो। तुम एक विशेष देश हो, दुनिया के सारे ही देशों में अग्रणी। अब तो तुम्हारी ही चौधराहट पूरी दुनिया में चलती है। लेकिन तुमने एक मिनट भी नहीं सोचा कि पुत्र तुम्हारे पास, तुम्हारे वैभव से चकाचौंध और माँ सात समन्दर पार! तुमने न टूटने वाले ताले लगा दिए? कैसी मानवता है तुम्हारी? तुम तो सारी दुनिया को श्रेष्ठता का संदेश देते हो, मानवता की बात करते हो, फिर होनहार पुत्रों के माँ-बापों को तरसाते क्यों हों? क्यों नहीं पूछते उनसे कि तुम्हारे माँ-बाप का भविष्य क्या होगा? लेकिन मैं भी तुमसे कैसे प्रश्न पूछने लगी? तुमने कब परिवार को महत्त्व दिया है? तुम तो एक व्यापारी हो। जो भी दुनिया का श्रेष्ठ हो उसे तुम ले लेते हो। बाकि भावनाओं से तुम्हें क्या मतलब? भारत का व्यक्ति हजारों में कमाता है लेकिन जैसा तुम्हारा आकार बड़ा है वैसे ही तुम्हारे डॉलर का आकार भी बहुत बड़ा है। भला भारत के माँ-बापों के पास इतना धन कहाँ जो तुम्हारे डॉलर का मुकाबला कर सकें? हाँ हमारा दिल जरूर बहुत बड़ा है। हम संतानों को अपनी छाती से लगाकर रखते हैं। हमारे सुख-दुख साँझी होते हैं। तुम बात-बात में उपहार देते हो, हम पल-पल अपना कर्तव्य पूरा करते हैं। हमारी संताने बैंक-लोन पर आश्रित नहीं रहती, वे हम पर ही आश्रित रहती हैं।
तुम्हारा वीजा-ऑफिस, स्वर्ग में जाने वाले चित्रगुप्त के दरबार जैसा ही है। सारे ही जीवन का लेखा-जोखा देखा जाता है। जरा सी चूक हुई कि दरवाजे बन्द। बेचारे लोग लम्बी-लम्बी कतारों में घण्टों खड़े रहते हैं। उनके हाथ में लदे होते हैं बही-खाते। जिसे स्वीकृति मिल जाती है, उसके घर में दीवाली मनती है और जिसे नहीं, वह अमावस में रहने को ही मजबूर होता है।
तुम अकस्मात् ही मेरे जीवन में आ गए। मेरे बरसों के सिंचित स्वाभिमान पर तुमने एकदम से प्रहार कर दिया। मैं, मेरा समाज और मेरा देश, तुमने गौण कर दिया, हमारी संतानों के समक्ष। मैं तो समझती थी कि शिक्षा का अर्थ स्वाभिमान जागृत करना होता है, लेकिन तुम्हारे यहाँ कि शिक्षा ने तो सम्पूर्ण भारत के स्वाभिमान को ही पददलित कर दिया। हमारे यहाँ जब गाँव का नौजवान पहली बार महानगरों में जाता है तब वह एकदम से बौरा जाता है। वह स्वयं को गँवार समझ बैठता है और महानगर में बसने के ख्वाब पाल बैठता है। कभी कच्ची बस्ती में, कभी चाल में, कभी सोसायटी में। वह सारे दुख उठाकर भी गर्व से तना रहता है कि मैं महानगर में रह रहा हूँ। छूट जाते हैं पीछे कहीं, शुद्ध हवा, प्रकृति के साथ जीने का तरीका, घर, चौबारे। तुम्हारे यहाँ भी ऐसा ही है, एक बार तुम्हारी धरती पर पैर रखा नहीं कि तुम्हारे सौंदर्य की चकाचौंध से हमारे पुत्रों की आँखें चुँधिया जाती हैं। साफ-सुथरा शहर, चौड़ी-चौड़ी सड़के, चारों तरफ रोशनी से नहाया शहर। रात को मद्धिम रोशनी, एक खुमारी सा जगा देती है। इसी खुमारी में वह विस्मृत कर देता है अपना अतीत। भूल जाता है उस माँ को जो उसके लिए सिगड़ी जलाए बैठी होती है, गर्म रोटी खिलाने को। भूल जाता है उस बाप को जिसके मजबूत कंधों पर खेलते हुए उसका बचपन बीता था, भूल जाता है उस बहन हो, जिसकी चोटी खींचते हुए वह बड़ा हुआ था। बस वर्तमान की सुंदरता में खो जाता है उसका तन और मन।
मुझे एक वाकया स्मरण में आता है। मैं एक बार एक कार्यक्रम के निमित्त सुदूर पहाड़ों और जंगलों के मध्य बसे एक छोटे से गाँव में गयी थी। शहर का व्यक्ति भला क्यूँ गाँव में जाता है? वह सोचता है कि मैं विकसित हूँ और ये लोग अभी अविकसित हैं, अतः उन्हें विकसित करने का भ्रम लेकर हम भी वहाँ गए थे। गर्मी अपने पूर्ण यौवन पर थी, शायद 45 डिग्री सेल्शीयस तापमान रहा होगा। हमारे यहाँ गर्मी में इतना ही तापक्रम रहता है। साथ में लाया थर्मस का पानी भी गर्म हो गया था। पास में ही चरस चल रहा था। कुएं से बैल की शक्ति के द्वारा पानी निकाला जाता है। बैल घूमता रहता है और छोटी-छोटी बाल्टियों में पानी भर-भरकर निकलता रहता है। वह जल इतना निर्मल और शीतल था कि हमारा अन्दर तक तृप्त हो गया। वहाँ छोटी-छोटी मगरियों पर झोपड़े बने थे। कुछ दूरी पर ही नदी बह रही थी। नदी के सहारे-सहारे सड़क चले जा रही थी और सड़क का अवलम्ब बने थे पहाड़। पहाड़ों पर कहीं गूलर था तो कहीं नीम। कहीं पलाश था तो कहीं महुवा। छोटे-छोटे खेतों में कहीं तुअर खड़ी थी तो कहीं अदरक और कहीं हल्दी के ढेर लगे थे। शाम को सारा क्षेत्र चिड़ियाओं के चहकने से गुंजायमान हो गया। बच्चे उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगे।
आम भी पेड़ों पर लदा था, हमें पेड़ों को निहारते देख, एक बच्चा झट से पेड़ पर चढ़ गया और कच्ची अमिया तोड़ लाया। घर से चुटकी भर नमक ले आया, हम कुएं की मेढ़ पर बैठकर चटखारे लेकर अमिया खाने लगे। जैसे ही सूरज ने पश्चिम की ओर प्रस्थान किया आकाश पर चाँद और तारे निकल आए। पूरा ही आकाश भर गया, ऐसा लगा कि यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं छोड़ी है तारों ने। झोपड़ियों के बाहर ढोल और मांदल की आवाजें आने लगी हैं। सारे ही पुरुष और महिलाएं एक साथ झूम रहे हैं, नाच रहे हैं। कोई अभाव नहीं, कोई शिकायत नहीं।
मन में प्रश्न उठने लगा कि हम शहरवाले इन्हें क्या देने आए हैं? या इनसे छीनने आए हैं इनका चैन-सुकून? यहाँ के नौजवान को क्षणिक भर का तो सुख देते हैं ये महानगर, लेकिन एक कालावधि के बाद टूटने लगता है इनका भ्रम। उन्हें याद आने लगता है वही अपना छोटा सा गाँव जो उससे कभी का पीछे छूट गया है। अब उसके पास होली पर टेसू के फूलों का रंग नहीं है, अब उसके पास तारों भरी रात नहीं है, अब उसके पास अमिया से लदा पेड़ नहीं है। बस अब उसके पास है अकेलापन, बस अकेलापन। ऐसा ही तो तुम भी करते हो। तुम्हारे यहाँ की सुन्दरता से बौराए हमारे पुत्र जब भारत को याद करते हैं तब बहुत देर हो जाती है वापस लौटने को।
मेरे देश की लाखों बूढ़ी आँखों को तुमसे शिकायत नहीं है, बस वे तो अपने भाग्य को ही दोष देते हैं। वे यह नहीं जान पाते कि गरीब को धनवान ने सपने दिखाएँ हैं, और उन सपनों में खो गये हैं उनके लाड़ले पुत्र। मैं समझ नहीं पाती थी कि तुम क्यों नहीं आने देते हो, बूढ़े माँ-बापों को तुम्हारे देश में? लेकिन तुम्हारी धरती पर पैर रखने के बाद जाना कि तुम सही थे। क्या करेंगे वे वहाँ जाकर? एक ऐसे पिंजरे में कैद हो जाएँगे जिसके दरवाजे खोलने के बाद भी उनके लिए उड़ने को आकाश नहीं हैं। अपने देश में, अकेले घर में कम से कम अपनी सी साँस तो ले सकेंगे। कोई तो भूले-भटके उनका हाल पूछने चला ही आएगा। लेकिन तुम्हारे यहाँ आकर तो कैसे कटेंगे उनके दिन? तुम ठीक करते हो, उन्हें अपनी धरती पर नहीं आने देने में ही समझदारी है। कम से कम वे यहाँ जी तो रहे हैं, वहाँ तो जीते जी मर ही जाएँगे।

क्रमशः