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Saturday, May 15, 2010

पत्नियों के साथ रात बिताने का हक...

पाकिस्तान...जिसका नाम आते ही जेहन में बेहद दकियानुसी और फिल्मों एवं मीडिया की बदौलत बनी एक स्टीरियोटाइप तस्वीर सामने आने लगती है...लेकिन इसबार कुछ अलग और दिलचस्प मामला है...माजरा ऐसा कि सुनकर यकायक यकीन नहीं होगा कि यह ख़बर पाकिस्तान से आई है...जी हां, पाकिस्तान के सिंध प्रांत की सरकार ने क़ैदियों को उनकी पत्नियों से जेल के भीतर मिलने और रात गुजारने की सुविधा देने की घोषणा की है और बाकायदा इसकी व्यवस्था करने के लिए जेल अधिकारियों को आदेश भी दिया है.
पाकिस्तान की स्टेट होम मिनिस्ट्री ने इस संबंध में एक अधिसूचना जारी की है, जिसमें कहा गया है कि सिंध प्रांत की जेलों में क़ैद पुरूषों की पत्नियां अब उनके साथ हर 3 महीने के बाद जेल की भीतर एक रात बिता सकती हैं…
जेल अधिकारियों का आदेश दिया गया है कि जेल के भीतर क़ैदियों और उनकी पत्नियों के मिलने के लिए एक जगह की व्यवस्था की जाए...साथ ही उनकी गोपनीयता का भी ध्यान रखा जाए.
अधिसूचना के अनुसार 5 साल या उससे अधिक की सज़ा वाले क़ैदी इस सरकारी राहत से लाभ उठा सकते हैं...जो क़ैदी इस सुविधा का लाभ लेना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले जेल के अधीक्षक के समक्ष अपना निकाहनामा प्रस्तुत करना होगा...
अधिसूचना में कहा गया है कि अगर किसी क़ैदी की 2 पत्नियाँ हैं तो उन्हें अलग अलग समय दिया जाएगा, जबकि महिलाएं अपने साथ 6 साल की उम्र तक के बच्चों को भी ला सकती हैं...ये तो बल्ले-बल्ले है जी.
लेकिन ऐसा नहीं कि सभी क़ैदियों को यह सुविधा मिलने वाली है...पहली बंदिश तो 5 साल से अधिक की क़ैद होना है, दूसरी यह है कि संबंधित क़ैदी आतंकवाद के मामले में लिप्त न हो...या उस पर इससे संबंधित कोई मुकदमा न चल रहा हो.
खैर, एक तरफ जहां इस सुविधा को वाज़िब और लोकहित में बताया जा रहा है, वहीं सिंध के जेल अधीक्षकों के कान खड़े हो गए हैं...सरकार का क्या है...घोषणा तो सरकार ने कर दी, लेकिन मूर्त रूप तो उन्हें ही देना...ग़ौरतलब है कि सिंध प्रांत की 20 जेलों में 14 हज़ार के करीब क़ैदी बंद हैं...जबकि इन जेलों में 10 हज़ार क़ैदियों के रखने की ही जगह है...यानी एक तो पहले से ही सुपर हाउसफुल है...ऊपर से जब बीवी और बच्चों वाली बात आएगी, तो उनकी व्यवस्था कैसे की जाएगी...वह भी निहायत ही पोशीदा तरीके से...और तुर्रा ये कि इनमें से 75 फीसदी क़ैदियों के मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं.
हाल ही में अदालत ने अपने एक फैसले में कहा था कि शादीशुदा क़ैदी को अपनी पत्नी से मिलना का पूरा अधिकार है और यह सुविधा उसे जेल के भीतर दी जानी चाहिए...अदालत का कहना था कि क़ैदी अपनी पत्नी से न मिलने की वजह से मानसिक बीमारी का भी शिकार होते हैं और अक्सर नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं...यहां एक बात गौर करने वाली है कि जब क़ैदी जेल के अंदर हैं, तो उन्हें नशीले पदार्थ कहां से उपलब्ध होते हैं...यानी प्रशासन और व्यवस्था...अनचाहे और अप्रत्यक्ष रूप से यह भी मानती है कि उनकी जेलों में हिंदुस्तान की जेलों की ही तरह सबकुछ दुरुस्त है (खासकर बेऊर जैसी जेलों की तरह, जहां उत्कृष्ट किस्म के साहित्य से लेकर गुब्बारे और भी जाने क्या-क्या उपलब्ध होते रहते हैं)
इससे पहले भी 2005 में, पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत की सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर क़ैदियों को जेल के भीतर साल में 3 दिन अपनी पत्नियों के साथ रहने की अनुमति दी थी, जिसका व्यापक स्तर पर स्वागत किया गया था...यानी पश्चिमोत्तर प्रांत से चली ये बयार अभी दूर तलक जाएगी...अब तो भारत के क़ैदियों की भी यही तमन्ना है कि काश ! ये बयार भारतीय सरहद में दाखिल हो जाए.

आलोक सिंह साहिल

Sunday, September 13, 2009

मुद्दे चीख रहे हैं, क्या सरकार बहरी है?


इस देश में मुद्दों की कमी नहीं। हर रोज़ एक नया मुद्दा सामने आता है। कभी व्यवस्था पर चर्चा, कभी सरकार तो कभी पुराने गढ़े मुर्दे उखाड़ने पर समय की बर्बादी। हम भी चर्चा करेंगे। हमारी सरकार ने सौ दिन भी तो पूरे किये हैं अभी। काफ़ी महीने पहले मैंने अपने एक लेख में लिखा था कि चीन भारत का नम्बर एक शत्रु है। कुछ साथी जन साथ भी हुए। अब मीडिया भी यही कह रहा है। सरकार का रवैया अभी भी चीन को लेकर सख्त नहीं। चीन लद्दाख में घुस आया है। तवांग पर तो वो अपना हक जता ही चुका है। चीन भारत को हर ओर से घेर चुका है। लेकिन हम खामोश हैं। हम खामोश हैं क्योंकि हम डरते हैं(?)। चीन ने भारत की सीमा के अंदर आकर अपने देश का नाम लिखा। चीन ने बंगाल की खाड़ी में अपनी सेना का अड्डा बना रखा है जो हर वक्त भारत की अंतरिक्ष गतिविधियों पर नजर गड़ाये हुए है। वही हिन्द महासागर में श्रीलंका के साथ मिलकर दक्षिणॊ श्रीलंका के हम्बन्तोता में एक बन्दरगाह का निर्माण चल रहा है। ये गौरतलब है कि प्रभाकरण को मारने के लिये धनराशि चीन द्वारा ही मुहैया कराई गई। लेकिन हमारी सरकार अभी भी खामोश। यही बंदरगाह चीनी नौसेना का अड्डा बनने जा रहा है। जैसे श्रीलंका के साथ समझौता हुआ उसी तरह पाकिस्तान के साथ भी एक बन्दरगाह के लिये काम चल रहा है। और पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनाने का काम भी तो चीन ने ही किया है। फिर सरकार द्वारा ऐसी अनदेखी। चारों ओर से घेर कर हमला करने का इरादा है चीन का। इसके लिये हमारी क्या तैयारी है? क्या १९६२ दोहराया जायेगा। कश्मीर के हिस्से के साथ साथ अरूणाचल, सिक्किम और लद्दाख भी जायेगा?

दूसरा किस्सा हुआ झारखंड में जिसको मीडिया ने तरजीह नहीं दी। बीजेपी के विधायकों का इस्तीफ़ा। और हो भी क्यों न। पिछले नौ-दस महीने से राज्य में राष्ट्रपति शासन। राष्ट्रपति तो बस "नाम" है, देखा जाये तो केंद्र सरकार का शासन। झामुमो के शिबू सोरेन के हार जाने के बाद राज्य में केंद्र सरकार का कब्जा। कांग्रेस को मालूम है कि झारखंड में जीत की उम्मीद कम है। जब हरियाणा, महाराष्ट्र के चुनाव नवम्बर में करवाये जाने हैं तो झारखंड में अभी क्यों नहीं? कांग्रेस सरकार को किस बात का डर है कि संविधान को ही दरकिनार कर दिया। छह महीने से अधिक हो गये राष्ट्रपति शासन को और अभी तक चुनाव नहीं!!!

पिछले दिनों की एक और खबर, जो हमारी "सेक्युलर" मीडिया को नजर ही नहीं आई। वो था सांगली, महाराष्ट्र में गणेश विसर्जन के दौरान हमला किया जाना। अफ़जल खान का पेट फ़ाड़ते हुए शिवाजी दिखाये गये तो शायद कुछ लोगों से रहा नहीं गया। पंडाल पर हमला कर दिया। कहीं ये उल्टा हुआ होता, यानि अल्पसंख्यकों पर हमला हुआ होता तो मानवाधिकार वाले सामने आ चुके होते। वहाँ कर्फ़्यू लगाया गया। पुलिस पर दंगाइयों ने हमला किया पर प्रशासन व सेक्युलर मीडिया चुप रहा क्योंकि वो कुछ और "जरुरी" खबरें "बनाने" में लगे हुए थे। इसके बारे में समाचार पत्रों में भी नहीं आया और यदि आया तो कहीं थोड़ा सा कॉलम। पता नहीं ऐसा क्यों है? ये तो मेरे मीडिया मित्र ही बता सकते हैं कि मीडिया ने खबर को तवज्जो क्यों नहीं दी? एक उदाहरण देता हूँ। कोई कत्ल होता है तो लिखा जाता है कि "व्यक्ति का कत्ल हुआ"। और कहीं अल्पसंख्यक का कत्ल होता है तो... "मुस्लिम व्यक्ति का कत्ल हुआ".."ईसाई व्यक्ति का कत्ल हुआ"..या "सिख का कत्ल हुआ"... दोनों बातों में अंतर क्यों? क्या हर बार "व्यक्ति का कत्ल हुआ".. ऐसा नहीं लिखा जाता। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में फ़र्क क्यों? जवाब इस लेख को पढ़ने वाला हर मीडियाकर्मी दे।

बहरहाल अगला मुद्दा थोड़ा ताज़ा है और वो है आई.एस.आई चीफ़ का भारतीय उच्चायोग की इफ़्तार पार्टी में शामिल होना। पाकिस्तान में इफ़्तार पार्टी हुई और आई.एस.आई का मुखिया भी शामिल हुआ। कहा गया कि दोनों देशों में सम्बन्ध सुधारे जा रहे हैं। एक तरफ़ परमाणु मिसाइलों की तैयारी और मुम्बई में हुए हमले में ढुलमुल रवैया ऊपर से हमारी सरकार पाकिस्तान के साथ "सम्बन्ध" सुधारने लग रही है। ये क्या तरीका हुआ भई!! यहाँ तो पाकिस्तान का नहीं बल्कि हिन्दुस्तान का रवैया ढुलमुल लग रहा है। हमारा "महान" मीडिया और विपक्ष तो पड़ोसी के "गड़े मुर्दे" उखाड़ने में लगा हुआ है। इसीलिये हमें ही ये खबरें सामने लानी पड़ रही हैं।

तपन शर्मा

Tuesday, August 25, 2009

माँओं ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया...

शायर अहमद फ़राज़ की पहली पुण्यतिथि पर


अहमद फ़राज़ एक ऐसा नाम जिसके बिना उर्दू शायरी अधूरी है. आज अगर एशिया में इश्किया शायरी में फैज़ अहमद "फैज़" के बाद किसी शायर का नाम आता है तो वो हैं अहमद "फ़राज़". आज उनकी ग़ज़लें हिन्दुस्तान और पकिस्तान के अलावा कई और मुल्कों में भी मशहूर हैं. जहाँ भी इंसानी आबादी पाई जाती है. उनकी ग़ज़लें पढ़ी और सुनी जाती है.

अहमद फ़राज़ साहब की पैदाइश पकिस्तान के नौशेरा जिले में 14 जनवरी 1931 को को एक पठान परिवार में हुई. उन्होंने पेशावर युनिवर्सिटी से इल्म हासिल किया और वही पर कुछ वक़्त तक रीडर भी रहे. उनका विसाल (निधन) 25 अगस्त, 2008 को इस्लामाबाद के एक अस्पताल में हुआ. वो गुर्दे की बीमारी में मुब्तिला हो चुके थे. उन्हें पकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाल-ऐ-इम्तियाज़ भी हासिल था. इसी के साथ उन्हें कई और गैर मुल्की सम्मान भी मिले था.

फ़राज़ साहब की मकबूलियत और शोहरत का अंदाजा एक वाकये से लगाया जा सकता है. एक दफा अमेरिका में उनका मुशायरा था जिसके बाद एक लड़की उनके पास आटोग्राफ लेने आयी। नाम पूछने पर लड़की ने कहा "फराज़ा". फराज़ ने चौंककर कहा "यह क्या नाम हुआ?" तो बच्ची ने कहा "मेरे मम्मी पापा के आप पसंदीदा शायर हैं। उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फराज़ रखेंगे। लेकिन बेटी पैदा हो गयी तो उन्होंने फराज़ा नाम रख दिया।"

इस बात पर एक शे'र कहा था.

"तुझे और कितनी मोहब्बतें चाहिए फराज़,
मांओ ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया"


क्या कहते हैं दूसरे शायर

फ़राज़ की शायरी ग़में दौराँ और ग़में जानाँ का एक हसीन संगम है। उनकी ग़ज़लें उस तमाम पीड़ा की प्रतीक हैं जिससे एक हस्सास (सोचने वाला) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है। उनकी नज़्में ग़में दौराँ की भरपूर तर्जुमानी करती हैं और उनकी कही हुई बात, जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है।
कुंवर महेंद्र सिंह बेदी "सहर"

आज के दौर में भारत और पाकिस्तान की बंदिशों को नहीं मानने वाले लोगों की बेहद कमी है। पाकिस्तान में रहते हुए जिस तरह की परेशानियों को उन्होंने झेला और उसके बाद भी इंसानी आजादी और मजहब के भेदभाव से ऊपर उठकर लिखा वह काबिले तारीफ है।
डॉ. अली जावेद
(नेशलन काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के निदेशक)

फराज़ उर्दू रोमांटिक शायरी का ऐसा नाम है जिसकी गज़लों और नज्मों से तीन पीढ़ियां वाकिफ है। इस वक्त उनके जितने शेर लोगों को याद है उतने शायद ही किसी अन्य शायर के हों
मशहूर शायर मुमताज राशिद

फ़राज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं। उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं। बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं। उनका कलाम न केवल ऊँचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है।
मजरूह सुल्तानपुरी
इसी तरह से उनकी वतनपरस्ती की एक मिसाल मिलती है. पश्चिम एशिया के अरबी बोलने वाले मुल्कों में एक जश्ने-शायराँ (काव्योत्सव) बहुत मशहूर है—अल मरबिद पोयट्री फेस्टिवल. उसमें तमाम मुल्कों से अलग-अलग ज़बानों के मशहूर शायर हिस्सा लेने के लिए बुलाये जाते हैं. उसी में पाकिस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने आए थे जनाब अहमद फ़राज़. हिन्दुस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने के लिए भेजे गए थे जनाब रिफ़त सरोश. यह वह वक़्त था जब इराक़ की लड़ाई ईरान से चल रही थी और ख़ूब घमासान चल रहा था.

तमाम मुल्कों के शायर बग़दाद में मौजूद थे. इराक़ी हुकूमत को लगा कि यह बढ़िया मौक़ा है दुनिया भर के शायरों को ‘ईरान की ज़्यादतियों को दिखाने का'. इसलिए उन्होंने काव्योत्सव के एक दिन पहले जंग के मोर्चे पर ले जाने के लिए एक बस का इन्तज़ाम किया और सभी को एक-एक यूनिफॉर्म पकड़ाना शुरू कर दिया। सबब यह बताया गया कि जंग के मोर्चे पर जा रहे हैं तो जंग की पोशाक ही होनी चाहिए। हिफाज़त के मद्देनज़र यह ज़रूरी है. तमाम मुल्कों के शायर पोशाक की पुलिन्दा लेकर बस में जा बैठे। जब एक भारत से गए हिंदी कवि का नंबर आया तो वह अड़ गए कि मैं यह नहीं पहनूंगा. इंचार्ज इराक़ी कमाण्डर उसे समझाने आया तो उन्होंने उसे समझाना शुरू कर दिया और बताया कि मैं बसरा से एक बार उस इलाक़े को देखने एक पत्रकार के रूप में सादे लिबास में जा चुका हूँ। दुबारा अगर आप उस इलाक़े में ले ही जाना चाहते हैं तो मैं जैसा हूँ, भारतीय, वैसा ही चलूँगा. आपकी फौजी वर्दी पहनकर हर्गिज़ नहीं जाऊँगा। कभी अगर फौजी वर्दी पहनने का अवसर आया भी तो अपने देश के लिए पहनूँगा, इराक़ या ईरान के लिए नहीं। अफसर ज़रा तन्नाया लेकिन कर कुछ न पाया। उसने तुरुप चाल चली कि अगर मोर्चे पर आपको कुछ हो गया, गोली ही लग गई तो ?

"तो मैं, ज़ाहिर है कि मर जाऊँगा। लेकिन मरूँगा तो भारतीय. आपकी सैनिक वर्दी में अगर मरा तो मेरी पहचान भी सही न हो सकेगी," उन्होंने कहा।

उन हिंदी कवि के साथ साथ रिफ़त सरोश साहब भी अड़ गए. और लोग भी मेरी इस दलील में शामिल न हो जाएँ, इस डर से वर्दी न लेने वाले लोगों को साथ न ले जाना मुनासिब पाया गया और वह वापस रिफ़त साहब के साथ होटल लौट आये. लॉबी में देखा कि फ़राज़ साहब पहले से ही कुछ चाहने वालों के साथ बैठे हैं।

उन्होंने ही टोका : ‘तो आप लोग भी नहीं गए?’
‘जी नहीं ! हमें उनकी वर्दी पहनना गवारा नहीं था.’ हिंदी कवि ने कहा।
‘निहायत अहमक़ाना ज़िद थी। मैं भी इसी वजह वापस आ गया।’ फ़राज़ साहब ने कहा।

फिर हिंदी कवि ने मजाकिया लहजे में कहा कि इतने लम्बे-तगड़े पठानी बदन पर कोई इराक़ी वर्दी फिट भी तो नहीं आ सकती थी, फ़राज़ साहब। इतने ख़ूबसूरत बदन के सामने वर्दी को खुदकुशी करनी पड़ती और उन्होंने फ़राज़ साहब की ही ग़ज़ल का एक शेर उन्हें नजर किया :

जिसको देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है।
शहर का शहर हुआ दाखिले-ज़िन्दा जानाँ!


फ़राज़ साहब को जिन दो ग़मों ने ज़िन्दगी भर परेशान किया. वो हैं उन्हें देश निकला दे देना और पकिस्तान में जम्हूरियत कायम न हो पाना.

उन्होंने एक ग़ज़ल कही थी.

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है तो जमाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ


कुछ लोगों का कहना है कि यह ग़ज़ल फ़राज़ साहब ने अपनी महबूबा के लिए कही थी तो कुछ लोगो का कहना है कि उन्होंने यह ग़ज़ल पुष्पा डोगरा के लिए कही थी जो कि भारतीय कत्थक डांसर थी. लेकिन अहमद फ़राज़ साहब का कहना था कि यह ग़ज़ल उन्होंने पकिस्तान की जम्हूरियत के लिए कही. फर्क सिर्फ इतना है कि उसे अपनी महबूबा मान लिया है.

दूसरा गम उन्हें देश निकाला से मिला था. अपने इस गम को कितनी खूबसूरती से उन्होंने अपने अश'आर में कहा है.

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़न्दगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा।

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा।


हिजरत यानी देश से दूर रहने का दर्द और अपने देश की यादें अपनी उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।


फ़राज़ साहब हिन्दोस्तानी मुशायरों में उन्हें बख्शी गई इज़्जत का बयां करते नहीं थकते थे.

"हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहाँ के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शेअरी तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा। इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं"

वैसे तो फ़राज़ एक ग़ज़ल कहने वाले शायर कि हैसियत से जाने जाते हैं. लेकिन उनकी नज्मों का भी कोई सानी नहीं है.

ये दुख आसाँ न थे जानाँ
पुरानी दास्तानों में तो होता था
कि कोई शाहज़ादी या कोई नीलम परी
देवों या आसेबों की क़ैदी
अपने आदम ज़ाद दीवाने की रह तकते


फ़राज़ साहब को गुज़रे एक साल हो गया मगर उनकी शाइरी आने वाली कई पीढ़ियों को रोशनी देगी....

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


शामिख फ़राज़
(लेखक हिंदयुग्म के यूनिपाठक भी हैं...)

Thursday, May 07, 2009

देव का पाकिस्तान

बड़ी मुश्किल से फोन मिला था... पहले बस हेलो... और फिर अगले ही पल “सलाम वाले कुम... भाई कैसे हैं... सब ख़ैरियत... तबियत अच्छी है” जो मैं पूछना चाह रहा था वो पहली ही सांस में दूसरी तरफ़ से पूछा जा रहा था। हम ठीक हैं भाई... मैं तो आपकी ख़ैरियत पूछना चाह रहा था। जो ख़बरें हम तक पहुंच रही हैं वो बेचैन करने वाली हैं। आपका फोन ही नहीं मिल रहा था तो चिंता और बढ़ रही थी। “ नहीं भाईजान मैं बिल्कुल ठीक हूं (हल्की हँसी के साथ) ऐसा कुछ नहीं है... सब सकून में है... सब मंगल कुशल है...”

हमारे सामने फरवरी 2006 का वो दिन आकर खड़ा हो गया जब पहली बार हम इस इंसान से पेशावर में मिले थे, तब हालात आज जैसे नहीं थे। वैसे तो पेशावर का हमारा ये सफर हमारे चैनल की तरफ से भारत-पाक एकदिवसीय मैच के लिये था लेकिन उस रोमांच में रहमान बाबा रोड पर स्थित कांटीनेंटल गेस्ट हाउस के रिसेप्शन काउंटर के पीछे खड़े शख़्स ने और रंग भर दिये थे।

ये वही सरज़मीन थी जहां 1923 में एक पठान बच्चे ने जन्म लिया था। बच्चा बड़ा हुआ तो हिंदुस्तान की धड़कन बन गया। लोग उसे ट्रेजडी किंग कहने लगे। पेशावर का यूसुफ ख़ान बंबई का दिलीप कुमार बन गया। लेकिन आसिफ जावेद की शक्ल में फिर एक ट्रेजडी हमारे सामने थी। आसिफ जावेद (विज़िटिंग कार्ड पर आसिफ कुमार का यही नाम छपा था) ने उस दिन पेशावर में हमारा इस्तेक़बाल नहीं स्वागत किया था। पाकिस्तान कई बार गया था मगर पहली बार एक हिंदू पाकिस्तानी से मुलाक़ात हुई थी, वो भी पेशावर में। अफगानिस्तान की सीमा से लगे इस शहर में हम चार दिन रहे और इन चारों दिनों में हमारे काम की व्यस्तताओं के बाद हमारे रहबर, दोस्त, गाइड, सब कुछ आसिफ भाई ही थे।

मगर इन तीन बरसों में पाकिस्तान ने बरबादियों का एक लंबा सफर तय किया है। आसिफ भाई लाख कहें सब मंगल कुशल है लेकिन हक़ीक़त से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता, और हक़ीक़त ये है कि पाकिस्तान की अवाम पर तालिबानी ख़तरा मौत की तरह मंडरा रहा है। जब वहां का बहुसंख्यक तबका महफूज़ नहीं है तो अल्पसंख्यकों के बारे में फ़िक्र कौन करेगा? पेशावर में सिंध के मुक़ाबले हिंदू परिवार बहुत कम हैं। आसिफ भाई के मुताबिक़ कोई हजार बारह सौ परिवार। और उनके समुदाय के एक एम॰पी॰ किशोर कुमार सहब भी है। “यहां शहर में तो हम ठीक हैं.... हाँ बाजोड़ के आगे जो सिख फैमलीज़ हैं उन्हें बड़ा टार्चर किया हुआ है... काफी लोग तो पंजा साहब आ गये हैं... काफी पंजाब की तरफ निकल आये हैं... हिंदू परिवारों के साथ ऐसा नहीं है न... सिखों का मामला दूसरा है... इनकी तो शिनाख़्त नज़र आ जाती है न...”

यानी ख़तरा है मगर शिनाख़्त न हो पाने की वजह से बचे हुए हैं। जैसे ही हमने ये कहा आसिफ कुमार की आवाज़ में दर्द पैदा हो गया “देखे जी बस... जहां इतने... 16-17 करोड़ अवाम पड़ी हुई हैं वहां हम भी एक कोने में पड़े हुए हैं...जो सबके साथ है वो हमारे साथ भी है...” आसिफ जिस जमात से आते हैं वो पाकिस्तान में सिर्फ तीन प्रतिशत है। इनमें हिंदुओं के साथ सिख और ईसाई भी शामिल हैं। पेशावर के मशहूर रेस्ट्रॉ “हेरिटेज” के खान साहब बताते हैं कि “अकेले पेशावर में सैकड़ों चर्च हैं, कई शहर की महत्वपूर्ण लोकेशंस पर बने हैं। दर्जनों मस्जिदें यहां बमों से उड़ा दी गईं लेकिन कभी किसी चर्च को नुकसान नहीं पहुँचाया गया। न ही किसी मंदिर के बारे में ऐसी खबर मिली। पता नहीं ये कौन लोग हैं जो मस्जिदों को निशाना बना रहे हैं।” ख़ान साहब के दर्द में गुस्सा भी शामिल है। उनका कहना है कि इन आतंकियों का संचालन भी अमरीका कर रहा है और उनके खिलाफ जंग भी अमरीका कर रहा है।

“भाईजान हम सब हैरान हैं यहाँ कि ये कौन लोग हैं। यहाँ की अवाम के सामने सवाल है कि क्या ये हमारी जंग है? ये लड़ाई हमारे शहरों गली-कूचों तक आ गई है। अगर फौजी ऑपरेशन इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब पूरा मुल्क तालिबानियों के कब्ज़े में होगा। हम तो चाहते हैं भाईजान कि हमारे सियासी रहनुमाओं, मज़हबी विद्वानों और समाजी हस्तियों की मदद से इन लड़ाकुओं को बेनक़ाब किया जाय ताकि पूरी कौम उनका चेहरा अच्छी तरह से देख ले। इसके बाद लोगों को भरोसे में लेकर एक भरपूर फौजी आपरेशन कर, दहशतपसंदों को सरेंडर करने पर मजबूर करके, समस्या का सियासी हल निकालने के लिये रास्ता हमवार किया जाय। और जंग में बरबाद हो चुके लोगों की बहाली यूँ की जाय कि वो आतंकी ताकतों की तरफ आकर्षित न हों।”

मैं सोच रहा था कि कितना फर्क़ है अवाम की सोच में, अल्पसंखयकों की सोच में और अमरीकी-पाकिस्तानी हुक्मरानों की सोच में। अवाम के पास जो हल है उसका कोई खरीदार नहीं है, दूसरी तरफ अमरीकी इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के रिसर्च फेलो इम्तियाज़ अली के अनुसार पाकिस्तान के टूटने-बिखरने की बातें हो रही हैं। अलक़ायदा, तालिबान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे विषयों के पंडित भविष्यवाणियां कर रहे हैं कि पाकिस्तान टूटने की कगार पर है। यहां तक कि एक नक़्शा भी प्रकाशित किया जा चुका है, जिसमें दिखया गया है कि बलूचिस्तान तथा अफगानिस्तान से लगे पाकिस्तानी इलाकों के निकल जाने के बाद भविष्य का पाकिस्तान कैसा दिखेगा।

पाकिस्तान में तालिबानी ताक़त इस्लामाबाद से सिर्फ़ 60 किलोमीटर पर मौजूद है और ये दूरी लगातार कम होती जा रही है। वाशिंगटन में हिलैरी क्लिंटन पाकिस्तान पर इल्ज़ाम लगा रही हैं कि उसकी सरकार तालिबानियों के लिये रास्ता साफ कर रही है कि वो पूरे मुल्क की हुकूमत अपने हाथ में ले लें। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ राजनायिक वाजिद शम्सउल हसन जो ब्रिटेन में राजदूत भी रह चुके हैं, राष्ट्रीय खूफिया परिषद की वैश्विक भविष्य आंकलन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि 2005 में ही पाकिस्तान पर पड़ने वाले काले साय की पेशिनगोई की जा चुकी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सिविल वार, खूनखराबा, प्रांतीय झगड़े और न्यूक्लियर हथियारों पर कब्ज़ा करने के लिये संघर्ष के चलते, 2015 तक पाकिस्तान एक नाकाम देश की श्रेणी में आ जायगा।

2006 में आसिफ भाई से हमने जानना चाहा था कि क्या आमतौर पर हिंदुओं के नाम ऐसे ही होते हैं जैसा उनका नाम है? उन्होंने हामी भरी थी कि हाँ ऐसे ही नाम हम लोग रखते हैं। “पिछले साल मेरे यहाँ बेटा हुआ है और हमने उसका नाम देव रखा है। ये हमारे परिवार में पहला हिंदू नाम है।” आसिफ भाई का गर्व से फूलता सीना और आंखों की चमक हमारी याद्दाश्त में अभी तक उतनी ही ताज़गी के साथ बसी हैं।

हमारी हिम्मत नहीं हुई कि हम आसिफ कुमार से देव के बारे में कुछ पूछें। हमें इसका एहसास है कि ऐसे सवाल न चाहते हुए भी डर पैदा करते हैं। फिर भी हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका देव अब स्कूल जाने लगा होगा। गुजरता वक़्त उसे बड़ा कर देगा लेकिन ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि किस पाकिस्तान के नक्शे में उसका घर होगा। और शायद ये भी कि कैसा होगा देव के भविष्य का पाकिस्तान?

--नाज़िम नक़वी