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Wednesday, August 26, 2009

पत्रकारिता में गांव या गांव की पत्रकारिता...

पत्रकारिता में गांव, विषय का संदर्भ मन में एक उत्सुकता जगाने के लिये काफी है। किसी के सीने में लगी, आग तो लगी। दिल्ली जैसे शहरों में गांव का विचार नुमाइशी है। किसी महँगे से इलाक़े में मिट्टी से लिपी दीवारों और बांस की सजावट के साथ खाने-पीने की जगहों पर गांव की ख़ुश्बू सूंघते हुए लोग आते हैं और एक मोटे बिल की अदायगी के साथ चले जाते हैं, बस। अक्सर ऐसा भी होता है कि गांव की दूसरी जानकारियां, एक रुपये की बहस में दस पैसे के बराबर आ जाती हैं। शहर और इससे भी दो क़दम आगे मेट्रो-पोलिटिन शहर गांव को किस नज़र से देखते हैं इस पर घंटों बातें की जा सकती हैं, लेकिन क्यों?

मेरी समझ में नहीं आता कि शहर क्यों गांव पर बातें करते हैं? या फिर ये कि सूर्योदय और सूर्यास्त के साथ सोने जागने वाले गांव आख़िर क्यों शहर की और ताकते हैं, जहां रात और दिन का फ़र्क़ ही नहीं रह गया है? दोनों की ज़रूरतें अलग हैं। तौर तरीक़े जुदा हैं। उठना बैठना भिन्न है। “पत्रकारिता में गांव”, किस पत्रकारिता में गांव? शहरी पत्रकारिता क्यों गांव पर बात करके अपना वक़्त ख़राब करती है? उससे कहो शहर पर ही ठीक से कुछ लिख ले, वही बहुत है।

असल में गांव का विकास शहर की सोच से बाहर की बात है। वो नहीं बता सकता कि गांव की बेहतरी के लिए क्या किया जाए? गांव का विकास शहर की तर्ज़ पर न हो सकता है न किया जा सकता है। देश का हर भू-भाग शहर में तो तब्दील नहीं हो सकता। न जाने कब और कैसे शहर को ये ग़लतफ़हमी हो गई कि गांव की बेहतरी के लिए सोचने और कुछ करने का दायित्व उसका है। हो सकता है ये तब हुआ हो जब प्रशासन से बात करने के लिए गांव, शहर के चक्कर लगाने पर मजबूर हुए हों। देश की संसद अगर गांव में होती तो शायद उसे शहर का ये एहसान लेने की भी ज़रूरत न पड़ती। लेकिन वो क्या करें कि उनके नेता चुनाव में जीतते ही शहर भाग जाते हैं। हरिया की जमीन जमींदार ने दाब ली थी और कितने साल उसे अपने नेता के इन आश्वासनों पर ज़िंदा रहना पड़ा था कि “दिल्ली से बात की है, तुम्हारा काम हो जायेगा”, “दिल्ली के कामों में वक़्त तो लगता ही है हरिया..., तुम्हारी तरह बेकार तो बैठी नहीं है दिल्ली” या फिर ये कि “अभी दिल्ली अमरीका गई हुई है, जब लौटेगी तो देखेंगे”।
गांव का विकास ख़ुद गांव को ही करना होगा। आज के दौर में तो ये और भी आसान है। सूचना क्रांति ने जानकारियों पर से शहर की बपौती ख़त्म कर दी है। एक अच्छी बात ये है कि गांवों ने इस दिशा में क़दम उठा लिये हैं, शुरूआत है, है तो सही।

ये अब गांवों को ख़ुद सोचना होगा कि वो कब तक थर्मल पावर के पड़ोस में रहकर भी अंधेरे में टटोल-टटोल कर चलते रहेंगे। रायबरेली, देश की सबसे शक्तिशाली महिला के संसदीय क्षेत्र में लगे थर्मल पावर प्लांट के आस-पास के लगभग सौ गांवों में 19 घंटों की बिजली कटौती उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। सोचिये देश के दूसरे गांव समूहों का क्या हश्र होगा। गांवों के अनगिनत दर्दों में ये ये तो महज़ एक टीस है। घाव देखने और दिखाने की हिम्मत तो अभी आई ही नहीं है। “एक-दो ज़ख्म नहीं सारा बदन है छलनी, दर्द बेचारा परीशां है कहां से उट्ठे”।

पत्रकारिता और साहित्य में गांव नहीं, गांव में साहित्य और पत्रकारिता, विषय होना चाहिये था। गांव को अपना सूचना तंत्र ख़ुद खड़ा करना होगा और प्रशासन से सीधे तौर पर जुड़ना होगा। सरकार और गांव के बीच की हर दूरी स्वंय पाटनी होगी। तकनीक शहर से नहीं आती, पैसे से आती है, ये समझना होगा। अपनी ख़ुदी को ऊंचा कीजिये फिर देखिये दिल्ली में बैठे ज़िल्ले-इलाही कैसे झुक के आपसे पूछेंगे, बताओ हरिया, आप क्या चाहते हो?




अपनी पहली वर्षगांठ पर पाखी पत्रिका ने साहित्य और पत्रकारिता में गांव संगोष्ठी आयोजित करके गांव को याद किया तो सभा के सबसे नौजवान वक्ता पुण्य प्रसून बाजपेयी ने सभा को गांव के मर्म का एहसास कराया। शायद प्रसून ही ऐसा कर सकते थे, क्योंकि वो उस जमात से आते हैं जो कभी शहर आये ही नहीं। उनके गांव में दिल्ली महज़ एक बिंदु का नाम है। प्रस्तुत है पाखी की संगोष्ठी में जो उन्होंने बोला, स्वयं उनकी आवाज़ में –


(यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें)

हिंद युग्म अपनी बैठक में इस चर्चा को और आगे ले जाना चाहता है। क्योंकि हमारा मानना है कि हर दिल एक गांव का नक़्शा है।